सांसद-विधायकों को भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं

संपादकीय
2 नवम्बर 2016  
संसद की समिति ने सांसदों की तनख्वाह बढ़ाने की सिफारिश कर दी है। केन्द्र सरकार ने सांसदों के मूल वेतन को दुगुना करना तय किया है। अब यह पचास हजार से बढ़कर लाख रूपया हो सकती है। यह सिफारिश पिछले कुछ समय से हवा में तैर रही थी, और लोग सोशल मीडिया पर इसका मजाक भी उड़ा रहे थे कि आमतौर पर कई मुद्दों पर एक-दूसरे से असहमत रहने वाले सांसदों ने बिल्कुल एक होकर अपना वेतन दो गुना करने की सिफारिश की है। अगर वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री इस पर सहमत हो जाते हैं तो संसद के अगले सत्र में यह लागू हो सकता है। आज सांसदों को 50 हजार रूपए महीने तनख्वाह मिलती है, इसे दोगुनी करने का प्रस्ताव है, और संसदीय क्षेत्र का भत्ता 45 हजार रूपए महीने से बढ़ाकर 90 हजार रूपए महीने करने की सिफारिश भी की गई है। इससे पहले देश के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाई है, और छत्तीसगढ़ में इसे लेकर कांग्रेस के भीतर ही गुटबाजी का एक बखेड़ा खड़ा हुआ था। लोगों को यह लगता है कि सांसद या विधायक कोई नौकरी नहीं करते हैं, और उन्हें मिलने वाले भत्ते या वेतन को बाजार भाव के हिसाब से नहीं बढ़ाना चाहिए, और सांसद-विधायक सेवाभाव से काम करते रहें।
आज देश में लोगों के बीच यह भी एक भावना है कि सांसदों और विधायकों में से बहुत से लोग भ्रष्ट हैं, और कुछ लोग यह भी मानते हैं कि वे निजी कमाई के लिए अगर भ्रष्टाचार नहीं करते, तो भी वे चुनाव का खर्च जुटाने के लिए भ्रष्ट होते ही हैं। इस देश ने कई तरह के स्टिंग ऑपरेशन देखे हैं जिनमें विधायक और सांसद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते पकड़ाए हैं, सांसदों की सदस्यता खत्म की गई है, और अदालतों ने अपनी बेबसी दिखाई है कि संसद के भीतर के मामलों पर वे कार्रवाई नहीं कर सकतीं वरना सांसद-विधायक जेल में भी होते। लोगों का यह भी देखा हुआ है कि चुनावों में आयोग द्वारा तय की गई सीमा से कई गुना अधिक खर्च उम्मीदवार करते हैं, और जनता का एक हिस्सा भ्रष्टाचार को बड़ा पसंद करता है, धर्म और जाति के नेता उगाही करते हैं, और देश का मीडिया पेडन्यूज को लेकर काफी नंगा हो चुका है। ऐसे में एक बात और जुड़ जाती है कि सांसद या विधायक को अपने चुनाव क्षेत्र में जितना दौरा करना पड़ता है, और जितना सामाजिक शिष्टाचार निभाना पड़ता है, लोगों की आसमान छूती उम्मीदों के लिए कम्प्यूटर से लेकर फोटोकॉपी तक और कर्मचारियों से लेकर उनके फोन और पेट्रोल तक जितना खर्च करना पड़ता है, वह विधानसभा या संसद की तनख्वाह से कभी पूरा नहीं हो सकता।
ऐसे में इस देश को यह समझना चाहिए कि अपने घर-परिवार की जरूरतों को अनदेखा करके कोई जनता की सेवा नहीं कर सकते। देश में कुछ गिने-चुने बाबा आम्टे हो सकते हैं, कुछ गिनी-चुनी मदर टेरेसा हो सकती हैं, लेकिन अगर सांसद और विधायक ईमानदार चाहिए, और काबिल भी चाहिए, तो उसके लिए कुछ दाम चुकाना देश को मुफ्तखोरी के मुकाबले अधिक सस्ता पड़ेगा। हमारा यह मानना है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों को अगर जरूरत के लायक तनख्वाह और भत्ते मिलेंगे, तो चुनावी राजनीति में कुछ बेहतर लोग भी आ पाएंगे। अपने परिवार को अभाव में रखते हुए लोग पूरी जिंदगी जनसेवा नहीं कर सकते। इसलिए जनता को अपने बाकी खर्च की तरह विधायक और सांसद पर भी खर्च करना सीखना चाहिए। बड़े बुजुर्ग बोल गए हैं कि सस्ता रोए बार-बार, महंगा रोए एक बार। पांच बरस में एक बार जिसे चुनना हो, और पांच बरस के बाद जिसके सामने इस काम के जारी रहने की कोई गारंटी न हो, उसे अपने वर्तमान और अपने भविष्य के लिए इतना भुगतान तो मिलना ही चाहिए कि वे घर की फिक्र से बेफिक्र रहकर जनता का काम कर सकें। हम इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि सांसद और विधायक तो भ्रष्ट होते ही हैं इसलिए उन्हें अधिक तनख्वाह क्यों दी जाए? इस पैमाने पर तो फिर सरकारी अमले को भी तनख्वाह देने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार की तोहमत लगती है। लोगों को भ्रष्ट होने से बचाना भी समाज का काम है, और हमारा यह मानना है कि थोड़े से महंगे सांसद या विधायक देश के लिए अधिक उत्पादक हो सकते हैं, बजाय इसके कि वे अपनी ही निजी उलझनों में फंसे रहें, और अपनी संसदीय जिम्मेदारी ठीक से न निभा सकें। निर्वाचित लोगों को बाजार के भ्रष्टाचार पर आश्रित रखना ठीक नहीं है।

