04 सितंबर 2026
अमरीका के कैलिफोर्निया के सानफ्रांसिस्को में अभी एक चर्चित अमरत्ववादी ब्रायन जॉनसन ने सौ-डेढ़ सौ लोगों के बीच एक कार्यक्रम किया जिसमें उन्होंने लंबी जिंदगी जीने के बारे में अपने तजुर्बे बांटे। तीन हजार से अधिक लोगों ने इस कार्यक्रम में मौजूद रहने के लिए आवेदन किया था, जिसमें अमरीका की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के मुखिया भी थे। कार्यक्रम जब चल रहा था, तो बाहर दर्जनों लोग भीतर जाने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, लेकिन यह सीमित लोगों के लिए ही था। ब्रायन जॉनसन 50 बरस से कम के एक अमरीकी कारोबारी हैं, और उन्होंने ब्रेन ट्री नाम की अपनी कंपनी को पे पाल नाम की कंपनी को 80 करोड़ डॉलर में बेचा था। इसके बाद से वे अपनी खुद की जिंदगी को अधिक से अधिक सेहतमंद, और अधिक से अधिक लंबी बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। वे अपने तन-मन को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और एक किस्म से वे बुढ़ापे को अधिक से अधिक धीमा, और अधिक से अधिक स्वस्थ बनाने में लगे हुए हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि वे भारत आए थे, और एक पांच-सात सितारा होटल के कमरे में एक इंटरव्यू देने वाले थे, कि उन्हें वहां की हवा प्रदूषित लगी और वे छोडक़र तुरंत निकल गए। वे अपनी जिंदगी का फलसफा बस दो शब्दों में सबके सामने रखते हैं, डोंट डाई (मरो मत)। कई लोग इस खरबपति को एक सनकी मान सकते हैं, और जब दुनिया का एक सबसे मशहूर गायक, माइकल जैक्सन अपने वक्त में दर्जनों प्लास्टिक सर्जरी कराकर अपने चेहरे को अधिक से अधिक आकर्षक बनाने में लगे रह सकता था, तो यह नया खरबपति तो सिर्फ सेहतमंद तरीकों की बात कर रहा है।
अब इस व्यक्ति से अलग हटकर कुछ बात करें, तो जिंदगी जीने के कई तरीके समझ पड़ते हैं। कई लोग जापानियों की तरह अधिक से अधिक लंबी जिंदगी जीना चाहेंगे, और उस देश में शायद दुनिया के सबसे अधिक शतायु लोग रहते हैं। हिन्दुस्तान में भी किसी को दुआ देना हो, तो कहा जाता है कि शतायु होओ। लेकिन क्या सौ बरस की उम्र सबके लिए अच्छी हो सकती है? आज तो साठ-पैंसठ बरस की उम्र में भी कई लोगों के हाथ-पांव चलना धीमा हो जाता है, बहुत से लोग इससे भी कम उम्र से तरह-तरह की दवाइयों पर आ जाते हैं। 70-75 के बाद तो शायद ही कोई ऐसे होंगे जो बिना मदद और सहारे के रह सकें। हिन्दुस्तान की अधिकतर आबादी ऐसी है जो कि इस उम्र की कमजोरी और बीमारी के खर्चें नहीं उठा सकती। परिवार भी बहुत लंबे जीने वाले बुजुर्गों से आमतौर पर थक जाते हैं, अगर वे परिवार को बहुत बड़ी विरासत दे नहीं चुके हैं, या फिर उनके बाद विरासत मिलने वाली न हो। एक सीमा के बाद किसी भी परिवार में बुजुर्ग धीरे-धीरे पारदर्शी सरीखे होने लगते हैं, उनकी आवाज अनसुनी होने लगती है, लोग उनके सामने से निकल जाते हैं, और बस यही मनाते रहते हैं कि वे आवाज न दे दें। कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग सकती है, लेकिन जिन लोगों को जापानियों की तरह सौ बरस पार करने तक जिंदा रहना है, उन्हें ऐसी वजहों के बारे में सोच लेना चाहिए कि जिनसे उनके परिवार उन्हें पूछते रहें, पूजते रहें। आज शहरीकरण के साथ-साथ परिवार बुजुर्गों को बोझ चाहे न मानें, वे जिम्मेदारी तो बहुत बड़ी रहते ही हैं। अभी ही पिछले दस-बीस दिनों में कई ऐसे अदालती मामले सामने आए हैं जिनमें बूढ़े माँ-बाप का साथ न छोडऩे वाले बेटे को छोडक़र जाने वाली बहू से अदालत ने तलाक मंजूर कर लिया। इसलिए अमर होना तो एक सोच तक सीमित है, उससे परे भी लंबा बुढ़ापा कितना तकलीफदेह हो सकता है इसे देखना हो तो उन खबरों को देखें जिनमें अभी भारत में ही तीन बेटियों के गुजरे एक पिता के अंतिम संस्कार के लिए उन्होंने पैसे ही भेज दिए, और भारत में रहते हुए वीडियो कॉल पर पिता का अंतिम संस्कार देख लिया। मध्यप्रदेश में अभी पिछले ही साल पति-पत्नी, और बच्चे, बूढ़ी और बीमार माँ को घर में ताले में बंद करके महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन चले गए थे, और उधर कई दिन बंद रहने के बाद माँ गुजर गई, लाश की बदबू से पड़ोसियों ने पुलिस को खबर की। कई मामलों में दूसरे देशों में बसी हुई आल-औलाद हिन्दुस्तान आती हैं, तो बंद घर में माँ-बाप मरे पड़े मिलते हैं, जाने कब से। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक बुजुर्ग महिला ने अपनी सौतेली बहू की प्रताडऩा से थककर दीवार पर आत्महत्या का नोट लिखकर वीडियो बनाकर खुदकुशी कर ली। इसलिए बुढ़ापा हर मायने में बहुत अच्छा नहीं होता है। लोगों को वृंदावन जाकर देखना चाहिए कि बूढ़ी महिलाओं को घर से रवाना करने के लिए कृष्णभक्ति के नाम पर किस तरह विधवाश्रम भेज दिया जाता है।
फिर भी हम अपनी सेहत का ख्याल रखने को बड़ा ही जरूरी काम मानते हैं, अगर आपके घर के लोग आपके प्रति बहुत अच्छे हों, तो भी। लोगों की पहली जिम्मेदारी अपनी सेहत ठीक रखने की होती है क्योंकि यह शरीर आस्थावानों के ईश्वर ने, और आस्थाहीन लोगों के माँ-बाप या प्रकृति ने दिया हुआ है। जब तक खुद फिट न रहें, किसी दूसरे की मदद तो की भी नहीं जा सकती, दूसरों पर बोझ ही बना जा सकता है। इसलिए हम अमरत्व की किसी सोच से परे हर दिन बेहतर जीने के हिसाब से ही यह सोचते हैं कि लोगों को अपने तन, मन, और अपने धन की भी फिक्र करनी चाहिए। बुढ़ापे में जाकर बहुत से काम सिर्फ पैसों से हो सकते हैं। लगातार महंगे इलाज महानगरों से उपमहानगरों तक होते हुए अब मामूली शहरों तक भी पहुंचने लगे हैं, लेकिन हर किसी की आल-औलाद के पास माँ-बाप के अंतहीन इलाज की सहूलियत नहीं होती। लंबे इलाज में अच्छे-खासे लोग भी चुक जाते हैं। इसलिए हर किसी की जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों पर एक सीमा से अधिक बोझ न डालें, अपने तन-मन को स्वस्थ रखें, और अपने बुढ़ापे के लिए धन का भी इंतजाम करके रखें।
हमको मालूम है कि जिस देश में लोगों को खाने-पीने के भी लाले पड़े रहते हैं, सरकारी राशन से जिनके चूल्हे जलते हैं, उन्हें बचत की नसीहत एक बकवास के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन जिंदगी के आखिरी बरसों में एकदम बेसहारा हो जाने से तो बेहतर यही होगा कि पूरी जिंदगी थोड़ा-थोड़ा इंतजाम करते चलें, अगर ताकत हो तो इलाज का बीमा भी करवा लें, सरकारी इलाज-बीमा भी इस्तेमाल करें, और यह मानकर चलें कि वे पूरी जिंदगी अपना जितना ख्याल रखेंगे, उतना ही वे आसपास के लोगों पर बोझ बनने से भी बचेंगे। अमरीकी खरबपति के अमरत्व की सोच कुछ और लोगों के काम की हो सकती है, लेकिन पूरी दुनिया के बहुत ही आम लोग भी अपने आपको तम्बाकू से, दारू और दूसरे नशे से बचाकर तो रख ही सकते हैं। ऐसी ही दो-चार चीजों को अगर जिंदगी से अलग रखा जाए, तो शायद दुनिया की एक चौथाई आबादी का बुढ़ापा बेहतर हो सकता है। यह बात सुनने में कुछ हैरान कर सकती है, लेकिन सच तो यह है कि रोज दारू या तम्बाकू पर लोग जितना खर्च करते हैं, उसे बचाकर ही अगर परिवार के इलाज का बीमा खरीदा जाए, तो शायद हर बरस 25-50 लाख तक के अस्पताल बिल का इंतजाम हो सकता है। ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं, दारू और तम्बाकू इन दो चीजों से होने वाली बचत से ऐसी बीमा पॉलिसी ली जा सकती है। इलाज की नौबत से परे भी इन चीजों के बिना सेहत बहुत अच्छी रह सकती है। फिर हमने मन को सेहतमंद रखने की बात भी कही है, मन को नफरत से दूर रखकर देखें, कई किस्म की मानसिक बीमारियों, और बेचैनी या ब्लडप्रेशर जैसी शारीरिक बीमारियों से भी बच सकेंगे। हमारी इस चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना। (जिन्हें तार का मतलब नहीं मालूम है, एक वक्त चलने वाले टेलीग्राम को तार कहा जाता था, और तार पहुंचता था, तो लोग रोना पहले शुरू करते थे, उसे पढऩे को खोलते बाद में थे)।
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