क्या गैरराजनीतिक आधार पर तय होते हैं अमरीकी चुनाव?

03 सितंबर 2026  

 

अमरीका के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में महिला वोटरों की सोच को लेकर अभी एक अध्ययन किया गया जिससे बड़े दिलचस्प नतीजे सामने आए हैं। दो तिहाई महिला वोटरों ने डॉनल्ड ट्रम्प के लिए वोट दिया था। इनमें से 68 फीसदी खुद को ईसाई मानती हैं। ईसाईयों के एक तबके, गोरे इवेंजेलिकल तबके की महिलाओं में से 80 फीसदी से अधिक ने ट्रम्प को वोट दिया था। दूसरी तरफ जो किसी धर्म से अपने को नहीं जोड़ती हैं ऐसी महिलाओं में से 80 फीसदी ने कमला हैरिस को वोट दिया था। अभी इस विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि रिपब्लिकन पार्टी महिलाओं को राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवनशैली के माध्यम से जोड़ती है। अमरीकी संकीर्णतावादी, यानी दक्षिणपंथी रणनीति यह है कि महिलाओं से सीधे राजनीति की बात करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप से रूढि़वादी, परिवार समर्थक, राष्ट्रवादी, और पश्चिमी (स्थानीय) सभ्यता का समर्थक बनाया जाए। इन तमाम सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीकों, जैसे बाइबिल, इसी सोच के कुछ लोकप्रिय उपन्यास, इसी संस्कृति से जुड़े हुए कुछ ब्राँड, महिलाओं को यह सिखाते हैं कि उन्हें क्या मानना चाहिए, घर में कैसे सामान रखने चाहिए, इंटरनेट पर क्या देखना चाहिए, और कैसे मतदान करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प, और उनकी रिपब्लिकन पार्टी लगातार गर्भपात के अधिकार के खिलाफ रहते आई है, चर्च गर्भपात के ही खिलाफ रहता है, और इस तरह धर्म, पुराने सामाजिक मूल्य, और अब ट्रम्प के चुनिंदा जजों के बहुमत वाली सुप्रीम कोर्ट, इन सबने गर्भपात पर पूरे देश में जिस तरह प्रतिबंध लगा दिया है, उससे भी धर्मालु महिलाएं बहुत प्रभावित हुई हैं। यह रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य सामने रखती है कि राजनीति में कोई दिलचस्पी न रखने वाली महिलाएं किसी तरह अमरीकी राजनीति के इस सबसे बड़े चुनाव को प्रभावित करती हैं। एक किस्म से अतिसरलीकरण किया जाए तो यह समझ आता है कि धर्म को मानने वाले लोगों का बहुतायत ट्रम्प के साथ रहा, और नास्तिकों का बहुमत उसकी विरोधी प्रत्याशी कमला हैरिस के साथ। 

अब किसी लोकतंत्र में होने वाले चुनाव को देखने के बहुत से अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। एक पहलू राजनीतिक सोच के आधार पर चुनाव हो सकता है, लेकिन दूसरा पहलू बिना किसी राजनीतिक सोच के सिर्फ धर्म और संस्कृति के आधार पर तय होने वाली चुनावी प्राथमिकता, यानी वोट रहता है। जिस चुनाव को पूरी तरह से राजनीतिक चुनाव, राजनीतिक रणभूमि, राजनीतिक अखाड़ा कहा जाता है, उसमें मुकाबले का फैसला अगर पूरी तरह से गैरराजनीतिक होता है, तो यह अपने-आपमें बहुत दिलचस्प बात नहीं है! अमरीका, जो कि आज दुनिया का एक सबसे आधुनिक, सबसे विकसित, और संपन्न देश है, जहां औसत पढ़ाई-लिखाई खासी अधिक है, जहां सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के सभी तरह के औजार, समाचार-विचार माध्यम खूब विकसित हैं, वहां पर चुनावी फैसले अगर गैरराजनीतिक आधार पर हो रहे हैं, तो फिर पार्टियों की राजनीतिक सोच का कम से कम ऐसे और इस देश में चुनाव जीतने के लिए बड़ा सीमित इस्तेमाल है। धर्म और संस्कृति, सामाजिक मूल्य और मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे राष्ट्रवादी नारे चुनाव के लिए काफी हैं! अमरीका का यह मॉडल ऐसा भी नहीं कि कोई विस्फोटक रहस्य सामने ला रहा है। दुनिया भर में जगह-जगह यह बात देखने मिल रही है कि राजनीतिक दलों, या अमरीका जैसी राष्ट्रपतीय प्रणाली में लोकतंत्र, राजनीति, अंतरराष्ट्रीय सोच से परे के मूल्य चुनाव में काम आ रहे हैं! 

