भारत में केन्द्र और राज्य स्तर पर नई संवैधानिक जांच एजेंसी बनें

संपादकीय
10 मई 2017


अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वहां की संघीय जांच एजेंसी, एफबीआई के डायरेक्टर को बर्खास्त कर दिया है। इसे लेकर अमरीका में भारी बहस शुरू हो गई है क्योंकि इसी डायरेक्टर की निगरानी में अमरीकी चुनाव के दौरान ट्रंप के सहयोगियों और रूस की सरकार के बीच के ऐसे तालमेल की जांच चल रही है जो कि राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने वाली कही जा रही है। वहां पर यह संवैधानिक मुद्दा उठ खड़ा हुआ है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परिवार, उनकी कंपनियां, उनके सहयोगी जिस तरह की जांच में घिरे हुए हैं, उस जांच के बीच जांच के सबसे बड़े अफसर को इस तरह से बर्खास्त करना राष्ट्रपति के अधिकारों, और राष्ट्रपति पर चल रही जांच के बीच सीधे-सीधे टकराव का मामला है। अमरीकी मीडिया कल से इस मुद्दे पर उबला हुआ है, और यह मामला अमरीकी से परे भी हितों के टकराव का ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसे दुनिया के बाकी हिस्सों में भी सोचा-विचारा जा सकता है।
भारत में राजनीतिक ताकतों से जुड़े मामलों की जांच उन्हीं नेताओं के मातहत काम करने वाली एजेंसियां करती हैं जिनके अफसरों का भविष्य इन्हीं नेताओं के हाथ रहता है। नतीजा यह होता है कि सत्ता के काबू से परे की कोई जांच एजेंसी रहती नहीं है, और इसमें काम कर रहे लोग सीधे-सीधे सरकार के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और अपने आगे के सरकारी करियर के लिए सरकार चला रहे नेताओं का मुंह तकते हैं। ऐसे में देश में लोकपाल या लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्थाओं का मुद्दा उठता है कि सरकार से परे की ऐसी जांच एजेंसियों को कमजोर बनाकर क्यों रखा जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की सारी दलीलों को खारिज करते हुए यह हुक्म दिया है कि लोकपाल के मौजूदा कानून के तहत ही तुरंत लोकपाल की नियुक्ति की जाए। मोदी सरकार के तीन बरस पूरे होने को आ रहे हैं, और अब तक लोकपाल न बनाने के लिए लोकपाल-कानून में ही फेरबदल की चर्चा जारी है। इसी देर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अभी साफ-साफ आदेश दिया है।
केन्द्र से परे राज्यों में भी भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां सरकार के मातहत काम करती हैं, और इसे लेकर उन पर गंभीर आरोप भी लगते हैं। हमारा ख्याल है कि राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता और शुचिता के लिए यह जरूरी है कि जिस तरह लोकसेवा आयोग के संवैधानिक पद पर नियुक्ति के बाद लोग किसी भी तरह का सरकारी पद नहीं ले सकते, उसी तरह की एक जांच एजेंसी होनी चाहिए, जिसमें जाने के बाद लोग सरकार में न लौट सकें, न ही कोई सरकारी मनोनयन पा सकें। भारत के संघीय ढांचे में यह भी जरूरी है कि राज्यों के भीतर भी ऐसी नियुक्तियां राज्य के अफसरों से परे, देश के दूसरे हिस्सों से आए हुए जांच अफसरों में से हो, ताकि वे स्थानीय शासन के प्रभाव और दबाव से मुक्त रहें। यह बात सत्ता पर बैठे लोगों को नहीं सुहाएगी, लेकिन अगर भारत में जांच और मुकदमों को सत्ता के दबाव से परे रखना है, तो देश में एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था बनानी जरूरी है जैसी कि चुनाव आयोग, या लोकसेवा आयोग की है, जहां पर पहुंचने के बाद लोगों का सरकार से उपकार लेने-देने का सिलसिला खत्म हो जाए। फिर दूसरी बात यह कि ऐसी तमाम नियुक्तियां अपने राज्य से परे ही होनी चाहिए, और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे अफसरों का एक पूल बनाया जा सकता है, और राज्यों को अफसरों का बंटवारा किया जा सकता है।
आज भारत में जांच और मुकदमे पर किसी को कोई भरोसा नहीं रहता है, जो लोग सत्ता पर बैठे हैं, वे किसी भी किस्म की कार्रवाई से बहुत दूर तक बचते चलते हैं, और उनको सजा मिलने की गुंजाइश लगातार कमजोर की जाती है। भारत के संविधान विशेषज्ञों को एक ऐसी नई व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जो कि केन्द्र और राज्य सरकार के असर से परे की हो, और जिसमें देश भर के अधिकारियों और कर्मचारियों को लाकर सत्ता के भ्रष्टाचार और सत्ता के जुर्म की जांच में ईमानदारी की संभावना पैदा की जा सके। यह एक बिल्कुल नई और मौलिक सोच होगी, लेकिन यह बहुत मुश्किल बात भी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट अपना घर सुधारने की पहल करे

