धर्म को कान पकड़कर स्कूलों से बाहर निकाल देने की सख्त जरूरत

16 नवम्बर, 2015
संपादकीय 

ब्रिटेन की स्कूलों में धार्मिक प्रार्थनाएं बंद करने का विचार चल रहा है। लेकिन एक तरफ ब्रिटेन विचार ही कर रहा है दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि वहां एक नया कानून बना लिया गया है, और स्कूलों में धर्म की पढ़ाई को पूरी तरह से रोक दिया जा रहा है। अगर स्कूलें धर्म पढ़ाते मिलेंगी, तो उनको सजा दी जाएगी। और भारत में चारों तरफ फैलाई जा रही धार्मिक असहिष्णुता से लेकर पेरिस पर हुए ताजा धर्मांध हमले की खबरें तो हैं ही जिनके बाद आज से फ्रांस ने सीरिया की जमीन पर चल रहे आइसिस के आतंकी कैंपों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। 
दरअसल, जिंदगी में जो धर्म की जो जगह होनी चाहिए, उसे बढ़ाकर जिंदगी पर पूरी तरह और बुरी तरह थोप दिया जा रहा है। यह सिलसिला न सिर्फ जानलेवा हो रहा है, बल्कि दुनिया की तबाही भी साबित हो रहा है। देशों के बीच की तनातनी, आतंक से बचने और निपटने की महंगी तैयारी, कारोबार की तबाही, और लोगों की मानसिकता पर धर्मांध नफरत का वजन, इन सबके बढ़ते चलने से दुनिया की तरक्की एक टूटे हुए पांव की रफ्तार से चल रही है। लोगों के मन में एक-दूसरे देश के लिए, एक दूसरी संस्कृति के लिए, एक दूसरे धर्म के लिए जितना अविश्वास बढ़ता चल रहा है, जितना खून बह रहा है, वह भयानक है। और यह सब धर्म के नाम पर चल रहा है, शायद धर्म की वजह से चल रहा है। 
ऐसे में भारत में भी तमाम स्कूल और कॉलेजों से धर्म को पूरी तरह बाहर कर देना जरूरी है। जब धर्म किताबों में लिखी हुई अपनी कुछ अच्छी बातों से परे महज हिंसा के लिए इस्तेमाल हो रहा है, तो उसके बारे में कुछ सोचने की जरूरत है, और सार्वजनिक जिंदगी से उसकी दखल घटाने की जरूरत है। बच्चों को बचपन से ही अगर धर्म पढ़ाया जाए, और वे अपने चारों तरफ धर्म के नाम पर हिंसक इस्तेमाल ही देखते रहें, तो इससे उनकी मानसिकता पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। लोगों को धर्म को अपनी निजी आस्था तक सीमित रखना चाहिए, और सड़कों के किनारे अवैध कब्जों, अवैध निर्माण से लेकर सांप्रदायिक दंगों तक, नफरत और हत्या तक धर्म का इस्तेमाल खत्म करने का सिलसिला स्कूलों से ही शुरू करना पड़ेगा। 
ऑस्ट्रेलिया शायद कम्यूनिस्ट देशों के बाहर का पहला ऐसा देश है जिसने धर्म को कान पकड़कर स्कूलों से बाहर कर दिया है। दुनिया में जो और समझदार देश हैं, उनको भी इससे नसीहत लेनी चाहिए, खासकर भारत को। 
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भारत की राजनीति पर दलाई लामा का निहायत गैरजरूरी बयान

