16 अगस्त 2026

आज चारों तरफ सबसे आम कचरा जो दिखाई देता है वह पानी या कोल्डड्रिंक की प्लास्टिक बोतलें हैं। समंदर के किनारे लहरों से जो कचरा किनारे आकर लगता है उसे देखें, या शहरी नालों में पानी के ऊपर तैरते हुए कचरे को देखें, ऐसा लगता है कि कचरे की दौड़ में प्लास्टिक की खाली बोतलों का कोई भी मुकाबला नहीं है। और इंसान हैं कि वे बात-बात पर कोई न कोई बोतल खरीदते रहते हैं, कई बार तो महज इसलिए कि वे खरीद सकते हैं। वे चाहें तो अपने घर से पहले की पुरानी बोतलों में पानी लेकर निकल सकते हैं, लेकिन रास्ते में गाड़ी रोककर, या बैठक की मेज पर सजी हुई बोतल का इस्तेमाल शायद इसलिए बेहतर लगता है कि गंदे पानी के बीच जीती हुई इस दुनिया में वे कारखाने का बोतलबंद पानी खरीदने, या पाने के हकदार हैं। जिस वक्त जिन नालों में प्लास्टिक का कचरा पटा हुआ है, जिसकी वजह से शहरों में बाढ़ आ रही है, उसी वक्त उन्हीं नालों के भीतर घुसकर वहां पानी के किसी टपकते हुए पाइप से बाल्टियां भरकर गरीब अपने घर के लिए पानी ले जा रहे हैं। दिल्ली के नोएडा के ऐसे ही एक नाले में छोटी-छोटी बच्चियां धार्मिक नारों वाले कपड़े पहने हुए ऐसे पाइप पर खड़े होकर वहां से बाल्टी भर-भरके ऊपर घरवालों को दे रही थीं, और इसका वीडियो फैलने पर अफसरों ने टपकते पाइप को वेल्डिंग से बंद कर दिया। नाले के ऊपर से पीने का पानी पाने का एक रास्ता बंद हो गया। आज जो लोग बोतल का पानी पीते हैं, शायद कुछ तो उनकी प्यास बुझती है, और शायद अधिक हद तक उनका अहंकार शांत होता है कि डबरी, नदी की रेत से पानी पाकर पीने वाले लोगों की दुनिया में वे नई बोतल खोलकर आधी बोतल पानी पी सकते हैं, और आधा पानी फेंक भी सकते हैं, फिल्म जाने भी दो यारों, की तरह, केक आधा खाओ और आधा फेंको।
अब मैं प्लास्टिक की बोतल की जिंदगी सोचता हूं तो यह धरती पर साढ़े चार सौ बरस तक तो बनी ही रहेगी। उसके बाद शायद इसका प्लास्टिक खत्म होने लगेगा। सुबह-सुबह मैंने यह समझने की कोशिश की, कि अगर आज मैं एक बोतल का कचरा धरती पर छोडक़र जाता हूं, तो इन 450 बरसों में मेरी औसत रफ्तार से बढऩे वाली पीढिय़ों के कितने लोगों पर वह बोझ रहेगा। मुझे खुद अंदाज नहीं था कि चैटजीपीटी, और एक-दो दूसरे एआई औजार क्या आंकड़ा बता सकते हैं। एक पीढ़ी की औसत अवधि 25 साल अगर मान लूं, तो यह 18 पीढिय़ां बनती हैं जिन पर इस बोतल का प्लास्टिक प्रदूषण का बोझ रहेगा। अब अंकगणित के हिसाब से आज की भारत की जन्मदर को देखें, तो 18 पीढिय़ों के बाद मेरे जो वारिस होंगे, वे 2 लाख 62 हजार 144 होंगे। ये आंकड़े थोड़े कम अधिक हो सकते हैं। अब लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए छोडक़र जाने को एक गुमटी की जगह के पट्टे से लेकर, एक ठेले से लेकर, एक महल और कारखाने तक अधिक से अधिक इंतजाम करके जाना चाहते हैं। लोगों में विरासत छोडऩे की इसी अमर आकांक्षा को देखते हुए ही मैं प्लास्टिक की बोतल की विरासत देख रहा हूं। आज मेरी छोड़ी हुई बोतल के 2 लाख 62 हजार से अधिक वारिस हो सकते हैं, उतने लोगों के कलेजे पर यह बोझ हो सकती है, उतने लोगों की रगों में इसके विघटित प्लास्टिक का प्रदूषण घुसा हो सकता है। यह विरासत छोडऩा कैसा रहेगा?
