22 जून 2011
सुनील कुमार
इतनी खूबसूरती के बीच भी कश्मीर में घूमना, उसे देखना, उस वक्त तकलीफदेह हो जाता है जब वहां गए हुए सैलानी और वहां के भी कुछ लोग, एक-दूसरे से या आपस में बदतमीजी पर उतर आते हैं। उत्तर भारत से गए हुए अधिकतर सैलानियों के मन में किसी कतार के लिए सम्मान बहुत कम दिखता है। जिस जगह दूसरे लोग घंटों से लाईन में लगे हैं वहां पर किस तरह रिश्वत देकर पीछे के रास्ते से आगे पहुंचा जाए इसका रास्ता कुछ लोगों को बहुत खुशी दे जाता है। हिन्दुस्तानियों का एक तबका इसी बात में खुश रहता है कि किसी साफ-सुथरी जगह पर कैसे थूका जाए या कैसे मूता जाए, जहां सिगरेट पीने की मनाही हो वहां कैसे सिगरेट पी जाए और मंदिर से लेकर केबल कार तक किस तरह अपने हद से अधिक आगे बढ़कर अपने को कामयाब माना जाए।
अलग-अलग इलाके के लोगों के मिजाज को देखें तो कुछ बातें खुलकर सामने दिखती हैं। कुछ लोगों को अलग-अलग इलाके के लोगों के बारे में ऐसी बात हो सकता है कि अपमानजनक भी लगे लेकिन अपने ही देश के लोगों की खामियों का अहसास किए बिना उन्हें खूबियों में कभी तब्दील नहीं किया जा सकता। गुजरात से आए हुए लोग सबसे शांत मिजाज के, धीरे बात करने वाले, कतार में लगने वाले लोग थे। बंगाल से आए हुए लोग किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहुत जोरों से बोलने वाले दिखते हैं और आपस में भी वे जो कहते हैं उन्हें दूर-दूर तक के लोग सुन सकते हैं। दिल्ली और पंजाब से आए हुए लोगों की जुबान में बहुत मौकों पर गालियां भरी होती हैं और अपने अलावा किसी और के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं दिखता।
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें किसी खूबसूरत और अच्छी जगह के मजे को किरकिरा करके रख देती हैं। कुछ ऐसी जवान, फैशनेबल, और चुलबुली लड़कियां केबल कार की घंटों लंबी कतार को तोडऩे की ऐसी कसम खाई बैठी थीं कि कई बार फटकार खाने के बाद भी वे किसी न किसी तरह सबसे आगे पहुंचकर घुसने में कामयाब हो गईं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जिन शहरी मां-बाप ने ऐसे लोगों को हजारों रुपए के चश्मे और दसियों हजार के मोबाईल फोन लेकर दिए, उन्होंने आसपास के किसी तमीजदार से कुछ तमीज लेकर अपने बच्चों को क्यों नहीं दी? जब हट्टे-कट्टे और जवान लोग, बच्चों वाले अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने को अपनी आदत बना लें तो वैसा समाज सभ्य लोगों के बीच कभी इज्जत नहीं पा सकता।
