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छोटी सी बात


28 अप्रैल 
निजी बातें न पूछें
भारत में यह आम बात है कि नए लोगों से मिलने पर बातचीत के दौरान लोग उनकी जात, उनके शादीशुदा होने या न होने, बच्चे होने या न होने की जानकारी लेने लगते हैं। लेकिन सभ्य दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में इसे बदतमीजी माना जाता है कि आप शुरुआती कुछ मुलाकातों में ही किसी से उनकी निजी जानकारी लेने लगें। सार्वजनिक जीवन का शिष्टाचार भी इसके खिलाफ है। 
भारत में लोग किसी महिला से सीधे यह पूछने पर उतर आते हैं कि उनके मिस्टर क्या करते हैं? अपने निजी जीवन का सम्मान करने वाले बहुत से लोग ऐसे सवालों पर रूखा जवाब देते हुए झिड़क सकते हैं। इसलिए किसी से अंतरंगता के बिना इस तरह के सवाल कभी न करें। किसी से सीधे-सीधे उनका मोबाइल नंबर मांगने के बजाय अपना मोबाइल नंबर लिखकर उन्हें देना बेहतर होता है, ताकि उनको ठीक लगे, और जरूरत हो तो वे ही आपको फोन लगा लें। 
ऐसी छोटी-छोटी बातें कुछ जगहों पर आपको ऊपर ले जाने में मदद कर सकती हैं, या आपको रोकने का काम कर सकती है। इसलिए शिष्टाचार को सीखने में कोई बुराई नहीं होती, और आप अपनी बेइज्जती करवाने से बचते हैं। 
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


27 अप्रैल 
जहां घूमने जाएं, वहां का देखें-खाएं
किसी देश-प्रदेश या शहर घूमने को जाना हो, तो उसके बारे में पहले पढ़ लेने से वहां का आपका सीमित समय अधिक से अधिक इस्तेमाल हो जाता है। बहुत से लोग स्थानीय गाइड पर जरूरत से अधिक निर्भर हो जाते हैं, या भरोसा कर लेते हैं। कुछ लोग अपने दोस्तों से मिली जानकारी को काफी मान लेते है जबकि ऐसा सच नहीं होता है। इन दिनों इंटरनेट से हर जगह के बारे में जानकारी आसानी से मिल सकती है। 
कुछ लोग नई जगह जाकर भी उन सामानों की खरीदी में जुट जाते हैं, जो कि बड़ी कंपनियों के हैं, और किसी भी जगह मिल सकते हैं। पर्यटकों को स्थानीय हस्तशिल्प, स्थानीय कला-संगीत, स्थानीय व्यंजन और स्थानीय खूबियों पर समय लगाना चाहिए, तभी आपका कहीं घूमने जाना सार्थक हो सकता है। किसी पर्यटन केन्द्र जाकर भी किसी मॉल या शापिंग कॉम्पलेक्स में समय लगाना, फिल्म देखना, खासी बरबादी है। इसलिए जहां जाते हैं वहां की स्थानीय खूबियों पर समय लगाएं, और इन खूबियों को जानने के लिए वहां पहुंचने के पहले ही एक मोटी-मोटी फेहरिस्त बनाकर रखें कि आपको वहां क्या करना है, क्या देखना है। अपने समय और अपने खर्च के बेहतर इस्तेमाल के लिए कई दिन पहले से सफर की तैयारी करनी चाहिए, और उसके लिए जिन दर्जनों बातों की जरूरत पड़ती है, आज की बात उनमें से एक है। बाकी फिर कभी।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


26 अप्रैल 
हर चमकदार चीज सोना नहीं होता
इन दिनों पश्चिम बंगाल में चिटफंड कंपनियों की जैसी धोखाधड़ी पकड़ा रही है, उनके चलते दसियों लाख गरीब लोग अपनी जमा पूंजी खो चुके हैं। इसलिए आपके पास कम पैसे हों या अधिक, उनको लापरवाही से कहीं न लगाएं। यह मानकर चलें कि जो लोग सितारों के सपने दिखाते हैं, वे आमतौर पर धरती पर ला पटकते हैं, और इतनी बुरी तरह पटकते हैं, कि गरीब एक जन्म उठकर खड़े भी नहीं हो पाते।
जमीनों और मकानों के बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले लोग कहीं पर बड़े दानदाता बनकर, तो कहीं पर रात-दिन जलसों में अपने चेहरे दिखाकर, बड़े-बड़े इश्तहार छपवाकर,  खुद के अखबार और टीवी चैनल खड़े करके कैसा धोखा देते हैं यह छत्तीसगढ़ में भी लोगों ने देखा हुआ है। इसलिए अपनी रकम को बहुत सावधानी से कहीं पर लगाएं, अगर मेहनत की है तो भी, और चोरी-भ्रष्टाचार की है, तो भी। भ्रष्ट कमाई को भी अगर कहीं फेंकना हो, तो जरूरतमंदों पर खर्च करें, जाहिर तौर पर जो जालसाज दिखते हैं, उनकी सुनहरी योजनाओं पर खर्च न करें।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


