ठगी-जालसाजी वाले गांवों पर भी शिकंजा क्यों नहीं?

संपादकीय
9 अप्रैल 2017


पिछले कुछ दिनों से लगातार ये खबरें आ रही हैं कि किस तरह देश के कुछ गिने-चुने शहरों में बैठकर पूरे देश में फोन करके लोगों को ठगने और बैंक-जालसाजी करने वाले लोग पकड़ में आ रहे हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि झारखंड के किसी एक गांव में अगर हजारों लोग यही काम कर रहे हैं, तो मोबाइल फोन पर धोखा देने के इस संगठित जुर्म को पकडऩे के लिए अलग-अलग राज्यों की पुलिस को क्यों मेहनत करनी पड़ रही है, जहां के लोग ठगे जा रहे हैं? केन्द्र सरकार या स्थानीय राज्य ऐसे संगठित अपराध पर सीधे कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे?
आज हिन्दुस्तान में जिस रफ्तार से लोगों का मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ा है, बैंक और उनकी बाकी सुविधाओं को आधार कार्ड से जिस रफ्तार से जोड़ा जा रहा है, और लोगों की तकनीकी समझ अब तक जितनी सीमित है, इन सबके चलते एक खतरनाक नौबत आकर खड़ी हो गई है, और बैंकवाला बनकर ठग लोगों को फोन करते हैं, उनके नंबर पूछ लेते हैं, और उनके खातों से रकम निकाल लेते हैं। आज केन्द्र सरकार नगदी को घटाकर लोगों के हर तरह के कामकाज में बैंक खाते को जिस आक्रामक तरीके से बढ़ावा दे रही है, उतनी आक्रामकता न तो लोगों को जागरूक करने में दिखती, और न ही ऐसे साइबर क्राईम को पकडऩे की तैयारी में दिखती। हम पहले भी यह बात लिखते आए हैं कि भारत में ठगी और जालसाजी जैसे आर्थिक अपराधों की रिपोर्ट होने के बाद उनकी जांच और कार्रवाई में बहुत देर हो जाती है, और तब तक लोग तो लुट चुके रहते हैं। ऐसे में आर्थिक अपराधों के लिए एक खुफिया निगरानी तंत्र होना चाहिए जो कि ऐसे अपराध होने के पहले ही, या होना शुरू होते ही उन्हें रोक सके ताकि लुटने वाले लोगों की गिनती न बढ़े।
अब जब टेलीफोन नंबरों की शिनाख्त के बाद उनके इलाके को जाना जा सकता है, तब यह बात हमारी समझ से परे है कि एक-दो गिने-चुने बदनाम गांव-कस्बे ऐसे कैसे हो सकते हैं कि जहां हजारों लोगों का पेशा ही ठगी-जालसाजी, और साइबर जुर्म हो? ऐसे गांव पर कार्रवाई आसान हो सकती है, वहां के नंबरों से होने वाले कॉल की रिकॉर्डिंग हो सकती है, वहां से चलने वाले बैंक खातों पर नजर रखी जा सकती है, और अगर सरकार ऐसा नहीं कर पाती है, तो उसे डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देने का कोई अधिकार भी नहीं है। डिजिटल इंडिया जैसे-जैसे शक्ल लेता जाएगा, वैसे-वैसे बेकसूर लोग और भी अधिक शिकार होते जाएंगे। इस सिलसिले को तुरंत रोकने की जरूरत है, और यह मामला ऐसा है जिसमें भारत के बाहर बसे हुए साइबर-विशेषज्ञ भारतवंशी लोग भी मदद कर सकते हैं। भारत सरकार को बिना देर किए एक अभियान इसी पर चलाना चाहिए, और उसे आगे भी जारी रखना पड़ेगा क्योंकि साइबर-सुरक्षा में सरकार जितना भी आगे बढ़ेगी, मुजरिम उससे चार कदम आगे चलने के रास्ते निकालते ही रहेंगे।

तरूण विजय से परे भी रंगभेद पर खुली चर्चा की जरूरत...