घूमने-फिरने की जगहों पर तरह-तरह से गंदगी फैलाना देखना हो तो उसके लिए हिन्दुस्तानियों से बेहतर मिसाल शायद कम ही लोगों की मिले। इन दिनों बाजार में तमाम चीजें जिस तरह की चमकदार प्लास्टिक पैकिंग की मिलती हैं, और वैसी पैकिंग के बिना कोई खुली चीज किसी बड़ी या महंगी जगह पर मिल ही नहीं सकती, वैसी चीजों को खाकर उसका कचरा खूबसूरत पहाडिय़ों पर फैला देने वाले, डल झील के पानी में बिखरा देने वाले सैलानियों के बीच नागरिक जिम्मेदारियों को कैसे पैदा किया जा सकता है, या फिर उन पर कुछ कड़े देशों की तरह का जुर्माना कैसे लगाया जा सकता है, इस बारे में सोचना चाहिए।
कश्मीर में जब बड़ी-बड़ी बातों के लिए भी सरकार और प्रशासन नामौजूद दिखते हैं तो ऐसी छोटी-छोटी बातें में बेहतरी की सोचने वाला कौन मिलेगा? कश्मीर के समाज में अपनी बड़ी-बड़ी दिक्कतों के चलते हुए, उनके मन में बड़े-बड़े रंज रहते हुए ऐसी कम अहमियत वाली बातों की तरफ उनका ध्यान न जाना तो ठीक है लेकिन मस्ती के मूड में जो सैलानी अपने अलग-अलग अच्छे भले इलाकों को छोड़कर वहां जाते हैं वे भी इस बारे में न सोचें तो यह दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के अपने अविकसित रह जाने और असभ्य रहने का सुबूत रहता है। वहां रहते हुए ही मैंने कुछ छोटी-छोटी बातें अखबार के लिए लिखकर भेजीं कि किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों का बर्ताव उनकी जाति, उनके धर्म, उनकी बोली, उनके इलाके जैसी बहुत सी बातों के लिए दूसरों के मन में सम्मान या अपमान तय करता है।
गुलमर्ग में केबल कार के गोंडोला कहा जाता है। उससे ऊंचाई पर बर्फ तक जाने के लिए 800 रुपए खर्च भी करने पड़ते हैं। इसके बाद भी वहां कतार इतनी लंबी लगी थी कि कई जगहों पर जाते और आते हुए घंटों तक खड़े रहना पड़ रहा था। अलग-अलग इलाकों के बदतमीज लोग तो वहां कतारें तोड़ ही रहे थे, हाथ में वायरलेस सेट पकड़े हुए एक अफसर आधा-पौन दर्जन लोगों को लाकर कतार से परे सीधा गोंडोला में बिठाने लगा। मैंने इसे लेकर जब बहस की और अंगे्रजी में फटकार लगाते हुए उसका नाम और पद पूछा तो बहुत बहस के बाद उसने नाम बताया और कहा कि ये लोग राजकीय अतिथि हैं और इन्हें वह सीएम हाउस से लेकर आया है। ऐसी नौबत हर जगह आती है। किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री ही नहीं, छोटे-छोटे अफसरों के भेजे हुए लोग ऐसे ही कभी नवरात्रि में किसी मंदिर तक तो कभी किसी दरगाह पर पहुंचते हैं। लेकिन कई घंटे लाईन में लगने के बाद, और लोगों को बदतमीजी-मक्कारी करते देखने के बाद मेरा सब्र जवाब दे चुका था। काफी डाटकर मैंने इस राजकीय जत्थे को अपने से आगे बढऩे से तो रोक दिया लेकिन ऊपर पहुंचकर जब हम उतरे तो एक-दो मिनट के बाद ही चमक-दमक वाला यह ताकतवर जत्था भी पहुंचा। मैंने इस अफसर के साथ इस परिवार की तस्वीरें भी खींचकर रख लीं, लेकिन उस वक्त एक फिक्र यह भी थी कि वर्दियों और बंदूकों के साथ में चलने वाले इन लोगों से उलझना कश्मीर में कितनी समझदारी की बात है?