भोपाल की फरारी और फिर मुठभेड़-मौतों से उठे सवाल

संपादकीय
1 नवम्बर 2016  
भोपाल की एक अतिसुरक्षित जेल से फरार हुए सिमी से जुड़े हुए आठ विचाराधीन कैदी कुछ घंटों के भीतर ही एक साथ मार गिराए गए। वे जेल के एक सिपाही की हत्या करके फरार हुए बताए जा रहे हैं, और जिस मुठभेड़ में उन्हें मार गिराया गया है, उसके कुछ वीडियो सामने आए हैं जिन्हें लेकर कांग्रेस, वामपंथी दल, और कुछ दूसरी पार्टियों ने भी जांच की मांग की है। इन वीडियो से ऐसा आभास होता है कि इनमें से कुछ लोगों को जिंदा पकडऩा शायद मुमकिन हो सकता था, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें करीब से गोली मारकर खत्म कर दिया। इसके साथ ही फरार होने की इस साजिश पर अब कोई गवाह नहीं बचा है, जो कि सुरक्षा व्यवस्था की जांच के लिए एक नुकसान की बात है।
आज देश में जिस तरह का धार्मिक और राजनीतिक धुव्रीकरण का माहौल बना हुआ है, उसमें इस इस्लामिक छात्र संगठन, सिमी, के विचाराधीन कैदियों को बात की बात में आतंकी करार देना शुरू हो गया, और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मीडिया-बयानों में बार-बार इन्हें आतंकी कहा। किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार दे देना सिर्फ अदालत का काम होता है, और जब प्रदेश का मुख्यमंत्री यह काम करने लगता है, तो वह जांच एजेंसी, सरकारी वकील, और न्याय प्रक्रिया, इन सब पर असर डालने वाली बात होती है। लेकिन न सिर्फ मप्र के भाजपा मुख्यमंत्री, बल्कि देश के अधिकतर मीडिया ने भी इन विचाराधीन कैदियों पर फैसला सुनाते हुए इन्हें आतंकी लिखना और कहना जारी रखा है। यह सिलसिला लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है जिसके तहत जब तक कोई मुजरिम साबित न हो जाए तब तक उसे मासूम मानने को कहा जाता है। आज देश में धार्मिक धुव्रीकरण का जो माहौल है, उसके चलते भोपाल जेल के इस मारे गए सिपाही को राष्ट्रभक्त करार दिया जा रहा है, और फरार होकर मारे गए विचाराधीन कैदियों को आतंकी से लेकर देशद्रोही तक करार दिया जा रहा है।
अब देश के बहुत से संगठनों और राजनीतिक दलों को यह शक है कि यह फरारी और उसके बाद इस तरह की मौत स्वाभाविक साजिश का नतीजा नहीं है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इनके मामलों की सुनवाई हो चुकी थी, और इनके रिहा होने के आसार दिख रहे थे, इसलिए इन्हें इस तरह फरार करवाकर मार डाला गया। कई लोगों को इस बात पर हैरानी है कि भोपाल की अतिसुरक्षित जेल के अलग-अलग दरवाजों के पीछे बंद ये कैदी किस तरह एक साथ सब दरवाजों को तोड़कर बाहर आ सके, और किस तरह आसानी से ऊंची दीवार चादर से पार कर सके। हम अभी किसी किस्म की साजिश को लेकर अटकलबाजी में पड़ना नहीं चाहते क्योंकि यह एक बड़ी जांच के लायक मामला है। लेकिन लोकतंत्र में मुख्यमंत्री से लेकर मीडिया तक से हमारी यह उम्मीद बनी रहेगी कि वे किसी विचाराधीन कैदी को मुजरिम करार देने की सोची-समझी लापरवाही बंद करें। इस हिसाब से तो मीडिया के जो लोग ब्लैकमेलिंग के जुर्म में गिरफ्तार होकर जेल काटकर जमानत पर बाहर हैं, उनके नाम के साथ ब्लैकमेलर कहा जा सकता है, और फिर प्रधानमंत्री ऐसे लोगों को दूसरे देश के प्रमुखों से किस तरह मिलवाएंगे? दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जैसे ताकतवर ओहदे पर बैठे हुए शिवराज सिंह चौहान को यह ध्यान रखना चाहिए कि मुकदमे के चलते हुए वे किसी को मुजरिम नहीं कह सकते। यह एक अलग बात है कि इस देश में कमजोर तबके के लिए किसी भी तरह की बातें कहना आम और जायज मान लिया जाता है, और लोग बेधड़क किसी आरोपी को मुजरिम कहने लगते हैं। लेकिन अगर कोई अदालती कटघरे में घसीटे, तो मीडिया हो या मुख्यमंत्री उन्हें अपने ऐसे बयानों के लिए सजा भी हो सकती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को तो यह भी सोचना चाहिए था कि ऐसी सुरक्षित राजधानी की जेल से थोक में हुई ऐसी फरारी जेल की बड़ी लापरवाही थी, और इस पर शर्मिंदगी के बजाय अगर वे आरोपियों को मुजरिम कह रहे हैं, तो उनके बेकसूर रिहा होने  की एक संभावना या आशंका के सही साबित होने के बाद वे अपने शब्दों का क्या करेंगे?

सरकार हो या अखबार, सभी नजरियों की भागीदारी जरूरी..

