ऐसा वीआईपी दर्जा किस काम का जिसमें और खतरे में पड़ते रहें...

संपादकीय
8 अप्रैल 2015

केन्द्रीय विमान मंत्री ने एक साधारण बातचीत में यह कहकर सनसनी फैला दी कि वे अपनी जेब में माचिस लेकर विमान में आते-जाते हैं, लेकिन मंत्री होने की वजह से अब उनकी तलाशी नहीं होती। उन्होंने अपने आपको चेन स्मोकर बताते हुए कहा है कि वे इसी वजह से जेब में हमेशा माचिस रखते हैं। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि माचिस से कोई विमान अपहरण तो कर नहीं सकता। 
अभी देश रॉबर्ट वाड्रा के खास सुरक्षा दर्जे से उबर भी नहीं पाया है, और पूरे देश में वीआईपी शब्द बुरी तरह से बदनाम हो रहा है, और उस बीच में एक केन्द्रीय मंत्री का यह कहना बहुत किस्म के सवाल उठाता है। रॉबर्ट वाड्रा के लिए पूरे देश के विमानतलों पर यह लिखा हुआ था कि जब भी वे प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सफर करेंगे, उनकी सुरक्षा जांच नहीं होगी। लोग विमानतलों पर लगातार देखते हैं कि बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को सुरक्षा जांच से किस तरह अघोषित छूट भी दे दी जाती है। और छूट का दर्जा प्राप्त लोग भी बहुत से हैं, सरकारी और संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए दर्जनों लोगों को सुरक्षा जांच से घोषित छूट मिली हुई है, और इन ओहदों वाले लोग अलग-अलग वक्त पर जुर्म करते भी पकड़ाए हैं, जेल भी गए हैं, और आज भी कटघरों में हैं। ऐसे में इनको सुरक्षा जांच से छूट देने पर कुछ सवाल खड़े होते हैं कि सार्वजनिक विमान में बाकी मुसाफिरों की जिंदगी भी दांव पर लगी रहती है, और किसी को भी ऐसे में छूट की इजाजत क्यों मिलनी चाहिए? दूसरी बात यह कि अगर ऐसे बड़े लोग सार्वजनिक विमानों से चलने के बजाय सरकारी विमानों से चलते हैं, तो भी वह तो जनता के पैसों का ही विमान होता है, और सुरक्षा जांच छूट के चक्कर में उनके साथ कोई ऐसा सामान भी रख सकते हैं जिससे विमान को नुकसान पहुंचाया जा सके। किसी को भी न तो जनता के साथ सफर करते हुए, न ही जनता के पैसों के विमान पर सफर करते हुए ऐसी कोई छूट दी जा सकती है। और ऐसी छूट सीधे-सीधे आम जनता के हक के खिलाफ है। 
दूसरी बात यह कि भारत की वीआईपी संस्कृति अंग्रेजों के वक्त के सामंती इंतजाम का बचा हुआ कचरा है। अक्सर ऐसे लोग किसी उड़ान में लेट पहुंचते हैं, रेल्वे स्टेशनों पर इनके लिए प्लेटफॉर्म बदले जाते हैं, सड़कों पर इनके लिए ट्रैफिक को रोका जाता है, सार्वजनिक जगहों पर इनकी गाडिय़ों के काफिले रोककर बाकी लोगों के लिए दिक्कतें खड़ी की जाती हैं। इस देश में और इसके प्रदेशों में इस पर रोक इसलिए नहीं लग पा रही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी ऐसी ही तमाम वीआईपी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं, और यह बात भारतीय संविधान के समानता के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। इसके खिलाफ पूरे देश में एक ऐसे जनमत को खड़े करने की जरूरत है जिससे कि वोटों के मोहताज नेता भी हिल जाएं, और अदालतों पर भी जनमत का असर हो। 

एनडीए के भीतर शिवसेना घरेलू ऑडिटर सरीखी...

7 अपै्रल 2015
संपादकीय
महाराष्ट्र की शिवसेना वैसे तो बहुत से मुद्दों पर एक आक्रामक और उग्र मराठीवाद और महाराष्ट्रवाद को लेकर चलती है, और बाल ठाकरे के वक्त से मुस्लिमों के खिलाफ उसकी जो बातें रहते आई हैं, उनसे देश के समझदार और धर्मनिरपेक्ष तबके की सहमति की कोई गुंजाइश नहीं रहती। लेकिन एनडीए के भीतर भाजपा के एक भागीदार की हैसियत से, और महाराष्ट्र में सत्ता के गठबंधन की हिस्सेदार के रूप में जब वह भाजपा की रीति-नीति के खिलाफ खुलकर कहती है, अपनी पार्टी के अखबार में अकसर लिखती है, तो उसकी बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उसने पिछले कई महीनों में, या कि मोदी की सरकार बनने के पहले से लेकर अब तक मोदी से लेकर भाजपा के दूसरे नेताओं तक की जो आलोचना की है, वह भाजपा के लिए एक आत्ममंथन की बात रहते आई है। उसने महाराष्ट्र सरकार के कई फैसलों के खिलाफ भी लगातार लिखा है और कहा है। कल शिवसेना ने अपने अखबार में संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो झाड़ू लेकर गंदगी साफ करने के लिए निकले हैं, लेकिन उनकी पार्टी के नेता, सांसद और मंत्री अपने मुंह से जिस तरह की गंदगी फैला रहे हैं, वैसे मुंह वे कैसे साफ करेंगे? 
हमारे पाठकों को याद होगा कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से हर हफ्ते-दो हफ्ते देश में मोदी के साथियों या उनके समर्थक संगठनों, या उनके मंत्री-सांसदों ने ऐसे भयानक बयान दिए हैं कि उनकी वजह से हमें भी नरेन्द्र मोदी और भाजपा को यह सलाह देनी पड़ी कि वे अपने लोगों को काबू करें। आज ही किसी एक बड़े अंगे्रजी अखबार में किसी का लेख है कि किस तरह बकवासी बयानों ने मोदी के इतने महीनों की उपलब्धियों को ढांककर रख दिया है। उनका सारा आर्थिक एजेंडा, और देश-विदेश में उनकी बनाई हुई कल्पना की तस्वीर पर आए दिन उनके साथ के लोग पीकते चलते हैं। यह सिलसिला उनको इसलिए खत्म करवाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी पार्टी और उनकी अपनी छवि का चाहे जो नुकसान हो रहा हो, इससे देश के माहौल का भी एक बड़ा नुकसान हो रहा है। और जब विविधताओं वाले इस विशाल देश में एक निहायत गैरजरूरी और थोपी हुई साम्प्रदायिकता हावी रहेगी, तो यह जाहिर है कि सारे आर्थिक सपने धरे रह जाएंगे। जब राज्य साम्प्रदायिकता, कट्टरता, और अवैज्ञानिक मुद्दों से जूझते रहेंगे, तब केंद्र की मोदी सरकार भी अपने खुद के तय किए हुए लक्ष्य पूरे नहीं कर पाएगी। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें जमीन पर गिर पड़ी हैं, इसलिए मोदी को देश में अधिक दिक्कत नहीं हो रही है। लेकिन अगर ये कीमतें कुछ बरस की तरह आसमान पर पहुंची हुई रहतीं, तो आज देश की जनता की बेचैनी मोदी को घायल भी करती।
मोदी और भाजपा को शिवसेना की कही हुई इस बात को अपने खुद के हित में गंभीरता से लेना चाहिए। देश के माहौल में आज अगर भाजपा मंत्री और नेता अठारहवीं सदी की कट्टरता को बढ़ावा देने में लगे हैं, अवैज्ञानिक बातों को फैलाने में लगे हैं, वैज्ञानिक तथ्यों को नकारने में लगे हैं, संसदीय समितियों में रहते हुए अपने खुद के तंबाकू कारोबारों को बढ़ाने में लगे हैं, तो यह सिलसिला थमना चाहिए। एनडीए के भीतर शिवसेना आज एक घरेलू ऑडिटर जैसा काम कर रही है। भाजपा को, और बाकी एनडीए को भी इसका फायदा उठाना चाहिए।

