एआई से होने वाली किफायत मौलिकता की कीमत पर है...

09 सितंबर 2026  

 

कुछ मुद्दे ऐसे रहते हैं जिस पर न लिखने का इरादा रहे, तो भी आसपास कुछ न कुछ ऐसा होता है कि लिखना पड़ जाता है। जैसे ट्रम्प, या एआई, या धर्मान्धता। आज लिखने के लिए पेरिस के एफिल टावर पर स्वामिनारायण सम्प्रदाय के संन्यासियों का खड़ा किया गया बवाल एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इस पर बहुत से दूसरे विश्लेषकों ने लिख दिया है, बहुत से लोगों के बयान आ गए हैं, और उस पर लिखने की जरूरत कुछ कम रह गई है। लेकिन एआई पर लिखने की जरूरत खत्म हो ही नहीं रही है। हर दिन दुनिया में कहीं न कहीं से एआई को लेकर ऐसी खबरें आती हैं कि नए खतरे दिखते हैं, और नई चुनौतियां भी दिखती हैं कि एआई की वजह से लोगों का सोचना कितना कम हो रहा है, दिमाग में कल्पना करने वाला हिस्सा, मौलिक सोचने वाला हिस्सा काम कम पा रहा है, चुनौतियां बिल्कुल नहीं पा रहा है, और धीरे-धीरे लोग अपने बहुत किस्म के काम एआई को ठीक उसी अंदाज में देते चले जा रहे हैं, जिस अंदाज में कोई बड़े नेता अपने भाषण लिखने का जिम्मा भाड़े, या तनख्वाह के लेखकों को देते चले जाते हैं। असल जिंदगी में यह देखने मिलता है कि नेताओं की अपनी सोच की मौलिकता, और कल्पनाशीलता उनके लिए रखे गए भाषण-लेखकों की वजह से घटती चलती है। अब जिन्हें लीडरशिप करनी है, चाहे वह किसी सरकार की हो, संगठन की, या कि किसी कंपनी की, अगर उनका सोचना कम होते चलेगा, तो धीरे-धीरे लीडरशिप की उत्कृष्टता भी घटने लगेगी। एक दूसरा खतरा यह भी रहता है कि मदद करने वाला एआई हो, या भाषण लिखने वाले पेशेवर लेखक हों, उनकी सोच के दायरे में लीडरों की सोच कैद होने लगती है। लेकिन लोगों को इसमें कुछ अटपटा इसलिए नहीं लगता है कि जिनकी रोजी-रोटी ही भाषण लिखने से चलती है, वे शब्दों के खिलवाड़ तो लीडर से बेहतर कर ही सकते हैं, और जब लोगों की वाहवाही  पेशेवर की लिखी लफ्फाजी से हासिल होने लगती है, तो फिर लीडर को मौलिक सोच की जरूरत और भी कम लगती है। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

यह एक ऐसा मददगार औजार साबित हो रहा है जिससे लोगों का काम हल्का होते चल रहा है, गैस के गुब्बारे जैसा। एआई ऐसी आदत बिगाडऩे वाला रहता है कि अगर हम अपने अखबार के लिए उससे इसी जगह छपने वाला संपादकीय लिखवाना चालू करें, तो वह शायद हमसे ज्यादा सधी हुई भाषा में लिख देगा। जब किसी विषय पर रिसर्च करते हुए एआई से तथ्य तलाशने को कहा जाता है, तो वह बार-बार उकसाता भी है कि अगर आप चाहें तो मैं इस पर संपादकीय लिख दूं। फिर उसे बड़ी मुश्किल से रोकना पड़ता है कि लिखने के लिए विचार हमारे पास जरूरत से अधिक हैं, सिर्फ पुराने तथ्यों को ढूंढने के लिए एआई की जरूरत है, इसलिए हमारी रोजी-रोटी पर डकैती न डालें, और सिर्फ तथ्य ढूंढकर बताएं। इससे परे बहुत से ऐसे काम एआई अपनी तरफ से नए सुझाने लगता है जो कि मानवीय सीमाओं से परे के रहते हैं। कल ही कोई एक तथ्य ढूंढते हुए एआई से लंबी बातचीत हुई, तो उसने उन आंकड़ों को पिछले सवा सौ साल के रिकॉर्ड देखकर, उनका विश्लेषण करके सामने रखने का प्रस्ताव रखा। फिर उसके साथ विचार-विमर्श करते-करते कई तरह के पैमाने तय किए गए, कुछ अपवादों पर विचार किया गया, और फिर उससे विश्लेषण करवाया गया। किसी मानवीय क्षमता में इतना विश्लेषण आता नहीं है। नतीजा यह होता है कि असाधारण और तकरीबन नामुमकिन किस्म के काम जब एआई से होने लगते हैं, तो दिमाग उसी तरफ अधिक चलने लगता है कि ऐसा असाधारण विश्लेषण करना कितना अनोखा होगा। दिमाग की मौलिक सोच कम होने लगती है, और हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद एआई के इस्तेमाल से हमारी मेहनत पर भी असर पडऩे लगा है। यह तो कुछ मौलिक काम खुद करने की आदत अभी बनी हुई है, वरना एआई ने दिमाग पर पूरी तरह चर्बी चढ़ाने का प्रस्ताव रखना जारी रखा था। 