संपादकीय
29 अक्टूबर 2016
मध्यप्रदेश के मंदसौर की एक खबर है कि वहां सरकारी कॉलेज में दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को सरकार की एक योजना के तहत पीठ के जो बैग बांटे गए, उन पर पीछे एसटी-एससी योजना के तहत छपा हुआ है। जब इस पर हंगामा हुआ तो प्रिंसिपल का कहना था कि अगर किसी को इससे आपत्ति है तो वे बैग पर से इसे मिटवा देंगे। ऐसा ही हाल गरीब बस्तियों में कई जगह घरों के बाहर दीवारों पर दिखता है जहां सरकार मकानों पर गरीबी की रेखा के नीचे, या जाति का जिक्र लिखवा देती है। समाज और सरकार में जगह-जगह ऐसी कई बातें नजर आती हैं, और उनसे यह लगता है कि ताकत और अहमियत के बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को भी कुछ समझ पाने की जरूरत बाकी है।
यह लिखने का मकसद कहीं भी दूसरों की आलोचना करना नहीं है, खुद मीडिया में समझ की कमी की ऐसी हालत है कि उसकी ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को सामाजिक हकीकत का अंदाज भी नहीं रहता। भारत के काफी बड़े हिस्से के, कम से कम हिन्दी मीडिया को देखते हुए ऐसा लगता है कि अखबारों में लिखने का हक रखने वाले अखबारनवीसों के बीच सवर्णों का बोलबाला है। बहुत ही कम पत्रकार अल्पसंख्यक तबकों से आते हैं, या कि दलित-आदिवासी रहते हैं। संपादकों के नाम भी देखें तो शायद ही कोई ऐसे तबकों में से आया हुआ हो। नतीजा यह होता है कि जब सामाजिक मुद्दों पर बातचीत होती है, तो सबसे दबे-कुचले लोगों की बात कहने वाले लोग वहां पर नहीं रहते। और हिन्दुस्तान के ऐसे हाल को जब अमरीका या ब्रिटेन के मीडिया से देखें, तो फर्क समझ आता है कि किस तरह पश्चिम के प्रतिष्ठित अखबार या टीवी समाचार चैनलों में काम करने वाले प्रेस या मीडियाकर्मियों को उनके धर्म, या उनके रंग के आधार पर भी चुना जाता है ताकि संपादक मंडल में हर नजरिए की मौजूदगी हो, और हर किस्म के तजुर्बे वहां सामने आ सकें।
कुछ ऐसी ही नौबत सरकारों में रहती है जहां फैसले लेने वाले ऊंचे तबकों में कई ऐसे मौके रहते हैं जब कोई दलित-आदिवासी नहीं रहते, या अल्पसंख्यक नहीं रहते, या जाति या धर्म से परे की भी बात करें, तो गरीबों के मुद्दों की समझ रखने वाले लोग ऐसे फैसलों की कुर्सियों पर नहीं रहते। नतीजा यह होता है कि करोड़पतियों और अरबपतियों से भर चली संसद और विधानसभाओं से लेकर मंत्रियों और अफसरों तक के बीच कुछ नजरिए गायब रहते हैं। जब गाय के बारे में फैसला लिया जाता है, तो गाय की पूजा करने वाले लोग तो उन टेबिलों पर रहते हैं, लेकिन गाय के मरने के बाद उसे ठिकाने लगाने वाले तबके, और उससे जुड़े दूसरे रोजगारों की समझ रखने वाले कोई लोग ऐसे ताकतवर फैसलों के वक्त नहीं रहते। ऐसे फैसले ले लिए जाते हैं, और इनके बीच देश की सामाजिक हकीकत के इतिहास के जानकार भी नहीं रहते, या रहते भी हैं, तो वे इतिहास के साथ खड़े रहने का हौसला नहीं रखते। नतीजा यह होता है कि कुछ चुनिंदा ताकतवर तबकों के लोग अपनी पसंद को एक काल्पनिक इतिहास मानकर फैसले ले लेते हैं, और अपने से असहमति रखने वाले कमजोर लोगों के सिर पर थोप देते हैं।
धीरे-धीरे सरकार और राजनीति, संसद और अदालत, मीडिया और बाकी कारोबार, इन सभी जगहों के सीमित संपन्न तबकों के लोग मिलकर एक किस्म का नया तथाकथित लोकतांत्रिक शासक वर्ग बन जाते हैं, और बाकी कमजोर बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों की अपने नजरिए से व्याख्या करने लगते हैं। यह नौबत कुछ उसी तरह की है जैसी आज अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में दुनिया के एक सबसे कुख्यात उम्मीदवार साबित हो चुके रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प ने खड़ी कर दी है। परले दर्जे की मूर्खता के साथ जब दौलत का अहंकार जुड़कर मैदान में उतरता है, तो वह एक डोनाल्ड ट्रम्प बना पाता है। हिन्दुस्तान में भी देश-प्रदेश के अनगिनत फैसले ऐसे ही अज्ञान के साथ लिए जा रहे हैं, और दूसरों पर थोपे जा रहे हैं। हमारा ख्याल है कि एक जिम्मेदार अखबार से लेकर एक जिम्मेदार सरकार तक हर कहीं फैसले लेने में समाज के सभी तबकों, पृष्ठभूमियों की भागीदारी होनी चाहिए, और जहां पर ऐसी जाहिर हिस्सेदारी निभाने के लिए लोग मौजूद न हों, वहां पर सरकार, समाज, या अखबार को कुछ थिंकटैंक बनाकर अपने खुद के शिक्षण-प्रशिक्षण का इंतजाम करना चाहिए, अपनी खुद की परिपक्वता की कोशिश करनी चाहिए। दिक्कत यही होती है कि शहरी, संपन्न, शिक्षित, सवर्ण, और सक्षम तबकों का अहंकार उन्हें यह एहसास नहीं होने देता कि उन्हें भी कुछ जानने और सीखने की जरूरत है। अपने आपके सर्वज्ञ होने की खुशफहमी लोगों को अपनी समझ का दायरा बढ़ाने नहीं देती, और ऐसे अहंकार को पूरा समाज भुगतता है। मंदसौर के जिस सरकारी कॉलेज ने एसटी-एससी लिखे हुए ऐसे बैग तैयार करवाए हैं, वहां के प्राचार्य को निश्चित ही इस सामाजिक हकीकत की समझ नहीं होगी कि लोगों की पीठ पर उनकी जात की तख्ती टांग देने से वे किस तरह के सामाजिक भेदभाव का शिकार और अधिक होते चलेंगे।

लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार

संपादकीय
28 अक्टूबर 2016
भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के एक वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के साथ देश के कुछ प्रमुख लोग अभी कश्मीर गए और वहां करीब दो दर्जन प्रमुख लोगों, तबकों से बात करके यह तलाशने की कोशिश की कि कश्मीर में कैसे अमन-चैन लौट सकता है। उन्होंने यह साफ कर दिया था कि यह उनकी निजी पहल है और उनके पास पार्टी या केन्द्र सरकार का कहा हुआ कुछ नहीं है, और यह एक गैरसरकारी पहल है। जिन लोगों ने कश्मीर को ध्यान से देखना जारी रखा है, उन्हें यह देखकर खुशी हुई होगी कि वहां के जिन अलगाववादियों से बात करने में केन्द्रीय गृहमंत्री ने अपने कश्मीर प्रवास के दौरान परहेज किया था, और जिन अलगाववादियों ने राजनाथ सिंह के साथ गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के गैरसरकारी, गैरभाजपाई सदस्यों से भी बात करने से इंकार कर दिया था, उन अलगाववादियों से भी यशवंत सिन्हा वाले प्रतिनिधिमंडल की बातचीत हुई। और यह बात उभरकर सामने आई कि अलगाववादी कश्मीर-समस्या का एक अपरिहार्य हिस्सा हैं, और उनसे बात किए बिना समाधान की पूरी कोशिश नहीं हो सकती। दूसरी बात यह भी उभरकर सामने आई कि बातचीत बिना किसी शर्त के ही हो सकती है।
हम दूर कश्मीर से हटकर थोड़ा करीब आएं तो बस्तर के बारे में अभी सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को यह सुझाया कि वह नक्सलियों से बातचीत करें। ऐसी शांतिवार्ता की यह सलाह कोई आदेश तो नहीं हो सकती, लेकिन फिर भी सुप्रीम कोर्ट की बात वजनदार रहती है, और बस्तर के बहुत से मोर्चों को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत में इतने किस्म के मुकदमे चल रहे हैं कि राज्य सरकार भी शायद सुप्रीम कोर्ट से उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस करने के बजाय बातचीत की एक और कोशिश को बेहतर समझे, और वही लोकतंत्र के लिए बेहतर भी होगा। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आने के हफ्ते-दस दिन पहले ही हमने इसी जगह संपादकीय में यह बात राज्य सरकार को सुझाई थी, और ऐसे मध्यस्थ के रूप में हमने एक पिछले मुख्य सचिव सुनील कुमार का नाम भी लिखा था जो कि बस्तर के एक कलेक्टर के अपहरण के बाद रिहाई की समझौता-वार्ता में शामिल रह चुके हैं।
कश्मीर हो या बस्तर हो, बातचीत के बिना लोकतंत्र का कोई गुजारा नहीं हो सकता। ब्रिटेन में उत्तरी आयरलैंड का सशस्त्र आंदोलन एक सदी से भी अधिक वक्त से चले आ रहा था। आए दिन इसमें कत्ल होते थे, और धमाके होते थे। वह सशस्त्र आंदोलन राजनीतिक विचारधारा वाला भी था। और जब कई दौर की शांतिवार्ताएं असफल साबित हो चुकी थीं, तो अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन बरस 2000 में उत्तरी आयरलैंड पहुंचे और सभी तबकों को बिठाकर मध्यस्थता की, उस वक्त समझौते के बाद हथियार डाले गए, और तब कायम हुई शांति आज तक चली आ रही है। इसलिए समझौते में हथियार रखे-रखे भी वार्ता होती है, दोनों तबकों को अपने पिछले कड़े रूख को छोड़कर कुछ-कुछ कदम आगे बढऩा पड़ता है, ऐसे मध्यस्थ स्वीकार करने पड़ते हैं जो कि दोनों पक्षों को मान्य हों, और जब नीयत अमनवापिसी की हो, तो फिर अहंकार को परे रखकर बातचीत करके अमन की कोशिश की जानी चाहिए और वैसी कोशिश ही कामयाब भी होती है। पिछली कई वार्ताओं की असफलता को देखकर निराश होकर नहीं बैठना चाहिए, और पूरी शांति कायम होने तक बातचीत जारी रखनी चाहिए। हमारा यह मानना है कि बातचीत के पहले कोई शर्त नहीं होनी चाहिए, और किसी मुद्दे से जुड़े हुए तमाम लोगों से बिना किसी परहेज के बातचीत होनी चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश का इतिहास गवाह है कि अर्जुन सिंह ने डाकुओं से बात करके उनका आत्मसमर्पण करवाया था, और मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश सीमा के करीब दशकों से आतंक बने हुए डाकू घर बैठ गए थे। अब उस वक्त कोई ऐसी शर्त रखी जाती कि पहले हथियार डाले जाएं, फिर बातचीत शुरू होगी, तो वह बात किसी किनारे पहुंचती ही नहीं। और ऐसी तमाम बातचीत की अधिक जिम्मेदारी उन लोकतांत्रिक सरकारों की होती है जो कि लोकतंत्र के आधार पर चुनकर आईं हैं, जिन्होंने लोकतंत्र की शपथ ली है, और जिनका लोकतंत्र पर भरोसा है। ऐसी सरकारों की जीत तो उसी दिन हो जाती है, जब ये सरकारें लोकतंत्र पर भरोसा न रखने वाले लोगों, अलगाववादी लोगों, हिंसक और हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले लोगों को बातचीत की मेज पर ले आती हैं। इस जीत के बाद की समझौते की जीत तो छोटी होती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जो सुझाया है, या निर्देश दिया है, हम उसे सही मानते हैं, और कश्मीर से लेकर बस्तर तक, उत्तर-पूर्व से लेकर पाकिस्तान तक, देश के भीतर और बाहर, बातचीत की हर कोशिश होनी चाहिए क्योंकि तमाम हथियारों और बुलेटप्रूफ जैकेटों के रहते हुए भी, लोकतंत्र में बातचीत सबसे सस्ता हथियार और औजार है।

आतंक के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े आतंकी की नसीहत

संपादकीय
27 अक्टूबर 2016
अमरीकी विदेश मंत्रालय ने अभी एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद से निपटने के लिए मिलजुलकर काम करने की जरूरत है। यह बात कहने और सुनने में अच्छी लगती है, और यह बात दक्षिण एशिया से परे भी दुनिया के तमाम देशों पर लागू होती है। लेकिन अमरीका का कहा हुआ और उसका किया हुआ, इन दोनों में बड़ा फर्क रहता है। खुद अमरीका दुनिया के अनगिनत देशों में अपनी खुफिया एजेंसी सीआईए के मार्फत गृहयुद्ध छिड़वाते आया है, तख्तापलट करवाते आया है, और इराक के मामले में उसने हद ही पार कर दी थी जब उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे किस्सों को सुबूत की तरह पेश करके जनसंहार के हथियारों को खत्म करने के नाम पर इराक पर फौजी हमला किया, और लाखों लोगों को मार डाला। इस पूरी कार्रवाई के बाद वहां से एक हथियार भी बरामद नहीं हुआ है। इसलिए यह मानना गलत है कि आतंकी सिर्फ कोई संगठन या गिरोह होते हैं, दुनिया में अमरीका सरीखी सरकार अपने आपमें आतंकी संगठन है, और वह हथियारों के बिना तो सारे वक्त आर्थिक प्रतिबंधों की नाकेबंदी से आतंक फैलाती है, गरीब मुल्कों से उनका छीनती है, और लोकतंत्र लाने के नाम पर देशों को तबाह करके वहां अपनी पि_ू तानाशाह सरकारें बिठाती है। अमरीका का इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने कहीं तालिबानों को बढ़ावा दिया, तो कहीं किसी और आतंकी संगठन को। आज अमरीका पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के सिलसिले में मसीहाई अंदाज में यह नसीहत देता है कि आतंक के खिलाफ मिलजुलकर काम करने की जरूरत है, तो यह एक बड़े पाखंड के अलावा और कुछ नहीं है।
दरअसल अमरीका अपनी कारोबारी और फौजी नीयत के चलते हुए दक्षिण एशिया के इस इलाके में जिस तरह से पाकिस्तान में तानाशाही, फौजी मनमानी, और आतंकियों को बढ़ावा देते आया है, और एक कमजोर लोकतंत्र को अपने पर आश्रित मुल्क बनाकर रखते आया है, उसके चलते ही इस इलाके में आतंक पनपा है। भारत और पाकिस्तान के रिश्ते शायद इतने खराब न हुए होते, अगर पाकिस्तान के पास अमरीका से आई हुई बहुत बड़ी आर्थिक मदद न होती। अगर महज अपने पैसों से पाकिस्तान को फौजी और आतंकी तैयारी करनी होती, तो उसके लोग भूखे मर गए होते। इसलिए अमरीका के लिए नसीहत देने के लिए ज्यादा आसान बात हो सकती थी, पाकिस्तान की फौजी और आतंकी नीयत और हरकत पर रोक लगाना। और ऐसा भी नहीं है कि हम यहां हिन्दुस्तान में बैठकर यह बात कह रहे हैं, खुद अमरीकी संसद में समय-समय पर कई लोग इस बात को उठाते आए हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद रोकी जाए। लेकिन अमरीका की एक मजबूरी यह भी है कि अगर वह पाकिस्तान को बेआसरा, बेसहारा छोड़ दे, तो पाकिस्तान पल भर में चीन की गोद में जाकर बैठ जाएगा, और यह बात अमरीका की विस्तारवादी फौजी नीति और नीयत के खिलाफ जाएगी। इसलिए अमरीका इस इलाके में आतंक फैलने देने की कीमत पर भी पाकिस्तान को पाल रहा है, और बाकी लोगों को नसीहत दे रहा है कि वे लोग मिलजुलकर आतंक से लड़ें।
आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था महज बहस और कागजी फैसलों का दफ्तर बनकर रह गई है, और जिस अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र के लिए अपनी जमीन पर जगह दी थी, वह अमरीका इस अंतरराष्ट्रीय संस्था को एक पांवपोंछने की तरह मानता है, और इसके दर्जन भर बयानों के बावजूद उसके खिलाफ जाकर अमरीका ने इराक पर हमला किया था। दुनिया चाहे लोकतांत्रिक रूप से कितनी भी विकसित होने की खुशफहमी न पाल ले, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और फैसलों में एक पुरानी कहावत ही लागू होती है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। इसलिए अमरीका दुनिया भर में आतंक को बढ़ावा देकर भी यह नसीहत बांट रहा है कि लोग आतंक के खिलाफ मिलजुलकर लड़ें।