जब गाडिय़ों का हॉर्स पॉवर दिमाग पर चढ़ जाता है...

6 अप्रैल 2015
संपादकीय
दिल्ली में एक कार को मोटरसाइकिल ने छू दिया, तो कार सवारों ने उतरकर बाईक सवार आदमी को उसके बच्चों के सामने ही सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला। इस खबर से विचलित हम सुबह से इस पर लिखने की सोच ही रहे थे कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जशपुर के भूतपूर्व शाही घराने के आज के भाजपा सांसद के भाई विक्रमादित्य सिंह जूदेव के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हुई है कि उसने अपनी बड़ी सी गाड़ी से एक स्कूल संचालक को बुरी तरह कुचला, और फरार हो गया। ऐसी भी खबर है कि जख्मी स्कूल संचालक की जिंदगी खतरे में है, या वह गुजर गया है। 
जिन लोगों के हाथ सत्ता, ओहदे, पैसे, या मशीनी इंजन की ताकत होती है, उनमें से बहुत से लोगों में यह ताकत दिमाग तक चढ़ जाती है। यह आमतौर पर दिखता है कि सड़कों पर जो लोग जितनी बड़ी और जितनी ताकतवर गाड़ी लेकर चलते हैं, उनके बर्ताव में बाकी तमाम लोगों के खिलाफ एक परले दर्जे की हिंसक हिकारत पैदा होने लगती है। मशीन का हॉर्स पॉवर कुछ लोग अपने दिमाग पर चढऩे से रोक पाते हैं, लेकिन अधिकतर लोग इसके शिकार हो जाते हैं। ऐसा शायद ही कोई दिन रहता हो जब सत्ता या ताकत की किसी और शक्ल के बेजा इस्तेमाल की खबर न आती हो। और दिल्ली में जो हुआ वह तो किसी अनजान से एक्सीडेंट के बाद के तनाव के चलते हुआ, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जो हुआ है, वह तो भूली-बिसरी शाही ताकत से उपजी बददिमागी का एक नमूना दिखता है, और पुलिस मामला दर्ज करके जशपुर-घराने के इस नौजवान की तलाश कर रही है। 
दरअसल भारत में जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा, हाईवे बढ़े, सड़कें चौड़ी हुईं, और गाडिय़ां बड़ी-बड़ी होती गईं, वैसे-वैसे लोगों में फासला बढ़ते चला गया। आज ताकतवर अमीर और पैदल या साइकिल वाले गरीब के बीच में इतना बड़ा फर्क रहता है कि प्रशासन या पुलिस भी इस फर्क को दूर नहीं कर सकते। लोगों को पैदल और साइकिल के लिए बेहतर इंतजाम का हक है, लेकिन शहरी ढांचा बड़ी गाडिय़ों के हिसाब से ही बनते चल रहा है। फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम लगातार देखते हैं कि किसी भी तरह की ताकत का एक हिंसक प्रदर्शन सड़कों पर होता है, और बाकी जनता के हकों के लिए ताकतवर दिमागों में भयान हिकारत रहती है। हालांकि जशपुर की यह ताजा हिंसा सड़कों की आम हिंसा से बहुत अधिक भयानक है, और उसमें सत्तारूढ़ पार्टी की बददिमागी के साथ-साथ पुरानी सामंती बददिमागी मिली हुई दिख रही है। 
कल देश के तमाम दिग्गज जज मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री के साथ बैठकर अदालती कामकाज में सुधार पर बातचीत कर रहे थे। एक बात यह भी निकलकर आई कि निचली अदालतों में गए हुए तमाम मामले पांच बरस के भीतर निपटा लेने की कोशिश होनी चाहिए। आज ही अखबार में यह भी खबर है कि किस तरह फिल्म अभिनेता सलमान खान के तेरह बरस पुराने सड़क हादसे के मामले में अब तक गवाही का दौर ही चल रहा है। सलमान की कार से फुटपाथ पर सोए हुए लोग कुचलकर मर गए थे, और पुलिस और अदालत इस खुले हुए केस में अब तक कोई इंसाफ नहीं दे पाए हैं। आज भी यह नया बयान सामने आया है कि सलमान के ड्राइवर ने एक्सीडेंट का दोष अपने ऊपर लिया है। अब अगर ताकतवर लोगों की ताकतवर गाडिय़ों से होने वाली मौतों के मामले दस-पन्द्रह बरस तक अगर निचली अदालत में ही पड़े रहेंगे, तो देश की आखिरी अदालत से इंसाफ या बेइंसाफी होने तक तो लोगों की जिंदगियां ही गुजर जाएंगी। 
यही वजह है कि इस देश में लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा नहीं रह गया है, और जिन लोगों में हौसला रहता है, खोने को कुछ नहीं रहता है, वे लोग हथियार उठा लेते हैं। 

