अपना घर छोड़ 22 सौ किमी दूर ओडिशा के जंगलों में कहां से पहुंचे ओरांग-गुटान बच्चे!

10 सितंबर 2026  

 

ओडिशा में अभी हैरान करने वाली बात। वहां बालासोर के इलाके में एक जंगल में पेड़ों पर पांच ओरांग-गुटान मिले। ये भारत के निवासी ही नहीं है, और सुमात्रा के जंगलों में पाए जाते हैं। वहां से वे ओडिशा कैसे पहुंचे, यह भी हैरानी की बात है। बंदर और चिम्पांजी जैसी एक नस्ल के ओरांग-गुटान के ये पांच बच्चे छह महीने से एक साल उम्र के हैं, इनमें भी सबसे छोटा बच्चा तो बहुत ही कम उम्र का है। ये दो हजार किलोमीटर से अधिक दूर इंडोनेशिया के सुमात्रा के टापू से पूरा समंदर पार करके ओडिशा के जंगल में कैसे आ गए, यह एक रहस्यमय पहेली है। स्थानीय सूचना बताती है कि इसी जंगल के आसपास रहस्यमय तरीके से एक काली थार गाड़ी देखी गई थी, और अब उसकी तलाश चल रही है। इनके आने की एक संभावना जिंदा वन्य जीवन तस्करी करने वाले लोग हो सकते हैं जो कि इस समंदर के रास्ते इन्हें ओडिशा लाए हों, और फिर जमीन के रास्ते भारत के किसी दूसरे हिस्से में ले जा रहे हों। भारत के अड़ोस-पड़ोस के कोई देश इतने संपन्न नहीं हैं कि जहां इस तरह के दुर्लभ जानवरों का भुगतान करने वाले लोग हों। भारत के जमीनी रास्ते से अगर कोई इन जानवरों को चीन ले जाने की बात सोचे, तो चीन का समुद्री रास्ता इंडोनेशिया, यानी सुमात्रा से करीब है, उसे इतने लंबे रास्ते की जरूरत नहीं है। लेकिन एक दूसरी खबर जो अभी-अभी आई है वह एक और चोरी की घटना बताती है। बांग्लादेश के गाजीपुर सफारी पार्क से मार्च 2025 में तीन रिंग-टेल्ड लेम्यूर चोरी हुए थे। बांग्लादेश की सीआईडी जांच के मुताबिक ये जानवर कई हाथों से गुजरने के बाद भारत लाए गए, और गुजरात के वनतारा वन्य प्राणी केन्द्र से जुड़े एक संस्थान को 48 लाख रूपए में बेचे गए। इस मामले में बांग्लादेश की अदालत में आठ आरोपियों से छह ने जुर्म मानते हुए बयान दिए हैं। बांग्लादेश की यह खबर वहां के सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और आज जब ओडिशा में इंडोनेशिया के ओरांग-गुटान इस तरह मिल रहे हैं, तो यह खबर याद पड़ती है। 

