जिन लोगों के दफ्तरों में बहुत से लोग काम करते हैं, और ई-मेल का इस्तेमाल भी करते हैं, उनके लिए ऑफिस के पदनाम या डिसिगनेशन वाले ई-मेल एड्रेस बना लेना चाहिए, ताकि वे काम छोड़कर जाएं, तो न तो अपने साथ ई-मेल बॉक्स ले जाएं और न ही उनके पीछे इस दफ्तर की ई-मेल जाती रहे। ये कर्मचारी और संस्थान, दोनों के लिए जरूरी है। निजी ई-मेल एड्रेस निजी फोन नंबर का इस्तेमाल दफ्तर के काम के लिए ठीक नहीं होता।
छोटी सी बात
जिन लोगों के दफ्तरों में बहुत से लोग काम करते हैं, और ई-मेल का इस्तेमाल भी करते हैं, उनके लिए ऑफिस के पदनाम या डिसिगनेशन वाले ई-मेल एड्रेस बना लेना चाहिए, ताकि वे काम छोड़कर जाएं, तो न तो अपने साथ ई-मेल बॉक्स ले जाएं और न ही उनके पीछे इस दफ्तर की ई-मेल जाती रहे। ये कर्मचारी और संस्थान, दोनों के लिए जरूरी है। निजी ई-मेल एड्रेस निजी फोन नंबर का इस्तेमाल दफ्तर के काम के लिए ठीक नहीं होता।
मिलिटेंसी, मिलिटरी और मीडिया वाला कश्मीर
23 जून 2011
सुनील कुमार
रायपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचना और वापिस आना, सब कुछ सरकार के हवाई अड्डों से और हर जगह टीवी पर दूरदर्शन या तो गायब या धुंधला। रायपुर के हवाई अड्डे पर तो केंद्र सरकार का ठिकाना होने के बावजूद हिन्दी के सबसे गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज, झूठे समाचार चैनल ही लगे रहते हैं, दिल्ली में निजीकरण के बाद के टीवी स्क्रीन भी दूरदर्शन दिखाना बंद कर चुके हैं और श्रीनगर में सब कुछ सरकारी होने के बाद भी बड़े से टीवी स्क्रीन पर दूरदर्शन के समाचार इतने धुंधले दिख रहे थे कि वे मानो केंद्र सरकार की धुंधली कश्मीर-नीति का एक प्रतीक थे।
जिस कश्मीर में केंद्र सरकार को अपनी बात अधिक खुलासे से करने की जरूरत है और वहां के अलगाववादी तबके को साथ जोडऩे की जरूरत है, वहां भी अगर हवाई अड्डे पर घंटे-घंटे बैठने वाले लोगों को दूरदर्शन के समाचार साफ-सुथरे दिखाने की फिक्र किसी अफसर को नहीं है, वहां से रोज आने-जाने वाले सांसदों को यह नहीं सूझता है तो यह अफसोस की बात है। केंद्र सरकार का प्रचारतंत्र तो ऐसी बातों को देखने पूरे देश घूम नहीं सकता लेकिन वहां के नेता-अफसर तो इन बातों का ध्यान रख सकते हैं।
एक तरफ तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में ऐसी लापरवाही, दूसरी तरफ कश्मीर की जमीन से जो लोग अपनी बात लिखते हैं उनके बारे में सरकार का नजरिया भयानक है। जिस दिन हम वहां थे उसी दिन बीबीसी उर्दू सर्विस की संवाददाता के खिलाफ सरकार ने झूठी जानकारी फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए एक मामला कायम किया था। कश्मीर की इस एक जानी-मानी अखबारनवीस, लंदन में बसी हुई नईमा अहमद महजूर को आईटी एक्ट के तहत राज्य में असंतोष फैलाने के लिए आईटी के उपयोग का आरोपी बनाया गया है।
नईमा ने यह लिखा था-'पुलिस ने लालचौक पर इस आदमी को क्यों मारा? कोई वजह?Ó
जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे थे, उसी दिन कुछ घंटे के भीतर होटल के पास ही शहर की जानी-मानी जगह पर एक नागरिक की ऐसी मौत हुई थी। पुलिस का कहना था कि इसे कुछ बेचेहरा बंदूकबाजों ने मारा था, न कि पुलिस ने।
नईमा ने फेसबुक पर लोगों के पोस्ट किए गए कमेंट्स पर लिखा था-क्या पुलिस आराम से नहीं बैठने देगी लोगों को?
कश्मीर के अखबारों में इस बारे में छपी खबरों में यह था कि पुलिस ने नईमा के लंदन और श्रीनगर के पतों पर नोटिस भेज दिया है। एक दूसरी जानकारी यह थी कि पिछले दिनों श्रीनगर में पुलिस ने ऐसे दर्जन भर नौजवानों को पकड़ा है जिन्होंने 2010 में राज्य में चल रही अशांति को लेकर फेसबुक पर बातें लिखी थीं। कश्मीर के एक मुस्लिम धार्मिक गुरु के खिलाफ भी फेसबुक पर अपनी बातें लिखने पर ऐसा ही जुर्म कायम किया गया है।
वहां से लौटने के बाद मैं यहां जिन लोगों के नाम सहित उनकी कही बातें लिखने की सोच रहा था, वह सारी सोच आखिरी के दो दिनों में मिले अखबारों में पुलिस के रुख के बाद धरी रह गई। जिन्होंने मुझसे कुछ कहा उन्हीं लोगों को मेरे लिखे से परेशानी खड़ी न हो जाए। और कुछ जानकार लोगों का कश्मीर से परे भी यह कहना है कि हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून इस कदर कड़ा बन गया है कि उसके तहत इंटरनेट पर साधारण बातें लिखने वालों को भी धर लिया जा सकता है। फिर कश्मीर तो आज ऐसा इलाका है जहां पर बंदूकों का राज है और बंदूकों की सोच बहुत लोकतांत्रिक तो होती नहीं। फिर कश्मीर लगातार ऐसी मौतें देख रहा है जिसके लिए जिम्मेदार सैनिकों और सिपाहियों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वहां एक अलग कानून लागू है जिसके तहत केंद्रीय सुरक्षा दस्तों को किसी कार्रवाई से कई तरह की रियायत मिली हुई है।
कश्मीर के मीडिया में एक किस्म का सन्नाटा है। वहां मिले एक-दो अखबारनवीसों का कहना है कि जब दोनों तरफ से बंदूकें चलती हों, और दोनों तरफ कत्ल करने से परहेज न हो तो यहां बसे हुए अखबारनवीस पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना हौसला दिखा सकते हैं? वहां के लोगों के पास पुलिस की ज्यादती की और भी मिसालें हैं लेकिन कुछ का यह कहना है कि गोलियों और गिरफ्तारी से परे भी अखबार वालों को दबाने के और तरीके सरकार के पास रहते हैं और आतंक से लड़ाई का तर्क देते हुए उन सबका इस्तेमाल सरकार खुले या छुपे तरीके से करते रहती है। वहां जनसुरक्षा कानून के तहत पिछली गर्मियों में एक पत्रकार साहिल मकबूल को गिरफ्तार किया गया, जम्मू-कश्मीर सरकार की आलोचना करने वाले एक अखबार को सेंसर किया गया, एक पे्रस फोटोग्राफर की हत्या कर दी गई, दर्जनों रिपोर्टरों को हमले में घायल किया गया और स्थानीय टीवी चैनलों को समय-समय पर रोका गया।
वहां की एक पत्रकार ने लौटने के बाद हुई बातचीत में बताया कि सरकार की मामूली आलोचना पर भी किसी पत्रकार को मिलिटेंट-सपोर्ट करार दे दिया जाता है। इसके अलावा कोई कड़ा आलोचक हो तो उसे आईएसआई का एजेंट कह दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर की बड़ी अजीब हालत है जहां सरहद करीब हो, आतंक से लंबी लड़ाई हो, अलगाववाद का बड़ा खतरा हो वहां पर मीडिया के खिलाफ घोषित और अघोषित कार्रवाई करने का मानो सरकार को एक हक सा मिल जाता है।
तहलका में इसी बरस फरवरी में छपी एक रिपोर्ट में यहां के मीडिया पर सरकार की ज्यादतियों की एक लंबी कहानी है जिसे इस (द्धह्लह्लश्च://222.ह्लद्गद्धद्गद्यद्मड्ड.ष्शद्व/ह्यह्लशह्म्4_द्वड्डद्बठ्ठ४८.ड्डह्यश्च?द्घद्बद्यद्गठ्ठड्डद्वद्ग=हृद्ग०५०२११ञ्जद्धद्गङ्कड्डद्यद्यद्ग4.ड्डह्यश्च) वेबसाईट पर देखा जा सकता है। अपने वहां के गिने-चुने दिनों में साथ के सैलानी-मूड के लोगों के साथ मेरे लिए अधिक अखबारनवीसी मुमकिन नहीं थी।
मीडिया और मिलिट्री, मिलिटेंसी और मजहब, इस किस्म की बातें वहां एक-दूसरे के साथ बहुत दूर तक जुड़ी हुई हैं। वहां एक वक्त तैनात रह चुके एक बड़े अफसर से बात होने पर उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा दस्ते एक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ते हैं। जिस जनता को वे बाहरी आतंकियों के हमलों से बचाने के लिए तैनात हैं वह जनता ही अपने देश के सैनिकों से नफरत करती है। आसपास से गुजरने वाले तमाम लोग जब आपको नफरत से देखते जाएं और सिर पर आतंकियों के हमलों का खतरा मंडराता रहता हो तो सिपाही और सैनिक एक अलग किस्म के तनाव में जीते हैं। ऐसे में राज्य की सरकार को मदद करने के लिए उनकी तैनाती भी अगर बहुत से तबकों की आलोचना पाती है और खुद राज्य सरकार जनता की तसल्ली के लिए बार-बार यह कहती है कि कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल कम किए जाएंगे, तो जवानों का हौसला भी पस्त होता है। उसने आगे कहा कि लगातार ऐसी परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं रहता जहां जनता नफरत के साथ-साथ पत्थरों से भी काम लेती है।
लेकिन कश्मीरी जब अपने सूबे से बाहर निकलकर बाकी हिन्दुस्तान में जाते हैं तो बाकी हिन्दुस्तान के लोग उन्हें कश्मीर से हिन्दुस्तान में आया हुआ मानते हैं। गे्रटर कश्मीर नाम के एक अंगे्रजी अखबार के एक कार्टूनिस्ट मलिक साजिद का दिल्ली का साबका कुछ इसी किस्म का था। उन्होंने अपने अखबार में इस बारे में लिखा है-दिल्ली के इंडिया हेबिटाट सेंटर में मेरे कार्टूनों की प्रदर्शनी हफ्ते भर के लिए लगी थी। इसमें मेरा काम 'अमन का आतंकÓ नाम से प्रदर्शित किया गया था। कश्मीर में जगह-जगह लगने वाले रेजरवायर से कार्टून टांगे गए थे। इसके साथ ही कुछ कीचड़-पत्थर और शराब की बोतलें भी मैंने रखी थीं जैसी कि कश्मीर में सुरक्षा दस्तों की बंकरों के आसपास सड़कों पर दिखती हैं। दिल्ली में रहते हुए मैंने अपने अखबार के लिए कार्टून बनाया, डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींची और उसे ईमेल करने के लिए एक साइबर कैफे तक गया। वहां से मैं ईमेल कर ही रहा था कि उसी वक्त कनॉट प्लेस और गे्रटर कैलाश में बम फूटने की खबर वहां किसी को फोन पर लगी। इस पर साइबर कैफे का मालिक दूसरे लोगों से फुसफुसाकर बात करने लगा कि यह आदमी कश्मीरी है और इसकी शिनाख्त देखें। ये मेरे पास आकर मेरा पासपोर्ट पूछने, जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और पहचानपत्र है तो उसे देखने के बाद वे यह देखने लगे कि मैं किस वेबसाईट को देख रहा था। जब उन्होंने पाया कि मैं कश्मीर की वेबसाईट देख रहा था तो उन्होंने तुरंत पुलिस को बुला लिया कि यहां एक कश्मीरी है। इस पर आनन-फानन वहां पुलिस पहुंची और पहुंचते ही चीखने लगी कि कहां है आदमी? इसके बाद वे मुझे गालियां देते हुए, घसीटते हुए बाहर ले गए और वहां करीब 200 लोग इस तरह इक_े हो गए कि कोई टेररिस्ट पकड़ाया है। मैं चीखते रह गया कि कोई जाकर हेबिटाट सेंटर में बताए कि जिसकी प्रदर्शनी लगी है उस आर्टिस्ट को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद थाने में हरामजादे कश्मीरी जैसी गालियां, देश के खिलाफ रहने की गालियां, चलती रहीं...