अदालती सुधार की बड़ी-बड़ी बातों के बीच कुछ छोटी बातें

संपादकीय
5 अप्रैल 2015
देश के मुख्य जजों की एक कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खासा लंबा भाषण दिया और जजों की तारीफ करते हुए उनके महत्व और उनके सामने की चुनौतियों पर बहुत कुछ कहा। यह कांफ्रेंस आज देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और सभी मुख्यमंत्रियों के साथ थी, और वैसे अदालती कामकाज में सुधार लाया जाए इस पर बात अभी जारी है।  देश में पहले दिन न्यायिक सुधार के लिए आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट धूल खाते दशकों से पड़ी हुई है।
 लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि भाषण में कौन क्या कहते हैं, मुद्दा यह है कि देश की सीमित अदालती क्षमता का इस्तेमाल आज किन बातों में हो रहा है, और क्या अदालती क्षमता को बढ़ाने की सोच जनता की कमर तोडऩे की कीमत पर नहीं होगी? आज देश की तकरीबन सभी अदालतों में ऐसे मामलों की भरमार है जिनमें केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाएं, या सरकारी सार्वजनिक उपक्रम अदालती कटघरों में खड़े हुए हैं। जब सरकार हांकने वाले लोग ही ऐसे काम करेंगे कि उनके खिलाफ मुकदमे चलते रहें, तो जाहिर है कि अदालतों की ताकत का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों पर खर्च हो रहा है। फिर अदालत की ताकत का एक दूसरा बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों पर खर्च होता है जो कि पैसों की ताकत रखते हैं, महंगे वकील करते हैं, सुबूत और विशेषज्ञ जुटाते हैं, और बरसों तक अदालतों को किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने देते। अब जिस देश में सुप्रीम कोर्ट इस बात पर दर्जनों बार सुनवाई कर चुका है कि सुब्रत राय सहारा को जेल में कितनी सहूलियतें कितने दिनों तक दी जाएं, कितना बड़ा दफ्तर दिया जाए, इंटरनेट दिया जाए या न दिया जाए, वहां पर आम लोगों के हितों से जुड़े हुए मामलों के लिए सुनवाई का वक्त कैसे निकलेगा? जहां पर एक-एक फिल्मी सितारे के मामलों की सुनवाई के लिए देश के सबसे दिग्गज वकील भीड़ बनाकर अदालत पर दबाव बनाते हैं, वहां पर व्यापक जनहित के मामलों की तारीखें बढ़ते चले जाना तय है। 
फिर अदालत तारीखों को बढ़ा-बढ़ाकर एक ऐसी नौबत ला देती है जिसमें बेकसूर शिकायतकर्ता का हौसला टूट जाता है, और मुजरिम मजे में घूमते रहता है। हिन्दुस्तान में आजादी की करीब पौन सदी बाद भी लोग आज तक यह कहते हैं कि भगवान कोर्ट-कचहरी से बचाए। यह नौबत पूरे देश में नीचे से लेकर ऊपर तक की अदालतों में आम है, और अगर लोगों के पास मुकदमेबाजी में खर्च करने के लिए बहुत सारा पैसा नहीं है, तो इंसाफ तक के लंबे सफर में वे बीच में ही दम तोड़ देते हैं। यह सिलसिला जब तक नहीं बदलेगा, तब तक कई किस्म की नई अदालतें खड़ी करने से कोई सस्ता इलाज नहीं मिलेगा। हर नई अदालत जनता पर बोझ बनकर आएगी, और यह नौबत इस गरीब देश के लिए ठीक नहीं है। इलाज तो अदालती तौर-तरीकों को चुस्त-दुरूस्त और ईमानदार बनाने से ही आएगा। आज आम जनता का अनुभव यह है कि जांच एजेंसियों से लेकर वकीलों तक, गवाहों से लेकर सुबूतों तक, और जजों तक, किसी न किसी स्तर पर खरीदी की एक संभावना निकल आती है, और ताकतवर लोग इंसाफ या फैसले को अपने पक्ष में करवा लेते हैं। 
आज जरूरत है बाकी तमाम बातों को करने के साथ-साथ अदालतों में तारीखों को बढ़ाने और बढ़वाने के अंतहीन सिलसिले को खत्म करने की। अगर अदालती इंसाफ, या बेइंसाफ भी, वक्त पर नहीं आता, तो उससे जनता का भरोसा खत्म हो जाता है। जो बातें हम कर रहे हैं, वे देश की इस सबसे बड़ी न्याय-कांफ्रेंस में इतनी खुलकर नहीं हो पाएंगी, लेकिन अदालतों के जानकार हर कोई यह जानते हैं कि हकीकत इससे भी बहुत बुरी है। हर संस्था अपने ढांचे को बढ़ाना चाहती है, और भारत की अदालतें भी इससे अलग नहीं हैं। लेकिन इतनी ही क्षमता को बेहतर इस्तेमाल करके, बदनीयती से तारीखें बढ़वाने का सिलसिला खत्म करके नीचे से ऊपर तक के जज इंसाफ को तेज रफ्तार कर सकते हैं। इसके साथ-साथ एक बात यह भी जरूरी है कि अदालतों में भ्रष्टाचार की बहुत ही स्पष्ट जनधारणा है, और इस बुराई को खत्म करने के बारे में भी भारतीय न्यायपालिका को अपने विशेषाधिकार छोड़कर, अपने को पारदर्शी बनाकर रास्ता निकालने के बारे में सोचना चाहिए। 

