23 जून 2011
सुनील कुमार
रायपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचना और वापिस आना, सब कुछ सरकार के हवाई अड्डों से और हर जगह टीवी पर दूरदर्शन या तो गायब या धुंधला। रायपुर के हवाई अड्डे पर तो केंद्र सरकार का ठिकाना होने के बावजूद हिन्दी के सबसे गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज, झूठे समाचार चैनल ही लगे रहते हैं, दिल्ली में निजीकरण के बाद के टीवी स्क्रीन भी दूरदर्शन दिखाना बंद कर चुके हैं और श्रीनगर में सब कुछ सरकारी होने के बाद भी बड़े से टीवी स्क्रीन पर दूरदर्शन के समाचार इतने धुंधले दिख रहे थे कि वे मानो केंद्र सरकार की धुंधली कश्मीर-नीति का एक प्रतीक थे।
जिस कश्मीर में केंद्र सरकार को अपनी बात अधिक खुलासे से करने की जरूरत है और वहां के अलगाववादी तबके को साथ जोडऩे की जरूरत है, वहां भी अगर हवाई अड्डे पर घंटे-घंटे बैठने वाले लोगों को दूरदर्शन के समाचार साफ-सुथरे दिखाने की फिक्र किसी अफसर को नहीं है, वहां से रोज आने-जाने वाले सांसदों को यह नहीं सूझता है तो यह अफसोस की बात है। केंद्र सरकार का प्रचारतंत्र तो ऐसी बातों को देखने पूरे देश घूम नहीं सकता लेकिन वहां के नेता-अफसर तो इन बातों का ध्यान रख सकते हैं।
एक तरफ तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में ऐसी लापरवाही, दूसरी तरफ कश्मीर की जमीन से जो लोग अपनी बात लिखते हैं उनके बारे में सरकार का नजरिया भयानक है। जिस दिन हम वहां थे उसी दिन बीबीसी उर्दू सर्विस की संवाददाता के खिलाफ सरकार ने झूठी जानकारी फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए एक मामला कायम किया था। कश्मीर की इस एक जानी-मानी अखबारनवीस, लंदन में बसी हुई नईमा अहमद महजूर को आईटी एक्ट के तहत राज्य में असंतोष फैलाने के लिए आईटी के उपयोग का आरोपी बनाया गया है।
नईमा ने यह लिखा था-'पुलिस ने लालचौक पर इस आदमी को क्यों मारा? कोई वजह?Ó
जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे थे, उसी दिन कुछ घंटे के भीतर होटल के पास ही शहर की जानी-मानी जगह पर एक नागरिक की ऐसी मौत हुई थी। पुलिस का कहना था कि इसे कुछ बेचेहरा बंदूकबाजों ने मारा था, न कि पुलिस ने।
नईमा ने फेसबुक पर लोगों के पोस्ट किए गए कमेंट्स पर लिखा था-क्या पुलिस आराम से नहीं बैठने देगी लोगों को?