संपादकीय
09 मई 2017


कोलकाता हाईकोर्ट के एक दलित जज का सुप्रीम कोर्ट के साथ महीनों से चलते आ रहा टकराव आज एक अभूतपूर्व नौबत लेकर आया, और सुप्रीम कोर्ट ने इस जज को अपनी अवमानना का दोषी ठहराते हुए 6 महीने की कैद सुनाई है। हाईकोर्ट जज ने लगातार सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह तोहमत लगाना जारी रखा था कि उनके साथ दलित होने की वजह से प्रताडऩा की जा रही है। उन्होंने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा टकराव खड़ा किया था और घर बैठे उन्होंने अपने को अदालत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट जजों को सजा सुना दी थी, और पुलिस को हुक्म दिया था कि इन जजों को जेल भेजा जाए।
दरअसल, भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बुनियादी खामी है कि सुप्रीम कोर्ट के हाथ हाईकोर्ट का प्रशासन नहीं रहता, और हाईकोर्ट के अदालती फैसलों पर तो सुप्रीम कोर्ट फैसला दे सकता है, लेकिन प्रशासनिक मामलों में उसका हाईकोर्ट पर काबू नहीं रहता। इसी तरह, खुद सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में प्रशासनिक रूप से बेकाबू सा रहता है, और सरकार के पास अदालत की मनमानी पर कार्रवाई करने के लिए कोई अधिकार नहीं रहते। किसी जज को हटाना हो तो उसके लिए संसद में बड़ी संख्या में सांसदों की तरफ से प्रस्ताव लाना पड़ता है, और उसके बाद भी महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। यह काम इतना मुश्किल रहता है कि देश के इतिहास में ऐसे गिने-चुने ही मौके आए हैं, जबकि जजों के बारे में कई बार ऐसी चर्चा आती है कि उनमें बहुत से जज भ्रष्ट रहते हैं, जिनपर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है।
संसद, सरकार, और अदालत, भारतीय लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों का  एक-दूसरे पर नियंत्रण बनाया तो गया है, लेकिन इन तीनों के बीच अदालतों का अधिकार क्षेत्र मनमानी का खतरा लिए हुए दिखता है। हमारे पास इसका कोई आसान इलाज नहीं है क्योंकि ऐसी किसी भी दिक्कत के चलते हुए हड़बड़ी में जब कोई इलाज ढूंढा जाता है तो उसका साईड रिएक्शन अधिक खतरनाक हो सकता है। लेकिन यह बात तय है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बीच एक बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था कायम करना जरूरी है क्योंकि जजों के भ्रष्ट होने पर भी उनके ऊपर कोई कार्रवाई होते हम नहीं देखते हैं। लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व कानून मंत्री शांति भूषण और उनके चर्चित वकील बेटे प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट जजों पर यह खुला आरोप लगाया था कि उनमें से आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट हैं, उनके ऊपर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मुकदमा भी शुरू किया था, लेकिन साहसी पिता-पुत्र ने कोई माफी मांगने से इंकार कर दिया था, और भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं करवाई गई।
हमारा यह मानना है कि अदालतों को अपनी अवमानना से अधिक फिक्र इस बात की करनी चाहिए कि उन पर लगने वाले आरोपों की जांच हो रही है या नहीं। जजों के हाथ में लोगों की जिंदगी के ऐसे मायने रखने वाले पहलू रहते हैं कि उन्हें संदेह से परे जीना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को खुद ही जजों पर लगने वाले भ्रष्टाचार या दूसरे किस्म के आरोपों की जांच के लिए अदालत से बाहर की एक प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए। अदालत के भीतर कोई जांच निष्पक्ष और ईमानदार नहीं हो सकती।