गैरजरूरी विवादों में उलझता हुआ देश

संपादकीय
4 अप्रैल 2015

भारत जैसे विशाल देश में विविधताओं का सम्मान करते हुए कई तरह के विवादों से बचने की कोशिश होनी चाहिए। खासकर धर्म और जाति के आधार पर, निजी जिंदगी को लेकर, जितने तरह के विवाद और बखेड़े हो रहे हैं, उनसे तो बचने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए। हम राजनीतिक दलों के नेताओं की गंदी जुबान से निकलती नफरत की बातों पर कई बार लिख चुके हैं, लेकिन उससे परे भी कुछ मुद्दे हैं जिन पर बात होनी चाहिए। अब जैसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ईसाइयों के एक बड़े त्यौहार गुडफ्राईडे के दिन देश भर के मुख्य न्यायाधीशों, मुख्यमंत्रियों, और प्रधानमंत्री का सम्मेलन रख दिया। एक वकील और एक जज ने इसका विरोध भी किया, तो भी मुख्य न्यायाधीश अड़े रहे, और उन्होंने गिनाया कि पहले भी दूसरे त्यौहारों पर, स्वतंत्रता दिवस पर जजों की ऐसी कांफ्रेंस होती रही है, और अदालतों का समय बचाने के लिए छुट्टी के दिन वे इसे कर रहे हैं। 
इसके पहले एक खबर यह आई कि गोवा सरकार ने सरकारी छुट्टियों की लिस्ट से गांधी जयंती का नाम हटा दिया था। बाद में इसका विरोध हुआ और सरकार ने इसे टाइपिंग की गलती बताकर इसे फिर जोड़ा। यहां यह याद दिलाने की जरूरत है कि कुछ बरस पहले भी गोवा में भाजपा की सरकार के रहते हुए एक बार और इसी तरह गांधी जयंती की छुट्टी हटाई गई थी। कहीं कोई सोनिया गांधी के रंग पर भद्दी बात कह रहा है, तो कहीं कोई नाइजीरिया के लोगों को बदसूरती की गाली की तरह इस्तेमाल कर रहा है। और फिर इसके जवाब में लालू यादव ने एक दूसरे किस्म की भद्दी बात कही कि सोनिया के खिलाफ गंदा बयान देने वाले केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को चूडिय़ां पहनानी चाहिए, और मांग में सिंदूर भरकर...। फिर भाजपा के दो सांसद सिगरेट को बचाने के लिए ऐसी भयानक अवैज्ञानिक बातें कह रहे हैं कि मानो वे तम्बाखू उद्योग के जनसंपर्क अधिकारी हों। कहीं कोई राहुल गांधी के बारे में कुछ कह रहा है, तो कहीं किसी और के बारे में। 
भारत में धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग, बोली इन सबको लेकर जितने तरह की अलग-अलग बिरादरियां हैं, उन सबका साथ रहना तभी हो सकता है जब उनके बीच एक-दूसरे के लिए परस्पर सम्मान हो, और एक-दूसरे के लिए कुछ या अधिक हद तक बर्दाश्त हो। आज पूरा देश खानपान के फर्क को लेकर उबल रहा है, जिस धर्म और जाति के भीतर गोमांस को खाने का पौराणिक काल से अब तक का इतिहास रहा है, वह भी आज मानो एक-दूसरे धर्म, या हिन्दू धर्म की ही दूसरी जातियों पर हमला करने के लिए, उनका रोजगार छीनने के लिए, उनकी जीवन शैली पर अपने किस्म की सनातनी जीवन शैली लादने के लिए टूट पड़ा है। एक तरफ तो केन्द्र की भाजपा सरकार के पर्यावरण मंत्री यह कहते हैं कि देश में हर गाय-भैंस पेट में 40 किलो पॉलीथीन लेकर जीते हैं, और दूसरी तरफ इन पशुओं के लिए जीने के किसी इंतजाम के बिना लोग उनको कसाइयों से बचाने को एक धार्मिक और साम्प्रदायिक मुद्दा बनाकर चल रहे हैं। यह सिलसिला न सिर्फ देश के अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने का खतरा खड़ा करेगा बल्कि खुद हिन्दू समाज के भीतर गोमांस खाने वाले एक बहुत बड़े तबके को भी सनातनी हिन्दू तबके से अलग कर देगा, जो कि हजारों बरस से अलग-थलग चले भी आ रहा था। आज अगर भाजपा सरकारों में, भाजपा में कोई यह सोचे कि हिन्दू समाज में हर कोई गोमांस खाने के खिलाफ है, तो यह हकीकत के बिल्कुल उल्टी बात है। हिन्दू समाज के भीतर बहुत बड़ी आबादी के लिए सस्ते मांस के रूप में गोमांस, गोवंश का मांस ही उपलब्ध है। 
आज देश-प्रदेश के मंत्रियों से लेकर सत्तारूढ़ पार्टियों तक के नेता जिस तरह की बेकाबू बातें कर रहे हैं, जिस तरह की गंदी जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनसे देश में एक तनाव बढ़ते चल रहा है, और संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश के इस माहौल को और बिगडऩे से बचाने के लिए देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। ऐसे विवादों पर प्रधानमंत्री को चुप रहने का हक नहीं मिल सकता। 

मां को घर से निकालने वाले बेटे ने बहन को मारा कि...