संपादकीय
15 नवंबर 2015
भारत में राजनीतिक शरण पर रह रहे तिब्बत के निर्वासित नेता दलाई लामा ने लोगों को बहस का एक और मौका दे दिया है। उन्होंने बिहार के चुनावी नतीजों को लेकर कहा कि ये नतीजे साबित करते हैं कि हिन्दू आबादी शांति और सद्भाव में यकीन करती है। अब भारत के राजनीतिक चुनावों को लेकर भारत में रह रहे एक धर्मगुरू का यह कहना एक राजनीतिक बयान के दर्जे में आता है, और कुछ लोगों ने उन्हें याद भी दिलाया है कि उन्हें यहां शरण मिली हुई है, यहां की राजनीति में हिस्सा लेने की जगह नहीं मिली है। दलाई लामा की कही हुई बातों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित इस बौद्ध धर्मगुरू का यह कहना कुछ अटपटा जरूर है। 
लोगों का दूसरे देशों में अलग-अलग दर्जा होता है, उन्हें कहीं पर काम करने की इजाजत मिलती है, और कहीं पर उन्हें केवल सिर छुपाने की जगह मिलती है। भारत में पड़ोस के देशों से आए हुए शरणार्थियों को जगह देने का लंबा इतिहास रहा है। यहां बांग्लादेश बनने के पहले के पूर्वी पाकिस्तान से आए हुए लाखों शरणार्थी कभी लौटे नहीं। उधर तिब्बत से आए हुए लाखों लोगों को भारत सरकार ने कई प्रदेशों में उनके माकूल मौसम वाले इलाकों में बसाया है, जिनमें छत्तीसगढ़ के मैनपाट का नाम भी है। और छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी शरणार्थियों की भी बड़ी पुरानी बसाहट है, उसके भी पहले पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी छत्तीसगढ़ में बसे हुए हैं। नेपाल से दसियों लाख लोग भारत में आकर काम करते हैं, बर्मा के लोग यहां रहते हैं, और भूटान के लोग भी। भारत की इस दरियादिली के बीच लोगों को यह शिष्टाचार निभाना चाहिए कि जिन शर्तों पर उनको यहां रहने की इजाजत मिली है, उनसे परे जाकर वे कोई ऐसा काम न करें जिससे कि भारत सरकार पर जनता के किसी हिस्से का यह दबाव आए कि ऐसे लोगों को बाहर निकाला जाए। लोगों को याद होगा कि बांग्लादेश से निकाली गई, या वहां न जा पा रही लेखिका तस्लीमा नसरीन लंबे समय से भारत में बसी हुई थीं, और यहां के कट्टरपंथी मुस्लिमों की नाराजगी के बावजूद भारत सरकार ने उनको यहां पर रहने की इजाजत दी, और बहुत खर्चीली हिफाजत भी अपनी तरफ से मुहैया कराई। कई बार तस्लीमा को लेकर यह विवाद उठता था कि सरकार इतनी खर्चीली शरण क्यों दे रही है? 
लेकिन आज हम इस मुद्दे पर एक दूसरी वजह से भी लिख रहे हैं। आज खाड़ी के देशों से लाखों मुस्लिम जान पर खेलते हुए योरप के देशों तक पहुंच रहे हैं और वहां शरण मांग रहे हैं, पा भी रहे हैं। लेकिन योरप में जगह-जगह स्थानीय लोग उनका विरोध भी कर रहे हैं, उनको शरणार्थियों के साथ आतंकियों के आने का भी डर है, और उनको एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा होने की आशंका भी है। कुछ जगहों पर जिन गांवों में सैकड़ों सीरियाई शरणार्थियों को बसाया गया है, वहां पर गांवों की आबादी ही कुछ दर्जन ही थी। ऐसे में उन गांवों का पूरा हुलिया ही बदल गया है, और स्थानीय लोगों को इससे असुविधा महसूस हो रही है। अब ऐसे माहौल में अगर शरणार्थी जगह पाने के बाद स्थानीय सरकार के नियमों से टकराएं, वहां की संस्कृति से टकराएं, तो उनका अपना नुकसान भी होता है, और उनके बाद बाहर से शरण मांगते वहां पहुंचने वाले लोगों को जगह मिलने की संभावना भी कम हो जाती है। इसलिए लोगों को स्थानीय कानून, स्थानीय संस्कृति, और स्थानीय वातावरण का सम्मान करना भी सीखना चाहिए। आज पर्यटक वीजा लेकर लोग अगर किसी दूसरे देश में जाते हैं, और वहां पर राजनीति में हिस्सा लेने लगते हैं, तो उनको तो वहां से निकाला ही जा सकता है, उनके बाद वहां जाने का वीजा मांगने वाले लोगों के लिए दिक्कतें आ खड़ी होती हैं। लोगों को याद होगा कि भारत से संगीत-दलों में दूसरे देशों में जाने वाले लोग जब वहां पहुंचकर गायब हो जाते हैं, और वीजा खत्म होने पर भी नहीं लौटते हैं, तो वे अपने देश के बाकी लोगों के लिए एक परेशानी खड़ी कर देते हैं। हमारा मानना है कि दलाई लामा का यह राजनीतिक बयान निहायत गैरजरूरी है, और भारत में उनके दर्जे के माकूल भी नहीं है। वे खुद तो नोबल शांति पुरस्कार की वजह से कई तरह की रियायतें पा सकते हैं, लेकिन वे बाकी तिब्बतियों के लिए एक परेशानी खड़ी कर रहे हैं। 
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पेरिस पर आतंकी हमले से बाकी दुनिया भी नसीहत ले

संपादकीय
14 नवंबर 2015

फ्रांस की राजधानी पेरिस में कुछ घंटे पहले हुए एक अभूतपूर्व ताकत के आतंकी हमले ने करीब डेढ़ सौ नागरिकों को मार डाला है। कुछ बरस पहले भी मुंबई-हमले की तरह आतंकियों ने हथियारों से भारी लैस होकर, कई दस्तों में बंटकर, शहर के कई ठिकानों को लगभग एक ही वक्त निशाना बनाया, और बात की बात में उन्होंने इतने लोगों को मार डाला। पहली नजर में ऐसा माना जा रहा है कि इस्लामिक स्टेट नाम के एक आतंकी संगठन ने मध्य-पूर्व के देशों से बाहर निकलकर यह हमला किया है, और इसने एक बड़ी जटिल समस्या यह भी खड़ी कर दी है कि सीरिया और लीबिया जैसे मध्य-पूर्व के देशों से निकलकर जो लाखों शरणार्थी समंदर में जीते-मरते योरप पहुंच रहे हैं, अब उनका क्या होगा? एक अंदाज यह भी है कि मध्य-पूर्व में जगह-जगह काबिज इस्लामिक स्टेट नाम के इस सबसे खूंखार और कातिल आतंकी संगठन की कोशिश यह भी है कि योरप के बहुत से देश जिन शरणार्थियों को शरण दे रहे हैं, वे इस हमले के बाद अब अपने दरवाजे बंद कर लें, और सीरिया जैसे देशों के लोग इस्लामिक स्टेट के मौत के साए तले जीने को मजबूर रहें। लेकिन इससे परे भी कोई वजह इस हमले की हो सकती है, क्योंकि इसी फ्रांस के इसी पेरिस शहर में कुछ अरसा पहले कार्टून की एक पत्रिका से असहमत आतंकियों ने उसके कार्टूनिस्टों को मार डाला था, उनके काम को इस्लाम-विरोधी करार देते हुए ऐसे हमले जारी रखने की धमकी भी दी थी। 
आज एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या ऐसा कोई खूनी और आतंकी संगठन किसी धर्म का नाम लेकर एक संगठन खड़ा कर ले, तो क्या उसे धर्म के नाम के ऐसे बेजा इस्तेमाल की इजाजत देनी चाहिए? लेकिन हम हिन्दुस्तान में भी देखते हैं कि धर्म के नाम पर तरह-तरह का आतंक चल रहा है और हत्या और धमाकों वाले हमलों में भी धार्मिक नाम वाले संगठनों से जुड़े हुए लोग कई बार पकड़ाए हैं, और जेल में हैं, अदालती कटघरों में हैं। अब यह एक बड़ी अजीब समस्या है कि जब कोई संगठन अपने नाम को किसी धर्म के नाम पर जोड़कर खड़ा कर ले, तो उसकी इस आजादी को कैसे मनाही की जा सकती है, और कैसे उसे किसी धर्म के नाम का बेजा इस्तेमाल करने दिया जा सकता है? लेकिन इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि म्यांमार के बौद्ध लोगों से लेकर, हिन्दुस्तान के हिन्दू और मुस्लिम संगठनों तक, पाकिस्तान और मध्य-पूर्व के मुस्लिम संगठनों तक अगर धर्म के नाम पर भी आतंक फैलाया जा रहा है, और हिंसा की जा रही है, तो उनके अपराधों से धर्म को अलग कैसे किया जा सकता है? दुनिया का इतिहास गवाह है कि धर्म के आधार पर नफरत ने तमाम जंगों को मिलाकर भी हुई मौतों से अधिक मौतें धरती पर दर्ज की हैं। बल्कि दुनिया के इतिहास में भी बहुत सी जंग धर्म के आधार पर ही हुई हैं। इसलिए धर्म के भले लोग यह चाहें कि आतंक से जुड़े हुए उनके धर्म के बुरे लोग धर्म के नाम का इस्तेमाल न करें, तो यह रोक मुमकिन नहीं हैं। 
फिलहाल पेरिस पर हुए आतंकी हमले को देखें तो यह लगता है कि दुनिया में आतंक पर युद्ध छेडऩे के नाम पर अमरीका ने एक साजिश के तहत इराक और लीबिया जैसे कई देशों पर जो हमले किए, उसकी वजह से दुनिया में एक आतंकी-धर्मान्धता बढ़ी है, और आज खुद अमरीका को अपने आपको चौकसी करके ऐसे हमलों से बचा रहा है, लेकिन उसके पैदा किए हुए, या उसकी प्रतिक्रिया में पैदा हुए आतंकी संगठन दुनिया में जगह-जगह ऐसे हमले कर रहे हैं, और करते रहेंगे। इसलिए यह पूरा मामला, यह पूरी नौबत आसान नहीं है, और ऐसे में आतंक के खिलाफ एक कड़ी फौजी कार्रवाई की भी जरूरत है, लेकिन अमरीकी हमलों की तरह की नहीं, जिसमें कि लाखों बेकसूर मारे जाएं। अमरीका ने दुनिया में आतंक को समर्थन करके, खर्च करके भी बढ़ाया है, और बेकसूरों को मारकर भी। 
आज इस हमले से कुछ सौ लोग मारे गए हैं, और जख्मी हुए हैं, लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान उन लाखों शरणार्थियों का हुआ है, जिनकी अब योरप में गुजर-बसर और मुश्किल हो जाएगी। इस पूरे हमले के कई ऐसे पहलू हैं जिसे कि भारत को सबक लेना चाहिए, क्योंकि यहां भी जिस तरह धर्मान्ध-आक्रामकता बढ़ाई जा रही है, उसकी भी इस तरह की कोई प्रतिक्रिया किसी भी तबके से किसी दिन सामने आ सकती है। इसी तरह बाकी दुनिया को भी नसीहत लेने की जरूरत है।
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सवाल यह नहीं कि सवाली कितने हैं, सवाल यह कि सवाल क्या हैं?