कश्मीर के अखबारों में इस बारे में छपी खबरों में यह था कि पुलिस ने नईमा के लंदन और श्रीनगर के पतों पर नोटिस भेज दिया है। एक दूसरी जानकारी यह थी कि पिछले दिनों श्रीनगर में पुलिस ने ऐसे दर्जन भर नौजवानों को पकड़ा है जिन्होंने 2010 में राज्य में चल रही अशांति को लेकर फेसबुक पर बातें लिखी थीं। कश्मीर के एक मुस्लिम धार्मिक गुरु के खिलाफ भी फेसबुक पर अपनी बातें लिखने पर ऐसा ही जुर्म कायम किया गया है।
वहां से लौटने के बाद मैं यहां जिन लोगों के नाम सहित उनकी कही बातें लिखने की सोच रहा था, वह सारी सोच आखिरी के दो दिनों में मिले अखबारों में पुलिस के रुख के बाद धरी रह गई। जिन्होंने मुझसे कुछ कहा उन्हीं लोगों को मेरे लिखे से परेशानी खड़ी न हो जाए। और कुछ जानकार लोगों का कश्मीर से परे भी यह कहना है कि हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून इस कदर कड़ा बन गया है कि उसके तहत इंटरनेट पर साधारण बातें लिखने वालों को भी धर लिया जा सकता है। फिर कश्मीर तो आज ऐसा इलाका है जहां पर बंदूकों का राज है और बंदूकों की सोच बहुत लोकतांत्रिक तो होती नहीं। फिर कश्मीर लगातार ऐसी मौतें देख रहा है जिसके लिए जिम्मेदार सैनिकों और सिपाहियों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वहां एक अलग कानून लागू है जिसके तहत केंद्रीय सुरक्षा दस्तों को किसी कार्रवाई से कई तरह की रियायत मिली हुई है।
कश्मीर के मीडिया में एक किस्म का सन्नाटा है। वहां मिले एक-दो अखबारनवीसों का कहना है कि जब दोनों तरफ से बंदूकें चलती हों, और दोनों तरफ कत्ल करने से परहेज न हो तो यहां बसे हुए अखबारनवीस पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना हौसला दिखा सकते हैं? वहां के लोगों के पास पुलिस की ज्यादती की और भी मिसालें हैं लेकिन कुछ का यह कहना है कि गोलियों और गिरफ्तारी से परे भी अखबार वालों को दबाने के और तरीके सरकार के पास रहते हैं और आतंक से लड़ाई का तर्क देते हुए उन सबका इस्तेमाल सरकार खुले या छुपे तरीके से करते रहती है। वहां जनसुरक्षा कानून के तहत पिछली गर्मियों में एक पत्रकार साहिल मकबूल को गिरफ्तार किया गया, जम्मू-कश्मीर सरकार की आलोचना करने वाले एक अखबार को सेंसर किया गया, एक पे्रस फोटोग्राफर की हत्या कर दी गई, दर्जनों रिपोर्टरों को हमले में घायल किया गया और स्थानीय टीवी चैनलों को समय-समय पर रोका गया।
वहां की एक पत्रकार ने लौटने के बाद हुई बातचीत में बताया कि सरकार की मामूली आलोचना पर भी किसी पत्रकार को मिलिटेंट-सपोर्ट करार दे दिया जाता है। इसके अलावा कोई कड़ा आलोचक हो तो उसे आईएसआई का एजेंट कह दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर की बड़ी अजीब हालत है जहां सरहद करीब हो, आतंक से लंबी लड़ाई हो, अलगाववाद का बड़ा खतरा हो वहां पर मीडिया के खिलाफ घोषित और अघोषित कार्रवाई करने का मानो सरकार को एक हक सा मिल जाता है।
तहलका में इसी बरस फरवरी में छपी एक रिपोर्ट में यहां के मीडिया पर सरकार की ज्यादतियों की एक लंबी कहानी है जिसे इस (द्धह्लह्लश्च://222.ह्लद्गद्धद्गद्यद्मड्ड.ष्शद्व/ह्यह्लशह्म्4_द्वड्डद्बठ्ठ४८.ड्डह्यश्च?द्घद्बद्यद्गठ्ठड्डद्वद्ग=हृद्ग०५०२११ञ्जद्धद्गङ्कड्डद्यद्यद्ग4.ड्डह्यश्च) वेबसाईट पर देखा जा सकता है। अपने वहां के गिने-चुने दिनों में साथ के सैलानी-मूड के लोगों के साथ मेरे लिए अधिक अखबारनवीसी मुमकिन नहीं थी।