केजरीवाल का राजनीतिक अंदाज आज उन पर भारी

संपादकीय
08 मई 2017


दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार से हटाए गए एक मंत्री ने अगले ही दिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर तगड़ा हमला किया और कहा कि उसने मुख्यमंत्री को 2 करोड़ रुपये नगद वसूली करते अपनी आंखों से देखा है। इसके बाद आज इस मंत्री ने भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो जाकर केजरीवाल सरकार के भ्रष्टाचार के कुछ मामले दिए। इसे लेकर कई तरह की चर्चा चल रही है कि जब महीनों पहले इस मंत्री ने अपने मुख्यमंत्री को ऐसी गैरकानूनी उगाही करते देखा तो उसी वक्त इसकी शिकायत क्यों नहीं की? और अब शिकायत की तब सूझी जब उसे बर्खाश्त कर दिया गया है। इस मौके पर सब लोग अपने-अपने हाथ धो रहे हैं, और भाजपा के विरोधियों ने यह ढूंढ कर निकाला है कि इस मंत्री,कपिल मिश्रा, की मां भाजपा की एक नेता थीं, और वे भाजपा से चुनाव लड़कर जीती भी थीं। दूसरी तरफ, केजरीवाल से अब अलग हो चुके बहुत से लोग यह याद दिला रहे हैं कि केजरीवाल की तो पूरी की पूरी राजनीति ही ऐसे आरोपों को लेकर चलती आई है और वे बिना किसी बुनियाद के लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने का काम करते रहे हैं। यह बात सही भी है कि केजरीवाल का अंदाज पत्थर उछालकर भाग लेने जैसा रहा है, और वे इसी आदत के चलते अदालतों में मानहानि के मुकदमे भी झेल रहे हैं।
सार्वजनिक जीवन में आरोपों को लेकर दो बातें साफ रहनी चाहिए, पहली तो यह कि जब तक सबूत न हो तब तक सारे आरोप संदेह की तरह ही सामने रखने चाहिए, और फिर अगर किसी ने संदेह न जताकर सीधे आरोप लगाए, तो फिर उस आरोप को साबित करने की जिम्मेदारी भी उसी पर आनी चाहिए। अरूण जेटली पर लगाए गए ऐसे ही आरोपों को लेकर केजरीवाल अदालती कटघरे में है, और साबित कुछ नहीं कर पा रहे हैं। लोकतंत्र में किसी की इज्जत को उछालना एक बड़ा आसान काम होता है, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसा करने वाले नेता, या करने वाला मीडिया कानून के प्रति जवाबदेह रहते हैं, और उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए तैयार भी रहना चाहिए। केजरीवाल सरकार के अनगिनत मंत्री और विधायक एक-एक करके कई तरह के मामलों में फंस गए हैं, और ये मामले आर्थिक भ्रष्टाचार से परे के भी हैं। केजरीवाल की दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने साथियों सहित राजनीति में ईमानदारी के पैमाने इतने ऊंचे कर दिए थे कि अब उनपर खरा उतर पाना उनके खुद के लिए भी मुश्किल हो रहा है।
हम किसी भी जांच को महज इसलिए टालने के खिलाफ है कि उसे लेकर सरकार पर राजनीति करने और विरोधियों को फंसाने के आरोप लग सकते हैं। ऐसे में तो देश की सारी पार्टियों, और सारे नेता मिलकर संगठित भ्रष्टाचार की गिरोहबंदी करने लगेंगे कि कोई किसी को फंसने न दे। लोकतंत्र में जो लोग ऊंची कुर्सियों पर बैठे हैं, उन्हें सबसे पहले उच्च स्तरीय जांच के लिए तैयार भी होना चाहिए। केजरीवाल की पूरी राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों को लगाने से शुरू हुई थी, और उस समय से उनकी कही हुई बातों को निकालकर उन्हें आज उस पर अमल करने को कहना चाहिए। 

पाकिस्तानी मरीजों को इलाज के लिए हिंदुस्तानी वीजा नहीं!