संपादकीय
13 नवंबर 2015

ब्रिटेन की यात्रा पर पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत से असुविधाजनक सवालों का सामना करना पड़ रहा है। उनका स्वागत तो सरकार और भारतवंशी समुदाय की तरफ से हो रहा है, लेकिन अलग-अलग तबके छोटी संख्या में उनकी नीतियों के खिलाफ, और भारत के आज के हालात के खिलाफ बैनर लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, और भारत का एक तबका इन प्रदर्शनों को आकार से आंक रहा है। ये तमाम पहलू अलग-अलग नजरिए से सही हैं, और गलत भी हैं। विरोधी प्रदर्शन आकार में अगर छोटा है, तो उसे कमजोर या कम, महत्वहीन, या अनदेखा करने लायक मानना ठीक नहीं है। ऐसी ही अनदेखी के चलते भारत में बिहार के चुनावों में मोदी की पार्टी और गठबंधन की चुनावी बदहाली हुई है। और आज मोदी विदेशी जमीन पर भारत में आज फैली धर्मान्ध-हिंसा के खिलाफ कुछ शब्द चाहे बोल रहे हों, देश में भड़काई जा रही कट्टरता और साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनकी जो चुप्पी लगातार दर्ज हो रही है, उसे ब्रिटेन में बसे भारतवंशी भी देख रहे हैं, और ब्रिटेन की सरकार भी। 
हम पहले भी इसी जगह कुछ मौकों पर यह बात लिख चुके हैं कि गुजरात दंगों के अपने इतिहास से उबरकर, आगे निकलकर, एक बड़ा नेता बनने की जो संभावनाएं मोदी के सामने थीं, उनमें से एक का भी इस्तेमाल उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद से नहीं किया है, और वे महज एक प्रधानमंत्री भर बन पाए हैं, जिनके बारे में उन्हीं के सहयोगी दल शिवसेना ने चार दिन पहले ही यह लिखा है कि लोकसभा चुनाव में मोदी की असाधारण सफलता इस वजह से हुई थी क्योंकि उनके सामने राहुल गांधी जैसा विकल्प विपक्ष ने पेश किया था। यह अलग बात है कि राहुल गांधी के मुकाबले कांग्रेस का कोई और मजबूत विकल्प भी पेश होता, तो भी शायद यूपीए का हश्र वही होता, लेकिन मोदी की जीत, एनडीए की जीत, ऐसी असाधारण नहीं हुई होती। आज ब्रिटेन की जमीन पर पहुंचकर भी मोदी का यह दौरा जिन घरेलू सवालों से लदा हुआ है, उनसे उनको घर पर रहते हुए ही जूझना था, उनका सामना करना था, और अपने आपको एक बेहतर लीडर साबित भी करना था। कुछ लोगों के सामने बड़ा बनने की संभावनाएं ही नहीं रहती हैं, लेकिन कुछ लोगों के सामने वक्त ऐसी संभावना पेश करता है। मोदी इन सवालों से वर्तमान में तो बच सकते हैं, लेकिन इतिहास के भविष्य में, या भविष्य के इतिहास में कैसे बचेंगे? 
बिहार का चुनाव न तो मोदी की शुरुआत है, और न ही मोदी का अंत। लेकिन यह एक अहमियत वाला बड़ा पड़ाव जरूर है, और भाजपा के सयान-लोगों के आलोचना वाले बयान से परे भी यह एक ऐसा पड़ाव है जिसमें डेरे पर ठहरकर मोदी और उनके साथियों को यह सोचना चाहिए कि देश के माहौल में जो जहर घोला गया है, उसी जहरीली हवा से मोदी की जीत की संभावनाओं में किस तरह दम तोड़ दिया। आज मोदी के साथ एक दिक्कत यह है कि जिस सोशल मीडिया को वे अपनी कुर्सी तक पहुंचने की राह में इस्तेमाल करके आए हैं, उसी सोशल मीडिया पर उनके ऐसे नामलेवा लोग तमाम किस्म की हिंसा और साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, जिन लोगों को मोदी ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो मोदी हर किसी की हिंसा के लिए जवाबदेह न होने का तर्क देते हुए भड़काई जा रही साम्प्रदायिकता से अपने को अलग साबित कर देते, लेकिन जब भारत का प्रधानमंत्री, या नरेन्द्र मोदी एक व्यक्ति के रूप में, ऐसे लोगों की ट्वीट फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे अपनी एक न्यूनतम जिम्मेदारी से बरी भी नहीं हो सकते। 
लंदन में मोदी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों को अनदेखा भी किया जा सकता है कि कुछ सौ लोग तो कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर बैनर लिए हुए जुट सकते हैं, लेकिन सवाल गिनती का नहीं, मुद्दों का है, और योरप के देश इस बात के लिए भी जाने जाते हैं कि वहां की संसद दूसरे देशों के कुछ किस्म के घरेलू मामलों पर भी चर्चा करती है, और उन पर भी अपनी सोच सामने रखती है। हमको यह अंदाज नहीं है कि लंदन में उठ रहे इन मुद्दों का मोदी घर पर उठ रहे इन्हीं मुद्दों के मुकाबले कुछ अधिक नोटिस लेंगे या नहीं, लेकिन एक समझदार नेता को अपनी चुप्पी से परे इन आवाजों को सुनना और समझना चाहिए, और इतिहास में जो एक ऐतिहासिक मौका उसके सामने रखा है, उस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए। 

दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का भी होना चाहिए

संपादकीय
10 नवंबर 2015

उत्तर भारत का साल का एक सबसे बड़ा त्यौहार दीवाली कई किस्म के सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को लेकर आता है, और शायद साल भर की सबसे अधिक आर्थिक हलचल भी इसी वक्त होती है। गरीबों के लिए और मध्यम वर्ग के लिए किसी भी बड़े त्यौहार की तरह यह त्यौहार भी एक बड़ा बोझ लेकर आता है, और लोग इसके आने और चले जाने की राह अधिक देखते हैं, खुशियां कम मना पाते हैं। लेकिन भारत में अधिकतर लोगों में अपने पुराने सामानों को सम्हालकर रखने की चाहत इतनी मजबूत रहती है कि साल के इस सबसे बड़े एक त्यौहार पर घर की सफाई करते हुए, कबाड़ साफ करते हुए भी बहुत सा ऐसा कबाड़ निकालकर झाड़-पोंछकर वापिस रख लेते हैं जिसे कि दस-बीस बरस में कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इससे कई किस्म के नुकसान होते हैं, एक तो यह कि यह कबाड़ जिन लोगों के काम आ सकता था, वे इनमें से कुछ सामान नए खरीदते हैं, और धरती पर सामानों का बोझ बढ़ता है, सामान बनाने में पर्यावरण का एक नुकसान होता है। दूसरी बात यह कि हर किस्म का कबाड़ जगह घेरता है, गंदगी इक_ा करता है, और छाती पर बोझ बने रहता है। 
हिन्दुस्तान में रीसाइकिलिंग का एक अभियान चलाने की जरूरत है जिसमें कुछ भरोसेमंद सामाजिक संगठन आगे आएं, और लोगों के सामानों के मोह को घटाने की कोशिश करें, उनसे सामान लेकर उन्हें जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का काम करें। यह काम एक तरफ तो गरीबों की मदद का होता है, दूसरी तरफ धरती पर से बोझ घटाने का भी होता है। दुनिया के कई देशों में बड़े-बड़े भरोसेमंद संगठन इस काम में लगे रहते हैं, और संपन्न-विकसित योरप के देशों में लोग अपना गैरजरूरी सामान या तो गैराज सेल लगाकर बेच देते हैं, या फिर घरों के बाहर उन सामानों को रख देने के दिन तय रहते हैं, लोग सामान बाहर रखते हैं, और जरूरतमंद लोग उठाकर ले जाते हैं। अगले दिन तक जो सामान कोई नहीं ले जाते, उनको म्युनिसिपल उठाकर कूड़े में ले जाती है। भारत जैसे देश में किसी भी सामान का कूड़ा बनना बड़ा मुश्किल है। लोगों की जरूरतें इतनी हैं कि औने-पौने सामान को भी लोग ले जाते हैं और उससे बरसों तक काम चलाते हैं। दुनिया में जिन सामानों को खराब होने पर लोग सीधे बेच देते हैं, हिन्दुस्तान में उन सामानों को बनाने वाले लोग गांव-गांव तक फैले रहते हैं। 
इसलिए पुराने सामानों के दुबारा और तिबारा इस्तेमाल की संभावना भारत जैसे देश में बहुत अधिक है, और उससे ही धरती पर बोझ बढऩा धीमा हो सकता है। यह काम खासकर शहरों में अधिक आसानी से हो सकता है जहां पर संपन्न लोग अधिक हैं, उनके पास कबाड़ अधिक है, इर्द-गिर्द गरीब अधिक हैं, और बड़े पैमाने पर सामानों की रीसाइकिलिंग अधिक आसान भी हो सकती है। दीवाली का मौका कबाड़ खाली करने का रहता है और लोगों के बीच इस सोच को बढ़ाने का काम जागरूक लोगों को करना चाहिए। 