इसके कुछ दिन पहले जब हम पहलगाम से श्रीनगर लौट रहे थे तो इस राजधानी के शुरू होने पर ही फौज का एक ठिकाना इस हाईवे के दोनों तरफ पड़ा। वहां अचानक दोनों तरफ सेना के फौजियों ने ही तमाम गाडिय़ों को रोक दिया। इसके बाद सड़क के एक तरफ के इस आर्मी कैंप से निकलकर सड़क के दूसरे तरफ कुल एक महिला जा रही थी जो कि अपने हुलिए और कपड़ों से किसी अफसर की बीबी थी। आमने-सामने के गेट तक आने-जाने के लिए जिस अंदाज में बंदूकबाजों ने पूरा ट्रैफिक रोक दिया था और फिर मैडम जिस तरह टहलते हुए पार गईं, उनके पीछे एक वर्दीधारी एक ट्रे में चाय का सामान लेकर गया, उससे कश्मीर में सत्ता और जनता के बीच का फासला समझ में आता है। एक महिला सड़क किनारे रूककर, आती-जाती गाडिय़ों को देखकर भी सड़क पा कर सकती थी, लेकिन कश्मीर में दिल्ली की भेजी हुई फौजें अपने-आपमें एक कानून हैं।
ऐसे में 13 हजार फीट की एक जमी हुई पहाड़ी पर मैं अगर वहां के कुछ ताकतवर बंदूक और वायरलैस वालों से उलझ रहा था तो इसके पीछे समझदारी तो कम थी, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की एक नासमझी अधिक थी। बाद में कुछ जानकार लोगों ने कहा कि कश्मीर ऐसी बहस की जगह नहीं है।
मुझे लगा कि अगर किसी राज्य को कुदरत से मिली खूबसूरती से खिंचे आ रहे सैलानियों की गिनती में इजाफा करना है, या उनसे अधिक कमाई करनी है तो उस राज्य को अपने-आपको एक बेहतर मेजबान बनकर भी दिखाना होगा। जिस परले दर्जे की बदइंतजामी वहां पर सरकार के तमाम कामों में एक सैलानी के सामने आती है वह भयानक है। जो अच्छी बातें सामने आती हैं वे कुदरत की दी हुई हैं और वहां के गरीब लोगों के भले मिजाज की हैं। कश्मीर में एक नौजवान मुख्यमंत्री के रहते हुए भी अगर रोजमर्रा की जिंदगी के हालात नहीं सुधरते हैं तो यह राज्य अपनी संभावनाओं को नहीं पा सकेगा। और हो सकता है कि एक नौजवान से ही ऐसी उम्मीदें बेबुनियाद हों और कहीं कोई बुजुर्ग मुख्यमंत्री भी बेहतर काम करने वाला आ जाए।
श्रीनगर की एक ठीक-ठाक दर्जे की होटल में हम अपने एक कश्मीरी दोस्त के ठहराए रूके थे। होटल मालिक के परिवार के मेहमान होने की वजह से जाहिर था कि बाकी लोगों के मुकाबले हमें कुछ अधिक अच्छा बर्ताव मिलता, और मिला भी। लेकिन उसके बाद भी ऐसा लगा कि वहां काम करने वाले लोगों को कुछ और अधिक टे्रनिंग की जरूरत है जिससे कि सैलानी कुछ बेहतर अनुभव लेकर जा सकें। वहां लोगों में पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग की शायद कुछ कमी है इसलिए सभी तरह के काम करने वाले लोग अपने मुहल्ले में काम करने के लायक तो हैं लेकिन बाहरी लोगों से वास्ता पडऩे पर उनमें कुछ-कुछ कमियां दिखती हैं। इस मामूली बात को मैं कश्मीर के नौजवानों में पनपते अलगाववाद और आतंक से जोड़कर देख रहा हूं कि अगर उन्हें बेहतर काम-धंधे से लगाना है तो उन्हें मामूली काम को भी खूबी के साथ करने की ट्रेनिंग देने का काम सरकार को करना चाहिए। जब तक ऐसा विकास काम करने वालों के बीच नहीं होगा तब तक बेरोजगारों के दिन नहीं सुधरेंगे और वे शायद रोज के मेहनतानों पर पत्थर फेंकने का काम अच्छा मानते रहेंगे।