न सिर्फ अमरीका, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक दुनिया को अपनी-अपनी सरहदों के भीतर चलने वाली राजनीति, और होने वाले चुनावों को लेकर यह फिक्र करनी चाहिए कि परंपरागत रूप से सैकड़ों बरस से जिस राजनीतिक विचारधारा और दर्शन को सब कुछ मान लिया जाता था, वह बहुत कुछ नहीं है। बहुत कुछ तो वोटरों की वह सोच है जो कि पार्टी के राजनीतिक घोषणापत्र के आधार पर तय नहीं होती है, बल्कि किसी पार्टी के लोगों की धार्मिक, सांस्कृतिक, और राष्ट्रवादी सोच से तय होती है। क्या अमरीकी चुनाव में महिला वोटरों के रूझान के विश्लेषण के मॉडल को भारत पर भी लागू किया जा सकता है? अमरीका और भारत इन दोनों के चुनाव सौ अलग-अलग पैमानों पर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि दर्जनभर पैमानों पर ये दोनों चुनाव एक-दूसरे से कुछ या अधिक हद तक मिलते-जुलते भी लगें। भारत में जिस तरह ऐतिहासिक कामयाबी पाने वाली भारतीय जनता पार्टी ठोस राजनीतिक सोच से परे के कई धार्मिक, सामाजिक, और राष्ट्रवादी मूल्यों पर जनता का असाधारण समर्थन पाते आई है, और भारत में तो महिला वोटरों का अलग से कोई ऐसा विश्लेषण होता नहीं है, फिर भी ऐसा दिखता है कि महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के साथ रहता है। तो क्या प्रधानमंत्री के राजनीतिक भाषणों से जुड़े बिना भी, उनकी व्याख्या किए बिना भी महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत धर्म, राष्ट्रीयता, और इस तरह के दूसरे मुद्दों पर तय होता है? सीधे-सीधे ऐसे कोई तुलना अतिसरलीकरण होगी, लेकिन इन दो मॉडलों में एक साम्य देखने की कोशिश एक दिलचस्प राजनीतिक अध्ययन का मुद्दा तो है ही। 

हमारा मानना है कि दुनिया के सारे लोकतंत्रों को, शासन व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने मिलता है। कई राजनीतिक दल तो ऐसे रहते हैं जो अपने राष्ट्रीय सम्मेलनों में दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को भी पर्यवेक्षकों की तरह आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रीय सम्मेलनों के मंच पर कोई गोपनीय चर्चाएं तो होती नहीं हैं, इसलिए विपक्षियों, और राजनीतिक विरोधियों को भी वहां आमंत्रित करने में कोई नुकसान नहीं रहता, किसी-किसी देश में कोई-कोई पार्टी ऐसी उदारता दिखाती भी है। हम ऐसे ही राजनीतिक विश्लेषण के लिए अमरीकी महिला मतदाताओं पर किए गए इस अध्ययन के मॉडल पर भारत को भी रखकर देखना चाहते हैं, हो सकता है कि यहां के कुछ राजनीति शास्त्र के जानकार, विशेषज्ञ, या विश्लेषक ऐसा कर सकें। और दुनिया के कुछ दूसरे अलग-अलग लोकतांत्रिक देशों को लेकर भी यह चर्चा हो सकती है कि वहां पर चुनाव क्या पूरी तरह राजनीतिक मुद्दों पर होते हैं, या उन पर कोई और गैरराजनीतिक असर भी होता है? 

(Daily Chhattisgarh)   

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