23 अप्रैल 
आज के वक्त में बच्चों को सावधान 
और परिपक्व बनाने की जरूरत
हिन्दुस्तान में इन दिनों जितने तरह के सेक्स-अपराध की खबरें भरी हुई हैं, उनको देखते हुए हर किसी की यह जिम्मेदारी है कि अपने आसपास के कम उम्र के लोगों को दो तरह से सावधान करके रखे। एक तो जिन पर ऐसे अपराधों का खतरा हो, उन्हें खतरों की नौबत गिनाते हुए उनसे बचने की सलाह देनी चाहिए। दूसरी तरफ आसपास के जो नौजवान ऐसी उम्र में हैं कि उनसे सेक्स संबंधों को लेकर कोई चूक हो सकती है, कोई जबर्दस्ती हो सकती है, उनको सावधान करने की जरूरत है कि वे किसी पर भी कोई ज्यादती करने से बचें, किसी तरह की छूट दूसरों से न लें, यह मानते हुए कि किसी साथी की सहमति है देह संबंध बनाने के लिए। देश का कानून लोगों को ऐसी छूट लेने की इजाजत नहीं देता। 
अपने छोटे बच्चों से लेकर अपने जवान बच्चों तक, सबसे इस बारे में जरूरत के मुताबिक खुलकर बात करनी चाहिए और उन्हें सावधान करना चाहिए। वे न तो सेक्स-अपराधों के शिकार बनें, न ही वे सेक्स-अपराधी बनें। छोटे बच्चों से लेकर जवान बच्चों तक, अलग-अलग पर इस तरह के कई खतरे रहते हैं, और सावधानी ही अकेला बचाव हो सकती है। कानून तो अपना काम बाद में करते रहता है, लेकिन समय रहते अपने बच्चों को समझदार बनाना, जागरूक बनाना, जिम्मेदार और सावधान बनाना ही उनकी हिफाजत है। आज के जमाने में छोटे बच्चों से लेकर जवानों तक को कई तरह की जगहों पर, कई तरह की स्थितियों से गुजरना होता है। ऐसे में उनके भीतर परिपक्वता और सावधानी ही उन्हें बचाकर रख सकते हैं। 
-सुनील कुमार

सवाल पूछने वाले का फायदा हो, या न हो...


16 अप्रैल 
छोटी सी बात
कुछ ऐसे लतीफे लंबे समय से चल रहे हैं जिनमें मां-बाप बच्चों को सवाल पूछने को कहते हैं, और फिर किसी बात का जवाब उनके पास नहीं रहता। और आखिर में जब बच्चे थक जाते हैं, तो मां-बाप कहते हैं कि पूछो-पूछो, अगर पूछोगे नहीं, तो सीखोगे कैसे। 
दरअसल बच्चों से बात करने का एक मतलब यह भी होता है कि उनके सवालों के जवाब सोचते हुए, आपको अपनी नासमझी या अपने अज्ञान का अंदाज लग जाता है। बच्चे कद-काठी और उम्र में छोटे होते हैं, लेकिन उनके छोटे-छोटे सवाल ऊंट जैसे बड़े-बड़े लोगों के लिए पहाड़ बनकर आते हैं, और अपनी अक्ल और अपने ज्ञान पर फिदा खुशफहम लोगों को उनका कद बता जाते हैं। 
सवालों का सामना करना अपना खुद का ज्ञान बढ़ाना होता है। सवाल पूछने वालों का ज्ञान तो तभी बढ़ सकता है जब आपके पास जवाब हों, लेकिन आपका ज्ञान तो सवाल सुन-सुनकर ही बढऩे लगता है, अगर आप उनके जवाब अपने खुद के लिए भी आगे-पीछे ढूंढ लें। 
इसके लिए दो बातें सबसे जरूरी होती हैं, बच्चों से मिलना, जो कि आमतौर पर जिज्ञासु होते हैं, और ऐसे नए लोगों से मिलना जो कि आपसे कुछ पूछ सकते हैं। लेकिन होता यह है कि लोग इन दोनों तबकों से बचते हुए अपने उन्हीं करीबी लोगों से बार-बार मिलते हैं जो दिमागी कसरत करने को मजबूर न करें। हौसला कुछ बढ़ाएं, और सवालों का सामना करें। 
- सुनील कुमार