कई बरस पहले देश के संपादकों के एक सरकारी जमावड़े में, उत्तर-पूर्व के एक राज्य में कमजोर इंटरनेट के बीच संपादकीय लिखकर भेजना बड़ी चुनौती का काम था। वहां पर कुछ कल्पनाशील संपादकों ने यह तरीका निकाला था कि इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइटें थीं जो हर दिन कई विषयों पर संपादकीय टिप्पणी लिखकर डालती थीं। बहुत से संपादक अपने दफ्तरों में इन्हीं में से किसी वेबसाइट से टिप्पणी लेकर संपादकीय छापने का जिम्मा किसी को दे आए थे। मतलब यह कि आज एआई जिस तरह लोगों को अलाल बनाने पर आमादा है, उस तरह का काम तो एआई के आने के दो दशक पहले से इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ने करना शुरू कर दिया था। नामी-गिरामी संपादकों को भी यह अपमानजनक नहीं लगता था कि उनके अखबार के संपादकीय कॉलम में इंटरनेट से उठाकर सामग्री छाप दी जाए। अब एआई ने तो यह सहूलियत दे रखी है कि एक विषय पर किसी एक एआई से एक लाख अलग-अलग लोग अपनी थोड़ी सी सोच बताकर, उसे एक रूख या रूझान सुझाकर, भाषा शैली बताकर एक लाख किस्म के संपादकीय लिखवा सकते हैं। 

हमारी बातचीत अपने खुद के पेशे तक सीमित हुई चली जा रही है, जबकि लिखना तो एआई का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, शायद उसकी क्षमता का सबसे आसान वाला एक-लाखवां हिस्सा। एआई का असली काम तो वैज्ञानिक, और कारोबारी विश्लेषण, और जरूरत पडऩे पर, मांगने पर निष्कर्ष सुझाने जैसा काम है। अब अगर दुनिया की कई कंपनियों में मैनेजमेंट ही लोगों पर यह बंदिश लगा रहा है कि वे अपने काम में एआई का भरपूर इस्तेमाल करें, एआई का इस्तेमाल न करने पर लोगों को नोटिस जारी हो रहे हैं, या उनकी नौकरियां ली जा रही हैं, तो फिर ऐसे में किसी भी क्षेत्र के मुखिया या लीडर अपने आपको एआई की आदत से कैसे बचा सकते हैं? एक तरफ तो उससे कई सहायकों की जरूरत खत्म हो रही है, काम जल्दी हो रहा है, पहले जो काम अकल्पनीय थे, अब कुछ पलों में हो जा रहे हैं, और फिर कंपनियां हैं कि एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं। तो ऐसे में किसी भी संगठन या कारोबार के नेता, या मीडिया में समाचार-विचार लिखने वाले लोग अपनी मौलिकता कब तक कायम रख सकते हैं? फिर आज आधी सदी से जो केलकुलेटर इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनकी वजह से लोगों के दिमाग से पहाड़ा निकल ही चुका है, उसी तरह अब जिस रफ्तार से एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लोगों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता दोनों की छुट्टी होने का खतरा आ गया है। अभी न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने वहां की स्कूलों में आठवीं क्लास तक के बच्चों के लिए जनरेटिव एआई औजार इस्तेमाल करने पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। आज कंपनियां खर्च में कटौती करने के लिए जिस तरह एआई को बढ़ावा दे रही हैं, उससे उन कंपनियों में काम आसान, और सस्ता तो हो रहा है, लेकिन कल्पनाशीलता, और मौलिकता का विसर्जन भी हो रहा है। इसके खतरे दिखते-दिखते दिखेंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

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