संपादकीय
3 अप्रैल 2015
छत्तीसगढ़ में दो दिन पहले एक सामाजिक बदलाव की खबर थी कि एक हिन्दू महिला के गुजरने पर उसके बेटी ने उसे कंधा दिया, और उसका दाह संस्कार किया।  लेकिन दो दिन गुजरे नहीं थे कि यह भयानक खबर आई कि इस बेटी के भाई ने कुल्हाड़ी से इस बहन के टुकड़े कर दिए, इसलिए कि मां की संपत्ति उसे न मिल जाए। और मां को इस बेटे ने पहले ही घर से निकाला हुआ था, और वह बेटी के साथ रहती थी, यह चाहती थी कि बेटी ही उसका दाह संस्कार करे। 
नवरात्रि खत्म हुई ही है कि ये दो खबरें आ गई। देवी की पूजा-उपासना करने वाला भारत का हिन्दू समाज साल में दो बार नवरात्रि पर, दुर्गा पूजा पर, लक्ष्मी और सरस्वती पूजा पर, काली और संतोषी मां की पूजा पर साल भर दर्जनों दिन लगाता है। देवी के गुणगान के गीत लाउडस्पीकर पर चलते रहते हैं, और वैष्णो देवी से लेकर हर प्रदेश के देवी मंदिरों तक भक्तों का सैलाब रहता है। लेकिन देश के बाकी धर्म और समुदायों के लोगों की तरह इस समाज में भी जिंदा देवियों के खिलाफ हिंसा बेहिसाब है। अजन्मी कन्या को गर्भ में मारने से लेकर बच्चियों से बलात्कार, दहेज हत्या से लेकर विधवा प्रथा तक, और कहीं-कहीं सती बनाने तक, महिलाओं से हिंसा का मानो देश में सैलाब आया हुआ है। बहुत से धर्म तो ऐसे हैं जिनमें देवियों की कोई कल्पना या धारणा नहीं है, लेकिन हिन्दू धर्म तो देवी पूजा से भरा हुआ धर्म है, और इस धर्म से तो यह उम्मीद की जाती है कि यह इस प्रतीक-पूजा से परे असल जिंदगी में भी लड़कियों और महिलाओं का थोड़ा सा सम्मान करे। 
अब छत्तीसगढ़ की इस ताजा भयानक घटना को देखें, तो एक बूढ़ी मां को बेटा घर से निकाल चुका है, और बेटी अपनी मां का सहारा है, उसी के पास मां रह रही है। देश में बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल की जिम्मेदारी के लिए कानून तो बना हुआ है लेकिन हकीकत यह है कि जिस देश में वृद्धावस्था पेंशन के लिए भी लोगों को रिश्वत देनी पड़ती हो, वहां पर बेटे से गुजारा-भत्ते का मुकदमा लडऩा आसान तो है नहीं। खैर, लड़कियां वैसे भी मां-बाप का अधिक ख्याल रखती हैं, और इस मामले में भी मां की मर्जी के मुताबिक लड़की ने उसका अंतिम संस्कार किया। और जब मौत के दो दिन बाद तालाब पर नहाने की रस्म चल रही थी, तो इस जिम्मेदार बेटी के भाई ने अपने बेटे के साथ आकर कुल्हाड़े से उसकी हत्या कर दी। 
यह वही छत्तीसगढ़ है जहां पर हर कुछ हफ्तों में पुलिस तक ऐसा मामला पहुंचता है जिसमें किसी महिला को टोनही बताकर उसे प्रताडि़त किया जाता है, उसे मारा जाता है, या मार डाला जाता है। यह समाज भी बराबरी की सोच न होने का नतीजा है। जिन समाजों में महिला को बराबर या लगभग बराबर माना जाता है, वहां पर महिला पर इस तरह के जुल्म कम होते हैं। छत्तीसगढ़ में ही आदिवासी समाज ऐसा है जिसमें महिला के अधिकार गैरआदिवासी समुदायों के मुकाबले अधिक बराबरी के हैं। बस्तर के आदिवासी समाजों में देखें तो रोजमर्रा के रीति-रिवाज और मनोरंजन महिला को लगभग बराबरी का हक मिलता है। इसलिए यह सोचना बेकार है कि शहरी समुदायों में, अधिक पढ़े-लिखे समुदायों में, संपन्न समाज में बराबरी अधिक है। 
छत्तीसगढ़ बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा के मामले में देश में सबसे अधिक हिंसक राज्यों में से एक है। और इस किस्म के निजी जुर्म अमूमन रोके जाने वाले नहीं होते। पुलिस जुर्म के पहले किसी की नीयत का अंदाज नहीं लगा सकती। जब तक समाज में लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक केवल सजा से मर्दानी हिंसा रूकते नहीं दिखती। और देश भर के आंकड़े बताते हैं कि तीन बरस पहले के अतिचर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद से भी अब तक इस देश में बलात्कार के मुकदमों में सजा के न आंकड़े बदले हैं, न उनकी रफ्तार बदली है। अब महिला आरक्षण की तरह महिला पर हिंसा या जुर्म के मामलों के लिए अलग से ही अदालतें बनें, और वे तेजी से गुनहगार को सजा दे सकें, तो क्या ऐसे जुर्म कम होंगे? इसके बारे में कानून और समाज के जानकार तबकों को सोचना चाहिए। फिलहाल इस तरह के निजी जुर्म सरकार या पुलिस शायद ही रोक पाए, समाज खुद चाहे तो इनमें कमी आ सकती है। 

सोच से शुरू होकर शौच तक कामयाबी की कहानियां...