मीडिया और मिलिट्री, मिलिटेंसी और मजहब, इस किस्म की बातें वहां एक-दूसरे के साथ बहुत दूर तक जुड़ी हुई हैं। वहां एक वक्त तैनात रह चुके एक बड़े अफसर से बात होने पर उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा दस्ते एक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ते हैं। जिस जनता को वे बाहरी आतंकियों के हमलों से बचाने के लिए तैनात हैं वह जनता ही अपने देश के सैनिकों से नफरत करती है। आसपास से गुजरने वाले तमाम लोग जब आपको नफरत से देखते जाएं और सिर पर आतंकियों के हमलों का खतरा मंडराता रहता हो तो सिपाही और सैनिक एक अलग किस्म के तनाव में जीते हैं। ऐसे में राज्य की सरकार को मदद करने के लिए उनकी तैनाती भी अगर बहुत से तबकों की आलोचना पाती है और खुद राज्य सरकार जनता की तसल्ली के लिए बार-बार यह कहती है कि कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल कम किए जाएंगे, तो जवानों का हौसला भी पस्त होता है। उसने आगे कहा कि लगातार ऐसी परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं रहता जहां जनता नफरत के साथ-साथ पत्थरों से भी काम लेती है।
लेकिन कश्मीरी जब अपने सूबे से बाहर निकलकर बाकी हिन्दुस्तान में जाते हैं तो बाकी हिन्दुस्तान के लोग उन्हें कश्मीर से हिन्दुस्तान में आया हुआ मानते हैं। गे्रटर कश्मीर नाम के एक अंगे्रजी अखबार के एक कार्टूनिस्ट मलिक साजिद का दिल्ली का साबका कुछ इसी किस्म का था। उन्होंने अपने अखबार में इस बारे में लिखा है-दिल्ली के इंडिया हेबिटाट सेंटर में मेरे कार्टूनों की प्रदर्शनी हफ्ते भर के लिए लगी थी। इसमें मेरा काम 'अमन का आतंकÓ नाम से प्रदर्शित किया गया था। कश्मीर में जगह-जगह लगने वाले रेजरवायर से कार्टून टांगे गए थे। इसके साथ ही कुछ कीचड़-पत्थर और शराब की बोतलें भी मैंने रखी थीं जैसी कि कश्मीर में सुरक्षा दस्तों की बंकरों के आसपास सड़कों पर दिखती हैं। दिल्ली में रहते हुए मैंने अपने अखबार के लिए कार्टून बनाया, डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींची और उसे ईमेल करने के लिए एक साइबर कैफे तक गया। वहां से मैं ईमेल कर ही रहा था कि उसी वक्त कनॉट प्लेस और गे्रटर कैलाश में बम फूटने की खबर वहां किसी को फोन पर लगी। इस पर साइबर कैफे का मालिक दूसरे लोगों से फुसफुसाकर बात करने लगा कि यह आदमी कश्मीरी है और इसकी शिनाख्त देखें। ये मेरे पास आकर मेरा पासपोर्ट पूछने, जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और पहचानपत्र है तो उसे देखने के बाद वे यह देखने लगे कि मैं किस वेबसाईट को देख रहा था। जब उन्होंने पाया कि मैं कश्मीर की वेबसाईट देख रहा था तो उन्होंने तुरंत पुलिस को बुला लिया कि यहां एक कश्मीरी है। इस पर आनन-फानन वहां पुलिस पहुंची और पहुंचते ही चीखने लगी कि कहां है आदमी? इसके बाद वे मुझे गालियां देते हुए, घसीटते हुए बाहर ले गए और वहां करीब 200 लोग इस तरह इक_े हो गए कि कोई टेररिस्ट पकड़ाया है। मैं चीखते रह गया कि कोई जाकर हेबिटाट सेंटर में बताए कि जिसकी प्रदर्शनी लगी है उस आर्टिस्ट को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद थाने में हरामजादे कश्मीरी जैसी गालियां, देश के खिलाफ रहने की गालियां, चलती रहीं...