भारत से वैसे भी बहुत सारे प्राणी दुनिया के दूसरे देशों में भेजे जाते हैं, और वहां से भी दुर्लभ वन्य प्राणी भारत आते हैं। बहुत बड़े-बड़े, कई रंगों वाले तोते सरीखे काकातुआ भारत के संपन्न लोगों के घरों में दिखते हैं, वे तस्करी से ही आए हुए रहते हैं। इसी तरह कई अलग-अलग दुर्लभ नस्लों के छोटे कछुए लोग अपने घरों के मछलीघर में पालते हैं। भारत में प्रतिबंधित कुत्तों की कुछ नस्ल भी जगह-जगह लोगों पर हमला करते दिखती है, और उन्हें पालने वाले लोग बहुत संपन्न बददिमाग रहते हैं जिन्हें दूसरों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं रहती। भारत के समुद्रतटों पर, हवाई अड्डों पर, कभी इस देश से बाहर ले जाते, तो कभी दूसरे देश से यहां लाते हुए तरह-तरह के प्राणी पकड़ाते हैं। इनके बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि जब कानूनी रूप से इन्हें लाया, या ले जाया जाता है, उनकी तरह-तरह की चिकित्सकीय जांच होती है, जो कि भारत के लिए भी जरूरी होती है, और दूसरे देश के लिए भी। लेकिन गैरकानूनी कारोबार में ऐसी कोई जांच नहीं की जाती, और इन प्राणियों के साथ कई तरह के रोग पहली बार भारत पहुंच सकते हैं, या भारत से उन देशों में जा सकते हैं। लोगों को याद होगा कि दूसरे देश से किसी भी तरह के बीज या पौधे लाने पर भी दुनिया के अधिकांश जिम्मेदार देशों में बड़ी रोक लगी रहती है। ऐसे बीजों, या पौधों के साथ में कई तरह के नए रोग आ सकते हैं, जिसमें देश में पहले से मौजूद वनस्पतियों को खतरा हो सकता है। इसी तरह तस्करी से लाए गए जानवरों से भारत में पहले से मौजूद जानवरों को भी खतरा हो सकता है, और भारत के इंसानों को भी। 

इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में वन्य जीवन की तस्करी पर नजर रखने वाली केन्द्र सरकार की संस्था डीआरआई ने अभी कल ही पिछले दस दिनों की कार्रवाई की जानकारी जारी की है, जिसमें तेंदुए की दो खालें, 180 जिंदा इंडियन स्टार कछुए, एक दुर्लभ किस्म की एक दर्जन बड़ी छिपकलियां (टोके गेको), और पेंगोलिन के करीब 24 किलो छिलके, बाघ की आधा किलो हड्डियां जब्त की गई हैं, और करीब 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें ओडिशा से लेकर मेघालय और असम तक कई जगह यह कार्रवाई हुई है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर और लगे हुए महाराष्ट्र के जंगलों में भी अवैध शिकार, और उससे हासिल जानवर की खाल जब्त हुई थीं, और इनमें तो वन विभाग के कर्मचारी भी शामिल मिले हैं। 

आज जब भारत जैसे देश में हर किस्म के जुर्म में शामिल मुजरिम बढ़ते चले जा रहे हैं, साइबर क्राइम से लेकर वाइल्ड लाईफ तस्करी तक बढ़ते चल रही है। ऐसे में इन्हें पकडऩे वाली एजेंसियों में भी जब कुछ भ्रष्ट लोग घुस जाते हैं, तो बाहर के मुजरिमों की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। भारत कैसे चारों तरफ की सरहद से होने वाली तस्करी को रोक सकता है, यह उसके सामने एक बड़ी चुनौती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार के खरीददार अच्छे दाम लेकर मौजूद रहेंगे, तब तक हिन्दुस्तान में अवैध शिकार, और तस्करी को खत्म कर पाना नामुमकिन है। आज तो हम हर दिन किसी न किसी प्रदेश में ऐसा कत्ल देखते हैं जिसमें जमीन-जायदाद की विरासत पाने के लिए आल-औलाद ही माँ-बाप को कत्ल कर देती है, ऐसे में जंगली जानवरों से भला किसको मोहब्बत हो सकती है? फिर आज तो गांव-गांव तक इंसानों, और फसलों पर जानवरों का जो खतरा मंडराता रहता है, वह भी भयानक है, उससे भी बहुत से इंसानों को एक बहाना मिलता है कि उन्हें अपने आपको बचाने के लिए जंगली जानवरों को मारना ही है, यह उनकी मजबूरी है। फिर भी आसमान से गिरे, और ओडिशा के जंगल के पेड़ों पर टंगे ओरांग-गुटान के बच्चे कई तरह के सवाल खड़े करते हैं। भारत में वन्य प्राणियों को रखने वाले निजी चिडिय़ाघरों, और दूसरे वैसे केन्द्रों को भी जांच-पड़ताल की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

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