एक कश्मीरी कार्टूनिस्ट की प्रताडऩा की यह लंबी कहानी और यह बताती है कि कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान में कश्मीरियों को लेकर बर्दाश्त कितना कम है और बेसमझी कितनी अधिक। जब समझ का ऐसा फासला हो और देश के किसी तबके में इस फासले को दूर करने की चाह न हो तो कश्मीरी किस तरह बाकी भारत से जुड़े रहेंगे? (बाकी कल)
सुनील कुमार
रायपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचना और वापिस आना, सब कुछ सरकार के हवाई अड्डों से और हर जगह टीवी पर दूरदर्शन या तो गायब या धुंधला। रायपुर के हवाई अड्डे पर तो केंद्र सरकार का ठिकाना होने के बावजूद हिन्दी के सबसे गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज, झूठे समाचार चैनल ही लगे रहते हैं, दिल्ली में निजीकरण के बाद के टीवी स्क्रीन भी दूरदर्शन दिखाना बंद कर चुके हैं और श्रीनगर में सब कुछ सरकारी होने के बाद भी बड़े से टीवी स्क्रीन पर दूरदर्शन के समाचार इतने धुंधले दिख रहे थे कि वे मानो केंद्र सरकार की धुंधली कश्मीर-नीति का एक प्रतीक थे।
जिस कश्मीर में केंद्र सरकार को अपनी बात अधिक खुलासे से करने की जरूरत है और वहां के अलगाववादी तबके को साथ जोडऩे की जरूरत है, वहां भी अगर हवाई अड्डे पर घंटे-घंटे बैठने वाले लोगों को दूरदर्शन के समाचार साफ-सुथरे दिखाने की फिक्र किसी अफसर को नहीं है, वहां से रोज आने-जाने वाले सांसदों को यह नहीं सूझता है तो यह अफसोस की बात है। केंद्र सरकार का प्रचारतंत्र तो ऐसी बातों को देखने पूरे देश घूम नहीं सकता लेकिन वहां के नेता-अफसर तो इन बातों का ध्यान रख सकते हैं।
एक तरफ तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में ऐसी लापरवाही, दूसरी तरफ कश्मीर की जमीन से जो लोग अपनी बात लिखते हैं उनके बारे में सरकार का नजरिया भयानक है। जिस दिन हम वहां थे उसी दिन बीबीसी उर्दू सर्विस की संवाददाता के खिलाफ सरकार ने झूठी जानकारी फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए एक मामला कायम किया था। कश्मीर की इस एक जानी-मानी अखबारनवीस, लंदन में बसी हुई नईमा अहमद महजूर को आईटी एक्ट के तहत राज्य में असंतोष फैलाने के लिए आईटी के उपयोग का आरोपी बनाया गया है।
नईमा ने यह लिखा था-'पुलिस ने लालचौक पर इस आदमी को क्यों मारा? कोई वजह?Ó
जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे थे, उसी दिन कुछ घंटे के भीतर होटल के पास ही शहर की जानी-मानी जगह पर एक नागरिक की ऐसी मौत हुई थी। पुलिस का कहना था कि इसे कुछ बेचेहरा बंदूकबाजों ने मारा था, न कि पुलिस ने।
नईमा ने फेसबुक पर लोगों के पोस्ट किए गए कमेंट्स पर लिखा था-क्या पुलिस आराम से नहीं बैठने देगी लोगों को?
कश्मीर के अखबारों में इस बारे में छपी खबरों में यह था कि पुलिस ने नईमा के लंदन और श्रीनगर के पतों पर नोटिस भेज दिया है। एक दूसरी जानकारी यह थी कि पिछले दिनों श्रीनगर में पुलिस ने ऐसे दर्जन भर नौजवानों को पकड़ा है जिन्होंने 2010 में राज्य में चल रही अशांति को लेकर फेसबुक पर बातें लिखी थीं। कश्मीर के एक मुस्लिम धार्मिक गुरु के खिलाफ भी फेसबुक पर अपनी बातें लिखने पर ऐसा ही जुर्म कायम किया गया है।
वहां से लौटने के बाद मैं यहां जिन लोगों के नाम सहित उनकी कही बातें लिखने की सोच रहा था, वह सारी सोच आखिरी के दो दिनों में मिले अखबारों में पुलिस के रुख के बाद धरी रह गई। जिन्होंने मुझसे कुछ कहा उन्हीं लोगों को मेरे लिखे से परेशानी खड़ी न हो जाए। और कुछ जानकार लोगों का कश्मीर से परे भी यह कहना है कि हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून इस कदर कड़ा बन गया है कि उसके तहत इंटरनेट पर साधारण बातें लिखने वालों को भी धर लिया जा सकता है। फिर कश्मीर तो आज ऐसा इलाका है जहां पर बंदूकों का राज है और बंदूकों की सोच बहुत लोकतांत्रिक तो होती नहीं। फिर कश्मीर लगातार ऐसी मौतें देख रहा है जिसके लिए जिम्मेदार सैनिकों और सिपाहियों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वहां एक अलग कानून लागू है जिसके तहत केंद्रीय सुरक्षा दस्तों को किसी कार्रवाई से कई तरह की रियायत मिली हुई है।
कश्मीर के मीडिया में एक किस्म का सन्नाटा है। वहां मिले एक-दो अखबारनवीसों का कहना है कि जब दोनों तरफ से बंदूकें चलती हों, और दोनों तरफ कत्ल करने से परहेज न हो तो यहां बसे हुए अखबारनवीस पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना हौसला दिखा सकते हैं? वहां के लोगों के पास पुलिस की ज्यादती की और भी मिसालें हैं लेकिन कुछ का यह कहना है कि गोलियों और गिरफ्तारी से परे भी अखबार वालों को दबाने के और तरीके सरकार के पास रहते हैं और आतंक से लड़ाई का तर्क देते हुए उन सबका इस्तेमाल सरकार खुले या छुपे तरीके से करते रहती है। वहां जनसुरक्षा कानून के तहत पिछली गर्मियों में एक पत्रकार साहिल मकबूल को गिरफ्तार किया गया, जम्मू-कश्मीर सरकार की आलोचना करने वाले एक अखबार को सेंसर किया गया, एक पे्रस फोटोग्राफर की हत्या कर दी गई, दर्जनों रिपोर्टरों को हमले में घायल किया गया और स्थानीय टीवी चैनलों को समय-समय पर रोका गया।
वहां की एक पत्रकार ने लौटने के बाद हुई बातचीत में बताया कि सरकार की मामूली आलोचना पर भी किसी पत्रकार को मिलिटेंट-सपोर्ट करार दे दिया जाता है। इसके अलावा कोई कड़ा आलोचक हो तो उसे आईएसआई का एजेंट कह दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर की बड़ी अजीब हालत है जहां सरहद करीब हो, आतंक से लंबी लड़ाई हो, अलगाववाद का बड़ा खतरा हो वहां पर मीडिया के खिलाफ घोषित और अघोषित कार्रवाई करने का मानो सरकार को एक हक सा मिल जाता है।
तहलका में इसी बरस फरवरी में छपी एक रिपोर्ट में यहां के मीडिया पर सरकार की ज्यादतियों की एक लंबी कहानी है जिसे इस (द्धह्लह्लश्च://222.ह्लद्गद्धद्गद्यद्मड्ड.ष्शद्व/ह्यह्लशह्म्4_द्वड्डद्बठ्ठ४८.ड्डह्यश्च?द्घद्बद्यद्गठ्ठड्डद्वद्ग=हृद्ग०५०२११ञ्जद्धद्गङ्कड्डद्यद्यद्ग4.ड्डह्यश्च) वेबसाईट पर देखा जा सकता है। अपने वहां के गिने-चुने दिनों में साथ के सैलानी-मूड के लोगों के साथ मेरे लिए अधिक अखबारनवीसी मुमकिन नहीं थी।
मीडिया और मिलिट्री, मिलिटेंसी और मजहब, इस किस्म की बातें वहां एक-दूसरे के साथ बहुत दूर तक जुड़ी हुई हैं। वहां एक वक्त तैनात रह चुके एक बड़े अफसर से बात होने पर उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा दस्ते एक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ते हैं। जिस जनता को वे बाहरी आतंकियों के हमलों से बचाने के लिए तैनात हैं वह जनता ही अपने देश के सैनिकों से नफरत करती है। आसपास से गुजरने वाले तमाम लोग जब आपको नफरत से देखते जाएं और सिर पर आतंकियों के हमलों का खतरा मंडराता रहता हो तो सिपाही और सैनिक एक अलग किस्म के तनाव में जीते हैं। ऐसे में राज्य की सरकार को मदद करने के लिए उनकी तैनाती भी अगर बहुत से तबकों की आलोचना पाती है और खुद राज्य सरकार जनता की तसल्ली के लिए बार-बार यह कहती है कि कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल कम किए जाएंगे, तो जवानों का हौसला भी पस्त होता है। उसने आगे कहा कि लगातार ऐसी परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं रहता जहां जनता नफरत के साथ-साथ पत्थरों से भी काम लेती है।
लेकिन कश्मीरी जब अपने सूबे से बाहर निकलकर बाकी हिन्दुस्तान में जाते हैं तो बाकी हिन्दुस्तान के लोग उन्हें कश्मीर से हिन्दुस्तान में आया हुआ मानते हैं। गे्रटर कश्मीर नाम के एक अंगे्रजी अखबार के एक कार्टूनिस्ट मलिक साजिद का दिल्ली का साबका कुछ इसी किस्म का था। उन्होंने अपने अखबार में इस बारे में लिखा है-दिल्ली के इंडिया हेबिटाट सेंटर में मेरे कार्टूनों की प्रदर्शनी हफ्ते भर के लिए लगी थी। इसमें मेरा काम 'अमन का आतंकÓ नाम से प्रदर्शित किया गया था। कश्मीर में जगह-जगह लगने वाले रेजरवायर से कार्टून टांगे गए थे। इसके साथ ही कुछ कीचड़-पत्थर और शराब की बोतलें भी मैंने रखी थीं जैसी कि कश्मीर में सुरक्षा दस्तों की बंकरों के आसपास सड़कों पर दिखती हैं। दिल्ली में रहते हुए मैंने अपने अखबार के लिए कार्टून बनाया, डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींची और उसे ईमेल करने के लिए एक साइबर कैफे तक गया। वहां से मैं ईमेल कर ही रहा था कि उसी वक्त कनॉट प्लेस और गे्रटर कैलाश में बम फूटने की खबर वहां किसी को फोन पर लगी। इस पर साइबर कैफे का मालिक दूसरे लोगों से फुसफुसाकर बात करने लगा कि यह आदमी कश्मीरी है और इसकी शिनाख्त देखें। ये मेरे पास आकर मेरा पासपोर्ट पूछने, जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और पहचानपत्र है तो उसे देखने के बाद वे यह देखने लगे कि मैं किस वेबसाईट को देख रहा था। जब उन्होंने पाया कि मैं कश्मीर की वेबसाईट देख रहा था तो उन्होंने तुरंत पुलिस को बुला लिया कि यहां एक कश्मीरी है। इस पर आनन-फानन वहां पुलिस पहुंची और पहुंचते ही चीखने लगी कि कहां है आदमी? इसके बाद वे मुझे गालियां देते हुए, घसीटते हुए बाहर ले गए और वहां करीब 200 लोग इस तरह इक_े हो गए कि कोई टेररिस्ट पकड़ाया है। मैं चीखते रह गया कि कोई जाकर हेबिटाट सेंटर में बताए कि जिसकी प्रदर्शनी लगी है उस आर्टिस्ट को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद थाने में हरामजादे कश्मीरी जैसी गालियां, देश के खिलाफ रहने की गालियां, चलती रहीं...