टाटा के मुखिया की बर्खास्तगी से निकलने वाले सबक

संपादकीय
26 अक्टूबर 2016
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक घरानों में से एक, टाटा को परिवार से बाहर का एक आदमी संभाल रहा था, लेकिन उसके तौरतरीकों से खफा होकर टाटा के डायरेक्टरों ने एक मिनट में उसे बाहर कर दिया, और पिछले मुखिया रतन टाटा को चार महीनों के लिए वापिस बुलाकर कंपनी संभालने का जिम्मा दिया है। रतन टाटा इस कंपनी के संस्थापक परिवार के थे, और कंपनी के शेयर होल्डर भी थे। वे अपनी मर्जी से कुछ समय पहले रिटायर हुए थे, और घर बैठकर अपनी पूंजी को नए-नए कारोबारियों के साथ लगा रहे थे, और समाजसेवा के कुछ काम कर रहे थे। उनकी जगह साइरस मिस्त्री नाम के जिस नौजवान को यह विशाल साम्राज्य दिया गया था, वह कारोबार को भी शायद ठीक से नहीं संभाल पाया था, और कंपनी से जुड़े हुए समाजसेवा के काम भी वह शायद ठीक से नहीं देख पा रहा था।
अब देश के निजी क्षेत्र के इस एक सबसे बड़े ओहदे को संभाल रहे आदमी को जिस तरह पलभर में निकाल कर बाहर कर दिया गया है, उसे देखते हुए सोशल मीडिया पर यह मजाक किया जा रहा है कि सुरक्षित तो सरकारी नौकरी ही होती है, बाकी कोई नौकरी सुरक्षित नहीं रहती। अब इतना बड़ा तो ओहदा देश में अधिक संख्या में नहीं हो सकता, लेकिन इससे छोटे-छोटे पदों पर बैठे हुए लोग भी एक सबक ले सकते हैं कि आज की बाजार व्यवस्था में कोई भी कुर्सी ऐसी सुरक्षित नहीं रहती कि उस पर बैठे हुए लोग काम ठीक से न करते हुए भी अपनी नौकरी बचा सकें। यह बात छोटी-छोटी कुर्सियों पर भी लागू होती है, और सरकार से परे भी हर जगह इसलिए लागू होती है कि मजदूर और कर्मचारी कानून भी निकम्मेपन को नहीं बचा सकते। यह निकम्मापन टाटा के इस अफसर के संदर्भ में नहीं कहा जा रहा है, लेकिन जितने तरह की उम्मीदें किसी से कंपनी करती है, या मालिक करता है, उसे पूरा करना ही नौकरी को बचा सकता है।
दुनिया में जो कामयाब और उदार अर्थव्यवस्थाएं हैं, वे किसी तरह की सुरक्षा कर्मचारियों को नहीं देती हैं, और अमरीका जैसे देश में लोगों को बस दराज खाली करके निकलने जितना वक्त मिलता है। भारत में भी लोगों के सामने यह मिसाल बेहतर काम करने के लिए एक प्रेरणा की तरह काम आनी चाहिए। काम अच्छा होने पर लोग कम उम्र में भी आगे बढ़ सकते हैं, और काम अच्छा न होने पर कोई भी नौकरी कायम भी नहीं रहती। टाटा में हुए इस ताजा फेरबदल की बाकी जानकारी आने में कुछ दिन का वक्त लगेगा, लेकिन यह बात सोचने के लायक है कि समाजसेवा में कंपनी की भूमिका को ठीक से ना निभाना भी कुर्सी जाने की वजह हो सकता है। 

