07 सितंबर 2026
दिल्ली में छात्रों के रहने वाली एक पांच मंजिला इमारत ढह गई जिसमें 5-6 छात्रों की मौत हो चुकी है, और मलबेतले दो दर्जन छात्रों के दबे होने की आशंका है। तीस साल से अधिक पुरानी इस इमारत की तीन मंजिलें अवैध थीं। उतना वजन तो पुरानी इमारत के ढांचे पर था ही। इसके अलावा इसमें तलघर और खोदा जा रहा था। इमारत का नाम सत्य निकेतन था, मालिक का नाम हरिराम, और यहां कॉलेज-विश्वविद्यालय के लडक़े रहते थे। तंग गली की इस इमारत तक बचाव की मशीनें जाने में भी दिक्कत थी। पूरे इलाके में किराया कमाने का यही हाल बताया जा रहा है। देश की राजधानी में जहां केन्द्र सरकार के मातहत राज्य सरकार चलती है, जहां सुप्रीम कोर्ट बैठता है, और जहां कि म्युनिसिपल का बजट किसी छोटे राज्य के बजट जैसा रहता है, वहां पर अवैध निर्माण इतने धड़ल्ले से होता है कि हर बाल्कनी, और हर छत पर कई किराएदार रख लिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक-दो दशक पहले दिल्ली के तलघरों में चलने वाले कारोबार बंद करवाए थे, और उन्हें सील करवाया था, लेकिन जिस तरह का हाल अवैध निर्माण को लेकर बाकी देश का है, उसी तरह का दिल्ली में भी है, दिल्ली में शायद कुछ अधिक ही है।
आज दुनिया में जहां-जहां भूकम्प आता है, वहां कुछ देशों में नुकसान अधिक होता है, और कुछ में कम। इसके पीछे की एक ही वजह बताई जाती है कि जहां सरकारें निर्माण नियम अधिक कड़ाई से लागू करती हैं, वहां पर मौतें कम होती हैं। अब हिन्दुस्तान में भी कई हिस्सों में भूकम्प का खतरा बना हुआ है, कई प्रदेशों में भूकम्प आया हुआ है। भूकम्प से परे नदियों, और समंदर के किनारे नियम-कानून के खिलाफ जाकर निर्माण किए गए हैं, जो कि बाढ़ या तूफान की, सुनामी की नौबत में बहुत बड़ी तबाही कर सकते हैं। देश में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, और हर किस्म की जमीन पर अवैध निर्माण लोगों की आदत हो गई है, और सत्तारूढ़ नेताओं का, सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसरों का पूरा समर्थन इनको रहता है। देश में कुछ प्रदेशों में नियमों का पालन अधिक होता होगा तो उसके बारे में हमें अलग से जानकारी नहीं है, लेकिन जहां-जहां की जानकारी है, ऐसा लगता है कि भूमाफिया और कंस्ट्रक्शनमाफिया सरकार पर हावी रहते हैं। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही देखते हैं कि शहर से लगी हुई चारों तरफ की खेती की जमीन को राजनीतिक संरक्षण पाए हुए जमीन-माफिया प्लाट काटकर उसकी अवैध बिक्री करते रहते हैं, किसानों की जमीन की रजिस्ट्री उन्हीं के दस्तखत से हो जाती है, और मध्यमवर्गीय लोग खरीददार रहते हैं। इस बीच में भूमाफिया का नाम भी कागजों पर नहीं आता, और उनके नाम की बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बन जाती हैं। धीरे-धीरे इतने अधिक पैसों के कारोबार से इतनी ताकत जुट जाती है कि ऐसे लोग चुनाव लडऩे की भी सोचने लगते हैं, या अधिक सहूलियत की बात रहती है कि निर्वाचित नेताओं को ही खरीद लेते हैं। नए और पुराने सभी तरह के अवैध निर्माण इतनी बड़ी कमाई का जरिया होते हैं कि अवैध कमाई का कद्दू कटता है, तो सबमें बंटता है। मीडिया भी ऐसे धंधों से बड़े-बड़े इश्तहार पाकर काले कारनामों को अनदेखा करते रहता है।