एक कश्मीरी कार्टूनिस्ट की प्रताडऩा की यह लंबी कहानी और यह बताती है कि कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान में कश्मीरियों को लेकर बर्दाश्त कितना कम है और बेसमझी कितनी अधिक। जब समझ का ऐसा फासला हो और देश के किसी तबके में इस फासले को दूर करने की चाह न हो तो कश्मीरी किस तरह बाकी भारत से जुड़े रहेंगे? (बाकी कल)
जन्नत को जहन्नुम बनाने पर आमादा सैलानी
22 जून 2011
सुनील कुमार
इतनी खूबसूरती के बीच भी कश्मीर में घूमना, उसे देखना, उस वक्त तकलीफदेह हो जाता है जब वहां गए हुए सैलानी और वहां के भी कुछ लोग, एक-दूसरे से या आपस में बदतमीजी पर उतर आते हैं। उत्तर भारत से गए हुए अधिकतर सैलानियों के मन में किसी कतार के लिए सम्मान बहुत कम दिखता है। जिस जगह दूसरे लोग घंटों से लाईन में लगे हैं वहां पर किस तरह रिश्वत देकर पीछे के रास्ते से आगे पहुंचा जाए इसका रास्ता कुछ लोगों को बहुत खुशी दे जाता है। हिन्दुस्तानियों का एक तबका इसी बात में खुश रहता है कि किसी साफ-सुथरी जगह पर कैसे थूका जाए या कैसे मूता जाए, जहां सिगरेट पीने की मनाही हो वहां कैसे सिगरेट पी जाए और मंदिर से लेकर केबल कार तक किस तरह अपने हद से अधिक आगे बढ़कर अपने को कामयाब माना जाए।
अलग-अलग इलाके के लोगों के मिजाज को देखें तो कुछ बातें खुलकर सामने दिखती हैं। कुछ लोगों को अलग-अलग इलाके के लोगों के बारे में ऐसी बात हो सकता है कि अपमानजनक भी लगे लेकिन अपने ही देश के लोगों की खामियों का अहसास किए बिना उन्हें खूबियों में कभी तब्दील नहीं किया जा सकता। गुजरात से आए हुए लोग सबसे शांत मिजाज के, धीरे बात करने वाले, कतार में लगने वाले लोग थे। बंगाल से आए हुए लोग किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहुत जोरों से बोलने वाले दिखते हैं और आपस में भी वे जो कहते हैं उन्हें दूर-दूर तक के लोग सुन सकते हैं। दिल्ली और पंजाब से आए हुए लोगों की जुबान में बहुत मौकों पर गालियां भरी होती हैं और अपने अलावा किसी और के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं दिखता।
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें किसी खूबसूरत और अच्छी जगह के मजे को किरकिरा करके रख देती हैं। कुछ ऐसी जवान, फैशनेबल, और चुलबुली लड़कियां केबल कार की घंटों लंबी कतार को तोडऩे की ऐसी कसम खाई बैठी थीं कि कई बार फटकार खाने के बाद भी वे किसी न किसी तरह सबसे आगे पहुंचकर घुसने में कामयाब हो गईं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जिन शहरी मां-बाप ने ऐसे लोगों को हजारों रुपए के चश्मे और दसियों हजार के मोबाईल फोन लेकर दिए, उन्होंने आसपास के किसी तमीजदार से कुछ तमीज लेकर अपने बच्चों को क्यों नहीं दी? जब हट्टे-कट्टे और जवान लोग, बच्चों वाले अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने को अपनी आदत बना लें तो वैसा समाज सभ्य लोगों के बीच कभी इज्जत नहीं पा सकता।
घूमने-फिरने की जगहों पर तरह-तरह से गंदगी फैलाना देखना हो तो उसके लिए हिन्दुस्तानियों से बेहतर मिसाल शायद कम ही लोगों की मिले। इन दिनों बाजार में तमाम चीजें जिस तरह की चमकदार प्लास्टिक पैकिंग की मिलती हैं, और वैसी पैकिंग के बिना कोई खुली चीज किसी बड़ी या महंगी जगह पर मिल ही नहीं सकती, वैसी चीजों को खाकर उसका कचरा खूबसूरत पहाडिय़ों पर फैला देने वाले, डल झील के पानी में बिखरा देने वाले सैलानियों के बीच नागरिक जिम्मेदारियों को कैसे पैदा किया जा सकता है, या फिर उन पर कुछ कड़े देशों की तरह का जुर्माना कैसे लगाया जा सकता है, इस बारे में सोचना चाहिए।
कश्मीर में जब बड़ी-बड़ी बातों के लिए भी सरकार और प्रशासन नामौजूद दिखते हैं तो ऐसी छोटी-छोटी बातें में बेहतरी की सोचने वाला कौन मिलेगा? कश्मीर के समाज में अपनी बड़ी-बड़ी दिक्कतों के चलते हुए, उनके मन में बड़े-बड़े रंज रहते हुए ऐसी कम अहमियत वाली बातों की तरफ उनका ध्यान न जाना तो ठीक है लेकिन मस्ती के मूड में जो सैलानी अपने अलग-अलग अच्छे भले इलाकों को छोड़कर वहां जाते हैं वे भी इस बारे में न सोचें तो यह दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के अपने अविकसित रह जाने और असभ्य रहने का सुबूत रहता है। वहां रहते हुए ही मैंने कुछ छोटी-छोटी बातें अखबार के लिए लिखकर भेजीं कि किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों का बर्ताव उनकी जाति, उनके धर्म, उनकी बोली, उनके इलाके जैसी बहुत सी बातों के लिए दूसरों के मन में सम्मान या अपमान तय करता है।
गुलमर्ग में केबल कार के गोंडोला कहा जाता है। उससे ऊंचाई पर बर्फ तक जाने के लिए 800 रुपए खर्च भी करने पड़ते हैं। इसके बाद भी वहां कतार इतनी लंबी लगी थी कि कई जगहों पर जाते और आते हुए घंटों तक खड़े रहना पड़ रहा था। अलग-अलग इलाकों के बदतमीज लोग तो वहां कतारें तोड़ ही रहे थे, हाथ में वायरलेस सेट पकड़े हुए एक अफसर आधा-पौन दर्जन लोगों को लाकर कतार से परे सीधा गोंडोला में बिठाने लगा। मैंने इसे लेकर जब बहस की और अंगे्रजी में फटकार लगाते हुए उसका नाम और पद पूछा तो बहुत बहस के बाद उसने नाम बताया और कहा कि ये लोग राजकीय अतिथि हैं और इन्हें वह सीएम हाउस से लेकर आया है। ऐसी नौबत हर जगह आती है। किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री ही नहीं, छोटे-छोटे अफसरों के भेजे हुए लोग ऐसे ही कभी नवरात्रि में किसी मंदिर तक तो कभी किसी दरगाह पर पहुंचते हैं। लेकिन कई घंटे लाईन में लगने के बाद, और लोगों को बदतमीजी-मक्कारी करते देखने के बाद मेरा सब्र जवाब दे चुका था। काफी डाटकर मैंने इस राजकीय जत्थे को अपने से आगे बढऩे से तो रोक दिया लेकिन ऊपर पहुंचकर जब हम उतरे तो एक-दो मिनट के बाद ही चमक-दमक वाला यह ताकतवर जत्था भी पहुंचा। मैंने इस अफसर के साथ इस परिवार की तस्वीरें भी खींचकर रख लीं, लेकिन उस वक्त एक फिक्र यह भी थी कि वर्दियों और बंदूकों के साथ में चलने वाले इन लोगों से उलझना कश्मीर में कितनी समझदारी की बात है?
इसके कुछ दिन पहले जब हम पहलगाम से श्रीनगर लौट रहे थे तो इस राजधानी के शुरू होने पर ही फौज का एक ठिकाना इस हाईवे के दोनों तरफ पड़ा। वहां अचानक दोनों तरफ सेना के फौजियों ने ही तमाम गाडिय़ों को रोक दिया। इसके बाद सड़क के एक तरफ के इस आर्मी कैंप से निकलकर सड़क के दूसरे तरफ कुल एक महिला जा रही थी जो कि अपने हुलिए और कपड़ों से किसी अफसर की बीबी थी। आमने-सामने के गेट तक आने-जाने के लिए जिस अंदाज में बंदूकबाजों ने पूरा ट्रैफिक रोक दिया था और फिर मैडम जिस तरह टहलते हुए पार गईं, उनके पीछे एक वर्दीधारी एक ट्रे में चाय का सामान लेकर गया, उससे कश्मीर में सत्ता और जनता के बीच का फासला समझ में आता है। एक महिला सड़क किनारे रूककर, आती-जाती गाडिय़ों को देखकर भी सड़क पा कर सकती थी, लेकिन कश्मीर में दिल्ली की भेजी हुई फौजें अपने-आपमें एक कानून हैं।
ऐसे में 13 हजार फीट की एक जमी हुई पहाड़ी पर मैं अगर वहां के कुछ ताकतवर बंदूक और वायरलैस वालों से उलझ रहा था तो इसके पीछे समझदारी तो कम थी, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की एक नासमझी अधिक थी। बाद में कुछ जानकार लोगों ने कहा कि कश्मीर ऐसी बहस की जगह नहीं है।
मुझे लगा कि अगर किसी राज्य को कुदरत से मिली खूबसूरती से खिंचे आ रहे सैलानियों की गिनती में इजाफा करना है, या उनसे अधिक कमाई करनी है तो उस राज्य को अपने-आपको एक बेहतर मेजबान बनकर भी दिखाना होगा। जिस परले दर्जे की बदइंतजामी वहां पर सरकार के तमाम कामों में एक सैलानी के सामने आती है वह भयानक है। जो अच्छी बातें सामने आती हैं वे कुदरत की दी हुई हैं और वहां के गरीब लोगों के भले मिजाज की हैं। कश्मीर में एक नौजवान मुख्यमंत्री के रहते हुए भी अगर रोजमर्रा की जिंदगी के हालात नहीं सुधरते हैं तो यह राज्य अपनी संभावनाओं को नहीं पा सकेगा। और हो सकता है कि एक नौजवान से ही ऐसी उम्मीदें बेबुनियाद हों और कहीं कोई बुजुर्ग मुख्यमंत्री भी बेहतर काम करने वाला आ जाए।
श्रीनगर की एक ठीक-ठाक दर्जे की होटल में हम अपने एक कश्मीरी दोस्त के ठहराए रूके थे। होटल मालिक के परिवार के मेहमान होने की वजह से जाहिर था कि बाकी लोगों के मुकाबले हमें कुछ अधिक अच्छा बर्ताव मिलता, और मिला भी। लेकिन उसके बाद भी ऐसा लगा कि वहां काम करने वाले लोगों को कुछ और अधिक टे्रनिंग की जरूरत है जिससे कि सैलानी कुछ बेहतर अनुभव लेकर जा सकें। वहां लोगों में पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग की शायद कुछ कमी है इसलिए सभी तरह के काम करने वाले लोग अपने मुहल्ले में काम करने के लायक तो हैं लेकिन बाहरी लोगों से वास्ता पडऩे पर उनमें कुछ-कुछ कमियां दिखती हैं। इस मामूली बात को मैं कश्मीर के नौजवानों में पनपते अलगाववाद और आतंक से जोड़कर देख रहा हूं कि अगर उन्हें बेहतर काम-धंधे से लगाना है तो उन्हें मामूली काम को भी खूबी के साथ करने की ट्रेनिंग देने का काम सरकार को करना चाहिए। जब तक ऐसा विकास काम करने वालों के बीच नहीं होगा तब तक बेरोजगारों के दिन नहीं सुधरेंगे और वे शायद रोज के मेहनतानों पर पत्थर फेंकने का काम अच्छा मानते रहेंगे।
जिस देश में देश भर के अफसरों को देश भर के राज्यों में भेजने का पुराना इंतजाम है वहां पर भी जम्मू-कश्मीर राज्य के आईएएस अफसर या उस राज्य के स्थानीय अफसर चीजों में इतने मामूली सुधार क्यों नहीं कर पाते यह मेरे लिए हैरानी की बात है। हो सकता है कि कुछ और राज्य इससे भी बुरी हालत में हों लेकिन ऐसी मामूली गलतियों को सही ठहराने के लिए कम से कम मैं तो किसी अधिक बुरे से तुलना करना ठीक नहीं समझता। (बाकी कल)
सुनील कुमार
इतनी खूबसूरती के बीच भी कश्मीर में घूमना, उसे देखना, उस वक्त तकलीफदेह हो जाता है जब वहां गए हुए सैलानी और वहां के भी कुछ लोग, एक-दूसरे से या आपस में बदतमीजी पर उतर आते हैं। उत्तर भारत से गए हुए अधिकतर सैलानियों के मन में किसी कतार के लिए सम्मान बहुत कम दिखता है। जिस जगह दूसरे लोग घंटों से लाईन में लगे हैं वहां पर किस तरह रिश्वत देकर पीछे के रास्ते से आगे पहुंचा जाए इसका रास्ता कुछ लोगों को बहुत खुशी दे जाता है। हिन्दुस्तानियों का एक तबका इसी बात में खुश रहता है कि किसी साफ-सुथरी जगह पर कैसे थूका जाए या कैसे मूता जाए, जहां सिगरेट पीने की मनाही हो वहां कैसे सिगरेट पी जाए और मंदिर से लेकर केबल कार तक किस तरह अपने हद से अधिक आगे बढ़कर अपने को कामयाब माना जाए।
अलग-अलग इलाके के लोगों के मिजाज को देखें तो कुछ बातें खुलकर सामने दिखती हैं। कुछ लोगों को अलग-अलग इलाके के लोगों के बारे में ऐसी बात हो सकता है कि अपमानजनक भी लगे लेकिन अपने ही देश के लोगों की खामियों का अहसास किए बिना उन्हें खूबियों में कभी तब्दील नहीं किया जा सकता। गुजरात से आए हुए लोग सबसे शांत मिजाज के, धीरे बात करने वाले, कतार में लगने वाले लोग थे। बंगाल से आए हुए लोग किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहुत जोरों से बोलने वाले दिखते हैं और आपस में भी वे जो कहते हैं उन्हें दूर-दूर तक के लोग सुन सकते हैं। दिल्ली और पंजाब से आए हुए लोगों की जुबान में बहुत मौकों पर गालियां भरी होती हैं और अपने अलावा किसी और के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं दिखता।