छोटी सी बात

15 अप्रैल 
धोखे के फेर में पडऩे के पहले सोचें...
टीवी के परदे पर एक के बाद दूसरा जालसाज छाए रहता है। पहले निर्मल बाबा नाम का एक आदमी लोगों को बेवकूफ बनाता रहा, अब कुछ दूसरे बाबा यही काम कर रहे हैं। इनके झांसे में आने वाले लोगों को यह सोचना चाहिए कि स्वर्ग दिलाना अगर इतना ही आसान होता, तो ऐसे बाबा धरती के लोगों को स्वर्ग ले जाने के लिए एक ट्रैवल एजेंसी ही खोल चुके होते। इसलिए किसी के झांसे में आने से पहले, किसी के करिश्मे पर भरोसा करने के पहले, अपनी अक्ल, सामान्य तर्क, और विज्ञान की  कुछ बुनियादी बातों पर भी गौर कर लेना चाहिए। 
किसी समझदार ने कभी यह लिखा था कि जब दुनिया का पहला मूर्ख, दुनिया के किसी जालसाज से मिला, तो उसी वक्त धर्म का आविष्कार हुआ। वह बात आज भी लागू होती है, और अब वह धर्म से बढ़कर आध्यात्म नाम की दूकान पर भी बिकने लगी है, और कई रंगों की पैकिंग में जन्नत बाजार में है। 
उन्हीं लोगों को इन सब मदद की अधिक जरूरत होती है, जिनके सीने पर अपने ही गलत कामों का बोझ सवार होता है। कभी यह सोचकर देखें कि अगर खुद सारे काम ही अच्छे करें, तो किसी बाबा की जरूरत ही क्या होगी? 
- सुनील कुमार

छोटी सी बात

12 अप्रैल 2013
बचाव से बड़ा इलाज नहीं
बीमारी के चलते परिवार के लोग बहुत निराश हो जाते हैं। और ऐसी निराशा बीमार का नुकसान अधिक करती हैं। अगर किसी बीमारी का इलाज है, और उस इलाज तक पहुंच है, खर्च उठाने की ताकत है, तो ऐसे लोगों को बिल्कुल निराश नहीं होना चाहिए। अगर इलाज है तो उसे खरीदने की ताकत है, और अगर नहीं है तो निराशा और फिक्र से क्या हो जाएगा? 
अब सवाल उठता है कि जिनके पास इलाज की ताकत नहीं है, वे क्या करें? यहीं पर दो बातों का ख्याल करना चाहिए। पहली बात तो यह कि बीमारी से बचाव करें। एक सेहतमंद जीवनशैली अपनाएं, बुरी आदतों से दूर रहें। गरीब के लिए यह और अधिक जरूरी है, क्योंकि उसके पास इलाज तो दूर, महंगी जांच की ताकत भी नहीं रहती। दूसरी बात यह कि किसी भी बीमारी के आसार दिखने पर जांच जल्द से जल्द करवाएं। समय रहते बीमारी का पता लगे, तो उसका इलाज आसान होता है, सस्ता होता है, और ठीक होने की उम्मीद अधिक होती है। 
और गरीब या अमीर, सबके लिए जरूरी यह रहता है कि अपनी जांच के कागज, दवाओं के पर्चे, इन सबको एक फाईल में सम्हालकर रखना। ऐसा न होने पर कई बार बीमारी का पकड़ में आना भी मुश्किल हो जाता है, और गैरजरूरी जांच दुबारा करवानी पड़ती है। 
लाख रूपये की बात यह है कि बीमारी से, किसी हादसे से बचा जाए। हर बार पैसा बचा नहीं पाता।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात

10 अप्रैल 2013
कम कहने और चुप रहने की नसीहत
कभी बहुत खुश होकर, या कभी बहुत नाराज होकर, कभी उत्तेजना में, तो कभी उकसावे में आकर बड़ी उटपटांग बात कह देने वाले किस तरह की मुसीबत में फंसते हैं, यह देखना हो तो महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार को देखें, जो प्यासी जनता को पानी की जगह पेशाब देने की बात कहकर, चारों तरफ से आ रही धार से भीग रहे हैं। 
इसलिए दूसरों के लिए अपमान की बात कहने के पहले यह भी सोचें कि आज का वक्त वह नहीं रह गया कि चार अखबारों को मनाकर किसी खबर को रोका जा सके। आजकल इतने कैमरे रहते हैं, और महाराष्ट्र की जनता से भी कहीं अधिक प्यासे टीवी चैनल रहते हैं, और इन सबको चुप कर पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं रहता। 
दुनिया के बड़े-बड़े समझदार लोगों ने इसीलिए कम कहने और चुप रहने की नसीहत दी है। कुछ लोगों ने कहा है- कम खाओ, गम खाओ। मतलब यह कि कुछ बुरा लगे, तो भी गम खाकर चुप रह जाओ। 
जो लोग सार्वजनिक जीवन में नहीं भी हैं, उनको भी चाहिए कि अपनी जुबान पर काबू रखें। और इन दिनों जुबान का एक दूसरा चेहरा कम्प्यूटर और मोबाइल फोन के की-बोर्ड भी हैं, जिन पर उंगलियों को काबू में रखना उतना ही जरूरी है। ऐसा न कहने वाले अपने को ऐसी मुसीबत में फंसाते हैं, कि जो जितने ऊंचे ओहदे पर होते हैं, वे उतनी ही बड़ी परेशानी झेलते हैं। 
-सुनील कुमार