संपादकीय
2 अप्रैल 2015

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि एक आइडिया बहुत अच्छी हो सकती है लेकिन अगर उस पर अमल के लिए संस्थागत ढांचा नहीं रहेगा, तो वह आइडिया किसी काम की नहीं रह जाती। बात बड़ी सरल है, लेकिन बहुत अहमियत रखने वाली है। लोगों की सोच, लोगों के विचार, उनके मन में उगती और पनपती योजनाएं बहुत अच्छी हो सकती हैं, लेकिन अगर उन्हें पूरा करने के लिए सरकारी या किसी गैरसरकारी ढांचे की क्षमता न हो, तो वैसी सोच समाज के काम नहीं आ सकती। 
मिसाल के लिए हम देश भर में सार्वजनिक शौचालय शुरू करने वाले बिन्देश्वरी पाठक को देखें। शौचालय बनाने के लिए जो ईंट-गारा लगता है, वह तो पाठक के पैदा होने के सैकड़ों बरस पहले से दुनिया में मौजूद था। लेकिन इसे एक सार्वजनिक सेवा के रूप में कैसे शुरू किया जाए, कैसे कामयाबी से चलाया जाए, इसका इंतजाम तो ब्राम्हण समाज से आए हुए एक बिन्देश्वरी पाठक ने ही किया, कामयाबी से किया, और अब वे भारत के बाहर भी कई देशों में इस काम को कर रहे हैं। भारत में हर शहर-कस्बे में सुलभ शौचालय अगर न बने होते, न चलते होते, तो लोग तो सड़कों के किनारे ही फारिग होते रहते। और शौचालय बनाने के लिए किसी रॉकेट-साईंस की जरूरत भी नहीं थी। 
इसी तरह हिन्दुस्तान में कुछ और बहुत ही मौलिक प्रयोग सफल हुए हैं। इनमें से एक गुजरात के आनंद में डेयरी उद्योग का रहा। वहां पर सहकारिता के आधार पर दूध उत्पादन से लेकर दूध की मार्केटिंग तक, और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से मुकाबला करते हुए मक्खन और चॉकलेट जैसे डेयरी-उत्पाद कामयाब बनाने में इस को-ऑपरेटिव ने जो मिसाल कायम की, उससे देश भर में सहकारिता क्षेत्र के भ्रष्टाचार के मुकाबले एक बिल्कुल ही अलग तस्वीर सामने आई। आज देश के एक कोने से शुरू हुई यह श्वेत क्रांति हिन्दुस्तान की एक सबसे सफल कहानी बन चुकी है। 
अब एक दूसरे कोने केरल से वामपंथी मजदूर आंदोलन के बीच से शुरू हुए इंडियन कॉफी हाऊस को देखें, तो उसकी कामयाबी कश्मीर से कन्याकुमारी तक, और गुजरात से असम तक बिखरी हुई है। किस तरह से एक मजदूर संगठन सहकारिता के आधार पर पूरे देश में एक सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद खानपान की जगह शुरू करके उसका मानो आसमान तक विस्तार कर चुका है, यह कहानी बहुत ही अनोखी और हैरान करने वाली है। इसके साथ ही मुंबई में पांच-दस लाख लोगों तक रोज टिफिन पहुंचाने वाले लोगों को देखें, तो वह भी एक अजीब किस्म की कामयाबी है। और इस तरह की दर्जनों सोच लोगों के मन में हो सकती हैं, लेकिन जब तक उस पर अमल करने के लिए लोगों का, सरकार का, या संगठन का कोई ढांचा न रहे, कुछ नहीं हो सकता। 
प्रधानमंत्री ने सोच की अहमियत को कम नहीं किया है, बल्कि उसके साथ-साथ, और उसके बाद, अमल के लिए जरूरी ढांचे की अहमियत को गिनाया है। हम बाजार में यह देखते हैं कि कोई बहुत अच्छा प्रोडक्ट भी कमजोर मार्केटिंग की वजह से फ्लॉप हो जाता है, और कोई औसत दर्जे का प्रोडक्ट भी कामयाब मार्केटिंग की वजह से हिट हो जाता है। खुद मोदी की कामयाबी के बारे में लोगों का यह मानना है कि वह एक बहुत कामयाब मार्केटिंग की उपज है, और इस मार्केटिंग के लिए भाजपा, आरएसएस, एनआरआई, कई किस्म की ताकतें लगी हुई थीं। इसलिए मोदी जब यह कह रहे होंगे, तो हो सकता है कि उनके दिमाग में अपनी खुद की कामयाबी रही हो।

परिवार में जितने लोग, उतना ही चावल सही

संपादकीय
1 अप्रैल 2015

छत्तीसगढ़ सरकार ने रियायती चावल को लेकर अब यह नया इंतजाम किया है कि परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर लोगों को चावल कम या अधिक मिलेगा। अब तक एक परिवार के राशन कार्ड पर हर महीने 35 किलो रियायती चावल मिलता था, चाहे परिवार के सदस्य कितने ही हों। ऐसे में ये शिकायतें भी सामने आती थीं कि लोगों ने राशन के लिए परिवार अधिक गिना दिए थे, या फिर जिन परिवारों में एक-दो ही सदस्य हैं उन्हें भी उतना ही चावल मिलता था, जितना कि पांच-दस सदस्यों वाले परिवार को। अब परिवार के सदस्य अधिक होने पर चावल अधिक मिलेगा, और कम होने पर कम मिलेगा। 
राज्य सरकार की राशन की यह रियायत सबसे गरीब तबके को भी पेट भर खाना मिल सके, इसलिए शुरू की गई थी। और कई बरस पहले जब गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की शिनाख्त करनी थी, तब सुप्रीम कोर्ट की राय के मुताबिक राज्य सरकार ने केन्द्र और राज्य के कई अलग-अलग पैमानों में से किसी भी एक पैमाने पर गरीब साबित होने वाले लोगों को इस रियायत का फायदा देना शुरू कर दिया था। बाद के बरसों में जब सरकार ने लोगों की जांच करना शुरू की, तो पता लगा कि लाखों लोग ऐसे थे जो कि गरीब न रहते हुए भी फायदा पा रहे थे, और जब उनके राशन कार्ड रद्द होने शुरू हुए, तो लोगों की नाराजगी भी सरकार को झेलनी पड़ी। लेकिन बिना जांच अगर कोई रियायत मिलने लगी है, तो उसका जल्द से जल्द खत्म करना भी जरूरी है। राज्य सरकार का चावल का फैसला ठीक है, और इससे यह जरूर हो सकता है कि कुछ लाख परिवारों का चावल कम हो जाए, और कुछ लाख परिवारों का चावल बढ़ जाए। लेकिन कुछ लोगों को रियायत में अगर कमी भी होती है तो भी रियायत का तर्कसंगत और न्यायसंगत होना जरूरी है, क्योंकि सरकारी खजाना तो कुल मिलाकर जनता का ही है, और गैरजरूरी रियायत से प्रदेश के दूसरे काम रूकते हैं। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि केन्द्र सरकार ने अभी पूरे देश के लोगों से यह अपील की है कि अगर वे बहुत जरूरतमंद नहीं हैं, तो वे रसोई गैस की सरकारी रियायत का फायदा न लें। 
लेकिन इस बारे में बात करते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि आज पूरे प्रदेश में जिस नान-घोटाले की चर्चा चल रही है, और एंटी करप्शन ब्यूरो पूरे प्रदेश से चावल के नमूने इक_े कर रहा है, उससे यह साबित होने जा रहा है कि गरीबों के लिए भेजे गए, और भेजे जा रहे चावल में कनकी और उससे भी बारीक चूरा मिला हुआ रहता था, रहता है, और इसी भ्रष्टाचार का हिस्सा-बांटा सरकारी छापे में सामने आया है। इसी तरह नमक में भ्रष्टाचार पकड़ाया है कि उसमें जितना आयोडीन होना चाहिए था, वह नहीं था, और उसमें बड़ा भ्रष्टाचार चल रहा था। एक वक्त नमक को लोगों की ईमानदारी से जोड़कर देखा जाता था, क्योंकि किसी इंसान के खाने में सबसे कम लागत का सामान नमक ही रहता था, आज भी रहता है। ऐसे में राज्य सरकार ने गरीबों को मुफ्त नमक देने की जो योजना बनाई थी, उस अमृत नाम के नमक में भी जब बेईमानी होने लगी, तो उसके लिए शब्दकोष में एक बड़ा आसान सा शब्द है, नमकहराम। लोगों ने नमक तक को नहीं छोड़ा था। 
आज जब हम राज्य सरकार की नई रियायती चावल नीति को सही ठहरा रहे हैं, तो इसी वक्त हम सरकार के ईमानदार अमले से यह उम्मीद भी करते हैं कि गरीबों के सामान में लूटपाट बंद करने की कोशिश करें। सरकार में बहुत से लोग हमेशा ही ईमानदार रहते हैं, और उनको अपनी ताकत लगाकर ऐसी बेईमान को रोकने में सबसे पहले मेहनत करनी चाहिए, जिसकी मार सबसे गरीब तबके पर सबसे अधिक पड़ती है। राज्य सरकार के पास अब भी अपने इंतजाम को सुधारने की बहुत गुंजाइश है। एक वक्त छत्तीसगढ़ का पीडीएस पूरे देश में और विदेशों में भी मशहूर था। उसी विभाग और उसी योजना में इतना बड़ा संगठित भ्रष्टाचार राज्य के खजाने के साथ-साथ राज्य की साख के लिए भी खराब है, और इस पर तुरंत कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए। 

