राहुल गांधी देश को जवाब दें

23 जून 11
उत्तरप्रदेश में किसानों और पुलिस के टकराव के बाद पुलिस ज्यादती के आरोपों के बीच कांगे्रस के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी मोटर साइकिल पर बैठकर दिल्ली के करीब के भट्टा परसौल पहुंचे थे और वहां से निकलकर उन्होंने ये गंभीर आरोप लगाए थे कि वहां महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और बड़ी संख्या में किसानों की हत्याएं हुईं। अब ऐसी खबर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि वहां पर न कोई बलात्कार हुआ और न ही किसानों की हत्या हुई।
कांगे्रस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक दिग्विजय सिंह के मार्गदर्शन में राहुल गांधी के राजनीतिक प्रशिक्षण का अंदाज लोगों को है। इस मौके पर दिग्विजय राहुल के साथ मौजूद भी थे। और ऐसे तमाम आरोप दिग्विजय ने भी लगाए थे। इसलिए यह बात साफ है कि कांगे्रस की अमूल-बेबी की कही बातें दिग्विजय के मुताबिक ही रही होंगी। इसलिए हम राहुल गांधी की अपरिपक्वता को कोई रियायत इस मामले में नहीं दे सकते। वैसे भी उम्र के इस पड़ाव पर आकर, अपनी पारिवारिक विरासत से सिखने का पूरा मौका पाते हुए, कांगे्रस की राजनीति की धुरी पर रहते हुए, और किसी भी दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को संभालने की अटकलों वाले नेहरू-गांधी परिवार के इस चिराग को नासमझी की रियायत नहीं दी जा सकती। जब एक दलित महिला मुख्यमंत्री के राज पर आरोप लगाने हों, तो हम कुछ सावधानी बरतने को ही समझदारी भी मानेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि उत्तरप्रदेश में अपनी जमीन खो चुकी कांगे्रस किसी तिनकेनुमा मुद्दे को भी छोडऩा नहीं चाहती और वह इसके लिए परले दर्जे के ऐसे झूठे आरोप लगाने से भी नहीं चूकी जिसका कि गलत साबित होना तय सा था।
हम मायावती के राज को बहुत अच्छा नहीं मान रहे और आज दरअसल माया राज की बदअमनी के खिलाफ ही लिखना तय था, लेकिन फिर केंद्र सरकार के अधीन सी काम करने वाले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट ने हमारा रूख मोड़ दिया। उत्तरप्रदेश में रोजाना होते कई-कई बलात्कार, सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्रियों और विधायकों के बड़े-बड़े अपराध और जेल में कल हुई एक बहुत संदिग्ध हत्या जैसे अनगिनत मामले माया के खिलाफ हैं। लेकिन इन सबके बीच भी यह बात अधिक मायने रखती है कि राहुल गांधी के लगाए हुए इतने गंभीर आरोप झूठे साबित होते दिख रहे हैं। राजनीति यह तो कहती है कि राहुल गांधी उत्तरप्रदेश गए होते और किसानों के जख्मों पर मरहम लगाने का या माया सरकार के खिलाफ उन जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करते। उन्होंने अलग-अलग नजरियों से इन दोनों ही कामों को किया लेकिन उसके बाद जब वे बलात्कार और हत्या जैसे ठोस अपराधों के आरोप लगाते हैं और किसानों की लाशों को बड़ी संख्या में ठिकाने लगा देने जैसी बात कहते हैं तो फिर उन्हें आज देश को इस बात पर जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ऐसी गैरजिम्मेदारी क्यों की?
दरअसल पिछले कुछ महीनों में दिग्विजय सिंह ने कांगे्रस पार्टी के औपचारिक प्रवक्ताओं से परे जाकर एक अलग आक्रामक मोर्चा खोलने का जो काम किया है उसे लेकर लोगों के बीच यह धुंध छाई हुई है कि वह सोनिया गांधी के कहे हुए, उनकी सहमति से या फिर अपनी मर्जी से एक आक्रामक नेता बने हुए हैं? लेकिन आक्रामकता का सिलसिला लोगों को कई तरह की गलतफहमी या खुशफहमी का शिकार भी बना देता है। दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और संघ परिवार के खिलाफ अपने अभियान की धार को लगातार बढ़ाते हुए इतना तेज कर दिया है कि अब उस पर चलना शायद उनके खुद के लिए मुश्किल साबित होगा। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि संघ परिवार के खिलाफ कांगे्रस के भीतर अर्जुन सिंह के जाने के बाद एक जगह खाली हो गई थी और दिग्विजय उसे भरने का काम भी कर रहे हैं। यह काम पार्टी अधिक चाहती है या वे खुद अधिक चाहते हैं इसे समझने का लोगों के पास कोई जरिया नहीं है क्योंकि कांगे्रस की मुखिया अधिकतर मामलों में मुंह नहीं खोलती हैं और पार्टी के भीतर के मुद्दों पर भी उनका रूख सामने नहीं आता है।
खैर, हमें इस पार्टी के भीतर के मुद्दों से अधिक लेना-देना नहीं है लेकिन दिग्विजय-राहुल की मायावती के खिलाफ यह पूरी तरह से नाजायज और गैरजरूरी बयानबाजी आज उनकी पार्टी को ही भारी पड़ रही है। हमारा लिखने का मकसद यह है कि जिस पुलिस पर बलात्कार और हत्या, हत्या के बाद लाशों को तबाह कर देने के आरोप लगाकर राजनीति चाहे जितनी की जाए, इससे पुलिस पर क्या असर पड़ता है? यह पुलिस कल तक किसी दूसरी पार्टी की सरकार के मातहत काम करती थी, आज मायावती के नीचे काम कर रही है, कल किसी और पार्टी की सरकार रहेगी। ऐसे में अगर विपक्ष पुलिस पर ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाते रहेगा तो क्या किसी ने यह भी सोचा है कि इन पुलिस कर्मचारियों को घर जाकर अपनी बीबी, अपने बच्चों को भी मुंह दिखाना रहता है और समाज में जीना भी पड़ता है। बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर आरोप इस लापरवाही से, इस बदनीयती से किसी पर लगाना हम बहुत खराब मानते हैं और कल को अगर मायावती की सरकार दिग्विजय-राहुल पर झूठ फैलाकर हिंसा भड़काने का जुर्म कायम करती है तो अदालत में कांगे्रस किस तरह अपने-आपको बचाएगी?
भारत जैसी राजनीति में हम वैसे भी बहुत ही फिजूल की गालीगलौज देख रहे हैं। जब भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी मुलायम-लालू से लेकर कांगे्रस तक गालियों की बौछार करते हैं तो उससे चटपटी हैडिंग अखबारों को मिल जाती हैं। टेलीविजन समाचार चैनलों को बार-बार दिखाने के लिए उनका एक बयान मिल जाता है। लेकिन इस चक्कर में देश के जो जरूरी मुद्दे हैं वे गायब हो जाते हैं। हमें यह भी लगता है कि क्या मीडिया को भी गैरजिम्मेदारी और बदनीयती से की गई गालीगलौज को बढ़ाने से बचना नहीं चाहिए? क्या ऐसे बयान देने वालों को उनके शब्दों और उनके मतलब को लेकर घेरना नहीं चाहिए? लेकिन दर्शक संख्या और पाठक संख्या के गलाकाट मुकाबले में मीडिया उसी तरह गंदगी को परोसने में ओवरटाईम कर रहा है जिस तरह वोटों की लड़ाई में आगे निकलने के लिए पार्टियां और नेता गंदगी परोस रहे हैं। देश को इससे उबरने की जरूरत है।

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