संपादकीय
8 अप्रैल 2017


भारतीय जनता पार्टी सांसद और आरएसएस के अखबार पांचजन्य के संपादक रहे हुए तरूण विजय के लिए टीवी पर बोलना या अखबारों में लिखना कोई नई बात नहीं है, वे लगातार मीडिया से मुखातिब रहते हैं, और उनसे हड़बड़ी या दबाव में कुछ गलत कहने की उम्मीद नहीं की जाती है। ऐसे में जब उन्होंने भारत में विदेशी अश्वेतों पर हुए हमलों पर चल रही एक टीवी बहस में कहा कि भारत में कोई नस्लवाद या रंगभेद नहीं है, और इसके सुबूत के रूप में उन्होंने यह कहा कि भारतीय, दक्षिण भारतीयों के साथ रहते हैं, उन्होंने कहा कि अगर भारतीय नस्लवादी होते तो वे दक्षिण भारतीयों के साथ कैसे रह पाते? उनकी इस बात में एक-दो शब्द इधर-उधर हो सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर उन्होंने भारत के रंगभेदी न होने के सुबूत के रूप में अपने दिमाग के रंगभेद को पेश कर दिया। अब आज का सोशल मीडिया का वक्त ऐसा है कि ऐसा कहकर किसी का बच निकलना तो मुमकिन हो नहीं सकता, इसलिए ट्विटर पर उनकी वह धुलाई हो रही है कि उन्हें खुद अपनी इस गलत बात पर बार-बार, लगातार माफी मांगनी पड़ रही है।
दरअसल दिमाग में जो सोच रहती है, वह कभी-कभी इस तरह से सामने आ भी जाती है। भाजपा के एक बड़े पुराने और जाने-माने चेहरे के रूप में तरूण विजय की यह बात दक्षिण भारतीयों के लिए अपमानजनक तो है ही, इससे उनकी यह सोच भी सामने आती है कि दक्षिण भारत मानो भारत का हिस्सा ही न हो। भाजपा के ये राज्यसभा सदस्य हों, या कि कोई और, एक बात यह समझ लेनी चाहिए कि दिल्ली पर उत्तर-पूर्व का, दक्षिण भारत का, या कि कश्मीर का उतना ही हक है, जितना कि उत्तर भारत का है। कश्मीर के लोगों को हमेशा से यह शिकायत रहते आई है कि बाकी हिन्दुस्तान के लोग कश्मीर को अलग-थलग गिनकर चलते हैं, और इसकी प्रतिक्रिया में कश्मीर के लोग भी अपने आपको कश्मीर और बाकी भारत को इंडिया कहते हैं। इसी तरह उत्तर-पूर्व की चर्चा भी बाकी हिन्दुस्तान के लोग इसी अंदाज में करते हैं कि उधर वह उत्तर-पूर्व है, और बाकी हिन्दुस्तान है। उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ देश में जगह-जगह भेदभाव होता है, दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक उन पर हमले होते हैं, और ऐसी घटनाओं से वहां के लोग बाकी देश की मूलधारा के साथ जुड़ नहीं पाते, या कि बाकी देश अपनी मूलधारा में ऐसी सरहदी राज्यों को, वहां के लोगों को जोडऩा नहीं चाहता।
तरूण विजय ने जो कहा है, वह हिन्दी फिल्मों में आधी सदी से भी अधिक से चली आ रही एक रंगभेदी सोच है जिसमें किसी दक्षिण भारतीय को दिखाने के लिए उसे एकदम काले रंग का दिखाया जाएगा, उसकी हिन्दी को टूटी-फूटी और बेहूदी बनाया जाएगा, उसे लुंगी पहना दी जाएगी, और उसे मद्रासी कहा जाएगा। भारत में रंगभेद की जड़ें समाज में इतनी गहरी हैं कि शादियों के विज्ञापनों में बहुत से ऐसे रहते हैं जिनमें गोरे रंग की शर्त जुड़ी रहती है। इस देश में गोरे बनाने की क्रीम का बहुत बड़ा बाजार है, और बड़े-बड़े फिल्मी सितारे इसे बेचने का काम करते हैं। काले रंग के लिए देश के बहुत से लोगों के मन में एक हिकारत है, और किसी का जिक्र करते हुए उसे काली-कलूटी कहा जाता है। ऐसे देश में जब काले रंग का इस्तेमाल विरोध करने के झंडों में होता है, किसी आंदोलन करने के लिए कपड़ों पर काली रिबन बांध ली जाती है, काले बैनर लगाए जाते हैं, तो काले रंग को एक नकारात्मक रंग की तरह पेश करने का काम भी होता है। लोग बोलचाल में यह कहते हैं कि फलां के काम इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होंगे, काला अक्षर भैंस बराबर, यह बात अपमान के रूप में कही जाती है, हालांकि इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि गोरी गाय पढ़ी-लिखी होती है।
तरूण विजय ने एक बहुत ही शर्मनाक बात कही है, और उसके लिए लोकतंत्र में माफी मांग लेने, और माफ कर देने के अलावा कोई बहुत अधिक विकल्प नहीं बचते हैं, लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि दक्षिण भारत में फतह पाने की उम्मीद लगाई हुई भारतीय जनता पार्टी को वहां नुकसान पहुंचाने के लिए, गोमांस के विवाद के बाद अब यह काले रंग का विवाद और जुड़ गया है, और आने वाले चुनावों में दक्षिण में इसका क्या मुद्दा बनता है, यह देखना होगा। लेकिन हमारा यह मानना है कि तरूण विजय के इस विवाद के साथ अब हिन्दुस्तान के भीतर के रंगभेद पर खुलकर चर्चा हो ही जानी चाहिए।

मोदी बिना ट्रैफिक रोके दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे!

संपादकीय
7 अप्रैल 2017


दिल्ली पहुंचीं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना ट्रैफिक को रोके हुए अघोषित तरीके से एयरपोर्ट पहुंचे। यह एक अलग बात है कि यह कदम आम शिष्टाचार नियमों से ऊपर था, और बांग्लादेश को एक अलग महत्व देने वाला था, लेकिन उससे भी अलग बात यह है कि मोदी ने यह दिखा दिया कि दिल्ली जैसे व्यस्त शहर में भी प्रधानमंत्री आम लोगों के ट्रैफिक के बीच से उसी तरह निकलकर जा सकता है। पिछले कुछ हफ्तों में पंजाब के मुख्यमंत्री का यह फैसला सामने आया है कि वे गाडिय़ों में लालबत्ती नहीं लगाएंगे, और सादगी की इस पहल पर हमने कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह लिखा भी है। लेकिन अब प्रधानमंत्री की इस पहल के बाद अब देश के बाकी मुख्यमंत्रियों और केन्द्र के मंत्रियों के सामने भी यह एक नैतिक दबाव रह सकता है कि वे भी ऐसा करें।
आज भारतीय लोकतंत्र में नेता जनता से कटते चले गए हैं, और जनता के मन में नेताओं के ठाठ-बाट देखकर हिकारत बढ़ती चली जा रही है। इसलिए यह जरूरी है कि जनता के बुनियादी हकों को कुचलने का काम खत्म किया जाए। दो ही दिन पहले एक वीडियो आया है जिसमें एक एम्बुलेंस में कोई मरीज दम तोड़ते दिख रहा है, और उसे रियायती कार-काफिले के लिए रोक दिया गया है। प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह एक बार जब चंडीगढ़ गए थे तो वहां के सबसे बड़े अस्पताल, पीजीआई, में कार्यक्रम था, और चारों तरफ एम्बुलेंस दूर-दूर रोक दी गई थीं, और भयानक नजारा मीडिया में सामने आया था। दुनिया के जितने सभ्य लोकतंत्र हैं, वहां पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बिना ऐसे काफिलों के निकल जाते हैं, और योरप के तो कई ऐसे देश हैं जिनमें प्रधानमंत्री साइकिल से दफ्तर आते-जाते हैं। भारत में ही मुगलों और अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही सामंती सोच खत्म नहीं होती है, और सुरक्षा-जरूरतों से आगे बढ़कर लोग अपनी शान-शौकत के लिए बड़े-बड़े काफिले लेकर चलते हैं, और शायद सरकार के भीतर की फाइलों में इसे सही ठहराने के लिए अपनी सुरक्षा पर खतरा भी लिखवा लेते हैं।
यह सिलसिला थमना चाहिए, लेकिन जनता इसे लेकर अदालत भी नहीं जा सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज खुद भी लालबत्तियों लगी हुई गाडिय़ों में, और कम से कम छत्तीसगढ़ में हमें दिखता है कि पुलिस की सायरन बजाती पायलट गाड़ी के साथ चलते हुए गुजरते हैं। उनका हाल यह रहता है कि फायर ब्रिगेड की तरह उन्हें अदालत पहुंचकर तुरंत ही बेइंसाफी की आग बुझानी है, यह एक अलग बात है कि मामले पूरी-पूरी पीढ़ी तक अदालत में घिसटते रहते हैं, और जजों के लिए ट्रैफिक रोक दिया जाता है। लोकतंत्र में सामंतवाद का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट का कोई जज अगर लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाला आए, तो उसे तुरंत यह बात समझ आएगी कि जजों को लालबत्ती और सायरन की कोई जरूरत नहीं रहती है, और उन्हें सरकार के सामने, नेताओं के सामने एक मिसाल रखनी चाहिए।