मौत के सौदागरों के मददगार सांसद

31 मार्च 2015
संपादकीय
भाजपा सांसद दिलीप गांधी की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने सरकार से 'गंभीरÓ मांग की है कि वह तंबाकू के पैकेट पर तस्वीरों में छपी चेतावनी का आकार 40 प्रतिशत से बढ़ाकार 85 प्रतिशत करने का अपना प्रस्ताव रोक ले। इस बारे में भाजपा सांसद का तर्क है कि सिगरेट से कैंसर का रिश्ता जोडऩे वाले सारे शोध दूसरे देशों में हुए हैं, और भारत में कोई भी नहीं। इस समिति ने सरकार से कहा है कि यह साबित करने वाला कोई भारतीय अनुसंधान नहीं है कि तंबाकू के सेवन से कैंसर होता है। कैंसर सिर्फ तंबाकू के कारण नहीं होता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में  अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चार करोड़ लोगों की जीविका तेंदूपत्ता से बीड़ी बनाने से चलती है। 
देश में जो कारोबारी तबके सबसे अधिक दबदबा सरकार पर लगातार रखते हैं, उनमें सिगरेट-तंबाकू उद्योग सबसे अधिक जानलेवा है। हर बार तंबाकू मजदूरों की रोजी-रोटी गिनाई जाती है, और तंबाकू का इस्तेमाल हटाने की कोशिशों पर पानी फेर दिया जाता है। जबकि ऐसे मजदूरों की कमाई से सैकड़ों गुना अधिक खर्च केंद्र और राज्य सरकारों को तंबाकू के शिकार गरीबों के इलाज पर करना पड़ता है। और इस खर्च से भी सबकी जान बच जाती है, ऐसा नहीं है। तंबाकू से होने वाले नुकसान की भरपाई इलाज से हो ही नहीं पाती, और दूसरी तरफ इसकी वजह से आसपास के लोगों को भी कहीं धुआं झेलना पड़ता है, तो कहीं बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है। यह सिलसिला पूरी तरह थमना चाहिए, और महज जागरूकता से लोगों का तंबाकू छूटने वाला नहीं है, इसके लिए कड़े कानून, कड़े अमल, और आक्रामक-असरदार प्रचार सबकी जरूरत है। 
भाजपा सांसद का यह कहना अपने-आपमें कुछ हंसी की बात भी है कि सिगरेट से कैंसर के रिश्ते पर शोध कार्य भारत में कुछ भी नहीं हुआ है। ऐसा कहकर वे अपने ही कई साथियों को निराश कर रहे हैं, जिनका मानना है कि हर मामले में पहला वैज्ञानिक शोध भारत में ही हुआ है। अब हजारों बरस से भारत में धूम्रपान चले आ रहा है, और अब तक इस पर यहां शोध कैसे नहीं हुआ था, यह बात वैदिक-विज्ञान के जानकारों से पूछनी चाहिए। दूसरी बात यह कि चिकित्सा विज्ञान की कोई शोध अगर दूसरे देशों में ही हुई है, और उसका कोई इस्तेमाल तब तक भारत में नहीं होना चाहिए, जब तक कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी रिसर्च न हो जाए, तो फिर भारत को आज की चिकित्सा की तकरीबन हर मशीन को, और हर ऐलोपैथिक दवाई को देश-निकाला दे देना पड़ेगा। यह एक बहुत ही खोखला तर्क है कि भारत में कोई शोध जब सिगरेट और कैंसर का रिश्ता कायम करेगा, तब ही भारत को ऐसे खतरे को मानने की जरूरत होगी। यह एक बहुत ही अवैज्ञानिक सोच है, और यह एक कारोबार को मौत बेचने की छूट देकर जनता को मौत खरीदने के लिए बढ़ावा देने जैसी बात है। 
हम तंबाकू से जुड़े रोजगार का हवाला देकर मौत बढ़ाने के खिलाफ हैं। यह केंद्र और राज्य सरकारों की मिली-जुली और अलग-अलग जिम्मेदारी है कि जानलेवा खेती और जानलेवा कारोबार को खत्म करके उनमें लगे हुए मजदूरों के लिए किसी और रोजगार का इंतजाम करे। यह काम बहुत मुश्किल और नामुमकिन नहीं है, और चौथाई सदी से चले आ रहा यह तर्क अब और जिंदगियां खाने के लिए नहीं बढ़ाना चाहिए।
भारत में हर साल करीब 9 लाख लोग तंबाकू से पैदा बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। और यह संख्या चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है। जानकारों का मानना है कि इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 15 लाख तक पहुंच जाएगा। और भारत की इस संसदीय समिति को अगर यह खतरनाक नहीं लग रहा है, और उसे लग रहा है कि कोई भारतीय शोध इसे साबित करे, तब तक सिगरेट के पैकेटों पर खतरनाक तस्वीरों की जरूरत नहीं है, तो जनता ऐसे रूख के पीछे कारोबार से दोस्ती का शक जरूर करेगी।

