वर्दी वालों को अपने बारे में जनधारणा सुधारनी चाहिए..

संपादकीय
10 अगस्त  2016
सोशल मीडिया पर पुलिस के जुल्म की तस्वीरें, और उसके वीडियो देख-देखकर दिल दहल जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ कई ऐसी तस्वीरें और ऐसे वीडियो इसी सोशल मीडिया पर दिखते हैं जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों के पुलिसवाले बीमार, जख्मी, या भूखे-गरीब की मदद करते हैं। यह बात जाहिर है कि जुल्म के मुकाबले रहम की तस्वीरें कम फैल पाती हैं, क्योंकि नकारात्मक बातों से सनसनी अधिक फैलती है। फिर भी सोशल मीडिया की ताकत को देखते हुए न सिर्फ पुलिस को, बल्कि सरकार के दूसरे तबकों को भी अपने अच्छे काम सामने रखने चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हकीकत चाहे जो हो, जनधारणा अपने आपमें बहुत वजन रखती है, और किसी व्यक्ति या विभाग, संगठन या सरकार का भविष्य कई मौकों पर जनधारणा से भी तय होता है। चूंकि पुलिस, फौज, या पैरामिलिट्री के लोग वर्दियों में रहते हैं, इसलिए उनके किए हुए गलत काम पूरी वर्दी की शान को चौपट कर देते हैं, और ऐसे में इस तस्वीर को सुधारने के लिए उनके अच्छे काम भी उनको खुद को जनता के सामने रखने चाहिए।
आज हिन्दुस्तान में आम लोगों की सोच का हाल मशहूर फिल्म शोले की तरह का है। जिसमें कहा जाता है कि गब्बर सिंह का नाम सुनाकर माताएं अपने बच्चों को सुलाती हैं, कि सो जा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा। हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में माताएं पुलिस का नाम लेकर बच्चों को सुलाती हैं कि सो जा नहीं तो पुलिस आ जाएगी, दूध पीले नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाएगी, नतीजा यह होता है कि बचपन से ही बच्चे पुलिस के डर और दहशत के साथ बड़े होते हैं, और भारत में यह आम बोलचाल है कि खाकी से भगवान बचाए। पुलिस की वर्दी, या पुलिस थाने जाना, लोगों के लिए अच्छा अनुभव नहीं रहता है, इसलिए पुलिस को यह चाहिए कि वह अपने बारे में जनधारणा को बदलने के लिए पहले तो ठोस काम करे, और फिर उस सकारात्मक काम को लोगों के सामने रखने के लिए सोशल मीडिया की तरह के माध्यम का इस्तेमाल भी करे। पुलिस से अगर लोगों के रिश्ते दोस्ताना रहें, तो जनता का एक ऐसा सहयोग पुलिस को मिल सकता है जिसे कि पुलिस अपने अमले को बढ़ाकर भी हासिल नहीं कर सकती। ब्रिटेन जैसे देश में पुलिस को एक दोस्त की शक्ल में पेश करने के लिए सरकार सोची-समझी बहुत सी कोशिशें करती है
और यह बात महज पुलिस पर लागू नहीं होती है, छवि सुधारने, छवि निखारने, साख बनाने, बदनामी घटाने जैसे कई कामों के लिए आज दुनिया में बड़ी-बड़ी कंपनियां काम करती हैं, और वे नेताओं से लेकर कारोबारियों तक, और समाज सेवा के काम में लगे हुए जनसंगठनों तक के लिए काम करती हैं। आज दुनिया में कहीं भी समाज सेवा में लगे हुए संगठनों की अगर अपनी खुद की साख अच्छी न हो, तो उन्हें कहीं से दान भी नहीं मिलता, और उनका धंधा ही मंदा हो जाता है।
अगर साख अच्छी रहे, लोगों का भरोसा रहे, तो काम आसान हो जाता है, और दाम अच्छे मिल जाते हैं। कारोबार की दुनिया की कंपनियां ऐसी साख के लिए बड़ी कोशिशें करती हैं, और अरबों-खरबों खर्च करती हैं। अमरीकी कंपनियों के बारे में यह बात बड़ी आम है कि किसी भी बड़ी कंपनी के मुखिया के ओहदे पर किसी को छांटते हुए यह भी देखा जाता है कि उन्होंने अपने पहले के कामकाज के दौरान समाज सेवा के किसी प्रोजेक्ट पर काम किया है या नहीं। कंपनियों के सामाजिक सरोकार को आज उनकी कमाई के लिए एक जरूरी बात माना जाता है, और कई कंपनियां तो महंगे ईश्तहार से भी जितनी शोहरत नहीं पाती हैं, उतनी शोहरत वे मामूली खर्च से समाज सेवा करके पा लेती हैं।
भारत में पुलिस और सुरक्षाबलों को अपने बीच से बुराई को तो खत्म करना ही चाहिए, अपने बीच भलाई को बढ़ाकर, लोगों के बीच अपने नेक काम रखने भी चाहिए, और यह खर्च बड़ा सस्ता पड़ेगा।

खिलाडिय़ों की पीठ पर लदे मैनेजर और पदाधिकारी...