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें किसी खूबसूरत और अच्छी जगह के मजे को किरकिरा करके रख देती हैं। कुछ ऐसी जवान, फैशनेबल, और चुलबुली लड़कियां केबल कार की घंटों लंबी कतार को तोडऩे की ऐसी कसम खाई बैठी थीं कि कई बार फटकार खाने के बाद भी वे किसी न किसी तरह सबसे आगे पहुंचकर घुसने में कामयाब हो गईं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जिन शहरी मां-बाप ने ऐसे लोगों को हजारों रुपए के चश्मे और दसियों हजार के मोबाईल फोन लेकर दिए, उन्होंने आसपास के किसी तमीजदार से कुछ तमीज लेकर अपने बच्चों को क्यों नहीं दी? जब हट्टे-कट्टे और जवान लोग, बच्चों वाले अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने को अपनी आदत बना लें तो वैसा समाज सभ्य लोगों के बीच कभी इज्जत नहीं पा सकता।
घूमने-फिरने की जगहों पर तरह-तरह से गंदगी फैलाना देखना हो तो उसके लिए हिन्दुस्तानियों से बेहतर मिसाल शायद कम ही लोगों की मिले। इन दिनों बाजार में तमाम चीजें जिस तरह की चमकदार प्लास्टिक पैकिंग की मिलती हैं, और वैसी पैकिंग के बिना कोई खुली चीज किसी बड़ी या महंगी जगह पर मिल ही नहीं सकती, वैसी चीजों को खाकर उसका कचरा खूबसूरत पहाडिय़ों पर फैला देने वाले, डल झील के पानी में बिखरा देने वाले सैलानियों के बीच नागरिक जिम्मेदारियों को कैसे पैदा किया जा सकता है, या फिर उन पर कुछ कड़े देशों की तरह का जुर्माना कैसे लगाया जा सकता है, इस बारे में सोचना चाहिए।
कश्मीर में जब बड़ी-बड़ी बातों के लिए भी सरकार और प्रशासन नामौजूद दिखते हैं तो ऐसी छोटी-छोटी बातें में बेहतरी की सोचने वाला कौन मिलेगा? कश्मीर के समाज में अपनी बड़ी-बड़ी दिक्कतों के चलते हुए, उनके मन में बड़े-बड़े रंज रहते हुए ऐसी कम अहमियत वाली बातों की तरफ उनका ध्यान न जाना तो ठीक है लेकिन मस्ती के मूड में जो सैलानी अपने अलग-अलग अच्छे भले इलाकों को छोड़कर वहां जाते हैं वे भी इस बारे में न सोचें तो यह दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के अपने अविकसित रह जाने और असभ्य रहने का सुबूत रहता है। वहां रहते हुए ही मैंने कुछ छोटी-छोटी बातें अखबार के लिए लिखकर भेजीं कि किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों का बर्ताव उनकी जाति, उनके धर्म, उनकी बोली, उनके इलाके जैसी बहुत सी बातों के लिए दूसरों के मन में सम्मान या अपमान तय करता है।
गुलमर्ग में केबल कार के गोंडोला कहा जाता है। उससे ऊंचाई पर बर्फ तक जाने के लिए 800 रुपए खर्च भी करने पड़ते हैं। इसके बाद भी वहां कतार इतनी लंबी लगी थी कि कई जगहों पर जाते और आते हुए घंटों तक खड़े रहना पड़ रहा था। अलग-अलग इलाकों के बदतमीज लोग तो वहां कतारें तोड़ ही रहे थे, हाथ में वायरलेस सेट पकड़े हुए एक अफसर आधा-पौन दर्जन लोगों को लाकर कतार से परे सीधा गोंडोला में बिठाने लगा। मैंने इसे लेकर जब बहस की और अंगे्रजी में फटकार लगाते हुए उसका नाम और पद पूछा तो बहुत बहस के बाद उसने नाम बताया और कहा कि ये लोग राजकीय अतिथि हैं और इन्हें वह सीएम हाउस से लेकर आया है। ऐसी नौबत हर जगह आती है। किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री ही नहीं, छोटे-छोटे अफसरों के भेजे हुए लोग ऐसे ही कभी नवरात्रि में किसी मंदिर तक तो कभी किसी दरगाह पर पहुंचते हैं। लेकिन कई घंटे लाईन में लगने के बाद, और लोगों को बदतमीजी-मक्कारी करते देखने के बाद मेरा सब्र जवाब दे चुका था। काफी डाटकर मैंने इस राजकीय जत्थे को अपने से आगे बढऩे से तो रोक दिया लेकिन ऊपर पहुंचकर जब हम उतरे तो एक-दो मिनट के बाद ही चमक-दमक वाला यह ताकतवर जत्था भी पहुंचा। मैंने इस अफसर के साथ इस परिवार की तस्वीरें भी खींचकर रख लीं, लेकिन उस वक्त एक फिक्र यह भी थी कि वर्दियों और बंदूकों के साथ में चलने वाले इन लोगों से उलझना कश्मीर में कितनी समझदारी की बात है?
इसके कुछ दिन पहले जब हम पहलगाम से श्रीनगर लौट रहे थे तो इस राजधानी के शुरू होने पर ही फौज का एक ठिकाना इस हाईवे के दोनों तरफ पड़ा। वहां अचानक दोनों तरफ सेना के फौजियों ने ही तमाम गाडिय़ों को रोक दिया। इसके बाद सड़क के एक तरफ के इस आर्मी कैंप से निकलकर सड़क के दूसरे तरफ कुल एक महिला जा रही थी जो कि अपने हुलिए और कपड़ों से किसी अफसर की बीबी थी। आमने-सामने के गेट तक आने-जाने के लिए जिस अंदाज में बंदूकबाजों ने पूरा ट्रैफिक रोक दिया था और फिर मैडम जिस तरह टहलते हुए पार गईं, उनके पीछे एक वर्दीधारी एक ट्रे में चाय का सामान लेकर गया, उससे कश्मीर में सत्ता और जनता के बीच का फासला समझ में आता है। एक महिला सड़क किनारे रूककर, आती-जाती गाडिय़ों को देखकर भी सड़क पा कर सकती थी, लेकिन कश्मीर में दिल्ली की भेजी हुई फौजें अपने-आपमें एक कानून हैं।
ऐसे में 13 हजार फीट की एक जमी हुई पहाड़ी पर मैं अगर वहां के कुछ ताकतवर बंदूक और वायरलैस वालों से उलझ रहा था तो इसके पीछे समझदारी तो कम थी, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की एक नासमझी अधिक थी। बाद में कुछ जानकार लोगों ने कहा कि कश्मीर ऐसी बहस की जगह नहीं है।
मुझे लगा कि अगर किसी राज्य को कुदरत से मिली खूबसूरती से खिंचे आ रहे सैलानियों की गिनती में इजाफा करना है, या उनसे अधिक कमाई करनी है तो उस राज्य को अपने-आपको एक बेहतर मेजबान बनकर भी दिखाना होगा। जिस परले दर्जे की बदइंतजामी वहां पर सरकार के तमाम कामों में एक सैलानी के सामने आती है वह भयानक है। जो अच्छी बातें सामने आती हैं वे कुदरत की दी हुई हैं और वहां के गरीब लोगों के भले मिजाज की हैं। कश्मीर में एक नौजवान मुख्यमंत्री के रहते हुए भी अगर रोजमर्रा की जिंदगी के हालात नहीं सुधरते हैं तो यह राज्य अपनी संभावनाओं को नहीं पा सकेगा। और हो सकता है कि एक नौजवान से ही ऐसी उम्मीदें बेबुनियाद हों और कहीं कोई बुजुर्ग मुख्यमंत्री भी बेहतर काम करने वाला आ जाए।
श्रीनगर की एक ठीक-ठाक दर्जे की होटल में हम अपने एक कश्मीरी दोस्त के ठहराए रूके थे। होटल मालिक के परिवार के मेहमान होने की वजह से जाहिर था कि बाकी लोगों के मुकाबले हमें कुछ अधिक अच्छा बर्ताव मिलता, और मिला भी। लेकिन उसके बाद भी ऐसा लगा कि वहां काम करने वाले लोगों को कुछ और अधिक टे्रनिंग की जरूरत है जिससे कि सैलानी कुछ बेहतर अनुभव लेकर जा सकें। वहां लोगों में पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग की शायद कुछ कमी है इसलिए सभी तरह के काम करने वाले लोग अपने मुहल्ले में काम करने के लायक तो हैं लेकिन बाहरी लोगों से वास्ता पडऩे पर उनमें कुछ-कुछ कमियां दिखती हैं। इस मामूली बात को मैं कश्मीर के नौजवानों में पनपते अलगाववाद और आतंक से जोड़कर देख रहा हूं कि अगर उन्हें बेहतर काम-धंधे से लगाना है तो उन्हें मामूली काम को भी खूबी के साथ करने की ट्रेनिंग देने का काम सरकार को करना चाहिए। जब तक ऐसा विकास काम करने वालों के बीच नहीं होगा तब तक बेरोजगारों के दिन नहीं सुधरेंगे और वे शायद रोज के मेहनतानों पर पत्थर फेंकने का काम अच्छा मानते रहेंगे।
जिस देश में देश भर के अफसरों को देश भर के राज्यों में भेजने का पुराना इंतजाम है वहां पर भी जम्मू-कश्मीर राज्य के आईएएस अफसर या उस राज्य के स्थानीय अफसर चीजों में इतने मामूली सुधार क्यों नहीं कर पाते यह मेरे लिए हैरानी की बात है। हो सकता है कि कुछ और राज्य इससे भी बुरी हालत में हों लेकिन ऐसी मामूली गलतियों को सही ठहराने के लिए कम से कम मैं तो किसी अधिक बुरे से तुलना करना ठीक नहीं समझता। (बाकी कल)
राहुल गांधी देश को जवाब दें
23 जून 11
उत्तरप्रदेश में किसानों और पुलिस के टकराव के बाद पुलिस ज्यादती के आरोपों के बीच कांगे्रस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी मोटर साइकिल पर बैठकर दिल्ली के करीब के भट्टा परसौल पहुंचे थे और वहां से निकलकर उन्होंने ये गंभीर आरोप लगाए थे कि वहां महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और बड़ी संख्या में किसानों की हत्याएं हुईं। अब ऐसी खबर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि वहां पर न कोई बलात्कार हुआ और न ही किसानों की हत्या हुई।
कांगे्रस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक दिग्विजय सिंह के मार्गदर्शन में राहुल गांधी के राजनीतिक प्रशिक्षण का अंदाज लोगों को है। इस मौके पर दिग्विजय राहुल के साथ मौजूद भी थे। और ऐसे तमाम आरोप दिग्विजय ने भी लगाए थे। इसलिए यह बात साफ है कि कांगे्रस की अमूल-बेबी की कही बातें दिग्विजय के मुताबिक ही रही होंगी। इसलिए हम राहुल गांधी की अपरिपक्वता को कोई रियायत इस मामले में नहीं दे सकते। वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर आकर, अपनी पारिवारिक विरासत से सिखने का पूरा मौका पाते हुए, कांगे्रस की राजनीति की धुरी पर रहते हुए, और किसी भी दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को संभालने की अटकलों वाले नेहरू-गांधी परिवार के इस चिराग को नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती। जब एक दलित महिला मुख्यमंत्री के राज पर आरोप लगाने हों, तो हम कुछ सावधानी बरतने को ही समझदारी भी मानेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि उत्तरप्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांगे्रस किसी तिनकेनुमा मुद्दे को भी छोडऩा नहीं चाहती और वह इसके लिए परले दर्जे के ऐसे झूठे आरोप लगाने से भी नहीं चूकी जिसका कि गलत साबित होना तय सा था।
हम मायावती के राज को बहुत अच्छा नहीं मान रहे और आज दरअसल माया राज की बदअमनी के खिलाफ ही लिखना तय था, लेकिन फिर केंद्र सरकार के अधीन सी काम करने वाले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट ने हमारा रूख मोड़ दिया। उत्तरप्रदेश में रोजाना होते कई-कई बलात्कार, सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्रियों और विधायकों के बड़े-बड़े अपराध और जेल में कल हुई एक बहुत संदिग्ध हत्या जैसे अनगिनत मामले माया के खिलाफ हैं। लेकिन इन सबके बीच भी यह बात अधिक मायने रखती है कि राहुल गांधी के लगाए हुए इतने गंभीर आरोप झूठे साबित होते दिख रहे हैं। राजनीति यह तो कहती है कि राहुल गांधी उत्तरप्रदेश गए होते और किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का या माया सरकार के खिलाफ उन जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करते। उन्होंने अलग-अलग नजरियों से इन दोनों ही कामों को किया लेकिन उसके बाद जब वे बलात्कार और हत्या जैसे ठोस अपराधों के आरोप लगाते हैं और किसानों की लाशों को बड़ी संख्या में ठिकाने लगा देने जैसी बात कहते हैं तो फिर उन्हें आज देश को इस बात पर जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ऐसी गैरजिम्मेदारी क्यों की?