छोटी सी बात


7 अप्रैल 2013
सफर के कई फायदों में से एक
सफर का समय नए लोगों से मुलाकात के लिए अच्छा होता है। ट्रेन, बस, या विमान, जैसे भी सफर कर रहे हों, बहुत से लोगों से बातचीत की गुंजाइश निकलती है। ऐसे मौके पर अपने साथ चल रहे लोगों के बजाय, नए-नए लोगों से बात करनी चाहिए। परिचय का दायरा भी बढ़ता है, और सामान्य ज्ञान भी। 
यह बात सुनने में अटपटी लगेगी कि साथ चलने वाले कुछ लोग भी ऐसे होते हैं जो सफर के दौरान अलग-अलग सीटों पर बैठते हैं ताकि नए लोगों से नई बात हो सके। 
दुनिया घूमने वाले लोगों का यह भी अनुभव है कि जो लोग सिर्फ अपनी टोली में चलते और रहते हैं, वे दुनिया को कम देख पाते हैं। नए लोगों से उनकी बात-मुलाकात कम हो पाती है। इसलिए खतरा उठाए बिना जहां-जहां आप नए लोगों से मिल सकते हैं, उनसे उनके देश-प्रदेश, पेशे और शौक के बारे में आम जानकारी ले सकते हैं, लेने की कोशिश करें। 
कुछ लोग बच्चों को अधिक सवाल करने पर चुप करा देते हैं, कि दूसरे मुसाफिरों या पास के लोगों को परेशान क्यों किया जाए। यह बात भी ठीक नहीं है। बच्चों की सामान्य जिज्ञासा न रहे, उससे उपजे सवाल पूछने का मौका न रहे, तो उनकी जानकारी ही नहीं बढ़ सकेगी। उनको भी लोगों से बातचीत करने के लिए बढ़ावा दें, और अगर काम की बात हो रही है तो खुद भी उसे सुनने की कोशिश करें।
- सुनील कुमार 

छोटी सी बात

4 अप्रैल 2013
बेमौके की, बेतुकी बात
कुछ लोग खाने के वक्त हत्या, बलात्कार या हिंसा की बातें छेड़ देते हैं। कुछ लोग खाने के बीच बीमारी या किसी गंदगी की चर्चा करने लगते हैं। ऐसे लोग यह ध्यान नहीं रखते कि पास के दूसरे लोगों को खाते हुए ऐसी चर्चा सुनने से भी अरूचि हो सकती है।  इसी तरह किसी गम के मौके पर हंसी-मजाक की बात करना, या किसी खुशी के मौके पर किसी हादसे या गम की चर्चा छेडऩा यही बताता है कि आपको मौके की समझ नहीं है।
समझदारी इसमें हैं कि आप जिस माहौल में हैं, उसे खराब करने से बचें। अगर आप ऐसा नहीं करते, तो धीरे-धीरे लोग आपसे ही बचने लगते हैं। बहुत से लोग आपकी बेमौके की बात पर आपको रूबरू नहीं टोकेंगे। लेकिन आपके पीठ-पीछे आपके बारे में इसको लेकर कोई अच्छी चर्चा नहीं होगी। अपने अलावा दूसरों की पसंद नापसंद का ख्याल भी रखना चाहिए।
- सुनील कुमार 

छोटी सी बात

3 अप्रैल 2013
सुपात्र को ही दान दें
दान-धर्म के नाम पर, या समाजसेवा के नाम पर बहुत से लोग लापरवाही से कुछ संस्थाओं, धार्मिक स्थानों, या सामाजिक नेताओं की मदद करते हैं। ऐसा दिया हुआ दान हर बार समाज का फायदा करता हो यह जरूरी नहीं है। दान देने के पहले यह देख लें कि पाने वाली संस्था का अब तक का रिकॉर्ड क्या है? उसकी साख क्या है? और उससे जुड़े हुए लोग अपना खुद का पैसा भी उसके काम में लगाते हैं? या फिर उस ट्रस्ट या संस्था के पैसों पर खुद पलते हैं? भारत में बहुत पहले से यह बात कही जाती है कि दान भी सुपात्र को देना चाहिए। इसका मतलब है ऐसे व्यक्ति को जो कि सच में जरूरतमंद हों, या सच्चे जरूरतमंद लोगों की मदद में उसका इस्तेमाल करने वाले लोग हों।
दरियादिली और लापरवाही से दान देने वाले लोग बेईमानों को बढ़ावा देते हैं, और भ्रष्ट लोगों को परजीवी बना देते हैं। एक बार जिस संपन्न, गैरजरूरतमंद के मुंह दान का खाना लग जाता है, वैसे लोग बाद में कोई काम नहीं करते और दान जुटाने में लगे रहते हैं। ऐसे में उन संस्थाओं को देने के लिए लोगों के पास दान की क्षमता नहीं बचती, जो कि सचमुच अच्छा काम करते हैं। समाज ऐसे चोरों से भरा हुआ है जो दान इक_ा करते हैं, सिर्फ घपला करने के लिए।
बहुत सी संस्थाएं ऐसी हैं जो ईमानदारी से हिसाब-किताब रखती हैं, पाई-पाई को सोच-समझकर खर्च करती हैं, लेकिन ऐसी संस्थाओं का हिसाब भी अगर देखें तो उनमें चंदा इक_ा करने पर एक तिहाई से अधिक खर्च कर दिया जाता है, संस्था अपने आप पर तनख्वाह और भत्तों-खर्चों पर आधा बजट खर्च कर देती है, और जरूरतमंदों तक एक चौथाई से कम पैसा पहुंच पाता है। इसलिए किसी भी संस्था को दान देने के पहले सावधानी से उसके कामकाज, हिसाब-किताब, और उसकी साख को तौल लें। अपनी अच्छी नीयत से किसी बेईमान को मजबूत बनने में मदद न करें।
- सुनील कुमार 

