13 सितंबर 2026

एक वक्त देश की एक बड़ी दलित पार्टी रही बसपा की मुखिया मायावती भारतीय राजनीति में अपनी पार्टी की सुप्रीमो कहलाती हैं। लोकतंत्र में जहां पर निर्वाचित अध्यक्ष होने चाहिए, वहां पर एक कुनबे की यह पार्टी मायावती से ही शुरू हुई और मायावती की अगली पीढ़ी पर ही यह दम तोड़ दे रही है। कहने के लिए मायावती के राजनीतिक गुरु रहे कांशीराम ने इस पार्टी को शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनकी राजनीति में उनकी चहेती मायावती आगे बढ़ते-बढ़ते इस पार्टी पर काबिज हो गईं। बीते कुछ दशक लोगों ने मायावती को कभी भाजपा, तो कभी समाजवादियों के साथ समझौते करके सत्ता पर बने रहते देखा, लेकिन बीते एक दशक, या कुछ अधिक से मायावती साल में जारी होने वाले दो-चार बयानों से परे घरघुस्सू नेता हो गई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें चौखट से बाहर निकलते ही दरवाजे की एक तरफ ईडी और दरवाजे की दूसरी तरफ सीबीआई के भूत हवा दिखाते हैं। उनकी दहशत इस हद तक बढ़ी हुई है कि हाल के कई चुनावों में उन्होंने बसपा को खुद होकर हाशिए पर ले जाते-ले जाते फुटपाथ के किनारे की नाली में डाल दिया है। उनकी पूरी राजनीति अब केंद्र सरकार की मेहरबानी पर चल रही सांसों तक सीमित हो गई है। यह एक अलग बात है कि लंबे समय से दलित राजनीति की उत्तर भारत में अगुवा बनी हुई मायावती और उनकी बसपा कागजों पर भी जिंदा हैं और किसी दूसरी दलित पार्टी के लिए मैदान खाली नहीं कर रहे हैं। न खुद दलितों के लिए कुछ करना, न और किसी को दलित अगुवाई करने देना।
अब मायावती के एक दूसरे पहलू पर चर्चा जरूरी है। वैसे तो हमें खुद ही याद नहीं पड़ता कि मायावती पर इसके पहले कितने बरस पहले लिखने की नौबत आई थी, या एक दशक ही हो गया है। फिलहाल पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अपने कुनबे को चर्चा में लाने की हरकतें इतनी तेज कर दी हैं कि अब उन पर लिखे बिना रहना कुछ मुश्किल हो रहा है। निहायत गैरजरूरी और अप्रासंगिक पारिवारिक हरकतों को वे देश की राजनीति की मुख्यधारा में एक बड़े घटनाक्रम की तरह पेश कर रही हैं और इसीलिए इस परले दर्जे की कुनबापरस्ती पर चर्चा जरूरी है। बीते बरसों में मायावती के भाई आनंद कुमार का नाम खबरों में तब-तब आया है और तभी आया है जब मायावती ने उसके बेटे आकाश आनंद को कभी संगठन में अपना वारिस बनाया और कभी इस विरासत से बेदखल करने की मुनादी की। अपने भतीजे को लेकर मायावती के विरासत के फैसले इतनी बार भीतर-बाहर हो चुके हैं कि उन्होंने रेल के भाप इंजन के पिस्टन को भी मात कर दिया है। अब उन्होंने ताजा मुनादी की है कि वे अपने दोनों भतीजों को राजनीतिक पदों से बाहर रखने का अंतिम फैसला ले चुकी हैं। इसके साथ ही मायावती ने इसी भाई की बेटी दीपिका आनंद के लिए पार्टी में भूमिका की गुंजाइश छोड़ी है। उन्होंने कहा कि दोनों भतीजों को कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी, जबकि जरूरत पडऩे पर भतीजी दीपिका अपने पिता आनंद कुमार की मदद कर सकती है। इसके कुछ दिन पहले ही अपने भतीजे के अलावा मायावती ने भतीजे के ससुर को भी पार्टी से भीतर-बाहर करने का एक सिलसिला चला रखा था और अब मायावती की सार्वजनिक चेतावनी के बाद भतीजा-ससुर ने अपने को बसपा की राजनीति से परे रखने की घोषणा की है।
दिलचस्प बात यह है कि मायावती खुद पूरी जिंदगी से मुलायम सिंह की कुनबापरस्ती, कांग्रेस की कुनबापरस्ती के ऊपर खुले हमले करती आई हैं और दूसरी तरफ अपने भाई आनंद कुमार को उन्होंने बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना रखा है, और भतीजे को वे विरासत पर लाती और वहां से हटाती रही हैं। अब उनका एक दावा यह भी हैरतअंगेज है कि उन्होंने बसपा को कुनबापरस्त नहीं बनने दिया और अपने भाई-बहन, रिश्तेदारों को सांसद-विधायक या मंत्री जैसे पदों से दूर रखा। भतीजे और उसके ससुर को लेकर सत्ता देने और छीनने की जिस तरह की सार्वजनिक घोषणाएं मायावती राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों की तरह घोषित करती आई हैं, उससे वे मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का एक दिलचस्प विषय बनती हैं। लेकिन कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त...! आकाश आनंद का एक छोटा भाई ईशान आनंद, मायावती का सगा भतीजा ही है। उसे संगठन में 2 को छोड़ सभी राज्यों का अगुवा बना दिया गया और इस घोषणा में मायावती ने यह भी कहा कि वह अपनी रिपोर्ट अपने पिता आनंद कुमार को देगा। 