दरअसल पिछले कुछ महीनों में दिग्विजय सिंह ने कांगे्रस पार्टी के औपचारिक प्रवक्ताओं से परे जाकर एक अलग आक्रामक मोर्चा खोलने का जो काम किया है उसे लेकर लोगों के बीच यह धुंध छाई हुई है कि वह सोनिया गांधी के कहे हुए, उनकी सहमति से या फिर अपनी मर्जी से एक आक्रामक नेता बने हुए हैं? लेकिन आक्रामकता का सिलसिला लोगों को कई तरह की गलतफहमी या खुशफहमी का शिकार भी बना देता है। दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और संघ परिवार के खिलाफ अपने अभियान की धार को लगातार बढ़ाते हुए इतना तेज कर दिया है कि अब उस पर चलना शायद उनके खुद के लिए मुश्किल साबित होगा। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संघ परिवार के खिलाफ कांगे्रस के भीतर अर्जुन सिंह के जाने के बाद एक जगह खाली हो गई थी और दिग्विजय उसे भरने का काम भी कर रहे हैं। यह काम पार्टी अधिक चाहती है या वे खुद अधिक चाहते हैं इसे समझने का लोगों के पास कोई जरिया नहीं है क्योंकि कांगे्रस की मुखिया अधिकतर मामलों में मुंह नहीं खोलती हैं और पार्टी के भीतर के मुद्दों पर भी उनका रूख सामने नहीं आता है।
खैर, हमें इस पार्टी के भीतर के मुद्दों से अधिक लेना-देना नहीं है लेकिन दिग्विजय-राहुल की मायावती के खिलाफ यह पूरी तरह से नाजायज और गैरजरूरी बयानबाजी आज उनकी पार्टी को ही भारी पड़ रही है। हमारा लिखने का मकसद यह है कि जिस पुलिस पर बलात्कार और हत्या, हत्या के बाद लाशों को तबाह कर देने के आरोप लगाकर राजनीति चाहे जितनी की जाए, इससे पुलिस पर क्या असर पड़ता है? यह पुलिस कल तक किसी दूसरी पार्टी की सरकार के मातहत काम करती थी, आज मायावती के नीचे काम कर रही है, कल किसी और पार्टी की सरकार रहेगी। ऐसे में अगर विपक्ष पुलिस पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाते रहेगा तो क्या किसी ने यह भी सोचा है कि इन पुलिस कर्मचारियों को घर जाकर अपनी बीबी, अपने बच्चों को भी मुंह दिखाना रहता है और समाज में जीना भी पड़ता है। बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर आरोप इस लापरवाही से, इस बदनीयती से किसी पर लगाना हम बहुत खराब मानते हैं और कल को अगर मायावती की सरकार दिग्विजय-राहुल पर झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने का जुर्म कायम करती है तो अदालत में कांगे्रस किस तरह अपने-आपको बचाएगी?
भारत जैसी राजनीति में हम वैसे भी बहुत ही फिजूल की गालीगलौज देख रहे हैं। जब भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी मुलायम-लालू से लेकर कांगे्रस तक गालियों की बौछार करते हैं तो उससे चटपटी हैडिंग अखबारों को मिल जाती हैं। टेलीविजन समाचार चैनलों को बार-बार दिखाने के लिए उनका एक बयान मिल जाता है। लेकिन इस चक्कर में देश के जो जरूरी मुद्दे हैं वे गायब हो जाते हैं। हमें यह भी लगता है कि क्या मीडिया को भी गैरजिम्मेदारी और बदनीयती से की गई गालीगलौज को बढ़ाने से बचना नहीं चाहिए? क्या ऐसे बयान देने वालों को उनके शब्दों और उनके मतलब को लेकर घेरना नहीं चाहिए? लेकिन दर्शक संख्या और पाठक संख्या के गलाकाट मुकाबले में मीडिया उसी तरह गंदगी को परोसने में ओवरटाईम कर रहा है जिस तरह वोटों की लड़ाई में आगे निकलने के लिए पार्टियां और नेता गंदगी परोस रहे हैं। देश को इससे उबरने की जरूरत है।
उत्तरप्रदेश में किसानों और पुलिस के टकराव के बाद पुलिस ज्यादती के आरोपों के बीच कांगे्रस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी मोटर साइकिल पर बैठकर दिल्ली के करीब के भट्टा परसौल पहुंचे थे और वहां से निकलकर उन्होंने ये गंभीर आरोप लगाए थे कि वहां महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और बड़ी संख्या में किसानों की हत्याएं हुईं। अब ऐसी खबर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि वहां पर न कोई बलात्कार हुआ और न ही किसानों की हत्या हुई।
कांगे्रस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक दिग्विजय सिंह के मार्गदर्शन में राहुल गांधी के राजनीतिक प्रशिक्षण का अंदाज लोगों को है। इस मौके पर दिग्विजय राहुल के साथ मौजूद भी थे। और ऐसे तमाम आरोप दिग्विजय ने भी लगाए थे। इसलिए यह बात साफ है कि कांगे्रस की अमूल-बेबी की कही बातें दिग्विजय के मुताबिक ही रही होंगी। इसलिए हम राहुल गांधी की अपरिपक्वता को कोई रियायत इस मामले में नहीं दे सकते। वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर आकर, अपनी पारिवारिक विरासत से सिखने का पूरा मौका पाते हुए, कांगे्रस की राजनीति की धुरी पर रहते हुए, और किसी भी दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को संभालने की अटकलों वाले नेहरू-गांधी परिवार के इस चिराग को नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती। जब एक दलित महिला मुख्यमंत्री के राज पर आरोप लगाने हों, तो हम कुछ सावधानी बरतने को ही समझदारी भी मानेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि उत्तरप्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांगे्रस किसी तिनकेनुमा मुद्दे को भी छोडऩा नहीं चाहती और वह इसके लिए परले दर्जे के ऐसे झूठे आरोप लगाने से भी नहीं चूकी जिसका कि गलत साबित होना तय सा था।
हम मायावती के राज को बहुत अच्छा नहीं मान रहे और आज दरअसल माया राज की बदअमनी के खिलाफ ही लिखना तय था, लेकिन फिर केंद्र सरकार के अधीन सी काम करने वाले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट ने हमारा रूख मोड़ दिया। उत्तरप्रदेश में रोजाना होते कई-कई बलात्कार, सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्रियों और विधायकों के बड़े-बड़े अपराध और जेल में कल हुई एक बहुत संदिग्ध हत्या जैसे अनगिनत मामले माया के खिलाफ हैं। लेकिन इन सबके बीच भी यह बात अधिक मायने रखती है कि राहुल गांधी के लगाए हुए इतने गंभीर आरोप झूठे साबित होते दिख रहे हैं। राजनीति यह तो कहती है कि राहुल गांधी उत्तरप्रदेश गए होते और किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का या माया सरकार के खिलाफ उन जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करते। उन्होंने अलग-अलग नजरियों से इन दोनों ही कामों को किया लेकिन उसके बाद जब वे बलात्कार और हत्या जैसे ठोस अपराधों के आरोप लगाते हैं और किसानों की लाशों को बड़ी संख्या में ठिकाने लगा देने जैसी बात कहते हैं तो फिर उन्हें आज देश को इस बात पर जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ऐसी गैरजिम्मेदारी क्यों की?
दरअसल पिछले कुछ महीनों में दिग्विजय सिंह ने कांगे्रस पार्टी के औपचारिक प्रवक्ताओं से परे जाकर एक अलग आक्रामक मोर्चा खोलने का जो काम किया है उसे लेकर लोगों के बीच यह धुंध छाई हुई है कि वह सोनिया गांधी के कहे हुए, उनकी सहमति से या फिर अपनी मर्जी से एक आक्रामक नेता बने हुए हैं? लेकिन आक्रामकता का सिलसिला लोगों को कई तरह की गलतफहमी या खुशफहमी का शिकार भी बना देता है। दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और संघ परिवार के खिलाफ अपने अभियान की धार को लगातार बढ़ाते हुए इतना तेज कर दिया है कि अब उस पर चलना शायद उनके खुद के लिए मुश्किल साबित होगा। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संघ परिवार के खिलाफ कांगे्रस के भीतर अर्जुन सिंह के जाने के बाद एक जगह खाली हो गई थी और दिग्विजय उसे भरने का काम भी कर रहे हैं। यह काम पार्टी अधिक चाहती है या वे खुद अधिक चाहते हैं इसे समझने का लोगों के पास कोई जरिया नहीं है क्योंकि कांगे्रस की मुखिया अधिकतर मामलों में मुंह नहीं खोलती हैं और पार्टी के भीतर के मुद्दों पर भी उनका रूख सामने नहीं आता है।
खैर, हमें इस पार्टी के भीतर के मुद्दों से अधिक लेना-देना नहीं है लेकिन दिग्विजय-राहुल की मायावती के खिलाफ यह पूरी तरह से नाजायज और गैरजरूरी बयानबाजी आज उनकी पार्टी को ही भारी पड़ रही है। हमारा लिखने का मकसद यह है कि जिस पुलिस पर बलात्कार और हत्या, हत्या के बाद लाशों को तबाह कर देने के आरोप लगाकर राजनीति चाहे जितनी की जाए, इससे पुलिस पर क्या असर पड़ता है? यह पुलिस कल तक किसी दूसरी पार्टी की सरकार के मातहत काम करती थी, आज मायावती के नीचे काम कर रही है, कल किसी और पार्टी की सरकार रहेगी। ऐसे में अगर विपक्ष पुलिस पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाते रहेगा तो क्या किसी ने यह भी सोचा है कि इन पुलिस कर्मचारियों को घर जाकर अपनी बीबी, अपने बच्चों को भी मुंह दिखाना रहता है और समाज में जीना भी पड़ता है। बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर आरोप इस लापरवाही से, इस बदनीयती से किसी पर लगाना हम बहुत खराब मानते हैं और कल को अगर मायावती की सरकार दिग्विजय-राहुल पर झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने का जुर्म कायम करती है तो अदालत में कांगे्रस किस तरह अपने-आपको बचाएगी?
भारत जैसी राजनीति में हम वैसे भी बहुत ही फिजूल की गालीगलौज देख रहे हैं। जब भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी मुलायम-लालू से लेकर कांगे्रस तक गालियों की बौछार करते हैं तो उससे चटपटी हैडिंग अखबारों को मिल जाती हैं। टेलीविजन समाचार चैनलों को बार-बार दिखाने के लिए उनका एक बयान मिल जाता है। लेकिन इस चक्कर में देश के जो जरूरी मुद्दे हैं वे गायब हो जाते हैं। हमें यह भी लगता है कि क्या मीडिया को भी गैरजिम्मेदारी और बदनीयती से की गई गालीगलौज को बढ़ाने से बचना नहीं चाहिए? क्या ऐसे बयान देने वालों को उनके शब्दों और उनके मतलब को लेकर घेरना नहीं चाहिए? लेकिन दर्शक संख्या और पाठक संख्या के गलाकाट मुकाबले में मीडिया उसी तरह गंदगी को परोसने में ओवरटाईम कर रहा है जिस तरह वोटों की लड़ाई में आगे निकलने के लिए पार्टियां और नेता गंदगी परोस रहे हैं। देश को इससे उबरने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री लोकपाल के बाहर क्यों?