छोटी सी बात

1 अप्रैल 2013
डिजिटल सलीका
इन दिनों मोबाइल फोन से लेकर कम्प्यूटरों तक लोगों की बहुत सी निजी बातें दर्ज रहती हैं। अगर कोई ऐसी नौबत आती है कि आप किसी परिचित के फोन से एक कॉल करते हैं, या उनके कम्प्यूटर का इस्तेमाल कुछ देर के लिए करते हैं, तो याद रखें कि उसका इस्तेमाल उतना ही करें। कोशिश करें कि उनके सामने ही आप रहें। उनके फोन या कम्प्यूटर पर बाकी चीजों को देखना, बहुत बड़ी बदतमीजी मानी जाती है, और यह लोगों की निजी जिंदगी में दखल भी रहती है। 
आज का जमाना ऐसा है कि आप अपने परिवार के बाकी लोगों के भी फोन और कम्प्यूटर में ताक-झांक करें, बैठे ठाले उससे खिलवाड़ करें, इसे कोई पसंद नहीं करता। एक वक्त लोगों की जिंदगी में निजी बातों के लिए डायरी हुआ करती थी, आज उसकी जगह फोन-लैपटॉप जैसी चीजों ने ले ली है। आज के डिजिटल-जमाने का सलीका यह भी कहता है कि आप किसी दूसरे की कम्प्यूटर स्क्रीन को देखते हुए भी खड़े न रहें, बैठे न रहें। 
इसी तरह आपको अगर कोई दूसरे लोग ई-मेल या एसएमएस पर, या किसी और तरीके से कोई बात या तस्वीर भेजते हैं, तो उसे आगे बढ़ाते हुए आपको भेजने वालों के नाम हटा देने चाहिए। इसी तरह जब आप किसी वयस्क मजाक या मनोरंजन को आगे बढ़ाते हैं तो पाने वालों के नाम ई-मेल में एक साथ लिख देने से वे लोग यह भी देख लेते हैं कि आपने वह ई-मेल किन-किन लोगों को भेजा है। इस तरह उन तमाम लोगों से आपके वयस्क-मजाक के संबंध उजागर हो जाते हैं। ऐसे ई-मेल अलग-अलग ही भेजें, एक साथ थोक में कई लोगों को ई-मेल न करें। 
- सुनील कुमार 

छोटी सी बात..


31 मार्च....
अपने और दूसरों के वक्त का ख्याल
जब कभी आप किसी कामकाजी या व्यस्त व्यक्ति से मिलने के लिए बिना फोन किए, बिना समय तय किए पहुंच जाते हैं, तो आप आपसी शर्मिंदगी या अपमान की नौबत ले आते हैं। इन दिनों जब हर किसी के पास फोन की सहूलियत है, तो फोन पर बात करके, समय तय करके ही कहीं जाएं। ऐसा न करने पर या तो आप दूसरे कामकाजी व्यक्ति के काम में रूकावट बनते हैं, या उनकी निजी जिंदगी में दखल। ये दोनों ही बातें ठीक नहीं हैं। 
यह भी ध्यान रखें कि आप जब किसी से मिलने अचानक पहुंच जाते हैं, तब वे किसी ऐसे दूसरे व्यक्ति से बात करने में लगे हुए हों, जिनसे वे आपके सामने बात करना नहीं चाहते हों। ऐसी बहुत सी स्थितियां रहती हैं। अपने और दूसरों के समय और सम्मान दोनों का ख्याल रखें। 
दूसरी बात यह कि अगर आपसे मिलने तैयार होते हैं, तो वह मुलाकात अंतहीन न हो जाए। यह अंदाज लगा लें कि वे आपके लिए कितना समय निकाल सकते हैं, और उसी हिसाब से अपनी रवानगी तय कर लें। कुछ लोग शिष्टाचार के लिए आपसे चाय-कॉफी पूछ सकते हैं, लेकिन अगर आपकी बहुत अंतरंगता नहीं है, तो पहली बार में आपको इसके लिए मना करना चाहिए और इसके बाद ही अगर वे जोर दें, तो फिर हां या ना कहना आपके बस में होता है। 
यह भी ध्यान रखें कि अगर एसएमएस पर कोई बात हो सकती है, तो व्यस्त लोगों को सीधे फोन करने के बजाय पहले एसएमएस भेजकर देख लें, हो सकता है कि वे किसी बैठक के बीच से भी आपको जवाब दे सकें और फोन पर बात करने की जरूरत न आए। 
अपने और दूसरों के वक्त का ख्याल किए बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकते। 
-सुनील कुमार