बस्तर पुलिस ने जलाए लोकतंत्र के पुतले, और सरकारी खामोशी

विशेष संपादकीय
25 अक्टूबर 2016
छत्तीसगढ़ के बस्तर में कल पुलिस ने फौजी किस्म की वर्दी पहने हुए सामूहिक रूप से जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, राजनीतिक नेताओं, और पत्रकारों के पुतले जलाए। और प्रतीक के रूप में स्थानीय थानों की पुलिस ने पुतलों की आगे बुझाने की कोशिश भी दिखाई। इन तस्वीरों को देखें तो यह हैरानी होती है कि पुलिस का एक हिस्सा एक ऐसे काम को रोक रहा है, जो कि पुलिस का ही दूसरा हिस्सा कर रहा है। और छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां पर पुलिस कर्मचारियों की कोई यूनियन भी नहीं है जिसे कि ऐसे किसी प्रदर्शन की छूट मिल सके। अभी तक राज्य सरकार की तरफ से कल की इस व्यापक सोची-समझी अलोकतांत्रिक कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आई है, इसलिए यह सोचना भी गलत होगा कि सरकार इस पर कोई कार्रवाई करने का सोच रही है। लेकिन यह एक राज्य का मामला नहीं है, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की लोकतांत्रिक परंपराओं और इसके लोकतांत्रिक ढांचे की बात है, और उसी नजरिए से बस्तर की कल की इस भयानक कार्रवाई के बारे में सोचना जरूरी है जिसमें पुलिस ने आदिवासियों का तो नहीं, लेकिन शहरी लोकतंत्र का लहू जरूर बहाया है।
बस्तर में अभी पिछले दो-चार दिनों के भीतर ही पुलिस को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पेश सीबीआई जांच रिपोर्ट खबरों में है जिसमें ऐसा कहा बताया जाता है कि ताड़मेटला की बहुत चर्चित आगजनी में सुरक्षा बलों ने आदिवासी बस्तियों में आग लगाई थी। बस्तर में काम कर रहे सामाजिक संगठन, मीडिया के कुछ लोग, और बहुत से स्थानीय आदिवासी पहले से यही बात कह रहे थे, लेकिन राज्य सरकार में उनकी कोई सुनवाई नहीं थी। अब जब यह बात सीबीआई के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई है, तो बस्तर की पुलिस मानो बौखलाते हुए ऐसा सार्वजनिक प्रदर्शन कर रही है जैसा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में याद नहीं पड़ता है। बस्तर के कई जिलों में सैकड़ों या हजारों पुलिस वालों ने जगह-जगह सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों-पत्रकारों के पुतले यह कहते हुए जलाए कि वे नक्सल-हिमायती हैं, या कि नक्सल हैं।
अब यह बुनियादी सवाल उठता है कि बस्तर की जो पुलिस अनगिनत बेकसूर लोगों के खिलाफ अदालती कार्रवाई से लेकर मुठभेड़ हत्या तक की तोहमतें झेल रही है, उस पुलिस को कानूनी कार्रवाई करने से कौन रोक रहा था अगर ये सारे लोग नक्सली हैं? और अगर यह लोग नक्सली हैं भी, तो भी पुलिस का काम जांच करके उन्हें गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने का है, न कि सड़कों पर उनके पुतले जलाते हुए अपनी वर्दी की अलोकतांत्रिक ताकत का हिंसक प्रदर्शन करने का। लोकतंत्र के लिए यह एक बहुत ही खतरनाक नौबत है कि पुलिस कानून को अपने हाथ में लेकर लोगों को मुजरिम करार दे, और अपनी वर्दी के साथ जुड़े हुए नियमों को कुचलकर ऐसा जश्न मनाए कि वह जिसके चाहे उसके पुतले जला सकती है। यहां पर दो दिन पहले बस्तर के भारी विवादास्पद आईजी एस.आर.पी. कल्लूरी का कैमरों के सामने दिया गया वह राजनीतिक और अलोकतांत्रिक बयान भी देखने की जरूरत है जिसमें उन्होंने खुले राजनीतिक-अहंकार के साथ लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ बयानबाजी की है, और अपने-आपको लोकतंत्र से ऊपर साबित करने की कोशिश की है। उनका यह बयान आदिवासी बस्तियों को जलाने की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के बाद और उसी संदर्भ में आया है। बस्तियों के बाद अब शहरों में लोकतांत्रिक लोगों के पुतले जलाकर कल्लूरी की पुलिस ने यह साबित किया है कि लोकतंत्र की ऐसी आगजनी पर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकता, और बस्तर की पुलिस बस्तियों के बाद बेकसूरों के पुतले भी एक आंदोलन की तरह जला सकती है।
छत्तीसगढ़ के लोकतांत्रिक ढांचे में यह एक बहुत ही अनोखी नौबत है कि एक अफसर इस कदर अलोकतांत्रिक बर्ताव कर रहा है, और सरकार में कोई भी उस पर रोक लगाने की न सोच रहा है, न ऐसा कुछ बोल रहा है। जब निर्वाचित लोकतांत्रिक ताकतें लोकतंत्र को इस तरह और इस हद तक हांकने की ताकत वर्दीधारी अफसरों को दे देती हैं, तो वह एक भयानक खतरनाक नौबत से कम कुछ नहीं है। कोई अफसर नक्सलियों को मारने में कामयाब हो सकता है, लेकिन क्या इस खूबी को देखते हुए उसे बस्तर जैसे एक नाजुक और संवेदनशील, संविधान में विशेष हिफाजत मिले हुए आदिवासी इलाके में तानाशाही का ऐसा हक देना जायज है? ऐसे में मुल्क की सरहद पर बहादुरी दिखाने वाले फौजियों को भी कुछ कत्ल माफ होने चाहिए, और फौजियों को भी बस्तर की तरह यह छूट मिलनी चाहिए कि वे भारत के जिन सामाजिक आंदोलनकारियों को पाकिस्तान का हिमायती समझते हैं उनके पुतले जलाने के लिए दिल्ली के राजपथ पर वर्दी में इकट्ठे हों।
पुलिस या किसी भी फौज में अफसर तो आते-जाते रहते हैं, और हिंसक और तानाशाह अफसर भी लोगों ने वक्त-वक्त पर देखे हैं, लेकिन वे अफसर लोकतंत्र की आखिरी ताकत नहीं रहते हैं। लोकतंत्र में आखिरी ताकत निर्वाचित जनप्रतिनिधि रहते हैं, और छत्तीसगढ़ की निर्वाचित सरकार सुप्रीम कोर्ट के बार-बार के आदेश देखने के बावजूद सबसे बेजुबान आदिवासियों के बस्तर में जिस तरह की तानाशाही की छूट देकर चल रही है, वह रूख हक्का-बक्का करने वाला है। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार ऐसे अफसरों के कितने ही जुर्म अनदेखे क्यों न करें, बस्तर सुप्रीम कोर्ट की नजरों में है, और हमको वह दिन दूर नहीं दिख रहा है जब लोकतंत्र के पुतलों को इस तरह से जलाने को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया जाएगा। अब यह काम सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुतले जलने के पहले होगा, या बाद में, यह देखना होगा।

सोशल मीडिया से पाखंड का भांडा फूट रहा है...