एक कश्मीरी कार्टूनिस्ट की प्रताडऩा की यह लंबी कहानी और यह बताती है कि कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान में कश्मीरियों को लेकर बर्दाश्त कितना कम है और बेसमझी कितनी अधिक। जब समझ का ऐसा फासला हो और देश के किसी तबके में इस फासले को दूर करने की चाह न हो तो कश्मीरी किस तरह बाकी भारत से जुड़े रहेंगे? (बाकी कल)
सुनील कुमार
रायपुर से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचना और वापिस आना, सब कुछ सरकार के हवाई अड्डों से और हर जगह टीवी पर दूरदर्शन या तो गायब या धुंधला। रायपुर के हवाई अड्डे पर तो केंद्र सरकार का ठिकाना होने के बावजूद हिन्दी के सबसे गैरजिम्मेदार और सनसनीखेज, झूठे समाचार चैनल ही लगे रहते हैं, दिल्ली में निजीकरण के बाद के टीवी स्क्रीन भी दूरदर्शन दिखाना बंद कर चुके हैं और श्रीनगर में सब कुछ सरकारी होने के बाद भी बड़े से टीवी स्क्रीन पर दूरदर्शन के समाचार इतने धुंधले दिख रहे थे कि वे मानो केंद्र सरकार की धुंधली कश्मीर-नीति का एक प्रतीक थे।
जिस कश्मीर में केंद्र सरकार को अपनी बात अधिक खुलासे से करने की जरूरत है और वहां के अलगाववादी तबके को साथ जोडऩे की जरूरत है, वहां भी अगर हवाई अड्डे पर घंटे-घंटे बैठने वाले लोगों को दूरदर्शन के समाचार साफ-सुथरे दिखाने की फिक्र किसी अफसर को नहीं है, वहां से रोज आने-जाने वाले सांसदों को यह नहीं सूझता है तो यह अफसोस की बात है। केंद्र सरकार का प्रचारतंत्र तो ऐसी बातों को देखने पूरे देश घूम नहीं सकता लेकिन वहां के नेता-अफसर तो इन बातों का ध्यान रख सकते हैं।
एक तरफ तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने में ऐसी लापरवाही, दूसरी तरफ कश्मीर की जमीन से जो लोग अपनी बात लिखते हैं उनके बारे में सरकार का नजरिया भयानक है। जिस दिन हम वहां थे उसी दिन बीबीसी उर्दू सर्विस की संवाददाता के खिलाफ सरकार ने झूठी जानकारी फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए एक मामला कायम किया था। कश्मीर की इस एक जानी-मानी अखबारनवीस, लंदन में बसी हुई नईमा अहमद महजूर को आईटी एक्ट के तहत राज्य में असंतोष फैलाने के लिए आईटी के उपयोग का आरोपी बनाया गया है।
नईमा ने यह लिखा था-'पुलिस ने लालचौक पर इस आदमी को क्यों मारा? कोई वजह?Ó
जिस दिन हम श्रीनगर पहुंचे थे, उसी दिन कुछ घंटे के भीतर होटल के पास ही शहर की जानी-मानी जगह पर एक नागरिक की ऐसी मौत हुई थी। पुलिस का कहना था कि इसे कुछ बेचेहरा बंदूकबाजों ने मारा था, न कि पुलिस ने।
नईमा ने फेसबुक पर लोगों के पोस्ट किए गए कमेंट्स पर लिखा था-क्या पुलिस आराम से नहीं बैठने देगी लोगों को?
कश्मीर के अखबारों में इस बारे में छपी खबरों में यह था कि पुलिस ने नईमा के लंदन और श्रीनगर के पतों पर नोटिस भेज दिया है। एक दूसरी जानकारी यह थी कि पिछले दिनों श्रीनगर में पुलिस ने ऐसे दर्जन भर नौजवानों को पकड़ा है जिन्होंने 2010 में राज्य में चल रही अशांति को लेकर फेसबुक पर बातें लिखी थीं। कश्मीर के एक मुस्लिम धार्मिक गुरु के खिलाफ भी फेसबुक पर अपनी बातें लिखने पर ऐसा ही जुर्म कायम किया गया है।