संपादकीय
9 अगस्त  2016
भारत की महिला धावक दुती चांद ने रियो ओलंपिक से अपनी आवाज में एक संदेश पोस्ट करते हुए बताया कि किस तरह हैदराबाद से रियो तक का छत्तीस घंटे का सफर उसे विमान की तंग इकॉनॉमी क्लास में करना पड़ा, और न आराम मिला, न नींद हुई, और न ही उसके कोच को साथ भेजा गया। दूसरी तरफ भारतीय टीम के मैनेजर और संघ पदाधिकारी बिजनेस क्लास की लंबी-चौड़ी आरामदेह सीटों पर गए। दुती चांद ने सवाल उठाया है कि ऐसे में किसी खिलाड़ी से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
यह कोई अकेला मौका नहीं है कि खिलाडिय़ों के नाम पर पलने वाले मैनेजर और संघ पदाधिकारी अपने लिए आराम जुटाकर खिलाडिय़ों को बदहाली में रखते मिले हैं। यह एक अलग बात है कि आमतौर पर खिलाड़ी ऐसी किसी बात का विरोध नहीं करते हैं क्योंकि आवाज उठाने पर अगली बार उनके टीम में ही चुने जाने पर खतरा खड़ा हो जाता है। ऐसे ही खतरे को देखते हुए बहुत सी खिलाड़ी लड़कियां देहशोषण को भी बर्दाश्त करती रहती हैं, क्योंकि बरसों की तपस्या के बाद जब किसी बड़े मुकाबले के लिए टीम में जगह का मौका आता है, तब उसे खोने का मतलब बरसों का वक्त भी खो देना रहता है, और ऐसे में खिलाड़ी तरह-तरह से समझौते के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। उनमें से कुछ आवाज उठाते हैं, लेकिन बहुत से इसे बर्दाश्त कर जाते हैं।
जब भारत के खिलाड़ी दुनिया के मुकाबलों में बराबरी नहीं कर पाते हैं, तो उसके पीछे की बहुत सी वजहें रहती हैं। खिलाडिय़ों को वक्त पर जूते, खेल की पोशाक, या खेल के उपकरण नहीं मिलते, और सीखने का मौका नहीं मिलता, खाने को ठीक से नहीं मिलता, और सफर या रहना तो खराब रहता ही है। जब तक कि खिलाड़ी सितारा-खिलाड़ी न बन जाए, तब तक उसे खेल संघों के नेता-अफसर पदाधिकारियों के रहमो-करम पर जिंदा रहना पड़ता है। ऐसे में जाहिर है कि दुनिया के बेहतर इंतजाम वाले देशों के खिलाडिय़ों से मुकाबला आसान नहीं रहता। और जो हम आज लिख रहे हैं, यह इस खिलाड़ी के नाम के बिना पचीस बरस पहले भी लागू होता था, और शायद पचीस बरस बाद भी लागू होगा। खेलों की राजनीति में देश और प्रदेशों की सत्ता पर काबिज नेता और अफसर इसी तरह हावी रहेंगे, और खेल की प्रतिभाओं की कोई आवाज नहीं रहेगी।
दरअसल क्रिकेट के मामले में तो फिर भी सुप्रीम कोर्ट तक ने दखल दी है, और इतना समय दिया है, कि मानो सुप्रीम कोर्ट के जज मैदान के अंपायर हों, लेकिन भारत के बाकी खेलों की ऐसी किस्मत कहां। नतीजा यह है कि जब तक खेल संघों के पदाधिकारियों को अपने राजनीतिक और कारोबारी नफे  के आसार दिखते हैं, वे अपना सार्वजनिक बाहुबल बढ़ाने के लिए खेलों का इस्तेमाल करते हैं, दुनिया में अपना नाम बढ़ाने का काम करते हैं, और खिलाडिय़ों को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करके नीचे कुचलते रहते हैं। न सिर्फ दुती चांद के मामले में, और न सिर्फ ओलंपिक के मामले में, हिंदुस्तान में तो जिले-जिले तक खेलों की राजनीति को खत्म करना चाहिए, वरना खिलाड़ी तो खत्म हो ही रहे हैं।

गौहिंसा पर मोदी का कहा टू लेट, एंड टू लिटिल...