विजेता नीतीश की विनम्रता से सबको कुछ सीखने की जरूरत

संपादकीय 
9 नवम्बर 2015

बिहार में ऐतिहासिक जीत के बाद नीतीश कुमार ने अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्ष के साथ काम करने के लिए जिस तरह की दरियादिली की बात कही है, वह गौर करने के लायक है। अपने डीएनए के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री की गालियां खाने के बाद भी नीतीश कुमार ने कल जितनी समझदारी और संतुलन की बातें की हैं, उनसे उन लोगों को सीखने की जरूरत है, जो कि जीतने के बाद आपा खो बैठते हैं, और भाषा का शिष्टाचार भी जिनका खत्म हो जाता है। दरअसल विजेता को विनम्र होना भी चाहिए, और नीतीश कुमार तो अच्छे या बुरे कैसे भी वक्त में संतुलित बातें करने के लिए जाने जाते हैं। यही वजह है कि कल जब कई टीवी चैनलों पर नीतीश को लेकर बहस चल रही थी, तो कुछ विश्लेेषकों का यह मानना था कि देश के अगले आम चुनाव में हो सकता है कि भाजपा के विरोध का गठबंधन नीतीश के इर्दगिर्द इकट्ठा हो। हालांकि ऐसी बात करने का अभी कोई वक्त नहीं है,क्योंकि अगले आम चुनाव साढ़े तीन बरस दूर हैं, लेकिन ऐसे किसी गठबंधन की संभावनाएं बनने और उसके शक्ल लेने में भी बरसों लगते ही हैं। और आने वाले बरसों में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, वहां पर भाजपा या एनडीए के खिलाफ बाकी पार्टियों के बीच के तालमेल अगले आम चुनाव के गठबंधन में मददगार भी हो सकते हैं। 
लेकिन अगले आम चुनाव को लेकर किसी अटकल के बजाए हम इस बात पर चर्चा करना चाहेंगे कि किस तरह एक भले नेता को जीत के बाद भी बददिमाग नहीं होना चाहिए, और लोकतांत्रिक उदारता की बात करनी चाहिए, वैसा आचरण करना चाहिए। बिहार में नीतीश के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं, एक सजायाफ्ता और प्रामाणिक भ्रष्ट लालू यादव के साथ मिलकर इस सरकार को चलाना आसान नहीं होगा, और अगर लालू कुनबे की हवस हावी हुई, तो हो सकता है कि नीतीश का तीसरा कार्यकाल मिट्टी में मिल जाए। लेकिन आज देश में राजनीति को नीतीश कुमार की बातों से कुछ सीखने की जरूरत है। आज जितना जहर हवा में घुला हुआ है, उसी का नतीजा है कि भाजपा वाले गठबंधन का ऐसा बुरा हाल देखने मिल रहा है। बिहार में जो बर्बादी भाजपा ने झेली है, वह अपनी बद्जुबानी की वजह से ही झेली है। अब भी वक्त है कि देश में संतुलित और भली बातें करने वाले लोगों से कुछ सीखा जाए। न सिर्फ भाजपा को, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों को अपनी गंदी बातों को छोडऩा पड़ेगा, वरना उनके परंपरागत मतदाता भी उनको छोडऩे की मिसाल बिहार में पेश कर ही चुके हैं। 