छोटी सी बात

30 मार्च
शब्दों का आतंक
कहावत-मुहावरे, तरह-तरह के शेर, महान या प्रमुख लोगों की कही हुई सूक्तियां, इन सबका कोई न कोई संदर्भ रहता है। वे किसी खास मौके पर, किसी खास सोच के साथ कही गईं, या गढ़ी गईं बातें होती हैं। इनका इस्तेमाल भाषा की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए तो ठीक होता है, किसी बात का बखान करने के लिए भी ठीक होता है, लेकिन तर्क के रूप में इनका इस्तेमाल ठीक नहीं होता। यह कुछ उसी तरह का है, कि मिठाई बहुत अच्छी होती है, लेकिन पैरों पर पहनने के लिए नहीं होती, और जूते बहुत अच्छे हो सकते हैं, लेकिन खाने के लिए नहीं होते (तब तक जब तक कि जूते खाने लायक कोई हरकत न की जाए)। 
किसी एक मौके पर, या किसी एक बात के लिए, सही ठहराते हुए कहावत-मुहावरा, शेर या सूक्ति, इनको कहीं से निकालकर, कहीं और फिट कर देना, शब्दों का मायाजाल तो हो सकता है, इनसे अखबारों में अच्छी सुर्खियां भी बन जाती हैं, लेकिन इनसे कोई तर्क नहीं बन सकता। इसलिए भाषा की खूबसूरती की खूबी को भाषा के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि आपसे बात करने वाले, आपसे कम पढ़े हों, और वे आपकी कही ऐसी पैनी बातों के जवाब में कुछ कहने लायक न रहें, आपके पढ़े-लिखे होने का आतंक उन पर चल जाए, लेकिन जब ऊंट पहाड़ के नीचे आते हैं, तो उनका कद नप जाता है। इसलिए शब्दजाल के बजाय वजनदार तर्कों की आदत रखें, जिंदगी के लंबे सफर में पहाड़ के पास से कभी न कभी गुजरना पड़ता ही है।
- सुनील कुमार

छोटी सी बात


28 मार्च
ईश्वर बहरा नहीं हो गया है
भारत में नियम-कानून कड़ाई से लागू नहीं होते, इसलिए लोग अपने घर पर पूजा-पाठ से लेकर शादी-ब्याह तक पूरी हैवानियत के साथ शोर करने वाले लाउडस्पीकर लगाते हैं, और आसपास के लोगों की जिंदगी घंटों से लेकर दिनों तक खराब करते हैं। ऐसा करने के पहले इतना जरूर सोच लें, कि आपके अपने बूढ़े और बीमार मां-बाप अगर ऐसे और इतने शोर को बर्दाश्त न कर पाने की हालत में हों, तो पड़ोस का ऐसा शोर आपको कैसा लगेगा? और जिन बच्चों की पढ़ाई ऐसे गैरजरूरी शोर से तबाह होती है, उनकी जगह अपने बच्चों को रखकर देखें, और फिर अखबारों में उन खबरों को देखें कि इम्तिहान में फेल होने पर बच्चे किस तरह जान दे देते हैं। 
यह भी सोचें कि रात भर जिनकी नींद खराब हो रही है, उनकी जगह अगर आप होते, तो शोर करने वालों को कौन-कौन सी गालियां देते, और फिर जहां तक आपके लाउडस्पीकर की आवाज जाती है, वहां तक की आबादी की गिनती से इन गालियों को गुणा करके देखें, और फिर समझें कि आपको क्या मिल रहा है। 
समझदार के लिए कबीर की कही हुई यही बात बहुत है कि ईश्वर बहरा नहीं हो गया है जो कि उसे सुनाने के लिए इतनी जोर की आवाज की जाए। कबीर की एक और बात याद रखनी चाहिए कि बद्दुआ किसी मरे हुए जानवर की भी नहीं लेनी चाहिए, जिसके चमड़े से बनी हुई धौंकनी से चलती भट्टी में लोहा भी पिघल जाता है। 
अपने आसपास के इतने अधिक लोगों की बद्दुआ का आप पर असर होना तय है, आपके शोर का ईश्वर पर असर हो या न हो, इसमें शक है। 
- सुनील कुमार