संपादकीय
07 मई 2017


पाकिस्तान ने भारत सरकार से इस बात को लेकर विरोध दर्ज कराया है कि वहां से हिन्दुस्तान आने वाले मरीजों को भारत में इलाज के लिए वीजा देना बंद कर दिया है। भारत की आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के चलते आस-पड़ोस के सभी देशों से बड़ी संख्या में मरीज आते हैं, और छत्तीसगढ़ की राजधानी में भी एक समाजसेवी अस्पताल में कई देशों के मरीजों का, बच्चों का ऑपरेशन हो रहा है। लेकिन पाकिस्तान के इस विरोध के साथ इस बात को जोड़कर देखना होगा कि सरहद पर किस तरह का तनाव चल रहा है, और इस तनाव की वजह से खेल, सिनेमा, टीवी, साहित्य समेत इलाज जैसी गैरफौजी बातों पर भी असर पड़ रहा है।
दोनों देशों में फौजी लोगों, और फौज को लेकर युद्धोन्माद से भरे हुए लोग सरहद के तनाव को बढ़ाते चलने में लगे रहते हैं। दूसरी तरफ अनगिनत लोग ऐसे हैं जिनके एक-दूसरे देश में रिश्तेदार हैं, तीर्थ हैं, और दिलचस्पी है, लेकिन इन लोगों का आना-जाना इस पर टिका रहता है कि कब दोनों देशों के बीच तनाव कितना है। पाकिस्तान में जाहिर तौर पर इलाज की वैसी सहूलियतें नहीं है जैसी कि हिन्दुस्तान में हैं, और इसीलिए वहां से लोग गंभीर बीमारियों के इलाज और ऑपरेशन के लिए भारत आते हैं। यहां पर हम भारत सरकार को यह सुझाव देना चाहेंगे कि सरहद पर चाहे कितना ही तनाव क्यों न हो, मरीजों पर किसी तरह की रोक नहीं लगानी चाहिए। जो लोग इलाज के लिए दूसरे महंगे देशों में नहीं जा पाते, वे ही लोग भारत आते हैं। और एक बड़ा देश, एक विकसित देश होने के नाते भारत की यह जिम्मेदारी है कि इस मानवीय काम में वह सरहद के किसी तनाव को आड़े न आने दे। अगर जरूरत हो तो वहां के फौजी अफसरों को, वहां के नेताओं को इलाज के लिए आने से रोक दे, लेकिन वहां के आम लोगों को तो बिल्कुल नहीं रोकना चाहिए, और वहां के बड़े लोग, खास लोग, ऐसे हैं जो कि अपनी काली या सफेद कमाई से दुनिया के महंगे देशों में भी जा सकते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का एक बहुत बुरा नुकसान दोनों देशों के सबसे गरीब लोगों को होता है जिनके मुंह का कौर छीनकर फौजों पर खर्च किया जाता है, और सरकारों के कामकाज का एक बड़ा हिस्सा इसी सरहदी तनाव पर खर्च हो जाता है। अगर ऐसा न हो तो दोनों देशों में कोई कुपोषण न रहे, कोई गरीब न रहे, और कोई बिना इलाज के न रहे। दिक्कत यह है कि सरहद के तनाव के फैसले सरहद से दूर राजधानियों में बैठकर लिए जाते हैं, और ऐसे लोगों द्वारा लिए जाते हैं जो कुपोषण या भूख को जानते भी नहीं हैं। अगर इन दोनों देशों में रिश्ते ठीक रहें, तो आपसी कारोबार भी इतना बढ़ सकता है कि किसी तीसरे मुल्क तक कमाई जाने के बजाय आपस में ही बहुत सा फायदा हो सकता है। नेता और फौजी अफसर, हथियारों के सौदागर, और उनके दलाल मीडिया के कुछ लोग, ये तमाम लोग मिलकर देशों के बीच तनाव को अपना पेशा बना लेते हैं, और इसके बीच दोनों तरफ के गरीब पिसते हैं। सरकारों से परे जनता के बीच से यह जागरूकता उठनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच तनाव से किसी का फायदा नहीं हो रहा है, और दोनों देश दीवालिया हो रहे हैं।