संपादकीय
24 अक्टूबर 2016
हिन्दुस्तान में आज उग्र राष्ट्रवाद के चलते हुए जिस तरह से पाकिस्तान और चीन के सामानों और इंसानों के बहिष्कार के फतवे चल रहे हैं, उनमें सोशल मीडिया की मेहरबानी से भांडाफोड़ भी होते चल रहा है। मुंबई में एक कागजी शेर राज ठाकरे ने फतवा जारी करके पाकिस्तानी कलाकार वाली एक मुंबईया फिल्म के बहिष्कार का नारा दिया, तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भूलकर राज ठाकरे और फिल्म उद्योग के बीच बिचौलिया बनकर यह समझौता कराया कि इस फिल्म का निर्माता सैनिक कल्याण कोष में पांच करोड़ दान देगा। लेकिन इसके बाद एक बड़ी जायज प्रतिक्रिया भूतपूर्व सैनिकों से लेकर शिवसेना के उद्धव ठाकरे तक से आई कि ऐसी फिरौती के अंदाज में वसूली गई रकम की जरूरत हिन्दुस्तान के सैनिकों को नहीं है।
दूसरी तरफ बाजार में सामानों के बहिष्कार का नाटक भी पूरी तरह से उजागर हो रहा है। जो बाबा रामदेव चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं, उनकी खुद की ट्वीट चीन में बने हुए मोबाइल फोन से पोस्ट हो रही है। दूसरी तरफ उनकी कंपनी जो आयुर्वेद दवाएं बेचती है, उनमें मुल्तानी मिट्टी भी शामिल है जो कि पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी है। और जिन पार्टियों के लोग लगातार ऐसे बहिष्कार की बात कर रहे हैं, उनमें से भाजपा के राज वाले महाराष्ट्र और गुजरात ने अभी-अभी चीनी कंपनियों के साथ दसियों हजार करोड़ रूपए के अनुबंध किए हैं, और हैरानी और हिकारत की बात यह है कि सड़क किनारे दस-बीस रूपए के चीनी सामान बेचने वाले फेरीवालों के सामानों का बहिष्कार किया जा रहा है। लोगों को इस बात की जानकारी कम है कि नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ इन दोनों के एक सरीखे करीब उद्योगपति सजन जिंदल ने इन दोनों के बीच बातचीत और दोस्ती करवाई, और सजन जिंदल सहित अदानी-अंबानी जैसे उद्योगपति पाकिस्तान के साथ हजारों करोड़ का कारोबार कर रहे हैं। तो बहिष्कार के फतवे महज छोटे लोगों के लिए हैं, और ऐसे दिखावे के लिए हैं जिनसे हिन्दुस्तान के मक्कार लोग अपनी राष्ट्रभक्ति और अपने राष्ट्रप्रेम के सुबूत बैनरों की तरह हवा में लहरा सकें।
आज जब किसी राजनीतिक दल के नेता ऐसे बहिष्कार के फतवे दें, तो उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि देश के बाकी कारोबार का हिसाब भी सामने रखें। छोटे लोगों के पेट पर लात मारना, और खरबपतियों के कारोबार को जारी रखना, यह कहां का देशप्रेम है? सोशल मीडिया की मेहरबानी से लोगों का ऐसा पाखंड उजागर होते चल रहा है। देश के भीतर के मुद्दों पर भी यह बात बार-बार उजागर हुई कि किस तरह गाय को बचाने के नाम पर इंसानों के कत्ल की वकालत करने वाले नेता गाय काटने और गोश्त बेचने वाले कारखानों में भागीदार हैं, उनसे करोड़ों का चंदा लेते हैं। यह एक अच्छी बात है कि सोशल मीडिया से भारत के बेजुबान लोगों को एक नया अधिकार मिला है, और देश-विदेश के ऐसे पाखंड का भांडा फूट रहा है।

उत्तरप्रदेश में सपा राजनीति एक नई नौजवान करवट...

संपादकीय
23 अक्टूबर 2016
उत्तरप्रदेश में सामंती मालिकाना हक की तरह, समाजवाद के नाम पर चलाई जा रही पार्टी और सरकार झेल रही है अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी दरार। ऐसा लग रहा है कि मुलायम सिंह और उनके बेटे के बीच यह पार्टी ऊपर से नीचे तक पूरी तरह दो फांक होने जा रही है, और यह शायद भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा दलीय विभाजन होगा जो कि बाप-बेटे को एक-दूसरे के सामने खड़ा कर देगा। हालांकि अभी इस लड़ाई में कई और बातें आना बाकी है, लेकिन अपने मौजूदा मतभेदों की वजह से भी आज यह मुद्दा लिखने लायक है।
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में समाजवाद के नाम पर जिस तरह का सामंतवाद चलता है, उसकी दो सबसे बड़ी मिसालें उत्तरप्रदेश और बिहार के ये दो बड़े यादव कुनबे हैं जो कि अब समधियाना भी बन चुके हैं। जब ऐसे बड़े-बड़े परिवार अपने सारे विस्तार के साथ एक ही पार्टी, एक ही सरकार, और एक ही प्रदेश पर इस तरह लद जाते हैं कि किसी को सांस लेने के लिए भी अलग से जगह न मिले, तो ऐसे तनाव और ऐसी खींचतान अनहोनी नहीं कही जा सकती। फिर यह भी है कि मुलायम सिंह की राजनीति किसी ईमानदारी के लिए नहीं जानी जाती। अनुपातहीन सम्पत्ति के मामले उनके कुनबे पर चलते रहे हैं, और उत्तरप्रदेश में जातिवाद, भ्रष्टाचार, सत्ता की मनमानी, इन सब में मुलायम सिंह की परले दर्जे की दखल सुनाई पड़ती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी का, विदेश में पढ़कर लौटा नौजवान अगर पार्टी और सरकार के तौर-तरीकों को थोड़ा सा बदलने की कोशिश करता है, तो एक स्वाभाविक टकराव होना बड़ी स्वाभाविक बात है। और समाजवादी पार्टी में आज कुछ उसी तरह की हलचल हो रही है जैसी कि धरती के नीचे लाखों बरस पहले की चट्टानी प्लेटों के खिसकने से भूकंप की शक्ल में होती है।
उत्तरप्रदेश के सामने खड़े चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का भविष्य अभी असमंजस में दिख रहा था। रीता बहुगुणा जैसे जिन नेताओं ने पार्टी को पूरी तरह से डुबाकर रख दिया था, उन्हें किसी चैंपियनशिप की ट्रॉफी की तरह पार्टी में लाकर, सजाकर भाजपा अपनी दुविधा का सुबूत दे रही थी। ऐसे में सबसे बड़ी समाजवादी पार्टी में इस तरह का दो फांक विभाजन भाजपा के लिए बड़े मजे का हो सकता है, लेकिन सिर्फ एक खतरा ऐसे में बाकी दिखता है कि अगर समाजवादी पार्टी का अखिलेश वाला हिस्सा और कांग्रेस पार्टी मिलकर कोई गठबंधन बनाएं, तो भाजपा के सामने एक नई परेशानी खड़ी हो सकती है। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह की राजनीति अगर इस तरह की एक नौजवान करवट लेती है, तो हो सकता है कि आगे चलकर प्रदेश के लिए वह एक अच्छी बात हो। हम किसी की ईमानदारी और बेईमानी के बारे में यहां अटकलबाजी करना नहीं चाहते, लेकिन उत्तरप्रदेश को करीब से देखने वाले बहुत से अखबारनवीस यह लिखते हैं कि अखिलेश एक बेहतर मुख्यमंत्री हैं, और शायद कम बेईमान हैं, या शायद कुछ ईमानदार हैं। अगर ऐसी बात होती है तो फिर एक सामंती, जातिवादी, और भ्रष्ट पीढ़ी का राजनीति के हाशिए पर चले जाना ही बेहतर होगा।
उत्तरप्रदेश की राजनीति पूरे उत्तर भारत या पूरे हिन्दी भाषी इलाके को प्रभावित करने वाली राजनीति रहती है, और सांसदों की संख्या के हिसाब से भी यह प्रदेश देश में सबसे बड़ा प्रदेश है जिसकी वजह से संसद में भी इस राज्य की पसंद देश की पसंद बनने की संभावना रखती है। ऐसे में एक नई पीढ़ी अगर राजनीति में आगे बढ़ रही है, तो पारिवारिक टकराव के बावजूद इसके कुछ अच्छे नतीजे हो सकते हैं। फिलहाल यह लिखना समय के पहले लिखने की तरह है, और हो सकता है कि आने वाले हफ्तों में बाप-बेटे एक बार फिर एक साथ हो जाएं। अब उत्तरप्रदेश में कल तक जो रीता बहुगुणा मोदी और अमित शाह के खिलाफ जहरीली और तेजाबी ट्वीट करती थीं, वे आज भाजपा का दुपट्टा पहनकर बड़े गर्व के साथ एक नई पारी शुरू कर रही हैं। तो जिस राजनीति में ऐसे अजीब हमबिस्तर होते हों, वहां पर मुलायम और अखिलेश तो फिर भी अब तक एक ही पार्टी के बाप-बेटे हैं।

