संपादकीय
21 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर से लगे हुए ओडिशा के इलाकों में जापानी बुखार फैला हुआ है, और वहां मौतें सौ के करीब पहुंचने को हैं और जिस तरह छत्तीसगढ़ की सरहद से लगे हुए ओडिशा, आन्ध्र, तेलंगाना, और महाराष्ट्र से यहां पर नक्सली आते हैं, उसी तरह बीमारियां भी यहां आ सकती हैं। आज बस्तर के सुकमा में एक बच्ची की जापानी बुखार से मौत के साथ ही इस राज्य में भी इस बीमारी का खतरा पहुंच गया है। यह बीमारी पालतू सुअरों से फैलने की जानकारी है, और जब ओडिशा में बड़ी संख्या में सुअर मारे जाने लगे, तो उन्हें औने-पौने दाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर में लाकर भी बेचना शुरू किया गया। यह खतरा भारत और पाकिस्तान या भारत और बांग्लादेश जैसे दो देशों के बीच भी रहता है जहां सरहद को पार करना आसान रहता है। और छत्तीसगढ़ और ओडिशा तो एक ही देश के दो ऐसे राज्य हैं जहां खरीद-बिक्री पर भी कोई रोक नहीं है, और न ही लोगों के आने-जाने पर। इसलिए यह खतरा और अधिक है कि एक प्रदेश की बीमारी दूसरे प्रदेश तक पहुंच जाए।
लोगों को याद होगा कि एक समय जब गुजरात के सूरत में गंदगी की वजह से प्लेग फैला था, और वहां से रेलगाडिय़ों में भरकर लोग पूरे देश में जा रहे थे, तब सूरत से आने वाली रेलगाड़ी को देखकर दहशत फैलती थी। लेकिन आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का मकसद ओडिशा के इंसानों या वहां के सुअर को लेकर छत्तीसगढ़ में दहशत फैलाना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि ऐसी कोई महामारी यहां के जानवरों से भी यहां फैल सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गंदगी आसमान को छू रही है, शहर के बहुत से हिस्से ऐसे हैं जहां गंदगी का अम्बार है, और उस पर सुअरों के झुंड पूरे समय दिखते रहते हैं। इस शहर में चौथाई सदी तो इस बात को सुनते हो गई है कि डेयरियों को बाहर ले जाना है। जब यहां शहर के बाहर गोकुल नगर बनाया गया, उस बरस जिस बच्चे का नाम गोकुल रखा गया होगा, वह बच्चा भी अब 25 बरस का हो चुका होगा। लेकिन स्थानीय संस्थाएं अब निजी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की तरह कांक्रीट के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में उलझकर रह गई हैं, और सफाई की अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी को भूल चुकी हैं। जब तक शहर साफ नहीं रहता, तब तक आसपास के गांव और कस्बों को भी साफ रहने के लिए नसीहत नहीं दी जा सकती। हालत यह है कि पूरा का पूरा छत्तीसगढ़ गंदगी के प्रति संवेदना खो चुका है, और अब वह गंदगी को अपनी नियती मान बैठा है। ऐसे में किसी भी दिन कोई बड़ी महामारी न सिर्फ ओडिशा से यहां आ सकती है, बल्कि वह यहां से उपज भी सकती है, और पड़ोसी राज्यों के लिए भी खतरा बन सकती है।
गुजरात का सूरत इस बात की मिसाल है कि गंदगी की मिसाल बनने के बाद और महामारी का शिकार होने के बाद हक्का-बक्का नागरिकों के साथ मिलकर एक जिम्मेदार स्थानीय म्युनिसिपल किस तरह शहर को देश के सबसे साफ शहरों में से एक बना सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित यहां के कई और शहरों को, बहुत से कस्बों को एक ऐसी सफाई की जरूरत है जो कि किसी महामारी की नौबत न आने दे। सरकार को भी यह चाहिए कि स्थानीय संस्थाओं को कमाऊ प्रोजेक्ट में जोत देने के बजाय उनको सफाई का उनका जिम्मा याद दिलाना चाहिए। आज हजारों करोड़ की लागत से एक-दो शहरों को स्मार्ट बनाने का नारा हवा में तैर रहा है, हम चाहते हैं कि कम से कम घूरों और नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए, और वहां से शुरुआत करना जरूरी है।
लोगों को याद होगा कि एक समय जब गुजरात के सूरत में गंदगी की वजह से प्लेग फैला था, और वहां से रेलगाडिय़ों में भरकर लोग पूरे देश में जा रहे थे, तब सूरत से आने वाली रेलगाड़ी को देखकर दहशत फैलती थी। लेकिन आज यहां पर इस मुद्दे पर लिखने का मकसद ओडिशा के इंसानों या वहां के सुअर को लेकर छत्तीसगढ़ में दहशत फैलाना नहीं है, बल्कि यह याद दिलाना है कि ऐसी कोई महामारी यहां के जानवरों से भी यहां फैल सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गंदगी आसमान को छू रही है, शहर के बहुत से हिस्से ऐसे हैं जहां गंदगी का अम्बार है, और उस पर सुअरों के झुंड पूरे समय दिखते रहते हैं। इस शहर में चौथाई सदी तो इस बात को सुनते हो गई है कि डेयरियों को बाहर ले जाना है। जब यहां शहर के बाहर गोकुल नगर बनाया गया, उस बरस जिस बच्चे का नाम गोकुल रखा गया होगा, वह बच्चा भी अब 25 बरस का हो चुका होगा। लेकिन स्थानीय संस्थाएं अब निजी कंस्ट्रक्शन कंपनियों की तरह कांक्रीट के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में उलझकर रह गई हैं, और सफाई की अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी को भूल चुकी हैं। जब तक शहर साफ नहीं रहता, तब तक आसपास के गांव और कस्बों को भी साफ रहने के लिए नसीहत नहीं दी जा सकती। हालत यह है कि पूरा का पूरा छत्तीसगढ़ गंदगी के प्रति संवेदना खो चुका है, और अब वह गंदगी को अपनी नियती मान बैठा है। ऐसे में किसी भी दिन कोई बड़ी महामारी न सिर्फ ओडिशा से यहां आ सकती है, बल्कि वह यहां से उपज भी सकती है, और पड़ोसी राज्यों के लिए भी खतरा बन सकती है।
गुजरात का सूरत इस बात की मिसाल है कि गंदगी की मिसाल बनने के बाद और महामारी का शिकार होने के बाद हक्का-बक्का नागरिकों के साथ मिलकर एक जिम्मेदार स्थानीय म्युनिसिपल किस तरह शहर को देश के सबसे साफ शहरों में से एक बना सकती है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर सहित यहां के कई और शहरों को, बहुत से कस्बों को एक ऐसी सफाई की जरूरत है जो कि किसी महामारी की नौबत न आने दे। सरकार को भी यह चाहिए कि स्थानीय संस्थाओं को कमाऊ प्रोजेक्ट में जोत देने के बजाय उनको सफाई का उनका जिम्मा याद दिलाना चाहिए। आज हजारों करोड़ की लागत से एक-दो शहरों को स्मार्ट बनाने का नारा हवा में तैर रहा है, हम चाहते हैं कि कम से कम घूरों और नालियों को तो पहले स्मार्ट बना दिया जाए, और वहां से शुरुआत करना जरूरी है।