सरकारी सेवानियम और अभिव्यक्ति की आजादी

संपादकीय
06 मई 2017


छत्तीसगढ़ में लोकसेवा आयोग के खिलाफ एक बड़ा मुकदमा जीतकर आने वाली एक नौजवान अधिकारी वर्षा डोंगरे को आज सुबह राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया, उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर राज्य सरकार की नक्सल और आदिवासी मामलों में रीति-नीति के खिलाफ बड़े आक्रामक अंदाज में लिखा था, और सरकार के दूसरे आलोचकों ने इसे हाथों-हाथ उठाया था, और चारों तरफ फैला दिया था। इस पोस्ट में यह भी लिखा हुआ था कि उन्होंने एक जेल अधिकारी की हैसियत से काम करते हुए जेल में ऐसी महिलाओं से बातचीत की है जिनके साथ सुरक्षा बलों ने बस्तर में सेक्स-बदसलूकी की थी। यह आरोप राज्य शासन के सुरक्षा कर्मचारियों और केन्द्रीय सुरक्षा कर्मचारियों पर लंबे समय से लगते आ रहा है, और बस्तर के आदिवासियों महिलाओं ने आरोपों को लेकर हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक दौड़ लगाई है। अब राज्य शासन की एक जेल-अधिकारी के ऐसे कथित पोस्ट को लेकर सरकार की काफी फजीहत हो रही है, और यह हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमों में अब मानवाधिकारवादियों के वकील वर्षा डोंगरे को गवाह बनाकर बुलाएं।
इस निलंबन के बाद सरकार आलोचना के कटघरे में आएगी कि उसने सच कहने वाली एक अफसर को निलंबित किया है। लेकिन हमारा सोचना इस बारे में थोड़ा सा अलग है। सरकार का काम कुछ नियमों से बंधा रहता है, और जो लोग सरकार से वेतन और बाकी सुविधाएं, नौकरी की सुरक्षा पाते हैं, उन्हें यह सब कुछ जिम्मेदारियों और जवाबदेही के साथ ही मिलते हैं। शासन के सेवानियमों में यह भी है कि राज्य शासन के कामकाज या उसकी रीति-नीति की आलोचना न की जाए। और ये नियम सोशल मीडिया के पैदा होने के बाद के नहीं है, ये पहले से चले आ रहे हैं, यह एक अलग बात है कि सोशल मीडिया पर अपनी नई ताजी सक्रियता के चलते अब बहुतसे अधिकारी बहुत से मुद्दों पर खुलकर ऐसी बातें लिखने लगे हैं जो कि उनके सेवानियमों के खिलाफ जाती हैं। दूसरी तरफ देश में कई ऐसे चर्चित अफसर भी हुए हैं जिन्होंने सरकार से असहमति होने पर कामकाज छोड़कर सामाजिक आंदोलनकारी के रूप में काम किया है, या कि केजरीवाल की तरह राजनीति में आए हैं।
हम अगर वर्षा डोंगरे के ही मामले की बात करें, और इसे सच मानें कि उन्होंने ऐसी पोस्ट लिखी थी, और यह भी सच मानें कि उन्हें जेल में या कहीं और महिलाओं ने अपने सेक्स-शोषण की, जुल्म की, बातें बताई थीं। तो ऐसे में भी हमारा ख्याल है कि उनके पास सरकार के भीतर, औपचारिक रूप से भी इन बातों को रखने का एक विकल्प मौजूद था, जो कि सरकार के सेवा-नियमों के हिसाब से ठीक भी रहता। लेकिन उन्होंने अपनी ऐसी जानकारी को सरकार के सामने रखने के बजाय सोशल मीडिया पर जब रखा है, तो सरकार भी उस पर कार्रवाई करने की आजादी रखती है, हक रखती है। सरकार और वर्षा डोंगरे के बीच की यह लड़ाई सच की लड़ाई नहीं है, सच तो दोनों ही हो सकते हैं, यह लड़ाई, या कि यह कार्रवाई सरकारी सेवानियमों की है, जिसके तहत राज्य सरकार इस बात के लिए भी जिम्मेदार है कि उसके अधिकारियों-कर्मचारियों का आचरण कैसा रहे।
दरअसल वर्षा डोंगरे ने राज्य शासन और पीएससी के खिलाफ मुकदमा लड़ते हुए, और अदालत में बिना वकील अपना पक्ष खुद रखते हुए जो एक लंबी लड़ाई जीती है, उसकी वजह से भी यह हो सकता है कि उनके मन में बेइंसाफी के खिलाफ, हिंसा के खिलाफ एक नाराजगी भरी हुई हो। आज वे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कुछ लोगों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील को लेकर एक बार फिर अदालत में खड़ी हैं, और उनके दिमाग में सरकारी व्यवस्था के खिलाफ एक नाराजगी भी भरी हुई है। लेकिन हर ओहदे और हर भूमिका की अपनी सीमाएं होती हैं, जिन लोगों को ऐसी सीमाओं के बाहर जाकर काम करना हो, उनके लिए रास्ते खुले रहते हैं। सरकार में काम करते हुए सरकार की किसी गलती, या गलत काम की जानकारी होने पर उसे सरकार के भीतर ही ऊपर तक पहुंचाने का जो रास्ता है, हमारा ख्याल है वही रास्ता वर्षा डोंगरे के लिए ठीक होता, न कि उसे सेवानियमों के खिलाफ जाकर सार्वजनिक रूप से उठाने के। सरकारी सेवानियम नौकरी में रहने तक अभिव्यक्ति की आजादी पर हावी रहते हैं, यह बात अच्छी हो या बुरी हो, जायज हो या नाजायज हो, जब तक ऐसे सेवानियम हैं, तब तक या तो लोग सरकार के खिलाफ सरकार के बाहर न बोलें, या कि जैसा कि इस मामले में हो सकता है, इन नियमों को चुनौती देकर अदालत की एक नई व्याख्या मांगें।