22 जून 11
अपने कुनबे और पार्टी के लोगों से मिलने चेन्नई से चलकर तिहाड़ जेल पहुंचने की बेबसी वाले डीएमके ने अपनी भागीदारी के यूपीए-मुखिया कांगे्रस के लिए एक परेशानी खड़ी की है। जब कांगे्रस के यूपीए-मंत्री लगातार देश को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों ठीक होगा, तब डीएमके ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। जाहिर है कि डीएमके अपनी नाराजगी को जाहिर करना चाह रहा है। लेकिन डीएमके की बात से परे भी इस बारे में सोचने की जरूरत है।
हम बरसों से यह लिखते आ रहे हैं कि देश के किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई खास दर्जा नहीं मिलना चाहिए जिससे कि वह दूसरे लोगों के अधिकार और सम्मान के ऊपर गिना जाए। हमने इस देश की सरकारी जुबान से वीआईपी शब्द भी हटाने पर जोर डाला था क्योंकि किसी एक व्यक्ति को दूसरों से कम महत्वपूर्ण कैसे गिना जा सकता है। जब इस देश की तमाम कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अलग-अलग समय पर भ्रष्ट साबित हो चुके हैं या उनके भ्रष्टाचार की खुली चर्चा हो चुकी है तब प्रधानमंत्री को या सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जजों को लोकपाल के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए? अभी कुछ ही समय पहले रिटायर हुए सुपीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन पर अपने कुनबे सहित भ्रष्टाचार में शामिल होने के कई आरोप सामने आए हैं। उन्हें वहां से रिटायर होने के बाद केंद्र सरकार ने एक दूसरे राष्ट्रीय संवैधानिक पद पर नियुक्त भी कर दिया है। इसी वक्त के आसपास केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर एक ऐसे अफसर को मनमोहन सरकार ने नियुक्त किया था जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल ही रहा था। नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की दखल पर सतर्कता आयुक्त को हटना पड़ा। ये तमाम कुर्सियां लोकपाल के दायरे से बाहर रखी जा रही हैं या इन्हें विमानतलों पर सुरक्षा जांच से छूट जैसे विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
लोकतंत्र के भीतर जो व्यक्ति अपने-आपको वीआईपी का दर्जा दिलाना चाहते हंै, या मंजूर करते हैं, वे एक अलोकतांत्रिक काम करते हैं। किसी को भी लोकपाल के दायरे से बचने की क्या जरूरत है? यह तो ठीक है कि आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निजी छवि को लेकर कुछ लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना ठीक होगा। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके बंगले के बगल में बसाए गए उनके दत्तक-दामाद के उस वक्त अपने जैसे कामों के लिए चर्चा में थे, क्या उसके बाद भी कोई प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सोच सकता है? आज यूपीए के भीतर कांगे्रस के मंत्री जिस तरह के तर्क प्रधानमंत्री को लेकर दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वे अपनी बात देश की जनता के गले से उतारने में लगे हैं। लेकिन मनमोहन सिंह को एक शो-केस के खूबसूरत पुतले की तरह इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। और फिर किसी इंसान के ईमानदार होने के हम इतनी बड़ी खूबी भी नहीं मानते कि उसकी मिसाल को प्रस्तावित कानून को प्रभावित करने के लिए काम में लाया जाए। यह तो हर व्यक्ति के लिए एक साधारण बात होनी चाहिए कि वह ईमानदार रहे।
कांगे्रस के भीतर भी दिग्विजय सिंह ने अपनी राय दी है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए। डीएमके के बाद हो सकता है कि कुछ और भागीदार पार्टियां भी इस राय से इत्तफाक रखें। अभी लोकपाल मसौदा कमेटी में तमाम मंत्रियों के कांगे्रसी होने की वजह से उनकी राय एक किस्म से कांगे्रस की राय जैसी भी दिखने लगी है। लेकिन जब केंद्रीय मंत्रिमंडल लोकपाल मसौदा लेकर बैठेगा तो हमारा ख्याल है कि ऐसी कुछ और पार्टियां भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखना चाह सकती हैं जिनके अपने प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकते। यूपीए को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बाकी लोगों की बात का भी ख्याल रखना पड़ेगा और वहां पर उन्हें सिर्फ कांगे्रस की मर्जी पर चलने की बददिमागी छोडऩी पड़ेगी।
इस देश में बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग जेल जा चुके हैं या जाने से बचे हुए हैं। ऐसे में उनमें से किसी को कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। लोकपाल के दायरे में हर किसी को लाना चाहिए, लेकिन अपनी इस सैद्धांतिक सोच को हम सरकार पर एक-एक शब्द नहीं थोपना चाहेंगे क्योंकि भारत के संविधान की कुछ दूसरी जटिलताएं भी हो सकती हैं। लेकिन हम यहां पर जोर देकर यह कहना चाहेेंगे कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को जांच के दायरे में रखना जरूरी है, और किसी को भी इससे रियायत नहीं मिलनी चाहिए।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी का राज ऐसा...
यह ठीक है कि कश्मीर पर कई अलग किस्म के दबाव हैं जो कि भारत के किसी दूसरे प्रदेश पर नहीं है, लेकिन उनसे वहां की सरकार की बदहाली को सही ठहराना मुमकिन नहीं। सैलानियों के मेजबान इस सूबे का हाल जैसा धूल, धुएं और लीद से लबालब है वह देखते ही बनता है (या कहें कि देखते नहीं बनता है?)
वहां के पिछली पीढ़ी के मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के बारे में इज्जत से बोलने वाला कोई नहीं टकराया। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को जरूर कुछ लोग बाप से बेहतर मानते हैं कि वह लोगों से मिल-जुल लेता है और लोगों को कुछ समझता है। फिर चाहे करता कुछ नहीं।
मुम्बई और दूसरे देशों में सैलानी की तरह सितारों के साथ घुमने-फिरने, नाचने-गाने की डॉ. फारूख अब्दुल्ला की तस्वीरें सबको याद हैं। एक आदमी ने कहा- जो चीफ मिनिस्टर पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने स्टेट से बाहर घूमता हो वह काम क्या करेगा?
यह एक लोकप्रिय तर्क हो सकता है और तुरंत एक से दूसरे तक पहुंच सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से नेता, अफसर, ऐसे होते हैं जो हर दिन काम करने के बाद भी अपने सूबे का नुकसान करते हैं उसे खा-पी जाते हैं। अब अगर राजा साल के तीन सौ पैंसठ दिन दूरसंचार मंत्रालय में काम करता होता, कलमाड़ी पूरे वक्त राष्ट्रमंडल खेलों के दफ्तर में काम करता होता, तो क्या देश का कुछ भला होता?
तीसरी पीढ़ी का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कई बरस से सत्ता में है, पहले दिल्ली की, अब कश्मीर की। लेकिन एक कलेक्टर के स्तर पर भी जो मामूली मरम्मत या सुधार के काम होने चाहिए, उनका भी कुछ पता नहीं है। सैलानियों से लबालब इस राज्य में कोई आतंकी तो आकर रोकता नहीं कि गांवों के नामों की तख्तियां न लगाओ, सड़क किनारे मील के पत्थर न लगाओ, मोड़ पर सावधान करने वाले बोर्ड न लगाओ, फुटपाथों की ऊंचाई कम न करो।
दरअसल आतंक और अलगाववाद से जूझने के बहाने सरकार को नालायक और निकम्मा बने रहने की छूट दे रखी है। एक हफ्ते में वहां के जितने जिले देखने मिले, सब आगे-पीछे के ही बदहाल थे। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कलेक्टर भी अपने-अपने जिलों में कोई न कोई काम करते दिखते हैं, कश्मीर में इन तमाम जिलों में कदम-कदम पर लगा कि फलां काम को करने की फुरसत अफसरों को क्यों नहीं है? केन्द्र सरकार से पैसे तो कश्मीर की दूसरे राज्यों के मुकाबिले बहुत अधिक मिलते हैं।
बिजली बंद रहने का हाल यह था कि कोई शाम ऐसी नहीं थी कि सड़क से गुजरते दर्जनों अंधेरे गांव-कस्बे पार न करना पड़े। श्रीनगर में एक अस्पताल की जरूरत पडऩे पर मैं हमारे ड्राइवर मकबूल भाई के साथ वहां के बहुत बड़े सरकारी चेस्ट हॉस्पिटल पहुंचा तो बंद बिजली के बीच अस्पताल के बोर्ड-गेट तक नहीं सूझ रहे थे, टीले पर बसी इमारत तो किसी भी तरह से दिख ही नहीं रही थी। बाजार में भी दूकानें अपने-अपने इंतजाम से रौशन थीं।
सरकार की बदहाली की यह तीसरी पीढ़ी नेशनल कांफ्रेंस की है और दूसरी पीढ़ी की पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सईद भी बाप के साए में राजनीति में हैं। लेकिन विरासत किसी को काबिल बना देती तो फिर कनिमोझि महीनों से जेल में क्या होती? (या फिर करूणानिधि से यही उसे विरासत में मिली है?)
श्रीनगर की डल लेक के किनारे हजरत बल दरगाह है। उसी के जरा से पहले सोच समझकर शेख अब्दुल्ला की मजार बनाई गई है। उस वक्त अदालतें चौकस नहीं थीं, इसलिए झील पर ही यह काम किया गया। लेकिन हजरत बल दरगाह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों में से एक परिंदा भी शेख अब्दुल्ला की मजार पर ठहरा नहीं दिखा। एक तख्ती तक वहां लगी नहीं दिखी और छह बार वहां से गुजरने पर भी सन्नाटा ही दिखा। अपने बाप और दादा की मजार पर एक तख्ती तक कश्मीर के मुख्यमंत्री क्यों नहीं लगवा पाए?
जब आतंक का साया हो, अलगाववादियों के पत्थर चल रहे हों, तो सरकार को सरहद का बहाना देकर कई किस्म का काम नकारने का रास्ता मिल जाता है। कश्मीर में राज्य सरकारों की नाकामयाबी को वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने बेहतर सरकारें देखी हैं, बेहतर राज्य देखें हैं। बाकी सैलानी तो जन्नत के नजारे देखते-देखते ही लौट जाते हैं। हो सकता है कि देश के कई राज्य इससे भी बुरे चल रहे हों, और वहां के लोगों को कश्मीर में कुछ न खटकता हो।
उमर अब्दुल के दादा शेख अब्दुल्ला इस राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री रहे। और उन्हीं की पार्टी ने उतने बरस लगातार राज किया जितने बरस नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे, 1947 से 1964 तक। नेहरू के जाने के जरा से पहले ही उनके इस राज्य ने पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री देखा 1964 में। फिर 1965 से यहां के प्राईमिनिस्टर की कुर्सी का नाम बदलकर चीफ मिनिस्टर कर दिया गया। कुल मिलाकर तीन बरस के पीडीपी के राज को छोड़ें तो अब्दुल्ला और नेहरू के कुनबों की पार्टी ही इस पर राज करती रहीं, लेकिन यहां का बुरा हाल कायम रहा। राजधानी से बेहतर तो और कहीं कुछ हो नहीं सकता।
राज्य का धर्मनिरपेक्ष मिजाज आतंकी घटनाओं, अलगाववाद और कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर देने से परे, रोजमर्रा में बना हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे सुनाई नहीं पड़ते, शायद इसलिए भी कि यहां पंडितों ने उसी तरह रहना सीख लिया है जिस तरह गुजरात में मुसलमानों ने। लेकिन शायद एक वजह और भी है। यहां से गए नेहरू की बेटी ने एक पारसी से शादी की थी, और उसकी अगली पीढ़ी तो इटली से बहू ले आई। कश्मीर के आज के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी एक फौजी अफसर रामनाथ की बेटी पायल से हुई और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा की शादी सचिन पायलट से हुई। अब कश्मीर के आम लोगों का यह अंदाज है कि उमर अब्दुल्ला की बहन की शादी राहुल गांधी से हो सकती है। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला ने एक अंग्रेज-ईसाई नर्स मौली से शादी की थी। इसलिए सत्ता पर काबिज कुनबे का निजी मिजाज दिल्ली के गांधी-नेहरू कुनबे सरीखा ही है।
कश्मीर के कई इलाकों से गुजरते एक गौर करने वाली बात यह भी थी कि यहां के किसी भी सर्वजनिक जगहों पर अखबार बिकते देखने को नहीं मिला जिस तरह हमारे यहां सड़क किनारे, चायठेलों, पानठेलों, बस स्टैंड, होटलों के आसपास अखबारों को बिकते देखा जा सकता है पर यहां ऐसा कोई चलन नहीं दिखा। शायद केवल घरों तक पहुंचता हो। वैसे यहां कई प्रेस काम्प्लेक्स हैं, कई अखबार छपते हैं। हो सकता है इसका कारण यह भी हो कि आतंकी गतिविधियों, हिंसा की खबरों से यहां आने वाले पर्यटकों का हौसला कम होता हो।
(बाकी कल)
वहां के पिछली पीढ़ी के मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के बारे में इज्जत से बोलने वाला कोई नहीं टकराया। उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को जरूर कुछ लोग बाप से बेहतर मानते हैं कि वह लोगों से मिल-जुल लेता है और लोगों को कुछ समझता है। फिर चाहे करता कुछ नहीं।
मुम्बई और दूसरे देशों में सैलानी की तरह सितारों के साथ घुमने-फिरने, नाचने-गाने की डॉ. फारूख अब्दुल्ला की तस्वीरें सबको याद हैं। एक आदमी ने कहा- जो चीफ मिनिस्टर पन्द्रह-पन्द्रह दिन अपने स्टेट से बाहर घूमता हो वह काम क्या करेगा?