भारत की जमीन पर विदेशियों से बुरे सुलूक के लंबे नतीजे

संपादकीय
6 अप्रैल 2017


दिल्ली से लगे उत्तरप्रदेश के नोएडा में कुछ दिन पहले एक अफ्रीकी नागरिक को एक मॉल में इस बुरी तरह पीटा गया कि उसका वीडियो देखते भी नहीं बनता था। लेकिन दिल्ली शहर में भी कुछ बरस पहले ऐसी वारदातें हुई हैं, और उस वक्त भी अफ्रीका के इन देशों ने इसका विरोध किया था। अब अफ्रीकी देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ में भी इसे नस्लवादी हमला बताते हुए शिकायत की है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर आपत्ति की है, और कहा है कि भारत के भीतर की इस घटना को लेकर संयुक्त राष्ट्र क्यों जाना चाहिए। पहले भी भारत के कुछ इलाकों में कुछ विदेशी नागरिकों के साथ हिंसा हुई है, और उसकी भी प्रतिक्रिया पर्यटकों के आने में कमी के अलावा भी कई और तरह से हुई।
भारत में विदेशियों के साथ बुरा सुलूक करने वाले लोगों को यह समझ नहीं रहती कि उन देशों के साथ भारत के संबंधों पर इसका क्या असर पड़ता है, भारत की साख पर इसका क्या असर पड़ता है, और सबसे बड़ी बात यह कि उन देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों को इससे क्या-क्या खतरे झेलने पड़ते हैं। अफ्रीका में पहले भी कई देशों से हिन्दुस्तानियों को भगाया जा चुका था, और उन्हें अपना कारोबार छोड़कर निकलना पड़ा था। यह बात जाहिर है कि दूसरे देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानी भारत के लिए एक बड़ी कमाई भी करते हैं, और वे वहां पर भारत के अघोषित प्रतिनिधि भी रहते हैं। ऐसे में आज यह मुद्दा भी उठ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत जिस सदस्यता के लिए दशकों से कोशिश किए जा रहा है, उसके लिए अफ्रीकी देशों का समर्थन उसके लिए बहुत मायने रखता है, और अगर वहां से आकर भारत में पढ़ रहे छात्रों के साथ ऐसी हिंसा होती है, तो इससे संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत के महत्व पर खतरे खड़े होंगे।
हिन्दुस्तान में बसे हुए इस देश के लोगों में से जिन लोगों के रिश्तेदार दूसरे देशों में काम करते हैं, या रहते हैं, वे शायद ही कभी विदेशियों के साथ इस तरह की हिंसा करेंगे क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपने घरवालों पर खतरे साफ दिखते रहेंगे। जो लोग दुनिया के दूसरे देश घूमने जाते हैं, वे लोग भी ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें बाहर अपने साथ भी ऐसे सुलूक का खतरा दिखेगा। लेकिन दुनिया से कटे हुए, अनजान, एक सुरंग या कुएं जैसी सीमित सोच और समझ रखने वाले लोग अपनी भीड़ की ताकत से ऐसी हिंसा पर उतर जाते हैं, और उसका नुकसान लंबे समय तक इस देश को और यहां से बाहर जाकर काम करने वाले लोगों को झेलना पड़ता है।
विदेशी नागरिकों के अलावा एक और बात जो भारत के लोगों की साख को दूसरे देशों में लगातार घटाती है, वह है यहां धर्म या जाति के नाम पर, लोगों के साथ की जाने वाली हिंसा। गौरक्षक बनकर जो लोग गाय लेकर जाते किसी भी मुस्लिम या दूसरे धर्म के लोगों को सड़कों पर मार डाल रहे हैं, वे गाय को नहीं बचा रहे हैं, वे इस देश की एक संभावना को मार रहे हैं। गाय को ही बचाने की ताकत अगर ऐसे स्वघोषित गौरक्षकों में होती, तो फिर बात ही क्या थी। गाय तो जैसे ही दूध देना बंद करती है, उसके लिए जिंदा रहने को खाने के लिए महज घूरे बच जाते हैं। अपनी मां कही जाने वाली गाय को इस तरह लंबी जिंदगी के लिए कचरे पर जीने की बेबसी देने वाले लोग एक पाखंडी धार्मिक कट्टरता दिखाते हुए भीड़ की ताकत से हिंसा करते हैं, और पूरी दुनिया में इस देश का नाम बदनाम करते हैं। इसलिए न सिर्फ दूसरे देशों से आए हुए विदेशी नागरिक, बल्कि अपने देश के नागरिकों के साथ भी ऐसी सार्वजनिक हिंसा हिन्दुस्तान को बहुत पीछे कर दे रही है। आज अगर सरकार को विदेशों से संबंध और कारोबार का नुकसान दिखाई नहीं दे रहा है, तो मोदी सरकार के इस कार्यकाल के भीतर ही यह दिखने लगेगा। आज जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक नस्लवादी और हिंसक अंदाज में विदेशियों के साथ अमरीकी धरती पर भेदभाव कर रही है, तो भारत के पास इसके खिलाफ बोलने के लिए मुंह भी नहीं बचता है क्योंकि यह देश अपने आपमें ऐसा ही कर भी रहा है। भेदभाव और हिंसा के खिलाफ मुंह खोलने के लिए जो नैतिक ताकत लगती है, उसे भारत अपनी घरेलू हिंसा की ऐसी घटनाओं के साथ खोते चल रहा है।

किसानों की कर्जमाफी और उससे जुड़े हुए दूसरे मुद्दे...

संपादकीय
5 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश में भाजपा सरकार ने अपने वायदे के मुताबिक किसानों की कर्जमाफी की घोषणा की है, और इससे एक तो पार्टी और दूसरे नए मुख्यमंत्री, इन दोनों की साख बढ़ी है। अब दूसरी तरफ महाराष्ट्र में राज्य सरकार ने भाजपा की भागीदार शिवसेना ने इसकी तारीफ करते हुए राज्य के भाजपा मुख्यमंत्री से किसानों की कर्जमाफी महाराष्ट्र में भी मांगी है। आगे-पीछे देश के बाकी राज्यों में भी ऐसी मांग उठने लगेगी, और खासकर भाजपा के शासन वाले राज्य इस गर्मी को कुछ अधिक महसूस करेंगे। एक राष्ट्रीय पार्टी एक राज्य में अलग नीति, और दूसरे राज्य में कोई दूसरी नीति नहीं रख सकती, हालांकि केन्द्र की भाजपा अगुवाई वाली सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्जमाफी जिस राज्य को करनी है, उसे अपने ही साधनों से यह काम करना होगा, और इसमें केन्द्र कोई मदद नहीं करेगा। पाठकों को याद होगा कि कुछ दिन पहले देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, एसबीआई की मुखिया ने किसानी-कर्जमाफी को अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया था, और इसका विरोध किया था। देश के अर्थशास्त्रियों में दोनों तरह के लोग हैं, कुछ लोग यह मानते हैं कि जब बड़े-बड़े कारखानेदारों को हजारों करोड़ के कर्ज लेने के बाद दीवालिया होने की छूट दी जाती है, तब छोटे-छोटे किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए उनको ऐसी रियायत क्यों नहीं मिलती?
दुनिया के अधिकतर देशों में किसानों को किसी न किसी तरह की सरकारी रियायत मिलती है, इसकी एक वजह यह भी है कि बाकी तमाम चीजें तो कारखानों में बन सकती हैं, अनाज अभी तक कारखानों में नहीं उग रहा है। इसलिए किसानों का जिंदा रहना बाकी दुनिया के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। भारत में हम देखते हैं कि बाजार में चीजों के दाम सरकार और जनता के काबू के बाहर रहते हैं, सोना कभी आसमान पर चले जाता है, तो कभी धरती पर गिर जाता है, और कारोबारी भी इस पर कोई काबू नहीं रख पाते। लोग महंगे सामान, महंगी गाडिय़ां, महंगे ऐशोआराम में तो मोलभाव नहीं करते, लेकिन फल-सब्जी पर खूब मोलभाव होता है, और किसान को मिलने वाली रियायत या मदद लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाती है। भारत में भी लोगों को यह समझने की जरूरत है कि बाकी चीजों के बिना तो वे कुछ दिन गुजार सकते हैं, लेकिन अनाज के बिना उनका काम नहीं चल सकता। अभी आधी सदी पहले तक की ही बात है जब देश में जरूरत से कम अनाज होता था, और अमरीका से मदद में बहुत रद्दी किस्म का गेहूं आता था, और लोग राशन दुकानों में लाईन में लगकर उसे लेते थे। इसलिए यह याद रखना चाहिए कि अगर किसान जिंदा नहीं रहेगा, तो बाकी आबादी भी जिंदा नहीं रहेगी।
हम किसानी या किसी और किस्म के कर्ज को माफ करने की कोई अंधी वकालत नहीं कर रहे, लेकिन इतना जरूर कह रहे हैं कि अगर सरकार को किसी की भी कर्जमाफी करनी है, तो वह मजदूर, फुटपाथ के व्यापारी, और छोटे किसान होने चाहिए। जो जितना कमजोर है, जो जितना गरीब है, उसे उतनी ही अधिक मदद मिलनी चाहिए, और अब इस पैमाने को कैसे तय किया जाए, कर्जदारों को इस पर कैसे परखा जाए, और कैसे इस मदद को लोगों की लत न बनने दिया जाए, यह सरकार और अर्थशास्त्रियों की बात है। छत्तीसगढ़ में भी हम पिछले बरसों में यह देखते हैं कि सरकार किसानों की लगभग पूरी उपज बाजार से अधिक दाम पर खरीदती है, और गरीब लोगों को बाजार से पांच फीसदी दाम पर अनाज देती है। ये दोनों किस्म की सब्सिडी खासा बड़ा बोझ है, लेकिन इन्हीं दोनों के चलते हुए किसानों की आत्महत्या किसानी की वजह से, कर्ज की वजह से, कम सुनाई देती है, और भूख-कुपोषण की वजह से लोगों की भुखमरी अब इस राज्य में बिल्कुल भी सुनाई नहीं पड़ती। जब कभी एक व्यापक नीति के तहत पूरे राज्य स्तर पर किसी तबके की मदद करनी है, तो उसकी बारीक छानबीन भी होनी चाहिए, क्योंकि यह जनता के हक का पैसा रहता है, और इसे महज लुभावनी राजनीति के लिए लुटाना ठीक नहीं है। गरीबी और मुसीबत, कर्ज न चुका पाने की हालत, इन सबको परखने का अच्छा पुख्ता इंतजाम होना चाहिए, और उसके बाद जहां जरूरत हो, वहां मदद जरूर करनी चाहिए।

अलग-अलग राज्यों में भाजपा की अलग-अलग नीतियों का राज

संपादकीय
4 अप्रैल 2017


गौहत्या और बीफ के मामले में देश में शुरू से आक्रामक रही भारतीय जनता पार्टी ने पिछले दो बरस में देश के अलग-अलग प्रदेशों में अपनी रीति-नीति अलग-अलग रखी है। इसी को लेकर अब भाजपा पर यह ताने कसे जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मम्मी, और उत्तर पूर्व में यम्मी, यानी मजेदार स्वाद वाली। उत्तर पूर्व में भाजपा ने यह साफ किया है कि वह बीफ के खिलाफ नहीं रहेगी। दूसरी तरफ, देश के एक अलग सिरे पर केरल में अभी दो दिन पहले भाजपा के एक लोकसभा-उपचुनाव उम्मीदवार ने सार्वजनिक रूप से मतदाताओं से वायदा किया है कि वे साफ सुथरा बूचडख़ाना मुहैय्या कराएंगे, और लोगों को बीफ हासिल रहेगा। भाजपा के ही राज वाले गोवा में लगातार भाजपाई मुख्यमंत्री कहते रहे हैं, और आज भी कहते हैं कि वहां न बीफ पर रोक लगेगी, न शराब पर। इसके अलावा वहां के पर्यटकों पर पोशाक की भी कोई बंदिश नहीं लगेगी, यह भी साफ किया गया है।
भाजपा के राज वाले अलग-अलग राज्यों में बीफ से लेकर शराब तक, और संस्कृति तक, अलग-अलग तस्वीरें देखने मिलती हैं। मोदी के गुजरात में नवरात्रि पर डांडिया की रातों में लड़कियों की दुस्साहसी पोशाकें देखने मिलती हैं, और यह आम बात रहती है कि नौजवान लड़के-लड़कियां होटलों में घंटों के हिसाब से कमरे लेते हैं। दूसरी तरफ उत्तरप्रदेश में भाजपा का राज आते ही लड़के-लड़कियों को साथ दिखने पर सड़कों और बाग-बगीचों में इस तरह पीटा जा रहा है कि हिंदुस्तान के इतिहास में पे्रम कभी रहा भी न हो। यहां तक कि जवान भाई-बहन भी सड़कों पर पीटे जा रहे हैं, और उन्हें छोडऩे के लिए पुलिस रिश्वत ले रही है। उत्तरप्रदेश से जिस तरह के वीडियो आ रहे हैं, वे भयानक हैं, और लग रहा है कि लोकतंत्र की इस देश में कोई जगह नहीं बची है।
अब अगर भाजपा के खुद के सीधे राज वाले प्रदेशों को देखें, तो वहां पर स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता के मुताबिक जिस तरह की विविधता भाजपा अपनी नीति में कर रही है, और सरकारी फैसलों में जैसा फेरबदल कर रही है उसे देखकर लगता है कि जब स्थानीय स्तर पर चुनाव जीतने की बात आती है तो भाजपा इन प्रदेशों में पर्याप्त लचीलापन दिखाती है। लेकिन जब किसी प्रदेश में बहुमत पाने के लिए उसकी नीतियां काफी हैं, तो वह अपनी तंगनीतियों पर कायम रहती है। इस फर्क को समझते हुए देश की विविधता को भी समझना होगा, और एक किस्म के खानपान, एक किस्म के पहरावे, एक किस्म संस्कृति को सब पर लादना बंद करना होगा। यह लोकतंत्र में वैसे भी गैरकानूनी और नाजायज बात है, लेकिन कहीं पर राज्य के कानून बनाकर, तो कहीं पर गैरकानूनी तरीके से सत्ता का संरक्षण देकर जिस तरह की एक सांस्कृतिक तानाशाही लादी जा रही है, वह भारत के लिए ठीक नहीं है। यह समझ लेना चाहिए कि चुनाव में बहुमत पाकर सत्ता में आने का यह मतलब नहीं होता है कि आबादी का बहुमत विविधता वाली आजादी के खिलाफ है। कई बार मुकाबले में खराब उम्मीदवार और खराब पार्टी के रहने से भी चुनाव जीते जाते हैं।

अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए

आजकल
3 अप्रैल 2017 

अभी एक साधारण से विश्वविद्यालय में हुए एक सरकारी समारोह में जाना हुआ, तो पूरा सभागृह तो ठंडा नहीं था, लेकिन स्टेज पर दोनों तरफ बड़े-बड़े टॉवर-एसी लगा दिए गए थे, ताकि मंच पर सूट-बूट और टाई में जकड़े हुए लोग चैन से बैठ सकें। इन दिनों बड़ी-बड़ी आमसभाओं में भी जहां लोग चिलचिलाती धूप में घंटों बैठते हैं, वहां कुछ देर के लिए मंच पर आने वाले लोगों के लिए भी किनारों पर इस तरह एसी लगाए जाते हैं कि नीचे के लोगों को न दिखें। और ऐसे तमाम मंचों पर लोग या तो जॉकेट और कोट में रहते हैं, या टाई पहने रहते हैं, बूट तो पहने ही रहते हैं।
दूसरी तरफ अभी कुछ दिन पहले खबर आई कि बढ़ती हुई गर्मी को देखते हुए छत्तीसगढ़ की अदालतों में वकीलों के काले कोट पहनने पर कुछ समय के लिए छूट दी गई है। लेकिन हम रोज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तस्वीरें खबरों में देखते हैं जिनमें वकील काले कोट से लदे हुए दिखते हैं, और जज तो पता नहीं कैसे जादूगरों से काले लबादे भी ओढ़े हुए रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट में शायद कुछ या सभी वकीलों को अदालत के भीतर जजों के सामने ऐसे लबादे भी ओढऩे होते हैं। 
रेलवे स्टेशनों पर देखें तो टीटीई भरी गर्मी में, खुले प्लेटफॉर्म पर भी काले कोट से लदे रहते हैं, और सरकारी कार्यक्रमों में एसी हॉल में पहुंचने वाले अफसर, एसी कार से जाते हुए सूट-बूट और टाई में रहते हैं। कारोबार की दुनिया में जो बड़े लोग रहते हैं, उनसे भी यह उम्मीद की जाती है कि वे इसी तरह की पोशाक में रहें जो कि हिन्दुस्तान जैसे देश के लिए न बनी थी, और न ही आज काम की है। 
हिन्दुस्तान के इतिहास की तस्वीरों को अगर देखें तो लखनऊ, बनारस, और कोलकाता के असली रईस लोग कुछ सौ बरस पहले हिन्दुस्तानी मौसम के लिए माकूल धोती-कुर्ते या पजामे में दिखते थे, और ठंड के मौसम में जरूरत के मुताबिक जाकिट पहन लेते थे। शायद अंग्रेजों के आने के बाद से इस तरह की पोशाक का चलन बढ़ चला जिसे कि अंग्रेज पहनते थे अपने देश में, लेकिन वे जब यहां आए तो वे वही पोशाक जानते थे। फिर एक शासक अपने गुलाम देश की पोशाक तो अपना भी नहीं सकता था, इसलिए अंग्रेज यहां की गर्मी में भी अपने ही अंग्रेजी कपड़ों में बने रहे, और चूंकि शासक समाज के स्तर के पैमाने तय करता है, इसलिए उसके नीचे के सारे गुलाम हिन्दुस्तानी वैसे ही कपड़ों का इस्तेमाल करने लगे, और हिन्दुस्तान जैसी भयानक गर्म जगह में भी लोग कोट और टाई पहनने लगे। 
नतीजा यह हुआ कि आज गली-मोहल्लों में खुलने वाली छोटी-छोटी अंग्रेजी स्कूलों के छोटे-छोटे बच्चों के गलों में भी दुमछल्ले की तरह एक टाई टांग दी जाती है, और मैनेजमेंट जैसी महंगी पढ़ाई करवाने वाले कॉलेज या इंस्टीट्यूट एक महंगा माहौल बनाने के लिए गर्म शहरों में भी छात्र-छात्राओं को कोट और टाई में बांधकर रखने लगे हैं। 
यह पूरा सिलसिला निजी प्रताडऩा का तो है ही, इसकी वजह से देश की बाकी जनता का भी एक बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। गर्म जगह या गर्म मौसम में सरकार, राजनीति, अदालत, या जनता के पैसों पर चलने वाले दूसरे पेशों में लोग जब गर्म कपड़े पहनकर बैठते हैं, तो जाहिर है कि वे कमरों को बेहद ठंडा बनाकर रखते हैं, ऐसे कपड़ों के बिना जितने ठंड की जरूरत न पड़ती हो, उतना ठंडा। नतीजा यह होता है कि जनता के पैसों की बिजली अंग्रेजों की छोड़ी हुई उतरन को ढोने के लिए खर्च हो रही है, और देश का एक बड़ा हिस्सा जब एक पंखे की बिजली भी नहीं पाता है, तब देश का यह चुनिंदा शासक वर्ग कोट और टाई के भीतर भी बदन को ठंडा रखने के लिए अंधाधुंध एयरकंडीशनिंग का इस्तेमाल करता है। 
पिछली यूपीए सरकार के वक्त केन्द्र में पर्यावरण मंत्री रहे जयराम रमेश ने जब दिल्ली में अपने मंत्रालय की इमारत बनवाना शुरू किया, तो उन्होंने पहली शर्त यह रखी कि यह इमारत साल भर में बिजली का शून्य उपयोग करेगी। अगर कुछ महीनों में कुछ बिजली लेगी, तो बाकी महीनों में उससे ज्यादा बिजली सौर ऊर्जा से बनाकर उसे इलेक्ट्रिक ग्रिड में वापिस लौटा देगी। उन्होंने इमारत डिजाइन करने वाले लोगों को उसे ठंडा रखने के लिए कई तरकीबें बताईं, और ठंड में गर्म रखने के लिए भी कई तकनीकों का इस्तेमाल करवाया। इसके साथ-साथ उन्होंने दफ्तर और मीटिंग-रूम्स का तापमान 27 डिग्री से नीचे न रखने के लिए इंतजाम करवा दिया। उनका कहना था कि लोग गर्मी में भी कोट और टाई पहनकर काम करते हैं, इससे ज्यादा अच्छा है कि वे कोट-टाई टांग दें, और साधारण कपड़ों में कम ठंड के बीच काम करें। 
कहने में यह बात छोटी लगती है कि अदालतों और सरकारी दफ्तरों, या जनता के पैसों पर मिलने वाली बिजली का इस्तेमाल करने वाले लोग अगर इस देश के वातावरण, यहां की गर्मी-ठंडी के मुताबिक कपड़े पहनें तो काफी बचत हो सकती है। सरकारी बचत से परे निजी दफ्तरों और घरों में भी ऐसी बचत हो सकती है क्योंकि बिजली की कमी तो देश भर में है, और बिजली को बचाने का मतलब पर्यावरण को बचाना भी है। 
ठीक इसी तरह का एक दूसरा मुद्दा यह भी दिखता है कि लोग अपने घरों के खुले आंगन, छतों पर, और दीवारों या बाल्कनी में ऐसे पौधे लगा देते हैं, ऐसे लॉन लगाते हैं जो कि खूब पानी पीते हैं। फिर इन्हें जिंदा रखने के लिए लोग बहुत सा पानी इंतजाम करके लाते हैं, और हरियाली की वजह से पर्यावरण-प्रेमी कहलाते हैं। बहुत से लोग तो ऐसी असंभव किस्म की घरेलू हरियाली की वजह से पर्यावरण के पुरस्कार भी पा लेते हैं। हकीकत यह है कि जिस देश-प्रदेश में जैसे पेड़ लगने चाहिए वह तो कुदरत ने ही बता दिया है। लेकिन लोग अपनी जगह से हटकर दूसरी तरह के पेड़-पौधे लगाकर लोग एक अनोखापन दिखाते हैं, और वाहवाही पाते हैं। लेकिन ऐसा करने के लिए वे कुदरत के खिलाफ जाकर कई तरह के खर्च करते हैं, और पानी खर्च करके कुदरत को ही बर्बाद भी करते हैं। ऐसा ही हाल उन लोगों का रहता है जो गर्म इलाकों में ऐसे कुत्ते पालते हैं जो कि ठंडे इलाकों की नस्लों के रहते हैं, और अपने बड़े-बड़े बालों की वजह से, ठंड की अपनी जरूरत की वजह से वे गर्मी में बदहाल रहते हैं, उन्हें रखने के लिए कूलर और एसी पर बिजली पर खर्च की जाती है, उन्हें नहलाने में ढेरों पानी खर्च होता है, और वे दिखावटी नस्ल के ऐसे प्राणी बनकर रह जाते हैं जो खुद भी तकलीफ पाते हैं, पर्यावरण पर भी बोझ रहते हैं, और वे महज सजावट के सामान की तरह, एक महंगे सामान की तरह साबित होते हैं। 
आज जब पर्यावरण के लिए लोगों में एक जागरूकता आ रही है, और जिम्मेदारी का एक एहसास हो रहा है, तो इन कुछ बातों को छोडऩा जरूरी है। भारत में मुगलों के वक्त तो गर्म पोशाकों की ऐसी नकल नहीं हुई, लेकिन अंग्रेजों के वक्त से तो जो नकल शुरू हुई, वह आज तक खत्म नहीं हुई। लोग इस बात को भी नहीं समझ रहे हैं कि एप्पल कंपनी खड़ी करने वाले स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक बनाने वाले मार्क जुकरबर्ग तक अनगिनत ऐसे खरबपति लोग हैं जिनकी सूट-बूट में शायद ही कोई तस्वीर दिखती हो। जो अपनी कंपनी के सबसे बड़े जलसे में भी टी-शर्ट और जींस में मंच पर रहते हों। इसलिए पोशाक की गुलामी-सोच से छुटकारा पाने की जरूरत है, और अपने इलाके के मौसम के मिजाज के मुताबिक कपड़े पहनकर धरती को बचाने की जरूरत भी है। 
कुछ महीने पहले जब छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बस्तर आए तब एक जिले के कलेक्टर को राज्य सरकार से इस बात के लिए नोटिस दिया गया कि उसने प्रधानमंत्री की अगवानी करते हुए परंपरागत पोशाक-नियम का पालन नहीं किया, और बंद गले का कोट नहीं पहना। हमारा ख्याल है कि भयानक गर्मी के बीच खुली धूप में बंद गले का कोट पहनने का नियम बनाना भी मानवाधिकार के खिलाफ है, और किसी को इस बात को चुनौती देनी चाहिए। इस अफसर को मिले नोटिस में यह भी जिक्र था कि उसने धूप का चश्मा लगा रखा था। हकीकत यह है कि तेज धूप में धूप का चश्मा लगाने की सिफारिश चिकित्सा विज्ञान करता है, और यह हिन्दुस्तान जैसा देश ही सोच सकता है कि धूप का चश्मा लगाना बेअदबी है। 
अंग्रेजों के छोड़े हुए इस टोकरे को ढोना बंद करना चाहिए, और हिन्दुस्तान को अपने आपमें एक देश की तरह जीने का आत्मविश्वास दुबारा हासिल करना चाहिए। जब भयानक गर्मी में लोग परेशान हों, तब किसी भी तरह की कोट या जाकिट क्यों इस्तेमाल की जाए? और खासकर जनता के पैसों पर? और खासकर इस देश में जहां एक बड़ी आबादी बिजली के बिना अंधेरे में, गर्मी में रहती है, और काम के औजार भी नहीं चला पाती है। अंग्रेजों के मैले के टोकरे ढोना बंद करना चाहिए। 

तीन तलाक खत्म करने का वक्त

संपादकीय
3 अप्रैल 2017


तीन बार कहकर तलाक दे देने की मुस्लिम समाज की प्रथा के खिलाफ मोदी सरकार एक सहमति और जनमत तैयार करने की कोशिश कर रही है, और जो लोग भाजपा या संघ परिवार से परे के हैं, और जो लोग मुस्लिमों के बचाव की कोशिश करते रहे हैं, वे आज दुविधा में हैं कि क्या करें? अगर तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की बात करें, तो मुस्लिम समाज के मर्द और मुल्ला नाराज हो सकते हैं, और यह बात उन लोगों को ठीक नहीं लगती जिन लोगों ने राजीव गांधी के वक्त संविधान संशोधन करके शाहबानो की हत्या की थी। शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट ने उसका हक दिलाया था, और मुस्लिम समाज की नाराजगी का हौव्वा दिखाकर कांग्रेस के दकियानूसी नेताओं ने विदेश में पढ़े हुए नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी से संविधान संशोधन करवा दिया था। लेकिन मुस्लिम समाज महज मर्दों से बना हुआ नहीं है, और उसकी आधी आबादी महिलाओं की भी है इसलिए भाजपा को आज उत्तरप्रदेश की चुनावी जीत के बाद यह जरूरी लग रहा है कि वह इस मुद्दे को उठाए क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव के पहले से उठाए गए इस मुद्दे के चलते हुए मुस्लिम महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया था।
दरअसल कुछ मुद्दों की साख और विश्वसनीयता इस बात को लेकर कम हो जाती है कि उन्हें कौन उठा रहे हैं। कश्मीर से वहां के पंडितों को आतंक और बलात्कार की धमकी देकर अलगाववादियों ने बेदखल कर दिया था, और आज दशकों बाद भी उनकी अपनी ही जमीन पर वापिसी नहीं हो पा रही है। लेकिन इस मुद्दे का हिन्दू-मुस्लिमकरण ऐसा हो गया था कि भारत के वामपंथियों ने, कांग्रेस पार्टी ने कभी इस नाजुक मुद्दे को छुआ नहीं, और यह मुद्दा मानो हिन्दू संगठनों और जनसंघ-भाजपा का मुद्दा होकर रह गया था। यह सिलसिला ठीक नहीं है। किसी एक धर्म से जुड़े हुए लोगों, या कि उस धर्म के महज मर्दों को खुश रखने के लिए उस धर्म की महिलाओं के हक कुचलते चलना ठीक नहीं है। भारत लगातार कई ऐसे फैसले लेते रहा है जो कि दुनिया के कई मुस्लिमों देशों ने भी नहीं लिए। सलमान रूश्दी की किताब पर रोक लगाने वाला भारत दुनिया का पहला देश था। इसी तरह भारत में आकर शरण लेने वाली लेखिका तसलीमा नसरीन को बंगाल में वामपंथियों की सरकार ने या ममता की सरकार ने घुसने की भी इजाजत नहीं दी क्योंकि उन्हें अपनी मुस्लिम आबादी की नाराजगी का ख्याल था।
लोकतंत्र में यह भी जरूरी रहता है कि किसी समाज को उसकी भावनाओं की आक्रामकता से बाहर लाकर लोकतंत्र और आज के वक्त की नजाकत को समझाया जाए। ऐसा परिवार के भीतर भी जरूरी होता है, और देश के भीतर भी जरूरी होता है। अल्पसंख्यक समुदाय को उसके धार्मिक अधिकारों पर कोई बात हमला न लगे, इसलिए नाजायज बातों को भी जारी रखा जाए, यह बिल्कुल ठीक नहीं है। इस देश में कानून की अदालत ने कई मंदिरों और दरगाहों में महिलाओं का दाखिला करवाया है, सतीप्रथा बंद करवाई है, बाल विवाह बंद करवाए हैं। तीन तलाक का मामला पहला धार्मिक मामला नहीं है जिसमें सरकार, संसद, या सुप्रीम कोर्ट की दखल हो रही है, अलग-अलग समय पर कहीं जानवरों की बलि को रोकने के लिए अदालतें सामने आई हैं, तो कहीं आर्य समाज जैसे संगठन ने धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास को रोकने का काम किया है। आज वक्त आ गया है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके हक दिए जाएं, उन्हें बराबरी का दर्जा दिया जाए। इसलिए तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत है और इसमें किसी धार्मिकता या साम्प्रदायिकता के तर्क आड़े नहीं आने देने चाहिए। 

अदालत या सरकार के फैसले और जमीनी हकीकत उल्टी...

संपादकीय
2 अप्रैल 2017


देशभर में बीते कल से हाईवे के किनारे शराब दुकानों और शराबखानों  पर सुप्रीम कोर्ट की रोक लागू हो गई है, लेकिन इससे बचने के लिए कई राज्य अपने प्रदेश के प्रादेशिक राज्यमार्गों से यह दर्जा हटा ले रहे हैं, ताकि वहां दारू बिकती रहे। राज्य सरकारों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा शराब के धंधे से आता है, और राजमार्गों के किनारे बनी बड़ी-बड़ी होटलों और शराबखानों पर इस अदालती फैसले की वजह से होटल-बार का कारोबार भी बुरी तरह प्रभावित होने जा रहा है। वैसे तो किसी भी जगह बार का लायसेंस आमतौर पर एक-दो बरस के लिए ही मिलता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि होटल-बार पर पूंजी निवेश करने वाले कारोबारियों का अगर कोई नुकसान होने जा रहा है, तो इसके लिए सरकार या अदालत जिम्मेदार नहीं हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बिना शराबखाने के महंगी होटलों का चलना मुश्किल है और छत्तीसगढ़ में ही इस रोक की वजह से दर्जनों बड़ी-बड़ी होटलें दीवालिया हो सकती हैं। देशभर में यह गिनती दसियों हजार कारोबार तक पहुंचेगी।
अदालत के बहुत से फैसले जाहिरतौर पर जनहित के होते हैं, लेकिन उनको लागू करने की रफ्तार, और उसके तरीके जमीनी हकीकत के साथ मेल नहीं खाते। अब जैसे तीन दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुराने इंजनों वाली गाडिय़ों की बिक्री पर एक अप्रैल से रोक की घोषणा कर दी। कारखानों से निकलकर डीलरों तक पहुंच चुकी गाडिय़ों को औने-पौने में दो दिन के भीतर बेचने की कोशिश की गई, और कंपनियों से लेकर डीलरों तक इससे होने वाले नफे-नुकसान के बारे में अदालत ने कोई लचीलापन नहीं दिखाया।  इससे कारोबार की अर्थव्यस्था में एक ऐसा भूचाल आया जिससे हो सकता है कि कई लोग ना उबर सकें। ऐसा ही एक दूसरा फैसला अखबारों के कर्मचारियों के वेतनमान को लेकर है। वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अखबार मालिकों की सारी याचिकाएं खारिज करते हुए उन्हें कड़ाई से लागू करने को कहा है। यहां पर दो बातें है, एक तो यह है कि समाचार पत्र उद्योग एक निजी कारोबार है, और इसके वेतन-भत्तों को इतनी बारीकी से तय करके वेतन आयोग ने इस कारोबार के अनगिनत प्रकाशनों के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी की है जिन्हें की यह कारोबार नहीं उठा सकता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इमानदारी और कड़ाई से लागू करने पर कर्मचारियों का जितना भला होगा, उससे कहीं अधिक नुकसान कर्मचारियों का होने जा रहा है। देशभर में अखबार मालिकों ने कई जगह संस्करण बंद कर दिए, और कई जगहों पर कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, नियमित कर्मचारियों को ठेका-कर्मी बना दिया, और उनकी नौकरी की सुरक्षा खत्म हो गई।
इसी तरह का एक और फैसला यह हुआ है कि महिला कर्मचारी को 6 महीने का प्रसुति अवकाश देने का कानून बना लिया गया है। संसद ने इसे लागू कर दिया है, और अभी से अर्थव्यवस्था के जानकार लोगों के बीच यह फिक्र खड़ी हो गई है कि क्या इससे लोग महिलाओं को काम पर रखना ही कम कर देंगे? महिलाओं को अधिक अधिकार देने की यह सोच तो अच्छी है, लेकिन यह बाजार की इस हकीकत से मेल नहीं खाती कि किसी संस्थान में महिला कर्मचारियों को रखने के पहले मैनेजमेंट ऐसी प्रसुती के बारे में सोचकर हिचक जाएगा। किसी भी देश में मजदूर के भले के लिए बनाए जा रहे कानून अगर दिखने में आकर्षक हों, और उन्हें लागू करना मुश्किल हो, या की उनकी वजह से लोग किसी खास किस्म के कर्मचारियों को रखने से ही कतराएं, तो उससे समाज का फायदे से अधिक नुकसान होने लगता है।
सुप्रीम कोर्ट के हाईवे के किनारे शराबखाने बंद करने के फैसले से दुर्घटनाओं में कितनी कमी आएगी, यह तो बाद की बात है, लेकिन इससे करीब 10 लाख रोजगार खत्म होने का अंदाज नीति आयोग के जानकार लोगों ने सामने रखा है। अदालत हो या केंद्र सरकार, उनके फैसले जमीनी हकीकत का अंदाज लगाकर ही लिए जाने चाहिए और लागू करने चाहिए।