शहरी सफाई में इस प्रदेश में अच्छी और बुरी, दोनों मिसालें

संपादकीय
05 मई 2017


देश भर के शहरों की स्वच्छता के सर्वे में छत्तीसगढ़ के पास खुश होने को अंबिकापुर, राजनांदगांव, कोरबा और दुर्ग, ये चार म्युनिसिपल हो सकते हैं, लेकिन राजधानी रायपुर की बदहाली जारी है और देश के साफ शहरों में इसका नंबर सवा सौ शहरों के बाद लगता है, और इस शहर के अधिकतर हिस्से को देखने वालों को इस बात की भी हैरानी होती है कि इसका नंबर 129वां भी कैसे आ गया? शहर की गंदगी का हाल यह है कि मानो सफाई का काम म्युनिसिपल की बुनियादी जिम्मेदारी है ही नहीं, और राजधानी का म्युनिसिपल सैकड़ों करोड़ के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने वाली एक कंस्ट्रक्शन कंपनी भर है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर और बिलासपुर जैसे शहरों को यहीं के एक किनारे पर बसे हुए अंबिकापुर से सबक लेने की जरूरत है जहां पर एक उत्साही कलेक्टर ने म्युनिसिपल को साथ जोड़कर न सिर्फ शहर को साफ कर दिखाया, बल्कि कचरे की अलग-अलग किस्मों को अलग-अलग करने का एक बड़ा काम भी किया है, और इससे बाकी प्रदेश को जो सीखना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। एक बरस पहले मुख्यमंत्री ग्राम सुराज के दौरान जब सरगुजा पहुंचे थे, तो वहां अंबिकापुर में उन्होंने बदली हुई तस्वीर देखी थी। महिला जनसंगठनों को साथ लेकर प्रशासन और म्युनिसिपल ने पूरे शहर से कचरा उठाने से लेकर उस कचरे के निपटारे तक का काम बड़े अच्छे तरीके से किया था, और राज्य शासन के तमाम बड़े लोगों ने उसे देखा भी था। लेकिन वाहवाही के बाद वहां से बाकी किसी शहर ने कुछ नहीं सीखा। खासकर राजधानी के म्युनिसिपल का हाल सबसे ही निराशाजनक है, जहां पर राज्य बनने के बाद से अब तक निगम सीमा में ही हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं, लेकिन म्युनिसिपल अपनी पहली बुनियादी जिम्मेदारी, सफाई को ही नहीं कर पाया।
दरअसल शहरों को साफ रखना एक ऐसा काम है जिसे जनता को साथ जोड़े बिना सिर्फ अफसर या निर्वाचित स्थानीय प्रतिनिधि अपने दम पर कभी नहीं कर सकते। और आज रायपुर में हाल यह देखने मिलता है कि सत्ता और जनता, ये दो बिल्कुल अलग-अलग तबके हैं, और इन दोनों का आपस में कोई संबंध, कोई लेन-देन, सफाई के मामले में नहीं रह गया। शहर गंदा है, यह तो शहर का हर हिस्सा