संपादकीय
8 अगस्त  2016
कुछ दिन पहले मन की बात के रेडियो प्रसारण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के लोगों से पूछा था कि इस बार उन्हें स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से किन-किन बातों पर कहना चाहिए। वे चाहते थे कि वे अपने मन की बातें करने के बजाय आजादी की सालगिरह पर देश की जनता के सुझाए हुए मुद्दों पर भी बोलें। और सोशल मीडिया पर लोग टूट पड़े, प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए कि उन्हें साम्प्रदायिकता पर, गाय के नाम पर की जा रही हिंसा पर, दलितों पर अत्याचार पर, कश्मीर में लोगों पर बरसाए जा रहे छर्रों पर बोलना चाहिए। जितने मुंह उतनी बातें। नतीजा यह हुआ कि उनकी कही बात उन्हें खासी महंगी पड़ी, और सोशल मीडिया पर लोगों ने याद दिलाया कि देश के कौन-कौन से जलते-सुलगते मुद्दों पर प्रधानमंत्री कुछ भी नहीं बोलते हैं।
अब इन बातों की वजह से, या एक बड़ी दलित आबादी वाले उत्तरप्रदेश के चुनाव की वजह से, चाहे जिस किसी वजह से प्रधानमंत्री ने पिछले दो दिनों में गाय का नाम लेकर हिंसा करने वालों के खिलाफ खासी कड़ी बातें कही हैं, और खुलकर यह माना कि गोरक्षा की बात करने वाले तीन चौथाई लोग असामाजिक तत्व हैं, जो कि बाकी वक्त जुर्म करते हैं, और उनको छुपाने के लिए दिन में गाय के नाम पर ठेकेदारी करते हैं। उनके शब्द कुछ और रहे होंगे लेकिन उन्होंने काफी कड़ाई से न सिर्फ यह कहा, बल्कि यह भी कहा कि अगर किसी को दलितों को मारना है, तो उनकी बजाय प्रधानमंत्री (मोदी) पर वे लोग गोली चला लें। यह बात वजन तो रखती है, और दो बातों की वजह से रखती है, पहली बात यह कि गाय के नाम पर दलितों के साथ, और अल्पसंख्यकों के साथ जाति और धर्म की हिंसा करने वाले सारे के सारे लोग नरेन्द्र मोदी की पार्टी के आसपास के हिन्दू संगठन ही हैं। दूसरी बात यह भी है कि प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ रहा है कि राज्य सरकारें ऐसी हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करें। अब सवाल यह है कि ऐसी सबसे हिंसक वारदातें खुद भाजपा की सरकारों के इलाकों में हुई हैं, तो फिर प्रधानमंत्री को ऐसी हिंसा के महीनों बाद सार्वजनिक मंच से ऐसी बात क्यों कहनी पड़ रही है? देश के प्रधानमंत्री वैसे भी किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री को उस प्रदेश की हिंसा के खिलाफ लिख भी सकता है, और बोल भी सकता है। फिर अगर मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी के हों, तो प्रधानमंत्री अपने दफ्तर का इस्तेमाल किए बिना भी, पार्टी के रास्ते यह नसीहत दे सकते थे। और अगर कई महीनों पहले नरेन्द्र मोदी ने यह बात कही होती, तो हो सकता है कि देश में जगह-जगह दस-बीस दलितों और अल्पसंख्यकों की जिंदगियां बच गई होतीं।
अंग्रेजी में एक लाईन कही जाती है, टू लेट, एंड टू लिटिल। प्रधानमंत्री के कहे हुए पर यह बात लागू होती है। देश में गाय के नाम पर जो नफरत और दहशत फैलाई जा रही है, जिस तरह की साम्प्रदायिकता और जातीयता की हिंसा फैलाई जा रही है, उसने जगह-जगह दरार पैदा कर दी है, और प्रधानमंत्री ने सब कुछ देखते हुए इस झिड़की में बड़ी देर कर दी। उनकी कही हुई बात जब तक एक कानूनी कार्रवाई की शक्ल में सामने नहीं आती है, और उन्हीं की पार्टी के, उन्हीं के सहयोगी संगठनों के सैकड़ों लोग जब तक जेल नहीं पहुंच जाते हैं, तब तक उनकी कही बात महज शब्दों से बने हुए वाक्य रहेंगे, उससे अधिक कुछ नहीं। और फिर अभी तो नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के हाथ देश और राज्यों की सरकारें अगले कुछ बरस हैं ही, और आने वाले वक्त में गाय के नाम पर इंसानों का कत्ल होना या थमना यह साबित कर देगा कि वे कितने गंभीर हैं, क्योंकि इस बात को तो कोई भी नहीं मानेगा कि उनकी पार्टी या उनके मुख्यमंत्री उनके काबू के बाहर हैं।
हम इस बारे में लगातार लिखते आ रहे थे कि गाय के नाम पर की जा रही धर्मान्ध राजनीति के चलते न सिर्फ अल्पसंख्यक, बल्कि दलित-आदिवासी भी भाजपा और मोदी से कटते जा रहे हैं, और हिन्दू समाज के कई और तबकों के लोग भी ऐसी गौहिंसा के खिलाफ हैं। हिन्दू समाज के भीतर सिर्फ दलित-आदिवासियों में गाय खाने वाले लोग नहीं हैं, और भी बहुत सी जातियों के लोग गाय खाते हैं, और इन सबके ऊपर एक हिन्दू-अल्पसंख्यक-सनातनी सोच को इस तरह की हिंसा के साथ लागू करके भाजपा बड़ी तेजी से अपना जनाधार खो रही है। हो सकता है कि हमारी तरह की यह बात और लोगों ने भी मोदी के सामने रखी हो, और हो सकता है कि उत्तरप्रदेश के चुनावों में दलितों की नाराजगी को दूर करने के लिए अचानक मोदी ने एक कड़ी बात कहना तय किया हो, लेकिन देश की जनता कथनी और करनी का फर्क देखते चल रही है, और भारत का चुनावी इतिहास बताता है कि जनता चाहे पढ़ी-लिखी न हो, वह ऐसा फर्क करना जानती है। फिलहाल मोदी की बातों पर जिनको अमल करना है, या नहीं करना है, वे सब उन्हीं के साथी हैं, और बाकी जनता असर और अमल की राह तक रही है।

बराक ओबामा की बेटी की मिसाल से सीखे की जरूरत

संपादकीय
7 अगस्त  2016
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बेटी की तस्वीरें खबरों में आई हैं कि वह इस तरह एक रेस्त्रां में गर्मी की छुट्टियों में काम कर रही है। वहां टेबिल साफ करने से लेकर खाना परोसने तक, और खाने की पार्सल देने की खिड़की पर काम करने तक, सभी तरह के काम वह कर रही है। यह अलग बात है कि अमरीकी राष्ट्रपति की बेटी होने के कारण उस पर जो खतरा है, उसके चलते वहां आधा दर्जन सुरक्षा अधिकारी बाहर एक गाड़ी में तैनात रहते हैं। लेकिन खबरों से यह भी पता लगता है कि किस तरह अपनी ड्यूटी पूरी होने के बाद वह जाने के पहले इन सुरक्षा अधिकारियों को भी अपनी तरफ से ले जाकर कुछ खिलाती है।
अभी हमको इंटरनेट पर यह ढूंढने की जरूरत भी नहीं है कि बराक ओबामा ने अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में छुट्टियों में या दिन के कुछ खाली घंटों में ऐसे काम किया था या नहीं। उन्होंने शर्तिया ऐसा काम किया होगा, और ऐसा सिर्फ जरूरतमंद या गरीब परिवारों के बच्चे नहीं करते, संपन्न परिवारों के बच्चे भी तजुर्बा लेने के लिए, अपना जेब खर्च चलाने के लिए, और अपनी स्वतंत्रता की तरफ बढऩे के लिए ऐसे कई तरह के काम करते ही हैं। बहुत से बच्चे लोगों की कारें धोते हैं, वेटर या वेट्रेस की तरह काम करना बड़ी आम बात है। और इस पर चर्चा करना आज इसलिए जरूरी लग रहा है कि हिन्दुस्तान में मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों से भी यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे बाहर कुछ काम करके जेब खर्च जुटाएं, या घर पर ही कुछ काम कर लें। घर पर जिन कामों के लिए आमतौर पर नौकर-चाकर रखे जाते हैं, उनमें से कोई काम अगर घर के बच्चों को बता दिया जाए तो उनका आम जवाब रहता है कि वे नौकर तो हैं नहीं।
यही वजह है कि हिन्दुस्तान में काम का सम्मान जरा भी नहीं है, और यहां अमरीकी राष्ट्रपति जैसे ताकतवर ओहदे की बात तो छोड़ ही दें, किसी मामूली व्यक्ति से भी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अपने घर-दफ्तर पर काम करने वाले, कम तनख्वाह वाले लोगों से कभी मुस्कुराकर बात कर लें। यह पूरा सिलसिला भारत में जाति व्यवस्था से जुड़ा हुआ भी है जिसमें किसी काम को नीचा, और किसी काम को ऊंचा माना गया है। यहां पर किसी रेस्त्रां में मेज पर खाना परोसना, या जूठे बर्तन उठाना, या मेज को पोंछना शर्म की बात मानी जाएगी, और ऐसा करने के बजाय अधिकतर लोग बिना जेब खर्च के रहना पसंद करेंगे। आज अमरीका अगर आगे बढ़ा हुआ देश है, तो वहां पर सभी तरह के काम के लिए अधिकतर आबादी के मन में किसी तरह की हेठी नहीं रहती है, और संपन्न तबके के जो बच्चे बिना ऐसे पार्ट टाईम काम किए हुए बड़े हो जाते हैं, वे खुद भी आसपास के अपने हमउम्र लोगों के बीच शर्मिंदगी महसूस करते हैं। हिन्दुस्तानी बच्चों और नौजवानों के बीच काम का सम्मान समझाने की भी जरूरत है, और इस देश के संपन्न मां-बाप के दिमाग में भी इस बात को बिठाने की जरूरत है कि मेहनत से आगे बढ़ते उनके बच्चे सचमुच आगे बढ़ सकते हैं, बजाय मां-बाप के पैसों पर ही पलने के।

मदरसों पर मंदिर का प्रसाद थोपने का फैसला गलत

संपादकीय
6 अगस्त  2016
मध्यप्रदेश में उज्जैन शहर के मदरसों ने सरकार का बाहर से पकाकर पहुंचाया जा रहा दोपहर का भोजन लेने से मना कर दिया है। यह विरोध तब शुरू हुआ जब सरकार ने दोपहर के भोजन को पकाकर सप्लाई करने का काम इस्कॉन नाम के हरे कृष्ण सम्प्रदाय को दिया, और इस पर मदरसों की आपत्ति थी कि वहां पकाया भोजन पहले भगवान को चढ़ाया जाता है, और फिर प्रसाद के रूप में बाकी लोगों को पहुंचाया जाता है। मुस्लिम शैक्षणिक संस्थाओं का यह कहना था कि खाने के साथ जुड़ी हुई यह हिन्दू सोच उनकी मुस्लिम भावनाओं से अलग है, और इसलिए वे ऐसा प्रसाद नहीं ले सकते।
मध्यप्रदेश में यह अकेला तनाव नहीं है। स्कूलों में गीता पढ़ाने को लेकर, या योग में ओम की ध्वनि के साथ सूर्य नमस्कार करवाने को लेकर, कई तरह से वहां हिन्दू धर्म की सोच बाकी धर्मों के लोगों पर भी लादने का लंबा इतिहास है। और इसके साथ ही मध्यप्रदेश में साम्प्रदायिक तनाव का भी इतिहास है, और दलितों पर अत्याचार का भी। कुल मिलाकर हिन्दू धर्म के भीतर ही एक बहुत सीमित संख्या वाले जिन सनातनी सोच वाले लोगों का दबदबा सत्ता और समाज में है, वे न सिर्फ बाकी हिन्दू तबकों, बल्कि समाज के बाकी धर्मों के लोगों को उसी रंग में रंगना चाहते हैं। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब उमा भारती कुछ वक्त के लिए मुख्यमंत्री बनाई गई थीं, तो उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री निवास के अहाते में एक मंदिर बनवाया था, बल्कि मुख्यमंत्री की मेज भी मंदिर की तरह प्रतिमा और फूल-मालाओं से सजा दी गई थी। उनका अपना भगवा चोला तो उनके स्वघोषित साध्वी जीवन के मुताबिक था ही, उनकी बातें भी घोर साम्प्रदायिकता की रहती थीं, और रहती हैं। लेकिन उनके बाद भी मध्यप्रदेश में वह सर्वधर्म समभाव सत्ता के रूख में कभी नहीं दिखा, जो कि भारतीय विविधतावादी लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी है। सत्ता के रंग, सत्ता के समारोहों के रंग, सत्ता की योजनाओं के नाम, और सत्ता की जुबान, इन सबमें मध्यप्रदेश में एक ऐसा हिन्दूवादी माहौल खड़ा किया है, कि दूसरे धर्मों के लोगों का ऐसे में चौकन्ना हो जाना तय और जायज दोनों ही था।
हम पहले भी यहां पर कुछ मिसालें गिना चुके हैं कि किस तरह भारत में आक्रामकता के साथ हिन्दू धर्म के नाम पर कुछ बातों को थोपना शुरू होने के पहले तक भारतीय संस्कृति में हिन्दू धर्म की बातों को देश के सभी तबके एक स्वाभाविक सांस्कृतिक तत्व की तरह मंजूर करते आए थे। किसी सरकारी योजना का भूमिपूजन या शिलान्यास हो, या किसी सरकारी दफ्तर और बैंक में दीवाली की लक्ष्मी पूजा हो, दूसरे धर्मों के मंत्री-अफसर इनमें बिना कुछ सोचे शामिल होते आए थे, और देश में कभी यह मुद्दा नहीं बना कि मुस्लिम मंत्री-अफसर कैसे अपने मजहब के खिलाफ बुतपरस्ती करें। धर्म से परे भी संस्कृति के एक महत्व को हर कोई मानते थे। और हो सकता है कि वैसा माहौल रहता तो मध्यप्रदेश के मदरसे आज इस्कॉन के प्रसाद का विरोध नहीं करते। लेकिन देश में पिछले बरसों में जिस तरह लगातार एक निहायत गैरजरूरी और नाजायज धार्मिक टकराव खड़ा किया जा रहा है, दलितों और आदिवासियों के खानपान के खिलाफ एक हिंसा खड़ी की जा रही है, जिस तरह मुस्लिमों को पाकिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है, जिस तरह मरी हुई गाय को ठिकाने लगाते लोगों को भी गाय का कातिल करार देते हुए उन्हें मारा जा रहा है, उन सबको देखते हुए इस हमलावर सवर्ण-हिन्दू मान्यता के खिलाफ आबादी के एक बड़े हिस्से के मन में विरोध खड़ा हो गया है। और यह विरोध जगह-जगह सड़कों पर उतर रहा है, छात्रों के बीच से सामने आ रहा है, और दलित संगठनों के झंडे तले खड़ा हो रहा है।
मध्यप्रदेश सरकार को दोपहर के खाने में किसी धार्मिक संगठन को जिम्मा देने के पहले यह भी सोचना था कि न सिर्फ मदरसों के मुस्लिम बच्चे, बल्कि बाकी स्कूलों में पढऩे वाले गैरहिन्दू बच्चे भी ऐसा प्रसाद खाना मुश्किल पा सकते हैं। कभी स्कूलों के कोर्स को धार्मिक रंग देना, कभी योग का भगवाकरण करना, कभी खानपान को सनातनी करना, और कभी सरकारी खर्च के मिड डे मील में धर्म को घोलना, इनमें से कोई भी बात लोकतंत्र की मूल भावना के अनुकूल नहीं है, और देश-प्रदेश की हर सरकार को इससे बचना चाहिए, इससे एक ऐसा गैरजरूरी तनाव खड़ा हो रहा है जिसकी आग में मोदी के सारे आर्थिक कार्यक्रम, सारी योजनाएं झुलसकर रह जाएंगे।

सावधानी बरतने में ही समझदारी है

संपादकीय
5 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ के दुर्ग में पिछले दो दिन एक ही घटना के दो भयानक पहलू के रहे। एक नौजवान को उसकी बुजुर्ग मां की पुलिस रिपोर्ट पर गिरफ्तार किया गया कि बेटे ने उससे बलात्कार किया है। दूसरी खबर यह है कि इस नौजवान को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया और वहां उसकी ऐसी मौत हुई है कि अंदाज है कि जेल के सिपाहियों या कैदियों ने उसे पीटकर मार डाला। ये दोनों बातें बीच-बीच में सामने आती रहती हैं जब वर्जित संबंधों को तोड़कर लोग इस तरह की हरकत करते हैं, और फिर कभी अदालत में वकील ऐसे लोगों को पीटते हैं जो कि बेटी से बलात्कार के मामले में अदालत पहुंचे हैं, या जेल में लोग ऐसे लोगों को मारते हैं। कुछ मामलों में किसी शहर के वकील यह भी तय करते हैं कि ऐसे लोगों का मुकदमा न लड़ा जाए। दरअसल मानवीय संबंधों जो सामाजिक व्यवस्था है उसके तहत कुछ तरह के संबंध लोग बर्दाश्त करते हैं, और कुछ तरह के संबंध बिल्कुल भी बर्दाश्त के लायक नहीं होते हैं।
मां-बेटे का संबंध कुछ इसी तरह का है, या बाप-बेटी का संबंध, भाई-बहन का संबंध चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से भी ठीक नहीं है, क्योंकि इतने करीबी रक्त संबंध से अगर कोई संतान पैदा होती है, तो उसके सामने जेनेटिक दिक्कतें आती हैं। ऐसे बहुत से वैज्ञानिक अध्ययन हैं जो कि ऐसे संबंध न करने की सलाह देते हैं, और भारत के कुछ समुदायों में कुछ पीढिय़ों तक के भाई-बहन या दूसरी तरह के रक्त संबंधियों के बीच रिश्तों पर रोक रहती है। हालांकि बलात्कार और हत्या की जिस घटना को लेकर हम यहां लिख रहे हैं, वह किसी विचलित दिमाग से किया गया जुर्म अधिक लगता है, और उसका नतीजा भी बहुत बुरा हो चुका है। लेकिन आज की ही एक दूसरी खबर है कि बिहार में एक नौजवान ने अपनी पत्नी को छोड़ दिया, और सास से शादी कर ली। अब मां के साथ-साथ सौत भी बन गई इस महिला का अपनी बेटी से कहना है कि वह उसके साथ भी रहने को तैयार है। लेकिन ऐसे संबंधों को समाज व्यवस्था के भीतर अधिकतर जगहों पर कोई मंजूरी नहीं है, इसलिए यह अधिक अटपटा भी लगता है।
सामाजिक रीति-रिवाजों और समाज व्यवस्था का यह पूरा मुद्दा वैसे तो बहुत व्यापक और बहुत जटिल है, और इसके ऊपर हम नैतिकता के किसी भी पैमाने का इस्तेमाल करके अपने कोई विचार रखना नहीं चाहते हैं, लेकिन इन दो घटनाओं और आए दिन आने वाली ऐसी और खबरों को लेकर यह जरूर सोचते हैं कि वर्जित संबंधों को लेकर समाज व्यवस्था के भीतर जिस तरह की सावधानी बरतने की बात सदियों से कही जाती है, उसका एक महत्व रहता है। अधिकतर जगहों पर यह कहा जाता है कि जवान हो चुके दो लोगों को वर्जित संबंधों का ध्यान रखते हुए एक हद से ज्यादा करीब नहीं रहना चाहिए। पुराने जमाने से आग और घी को करीब न रखने की बात कही जाती है, क्योंकि इंसानी बदन की जरूरतें बहुत मौकों पर समाज की लगाई हुई पाबंदियों को मानने से इंकार कर देती हैं। बहुत से ऐसे कमजोर पल होते हैं जब लोग तमाम वर्जनाओं को भूलकर उस पल के सुख के सामने बेकाबू हो जाते हैं। ऐसे ही बहुत से कमजोर पलों में अनैतिक समझे जाने वाले रिश्ते भी बन जाते हैं, बलात्कार भी किए जाते हैं, और परिवार से लेकर समाज तक के भीतर बर्बाद कर देने वाले तनाव खड़े होते हैं।
समाज व्यवस्था जहां बहुत से मामलों में गैरजरूरी हैवानियत दिखाती है, और प्रेम से लेकर समलैंगिकता तक का विरोध करती है, दूसरे धर्म या जाति में शादी के खिलाफ रहती है, वहीं ऐसी मानवीय कमजोरियों को रोकने के लिए उसकी बनाई हुई कुछ बंदिशें ठीक भी लगती हैं। परिवार के भीतर होने वाले हर तरह के जुर्म इन बंदिशों से नहीं रूकते, लेकिन दुनिया की किसी भी सामाजिक, नैतिक, या संवैधानिक बंदिश से हर तरह के जुर्म नहीं रूक सकते, उनको कम ही किया जा सकता है। इसलिए वर्जित संबंधों को लेकर, और मानवीय कमजोरी के खतरों को देखते हुए परिवारों के भीतर भी एक सावधानी बरतने में ही समझदारी है।

संसदीय लोकतंत्र में सहमति का महत्व

संपादकीय
4 अगस्त  2016
बहुत समय बाद भारतीय संसद में किसी बात को लेकर एकमत सा हुआ और देश में टैक्स ढांचे को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ा कानून बनने का रास्ता खुला। अब यह उम्मीद है कि राज्यों की विधानसभाओं से मंजूरी पाते हुए जीएसटी अगले साल-छह महीने में लागू हो जाएगा। जीएसटी विधेयक यूपीए सरकार के वक्त बना था, और उस वक्त देश के विपक्ष में रही एनडीए ने इसका जमकर विरोध किया था। छत्तीसगढ़ भी उन भाजपा-एनडीए राज्यों में से एक था जहां के वित्त मंत्रियों ने दिल्ली जाकर इसका खुला विरोध किया था। इसके बाद जब अरूण जेटली पर देश की अर्थव्यवस्था का बोझ पड़ा, तो इस टैक्स व्यवस्था का महत्व समझ आया, और कांग्रेस को मनाते हुए दो बरस गुजर गए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस की मर्जी के कुछ संशोधनों के साथ अब यह विधेयक राज्यसभा में पारित हो चुका है, और देश के ग्राहकों को, जनता को इसका असर देखने मिलेगा।
अभी हम इससे होने वाले अलग-अलग नफे-नुकसान की बात नहीं कर रहे, क्योंकि पिछले दो दिनों में हमने इस अखबार में इस बारे में बहुत से अधिक जानकार लोगों के विश्लेषण छापे हैं, और आज के अखबार में भी इस बारे में जानकारी जा रही है। लेकिन हम भारत सरीखे लोकतंत्र में संसदीय सहमति की अहमियत, और उसकी कमी, इस बारे में जरूर बात करना चाहते हैं कि विरोध के नाम पर विरोध कितना खतरनाक होता है। हमको याद है कि छत्तीसगढ़ में जब अजीत जोगी कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, और उन्होंने हेलमेट लागू करवाने की कोशिश की थी, तो भाजपा सड़कों पर उतर आई थी। इसके बाद भाजपा की सरकार आई और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने यही कोशिश की, तो कांग्रेस इसके खिलाफ सड़कों पर थी, और हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को जैसा नारा लगा रही थी। जबकि उसी पार्टी के पिछले मुख्यमंत्री हेलमेट के हिमायती रह चुके थे, और उस दिन के कुछ प्रमुख प्रदेश कांग्रेस नेता हेलमेट का समर्थन कर रहे थे, फिर भी कांग्रेस के बकवासी नेता गालियों का इस्तेमाल कर रहे थे, और लोगों के बीच लापरवाही बढ़ा रहे थे। यह एक छोटी सी मिसाल है, लेकिन देश की संसद में भी ऐसे बहुत से मौके लगातार आते हैं, जब किसी विधेयक पर चर्चा को रोका जाता है, और राजनीतिक विरोध संसदीय अड़ंगा बनकर देश का नुकसान करता है। भारतीय लोकतंत्र को अपने सत्तरहवें बरस में पहुंचते हुए जिस परिपक्वता को हासिल करना था, वह उससे कोसों पीछे है, और पार्टियों के बीच की कटुता देश पर राज कर रही है।
हम छत्तीसगढ़ में भी यह देख रहे हैं कि सरकार के खिलाफ किसी आंदोलन को चलाने के नाम पर जिस तरह के उथले अंदाज में सड़कों पर हरकतें की जा रही हैं, उससे सबसे बड़ा नुकसान तो राज्य की जनता का हो रहा है, जिसके असल मुद्दे धरे रह जा रहे हैं, और तुकबंदी वाले नारे आंदोलन बन रहे हैं। यह सिलसिला चाहे जिस देश में हो, चाहे जिस प्रदेश में हो, उसके पीछे की नीयत को उजागर करना लोकतांत्रिक ताकतों की जिम्मेदारी है।
संसदीय लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था नहीं है कि जिसमें हर मुद्दे पर, हर दिन सदन के भीतर के बाहुबल की पंजा-कुश्ती करवाई जाए। लोकतंत्र में व्यापक जनहित को देखते हुए दो चुनावों के बीच के पांच बरसों में महज दंगल से संसदीय व्यवस्था नहीं चल सकती। और भारत में लोगों की, राजनीतिक दलों की बाहुबल-प्रदर्शन की चाहत इतनी मजबूत है कि देश की जनता सड़क किनारे भूखी और जख्मी पड़ी हो, पार्टियां सड़क पर कुश्तियों में लगी रहती हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से आज देश का प्रिंट मीडिया भी सतह पर तैरती हुई सनसनी पर जिंदा रहने की लत का शिकार हो चुका है, और कल तक अखबारों की जो गंभीरता थी, उसे आज टीवी चैनलों की सनसनी का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मीडिया भी आज राजनीति को जिम्मेदारी की नसीहत देने के बजाय, उसकी गैरजिम्मेदारी पर अधिक जिंदा है। यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए बहुत ही निराशा की है, आज इतने बरसों की कोशिशोंके बाद, कई सरकारों के आने-जाने के बाद किसी तरह समझौते करके जीएसटी बिल पास हुआ है, लेकिन देशहित के ऐसे ढेरों काम देश की संसद, और प्रदेशों की विधानसभाओं में धक्के खा रहे हैं।

बलात्कार और बकवास

संपादकीय
3 अगस्त  2016
उत्तरप्रदेश में सड़क सफर कर रहे एक परिवार को रोककर अपराधियों ने लूटा और महिलाओं से बलात्कार किया। इसे लेकर एक तरफ तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिले के तमाम बड़े अफसरों को बेदखल कर दिया है, लेकिन दूसरी तरफ उनकी पार्टी के एक बड़बोले मंत्री आजम खान ने कहा है कि इस घटना के पीछे राजनीतिक साजिश हो सकती है। लोगों को याद होगा कि ममता बैनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक बलात्कार हुआ था, और पुलिस की जांच शुरू ही पहले ममता ने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश करार दिया था, और बाद में उन्हीं की पुलिस ने उस मामले में लोगों को गिरफ्तार करके अदालत से सजा भी दिलवाई थी। अब आजम खान का यह कहना कि वोटों के लिए लोग किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं, और जब मुजफ्फरनगर हो सकता है, शामली और कैराना हो सकता है तो यह क्यों नहीं हो सकता। जाहिर है कि ऐसे संवेदनाशून्य बयान पर इस बलात्कार की शिकार नाबालिग के पिता ने जवाब में यह सवाल किया है कि क्या आजम खान के परिवार के साथ ऐसी घटना होती तब भी क्या वे ऐसी बात कहते?
भारत में न सिर्फ राजनीति, बल्कि जिंदगी के किसी भी दायरे में ताकत पा जाने वाले लोगों में से कुछ लोग इतने बददिमाग हो जाते हैं, कि वे न सिर्फ बेदिमागी की, बल्कि हिंसा की भी बातें करने लगते हैं। हम पहले भी इसी कॉलम में लिख चुके हैं कि ऐसी हिंसक और ओछी बकवास के खिलाफ मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग जैसे राज्य और केन्द्र के संवैधानिक संगठनों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों को भी ऐसे हिंसक बयानों पर नोटिस जारी करना चाहिए। लेकिन राजनीति में एक-एक करके अधिकतर पार्टियों के लोग गंदगी की बातें करते आए हैं, और हरेक के सामने गंदगी के लिए दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं की मिसाल मौजूद रहती है। लेकिन हमारा मानना है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों को ऐसे मामलों पर चुप रहने के बजाय खुलकर बोलना चाहिए, और जब कभी ऐसे बकवासी नेता चुनाव मैदान में रहें, उनके खिलाफ एक अभियान भी छेडऩा चाहिए। किसी नेता के पेट पर लात दो ही मौकों पर पड़ सकती है, जब उसका वोट कमाने का मौका हो, या जब उसका नोट कमाने का मौका हो।
लेकिन बलात्कार को भारत में बहुत से लोग कॉर्टून और लतीफों का सामान भी मान लेते हैं और हमारा मानना है कि सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। देश की जनता की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का दीवाला ऐसा निकला हुआ है कि सलमान खान बलात्कार का मजाक बनाता है, और उसकी फिल्म हिट हो जाती है, जो कि जाहिर है कि महिला दर्शकों के बिना नहीं हो सकती, और ऐसे आदमियों के बिना भी नहीं हो सकती जिनको किसी महिला ने जन्म दिया है। इसलिए जब तक देश की जनचेतना हिंसक बयानों के खिलाफ नहीं होगी, तब तक नेताओं की बेशर्मी जारी रहेगी। हम अगर उत्तरप्रदेश या देश के महिला आयोग की कुर्सी पर होते तो आजम खान को नोटिस जारी करते, और अगर उत्तरप्रदेश या देश की सबसे बड़ी अदालत के जज होते, तो भी आजम खान को बिना किसी रिपोर्ट के अदालती कटघरे में खींच लाते।

उग्र राष्ट्रवाद से घायल अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाने की जरूरत

संपादकीय
2 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ में आज एक सामाजिक संगठन ने स्कूली बच्चों के लिए गणित और अंग्रेजी में मदद करने वाली किताब व अन्य सामग्री की किट बांटना शुरू किया है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में यह कार्यक्रम हुआ, और उन्होंने कहा कि प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधार की जरूरत है। प्राइमरी स्कूलों में बेहतर शिक्षा से बच्चों में आगे बढऩे की इच्छा शक्ति बनती है। हम अभी इस संगठन के काम के बारे में नहीं जानते और यह पता नहीं है कि यह किट कितनी उपयोगी है, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि स्कूलों में अंग्रेजी की कितनी जरूरत है। हम पहले भी इस बारे में लिखते हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में बाकी तमाम बातों के साथ-साथ बेहतर अंग्रेजी की बहुत जरूरत है, और स्कूल-कॉलेज की इमारतों में खाली घंटों में बेरोजगारों को भी अंग्रेजी सिखाने की जरूरत है।
राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर, राष्ट्रभाषा के नाम पर जो लोग एक उन्माद फैलाने की कोशिश करते हैं, वैसे बहुत से लोगों के अपने बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं, और हम नाम गिनाना नहीं चाहते, लेकिन ऐसे बहुत से नेताओं के बच्चे ईसाई स्कूलों में भी पढ़ते हैं जिनके खिलाफ वे धर्मांधता फैलाने की कोशिश करते रहते हैं। हमारा तो यह मानना है कि भाषा महज एक औजार होती है, और उसका जो बखूबी इस्तेमाल कर ले, वही उस भाषा का सम्मान है, वरना पूरी जिंदगी हिन्दी सेवक का तमगा लगाकर घूमने वाले गुजर चुके छत्तीसगढ़ के विधानसभाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला ने सरकारी बंगले का नाम स्पीकर हाऊस रखवाया, जो कि आज भी जारी है। और छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नाम पर बरसों से एक राष्ट्रवादी पत्रकारिता का नारा बुलंद किया जा रहा है, वहां से लोग पत्रकार बनकर तो नहीं निकल रहे, लेकिन देश भर से छांटकर बुलाए गए लोगों के प्रवचन सुन-सुनकर हो सकता है कि राष्ट्रवादी-गैरपत्रकार जरूर बन गए हों। ऐसे विश्वविद्यालय ने अभी पिछले कुछ हफ्तों में दाखिले के जो इश्तहार छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपवाए हैं वे सारे के सारे अंग्रेजी में हैं। छत्तीसगढ़ की तमाम आबादी हिन्दी पढऩे और समझने वाली है, और इस विश्वविद्यालय की पढ़ाई हिन्दी में है, इसके बावजूद इस स्वघोषित राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय के इश्तहार अंग्रेजी में छप रहे हैं। हम इसके भी खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जो लोग अंग्रेजी के रास्ते कमाते-खाते हैं, जो अंग्रेजी पढऩे अपने बच्चों को भेजते हैं, वे भी आम आबादी के राष्ट्रभाषा के झांसे में रखते हैं।
आज दुनिया में संपर्क की जो भाषा भारतीय उपमहाद्वीप के काम की है, वह अंग्रेजी ही है। अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, या अंग्रेजी का विरोध पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों का नुकसान करते आ रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और कोई देश अपनी भाषा की वजह से सम्मान नहीं पाता, अपनी भाषा बोलने वालों की कामयाबी से, उनकी महानता से सम्मान पाता है। आज राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा और गौभक्ति का नाम लेकर धार्मिक और साम्प्रदायिक हिंसा और उन्माद फैलाकर किसी तरह का सम्मान नहीं पाया जा सकता। इसलिए अंग्रेजी जरूरी है, और इसे सरकार करे या सामाजिक संगठन, यह काम छत्तीसगढ़ में होना चाहिए। आज देश के जिन प्रदेशों के लोग दुनिया भर में पहुंचकर आगे बढ़ते हैं, उनकी तरक्की में एक बड़ा योगदान अंग्रेजी भाषा का भी है, और छत्तीसगढ़ के बच्चों और नौजवानों को इसे एक अनिवार्य हुनर के रूप में दिया जाना चाहिए। 

भूतों से बंगले खाली करवाने की जरूरत

संपादकीय
1 अगस्त  2016
उत्तरप्रदेश की एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उस राज्य के आधा दर्जन भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का आदेश दिया है। दो महीने के भीतर मकान खाली करने का यह आदेश संभवत: बाकी देश पर भी लागू होगा जहां पर भूतपूर्व मुख्यमंत्री, या मंत्री, या बाकी नेताओं ने इसे एक आदत ही बना ली है कि एक बार किसी बंगले में घुसें, तो अधिक से अधिक वक्त तक वहां बने रहें। दिल्ली में तो मीरा कुमार से लेकर अजीत सिंह तक कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने पिताओं के नाम पर सरकारी बंगलों को स्मारक ही बना डाला है। कई राज्य ऐसा करने के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ नियम बना लेते हैं, और कई बार सरकारें चुनावी-राजनीतिक कारणों से किसी जाति या क्षेत्र के नेता के कुनबे को ऐसे बंगला-स्मारक की खास छूट दे देती हैं।
हमारा मानना है कि जनता के पैसों पर बनने और चलने वाले सरकारी बंगलों को लेकर अदालत को एक कड़ा रूख सामने रखना चाहिए, और इस आदेश का एक विस्तार भी करना चाहिए, ताकि कार्यकाल खत्म होने के बाद एक-दो महीने के भीतर हर किसी को बंगला खाली करना पड़े। जहां कहीं भूतपूर्व लोगों को सरकारी बंगले देने का इंतजाम किया गया है, वह भी खत्म होना चाहिए, क्योंकि जनता भूतों का बोझ कब तक ढोए? लोग अपने परिवार के गुजरे हुए पुरखों का वजन तो ढो नहीं पाते, और गयाजी जाकर उनका पिंडदान करते हैं, ताकि आगे बरसी की जरूरत न हो। ऐसे में जिन राज्यों में आधे वक्त बिजली बंद रहती है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं है, जहां आधी आबादी रियायती चावल की वजह से ही दो वक्त खाना खा पाती है, वहां पर इस तरह की सामंती और शाही दरियादिली जनता के पैसों से नहीं दिखाना चाहिए। और फिर ऐसी मिसालें किसी एक महात्मा गांधी पर खत्म नहीं हो पातीं, आज तो नेताओं के कुनबे के लोग अपनी हसरतों को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक बंगलों और सहूलियतों पर कब्जा करना चाहते हैं।
भारत में शायद अकेले गांधी ही ऐसे रहे जिनके नाम पर उनके वारिसान ने कोई मकान नहीं लिया, और शायद नेहरू ऐसे अकेले नेता रहे जिन्होंने आनंद भवन की अपनी निजी जायदाद सरकार को दे दी। कुछ वामपंथी मुख्यमंत्री, और मंत्री ऐसे रहे जिन्होंने बहुत किफायत के साथ सरकारी-जिंदगी पूरी की। जिस वक्त सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे, उस वक्त भी कोलकाता में वे एक सरकारी क्लर्क के दर्जे के मकान में रहते थे। लेकिन अब चलन अपने जीते जी हजारों करोड़ से अपने स्मारक बनवाने का है, अपने गांव में हवाई अड्डा बनवाने का है, और अपने मां-बाप के नाम पर सरकारी बंगले को स्मारक के लिए आबंटित करवाने के लिए राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करने का है। देश के ऐसे खराब राजनीतिक माहौल में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत अच्छा है, और इसे हर प्रदेश में लागू करवाने के लिए स्थानीय संगठनों को आगे आना चाहिए, और सरकार से लेकर अदालत तक को गिनाना चाहिए कि ऐसे दायरे में, कौन-कौन से बंगले आ रहे हैं।