नक्सल मोर्चे पर बहादुरी का ईनाम 40-50 रूपये !

संपादकीय
1 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ विधानसभा में गृहमंत्री रामसेवक पैकरा ने विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव के एक सवाल के जवाब में दर्जनों पन्नों की एक लिस्ट दी है कि नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में पुलिस और सुरक्षा बल जवानों को बारी के पहले पदोन्नति और ईनाम कैसे-कैसे दिए गए हैं। ऐसी पदोन्नति तो गिने-चुने जवानों की हुई है, लेकिन इस लिस्ट में सैकड़ों ऐसे जवान हैं जिन्हें नक्सल मोर्चे पर मुठभेड़ का पुरस्कार नगद दिया गया है, और यह रकम 40-50 रूपये भी है। चूंकि गृहमंत्री ने विधानसभा में यह जवाब दिया है, इसलिए हम सरकारी आंकड़ों पर शक भी नहीं कर रहे, और बीबीसी के संवाददाता ने ऐसे पुलिस वालों से बात भी की है जिन्हें नक्सल मुठभेड़ के बाद 40-50 रूपए पुरस्कार मिला, और वे इसे अपना अपमान मान रहे हैं।
लोगों को याद होगा कि बहुत से प्रदेशों में किसानों को बाढ़ मुआवजा, फसल बर्बादी का किसी और किस्म का मुआवजा, इसी तरह 10-20 रूपये भी मिला है। सरकार में बैठे लोग कभी-कभी कुछ और तरह की राहत राशि भी 10-20 रूपये के चेक बनाकर बांटते हैं। अब छत्तीसगढ़ के इन आंकड़ों के संदर्भ में हम यह देखकर हैरान हैं कि नक्सल प्रभावित जिलों में तैनात पुलिस का अगर इस तरह से अपमान किया जा सकता है, तो फिर बाकी पुलिस के साथ तो और भी बुरा सुलूक हो सकता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ सरकार ने पंजाब के नामी-गिरामी पुलिस-प्रमुख रह चुके के.पी.एस. गिल को राज्य का सुरक्षा सलाहकार बनाया था, और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में यह बताया था कि किस तरह बस्तर में तैनात बड़े-बड़े अफसरों को लाखों रूपए की रिश्वत देकर छोटे पुलिस वाले अपना तबादला नक्सल इलाकों से बाहर करवा लेते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ पुलिस के खिलाफ और भी बहुत कुछ लिखा था, लेकिन बाकी बातें फिर कभी।
राज्य सरकार को तुरंत अपनी दी हुई इस जानकारी के पीछे की वजहों को देखना चाहिए, क्योंकि आज बस्तर या किसी जंगल वाले इलाके में तैनात पुलिस को 50 रूपए में एक महीने मच्छर भगाने की दवा भी नहीं मिलती। ऐसे में अपने कर्मचारियों का मनोबल इस तरह गिराना ठीक नहीं है, और ये आंकड़े अपमानजनक हैं। कुछ जानकार अफसरों का कहना है कि नगद पुरस्कार की यह परंपरा अंग्रेजों के समय से चली आ रही है, और हो सकता है कि यह ईनाम नक्सल इलाकों में बिना नक्सल मुठभेड़, अच्छे कामकाज के लिए दिए गए हों। लेकिन इस तर्क पर भी हमारा मानना है कि एक पुलिस कर्मचारी को 40 रूपये का पुरस्कार देने के लिए जितने तरह के कागज तैयार किए गए होंगे, चेक बनाया गया होगा, या खाते में रकम डाली गई होगी, उसका सरकारी खर्च ही इससे अधिक हो गया होगा। और फिर आज के जमाने में जब 40 रूपए में एक वक्त का नाश्ता ही किया जा सकता है, तब ऐसा पुरस्कार चाहे अंग्रेजों का शुरू किया गया हो, उसे बंद कर देना ठीक है।
लगे हाथों हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जब पुलिस के सम्मान की बात होती है, तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि पुलिस का अपमान रोज कहां-कहां होता है। अफसरों के बच्चे घुमाने से लेकर, अफसरों के कुत्तों को नहलाने तक, पुलिस को कई तरह के अपमानजनक काम में लगा दिया जाता है। राज्य की जनता के पैसों के बेहतर इस्तेमाल के लिए, और पुलिस के सम्मान के लिए यह जरूरी है कि पुलिस का गैर-पुलिसिया इस्तेमाल तुरंत खत्म किया जाए, मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर पुलिस की तैनाती केवल सुरक्षा वजहों से की जाए, और उनका केवल सुरक्षा का काम रहे। शान-शौकत के लिए पुलिस का इस्तेमाल बहुत ही अपमानजनक भी है, और जनता के पैसों की बर्बादी भी है। यह सिलसिला तुरंत थमना चाहिए, और सरकार पुरस्कार की रकम के बारे में बारीकी से सोचे, और या तो रकम बढ़ाए, या ऐसा पुरस्कार खत्म करे।