बिहार ने सरकार चुनने के साथ-साथ देश के माहौल पर भी राय जाहिर की है

8 नवंबर 2015
संपादकीय
बिहार के चुनावी नतीजे शायद इस देश के अटकलों को सबसे अधिक पलटने वाले नतीजों में से हैं, अधिकतर सर्वे कड़ी टक्कर या उसके आसपास की भविष्यवाणी कर रहे थे, लेकिन आज के नतीजों ने विश्लेषकों को हिलाकर रख दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की पार्टियों ने जिस जोर-शोर से बिहार में चुनाव लड़ा, और खुद प्रधानमंत्री ने इस चुनाव में जितना वक्त दिया, जितनी आक्रामक बातें कहीं, उनके बाद कोई कसर बाकी नहीं रह गई थी। और अभी दोपहर को जो आंकड़े टीवी के स्क्रीन पर सामने हैं, उनके मुताबिक नीतीश कुमार और उनके साथी मोदी और उनके साथियों के दुगुने से भी अधिक सीटें पाते दिख रहे हैं। यह तस्वीर कम से कम भाजपा के लिए एक बहुत गंभीर और ईमानदार आत्ममंथन सुझाती है। 
हम अभी बिहार की चुनावी राजनीति को लेकर बहुत बारीक विश्लेषण करना नहीं चाहते, क्योंकि वहां के अधिक जानकार लोग उसे अलग से करेंगे ही। लेकिन बिहार के नतीजे ऐसे क्यों आए, इस पर बाकी देश की तरफ से एक नजर डालना जरूरी है। बिहार देश के बीच का राज्य है, और राजनीतिक रूप से यह अधिक पढ़े-लिखे लोगों का, राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का, पिछले दस बरस से शराफत पर भरोसा रखने वाला, और बेहतर सरकार का साथ देने वाला राज्य साबित हुआ है। हमारा ऐसा मानना है कि पिछले कुछ महीनों में इस देश में राष्ट्रीय स्तर पर जिन साम्प्रदायिक मुद्दों को खड़ा करने, उन्हें सुलगाकर, पंखे से हवा दी गई, उसको बिहार ने अनदेखा नहीं किया है। हमारे पास वोटों का ऐसा कोई विश्लेषण नहीं है कि हम अपनी इस बात को साबित कर सकें, लेकिन महीनों से इस देश में जो भड़काऊ बातें रात-दिन टीवी और अखबारों में छाई हुई थीं, हमारा मानना है कि बिहार की जनता पर उसका खासा असर पड़ा होगा। बिहार के भीतरी जातिवादी समीकरण तो दोनों ही गठबंधनों ने इस्तेमाल किए होंगे, और भाजपा के पक्ष में जो एक बात उसकी कोशिश से, या उसकी किसी जाहिर-कोशिश के बिना हुई, वह थी ओवैसी की मुस्लिम पार्टी का बिहार घुसकर पहली बार इस तरह चुनाव लडऩा, जिससे कि मुस्लिम वोटों का धु्रवीकरण भी हो, और मुस्लिम वोट नीतीश-लालू-कांगे्रस के साम्प्रदायिकता विरोधी गठबंधन के खिलाफ भी चले जाएं। यह बात भी एनडीए-भाजपा के काम आई नहीं, और नीतीश कुमार एक ऐतिहासिक किस्म की जीत के साथ तीसरे कार्यकाल के लिए लौटे हैं। 
भाजपा के भीतर और बाहर इस चुनाव को लेकर कई तरह की सुगबुगाहट चल रही थी, और आज वह कुछ बढ़ भी गई होगी। लेकिन हमको भाजपा के भीतरी मामलों की अधिक फिक्र नहीं है, बाकी देश की फिक्र जरूर है। और बाकी देश पिछले महीनों में भाजपा और उसके साथी संगठनों, उसके अपने मंत्रियों और नेताओं की लगाई आग से झुलस रहा है। इस बात को लेकर हमने इसी जगह पिछले महीनों में लगातार नरेन्द्र मोदी के लिए लिखा भी था कि देश की गैरसवर्ण-हिंदू आबादी के खिलाफ जिस तरह से एक धार्मिक, साम्प्रदायिक, और खानपान का उन्माद लादा जा रहा था, जिस कदर थोक में लोगों को पाकिस्तान भेजा जा रहा था, वह भाजपा के लिए चुनावी नुकसान का काम भी हो रहा था। हमने बड़े साफ शब्दों में गोमांस को लेकर फैलाए जा रहे उन्माद के बारे में लिखा था कि एक सवर्ण-हिंदू तबके का यह झांसा झूठा है कि इस देश में लोग गोमांस नहीं खाते। दलितों के बीच, आदिवासियों के बीच, अल्पसंख्यकों के बीच, उत्तर-पूर्वी लोगों के बीच, और गरीब-मांसाहारियों के बीच जितने बड़े पैमाने पर गोमांस खाया जाता है, उस तथ्य को दबाया गया, और भारत को एक सवर्ण-हिंदू राष्ट्र की मर्जी में ढाला जा रहा था। भारत जैसी विविधता वाले देश में ऐसी आतंकी-उन्मादी जिद अधिक चल नहीं सकती। और हमारा यह मानना है कि बाकी देश में भाजपा और उसके लोगों ने जिस अंदाज में देश के वफादार लोगों को गद्दार करार देकर पाकिस्तान भेजने के फतवे जारी किए, उसका भी नुकसान इस पार्टी को बिहार में आज झेलना पड़ा।
यह भाजपा की अपनी मर्जी की बात है कि वह बिहार की इस शर्मनाक हार के बाद भी एक आत्ममंथन करना चाहती है या नहीं, या फिर वह लोगों को पाकिस्तान भेजने के लिए एक ट्रैवल एजेंसी की तरह मेहनत करना चाहती है? और यह मौका खासकर प्रधानमंत्री के निजी आत्ममंथन का है क्योंकि केंद्र की सरकार, एनडीए गठबंधन, और भाजपा, इन सबके वे आज बेताज बादशाह बने हुए हैं, और वे देश के आज भड़के हुए माहौल, लोगों के बीच फैली हुई दहशत, और उन्मादी-साम्प्रदायिक लोगों की फड़कती बांहों के लिए जिम्मेदार भी हैं। बिहार की हार को महज एक राज्य के विधानसभा चुनाव के नतीजे मानकर चलना अपने-आपको धोखा देना होगा, हमारा मानना है कि बिहार के मतदाताओं ने राज्य में सरकार चुनने के साथ-साथ देश के माहौल पर भी अपनी राय जाहिर की है।  