इजराइल से सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, साइबर सुरक्षा सीखी जाए

संपादकीय
22 अक्टूबर 2016
भारत के बैंक ग्राहकों में से करीब पौन करोड़ के एटीएम कार्ड में विदेशी हैकरों ने सेंध लगा दी है, ऐसी खबर सरकार की तरफ से आई है। और इसमें सारे नामी-गिरामी बड़े-बड़े बैंक हैं जिनके पास अपने कम्प्यूटरों की हिफाजत करने की ताकत होनी चाहिए थी। लेकिन यह दुनिया की एक नई हकीकत है कि कम्प्यूटरों में कुछ भी सुरक्षित नहीं रह सकता, और दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर-ताकत अमरीका सरकार के खुफिया कम्प्यूटरों में भी लगातार घुसपैठ चलती ही रहती है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम ऐसी एक नौबत को लेकर कई बार लिखते हैं कि दुनिया की आने वाली जंग जरूरी नहीं है कि फौजी हथियारों से ही लड़ी जाए, और भारत जैसे देश की सरहद पर फौजी हमले से जितना नुकसान हो सकता है, उससे कहीं अधिक नुकसान एक साइबर हमले से हो सकता है जिससे पल भर में रेल रिजर्वेशन खत्म हो जाए, बैंकों के रिकॉर्ड तहस-नहस हो जाएं, विमानों की सीट बुकिंग के रिकॉर्ड मिट जाएं, और लोगों के ई-मेल पर हमला हो जाए। इससे जो तबाही होगी, उसके जख्म आसानी से भरे भी नहीं जा सकेंगे।
कुछ महीने पहले की बात है कि बांग्लादेश के एक बड़े सरकारी बैंक में बड़ी साइबर डकैती हुई थी, और बैंक को शायद कंगाल बना दिया गया था। आज भारत में यहीं के घरेलू साइबर मुजरिम हर दिन हजारों लोगों के खातों से तरह-तरह की ठगी और जालसाजी करते हैं, और जनता के बीच अपने बैंक खातों के हिफाजत की समझ बड़ी कमजोर है। ऐसे में अगर पौन करोड़ लोगों के बैंक-कार्ड पर हमला हुआ है, तो इससे बैंकों पर लोगों का भरोसा भी उठेगा। और भारतीय अर्थव्यवस्था में आज भी जमीन, शेयर बाजार, या सोने के मुकाबले बैंक मेें जमा रकम को अधिक सुरक्षित माना जाता है और यह नौबत अगर बदलेगी तो बैंकों से हटाए गए पैसे कम सुरक्षित जगहों पर जाएंगे और देश की अर्थव्यवस्था एक अलग किस्म से तबाह होगी।
अभी यह ठीक से मालूम नहीं है कि भारत ऐसे साइबर-हमलों के लिए किस हद तक तैयार है, लेकिन अमरीका की बनी हुई कई रोमांचक अपराध फिल्मों में यह देखने मिलता है कि सरकार और पुलिस के कम्प्यूटरों पर कब्जा करके अपराधियों का एक छोटा सा गिरोह भी एक कमरे में बैठकर पूरे देश के बिजलीघरों को ठप्प कर सकता है, उपग्रह संचार प्रणाली को बैठा सकता है, और सड़कों पर सारे के सारे ट्रैफिक लाईट अपने काबू में ले सकता है। अब ऐसा साइबर खतरा अकेले भारत पर है, ऐसा हम नहीं कहते, लेकिन भारत ऐसे किसी खतरे से निपटने की तैयारी में बड़ा दमखम रखता हो, ऐसा भी नहीं लगता है। एक बात यह भी याद रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय बाजार व्यवस्था में भारत के कॉल सेंटर दसियों लाख लोगों को रोजगार देते हैं, और ये महंगी कमाई वाले काम है। लेकिन अगर इनकी साइबर सुरक्षा खतरे में रहेगी, तो ये रोजगार भारत से छिन भी सकते हैं।
इन तमाम बातों को देखते हुए भारत को अपने कम्प्यूटरों और इंटरनेट की हिफाजत बड़ी तेजी से बढ़ानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो दिन पहले सर्जिकल स्ट्राइक के लिए इजराइल का जिक्र तारीफ के साथ किया है। इजराइल के तमाम हमले बेकसूर और निहत्थे फिलीस्तीनियों पर रहते हैं। अगर इजराइल से कुछ सीखना है तो वह साइबर-सुरक्षा है जिसमें कि इजराइल दुनिया में नंबर वन का देश है।