लड़कियों के धड़ल्ले से, और बरसों से शोषण का एक साधारण समाधान...

13 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के नक्सल हिंसा मुक्त पूरी तरह आदिवासी जिले बीजापुर की एक भयानक खबर है। वहां एक सरकारी आवासीय स्कूल में एक कम्प्यूटर शिक्षक आधा दर्जन से अधिक छात्राओं से दो साल से अश्लील हरकत करते आ रहा था, और विरोध करने पर परीक्षा में फेल करने और बदनाम करने की धमकी देता था। अब ऐसी सात छात्राओं ने परिवार के साथ जाकर कलेक्टर से इसकी शिकायत की है, और मामले की जांच शुरू हुई है। इससे भी गंभीर बात यह है कि छात्राओं का कहना है कि उन्होंने प्राचार्य से जब भी इसकी शिकायत की, प्राचार्य ने धमकाकर उन्हें चुप रहने कहा। एक तरफ तो छत्तीसगढ़ की पहचान एक आदिवासी प्रदेश की है, दूसरी तरफ एक पूरी तरह आदिवासी इलाके में पढऩे का उत्साह रखने वाली बच्चियों के साथ ऐसी हरकत न सिर्फ शिक्षक कर रहा है, बल्कि प्राचार्य इन बच्चियों को ही धमका रहा है। ऐसे मामले प्रदेश में दूसरी जगह भी आए हैं, और लड़कियां जगह-जगह देह-शोषण का शिकार होती ही रहती हैं। और तो और राजधानी रायपुर में राज्य सरकार के एक सबसे प्रमुख, नामी-गिरामी स्कूल में वहां का शिक्षक लगातार लड़कियों को अश्लील संदेश भेजता था, और इसकी शिकायत करने के बाद भी इस पर कार्रवाई करवाने के लिए उनके पालकों को प्रदर्शन करना पड़ा था। राज्य बनने के पहले से ही आदिवासी इलाके इस तरह की मनमानी के अधिक शिकार रहते हैं क्योंकि यह मान लिया जाता है कि गरीब, या अनपढ़ आदिवासियों की कोई आवाज तो रहती नहीं है, वे शिकायत लेकर कहीं जाकर सुनवाई की उम्मीद भी नहीं कर सकते। चौथाई सदी पहले यह राज्य बन गया, लेकिन आज भी जगह-जगह से छात्राओं के शोषण की बात उसी तरह सामने आती है, जिस तरह देश के दूसरे कई प्रदेशों से आती है। ऐसा लगता है कि भारत में छात्राओं के शोषण की एक मजबूत संस्कृति बन चुकी है, और पांच-दस बरस की कैद का डर भी किसी बलात्कारी के हौसले पस्त नहीं करता। 

अब अगर कोई ऐसे लोगों को सजा मिल जाने को काफी मान लें, तो वह देश की लड़कियों के साथ बड़ी ज्यादती होगी। एक बार यौन शोषण हो जाए, उसके बाद जाकर मुजरिम को सजा मिले, तो उससे ऐसे जुल्म की शिकार लडक़ी का व्यक्तित्व, और उसका आत्मविश्वास तो पहले सरीखे हो नहीं सकते। एक बार हिन्दुस्तानी समाज में किसी लडक़ी या महिला के दिल-दिमाग में जख्म आ जाएं, तो वे जाते नहीं हैं। इसलिए सरकारों को लड़कियों पर मंडराते ऐसे खतरे सिरे से ही दूर करने चाहिए। मामूली फेरबदल से कुछ बदलते दिख नहीं रहा है, इसलिए कुछ बुनियादी परिवर्तन जरूरी हैं। शोषण आमतौर पर लड़कियों का ही होता है, और आमतौर पर पुरूष अध्यापक, या प्राचार्य, खेल प्रशिक्षक, या स्कूल-हॉस्टल के कर्मचारी ही करते हैं। इसलिए क्या लड़कियों की स्कूल शिक्षा में महिला कर्मचारियों के अनुपात को बढ़ाना कोई समाधान हो सकता है? क्या नियुक्ति के समय ही शिक्षिकाओं का आरक्षण बढ़ाकर इतना कर दिया जाए कि पुरूष शिक्षक अनुपात में हर जगह कम रहें, महिला शिक्षकों तक शोषण की शिकार लड़कियां अधिक आसानी से जा सकें? इस संभावना पर जरूर ही विचार करना चाहिए, क्योंकि इससे यौन शोषण का खतरा तो कम होगा ही होगा। दूसरी बात यह कि लड़कियों की स्कूल-कॉलेज में शोषण की शिकायत करने की व्यवस्था पुख्ता की जानी चाहिए। इसके लिए दूसरी स्कूल की शिक्षिकाओं को भेजकर छात्राओं से बंद कमरे में एक-एक कर यह जानकारी लेनी चाहिए कि क्या उन्हें किसी शोषण का शिकार होना पड़ रहा है? और फिर इसकी रिपोर्ट पर सरकार को गौर करना चाहिए। अपनी ही स्कूल में एक साथ काम करने वाले पुरूष और महिला शिक्षक एक-दूसरे के लिए हमदर्दी रख सकते हैं, और कुछ बातों को छुपा सकते हैं। इसलिए दूसरे स्कूल की महिलाओं को, या किसी दूसरे विभाग की महिलाओं को भेजकर ऐसी पूछताछ करनी चाहिए। यह भी होना चाहिए कि बच्चों और महिलाओं के लिए सरकार की जो हेल्पलाइन है, उस पर फोन करने के लिए स्कूल-कॉलेज की लड़कियों का प्रशिक्षण होना चाहिए, उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, और उन्हें इस बात की एडवांस गारंटी देनी चाहिए कि उनका नाम, या उनका नंबर उजागर नहीं होगा। छोटी कक्षाओं की लड़कियों को जहां-जहां गुड टच, और बैड टच का फर्क समझाया जाता है, वहां से लड़कियों की शिकायतें आने लगती हैं। लड़कियों को उनके तन-मन के बारे में बेहतर समझ देने का काम भी करना चाहिए, और उन्हें शिकायत करने के अपने अधिकार, और अपनी जिम्मेदारी, दोनों की समझ देनी चाहिए। एक जागरूक लडक़ी अपने या किसी सहपाठिनी के हो रहे शोषण की सूचना देने का हौसला जुटा सकेगी। स्कूल-कॉलेज, खेल के मैदान, या ऐसे दूसरे प्रशिक्षण संस्थानों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि अगर यौन शोषक के खिलाफ जल्द ही शिकायत न हो, तो वे एक सीरियल मुजरिम की तरह आगे बढ़ते ही चले जाते हैं, और शोषण का सिलसिला कई दूसरी लड़कियों तक भी पहुंच जाता है। 

