22 जून 11
अपने कुनबे और पार्टी के लोगों से मिलने चेन्नई से चलकर तिहाड़ जेल पहुंचने की बेबसी वाले डीएमके ने अपनी भागीदारी के यूपीए-मुखिया कांगे्रस के लिए एक परेशानी खड़ी की है। जब कांगे्रस के यूपीए-मंत्री लगातार देश को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना क्यों ठीक होगा, तब डीएमके ने मांग की है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। जाहिर है कि डीएमके अपनी नाराजगी को जाहिर करना चाह रहा है। लेकिन डीएमके की बात से परे भी इस बारे में सोचने की जरूरत है।
हम बरसों से यह लिखते आ रहे हैं कि देश के किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई खास दर्जा नहीं मिलना चाहिए जिससे कि वह दूसरे लोगों के अधिकार और सम्मान के ऊपर गिना जाए। हमने इस देश की सरकारी जुबान से वीआईपी शब्द भी हटाने पर जोर डाला था क्योंकि किसी एक व्यक्ति को दूसरों से कम महत्वपूर्ण कैसे गिना जा सकता है। जब इस देश की तमाम कुर्सियों पर बैठे हुए लोग अलग-अलग समय पर भ्रष्ट साबित हो चुके हैं या उनके भ्रष्टाचार की खुली चर्चा हो चुकी है तब प्रधानमंत्री को या सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के जजों को लोकपाल के दायरे से बाहर क्यों रखा जाए? अभी कुछ ही समय पहले रिटायर हुए सुपीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन पर अपने कुनबे सहित भ्रष्टाचार में शामिल होने के कई आरोप सामने आए हैं। उन्हें वहां से रिटायर होने के बाद केंद्र सरकार ने एक दूसरे राष्ट्रीय संवैधानिक पद पर नियुक्त भी कर दिया है। इसी वक्त के आसपास केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर एक ऐसे अफसर को मनमोहन सरकार ने नियुक्त किया था जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल ही रहा था। नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की दखल पर सतर्कता आयुक्त को हटना पड़ा। ये तमाम कुर्सियां लोकपाल के दायरे से बाहर रखी जा रही हैं या इन्हें विमानतलों पर सुरक्षा जांच से छूट जैसे विशेष अधिकार मिले हुए हैं।
लोकतंत्र के भीतर जो व्यक्ति अपने-आपको वीआईपी का दर्जा दिलाना चाहते हंै, या मंजूर करते हैं, वे एक अलोकतांत्रिक काम करते हैं। किसी को भी लोकपाल के दायरे से बचने की क्या जरूरत है? यह तो ठीक है कि आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निजी छवि को लेकर कुछ लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना ठीक होगा। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए उनके बंगले के बगल में बसाए गए उनके दत्तक-दामाद के उस वक्त अपने जैसे कामों के लिए चर्चा में थे, क्या उसके बाद भी कोई प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सोच सकता है? आज यूपीए के भीतर कांगे्रस के मंत्री जिस तरह के तर्क प्रधानमंत्री को लेकर दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वे अपनी बात देश की जनता के गले से उतारने में लगे हैं। लेकिन मनमोहन सिंह को एक शो-केस के खूबसूरत पुतले की तरह इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। और फिर किसी इंसान के ईमानदार होने के हम इतनी बड़ी खूबी भी नहीं मानते कि उसकी मिसाल को प्रस्तावित कानून को प्रभावित करने के लिए काम में लाया जाए। यह तो हर व्यक्ति के लिए एक साधारण बात होनी चाहिए कि वह ईमानदार रहे।
कांगे्रस के भीतर भी दिग्विजय सिंह ने अपनी राय दी है कि प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए। डीएमके के बाद हो सकता है कि कुछ और भागीदार पार्टियां भी इस राय से इत्तफाक रखें। अभी लोकपाल मसौदा कमेटी में तमाम मंत्रियों के कांगे्रसी होने की वजह से उनकी राय एक किस्म से कांगे्रस की राय जैसी भी दिखने लगी है। लेकिन जब केंद्रीय मंत्रिमंडल लोकपाल मसौदा लेकर बैठेगा तो हमारा ख्याल है कि ऐसी कुछ और पार्टियां भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखना चाह सकती हैं जिनके अपने प्रधानमंत्री कभी नहीं बन सकते। यूपीए को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बाकी लोगों की बात का भी ख्याल रखना पड़ेगा और वहां पर उन्हें सिर्फ कांगे्रस की मर्जी पर चलने की बददिमागी छोडऩी पड़ेगी।
इस देश में बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग जेल जा चुके हैं या जाने से बचे हुए हैं। ऐसे में उनमें से किसी को कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। लोकपाल के दायरे में हर किसी को लाना चाहिए, लेकिन अपनी इस सैद्धांतिक सोच को हम सरकार पर एक-एक शब्द नहीं थोपना चाहेंगे क्योंकि भारत के संविधान की कुछ दूसरी जटिलताएं भी हो सकती हैं। लेकिन हम यहां पर जोर देकर यह कहना चाहेेंगे कि लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को जांच के दायरे में रखना जरूरी है, और किसी को भी इससे रियायत नहीं मिलनी चाहिए।
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