जिस देश में देश भर के अफसरों को देश भर के राज्यों में भेजने का पुराना इंतजाम है वहां पर भी जम्मू-कश्मीर राज्य के आईएएस अफसर या उस राज्य के स्थानीय अफसर चीजों में इतने मामूली सुधार क्यों नहीं कर पाते यह मेरे लिए हैरानी की बात है। हो सकता है कि कुछ और राज्य इससे भी बुरी हालत में हों लेकिन ऐसी मामूली गलतियों को सही ठहराने के लिए कम से कम मैं तो किसी अधिक बुरे से तुलना करना ठीक नहीं समझता। (बाकी कल)
सुनील कुमार
इतनी खूबसूरती के बीच भी कश्मीर में घूमना, उसे देखना, उस वक्त तकलीफदेह हो जाता है जब वहां गए हुए सैलानी और वहां के भी कुछ लोग, एक-दूसरे से या आपस में बदतमीजी पर उतर आते हैं। उत्तर भारत से गए हुए अधिकतर सैलानियों के मन में किसी कतार के लिए सम्मान बहुत कम दिखता है। जिस जगह दूसरे लोग घंटों से लाईन में लगे हैं वहां पर किस तरह रिश्वत देकर पीछे के रास्ते से आगे पहुंचा जाए इसका रास्ता कुछ लोगों को बहुत खुशी दे जाता है। हिन्दुस्तानियों का एक तबका इसी बात में खुश रहता है कि किसी साफ-सुथरी जगह पर कैसे थूका जाए या कैसे मूता जाए, जहां सिगरेट पीने की मनाही हो वहां कैसे सिगरेट पी जाए और मंदिर से लेकर केबल कार तक किस तरह अपने हद से अधिक आगे बढ़कर अपने को कामयाब माना जाए।
अलग-अलग इलाके के लोगों के मिजाज को देखें तो कुछ बातें खुलकर सामने दिखती हैं। कुछ लोगों को अलग-अलग इलाके के लोगों के बारे में ऐसी बात हो सकता है कि अपमानजनक भी लगे लेकिन अपने ही देश के लोगों की खामियों का अहसास किए बिना उन्हें खूबियों में कभी तब्दील नहीं किया जा सकता। गुजरात से आए हुए लोग सबसे शांत मिजाज के, धीरे बात करने वाले, कतार में लगने वाले लोग थे। बंगाल से आए हुए लोग किसी भी सार्वजनिक जगह पर बहुत जोरों से बोलने वाले दिखते हैं और आपस में भी वे जो कहते हैं उन्हें दूर-दूर तक के लोग सुन सकते हैं। दिल्ली और पंजाब से आए हुए लोगों की जुबान में बहुत मौकों पर गालियां भरी होती हैं और अपने अलावा किसी और के लिए उनके मन में कोई सम्मान नहीं दिखता।
ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी बातें किसी खूबसूरत और अच्छी जगह के मजे को किरकिरा करके रख देती हैं। कुछ ऐसी जवान, फैशनेबल, और चुलबुली लड़कियां केबल कार की घंटों लंबी कतार को तोडऩे की ऐसी कसम खाई बैठी थीं कि कई बार फटकार खाने के बाद भी वे किसी न किसी तरह सबसे आगे पहुंचकर घुसने में कामयाब हो गईं। मुझे यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जिन शहरी मां-बाप ने ऐसे लोगों को हजारों रुपए के चश्मे और दसियों हजार के मोबाईल फोन लेकर दिए, उन्होंने आसपास के किसी तमीजदार से कुछ तमीज लेकर अपने बच्चों को क्यों नहीं दी? जब हट्टे-कट्टे और जवान लोग, बच्चों वाले अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने को अपनी आदत बना लें तो वैसा समाज सभ्य लोगों के बीच कभी इज्जत नहीं पा सकता।
