नशे पर सवार दौलत का अहंकार, इस हिंसा पर अतिरिक्त सजा जरूरी..

01 सितंबर 2026  

 

अभी दिल्ली से लगे हुए यूपी के नोएडा के एक महंगे रिहायशी कॉम्पलेक्स का एक वीडियो सामने आया जिसमें देर रात दो बजे नशे में धुत्त वहां रहने वाली एक महिला ने इमारत के एक-एक गार्ड को माँ-बहन की गालियां बकते हुए उन्हें अखिलेश यादव का कुत्ता कहा, भंगी कहा, पुलिस बुलाने पर पुलिस अफसर से चप्पलें खिलवाने की धमकी दी। ऐसा कम से कम चार-पांच मिनट का यह वीडियो अपने को ताकतवर, रूतबे वाली करार देती हुई इस महिला का लोगों के बीच सुनने लायक भी नहीं है क्योंकि उसने माँ-बहन की गालियों की विविधता भी पेश की है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वह हर चौथे वाक्य में गार्डों को गरीब कह-कहकर गाली दे रही थी। उसके हिसाब से गरीब होना एक बड़ी गाली के लायक जुर्म था। बाद में पुलिस को बुलाने पर उसने इस महिला का चालान किया, और बॉंड भरवाकर छोड़ दिया। 

दिल्ली के आसपास के संपन्न इलाकों से हर कुछ हफ्तों में पैसे वाले तबके की किसी न किसी महिला का ऐसा वीडियो सामने आता है जो नशे में धुत्त रहती है, और कॉलोनी के सुरक्षा गार्डों को धमकाती रहती हैं, मारती रहती हैं, और ऐसी अश्लील गालियां देती रहती हैं, जिन्हें आमतौर पर सडक़ के लोगों का सडक़छाप विशेषाधिकार माना जाता है। इनमें से हर किसी को पता रहता है कि उनकी रिकॉर्डिंग कैमरों पर हो रही है, सीसीटीवी कैमरों पर भी, और सामने से मोबाइल कैमरों पर भी। इसके बावजूद उन्हें ऐसी हरकतों से परहेज नहीं रहता। इनकी बातचीत में अपनी हस्ती, और सामने वाले की औकात की बातें तरह-तरह की गालियों के साथ गूंजती रहती हैं। सबसे बड़ा गुमान उन्हें अपने पैसों का रहता है। तैश का अंदाज यह रहता है कि गरीब गार्ड, टैक्सी ड्राइवर, किसी रेस्त्रां के वेटर को गालियां देते बार-बार यह कहते हैं कि वे जानते नहीं कि वे कौन हैं? ऐसा ही सडक़ों पर गाडिय़ों के भिड़ जाने पर, किसी के सामने आ जाने पर भी किया जाता है। मतलब यह कि संपन्नता नशे के सिर पर सवार होकर एक अलग सुपरनागरिकता दिला देती है। 

यह देश अपने गौरवशाली इतिहास पर चाहे कितना ही दंभ भरे, आज का सच तो यह है कि पैसों की ताकत, सत्ता या किसी और किस्म के ओहदे की ताकत जिस तरह यहां सिर चढक़र बोलती है, उससे लगता है कि देश के एक हिस्से को ऐसे संपन्न लोगों की नागरिकता के लिए अलग से रिजर्व कर देना चाहिए, ताकि वे बाकी गरीब लोगों की छाया से भी दूर रह सकें। एक वक्त था जब नीची कही जाने वाली कुछ जातियों के लोगों को गले में हंडी टांगकर चलना पड़ता था, ताकि उनकी शिनाख्त अलग से हो सके, और उन्हें थूकना हो तो हंडी में ही थूकें, जमीन पर नहीं। आज भी गरीब से हिकारत आम बात है। शहरी भीड़ में जाति तो उतनी आसानी से नहीं पहचानी जाती, लेकिन गरीबी तो हुलिए से दिख जाती है। ऐसे गरीबों से हिकारत उसी तरह की रहती है जिस तरह कुछ तबकों को अछूत मानते हुए उनसे सदियों से हिकारत चली आ रही है। 