लेकिन किसी भी देश-प्रदेश में राजधानी बाकी इलाके के लिए एक मिसाल रहती है। नियमों की जितनी हेठी राजधानी में होती है, बाकी इलाकों में उससे कुछ अधिक ही होती है। इसलिए दिल्ली में इतने बड़े-बड़े अवैध कारोबार चलना, लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाली अवैध इमारतें बनने देना, यह सब रातों-रात तो नहीं हो जाता। किसी इमारत में कई अवैध मंजिलें अगर जुड़ गई हैं, तो उसे तो म्युनिसिपल अपने दफ्तर में बैठे हुए सेटेलाइट मैप पर भी देख सकता है। इन्हें अनदेखा करना एक साजिश का हिस्सा रहता है। जहां देश की सबसे बड़ी अदालत भी बैठी हुई है, हाईकोर्ट भी वहां पर है, और केन्द्र सरकार भी है जिसकी दिलचस्पी इतने छोटे अवैध निर्माणों से कमाई में नहीं हो सकती। उसके बाद भी अगर दिल्ली धड़ल्ले से अवैध निर्माणों से भरी हुई है, तो उसे अनदेखा करने के पीछे सरकारी और राजनीतिक नीयत बिल्कुल ही रहती है। आज चूंकि दिल्ली में दो-तीन इंजनों वाली सरकार है, इसलिए कोई किसी और को तोहमत नहीं दे सकते।
पुरानी इमारतों का खतरा देश के तमाम शहरों में है। उन्हें गिराने के खिलाफ कई तरह की ताकतें काम करती हैं। दशकों से जो किराएदार वहां बसे रहते हैं, वे नहीं चाहते कि इमारत गिरे, और नई बने, क्योंकि नई इमारत में मकान मालिक उन्हें जगह दे या न दे, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। इसलिए कुछ जगहों पर मकान मालिक इमारत को गिरवाना चाहते हैं, किराएदार बचाना चाहते हैं। कई जगहों पर मकान मालिक ही जर्जर निर्माण को बचाए रखना चाहते हैं। फिर इसके बाद ऐसे जर्जर भवनों में ऊपर अवैध मंजिलें जोड़ी जाती हैं, और नीचे अवैध तलघर बनाया जाता है। इनका गिरना तय सरीखा रहता है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि सरकार को इसकी जानकारी नहीं रहती है। देश के हर हिस्से में निर्वाचित पार्षद, या पंच रहते हैं, अब तो म्युनिसिपलों का ढांचा इतना बड़ा हो गया है कि चारों तरफ उसके कर्मचारी-अधिकारी रहते हैं। अब एक मामूली से फोन से वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है कि कहां-कहां अवैध निर्माण हुआ है, या हो रहा है। सरकारें उपग्रह तकनीक का इस्तेमाल करती ही हैं ताकि टैक्स निकाला जा सके। ऐसे में अगर म्युनिसिपलें शहरी जिंदगी को सुरक्षित रखने के बजाय इतनी बुरी तरह खतरे में डालती हैं, तो इसके पीछे एक संगठित मोटी कमाई रहती है। कई लोगों को यह भी लगता है कि ऐसे हादसों के जिम्मेदार अफसरों के लिए भी कैद का इंतजाम होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान का एक बुरा तजुर्बा यह रहा है कि सिर्फ कानून कड़ा करते चले जाने से, सजा बढ़ाते चले जाने से कुछ होता नहीं है। असर तो तभी हो सकता है जब तेज रफ्तार से इंसाफ हो। लेकिन हिन्दुस्तान की अदालतों का हाल यह है कि मामले-मुकदमों के बोझ से उसका अपना ढांचा जर्जर हो गया है, और लोगों को इस खतरनाक भवन के नीचे सुनवाई के बजाय सडक़ों पर इंसाफ करने की भी सूझने लगी है।
शहरीकरण और शहरी विकास के मुद्दे बहुत जटिल हैं, हम यहां बहुत सीमित जगह में इससे अधिक कुछ कह नहीं सकते, लेकिन अलग-अलग पार्टियां, अलग-अलग समय पर अलग-अलग सत्ता पर काबिज रहती हैं, और जब तक भ्रष्टाचार से इन सबको परहेज नहीं होगा, जब तक अदालतें कड़ा रूख अख्तियार नहीं करेंगी, जब तक आज का स्वतंत्र मीडिया माफिया कारोबार का भांडाफोड़ नहीं करेगा, तब तक अवैध निर्माण के बंद होने की कोई अधिक उम्मीद नहीं की जा सकती।
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