घूमने-फिरने की जगहों पर तरह-तरह से गंदगी फैलाना देखना हो तो उसके लिए हिन्दुस्तानियों से बेहतर मिसाल शायद कम ही लोगों की मिले। इन दिनों बाजार में तमाम चीजें जिस तरह की चमकदार प्लास्टिक पैकिंग की मिलती हैं, और वैसी पैकिंग के बिना कोई खुली चीज किसी बड़ी या महंगी जगह पर मिल ही नहीं सकती, वैसी चीजों को खाकर उसका कचरा खूबसूरत पहाडिय़ों पर फैला देने वाले, डल झील के पानी में बिखरा देने वाले सैलानियों के बीच नागरिक जिम्मेदारियों को कैसे पैदा किया जा सकता है, या फिर उन पर कुछ कड़े देशों की तरह का जुर्माना कैसे लगाया जा सकता है, इस बारे में सोचना चाहिए।
कश्मीर में जब बड़ी-बड़ी बातों के लिए भी सरकार और प्रशासन नामौजूद दिखते हैं तो ऐसी छोटी-छोटी बातें में बेहतरी की सोचने वाला कौन मिलेगा? कश्मीर के समाज में अपनी बड़ी-बड़ी दिक्कतों के चलते हुए, उनके मन में बड़े-बड़े रंज रहते हुए ऐसी कम अहमियत वाली बातों की तरफ उनका ध्यान न जाना तो ठीक है लेकिन मस्ती के मूड में जो सैलानी अपने अलग-अलग अच्छे भले इलाकों को छोड़कर वहां जाते हैं वे भी इस बारे में न सोचें तो यह दिल्ली-मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के अपने अविकसित रह जाने और असभ्य रहने का सुबूत रहता है। वहां रहते हुए ही मैंने कुछ छोटी-छोटी बातें अखबार के लिए लिखकर भेजीं कि किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों का बर्ताव उनकी जाति, उनके धर्म, उनकी बोली, उनके इलाके जैसी बहुत सी बातों के लिए दूसरों के मन में सम्मान या अपमान तय करता है।
गुलमर्ग में केबल कार के गोंडोला कहा जाता है। उससे ऊंचाई पर बर्फ तक जाने के लिए 800 रुपए खर्च भी करने पड़ते हैं। इसके बाद भी वहां कतार इतनी लंबी लगी थी कि कई जगहों पर जाते और आते हुए घंटों तक खड़े रहना पड़ रहा था। अलग-अलग इलाकों के बदतमीज लोग तो वहां कतारें तोड़ ही रहे थे, हाथ में वायरलेस सेट पकड़े हुए एक अफसर आधा-पौन दर्जन लोगों को लाकर कतार से परे सीधा गोंडोला में बिठाने लगा। मैंने इसे लेकर जब बहस की और अंगे्रजी में फटकार लगाते हुए उसका नाम और पद पूछा तो बहुत बहस के बाद उसने नाम बताया और कहा कि ये लोग राजकीय अतिथि हैं और इन्हें वह सीएम हाउस से लेकर आया है। ऐसी नौबत हर जगह आती है। किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री ही नहीं, छोटे-छोटे अफसरों के भेजे हुए लोग ऐसे ही कभी नवरात्रि में किसी मंदिर तक तो कभी किसी दरगाह पर पहुंचते हैं। लेकिन कई घंटे लाईन में लगने के बाद, और लोगों को बदतमीजी-मक्कारी करते देखने के बाद मेरा सब्र जवाब दे चुका था। काफी डाटकर मैंने इस राजकीय जत्थे को अपने से आगे बढऩे से तो रोक दिया लेकिन ऊपर पहुंचकर जब हम उतरे तो एक-दो मिनट के बाद ही चमक-दमक वाला यह ताकतवर जत्था भी पहुंचा। मैंने इस अफसर के साथ इस परिवार की तस्वीरें भी खींचकर रख लीं, लेकिन उस वक्त एक फिक्र यह भी थी कि वर्दियों और बंदूकों के साथ में चलने वाले इन लोगों से उलझना कश्मीर में कितनी समझदारी की बात है?