वहां से लौटने के बाद मैं यहां जिन लोगों के नाम सहित उनकी कही बातें लिखने की सोच रहा था, वह सारी सोच आखिरी के दो दिनों में मिले अखबारों में पुलिस के रुख के बाद धरी रह गई। जिन्होंने मुझसे कुछ कहा उन्हीं लोगों को मेरे लिखे से परेशानी खड़ी न हो जाए। और कुछ जानकार लोगों का कश्मीर से परे भी यह कहना है कि हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून इस कदर कड़ा बन गया है कि उसके तहत इंटरनेट पर साधारण बातें लिखने वालों को भी धर लिया जा सकता है। फिर कश्मीर तो आज ऐसा इलाका है जहां पर बंदूकों का राज है और बंदूकों की सोच बहुत लोकतांत्रिक तो होती नहीं। फिर कश्मीर लगातार ऐसी मौतें देख रहा है जिसके लिए जिम्मेदार सैनिकों और सिपाहियों पर कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि वहां एक अलग कानून लागू है जिसके तहत केंद्रीय सुरक्षा दस्तों को किसी कार्रवाई से कई तरह की रियायत मिली हुई है।
कश्मीर के मीडिया में एक किस्म का सन्नाटा है। वहां मिले एक-दो अखबारनवीसों का कहना है कि जब दोनों तरफ से बंदूकें चलती हों, और दोनों तरफ कत्ल करने से परहेज न हो तो यहां बसे हुए अखबारनवीस पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना हौसला दिखा सकते हैं? वहां के लोगों के पास पुलिस की ज्यादती की और भी मिसालें हैं लेकिन कुछ का यह कहना है कि गोलियों और गिरफ्तारी से परे भी अखबार वालों को दबाने के और तरीके सरकार के पास रहते हैं और आतंक से लड़ाई का तर्क देते हुए उन सबका इस्तेमाल सरकार खुले या छुपे तरीके से करते रहती है। वहां जनसुरक्षा कानून के तहत पिछली गर्मियों में एक पत्रकार साहिल मकबूल को गिरफ्तार किया गया, जम्मू-कश्मीर सरकार की आलोचना करने वाले एक अखबार को सेंसर किया गया, एक पे्रस फोटोग्राफर की हत्या कर दी गई, दर्जनों रिपोर्टरों को हमले में घायल किया गया और स्थानीय टीवी चैनलों को समय-समय पर रोका गया।
वहां की एक पत्रकार ने लौटने के बाद हुई बातचीत में बताया कि सरकार की मामूली आलोचना पर भी किसी पत्रकार को मिलिटेंट-सपोर्ट करार दे दिया जाता है। इसके अलावा कोई कड़ा आलोचक हो तो उसे आईएसआई का एजेंट कह दिया जाता है।
जम्मू-कश्मीर की बड़ी अजीब हालत है जहां सरहद करीब हो, आतंक से लंबी लड़ाई हो, अलगाववाद का बड़ा खतरा हो वहां पर मीडिया के खिलाफ घोषित और अघोषित कार्रवाई करने का मानो सरकार को एक हक सा मिल जाता है।
तहलका में इसी बरस फरवरी में छपी एक रिपोर्ट में यहां के मीडिया पर सरकार की ज्यादतियों की एक लंबी कहानी है जिसे इस (द्धह्लह्लश्च://222.ह्लद्गद्धद्गद्यद्मड्ड.ष्शद्व/ह्यह्लशह्म्4_द्वड्डद्बठ्ठ४८.ड्डह्यश्च?द्घद्बद्यद्गठ्ठड्डद्वद्ग=हृद्ग०५०२११ञ्जद्धद्गङ्कड्डद्यद्यद्ग4.ड्डह्यश्च) वेबसाईट पर देखा जा सकता है। अपने वहां के गिने-चुने दिनों में साथ के सैलानी-मूड के लोगों के साथ मेरे लिए अधिक अखबारनवीसी मुमकिन नहीं थी।