बुरा वक्त चि_ी लिख नहीं आता अच्छे वक्त में तैयारी ही समझदारी

संपादकीय
30 मार्च 2015
कश्मीर एक बार फिर बाढ़ से घिरा है और श्रीनगर से लेकर जम्मू तक अलग-अलग कई जगहों पर बाजार और बस्तियां डूबे हुए हैं। गर्मियों के इस मौसम में जब कश्मीर को कुछ महीने पहले की बाढ़ का कुछ सैलानी-मुआवजा मिलने का आसार था, कश्मीर फिर बाढ़ का शिकार हो गया। कुछ हिस्सों में सड़कें बर्फ से बंद हैं, कई शहर बाढ़ में अगली बर्बादी की कगार पर हैं। इससे बिल्कुल अलग कुछ अलग-अलग और खबरें भी हैं। मुम्बई में एक बड़े अस्पताल में एक गर्भवती महिला ने चार दिन पहले अपना बच्चा खोया, और वह अस्पताल के बिस्तर पर ही थी कि कल उसके सिर पर छत का पंखा गिर गया। उत्तरप्रदेश में गाज गिरी और कुछ लोग मौके पर ही मारे गए, कुछ लोग झुलस गए। दुनिया के कुछ और देशों में सुनामी की चेतावनी सुनाई पड़ रही है। और साल के हर दिन हर पल कहीं न कहीं हादसों में लोगों की जान ऐसे जाते रहती है, ऐसे नुकसान होते रहते हैं जिनके बारे में उन्होंने कुछ पल पहले भी सोचा नहीं होगा। 
दूसरी तरफ इंसानों से दूर, शहरी पढ़ाई-लिखाई से नावाकिफ चीटियां बारिश के जिस मौसम में बाहर खाना नहीं पा सकतीं, वैसे आड़े वक्त के लिए वे एक पूरे समुदाय के रूप में खाना इक_ा करके रखती हैं, ताकि भूखों मरने की नौबत न आए। लेकिन अगर हम सोचें कि इंसानों में कितने लोग बुरे वक्त की सोचकर, अपने अच्छे वक्त में कुछ किफायत और कुछ कटौती करके मुसीबत से जूझने की कुछ तैयारी करके रखते हैं, तो हम आईना देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकते। कम ही लोग ऐसे रहते हैं जो कि किसी मुसीबत का अंदाज लगाकर वक्त रहते कुछ बचत करें, कुछ बीमा करवाएं, और किफायत में काम चलाएं। यह बात सही है कि हमारी इस मसीहाई नसीहत का सलीब ढोने की गुंजाइश आज के थके हुए और लदे हुए मध्यमवर्गीय या निम्न आय वर्ग के लोगों के कंधों में बची नहीं है। लोग आज का काम ही बड़ी मुश्किल से चला पाते हैं। लेकिन अगर चीटियों सहित कुछ और समझदार नस्लों से सबक लें, तो अच्छे वक्त में थोड़ा सा वक्त बुरे के हिसाब से भी अलग रखना चाहिए। मुसीबत की मार के वक्त तो कुछ भी नहीं सूझता, कुछ भी नहीं बचता। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में हम देखते हैं कि कर्ज से लदे किसान जब थोक में खुदकुशी करते हैं, तो यह जाहिर रहता है कि एक फसल की बर्बादी भी वे झेल नहीं पाते। लेकिन यह बात भी सच है कि आत्महत्या के पहले की कई बरसों में फसलों से उनका कुछ न कुछ काम चल रहा था, और उस वक्त कुछ अधिक तकलीफें झेलकर कुछ अधिक बचत कर ली होती, तो आज इतनी बुरी नौबत न आती कि जान देना ही अकेला रास्ता बचता। 
हम कोई नई बात नहीं कह रहे, और न ही कोई बहुत मौलिक बात। हम तो दुनिया के सयाने लोगों की हमेशा की दी गई नसीहत को दुहरा रहे हैं, ताकि जिन लोगों को इसे पढ़कर आज से ही कुछ बचत और कुछ किफायत सूझ सके, उन लोगों को आज मामूली तकलीफ झेलकर भी ऐसा करना चाहिए, ताकि आड़े वक्त पर भी वे खड़े रह सकें। गाज गिरने से घर के कमाऊ लोग अगर एकदम से चले जाते हैं, तो घर-परिवार का क्या होगा, यह भी सोचने की बात है। केन्द्र सरकार ने गरीबों के लिए एक बहुत ही रियायती बीमा का इंतजाम किया है, और यह मदद पाने के हकदार वे ही लोग रहेंगे जो कि इसके कागज-पत्तर पूरे कर चुके रहेंगे। घर बैठे, बिना हाथ हिलाए कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए इस तरह के बीमे और बाकी हक की सरकारी रियायतें पाने के लिए लोगों को औपचारिकताएं पूरी करके रखना चाहिए। इसके बाद यह भी कि बीमारी, हादसे, या किसी और बुरे वक्त के हिसाब से लोगों को कुछ न कुछ बचत जरूर करनी चाहिए। धरती का स्वर्ग जिस कश्मीर को कहते हैं वहां कुछ महीने पहले की बाढ़ में जिंदगी ऐसी तबाह हुई थी कि अब तक पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है, और अब फिर बाढ़ है। ऐसे में बीमा और बचत ये ही लोगों के काम आ सकते हैं। ठोकर दूसरों लगती है, उसे देखकर बाकी लोग अगर सम्हल जाएं, तो उसी में समझदारी है।