चीख-चीखकर बता ही देता है, लेकिन एक दूसरा बड़ा खतरा बारूद के ढेर की तरह खड़ा हो रहा है कि शहर के ठोस कचरे का अलग-अलग निपटारा नहीं किया जा रहा, और जो कचरा सड़कर धरती से मिल सकता है, उसका बायो-इस्तेमाल नहीं हो रहा, और बाकी तरह के कचरे को अलग-अलग नहीं किया जा रहा। शहर में जब तक लोगों के बीच ऐसी सभ्यता फैलाई नहीं जाएगी, तब तक म्युनिसिपल चाहे जितना खर्च कर ले, न तो कचरे का कोई इस्तेमाल होगा, न कचरा कम होगा, न सफाई बढ़ेगी। दूसरी तरफ रायपुर सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में भी बार-बार आता है, और उसकी एक वजह शहरी कचरा भी है जिस पर काबू किए बिना शहर का पर्यावरण नहीं सुधरेगा। कचरे के अलावा भी म्युनिसिपल की कई तरह की जिम्मेदारियां हैं, लेकिन वे भी तिरस्कृत पड़ी रहती हैं, और नेता-अफसर जलसों में मगन रहते हैं।
आज दिक्कत यह है कि स्थानीय निर्वाचित संस्थाएं हों, या कि विकास प्राधिकरण जैसी बनाई गई और मनोनीत लोगों की संस्था हो, इन सबको बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाकर घोषित और अघोषित कमाई से बड़ी प्राथमिकता और कुछ नहीं दिखती है।  यह सिलसिला बदलने के लिए ऐसे अफसरों की जरूरत है जिन्हें अपने ओहदों पर गुरूर न हों, और जो एक चुनौती मानकर शहर को सुधार सकें। हम एक बार फिर अंबिकापुर की मिसाल देना चाहेंगे जहां पर सीमित साधनों में भी अफसरों ने यह कर दिखाया है, और दूसरी तरफ रायपुर-बिलासपुर जैसी जगहों पर पिछले बहुत बरसों से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में शहरों को फंसाकर रख दिया गया है, और साफ-सफाई का कोई ठिकाना नहीं है। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को म्युनिसिपलों में अफसरों की तैनाती के वक्त यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका मिजाज कैसा है, क्या वे गली-गली घूमकर काम करवाने में भरोसा रखते हैं, या फिर वे ओहदे को शान समझकर बैठे रहते हैं। मेहनत में ईमानदार, और कल्पनाशील अफसरों की कमी नहीं है, और राज्य शासन को छांटकर ऐसे अफसरों को म्युनिसिपलों में रखना होगा, क्योंकि शहरों की सफाई और उन्हें सुधारने, उनका रख-रखाव करने का जिम्मा एक अलग तरह का है। स्थानीय शासन विभाग से परे, पर्यावरण विभाग को भी इसमें दखल देनी चाहिए, क्योंकि शहरों का पर्यावरण म्युनिसिपल के काम से सीधा प्रभावित होता है। 

