भारत की जिंदगी में बिखरी कतरा-कतरा अंधेरी बातें...

23 अगस्त 2026  

 

अभी एक शहर के बाहरी हिस्से में एक खाली खदान में भरे हुए पानी में डूबकर एक नौजवान की मौत हो गई। आपस में कुछ नौजवान वहां भरे हुए पानी को तैरकर पार करने का मुकाबला कर रहे थे, बीच में दम टूट गया, और एक नौजवान डूब गया। अब यह साधारण खदान जितनी गहराई नहीं थी, चार सौ फीट गहरे पानी में नीचे तक जाकर ढूंढना स्थानीय बचावकर्मियों के लिए मुमकिन नहीं था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने नौसेना के अफसरों से बात करके गोताखोरों का इंतजाम किया था, लेकिन इसके पहले कि वे यहां के लिए रवाना हो सकें, कोई 80 घंटे बाद लाश तैरकर सतह पर आ गई। इस तरह छत्तीसगढ़ में नौसेना के गोताखोरों की पहली तलाश शुरू होने के पहले ही रूक गई। लेकिन इन चार दिनों शहर में जो बेचैनी रही, बचावकर्मियों पर जो दबाव रहा, वह बहुत था। ऐसी खतरनाक जगह पर लंबी तैराकी का मुकाबला बिना किसी बचाव के करने वाले लोगों ने अपनी जिंदगी तो गंवाई ही, सरकार पर भी एक असाधारण बोझ लाद दिया। एक दूसरी घटना में एक आदमी अपने दो बच्चों को लेकर कहीं नदी-तालाब के किनारे गया, बच्चे पानी में डूबते रहे, और किनारे बैठा बाप मोबाइल पर जुटे रहा, बच्चों की जिंदगी चली गई। रील बनाते हुए जिंदगियां देने वाले तो बहुत सारे लोग हैं, और हाईकोर्ट के हुक्म के बावजूद सडक़ों पर स्टंट करने वाले लोगों की भी कमी नहीं है। यह तो बात हुई जनता की, लेकिन जब हम सरकार या अदालत पर पडऩे वाले बोझ की बात करते हैं, तो सरकारों के बहुत सारे फैसले भी ऐसे रहते हैं जिनके बारे में सरकार को यह कानूनी समझ रहती है कि यह अदालती अग्निपरीक्षा को नहीं झेल पाएंगे, लेकिन वे ऐसे फैसले लेती हैं। ये फैसले सरकारी अमले के बारे में भी रहते हैं, जनता के बारे में भी रहते हैं। खुद अदालतों के भीतर अगर देखें, तो छोटी अदालतें ऐसे नाजायज फैसले भी देती हैं जो कि पहली नजर में ही गलत लगते हैं, और जिन पर ऊपर की अदालतों का और अधिक वक्त बर्बाद होता है। साम्प्रदायिक और राजनीतिक नेता कई तरह के भडक़ाऊ बयान देते हैं, जिनके बारे में उन्हें अंदाज रहता है कि इस पर या तो पुलिस रिपोर्ट होगी, या मुकदमे चलेंगे, या फिर कानून व्यवस्था की दिक्कत खड़ी होगी, और सरकारी अमला उसमें झोंकना पड़ेगा। 

हम भारत जैसे देश में सरकार और अदालत की उत्पादकता का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही गैरजरूरी मुद्दों में बर्बाद होते देखते हैं, जिन्हें वक्त रहते सुलझाया जा सकता था, या गलत फैसलों से बचा जा सकता था, बिना विवाद बढ़ाए काम हो सकता था। ऐसे फैसले निजी जिंदगी के भी रहते हैं, और सरकारी या अदालती भी। अब चाकू या पिस्तौल दिखाते हुए एक वीडियो बनाकर पोस्ट कर देने का मतलब यह रहता है कि उसकी तलाश करते हुए पुलिस सोशल मीडिया कंपनियों तक जाए, फिर पहचान निकालकर उनके घर जाकर पकड़े, उन्हें अदालत में पेश करे, जेल भेजे, और यही करते रह जाए। क्या आज टेक्नॉलॉजी और दूसरी वजहों से जिस रफ्तार से जुर्म बढ़ रहे हैं, उस अनुपात में अगर पुलिस और अदालत की क्षमता बढ़ाई जाएगी, तो उसका खर्च आएगा कहां से? जेलें कैदियों से उफन रही हैं, सडक़ें उन जानवरों से उफन रही हैं जिन्हें उनके मालिकों ने दूध की आखिरी बूंद तक निचोडक़र सडक़ों पर छोड़ दिया है। लोग इन जानवरों से टकराते हैं, अपनी जिंदगी देते हैं, और अगर खुद बच जाते हैं, तो जानवरों को जख्मी करने की तोहमत झेलते हुए जेल भी जाते हैं, भीड़ की मार भी खाते हैं, और कभी-कभी भीड़ के हाथों मारे भी जाते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या सरकार और अदालत का ढांचा, आम लोगों के लिए बनी हुई सडक़ें इसीलिए है कि लापरवाह और गैरजिम्मेदार लोग, मुजरिम किस्म के लोग उनका बेजा इस्तेमाल करें? यह सब होता तो जनता के ही टैक्स के पैसों से है। 