छोटी सी बात



26 मार्च
होली तो है लेकिन...
हिन्दुस्तान में बहुत से त्यौहारों के मौकों पर नशा करने का चलन है, और इसके बाद लोग कई बार एक-दूसरे से बहुत किस्म की बदसलूकी भी कर बैठते हैं। जो पीने वाले हैं उनको तो यह लगता है कि नशे में कही हुई बात आई-गई हो जाती है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोगों के मन में चुभी हुई बात कई बार तो पूरी जिंदगी नहीं निकल पाती। और रिश्ते कभी पहले जैसे नहीं हो पाते। इसलिए अपने नशे को बंद कमरे तक अगर रख सकें तो ही वह आपके लिए कम नुकसानदेह है, और अगर वह दूसरों के सामने सिर चढ़कर बोलता है, तो फिर वह आपके लिए सेहत से परे भी नुकसानदेह रहता है।
आज हिन्दुस्तान में बड़े-बड़े ताकतवर लोग, अरबों की दौलत के बावजूद जेल जाते दिखते हैं, क्योंकि उनसे कोई जुर्म हो गया, या कोई चूक हो गई। कानून की नजर में गलत काम और गलती दोनों के लिए बड़ी-छोटी सजा है। नशे की हालत में इनमें से कुछ भी अगर आपसे होता है, तो न सिर्फ आपकी जिंदगी जेल में कट सकती है, बल्कि पूरा परिवार तबाह हो सकता है। इसलिए नशे से बचने में ही समझदारी है। अपने पैसे, अपनी सेहत, और आसपास के माहौल का खराब करते हुए जेल जाने जैसे किसी हादसे से बचकर चलना ही ठीक है।
- सुनील कुमार


छोटी सी बात

25 मार्च
ज्ञान की विरासत
जिस मौसम में जो फूल खिलते हैं, या फल बाजार में आते हैं, या जो मौसमी सब्जियां दिखती हैं, उनको लेकर खुद भी जानकारी पाना चाहिए, और अपने आस-पास के बच्चों-बड़ों को बताना भी चाहिए। जरा से तलाशें तो पता लगेगा कि कौन सा फूल किस देश से आया, उसका चिकित्सा में क्या इस्तेमाल है, उसका जिक्र किस पौराणिक कथा में है, और उसकी क्या-क्या खूबियां हैं। ऐसी जानकारी की आदत अगर डाल लें, तो आपके आस-पास का पूरा दायरा उससे फायदा भी पाता है और धीरे-धीरे दूसरे लोग भी कुछ दूसरी जानकारी लाकर आपके साथ बांटते हैं। इसीलिए कहा गया है कि ज्ञान को जितना बांटें, वह उतना ही बढ़ता है। यह बात आपके ज्ञान पर आपको मिलने वाले किसी ब्याज से नहीं बनी है, बल्कि इसलिए बनी है कि ज्ञान की आदत जब आपके आस-पास के लोगों को पड़ती है, तो वे अपना जुटाया ज्ञान भी आपके साथ बांटते हैं। 
अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में आप जो कुछ अच्छी चीजें देकर जा सकते हैं, उनमें ज्ञान की आदत एक महत्वपूर्ण बात हो सकती है, जिसे कि आने वाली कोई भी मंदी छीनकर नहीं ले जा सकेगी। 
- सुनील कुमार

छोटी सी बात

24 मार्च 13
हासिल को छोड़ हसरत के पीछे
किसी और की लिखी हुई बात को जो लोग अपने नाम से आगे बढ़ाते हैं, उनकी चोरी पकड़ाना इन दिनों आसान हो गया है। इंटरनेट पर ऐसी बात डाली जाए या कहीं छपने के लिए दी जाए, कुछ लोग ऐसी बातों के चुनिंदा शब्द लेकर इंटरनेट पर उसकी असल ढूंढ सकते हैं। और चोरी करने वालों के नाम की मिट्टी पलीद हो सकती है। इसलिए कोशिश करें कि आपको अच्छी लगी हुई बात, उसके लिखने वालों या कहने वालों के नाम के साथ  ही आप आगे बढ़ाएं। जब आप ऐसी किसी बात को फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट करते हैं तो यह माना जाता है कि यह आपकी ही कही हुई बात है, इसलिए वहां पर या तो उसे अज्ञात नाम के साथ डालें, या नाम मालूम हो तो उसके साथ लिखें। 
आपको चाहे अच्छा लिखना न आता हो, अच्छी चीजों को छांटना भी आता है, तो भी आप एक पारखी तो माने ही जाते हैं। और पारखी हुनरमंद हों, या न हों, पारखी के रूप में उनकी इज्जत होती ही हैं। इसलिए आप जिस इज्जत के हकदार हैं, उसे छोड़कर उस इज्जत के पीछे न भागें, जिसके कि आप हकदार नहीं हैं। ऐसी ही बात के लिए किसी समय मैंने लिखा था कि लोग हासिल को छोड़, हसरत के पीछे भागते हैं।
सुनील कुमार 