भारत की न्यायव्यवस्था में बुनियादी फेरबदल जरूरी

संपादकीय
7 नवंबर 2015

मुंबई के फिल्म उद्योग से जुड़े हुए एक अभिनेता आदित्य पंचोली का अपने मकान मालिक के साथ कुछ सौ रूपयों का झगड़ा चलते-चलते अभी सुप्रीम कोर्ट से निपटा, और अदालत ने उन्हें मकान खाली करने का आदेश दिया। यह मामला 1978 से निचली अदालत से शुरू होकर अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर निपटा है। और इतने लंबे सफर, और इतने छोटे मुद्दे को देखकर लगता है कि देश के जिन लोगों के पास महंगे वकील करने, या बड़ी अदालत तक जाने की ताकत नहीं रहती होगी, उनका क्या हाल होता होगा। और दूसरी बात यह कि देश की अदालतों पर अगर ऐसे मामलों के बोझ लदे रहेंगे तो जो अधिक जरूरी मामले हैं, उनका क्या हो सकेगा? अभी भी सुप्रीम कोर्ट और देश की बाकी अदालतों के जानकार लोगों का यह मानना है कि आज अदालतों में चल रहे सारे मामलों के निपटारे में साढ़े तीन सौ बरस लग सकते हैं। 
भारत में इंसाफ इतना मुश्किल है, कि लोग थक-हारकर, निराश होकर अपना इंसाफ खुद भी करने लगते हैं। सड़कों पर कत्ल होते हैं, कहीं नक्सल आंदोलन चलते हैं, कहीं लोग स्थानीय गुंडों के पास जाकर उनके मामले निपटाने की बात करते हैं, और अभी कुछ बरस पहले तक इंसाफ की तरफ से नाउम्मीदी से फूलन की तरह के बागी पैदा होते थे। आज भी सरकार से जुड़े हुए बहुत से मामलों में लोगों को लगता है कि इंसाफ के लिए अदालती लड़ाई के मुकाबले रिश्वत देकर मामले को बाहर ही निपटा लेना आसान है, और सस्ता पड़ेगा। दूसरी तरफ जमीन-जायदाद और कारोबार के बहुत से मामलों में लोग गुंडों को भाड़े पर लेकर मामले निपटा लेते हैं, क्योंकि अदालत जाने का मतलब अगली एक-दो पीढ़ी तक इंतजार करना होता है। इस देश में न्यायपालिका के पूरे कामकाज में ऐसे फेरबदल की जरूरत है कि लोगों को सच में इंसाफ मिले, वक्त रहते मिले, और इंसाफ के नाम पर आज देश में जो चल रहा है वह पाखंड खत्म हो। आज गिने-चुने मामलों में इंसाफ होते दिखता है, और अधिकतर मामलों में यह साफ-साफ दिखता है कि इंसाफ नहीं हो रहा है। 
इस देश में इंसाफ तक गरीब की पहुंच पूरी तरह नामुमकिन है, और पुलिस से लेकर जांच करने वाली प्रयोगशालाओं तक, गवाहों से लेकर वकील तक, और जजों तक इतना भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि कदम-कदम पर इंसाफ की संभावना पटरी से उतरती रहती है। यही वजह है कि नक्सलियों के साथ हमदर्दी रखने वाले लोग जो खुद हिंसा पर भरोसा नहीं रखते हैं, वे भी यह मानते हैं कि इस देश में सबसे कमजोर के साथ इंसाफ बिना हिंसा के नहीं हो सकता। मिसाल के लिए कुछ मामलों को गिनाया जा सकता है जिनमें अदालत में खड़े लोगों के जीते जी ही फैसला हो गया हो, लेकिन लोगों के मर-खप जाने के बाद आने वाली पीढिय़ों को मिलने वाले इंसाफ की कहानियां अनगिनत हैं, और उन्हीं को देख-देखकर लोग यह कहते हैं कि ईश्वर खाकी वर्दी और काले कोट से बचाकर ही रखे। 
भारत में अदालतों का जो ढर्रा चले आ रहा है, उसमें बुनियादी फेरबदल की जरूरत है, आज यह सिलसिला गरीबों की पहुंच के भी बाहर है, और इसमें इंसाफ की संभावना भी बहुत कम है। 

फायरब्रिगेड निगमों से लेकर होमगार्ड को, सही फैसला

संपादकीय
6 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में दमकल विभाग पुलिस विभाग के तहत आने वाले होमगार्ड को दे दिया गया है। अब तक नगर निगम, नगर पालिकाएं अपने इलाकों में आग बुझाने का काम करती थीं, और उनकी बदहाली इतनी थी कि राजधानी रायपुर में किसी भी बड़ी अग्नि दुर्घटना से निपटने के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र की फायर ब्रिगेड को 25 किलोमीटर दूर से बुलाना पड़ता था, या कभी एयरपोर्ट की फायर ब्रिगेड की तरफ देखना पड़ता था। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े शहर और राजधानी बनने के बाद भी रायपुर में म्युनिसिपल की फायर ब्रिगेड का हाल यह था कि उसकी गाडिय़ां कंडम थीं, उनकी टंकी में डीजल नहीं रहता था, ड्राइवरों की कमी थी, और जो ड्राइवर थे भी, उनकी नजरें कमजोर थीं, आग बुझाने वाले कर्मचारियों के पास अपने खुद के बचाव के लिए कोई तरीके नहीं थे, और शहर में बन गई ऊंची इमारतों की ऊपरी मंजिलों तक पहुंचने की फायर ब्रिगेड की क्षमता नहीं थी। कुल मिलाकर नगर निगम के कामकाज के मिजाज में ऐसे हादसों से जूझना था भी नहीं। यह एक अच्छी बात है कि बहुत देर से सही, लेकिन राज्य सरकार ने समझदारी का फैसला लिया, और म्युनिसिपल से उसकी समझ, क्षमता, प्राथमिकता, और मिजाज से बिल्कुल परे का यह काम अलग कर दिया। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय वहां पर भोपाल और शायद कुछ दूसरे शहरों में भी फायर ब्रिगेड कुछ समय पुलिस विभाग के जिम्मे थी, और फिर बाद में पुलिस से हटाकर म्युनिसिपल को दे दी गई थी। अब पता लगा है कि मध्यप्रदेश भी छत्तीसगढ़ की इस नई नीति से कुछ सीखने जा रहा है। छत्तीसगढ़ में इस नए फैसले के तहत आग बुझाने, आपदा प्रबंधन, और आपातकालीन सेवाओं के लिए प्रदेश स्तर की यह नई फोर्स तैयार की जा रही है। जिसमें करीब 12 सौ लोग रहेंगे। 
राज्य सरकार को आपदा प्रबंधन की सोच को फाइलों से निकालना चाहिए। हम पहले भी कई बार इस जगह यह लिखते आए हैं कि पूरे प्रदेश में सरकार और सरकार से परे निजी क्षेत्र की जो क्षमता है, उसका एक ऐसा व्यापक नक्शा बनाने की जरूरत है कि किसी भी तरह की प्राकृतिक, औद्योगिक या किसी और तरह की मानव निर्मित आपदा आने पर तेजरफ्तार बचाव के लिए सारे साधनों और क्षमताओं का तुरंत इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। इसमें मशीनों से लेकर इलाज की सुविधा तक, और तैराकों से लेकर रक्तदाताओं तक का ऐसा नक्शा संपर्क सहित बनना चाहिए कि प्रदेश में कहीं भी पल भर में यह देखा जा सके कि घायलों को किस तरफ भेजा जाए, वहां पर हर तरह के इंतजाम किस तरह जुटाकर रखे जाएं। इस काम को भी राज्य सरकार के दूसरे विभागों से परे सीधे पुलिस के हवाले इसलिए करना चाहिए कि हर तरह के हादसे में सबसे पहले पुलिस को ही झोकना पड़ता है। आज राज्य के सचिवालय में दूसरे विभागों के अधिकारी आपदा प्रबंधन की योजना बनाते हैं, और उनके विभाग के लोगों का जमीनी आपदा प्रबंधन से कोई लेना-देना नहीं रहता। यह पूरा काम जिला प्रशासन और पुलिस को देखना पड़ता है, और इसकी योजना पुलिस बेहतर तरीके से बना सकती है। 
राज्य सरकार ने म्युनिसिपलों से यह एक अनचाहा काम ले लिया है, और इसे लेकर म्युनिसिपल शायद खुश ही होंगी। सरकार के कुछ और विभागों में कामकाज को दुबारा बांटने की जरूरत है, और राज्य सरकारी ढांचे को एक कल्पनाशील तरीके से दुबारा ढालने की जरूरत है। एक तरफ तो राज्य में डॉक्टरों का भारी अकाल है, दूसरी तरफ सरकार में स्वास्थ्य विभाग में हर स्तर पर प्रशासनिक काम के लिए डॉक्टरों को जिलों से लेकर राजधानी तक झोंका गया है। कॉलेजों में पढ़ाने वाले कम हैं, और बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के प्राध्यापकों को वरिष्ठता के आधार पर प्राचार्य बना दिया जाता है। ऐसा ही स्कूलों में भी होता है। सरकार को स्वास्थ्य प्रशासन, शिक्षा प्रशासन जैसे काडर अलग से विकसित करने चाहिए, जिनमें आज के कर्मचारी-अधिकारी ही अपनी जानकारी और अपने अनुभव के आधार पर छांटे जाएं, और उनकी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल हो। एक नए राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश की परंपराओं से अलग होकर एक नई ताजगी के साथ योजनाएं बनाने की सहूलियत थी, लेकिन डेढ़ दशक पूरा होने के बावजूद अधिकतर बातों के लिए यह राज्य अविभाजित मध्यप्रदेश के तौर-तरीकों पर ही टिका रहता है। यह सोच बदलने की जरूरत है। 