यह एक लोकप्रिय तर्क हो सकता है और तुरंत एक से दूसरे तक पहुंच सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से नेता, अफसर, ऐसे होते हैं जो हर दिन काम करने के बाद भी अपने सूबे का नुकसान करते हैं उसे खा-पी जाते हैं। अब अगर राजा साल के तीन सौ पैंसठ दिन दूरसंचार मंत्रालय में काम करता होता, कलमाड़ी पूरे वक्त राष्ट्रमंडल खेलों के दफ्तर में काम करता होता, तो क्या देश का कुछ भला होता?
तीसरी पीढ़ी का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कई बरस से सत्ता में है, पहले दिल्ली की, अब कश्मीर की। लेकिन एक कलेक्टर के स्तर पर भी जो मामूली मरम्मत या सुधार के काम होने चाहिए, उनका भी कुछ पता नहीं है। सैलानियों से लबालब इस राज्य में कोई आतंकी तो आकर रोकता नहीं कि गांवों के नामों की तख्तियां न लगाओ, सड़क किनारे मील के पत्थर न लगाओ, मोड़ पर सावधान करने वाले बोर्ड न लगाओ, फुटपाथों की ऊंचाई कम न करो।
दरअसल आतंक और अलगाववाद से जूझने के बहाने सरकार को नालायक और निकम्मा बने रहने की छूट दे रखी है। एक हफ्ते में वहां के जितने जिले देखने मिले, सब आगे-पीछे के ही बदहाल थे। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कलेक्टर भी अपने-अपने जिलों में कोई न कोई काम करते दिखते हैं, कश्मीर में इन तमाम जिलों में कदम-कदम पर लगा कि फलां काम को करने की फुरसत अफसरों को क्यों नहीं है? केन्द्र सरकार से पैसे तो कश्मीर की दूसरे राज्यों के मुकाबिले बहुत अधिक मिलते हैं।
बिजली बंद रहने का हाल यह था कि कोई शाम ऐसी नहीं थी कि सड़क से गुजरते दर्जनों अंधेरे गांव-कस्बे पार न करना पड़े। श्रीनगर में एक अस्पताल की जरूरत पडऩे पर मैं हमारे ड्राइवर मकबूल भाई के साथ वहां के बहुत बड़े सरकारी चेस्ट हॉस्पिटल पहुंचा तो बंद बिजली के बीच अस्पताल के बोर्ड-गेट तक नहीं सूझ रहे थे, टीले पर बसी इमारत तो किसी भी तरह से दिख ही नहीं रही थी। बाजार में भी दूकानें अपने-अपने इंतजाम से रौशन थीं।
सरकार की बदहाली की यह तीसरी पीढ़ी नेशनल कांफ्रेंस की है और दूसरी पीढ़ी की पीडीपी की महबूबा मुफ्ती सईद भी बाप के साए में राजनीति में हैं। लेकिन विरासत किसी को काबिल बना देती तो फिर कनिमोझि महीनों से जेल में क्या होती? (या फिर करूणानिधि से यही उसे विरासत में मिली है?)
श्रीनगर की डल लेक के किनारे हजरत बल दरगाह है। उसी के जरा से पहले सोच समझकर शेख अब्दुल्ला की मजार बनाई गई है। उस वक्त अदालतें चौकस नहीं थीं, इसलिए झील पर ही यह काम किया गया। लेकिन हजरत बल दरगाह पर पहुंचने वाले हजारों लोगों में से एक परिंदा भी शेख अब्दुल्ला की मजार पर ठहरा नहीं दिखा। एक तख्ती तक वहां लगी नहीं दिखी और छह बार वहां से गुजरने पर भी सन्नाटा ही दिखा। अपने बाप और दादा की मजार पर एक तख्ती तक कश्मीर के मुख्यमंत्री क्यों नहीं लगवा पाए?
जब आतंक का साया हो, अलगाववादियों के पत्थर चल रहे हों, तो सरकार को सरहद का बहाना देकर कई किस्म का काम नकारने का रास्ता मिल जाता है। कश्मीर में राज्य सरकारों की नाकामयाबी को वे लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने बेहतर सरकारें देखी हैं, बेहतर राज्य देखें हैं। बाकी सैलानी तो जन्नत के नजारे देखते-देखते ही लौट जाते हैं। हो सकता है कि देश के कई राज्य इससे भी बुरे चल रहे हों, और वहां के लोगों को कश्मीर में कुछ न खटकता हो।
उमर अब्दुल के दादा शेख अब्दुल्ला इस राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री रहे। और उन्हीं की पार्टी ने उतने बरस लगातार राज किया जितने बरस नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे, 1947 से 1964 तक। नेहरू के जाने के जरा से पहले ही उनके इस राज्य ने पहला कांग्रेसी मुख्यमंत्री देखा 1964 में। फिर 1965 से यहां के प्राईमिनिस्टर की कुर्सी का नाम बदलकर चीफ मिनिस्टर कर दिया गया। कुल मिलाकर तीन बरस के पीडीपी के राज को छोड़ें तो अब्दुल्ला और नेहरू के कुनबों की पार्टी ही इस पर राज करती रहीं, लेकिन यहां का बुरा हाल कायम रहा। राजधानी से बेहतर तो और कहीं कुछ हो नहीं सकता।
राज्य का धर्मनिरपेक्ष मिजाज आतंकी घटनाओं, अलगाववाद और कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर देने से परे, रोजमर्रा में बना हुआ है। साम्प्रदायिक दंगे सुनाई नहीं पड़ते, शायद इसलिए भी कि यहां पंडितों ने उसी तरह रहना सीख लिया है जिस तरह गुजरात में मुसलमानों ने। लेकिन शायद एक वजह और भी है। यहां से गए नेहरू की बेटी ने एक पारसी से शादी की थी, और उसकी अगली पीढ़ी तो इटली से बहू ले आई। कश्मीर के आज के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी एक फौजी अफसर रामनाथ की बेटी पायल से हुई और उमर अब्दुल्ला की बहन सारा की शादी सचिन पायलट से हुई। अब कश्मीर के आम लोगों का यह अंदाज है कि उमर अब्दुल्ला की बहन की शादी राहुल गांधी से हो सकती है। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला ने एक अंग्रेज-ईसाई नर्स मौली से शादी की थी। इसलिए सत्ता पर काबिज कुनबे का निजी मिजाज दिल्ली के गांधी-नेहरू कुनबे सरीखा ही है।
कश्मीर के कई इलाकों से गुजरते एक गौर करने वाली बात यह भी थी कि यहां के किसी भी सर्वजनिक जगहों पर अखबार बिकते देखने को नहीं मिला जिस तरह हमारे यहां सड़क किनारे, चायठेलों, पानठेलों, बस स्टैंड, होटलों के आसपास अखबारों को बिकते देखा जा सकता है पर यहां ऐसा कोई चलन नहीं दिखा। शायद केवल घरों तक पहुंचता हो। वैसे यहां कई प्रेस काम्प्लेक्स हैं, कई अखबार छपते हैं। हो सकता है इसका कारण यह भी हो कि आतंकी गतिविधियों, हिंसा की खबरों से यहां आने वाले पर्यटकों का हौसला कम होता हो।
(बाकी कल)
छोटी सी बात
जब बुराई से लडऩे की आपकी ताकत न रहे, तो भी उससे दूर रहने का हौसला तो दिखाएं। लड़ाई और भागीदारी के बीचभी एक रास्ता रहता है। दुनिया का इतिहास, समाज की यादें, सब दर्ज करते हैं।
कर्नाटक में अब नया धोखा,भक्त, भगवान दोनों को!
21 जून 11
सुनील कुमार
कर्नाटक की कुटिल राजनीति का कोई इलाज नहीं दिखता कभी सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर कमल को झुलसा देने वाली घर की आग लगती है तो कभी मुख्यमंत्री को निपटाने में ऐसे जुट जाता है कि दिल्ली में उसके आका शर्मा जाते हैं। पैसों के नंगे नाच में कर्नाटक की राजनीति इतनी अश्लील है कि उसे धनबल के पैमाने पर 'एÓ सर्टिफिकेट मिलना चाहिए। लेकिन अब एक बिल्कुल ही नया नाटक वहां शुरू हो गया है ईश्वर के दरबार में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और उनके कट्टर विरोधी जनतादल-एस के एच.डी कुमारस्वामी के बीच आरोपों की सच्चाई के लिए वहां के एक मंदिर में कसमें खाई जाएंगी। वहां भक्तों के बीच इस भगवान के लिए मान्यता है कि उसके सामने झूठी कसम खाने वाला पूरे कुनबे सहित तबाह हो जाता है।
यह बड़े मजे की कुश्ती है। इसी मंदिर में नहीं, दुनिया के किसी भी धर्मस्थल में, ईश्वर में इंसाफ कर देने की इतनी ताकत होती, तो रोम में ईसा मसीह के रहते जर्मनी में हिटलर दस लाख बेकसूर यहूदियों को कैसे मार पाता? पंजाब में भिंडरावाले के हत्यारे स्वर्ण मंदिर से निकल-निकलकर बेकसूरों को मारकर दुबारा वहीं कैसे छुप जाते? कश्मीर की हजरत बल दरगाह पर आतंकी कैसे कब्जा कर पाते? बिरला मंदिर वाली दिल्ली में निठारी के बलात्कारी-हत्यारे इतने बच्चों को मारकर उन्हें खा कैसे पाते? जगन्नाथ मंदिर वाले उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जिंदा कैसे जलाया जाता? प्रार्थना के लिए जाते गांधी को एक हिंदू उग्रवादी नाथूराम गोडसे कैसे गोली मार पाता? ओसामा बिन लादेन अल्लाह का नाम लेकर कैसे हजारों हत्याएं कर पाता? कैसे दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासी बनाने के नाम पर गरीब बेबस लड़कियों के बदन लूटे जाते? कैसे अल्लाह का नाम लेकर छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियों की शादी कब्र में पांव टांगे बूढ़ों से हो पाती? कैसे राम-सीता को घर से निकाल पाते? कैसे अहिंसा की बात करने वाले बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या कर पाते?
ऐसी मिसालों की फेहरिस्त का अंत नहीं है। ईश्वर की शपथ अनिवार्य रूप से लेकर ही जो अमरीकी राष्ट्रपति बन पाता है वह किस तरह वियतनाम में दसियों लाख की हत्या करवाता है इसे देखने वाला ईश्वर कहां है? अगर कर्नाटक में ईश्वर होता तो वह हजारों करोड़ की अवैध खुदाई करके खरबपति बने मंत्रियों से सब कुछ छीनकर इस देश के भूखे-नंगे लोगों में न बांट देता? जब इसी कर्नाटक में वेलेंटाईन डे पर प्रेम करने वाले साथ रहते हैं, तो इसी ईश्वर का नाम लेने वाले उन पर हमले करते हैं, तब क्या करता है ईश्वर? देश भर की जेलों में सजायाफ्ता मुजरिम अपने-अपने ईश्वर की उपासना करते दिखते हैं, अगर ऐसा ईश्वर सचमुच होता, और उसका असर होता तो अपने ऐसे भक्तों को अपराध से क्यों नहीं रोकता? क्यों मस्तान को हज जाने से खुदा नहीं रोकता? क्यों किसी हिंदू देवता ने गोडसे का हाथ नहीं थामा? क्यों पशुपति नाथ मुम्बई में हर बरस चकलाघरों में उतारी जाती दसियों हजार नाबालिग नेपाली लड़कियों को बचा पाते? क्यों अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में राम बलात्कारियों को नहीं रोक पाते? बलात्कार की शिकार लड़कियों को जलने से नहीं रोक पाते? उनकी आंखें फोड़ दी जाती हैं, और राम देखते रहते हैं?