7 सितंबर की इस घोषणा को पलटकर मायावती ने 12 सितंबर को यह नया संविधान रचा कि आनंद कुमार के दोनों बेटों को बसपा में कोई राजनीतिक पद नहीं मिलेगा। दोनों भतीजों को लात मारकर बाहर करने के बाद उनकी बहन दीपिका को जिम्मेदारी देने की घोषणा भी की। जिस मायावती को देश में दलित-विरोधी ताकतों से लडऩा था, वह मायावती अपनी घरेलू पार्टी के भीतर अपने ही मानसिक विरोधाभासों से लड़ते जिंदगी गुजार रही हैं।
भारत में पहले भी कहा जाता है कि बैठा बनिया (दुकानदार) क्या करे, इधर का डिब्बा-उधर करे। जैसे कोई किराना व्यापारी ग्राहकी न रहने पर दुकान के ही सामानों को इधर-उधर करता है, वैसा ही मायावती कोई चुनाव लडऩे, कोई राजनीति करने के बजाय कुनबे के भीतर उठा-पटक में लगी हैं। किसी सुबह बड़े भतीजे ने चाय खराब बनाई, तो पार्टी छोटे भतीजे को दे दी, और छोटे भतीजे ने नींबू-शहद में शहद ज्यादा मिला दिया तो पार्टी भतीजी को दे दी। फिर इस उठा-पटक में इन भतीजे-भतीजी का पिता, मायावती का भाई भी है, और एक समधी, भतीजा-ससुर भी है। उत्तर भारत की जुबान में अगर कहें तो यह गजबै पार्टी है। मायावती की पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी को देखें, तो उसके चार पैर, एक सूंड और एक पूंछ-ये सब आपस में ही एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। माया का हाथी कभी किसी पैर पर खड़ा हो रहा है, कभी किसी दूसरे पैर पर, कभी सूंड पर, तो अब दुम पर खड़ा करने की घोषणा की गई है। जिस भारत में दलित आबादी 16 फीसदी से अधिक है, उसकी उत्तर भारत की सबसे बड़ी पार्टी बसपा का यह बुरा हाल है। एक वक्त साइकिल पर घूम-घूमकर बसपा को खड़ा करने वाले कांशीराम ने अपनी चहेती को इस पार्टी का वारिस इसलिए तो नहीं बनाया था कि वह जांच एजेंसियों की दहशत में आकर पार्टी को घर के भीतर खेले जा रहे लूडो जैसा बना दे। घरेलू लूडो में भी खेल के नियम तो लागू होते हैं, लेकिन इस मायावी दुनिया में तो देश में दलितोद्धार के योद्धा इस आधार पर बनाए और मिटाए जाते हैं कि उस सुबह मायावती का मिजाज कैसा है।
हमारा यह मानना है कि जिस देश में तमिलनाडु जैसी परिपक्व दलित राजनीति होती आई है, जिस देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने दलितों में नवजागरण का महाभियान कामयाब किया, उस देश में दलित राजनीति को एक कुनबे के भीतर खाने की मेज पर सीमित कर देना और एक सनकी की सनक के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना, यह दलितों का बहुत बड़ा अपमान है। आज देश के कानून में दलितों के अपमान करने के खिलाफ जो कानून बने हैं, वे बड़े कमजोर हैं, वरना हमारा यह मानना है कि मजबूत दलित संरक्षण कानून के तहत मायावती के इन फैसलों को दलित समुदाय का अपमान मानते हुए मायावती पर कार्रवाई का प्रावधान रहना चाहिए था। एक महिला जिसने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में एक से अधिक बार मुख्यमंत्री रहते हुए अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की फसल ही खड़ी कर दी थी, जिस महिला ने अपने जीते-जी अफगानिस्तान की बुद्ध प्रतिमाओं जैसी विशालकाय पाषाण प्रतिमाएं बनवा ली थीं, उस महिला ने आज दलितों की राजनीतिक चेतना को कुचलकर रख दिया है। हमारा मानना है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों से घिरी हुई मायावती दलित-चेतना की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई हैं। और उत्तर भारत में, हिंदी प्रदेशों में इसका कोई विकल्प बनना जरूरी है। शायद भाजपा इस नौबत में छुपी संभावनाओं को समझ रही है, इसीलिए वह दलित-संत रयदास के गांव की मिट्टी कलश में लेकर सिर पर चढ़ाकर पूरे देश में गांव-गांव जा रही है।
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