छोटी सी बात

22 मार्च 2013
तलवार चलाएं, लेकिन तौलकर
संसद और विधानसभाओं में लोगों की कही बातों पर कई बार यह सुनने मिलता है कि उनके कहे शब्दों को असंसदीय मानकर सदन की कार्रवाई से मिटा दिया जाता है। ऐसा होने पर उन शब्दों को सदन की कार्रवाई के साथ खबरों में लिखा भी नहीं जा सकता। लेकिन ऐसे शब्द गाली ही हों, यह भी जरूरी नहीं है। बहुत से ऐसे शब्द जो कि एक सच को बयां करते हैं, उनको भी असंसदीय मान लिया जाता है।
 अब जैसे कामचोर शब्द है, जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी के काम को नहीं करते, उन्हें कामचोर कहते हैं, लेकिन यह शब्द असंसदीय मानकर कार्रवाई से निकाल दिया जाता है। इसी तरह बेईमान, नमकहराम जैसे शब्द हैं, जो असल जिंदगी में कई लोगों के ऊपर सही साबित होते होंगे, लेकिन संसद और विधानसभा इन्हें बर्दाश्त नहीं करते। इसलिए बहुत से शब्द असंसदीय हो सकते हैं, अनुचित नहीं। इनका इस्तेमाल अगर सावधानी से तौलकर किया जाए, तो वे कहीं से भी गाली में नहीं आते। अब जैसे जनता के पैसों से रियायती खाना खाने वाले सांसद अगर अपनी जिम्मेदारी का काम न करें, तो भी उनके लिए एकदम सही शब्द संसद में इस्तेमाल नहीं हो सकते, बाहर तो हो ही सकते हैं। 
लेकिन इसकी यहां पर चर्चा का एक मकसद है। बहुत तीखे शब्द बहुत तेज धार की तलवार सरीखे होते हैं, उनके चौकन्ने और संतुलित इस्तेमाल के बिना वे जिसके हाथ होते हैं, उसी को काटकर रख सकते हैं। इसलिए जब तक शब्दों को तौलने की काबिलीयत न हो, तब तक तीखे शब्दों से बचना चाहिए। अगर किसी समझदार और संवेदनशील के खिलाफ बेजा इस्तेमाल किया जाए, तो आपके शब्द आपको ही घायल कर सकते हैं। इसलिए अपनी समझ से आगे बढ़कर तलवार चलाना ठीक नहीं है। पुराने लोग कहते थे कि जितनी चादर हो, पैर उतने ही फैलाने चाहिए। उसी तरह समझ जितनी हो, उसी के मुताबिक हमलावर लफ्जों का इस्तेमाल करना चाहिए।
-सुनील कुमार

छोटी सी बात

21 मार्च 2013
आज भी हिज्जों का महत्व है
इन दिनों इंटरनेट की मेहरबानी से बहुत से देशों में लोग एक-दूसरे के दोस्त बन जाते हैं और फेसबुक या ट्विटर जैसी वेबसाईटों पर एक-दूसरे से बातचीत भी करते हैं। इनमें अंग्रेजी वाले बहुत से लोग रहते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे भी रहते हैं जो गैरअंग्रेजी जुबान वाले हैं, लेकिन इंटरनेट पर अनुवाद की आसान और मुफ्त सहूलियत के चलते वे एक-दूसरे से बात कर लेते हैं। लेकिन इंटरनेट ने अंग्रेजी जुबान के हिज्जे बदलकर रख दिए हैं। लोग शब्दों को अलग तरीके से लिखने लगे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए यह याद रखने की जरूरत है कि नेट पर अनुवाद करने वाले सॉफ्टवेयर इस तरह की नई स्पेलिंग का सही अनुवाद नहीं कर पाते। उनकी डिक्शनरी में परंपरागत स्पेलिंग ही रहती है। इसलिए यह याद रखें कि अगर आपका संपर्क बहुत से ऐसे लोगों से है, जो कि मशीनी अनुवाद से ही आपकी बात पढ़ पाते हैं, और अपनी बात अंग्रेजी में बदलकर लिख पाते हैं, तो ऐसे लोगों से संपर्क करते हुए हिज्जे पूरे-पूरे लिखें। 
और एक दूसरी बात जो हम पहले भी कई बार सुझाते आए हैं कि दुनिया की ऐसी कोई बात नहीं है जिसे कि बिना गाली-गलौज न लिखा जा सके। इसलिए ऐसे ही शब्द लिखें जिन्हें आपके बुजुर्ग भी पढ़ सकें, और आपके बच्चे भी। गालियां या गंदे शब्द आपकी साख को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि आपको अंदाज भी नहीं होगा।
-सुनील कुमार