बंदूक की हिंसा गई बटुए की हिंसा आई

संपादकीय
5 नवंबर 2015

जब चारों तरफ बुरी बातें हो रही हों, तब कुछ छोटी-छोटी अच्छी-अच्छी बातों को भी देख लेना चाहिए ताकि जिंदगी बिल्कुल ही निराशाजनक न लगने लगे। अब जैसे आज बिहार में इस विधानसभा चुनाव के आखिरी वोट पड़ रहे हैं, और जहां तक अखबारी सुर्खियां याद पड़ रही हैं, कई हफ्तों तक चले मतदान में भी न तो कहीं बूथ पर कब्जा सामने आया, न कहीं कत्ल हुए, और न ही बम फटे। अभी कुछ चुनाव पहले तक की ही बात है, अलग-अलग जातियों की, पार्टियों की, सेनाएं वहां बूथ कब्जा करती थीं, और कागजों पर सील लगाने वाले वोट पर मनमर्जी से थप्पा लगाती थी। बिहार को लेकर ही देश की चुनावी राजनीति में बूथ-छापना शब्द प्रचलित हुआ था, और ऐसा माना जाता था कि देश में सबसे अधिक अराजक चुनाव बिहार में होते हैं, और वहां बंदूकधारी बाहुबली, और बम चलाने वाले लोग चुनाव पर काबू करते हैं। 
लेकिन लोगों को अच्छी बातें तुरंत दिखती नहीं हैं, और आज बिहार में अगर बिना जुर्म, बिना हिंसा, ठीक तरीके से चुनाव हो रहे हैं, तो इसकी चर्चा भी नहीं हो रही है। इसके पीछे राज्य में एक बेहतर सरकार रहना भी एक वजह है, और एक दूसरी वजह है कि चुनाव आयोग ने देश के किसी भी हिस्से के लोकसभा या विधानसभा चुनाव को साफ-सुथरे तरीके से करवाने का इंतजाम कर लिया है। आयोग को इसके लिए असीमित अधिकार भी मिले हैं, और राज्य सरकारों की मनमानी से परे अब चुनाव आयोग अपनी मर्जी से केन्द्रीय बल लगाकर, दूसरे राज्यों से पर्यवेक्षक भेजकर चुनावों को बिना हिंसा करवाने का खासा कामयाब तरीका बना चुका है। 
इस सारी कामयाबी के बाद भी अगर सतह से थोड़ा नीचे जाकर देखें, तो आज भी भारत के चुनाव पैसों के दम पर इस हद तक प्रभावित होते हैं कि जीतने वाली पार्टी हार जाए, और हारने वाली पार्टी जीत जाए। एक तरीके से दिखने वाली हिंसा की जगह अब वोट खरीदने की ताकत रखने वाले बटुए ने ले ली है। पिस्तौल गई, बटुआ आ गया। जिस राज्य में भी पांच-दस फीसदी सीटों का फर्क रहता है, वहां पर अगर पैसों का बड़ा खेल हुआ है, तो फिर जनता का रूख भांपना नामुमकिन हो जाता है। और लोगों के वोट मंडी में इसलिए बिकने खड़े रहते हैं, क्योंकि लोगों को उनके सामने मौजूद विकल्पों में कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं दिखता, किसी में एक किस्म की खामी रहती है, और किसी में दूसरे किस्म की। अगर पार्टियों और उम्मीदवारों के बीच बड़ा साफ-साफ फर्क हो, तो मतदाता शायद बिकने के बजाय चुनना पसंद करें, लेकिन जब एक बुरे और दूसरे बुरे के बीच ही पसंद बची हो, तो फिर लोग बिकने को बुरा भला क्यों मानें? 
लोकतंत्र के लिए यह एक ऐसी खतरनाक बात है कि चुनाव को प्रभावित करने वाली पैसों की ताकत लोगों को जुर्म नहीं लगती, हिंसा नहीं लगती, और चुनाव प्रभावित हो जाते हैं। अब यह हमको ठीक से समझ नहीं पड़ता कि बंदूक की हिंसा जाने, और बटुए की हिंसा आने को लोकतंत्र का विकास माना जाए, या न माना जाए? यह कुछ उसी किस्म का है कि दुनिया की फौजें ऐसे हथियार तैयार कर रही हैं कि लोगों का खून न बहे, और उनकी मौत हो जाए।