इसके कुछ दिन पहले जब हम पहलगाम से श्रीनगर लौट रहे थे तो इस राजधानी के शुरू होने पर ही फौज का एक ठिकाना इस हाईवे के दोनों तरफ पड़ा। वहां अचानक दोनों तरफ सेना के फौजियों ने ही तमाम गाडिय़ों को रोक दिया। इसके बाद सड़क के एक तरफ के इस आर्मी कैंप से निकलकर सड़क के दूसरे तरफ कुल एक महिला जा रही थी जो कि अपने हुलिए और कपड़ों से किसी अफसर की बीबी थी। आमने-सामने के गेट तक आने-जाने के लिए जिस अंदाज में बंदूकबाजों ने पूरा ट्रैफिक रोक दिया था और फिर मैडम जिस तरह टहलते हुए पार गईं, उनके पीछे एक वर्दीधारी एक ट्रे में चाय का सामान लेकर गया, उससे कश्मीर में सत्ता और जनता के बीच का फासला समझ में आता है। एक महिला सड़क किनारे रूककर, आती-जाती गाडिय़ों को देखकर भी सड़क पा कर सकती थी, लेकिन कश्मीर में दिल्ली की भेजी हुई फौजें अपने-आपमें एक कानून हैं।
ऐसे में 13 हजार फीट की एक जमी हुई पहाड़ी पर मैं अगर वहां के कुछ ताकतवर बंदूक और वायरलैस वालों से उलझ रहा था तो इसके पीछे समझदारी तो कम थी, अपने अधिकार के लिए आवाज उठाने की एक नासमझी अधिक थी। बाद में कुछ जानकार लोगों ने कहा कि कश्मीर ऐसी बहस की जगह नहीं है।
मुझे लगा कि अगर किसी राज्य को कुदरत से मिली खूबसूरती से खिंचे आ रहे सैलानियों की गिनती में इजाफा करना है, या उनसे अधिक कमाई करनी है तो उस राज्य को अपने-आपको एक बेहतर मेजबान बनकर भी दिखाना होगा। जिस परले दर्जे की बदइंतजामी वहां पर सरकार के तमाम कामों में एक सैलानी के सामने आती है वह भयानक है। जो अच्छी बातें सामने आती हैं वे कुदरत की दी हुई हैं और वहां के गरीब लोगों के भले मिजाज की हैं। कश्मीर में एक नौजवान मुख्यमंत्री के रहते हुए भी अगर रोजमर्रा की जिंदगी के हालात नहीं सुधरते हैं तो यह राज्य अपनी संभावनाओं को नहीं पा सकेगा। और हो सकता है कि एक नौजवान से ही ऐसी उम्मीदें बेबुनियाद हों और कहीं कोई बुजुर्ग मुख्यमंत्री भी बेहतर काम करने वाला आ जाए।
श्रीनगर की एक ठीक-ठाक दर्जे की होटल में हम अपने एक कश्मीरी दोस्त के ठहराए रूके थे। होटल मालिक के परिवार के मेहमान होने की वजह से जाहिर था कि बाकी लोगों के मुकाबले हमें कुछ अधिक अच्छा बर्ताव मिलता, और मिला भी। लेकिन उसके बाद भी ऐसा लगा कि वहां काम करने वाले लोगों को कुछ और अधिक टे्रनिंग की जरूरत है जिससे कि सैलानी कुछ बेहतर अनुभव लेकर जा सकें। वहां लोगों में पढ़ाई-लिखाई और ट्रेनिंग की शायद कुछ कमी है इसलिए सभी तरह के काम करने वाले लोग अपने मुहल्ले में काम करने के लायक तो हैं लेकिन बाहरी लोगों से वास्ता पडऩे पर उनमें कुछ-कुछ कमियां दिखती हैं। इस मामूली बात को मैं कश्मीर के नौजवानों में पनपते अलगाववाद और आतंक से जोड़कर देख रहा हूं कि अगर उन्हें बेहतर काम-धंधे से लगाना है तो उन्हें मामूली काम को भी खूबी के साथ करने की ट्रेनिंग देने का काम सरकार को करना चाहिए। जब तक ऐसा विकास काम करने वालों के बीच नहीं होगा तब तक बेरोजगारों के दिन नहीं सुधरेंगे और वे शायद रोज के मेहनतानों पर पत्थर फेंकने का काम अच्छा मानते रहेंगे।
जिस देश में देश भर के अफसरों को देश भर के राज्यों में भेजने का पुराना इंतजाम है वहां पर भी जम्मू-कश्मीर राज्य के आईएएस अफसर या उस राज्य के स्थानीय अफसर चीजों में इतने मामूली सुधार क्यों नहीं कर पाते यह मेरे लिए हैरानी की बात है। हो सकता है कि कुछ और राज्य इससे भी बुरी हालत में हों लेकिन ऐसी मामूली गलतियों को सही ठहराने के लिए कम से कम मैं तो किसी अधिक बुरे से तुलना करना ठीक नहीं समझता। (बाकी कल)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें