घूरों-नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए

संपादकीय
21 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर से लगे हुए ओडिशा के इलाकों में जापानी बुखार फैला हुआ है, और वहां मौतें सौ के करीब पहुंचने को हैं और जिस तरह छत्तीसगढ़ की सरहद से लगे हुए ओडिशा, आन्ध्र, तेलंगाना, और महाराष्ट्र से यहां पर नक्सली आते हैं, उसी तरह बीमारियां भी यहां आ सकती हैं। आज बस्तर के सुकमा में एक बच्ची की जापानी बुखार से मौत के साथ ही इस राज्य में भी इस बीमारी का खतरा पहुंच गया है। यह बीमारी पालतू सुअरों से फैलने की जानकारी है, और जब ओडिशा में बड़ी संख्या में सुअर मारे जाने लगे, तो उन्हें औने-पौने दाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर में लाकर भी बेचना शुरू किया गया। यह खतरा भारत और पाकिस्तान या भारत और बांग्लादेश जैसे दो देशों के बीच भी रहता है जहां सरहद को पार करना आसान रहता है। और छत्तीसगढ़ और ओडिशा तो एक ही देश के दो ऐसे राज्य हैं जहां खरीद-बिक्री पर भी कोई रोक नहीं है, और न ही लोगों के आने-जाने पर। इसलिए यह खतरा और अधिक है कि एक प्रदेश की बीमारी दूसरे प्रदेश तक पहुंच जाए।
लोगों को याद होगा कि एक समय जब गुजरात के सूरत में गंदगी की वजह से प्लेग फैला था, और वहां से रेलगाडिय़ों में भरकर लोग पूरे देश में जा रहे थे, तब सूरत से आने वाली रेलगाड़ी को देखकर दहशत फैलती थी। लेकिन आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का मकसद ओडिशा के इंसानों या वहां के सुअर को लेकर छत्तीसगढ़ में दहशत फैलाना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि ऐसी कोई महामारी यहां के जानवरों से भी यहां फैल सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गंदगी आसमान को छू रही है, शहर के बहुत से हिस्से ऐसे हैं जहां गंदगी का अम्बार है, और उस पर सुअरों के झुंड पूरे समय दिखते रहते हैं। इस शहर में चौथाई सदी तो इस बात को सुनते हो गई है कि डेयरियों को बाहर ले जाना है। जब यहां शहर के बाहर गोकुल नगर बनाया गया, उस बरस जिस बच्चे का नाम गोकुल रखा गया होगा, वह बच्चा भी अब 25 बरस का हो चुका होगा। लेकिन स्थानीय संस्थाएं अब निजी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की तरह कांक्रीट के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में उलझकर रह गई हैं, और सफाई की अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी को भूल चुकी हैं। जब तक शहर साफ नहीं रहता, तब तक आसपास के गांव और कस्बों को भी साफ रहने के लिए नसीहत नहीं दी जा सकती। हालत यह है कि पूरा का पूरा छत्तीसगढ़ गंदगी के प्रति संवेदना खो चुका है, और अब वह गंदगी को अपनी नियती मान बैठा है। ऐसे में किसी भी दिन कोई बड़ी महामारी न सिर्फ ओडिशा से यहां आ सकती है, बल्कि वह यहां से उपज भी सकती है, और पड़ोसी राज्यों के लिए भी खतरा बन सकती है।
गुजरात का सूरत इस बात की मिसाल है कि गंदगी की मिसाल बनने के बाद और महामारी का शिकार होने के बाद हक्का-बक्का नागरिकों के साथ मिलकर एक जिम्मेदार स्थानीय म्युनिसिपल किस तरह शहर को देश के  सबसे साफ शहरों में से एक बना सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित यहां के कई और शहरों को, बहुत से कस्बों को एक ऐसी सफाई की जरूरत है जो कि किसी महामारी की नौबत न आने दे। सरकार को भी यह चाहिए कि स्थानीय संस्थाओं को कमाऊ प्रोजेक्ट में जोत देने के बजाय उनको सफाई का उनका जिम्मा याद दिलाना चाहिए। आज हजारों करोड़ की लागत से एक-दो शहरों को स्मार्ट बनाने का नारा हवा में तैर रहा है, हम चाहते हैं कि कम से कम घूरों और नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए, और वहां से शुरुआत करना जरूरी है।

नई दीवाली के बहाने, पुरानी सलाह फिर से

संपादकीय
20 अक्टूबर 2016
आज हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा ही हिस्सा एक बड़े त्योहार दीवाली की तैयारियों में लगा है, घरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन किए जा रहे हैं। इसके कुछ दिन पहले ही गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को देश भर में स्वच्छता अभियान एक बार फिर शुरू हुआ। सड़कों के किनारे झाड़ू लिए हुए नेता और अफसर तस्वीरें खिंचवाकर छपवा भी चुके हैं, और उसके बाद अब शहरी इलाके फिर से घूरे जैसे दिखने लगे हैं। ऐसे में सार्वजनिक जगहों से परे, निजी जिंदगी में भी एक सफाई की गुंजाइश बनती है और इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। हम हर बरस इन्हीं दिनों इस मुद्दे पर लिखते हैं, और हो सकता है कि कुछ लोगों पर उसका असर भी होता है।
मध्यम वर्ग और उससे ऊपर के तबकों में, घरों में बहुत से सामान ऐसे रहते हैं जो कि कचरा नहीं रहते, खराब नहीं रहते, लेकिन वे बेकार पड़े रहते हैं, या बेकाम रहते हैं। चीजों का मोह ऐसा रहता है कि लोग कई बार बच्चों के झूले, उनको घुमाने की गाडिय़ां, अगली पीढ़ी तक सम्हालकर रख लेते हैं। यही हाल कपड़ों और जूतों का रहता है, नए सामान आते जाते हैं, और पुरानों की बिदाई कभी नहीं हो पाती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, घरों में कबाड़ उसी अनुपात में बढ़ते चलता है। घर पर कोई साइकिल चलाने वाले नहीं रह जाते, लेकिन जंग खाती साइकिल रह जाती है। लेकिन बड़े सामानों से परे, बहुत से छोटे सामान भी रहते हैं। दवाइयां बची रह जाती हैं, बदले हुए नंबरों के नए चश्मे आ जाते हैं, और पुराने चश्मे पड़े रहते हैं। ऐसे अनगिनत सामान रहते हैं जिनको कि दूसरे जरूरतमंद लोग इस्तेमाल कर सकते हैं।
कई बरस पहले हमने इसी जगह पर 'दस का दम' नाम का एक ऐसा अभियान सुझाया था कि जिसके तहत उत्साही लोग दस-दस के समूह बनाएं, और अपने आसपास के लोगों के घरों से फालतू सामान इकट्ठा करके उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम करें। हमने यह भी सुझाया था कि जिस तरह नेटवर्क मार्केटिंग के नाम पर झांसा देने वाली कंपनियां अपनी चेन बढ़ाती चलती हैं, उसी तरह नेक काम का सिलसिला भी फैलते चल सकता है, और उत्साही लोगों में से हर कोई अपने साथ ऐसे दस लोगों को जोड़ सकते हैं, जो कि आगे वैसे ही दस-दस उत्साही लोगों को जोडऩे के लिए तैयार हों। हमने यह बात कई बरस पहले लिखी थी, और अभी सफाई अभियान के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक इसी तरह का काम किया, और उन्होंने देश के नौ प्रमुख लोगों के नाम लिए, और उन्हें सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मा दिया। इसके बाद ये प्रमुख लोग अपने आसपास के और लोगों के नाम ले रहे हैं, और यह सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ रहा है।
सालाना सफाई के त्यौहार दीवाली के मौके पर हम इस सोच को फिर याद दिला रहे हैं कि धरती पर नए सामानों का बोझ घटाने के लिए, घरों से कबाड़ का बोझ कम करने के लिए, और जरूरतमंद तबके की मदद करने के लिए इस तरह का 'दस का दम' अभियान लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी में जब हम अच्छे काम करते हैं, तो उससे एक ऐसी ताकत भी मिलती है कि तन और मन बाकी कामों को भी बेहतर कर सकते हैं। अमरीका जैसे पूंजीवादी देश में भी किसी कंपनी का मुखिया बनाने के पहले इस बात को देखा जाता है कि ऐसे लोग सामाजिक सरोकारों के काम कर चुके हैं या नहीं। वहां के सबसे कामयाब लोगों में से एक, बिल गेट्स अभी पूरी दुनिया में घूम-घूमकर खरबपतियों का हौसला बढ़ा रहे हैं कि वे अपनी पूंजी का कम से कम आधा हिस्सा समाज सेवा के लिए दें।
हम अपने आसपास ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो कि बिना किसी मतलबपरस्ती के, दूसरों के भले के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भले लोग खबरों में कम आते हैं, और मीडिया जुर्म की खबरों से भरे रहता है। लेकिन अच्छा काम करने के लिए खबरों में जगह पाने की कोई जरूरत नहीं रहती। लोग घरों से कबाड़ निकालकर समाज के कमजोर तबके तक बांटने का सिलसिला शुरू करें, तो उन्हें देखकर हर किसी को यह याद पडऩे लगेगा कि वे अपने घर से कौन सा कबाड़ कम कर सकते हैं। और सामानों के इस तरह दो-चार बार इस्तेमाल से ही धरती के साधनों का बचाव होगा, और धरती बच सकेगी।

समाज में सेक्स-खतरों पर खुली बातचीत की जरूरत

संपादकीय
19 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के भिलाई में एक महंगे निजी स्कूल में चार बरस की छोटी सी बच्ची के साथ स्कूल के ही एक कर्मचारी द्वारा बलात्कार करने की खबर आ रही है। अभी वहां भीड़ लगी हुई है और तनाव जारी है, बच्ची के घरवालों की शिकायत के बाद आरोपी कर्मचारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसके पहले भी न सिर्फ इस शहर में, बल्कि छत्तीसगढ़ के बहुत से शहर-कस्बों में, गांव-गांव के आदिवासी आश्रम-छात्रावासों में, मदरसों में और दूसरे धर्मों से जुड़ी हुई स्कूलों में ऐसे मामले हुए हैं, और एक भी मामला ऐसा नहीं रहा जिसमें कोई पकड़ाया न गया हो। लेकिन मुजरिम के पकड़े जाने और सजा पाने से बच्चों की बाकी पूरी जिंदगी पर लगने वाले जख्म की कोई भरपाई नहीं हो सकती। और छत्तीसगढ़ के जिस भिलाई में यह घटना हुई है, वह दुर्ग-भिलाई शहर बलात्कार के मामले में कई बार देश में सबसे अधिक बलात्कार वाले दस लाख आबादी के शहरों में सबसे ऊपर गिनाता है।
ऐसे हादसों की जानकारी पर हमारा एक बिना किसी आधार का अंदाज यह है कि दस-बीस में से कोई एक मामला ही बच्चे अपने मां-बाप या स्कूल-टीचर को बता पाते हैं, और उनमें से अधिकतर मामलों में पुलिस में शिकायत नहीं होती है कि कौन बदनामी झेले, कौन अस्पताल और कोर्ट-कचहरी में आते-जाते कैमरों का सामना करे। समाज में जब सेक्स-अपराधों के खिलाफ शिकायत के मामले में लोगों में हौसला कम है, और शिकायत के बाद भी कार्रवाई न होने पर छत्तीसगढ़ में ही लड़कियों और महिलाओं की आत्महत्या के मामले बहुत अधिक हैं, तो ऐसे में सरकार और समाज दोनों को मिलकर जागरूकता का एक अभियान चलाना चाहिए। हमारा ऐसा खयाल है कि बलात्कारी की नीयत चाहे जो भी हो, अपराध करने के ऐसे दौर के दौरान उसके दिमाग से यह डर निकल जाता है कि उसे किस तरह की जेल हो सकती है, और उतनी लंबी कैद के दौरान उसका परिवार किस तरह और किस हद तक तबाह हो सकता है। अगर समाज के लोगों को ऐसी नौबत का एहसास कराया जाए, तो हो सकता है कि कई मुजरिमों का ऐसे जुर्म का हौसला जवाब दे जाए। दूसरी तरफ परिवार और समाज को सरकार के साथ मिलकर खतरों की ऐसी नौबत को घटाना होगा जिनमें बच्चे या लड़कियां-महिलाएं अकेले रह जाते हैं, और किसी सेक्स-अपराधी के शिकार हो जाते हैं। स्कूलें, खेल के मैदान, काम की जगह, अस्पताल, या सूना घर, इन जगहों को किस तरह की सामाजिक या सरकारी निगरानी या सावधानी में रखा जा सकता है, इसके बारे में अपने मोहल्ले या कॉलोनी में लोगों को बैठकर सोचना चाहिए, और उसके रास्ते निकालने चाहिए। हमारा यह पक्का मानना है कि पुलिस की वर्दी और लाठी, बंदूक या निगरानी मिलकर भी न तो किसी बलात्कारी के दिल-दिमाग को पढ़ सकते, और न ही इस जुर्म को रोक सकते। इसलिए लोगों को ही सावधानी से ऐसे जुर्म के खतरे को घटाना होगा।
दूसरी बात यह कि बलात्कार से कम गंभीर सेक्स-अपराध ऐसे होते हैं जिनमें छोटे बच्चों के देह शोषण के मामले गिनती में बहुत अधिक होते हैं। यह बात अधिकतर हर परिवार के लोग, दोस्त और पड़ोसी, और परिचित लोग ही अधिक करते हैं। इसके बारे में भी स्कूलों को बच्चों को जागरूक करने का अभियान छेडऩा चाहिए, दिक्कत यह है कि इसे तुरंत यौन शिक्षा का लेबल लगाकर दकियानूसी लोग इसके खिलाफ अभियान छेड़ देते हैं। हम इन मुद्दों पर और अधिक लिखने के बजाय केवल यही चाहते हैं कि सरकार और समाज मिलकर इस तरह के सेक्स-खतरों पर खुलकर चर्चा करे, क्योंकि खुली बातचीत के बिना किसी तरह के बचाव की कोई गुंजाइश नहीं बन सकेगी।

मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता

संपादकीय
18 अक्टूबर 2016
बिना जरूरत और बिना मतलब कहना सार्वजनिक जीवन में खासी दिक्कत खड़ी कर सकता है। आमतौर पर खबरों में एक अच्छे इंसान की तरह दिखाए जाने वाले भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर अपने एक बयान से एक निहायत ही गैर जरूरी विवाद में फंसे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय फौज ने पाकिस्तान पर जो सर्जिकल स्ट्राइक किया, उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच का फायदा मिला था। अब इस बात का कोई तुक नहीं बनता कि एक ऐसी फौजी कार्रवाई को संघ से जोड़कर रक्षामंत्री लोगों को इस हमले और संघ पर चौतरफा टिप्पणी करने का मौका दिया। अच्छे भले समझदार लोग भी माइक सामने आते ही बेमतलब बातें करने लगते हैं, और पिछले दो बरस में कम से कम आधा दर्जन बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या उनकी पार्टी की तरफ से अनौपचारिक सार्वजनिक बयानों में पार्टी के नेताओं को चुप रहने की नसीहत दी गई है। किसी भी मुद्दे को तबाह करना हो, तो उसकी गंभीरता से परे कोई ओछी या बेतुकी बात छेड़ दी जाए, तो मुद्दा धरे रह जाता है, और बेतुकी बातों पर लाठियां चलने लगती हैं।
यह पता नहीं सोची समझी बात रहती है, या कि महज संयोग है कि यूपीए के रक्षामंत्री एके एंटोनी और मनोहर पर्रिकर, दोनों ही अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। और राजनीति में इनको ईमानदार भी माना जाता है। चूंकि किसी भी देश में फौजी खरीदी में सैकड़ों करोड़ से लेकर हजारों करोड़ तक के भ्रष्टाचार की खबरें रहती हैं, और ऐसे में दिखावे के लिए एक ईमानदार मंत्री सरकारी की साख के लिए अच्छा साबित होता है। लेकिन ऐसे अच्छे मंत्री को सरकारी काम से परे सार्वजनिक बयानों में भी अच्छा बने रहना चाहिए, और मनोहर पर्रिकर ने हिंदुस्तानी फौज की एक कार्रवाई को लेकर यह निहायत गैरजरूरी बयान दिया है। भारत की फौज की तारीफ इसलिए नहीं हो सकता है कि वह किसी संगठन की सोच के मुताबिक फौजी कार्रवाई करे। उसकी तारीफ तभी हो सकती है, जब वह एक अच्छी फौज की तरह कार्रवाई करे।
सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर वैसे भी उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार में लगी भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उसे भाजपा की एक जीत साबित करने पर उतारू है, वह तरीका भी भारतीय फौज का सम्मान करने का नहीं है, और वह उसकी एक साधारण कार्रवाई को राजनीतिक रूप से दुहने का काम है, जो कि नहीं किया जाना चाहिए। भारत जैसे मजबूत लोकतंत्र में फौज का सम्मान राजनीति करके नहीं किया जा सकता। 

बीसीसीआई के मामले में काटजू का यह बयान ठीक लगता है कि कपड़े उतार कोड़े लगाएं...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2016
भारत में क्रिकेट को नियंत्रित करने वाला संगठन बीसीसीआई कम से कम तीन बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों की काबू वाली संस्था है, और इसका सैकड़ों करोड़ का बजट है, यह हजारों करोड़ तक शायद कारोबार करता है, और इसी के दम पर यह संगठन लगातार सुप्रीम कोर्ट से ऐसा टकराव ले रहा है जिसे देखकर देश की गरीब और बेबस जनता हक्का-बक्का है। लगातार यह सुप्रीम कोर्ट को उसकी औकात दिखा रहा है, और अपने आपको सूचना के अधिकार से परे मानता है, पांच सितारा होटलों से यह संस्था चलाता है, और देश के क्रिकेट खिलाड़ी इसके बंधुआ मजदूर बनकर खेलते हैं, या फिर उनके पास क्रिकेट से बाहर हो जाने की भी एक पसंद रहती है। लेकिन अकेले बीसीसीआई के मुद्दे पर लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, और इसके साथ-साथ एक दूसरा मुद्दा है जिसे जोड़कर ही हम यहां लिखना चाहते हैं।
सहारा नाम की एक कंपनी के रहस्यमय कारोबार के चलते उसके मुखिया महीनों से जेल में है, और सुब्रत राय सहारा की जमानत को लेकर, पैरोल को लेकर, जेल से उनके दफ्तर चलाने को लेकर जितनी छोटी-छोटी बातों पर सुप्रीम कोर्ट अपना वक्त दे रहा है, और अब तक शायद देश की सबसे बड़ी अदालत इस मामले की सुनवाई में सेंचुरी पूरी कर चुकी है, और ऐसी ही सेंचुरी बीसीसीआई की सुनवाई में भी जज लगा चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि देश की यह सबसे बड़ी अदालत जहां पर जनता के हित के मामले महीनों के इंतजार के बाद मिनटों का वक्त भी शायद ही पाते हों, वहां पर इन दो धनकुबेरों के लिए अदालत आखिर इतना वक्त कैसे निकालती है, क्यों निकालती है, और ऐसी अदालत देश के उन बाकी तमाम करोड़ों लोगों को चेहरा कैसे दिखाती है, जिनकी रोजी-रोटी, भूख-प्यास, और जिंदगी से जुड़े हुए बुनियादी मुद्दों के मामले इसी अदालत में कतार में खड़े-खड़े दम तोड़ते दिखते हैं।
करोड़ों की फीस लेने वाले अरबपति वकीलों को ऐसे मुवक्किलों के लिए सुप्रीम कोर्ट का इतना वक्त कैसे मिलता है, यह भी हैरान करने वाली बात है। ऐसे बददिमाग लेकिन ताकतवर लोगों को देश की सबसे बड़ी अदालत में बात-बात पर इतने मौके मिलना, इतने किस्म की रियायत मिलना, एक वकील पर अदालत के भड़कने के बाद घर से उठकर आए हुए दूसरे वकील को फिर अदालत से समय मिल जाना, यह सब देश के लोकतंत्र पर भरोसा घटाता है। हमारा यह मानना है कि ऐसे बददिमाग रईस लोगों को अदालतों में कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए, और भारत के कानून में यह फेरबदल भी करना चाहिए कि जब इतने पैसे वालों पर अदालत का वक्त लगता हो, तो ऐसे लोगों से उसकी भरपाई भी करवानी चाहिए, चाहे वे वादी हों, या प्रतिवादी हों। यह एक किस्म का अदालती टैक्स रहेगा, और उस पैसे का इस्तेमाल गरीबों को कानूनी राहत देने के लिए किया जा सकता है।
फिलहाल जिस मुद्दे से बात शुरू हुई थी, उस पर लौटें तो बीसीसीआई देश की सबसे बड़ी अदालत को जिस तरह की हेकड़ी दिखा रहा है, उस पर कुछ लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए। हमारा कोई भरोसा अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों पर नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ही एक रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू की यह बात ठीक लगती है कि बीसीसीआई के पदाधिकारियों के कपड़े उतारकर उन्हें कोड़े लगाने चाहिए।

तरह-तरह के सेक्स अपराधों से सत्ता का संबंध, कई राज्यों में

संपादकीय
16 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एक दलित शादीशुदा महिला का अपहरण करके उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग की गई, और उसके बदन में ठीक उसी तरह लोहे की छड़ घुसा दी गई, जिस तरह दिल्ली में निर्भया के साथ किया गया था। शिकायत के बाद दो लोग गिरफ्तार हो गए हैं, और इन सबका बयान यह है कि भाजपा के एक नेता के बेटे ने यह सब योजना बनाकर किया, और अब वह कार लेकर फरार है। ऐसा नहीं कि ऐसा करने वाले लोग सिर्फ भाजपा के हैं, लेकिन कुछ समय पहले मध्यप्रदेश में सेक्स रैकेट में भाजपा का एक नेता गिरफ्तार हुआ, जिसकी तस्वीरें प्रधानमंत्री से लेकर मध्यप्रदेश के बड़े-बड़े भाजपा नेताओं के साथ सोशल मीडिया पर सजी हुई हैं, गुजरात में दो दिन पहले एक सेक्स रैकेट पकड़ाया जिसमें भाजपा का एक नेता भी पकड़ाया है।
इन बातों से एक नतीजा यह निकलता है कि इस तरह के धंधे और इस तरह की भयानक हरकतें करने का हौसला उन लोगों में अधिक होता है जो कि सत्ता के करीबी लोग हैं। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि ऐसे धंधों पर और ऐसे लोगों पर कार्रवाई जिस पुलिस को करनी चाहिए, उस पर सत्ता से जुड़े मुजरिमों को यह भरोसा रहता है कि उन पर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करेगी। हम छत्तीसगढ़ में भाजपा के लंबे शासनकाल के बाद अब जगह-जगह यह बात देखते हैं कि कई तरह के संगठित और नियमित अपराध भाजपा के स्थानीय नेताओं के साये तले चलते हैं। कुछ जगहों पर सत्तारूढ़ भाजपा नेता सट्टेबाजी से लेकर धान के घोटाले और सरकार को चूना लगाने तक के पीछे जाहिर तौर पर हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। सरगुजा में दो दिन पहले मंत्री के बेटे ने दुर्गोत्सव के समारोह में चल रहे अश्लील नाच के बीच अपने अंगरक्षक या दोस्त के साथ पहुंचकर वहां बंदूक से गोलियां चलवाईं, और उस पर न तो मंत्री का कोई जिम्मेदार बयान आया, और न ही पुलिस-प्रशासन का। नतीजा यह है कि पार्टी के छोटे लोग भी ऐसे रूख से यह मानकर चलते हैं कि वे भी मनमानी कर सकते हैं। और पूरे प्रदेश में सड़कों पर यह दिखता है कि नंबर प्लेट पर भाजपा के रंग की पट्टी लगवाकर हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता सायरन बजाते हुए चलते हैं, और अगर पुलिस रोकने की कोशिश करती है, तो कई जगह वह मार भी खा चुकी है।
यह पूरा सिलसिला मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निजी चाल-चलन और उनकी निजी सोच के ठीक खिलाफ है। छत्तीसगढ़ में ऐसा भी नहीं है कि भाजपा संगठन रमन सिंह की पहुंच से परे की कोई समानांतर सत्ता हो। उनको भाजपा के लोगों की मनमानी और अपराधों से उनके रिश्ते पर कड़ाई से रोक लगानी चाहिए, क्योंकि सरकारी अफसर तो कार्रवाई करने से कतरा सकते हैं लेकिन जब जनता का वोट देने का मौका आता है, तो वह चुप नहीं रहती है। और यह केवल छत्तीसगढ़ की बात नहीं है, बहुत से प्रदेशों में, सभी प्रदेशों में यह देखने में आता ही है कि जब किसी एक पार्टी की सरकार लंबे समय तक रहती है, तो वह सत्ता की ताकत से आने वाली बददिमागी का शिकार हो ही जाती है, और चुनाव में नुकसान झेलती है। छत्तीसगढ़ में पिछले कई चुनावों में ऐसा नुकसान भाजपा को नहीं झेलना पड़ा क्योंकि कांग्रेस की गुटबाजी ने भाजपा की मदद की। लेकिन डॉ. रमन सिंह को तरह-तरह के जुर्म और अराजकता से भाजपा के लोगों के रिश्ते को तोडऩा होगा, वरना ये तो पब्लिक है, यह सब जानती है।

लोकतंत्र में फौज को लेकर भावनात्मक उन्माद खतरनाक

संपादकीय
15 अक्टूबर 2016
पाकिस्तान पर भारतीय सेना के एक सर्जिकल स्ट्राईक के बाद से देश पर राज कर रहे गठबंधन की मुखिया भाजपा से लेकर विपक्षी कांग्रेस और बाकी राजनीतिक दलों, धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों, इन सबके बीच सेना को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। और सेना की कार्रवाई पर पाकिस्तान की तरफ से उठाए गए सवालों का जवाब देने के लिए भारत में जिन लोगों ने सरकार से मांग की, उन लोगों को बात की बात में देशद्रोही करार दे दिया गया। इसके बाद सेना को लेकर माहौल इतना संवेदनशील हो गया है कि सेना का लोग स्वागत किस तरह से करें, उनका सम्मान कैसे करें, इसके बारे में तरह-तरह के सुझाव हवा में तैरने लगे, और उन्हें राष्ट्रप्रेम के लिए एक अनिवार्य सुबूत की तरह मांगा जाने लगा है। फिर बात की बात में चीनी सामानों के बहिष्कार की बात होने लगी, पाकिस्तानी कलाकारों को वापिस भेज दिया गया, और इस हो-हल्ले में यह बात तो पूरी तरह अनदेखी कर दी गई कि भारत के कुछ सबसे बड़े उद्योगपति किस तरह पाकिस्तान के कुछ सबसे बड़े उद्योगपतियों के साथ मिलकर साझा कारोबार कर रहे हैं, और ये दोनों ही खेमे अपने-अपने देश के प्रधानमंत्रियों के कितने करीबी हैं, और किस तरह सजन जिंदल जैसे भारतीय उद्योगपति की पहल या दखल से मोदी और शरीफ की मुलाकातें हुईं। मतलब यह कि बड़े-बड़े कारोबारी और बड़े-बड़े काम तो जारी रहें, हजारों करोड़ का कारोबार चलता रहे, लेकिन किसी कलाकार या खिलाड़ी को लेकर देशनिकाला मांगा जाए और इसका विरोध करने वालों को गद्दार करार दिया जाए।
किसी भी लोकतंत्र में सभ्य समाज को यह बात याद रखना चाहिए कि ऐसा उग्र राष्ट्रवाद किसी दुश्मन का नुकसान तो सरहद पर जंग छिडऩे पर ही कर सकता है, लेकिन अपने खुद के लोगों की लोकतांत्रिक सोच, इंसानी सोच का नुकसान तो वह बिना जंग के भी, अमन के दौर में भी करते ही रहता है। आज भारत में जो लोग भी जंग के फतवे हवा में उछाल रहे हैं, वे लोग इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि सरहद पर गोला-बारूद और फौजी खर्च के बिना भी हिन्दुस्तान दुनिया के सबसे गरीब और भुखमरी वाले देशों में से एक है, और अभी इसी हफ्ते सामने आए आंकड़े बताते हैं कि किस तरह दुनिया की भूख की फेहरिस्त में भारत पड़ोस के गरीब देशों के मुकाबले भी बदहाल है। जो लोग जंग की बातें करते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि ऐसे बयान जारी करने वालों की खीर में से केसर भी कम नहीं होगी, लेकिन गरीबों के लिए अनाज, उनकी पढ़ाई, उनका इलाज, उनका पानी, यह सब कुछ एक जंग छीनकर ले जा सकती है। और जंग से पहले भी हवा में एक गैरजरूरी हिंसक सोच जिस तरह एक झंडे की शक्ल में फहरा रही है, वह भयानक है।
फौज को न सिर्फ एक राजनीतिक हथियार की तरह, चुनावी हथियार की तरह, राष्ट्रवाद के हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू हो गया है, और यह एक भयानक नौबत है। बिना सोचे-समझे यह बात भी हो रही है कि फौज को खुली छूट दी जाए, फौज ने सर्जिकल स्ट्राईक का फैसला लिया, या उसे ऐसा लेने का हक दिया जाए। ऐसा कहने वाले लोगों को बगल के पाकिस्तान को देख लेना चाहिए कि किस तरह वहां फौज को राजनीतिक या जंग के फैसले लेने की इजाजत दी जाती है तो उससे किस तरह फौजी तानाशाही का खतरा खड़ा होता है। दुनिया में पाकिस्तान ऐसे खतरे की सबसे बड़ी मिसाल है, और इस मिसाल को अनदेखा करके आज भारत के कुछ लोगों का धर्मोन्माद फौज को इस तरह से बढ़ावा दे रहा है कि वह देश की निर्वाचित लोकतांत्रिक सरकार से परे या उससे ऊपर एक ताकत रहना चाहिए। भारत का संविधान इस तरह की व्यवस्था के लिए बना हुआ नहीं है। और इसके खतरे अनदेखा करके आज फौज को लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी ऊपर जिस तरह से बिठाया जा रहा है, वैसी अंधभक्ति खुद फौज के काम की नहीं है, उसके फायदे की नहीं है। अंधविश्वास का सबसे बड़ा नुकसान उसको होता है जिस पर अंधविश्वास होता है। भारत में ऐसे सैनिक-सपनों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए कि फौज जब बनाई गई है, तो सरहद के फैसले फौज को लेने देना चाहिए।

अमन के गीतकार को नोबल मिलना एक महत्वपूर्ण बात

संपादकीय
14 अक्टूबर 2016
अमरीका के एक गीतकार और गायक बॉब डिलन को नोबल साहित्य पुरस्कार कुछ लोगों को अटपटा लग रहा है क्योंकि उनकी पहचान गीतकार से अधिक गायक के रूप में है, और लोगों को लग रहा है कि साहित्य के लोगों का एक मौका इससे घट जा रहा है। लेकिन इस पुरस्कार को कई संदर्भों में देखने की जरूरत है। पिछली आधी सदी से बॉब डिलन अमरीका में युद्ध विरोधी गीतकार और गायक के रूप में जाने जाते हैं, और कई बार उनके नाम को लेकर यह चर्चा भी होती थी कि उन्हें साहित्य या शांति का नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए। उनके युद्ध विरोधी गीत दुनिया भर में फैले हुए थे, और उनसे राजनीतिक जनचेतना उठती थी।
अब अगर यह देखा जाए कि साहित्य के पैमाने पर उनके गीत अगर कमजोर बैठते हैं, और दुनिया के बाकी कुछ साहित्यकार इस पैमाने पर ऊपर जाते हैं, तो इसके साथ-साथ साहित्य के सामाजिक योगदान को भी देखना चाहिए। साहित्य सिर्फ भाषा नहीं रहता, साहित्य सिर्फ कोई विधा या शैली भी नहीं रहता, साहित्य तो समाज से जुड़े रहने वाली एक ऐसी रचनात्मकता है जिसके योगदान को अनदेखा करके उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। बहुत से साहित्यकार आलोचकों के बीच ऊंचे दर्जे के गिने और माने जाते हैं, लेकिन प्रकृति और प्रेम की उनकी अमूर्त बातों का सामाजिक योगदान उनकी रचनाओं जितना ही अमूर्त रहता है। दूसरी तरफ सामाजिक और राजनीतिक चेतना, संघर्ष और इंसाफ की लड़ाई की बात करने वाली साहित्यिक रचनाओं का योगदान बहुत बड़ा रहता है। हम साहित्य को महज आलोचकों के मूल्यांकन का सामान नहीं मानते, और हमारे हिसाब से इसके योगदान के बिना इसका कोई महत्व नहीं है। जो लोग क्रांति की बातें करते हैं, मजदूर संघर्ष की बात करते हैं, बराबरी के हक की बात करते हैं, उनके साहित्य का महत्व इतिहास में दर्ज होता है, और ऐसे तमाम लोग बाकी किस्म के साहित्यकारों के मुकाबले अधिक खतरे झेलते हुए, अधिक अभाव और नुकसान झेलते हुए काम करते हैं। जो लोग दूसरों के लिए लड़ते हैं, उनके भले के लिए अपना बुरा झेलने को तैयार रहते हैं, वैसे गीतकार मानवीय प्रेम या प्रकृति के गीतकारों के मुकाबले अधिक अहमियत वाले रहते हैं।
आज नोबल साहित्य पुरस्कार कमेटी ने जब इस नाम को चुना होगा, तो हमें भरोसा है कि आज दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे तरह-तरह के युद्ध और गृहयुद्ध पर उनकी नजर रही होगी। आज दुनिया में अमन-चैन की जरूरत पहले के मुकाबले कहीं अधिक है, और ऐसे में युद्ध विरोधी सोच को बढ़ावा देने वाले गीतकार का ऐसा सम्मान एक सामाजिक और राजनीतिक हकीकत का सम्मान भी है, और साहित्य को ऐसी हकीकत से अलग करके देखना कम से कम हमें जरा भी मंजूर नहीं है। साहित्य आलोचकों के लिए नहीं होता, वह महज साहित्यकारों के लिए भी नहीं होता, वह आम जनता के लिए होता है, और सीधी-सपाट बात से अमन के गीत गाने वाला सम्मान पाकर आज की जरूरत को भी सामने रख रहा है।

अब महज सावधान रहना काफी नहीं, साफ-सुथरा रहना जरूरी

संपादकीय
13 अक्टूबर 2016
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में जिस तरह पुराने टेप सामने आ रहे हैं, और एक उम्मीदवार के पति के पुराने मामले सामने आ रहे हैं, उससे न सिर्फ अमरीका में, न सिर्फ चुनाव में, बल्कि दुनिया में हर किसी को बहुत कुछ समझने और सीखने की जरूरत है। हिलेरी क्लिंटन के पति, बिल क्लिंटन के खिलाफ एक ऐसा नौजवान सामने आया है जो दावा कर रहा है कि वह क्लिंटन का अवैध बेटा है। क्लिंटन के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाने वाली चार महिलाओं को डोनाल्ड ट्रम्प ने हिलेरी के साथ बहस में सामने पेश कर ही दिया था, और अब डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ दो महिलाएं सामने आई हैं जिन्होंने दशकों पहले ट्रम्प के हाथों देह शोषण की शिकायतें मीडिया के सामने रखी हैं। लेकिन यह अमरीका की कोई खास बात नहीं है, और भारत में भी नारायण दत्त तिवारी से लेकर बहुत से दूसरे नेता ऐसे आरोप झेलते रहे हैं, डीएनए जांच से उनकी वैध-अवैध संतानें सामने आती रही हैं।
लेकिन आज इस घिसे-पिटे मुद्दे पर चर्चा की एक खास वजह है। अभी कोई 20-25 बरस पहले तक ऐसे स्टिंग ऑपरेशन नहीं होते थे, या टेलीफोन की रिकॉर्डिंग बहुत आम बात नहीं थी, या डीएनए जांच का उतना अधिक चलन नहीं था। आज तो छोटे-छोटे बच्चे भी हाथ में ऐसे मोबाइल लिए चलते हैं कि जिनसे कि तरह-तरह वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है, हर कॉल रिकॉर्ड हो सकती है, और हर संदेश हमेशा के लिए अपमान बनकर दर्ज हो सकता है। अब छोटे-छोटे पेन और की-रिंग में भी कैमरे आम बात हो चुके हैं, और हर किसी को न सिर्फ सावधान रहने की जरूरत है, बल्कि अपना चाल-चलन ही ठीक रखने की जरूरत है। गांधी के विरोधियों ने अभी कुछ दिन पहले ही एक लेख में यह सवाल उठाया कि क्या गांधी अपनी महानता के दर्जे का फायदा उठाकर कमउम्र लड़कियों के साथ अपने सेक्स प्रयोग नहीं करते थे? और क्या आज के कानून के मुताबिक वे प्रयोग उनको जेल में नहीं डाल देते?
वक्त के साथ-साथ तौर-तरीके बदल जाते हैं, आज कोई गांधी भी उस तरह के प्रयोग नहीं कर सकता, और कानून भी अब इतना कड़ा हो गया है कि एक नाबालिग बच्ची की शिकायत के बाद बरसों से आसाराम की जमानत नहीं हो रही है। अब वक्त इतना खतरनाक है कि महज सावधानी किसी को नहीं बचा सकती, अब पूरी तरह से साफ-सुथरे रहने वाले लोग ही सुरक्षित रह सकते हैं। आज का डिजिटल जमाना हर शब्द और हर पल को ऐसे रिकॉर्ड करता है कि उसे कोई मिटाना चाहे, तो भी वह मुमकिन नहीं है। लोगों को याद रखना चाहिए कि पुराने कुकर्म कब्र फाड़कर उठ खड़े होते हैं, और अच्छी भली जिंदगी को तबाह करने की ताकत रखते हैं। इसलिए आज टेक्नालॉजी ने कुछ कहना, कुछ लिखना, कुछ भेजना जितना आसान कर दिया है, उतना ही अधिक अपने आपको ठीक रखना भी जरूरी हो गया है। आज तो मन में अगर कोई गलत खयाल आया, तो मानो उसका पोस्टर ही छप गया।

सेक्स भुगतान का झगड़ा बलात्कार न मानना सही

संपादकीय
12 अक्टूबर 2016
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में बलात्कार के आरोप से तीन लोगों को बरी किया और कहा कि अगर कोई सेक्सकर्मी भुगतान के किसी झगड़े में ग्राहक के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराए तो वह बलात्कार नहीं कहा जा सकता। दो जजों की बेंच ने यह भी कहा कि महिला के दिए गए सुबूतों को महत्व दिया जाना चाहिए, लेकिन उसे परम सत्य की तरह नहीं मानना चाहिए। यह मामला बेंगलुरू का था जिसमें बीस साल से यह मुकदमा चल रहा था।
इस फैसले से कुछ और भी पहलू फिर बहस में आएंगे। किसी सेक्सकर्मी के भुगतान का मामला ग्राहक और कर्मी के बीच का भुगतान का लेन-देन का झगड़ा माना गया है, और यह सही भी है। लेकिन हमारा मानना है कि इसके अलावा एक और किस्म का मामला आए दिन सामने आता है जिस पर भी सुप्रीम कोर्ट को गौर करना चाहिए, और एक ज्यादती खत्म करनी चाहिए। हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं बलात्कार की एक ऐसी रिपोर्ट दर्ज होती है जिसमें शादी का वायदा करके बनाए गए शारीरिक संबंधों के बारे में लड़की या महिला की तरफ से कहा जाता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। हम शादी का वायदा करके बनाए गए संबंधों को बलात्कार नहीं मानते। इसे भी अगर बलात्कार मान लिया गया तो फिर वायदाखिलाफी शब्द का कहां इस्तेमाल होगा? और वायदे से परे भी यह तो मानकर चलना चाहिए कि जो लोग आज किसी के साथ शादी का इरादा रखते हैं, जरूरी नहीं है कि कुछ समय बाद भी उन्हें उनसे शादी करना ठीक लगे। लोगों के खयालात समय और हालात के मुताबिक बदलते हैं, और यही वजह है कि सगाई होने के बाद भी टूट जाती हैं, शादी हो जाने के बाद भी तलाक हो जाते हैं। तो जिस तरह शादी के बाद तलाक होता है, उसी तरह शादी के पहले के प्रेम संबंध भी टूट सकते हैं, और उसे बलात्कार से जोडऩा पूरी तरह नाजायज है।
आज दहेज का कानून, बलात्कार का कानून, कामकाज की जगह पर शोषण का कानून महिलाओं के पक्ष में बहुत हद तक झुका हुआ है, और यह बात जायज भी है। लेकिन यह बात नाजायज है कि प्रेम संबंध टूट जाने पर या शादी न करने पर पहले के देह संबंधों को बलात्कार करार दिया जाए। आज का कानून ऐसे बहुत से लोगों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देता है, और बरसों तक वे लोग मुकदमा झेलते रहते हैं। किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला दिया हो, तो वह अभी हमें नहीं मालूम है, लेकिन किसी वजह से अगर शादी का वायदा पूरा नहीं किया जाता है, तो उसे किसी भी तरह का अपराध मानना गलत होगा। अभी सेक्सकर्मी के भुगतान के विवाद को लेकर जो फैसला आया है, उसकी भावना भी कुछ इसी किस्म की है। वह मिसाल तो अलग है लेकिन उस आधार पर वायदाखिलाफी जैसे मामलों पर भी गौर किया जाना चाहिए।