अगले दिन जब एक बड़े अखबार ने नोएडा की इस महिला से बात की, तो उसे अपने किए हुए पर जरा भी मलाल नहीं था। उसने खुद होकर कहा कि उस रात उसने पी रखी थी, और उसने बाहर से खाना मंगाया था, लेकर आए हुए लडक़े को गार्डों ने गेट पर रोक दिया था क्योंकि रात के दो बजे थे। इस महिला को फोन लगाया गया, लेकिन जवाब न मिलने पर डिलिवरी ब्वॉय को भीतर नहीं जाने दिया गया। इस बात को लेकर उसने नशे की हालत में नीचे आकर गार्डों को पीटने की भी कोशिश की, उन्हें सबसे गंदी गालियां दीं, जाति की गालियां दीं, धमकियां दीं, और जाने क्या नहीं किया। भारत कहने के लिए अपने को बड़ी महान संस्कृति वाला देश कहता है, लेकिन यहां आज ऊंची समझी जाने वाली जातियों का अहंकार, नीची समझी जाने वाली जातियों से भेदभाव, बहुसंख्यक, और अल्पसंख्यक धर्म के लोगों के अधिकारों के बीच भेदभाव, अफसरों और जनता के बीच भेदभाव, अमीर और गरीब के बीच भेदभाव सिर चढक़र बोलता है। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं है। लोग जितनी बड़ी और जितनी महंगी गाडिय़ों पर चलते हैं, उनका अहंकार भी उतना ही बड़ा हो जाता है, वे सडक़ों पर भी एक अलग, खास दर्जे के बनकर चलते हैं, मानो उन्हें सडक़ पर अपनी बड़ी गाड़ी की वजह से, अपनी अहंकारी औकात की वजह से एक अलग दर्जा मिलना चाहिए। भारत में गैरबराबरी इस हद तक सिर चढक़र बोलती है, और यह गैरबराबरी का प्रदर्शन इतना बढ़ते चल रहा है कि देश की सभ्यता मानो रिवर्स गियर में चल रही है, पीछे की तरफ जा रही है। 

दुनिया के सभ्य देशों में कोई आम और खास नहीं होते, सबके सार्वजनिक अधिकार बराबर होते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में वीआईपी, और वीवीआईपी दर्जे ऐसे खड़े कर दिए गए हैं कि अंग्रेज चले गए, अपनी काली औलादें छोड़ गए। इन तबकों के लोग उसी हवा में साँस कैसे ले पाते हैं जिस हवा में आम लोग भी साँस लेते हैं, यह समझना मुश्किल रहता है। क्यों ये लोग अपने लिए एक अलग से बुलबुले की शक्ल का, कांच के डोम वाला शहर नहीं बना लेते, जहां आम लोगों की छोड़ी हुई साँस भी हवा में न मिल सके? क्यों ये लोग अपने लिए सीधे गंगोत्री से पाईप लाईन नहीं बिछवाते ताकि नीची कही जाने वाली जातियों, गरीबों, और गैरवीआईपी लोगों की छुई हुई नदी का पानी इन्हें न लेना पड़े? क्यों ये लोग गरीबों के साथ एक मेट्रो में, एक प्लेन में, या एक ट्रेन में चाहे अलग डिब्बे में ही क्यों न सही सफर करते हैं? ऐसी कई बातें आज भी परेशान करती हैं कि ताकतवर तबके क्यों इतने कमजोर तबकों के लोगों के साथ एक ही धरती पर जीते हैं, क्यों इन लोगों को छोडक़र वे ऊपर स्वर्ग नहीं चले जाते?  

हम बीते कुछ दशकों से यह बात लिख रहे हैं कि जब संपन्न या ताकतवर तबके किसी विपन्न या कमजोर तबके के खिलाफ कोई जुर्म करते हैं, तो उसके लिए अलग से सजा का इंतजाम होना चाहिए। हो सकता है कि दो साधारण, या आम लोगों के बीच जुर्म पर जितनी सजा हो, दौलतमंद के गरीब के खिलाफ जुर्म पर उसी सजा को दुगुना कर दिया जाए, या बड़े नेता या अफसर के किसी छोटे कर्मचारी, या कमजोर जनता पर किए गए जुल्म पर आम जुर्म के मुकाबले दोगुनी सजा कर दी जाए? इस देश में न्याय व्यवस्था में ऐसे फेरबदल की जरूरत है ताकि गरीबों पर होने वाले जुल्म को रोकने के लिए अधिक और अतिरिक्त सजा का इंतजाम किया जाए, उसके बिना नशे में धुत्त पैसे वाले गरीबों को इसी तरह माँ-बहन की गालियां देते रहेंगे। 

(Daily Chhattisgarh)   

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