चैटजीपीटी से सुबह मैंने इसका हिसाब लगाने कहा कि एक औसत हिन्दुस्तानी के साढ़े चार सौ बरस बाद कितने वंशज हो सकते हैं, तो उसने कहा कि यह गिनती लगाना जायज नहीं होगा, और इससे बेहतर होगा साढ़े चार सौ बरस लिखना। मुझे यह सफाई देनी पड़ी कि हिन्दुस्तान सदियों में नहीं जीता, अपने वारिसों में जीता है। साढ़े चार सदी बाद क्या होगा इससे किसी का कुछ लेना-देना नहीं है, अपने कुनबे में कितने लोग रहेंगे, इससे सबका बड़ा लेना-देना रहता है। इसलिए आज सबसे गैरजरूरी एक प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर मैं यह हिसाब लगा रहा हूं कि विघटित होता हुआ प्लास्टिक भी अब तरह-तरह से इंसानी बदन में घुसते जा रहा है, खून की नलियों में जमने लगा है, भ्रूण के भीतर भी मिलने लगा है, और इंसानों के दिमाग में भी। इसलिए आज जिस बोतल को आप पानी पीकर फेंक दे रहे हैं, उसे अपनी 18वीं पीढ़ी की खून की नलियों में जमते हुए भी सोचकर देखिएगा।
आज सरकार के ऊंचे स्तर पर, या छोटे दफ्तरों में भी जहां-कहीं खर्च का बजट रहता है, या ऊपरी कमाई रहती है, वहां भी, खुले पानी का चलन बंद हो गया है। हर जगह एक घूंट पानी पीने के लिए लोग एक बोतल खोलते हैं, और तीन चौथाई बोतल जूठी छोड़ भी जाते हैं। पानी की बर्बादी तो एक मुद्दा है, धरती के बदन को छेदकर भीतर से निकाले गए पानी को बर्बाद करने के अलावा इस एक-एक घूंट के लिए लोग प्लास्टिक की एक-एक छोटी बोतल इस्तेमाल करके फेंक देते हैं। यह सिलसिला शहरीकरण, सत्ता के बेजा इस्तेमाल, और सरकारी फिजूलखर्ची के साथ बढ़ते ही चल रहा है। अब संपन्नता के सामाजिक दिखावे के लिए पानी को प्लास्टिक की बोतलों में ही पेश करना जरूरी हो गया है।
मैंने एक-दो जगह बोतल का पानी पीने से मना किया, और लाने वाले कर्मचारी से कहा कि बोतल का पानी नहीं चाहिए, पानी ग्लास में ले आओ, तो उसने बोतल के ही पानी को ग्लास में निकालकर पेश कर दिया। बड़े बंगले के कर्मचारी को यह समझ ही नहीं पड़ा कि कोई मेहमान बोतल से परहेज कर सकता है, उसे लगा कि बोतल से पानी पीने से परहेज था, इसलिए उसने बोतल से ग्लास में उंडेलकर दे दिया। हर दिन धरती पर इस तरह का कचरा इस कदर बढ़ रहा है कि अब अलग-अलग शहरों में गार्बेज कैफे खुल रहे हैं जहां कचरा बीनने वाले लोग खाली बोतलें जमा करके कुछ खाने का कूपन पा सकते हैं। यह हो चुके प्लास्टिक कचरे का एक बेहतर इस्तेमाल तो हो सकता है, लेकिन यह धरती पर बोझ तो किसी न किसी शक्ल में बन ही चुका है।
इस सिलसिले को तोडऩे का एक बड़ा आसान तरीका है। किसी भी देश-प्रदेश में सरकारों में, राजभवनों या लोकभवनों में, अदालतों, और बड़े दफ्तरों में मुखिया पानी की अपनी बोतल लेकर चलें। एक बार यह सिलसिला शुरू होगा, तो दफ्तरों के कर्मचारियों तक अपने-आप फैल जाएगा। लेकिन जब तक सरकारी बैठकों में, मंच पर, बड़े जगहों के मुलाकातियों के लिए प्लास्टिक की बोतलें रहेंगी, तब तक वे सहूलियत से अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा, शान-शौकत, और अहंकार का प्रतीक बनी रहेंगी। पर्यावरण के प्रति सरोकार अगर जरा भी है, तो लोगों को अपने घर-दफ्तर का साफ पानी लेकर चलना चाहिए, जो कि किसी भी फैक्ट्री के लेबल लगे पानी से बेहतर होगा। फिर यह भी है कि आज खानपान के जितने सामान नकली पैकिंग में आ रहे हैं, बेस्वाद पानी को नकली पैकिंग में नहीं बेचा जा रहा होगा, ऐसा क्यों माना जाए? इसलिए बाजार पर भरोसा करने के बजाय अपने परिवार के साफ पानी पर भरोसा करना चाहिए।
किसी देश-प्रदेश में बोतलबंद पानी का चलन विकास का पैमाना नहीं है, वह तो इस बात का पैमाना है कि वहां सरकार की तरफ से मुहैया कराए गए पानी पर लोगों का भरोसा कितना कम है, वहां नलों का आम पानी कितना गंदा है। योरप के बहुत से देशों में बाथरूम के नल तक पर यह लेबल लगे रहता है कि यह पानी पीने के लिए एकदम सुरक्षित है। इधर बोतल से कम किसी को कुछ सुरक्षित नहीं लगता!
चूंकि संपन्नता की नजरों में सरोकार की कोई जगह नहीं रहती, इसलिए हम विरासत की भाषा में आज की इस बड़ी मामूली सी बात को रख रहे हैं। याद रखिएगा कि आपकी 18वीं पीढ़ी के 2 लाख 62 हजार लोगों तक तो आपकी छोड़ी बोतल का प्रदूषण जाएगा ही, उसके तुरंत बाद खत्म हो जाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। उस वक्त हो सकता है कि आपके वंशजों के बदन में इतना प्लास्टिक पहुंच चुका हो कि उनकी मामूली सर्जरी भी प्लास्टिक सर्जरी कहलाने लगेगी, मतलब प्लास्टिक की सर्जरी! अपनी अगली पीढिय़ों पर मेहरबानी रखिए, बोतलबंद पानी से दूर रहिए, अपने मेहमानों को दूर रखिए, और अपने साथ, अपने हाथ बोतल, मतलब पानी की, घर से लेकर चलिए।
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