मीडिया और मिलिट्री, मिलिटेंसी और मजहब, इस किस्म की बातें वहां एक-दूसरे के साथ बहुत दूर तक जुड़ी हुई हैं। वहां एक वक्त तैनात रह चुके एक बड़े अफसर से बात होने पर उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा दस्ते एक गैरबराबरी की लड़ाई लड़ते हैं। जिस जनता को वे बाहरी आतंकियों के हमलों से बचाने के लिए तैनात हैं वह जनता ही अपने देश के सैनिकों से नफरत करती है। आसपास से गुजरने वाले तमाम लोग जब आपको नफरत से देखते जाएं और सिर पर आतंकियों के हमलों का खतरा मंडराता रहता हो तो सिपाही और सैनिक एक अलग किस्म के तनाव में जीते हैं। ऐसे में राज्य की सरकार को मदद करने के लिए उनकी तैनाती भी अगर बहुत से तबकों की आलोचना पाती है और खुद राज्य सरकार जनता की तसल्ली के लिए बार-बार यह कहती है कि कश्मीर में केंद्रीय सुरक्षा बल कम किए जाएंगे, तो जवानों का हौसला भी पस्त होता है। उसने आगे कहा कि लगातार ऐसी परिस्थितियों में काम करना आसान नहीं रहता जहां जनता नफरत के साथ-साथ पत्थरों से भी काम लेती है।
लेकिन कश्मीरी जब अपने सूबे से बाहर निकलकर बाकी हिन्दुस्तान में जाते हैं तो बाकी हिन्दुस्तान के लोग उन्हें कश्मीर से हिन्दुस्तान में आया हुआ मानते हैं। गे्रटर कश्मीर नाम के एक अंगे्रजी अखबार के एक कार्टूनिस्ट मलिक साजिद का दिल्ली का साबका कुछ इसी किस्म का था। उन्होंने अपने अखबार में इस बारे में लिखा है-दिल्ली के इंडिया हेबिटाट सेंटर में मेरे कार्टूनों की प्रदर्शनी हफ्ते भर के लिए लगी थी। इसमें मेरा काम 'अमन का आतंकÓ नाम से प्रदर्शित किया गया था। कश्मीर में जगह-जगह लगने वाले रेजरवायर से कार्टून टांगे गए थे। इसके साथ ही कुछ कीचड़-पत्थर और शराब की बोतलें भी मैंने रखी थीं जैसी कि कश्मीर में सुरक्षा दस्तों की बंकरों के आसपास सड़कों पर दिखती हैं। दिल्ली में रहते हुए मैंने अपने अखबार के लिए कार्टून बनाया, डिजिटल कैमरे से उसकी तस्वीर खींची और उसे ईमेल करने के लिए एक साइबर कैफे तक गया। वहां से मैं ईमेल कर ही रहा था कि उसी वक्त कनॉट प्लेस और गे्रटर कैलाश में बम फूटने की खबर वहां किसी को फोन पर लगी। इस पर साइबर कैफे का मालिक दूसरे लोगों से फुसफुसाकर बात करने लगा कि यह आदमी कश्मीरी है और इसकी शिनाख्त देखें। ये मेरे पास आकर मेरा पासपोर्ट पूछने, जब मैंने उन्हें बताया कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और पहचानपत्र है तो उसे देखने के बाद वे यह देखने लगे कि मैं किस वेबसाईट को देख रहा था। जब उन्होंने पाया कि मैं कश्मीर की वेबसाईट देख रहा था तो उन्होंने तुरंत पुलिस को बुला लिया कि यहां एक कश्मीरी है। इस पर आनन-फानन वहां पुलिस पहुंची और पहुंचते ही चीखने लगी कि कहां है आदमी? इसके बाद वे मुझे गालियां देते हुए, घसीटते हुए बाहर ले गए और वहां करीब 200 लोग इस तरह इक_े हो गए कि कोई टेररिस्ट पकड़ाया है। मैं चीखते रह गया कि कोई जाकर हेबिटाट सेंटर में बताए कि जिसकी प्रदर्शनी लगी है उस आर्टिस्ट को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके बाद थाने में हरामजादे कश्मीरी जैसी गालियां, देश के खिलाफ रहने की गालियां, चलती रहीं...
एक कश्मीरी कार्टूनिस्ट की प्रताडऩा की यह लंबी कहानी और यह बताती है कि कश्मीर से बाहर के हिन्दुस्तान में कश्मीरियों को लेकर बर्दाश्त कितना कम है और बेसमझी कितनी अधिक। जब समझ का ऐसा फासला हो और देश के किसी तबके में इस फासले को दूर करने की चाह न हो तो कश्मीरी किस तरह बाकी भारत से जुड़े रहेंगे? (बाकी कल)
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