हम एक दूसरा तर्क भी देना चाहते हैं जो कि हम बरसों से इस कॉलम में लिखते आ रहे हैं। समाज में ताकतवर तबके जब कमजोर तबकों पर जुर्म करने पर उतर आते हैं, तो बलात्कार जैसे जुर्म में बलात्कारी की सम्पत्ति का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला को देने का कानून बनाना चाहिए। अब हमें यह लग रहा है कि बलात्कारी शिक्षक-प्रशिक्षक, या हेडमास्टर-प्राचार्य के सरकार के पास जमा किसी भी तरह के धन का एक हिस्सा भी बलात्कार या यौन शोषण की शिकार लडक़ी को मिलना चाहिए। ऐसा इसलिए कि शिक्षक-शिष्या के संबंध में शिक्षक ताकतवर होते हैं, और शिष्या कमजोर होती है। फिर शिक्षक किसी शिष्या की हिफाजत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं, और जब चौकीदार ही चोर हो जाएं, इलाज करते डॉक्टर ही कातिल हो जाएं, थानेदार ही डकैत हो जाए, तो उन्हें अतिरिक्त सजा, और अतिरिक्त जुर्माने का इंतजाम होना चाहिए। 

फिलहाल हम अपने पहले समाधान पर लौटते हैं, सरकार को इस पर गौर करना चाहिए कि जहां कहीं छात्राएं पढ़ती या रहती हैं, जहां वे खेलती हैं, या कोई प्रशिक्षण पाती हैं, वहां पर महिला कर्मचारियों का अनुपात बढ़ाया जाए। किसी भी प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी सबसे अधिक संख्या में रहते हैं। ऐसे में दसियों हजार महिला कर्मचारियों के लिए काम के अवसर भी पैदा होंगे। नियुक्ति के समय महिलाओं को अधिक आरक्षण देने से छात्राओं के शोषण की यह समस्या धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी। यह कोई आदर्श समाधान नहीं है, लेकिन देश की स्थितियां भी आदर्श नहीं हैं, और असाधारण स्थितियां असाधारण समाधान की हकदार होती हैं। भारत में लड़कियों को आगे बढ़ाने बिना अगली चौथाई सदी बिना पूरी संभावनाओं तक पहुंचे गुजर जाएगी। इसलिए लड़कियों की पूरी पीढ़ी को आत्मविश्वास से भरने, और उनका बेहतर व्यक्तित्व विकास करने की जरूरत है, उसी से यह देश आगे बढ़ सकेगा, उसी से आधी आबादी को उसके जायज हक मिल पाएंगे, और उसी से यह देश एक बेहतर संस्कृति पा सकेगा, जो कि आज बहुत शर्मनाक है।

(Daily Chhattisgarh)   

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