सरकारों की बात करें तो वे भी देश के संविधान के शब्दों और उसकी भावना के खिलाफ जाकर कई तरह के फैसले लेती हैं। फिर देश मेें चुनाव आयोग जैसी जो दूसरी संवैधानिक संस्थाएं बनाई गई हैं, वे भी बड़े पैमाने पर बदअमनी फैलाने का काम कर रही हैं। बंगाल में जिस तरह चुनाव के चलते हुए दसियों लाख मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया गया, सुप्रीम कोर्ट ने उसकी न्यायिक सुनवाई करने के लिए चुनाव आयोग से कहा। अभी भी इस लिस्ट में दसियों लाख लोग, शायद 30 लाख से अधिक, अर्जियां लेकर खड़े हुए हैं, और जिस रफ्तार से उनकी जांच की जा रही है, उससे खुद सुप्रीम कोर्ट का अंदाज है कि सारी अर्जियां निपटाने में 21 साल लग जाएंगे। इसका मतलब यह है कि यह चुनाव तो निकल ही गया, इसके बाद के और चार चुनाव निकल जाएंगे, तब तक आज की अर्जियां ही नहीं निपट पाएंगी, लोगों का वोट देने का अधिकार जाता रहेगा। यह तो गनीमत कि देश में सुप्रीम कोर्ट से ऊपर कोई और कोर्ट नहीं है, वरना यह फैसला किसी सुपर सुप्रीम कोर्ट में पल भर में खारिज हो गया रहता, कि अगर इस चुनाव में लोग वोट नहीं दे पा रहे हैं तो क्या हुआ, अगले चुनाव में दे देंगे। कोई सुप्रीम कोर्ट के जजों से यह बात कहकर देखते कि उनका इस जन्म में सुप्रीम कोर्ट के लिए सलेक्शन नहीं हो पाया तो क्या हुआ, अगले जन्म में हो जाएगा, तो पता लगता। हमारे कहने का मतलब यह है कि गनीमत कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को संसद के अलावा कहीं और चुनौती नहीं दी जा सकती है, वरना ढेर सारे फैसलों को खारिज करने के तर्क तो हमारे जैसे को ही सूझते रहते हैं। आज की इस चर्चा में हम कॉकरोच-प्रसंग पर कुछ लिखना नहीं चाहते क्योंकि उस अवांछित प्रसंग पर बहुत बार बहुत कुछ लिख चुके हैं। 

भारतीय लोकतंत्र में लोगों के नफरती और जहरीले बयानों से लेकर तरह-तरह के लोगों के किए जा रहे तरह-तरह के जुर्म तक इतना कुछ ऐसा हो रहा है कि उससे पुलिस, अदालत, सरकार, और समाज सबका जीना हराम है। यह सिलसिला कैसे कम होगा? कैसे लोगों में सामाजिक सरोकार आ सकता है, सामूहिक चेतना आ सकती है, कानून के प्रति सम्मान आ सकता है, कैसे सरकारों से बददिमागी कम हो सकती है, कैसे पूरे भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर फैला हुआ भ्रष्टाचार घट सकता है, कैसे महिलाओं का सम्मान पत्थर-मिट्टी की देवी प्रतिमाओं के बराबर हो सकता है, कैसे बच्चों के साथ बर्ताव तथाकथित इंसानी हो सकता है, कैसे लोग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी मंजूर कर सकते हैं? कैसे ये तमाम चीजें भारतीय जीवन में लौट सकती हैं, या पहली बार आ सकती हैं? यह न सिर्फ हथियारबंद अराजकता है, बल्कि तथाकथित मानवीय मूल्यों की अराजकता भी है, जो कि वैचारिक से लेकर शारीरिक हिंसा तक भारतीय जनजीवन पर हावी हो चुकी है। कानून के प्रति हिकारत, समाज के प्रति गैरजिम्मेदारी, दूसरों के अधिकारों की हेठी, क्या नहीं है हिन्दुस्तान में? किस तरह सार्वजनिक जगहों पर और जनजीवन मेंं कभी दुरुस्त न होने वाला नुकसान होते चल रहा है, क्या कोई इस बारे में सुधार करने की बात सोच भी रहे हैं? यह एक बहुत लंबी-गहरी अंधेरी सुरंग की तरह है, जिसमें अगर किसी को आखिर में उम्मीद की किरण अगर दिखती भी है, तो वह असली होने के बजाय घुप्प अंधेरे में दिखती मृगतृष्णा ही है।

(Daily Chhattisgarh)   

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