कर्नाटक के नेताओं के नंगे नाच का यह आखिरी बेशर्मा आइटम है जब वो ईश्वर की एक धारणा का बेजा इस्तेमाल करके जनता को फिर बेवकूफ बना रही हैं। इस मंदिर के देवता के सामने झूठ बोलने पर वैसी ही तबाही की कहानियां प्रचलित हैं, जैसी कि चौथाई सदी पहले संतोषी मां के नाम से चलती थीं। संतोषी मां की पूजा न करने से साहूकार के बेटे का पूरा कुनबा किस तरह खत्म हो जाता है, यह डरावनी कहानी पर्चों के रास्ते देश भर में फैलाई गई थी। कर्नाटक के एक मंदिर को एक अदालत की तरह दो नेता बीच में ला रहे हैं। हम मजे से 27 जून का इंतजार कर रहे हैं कि इस दिन दोनों में से कम से कम एक तो झूठ बोलेगा ही, और फिर हम देखेंगे कि कौन तबाह होता है। सच की अग्निपरीक्षा का यह पूरा नाटक फर्जी है। अगर इन दोनों नेताओं में दम है तो दोनों नार्को टेस्ट के लिए जाएं और उन पर लगे तमाम आरोपों के बारे में उनसे बेहोशी की हालत में जवाब लिए जाएं। ऐसा ही नार्को टेस्ट बाबा रामदेव का होना चाहिए जो रामलीला मैदान में पुलिस पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं। किसी पर इतना गंभीर आरोप लगे तो उसके सच को तो परख ही लेना चाहिए। और बाबा तो अपना जीवन खुली किताब बताते हैं, नार्को टेस्ट में उनके पास छिपाने को तो कुछ रहेगा नहीं!
इस देश में तो ईश्वर के नाम को लेकर जालसाजी कर रहा है, कोई गांधी का नाम लेकर तानाशाही कर रहा है और कोई योग के नाम पर अराजकता कर रहा है। यह सब लोकतंत्र के ढांचे को कमजोर करने की तरकीबें हैं। एक तरफ जंगलों में नक्सली-लोकतंत्र को बारूदी सुरंग से उड़ा रहे हैं, दूसरी तरफ शहरों में आस्था के नाम पर लोग लोकतंत्र को हाशिए पर धकेल रहे हैं। सार्वजनिक जीवन के सत्ताभोगी लोग भी लोकतांत्रिक जांच और जवाबदेही से बचकर अगर आस्था के आंगन में नंगा नाच रहे हैं तो यह इस देश की आस्थावान आबादी के साथ एक और धोखाधड़ी है। जनता के पैसों पर ऐश करने वाले और उसे लूटने वाले लोग अब ईश्वर का नाम लेकर उसे और छलने जा रहे हैं।
दूरसंचार घोटाले में जेल में बंद शाहिद बलावा पर हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप है। वह इस देश का सबसे नौजवान खरबपति कहा जा रहा है। अब उसे बचाने के लिए उसका परिवार रोज दो बकरों को काटकर गरीबों में बांट रहा है। बताया गया है कि बलवा अपने 300 बकरों का इतना शौकीन था कि उन्हें फल, मेवे खिलाता था और कोल्ड ड्रिंक पिलाता था। देश में भूख और कुपोषण से हर बरस दसियों लाख बच्चे मारे जाते हैं, उनका हक खाने वाले ऐसे बलवे और उनके पावरफुल आका बकरों को मेवे खिला रहे हैं और अब गरीबों में बकरों का गोश्त बांट रहे हैं?
इसी दर्जे की जालसाजी मुम्बई में सबसे बड़ा एक गणेश बिठाने वाला कुख्यात तस्कर वरदराजन मुदलियार करता था। लेकिन वरदा के पंडाल से उठकर गणेश कभी नहीं गए। 27 जून को कर्नाटक में एक बार फिर जनता को धोखा दिया जाएगा, इस बार सत्ता और विपक्ष मिलाकर यह धोखा देंगे। अस्तित्वहीन ईश्वर पत्थर बने रहेगा, बस जतना धोखा खाएगी। इससे तो अच्छा रहता कि वह बकरा खाती।
सुनील कुमार
कर्नाटक की कुटिल राजनीति का कोई इलाज नहीं दिखता कभी सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर कमल को झुलसा देने वाली घर की आग लगती है तो कभी मुख्यमंत्री को निपटाने में ऐसे जुट जाता है कि दिल्ली में उसके आका शर्मा जाते हैं। पैसों के नंगे नाच में कर्नाटक की राजनीति इतनी अश्लील है कि उसे धनबल के पैमाने पर 'एÓ सर्टिफिकेट मिलना चाहिए। लेकिन अब एक बिल्कुल ही नया नाटक वहां शुरू हो गया है ईश्वर के दरबार में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा और उनके कट्टर विरोधी जनतादल-एस के एच.डी कुमारस्वामी के बीच आरोपों की सच्चाई के लिए वहां के एक मंदिर में कसमें खाई जाएंगी। वहां भक्तों के बीच इस भगवान के लिए मान्यता है कि उसके सामने झूठी कसम खाने वाला पूरे कुनबे सहित तबाह हो जाता है।
यह बड़े मजे की कुश्ती है। इसी मंदिर में नहीं, दुनिया के किसी भी धर्मस्थल में, ईश्वर में इंसाफ कर देने की इतनी ताकत होती, तो रोम में ईसा मसीह के रहते जर्मनी में हिटलर दस लाख बेकसूर यहूदियों को कैसे मार पाता? पंजाब में भिंडरावाले के हत्यारे स्वर्ण मंदिर से निकल-निकलकर बेकसूरों को मारकर दुबारा वहीं कैसे छुप जाते? कश्मीर की हजरत बल दरगाह पर आतंकी कैसे कब्जा कर पाते? बिरला मंदिर वाली दिल्ली में निठारी के बलात्कारी-हत्यारे इतने बच्चों को मारकर उन्हें खा कैसे पाते? जगन्नाथ मंदिर वाले उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को उनके बच्चों सहित जिंदा कैसे जलाया जाता? प्रार्थना के लिए जाते गांधी को एक हिंदू उग्रवादी नाथूराम गोडसे कैसे गोली मार पाता? ओसामा बिन लादेन अल्लाह का नाम लेकर कैसे हजारों हत्याएं कर पाता? कैसे दक्षिण भारत के मंदिरों में देवदासी बनाने के नाम पर गरीब बेबस लड़कियों के बदन लूटे जाते? कैसे अल्लाह का नाम लेकर छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियों की शादी कब्र में पांव टांगे बूढ़ों से हो पाती? कैसे राम-सीता को घर से निकाल पाते? कैसे अहिंसा की बात करने वाले बड़े पैमाने पर कन्या भू्रण हत्या कर पाते?
ऐसी मिसालों की फेहरिस्त का अंत नहीं है। ईश्वर की शपथ अनिवार्य रूप से लेकर ही जो अमरीकी राष्ट्रपति बन पाता है वह किस तरह वियतनाम में दसियों लाख की हत्या करवाता है इसे देखने वाला ईश्वर कहां है? अगर कर्नाटक में ईश्वर होता तो वह हजारों करोड़ की अवैध खुदाई करके खरबपति बने मंत्रियों से सब कुछ छीनकर इस देश के भूखे-नंगे लोगों में न बांट देता? जब इसी कर्नाटक में वेलेंटाईन डे पर प्रेम करने वाले साथ रहते हैं, तो इसी ईश्वर का नाम लेने वाले उन पर हमले करते हैं, तब क्या करता है ईश्वर? देश भर की जेलों में सजायाफ्ता मुजरिम अपने-अपने ईश्वर की उपासना करते दिखते हैं, अगर ऐसा ईश्वर सचमुच होता, और उसका असर होता तो अपने ऐसे भक्तों को अपराध से क्यों नहीं रोकता? क्यों मस्तान को हज जाने से खुदा नहीं रोकता? क्यों किसी हिंदू देवता ने गोडसे का हाथ नहीं थामा? क्यों पशुपति नाथ मुम्बई में हर बरस चकलाघरों में उतारी जाती दसियों हजार नाबालिग नेपाली लड़कियों को बचा पाते? क्यों अयोध्या वाले उत्तरप्रदेश में राम बलात्कारियों को नहीं रोक पाते? बलात्कार की शिकार लड़कियों को जलने से नहीं रोक पाते? उनकी आंखें फोड़ दी जाती हैं, और राम देखते रहते हैं?
कर्नाटक के नेताओं के नंगे नाच का यह आखिरी बेशर्मा आइटम है जब वो ईश्वर की एक धारणा का बेजा इस्तेमाल करके जनता को फिर बेवकूफ बना रही हैं। इस मंदिर के देवता के सामने झूठ बोलने पर वैसी ही तबाही की कहानियां प्रचलित हैं, जैसी कि चौथाई सदी पहले संतोषी मां के नाम से चलती थीं। संतोषी मां की पूजा न करने से साहूकार के बेटे का पूरा कुनबा किस तरह खत्म हो जाता है, यह डरावनी कहानी पर्चों के रास्ते देश भर में फैलाई गई थी। कर्नाटक के एक मंदिर को एक अदालत की तरह दो नेता बीच में ला रहे हैं। हम मजे से 27 जून का इंतजार कर रहे हैं कि इस दिन दोनों में से कम से कम एक तो झूठ बोलेगा ही, और फिर हम देखेंगे कि कौन तबाह होता है। सच की अग्निपरीक्षा का यह पूरा नाटक फर्जी है। अगर इन दोनों नेताओं में दम है तो दोनों नार्को टेस्ट के लिए जाएं और उन पर लगे तमाम आरोपों के बारे में उनसे बेहोशी की हालत में जवाब लिए जाएं। ऐसा ही नार्को टेस्ट बाबा रामदेव का होना चाहिए जो रामलीला मैदान में पुलिस पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं। किसी पर इतना गंभीर आरोप लगे तो उसके सच को तो परख ही लेना चाहिए। और बाबा तो अपना जीवन खुली किताब बताते हैं, नार्को टेस्ट में उनके पास छिपाने को तो कुछ रहेगा नहीं!
इस देश में तो ईश्वर के नाम को लेकर जालसाजी कर रहा है, कोई गांधी का नाम लेकर तानाशाही कर रहा है और कोई योग के नाम पर अराजकता कर रहा है। यह सब लोकतंत्र के ढांचे को कमजोर करने की तरकीबें हैं। एक तरफ जंगलों में नक्सली-लोकतंत्र को बारूदी सुरंग से उड़ा रहे हैं, दूसरी तरफ शहरों में आस्था के नाम पर लोग लोकतंत्र को हाशिए पर धकेल रहे हैं। सार्वजनिक जीवन के सत्ताभोगी लोग भी लोकतांत्रिक जांच और जवाबदेही से बचकर अगर आस्था के आंगन में नंगा नाच रहे हैं तो यह इस देश की आस्थावान आबादी के साथ एक और धोखाधड़ी है। जनता के पैसों पर ऐश करने वाले और उसे लूटने वाले लोग अब ईश्वर का नाम लेकर उसे और छलने जा रहे हैं।
दूरसंचार घोटाले में जेल में बंद शाहिद बलावा पर हजारों करोड़ के घोटाले का आरोप है। वह इस देश का सबसे नौजवान खरबपति कहा जा रहा है। अब उसे बचाने के लिए उसका परिवार रोज दो बकरों को काटकर गरीबों में बांट रहा है। बताया गया है कि बलवा अपने 300 बकरों का इतना शौकीन था कि उन्हें फल, मेवे खिलाता था और कोल्ड ड्रिंक पिलाता था। देश में भूख और कुपोषण से हर बरस दसियों लाख बच्चे मारे जाते हैं, उनका हक खाने वाले ऐसे बलवे और उनके पावरफुल आका बकरों को मेवे खिला रहे हैं और अब गरीबों में बकरों का गोश्त बांट रहे हैं?
इसी दर्जे की जालसाजी मुम्बई में सबसे बड़ा एक गणेश बिठाने वाला कुख्यात तस्कर वरदराजन मुदलियार करता था। लेकिन वरदा के पंडाल से उठकर गणेश कभी नहीं गए। 27 जून को कर्नाटक में एक बार फिर जनता को धोखा दिया जाएगा, इस बार सत्ता और विपक्ष मिलाकर यह धोखा देंगे। अस्तित्वहीन ईश्वर पत्थर बने रहेगा, बस जतना धोखा खाएगी। इससे तो अच्छा रहता कि वह बकरा खाती।
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