लोक सुराज की कड़ी मेहनत के साथ-साथ कुछ और भी जरूरी

संपादकीय
04 मई 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अपनी पूरी सरकार के साथ गर्मी के सबसे अधिक गर्म दिनों में सुबह से शाम तक लगातार लोक सुराज का दौरा कर रहे हैं, और इतना विशाल, इतना विस्तृत जनसंपर्क आसान बात नहीं रहती। उन्होंने इस अभियान की शुरुआत में ही यह साफ किया था कि वे लोगों की नाराजगी या संतोष को भी देख लेना चाहते हैं जो कि लगातार चल रही सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी के नाम से कई प्रदेशों में देखने मिलती है। जनता की नाराजगी और शिकायतों का ऐसा सामना कुछ तकलीफदेह तो रहता है क्योंकि सरकार के कामकाज में कमियां और खामियां दोनों ही आम बात रहती हैं, लेकिन लोगों के मुंह से उनकी दिक्कत-परेशानी, उनकी शिकायत, और उनकी मांग-उम्मीदों को सुनना, और प्रदेश-जिले स्तर के अफसरों के साथ उन्हें मौके पर ही निपटाना प्रतीकात्मक ही सही लेकिन एक बड़ा काम है। उनके मंत्री भी जगह-जगह दौरे कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का दौरा सबसे ही कड़ा है, सबसे ही मुश्किल है, और इसकी वजह से पूरे प्रदेश के अफसरों को अपने-अपने इलाकों में, अपने-अपने विभागों के कामकाज में चौकन्ना रहना पड़ रहा है।
वैसे तो आदर्श स्थिति यह होती कि जनदर्शन या ऐसे जनसंपर्क की नौबत ही नहीं आती, लेकिन भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में कभी भी ऐसी आदर्श स्थिति नहीं आ सकती जिसमें कि सुधार की गुंजाइश न हो, या कि गड़बडिय़ों को पकड़ा न जा सके। लोक सुराज का यह अभियान मुख्यमंत्री को प्रदेश के जिला स्तर के अफसरों के कामकाज को बेहतर समझने का एक मौका भी दे रहा है, और सरकारी अमला यह उम्मीद भी कर रहा है कि इस अभियान के पूरे होने के बाद बहुत से तबादले होंगे, और कई महत्वपूर्ण कुर्सियों पर जाने वाले लोग चुनाव तक वहां रहेंगे। यह भी उम्मीद की जा सकती है कि लोक सुराज दौरा शुरू होने के पहले से शिविर लगाकर लोगों से जो शिकायतें और मांग इक_ी की गई थीं, उनमें से संभव बातों को चुनाव तक पूरा करने का मौका सरकार को मिल जाएगा। अब छत्तीसगढ़ सरकार चुनाव-मोड में आ चुकी है, और केवल ऐसे ही कामों को उठाया जाएगा जिन्हें चुनाव आचार संहिता के पहले पूरा करके, या एक शक्ल देकर जनता के सामने रखा जा सकेगा।
लेकिन हम आज एक दूसरी बात करने के लिए इस चर्चा को छेड़ रहे हैं, न कि महज इस अभियान के बारे में लिखने को। यह अभियान तो अगले एक पखवाड़े में पूरा हो जाएगा, लेकिन सरकार के कामकाज को लेकर एक कमी शायद उसके बाद भी बनी रहेगी, जिसके लिए राज्य सरकार प्रदेश स्तर पर कभी-कभी कोशिश करती है। ऐसे अभियानों से परे भी प्रशासनिक सुधार एक ढांचागत सुधार से ही आ सकता है। और इसके लिए सरकार को अपने जमीनी स्तर के कामकाज में कागजों और फाईलों को कम करना पड़ेगा। आज जरा-जरा सी बात के लिए लोगों को सरकार में बहुत से कागज जमा करने पड़ते हैं, बहुत से धक्के खाने पड़ते हैं, और किसी को यह भरोसा नहीं रहता कि एक छोटी सी पटवारी-नकल जैसी बात उसे कितने महीने में मिल पाएगी, या कि तहसील का कोई नामांतरण कितने दिनों में हो पाएगा, या कि राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा में एमआरआई की बारी कितने हफ्तों में आ सकेगी। सरकार को अपने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए लोगों से भरवाए जाने वाले कागज घटाने चाहिए, हर कागज में मांगी जाने वाली जानकारी को घटाना चाहिए। अमरीका जैसे विकसित देश को देखें तो वहां सरकार के हर फॉर्म पर यह छपा होता है कि उसे भरने में औसतन कितनी देर लगेगी। भारत के प्रदेशों में सरकारी दफ्तरों का भ्रष्टाचार इस बात पर पनपता है कि लोगों से अधिक से अधिक जानकारी कैसे मांगी जाए, और उनमें से किसी भी जानकारी के न होने पर उनसे रिश्वत कैसे ली जाए। सरकार को जनता के बीच के लोगों की एक साधारण कमेटी बनाकर सरकारी कामकाज के जाल को घटाना चाहिए।
एक दूसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, और जो सरकार में कभी-कभी चर्चा में आती है, लेकिन आई-गई भी हो जाती है, वह है सरकारी दफ्तरों में अफसरों और कर्मचारियों की मौजूदगी। राज्य सरकार को बहुत ही कड़ाई से यह नियम लागू करना चाहिए कि हफ्ते में कम से कम एक दिन मुख्यमंत्री से लेकर पटवारी तक, हर कोई सुबह से शाम तक अपने दफ्तर में मौजूद रहें, और हफ्ते के ऐसे दिन को किसी भी तरह की बैठक या दौरों से मुक्त रखा जाए। इतना करने के बाद सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कौन से ऐसे दफ्तर हैं जहां पर जनता के काम ज्यादा पड़ते हैं, और वहां ऐसी अनिवार्य मौजूदगी के दिन एक से अधिक भी रखने चाहिए, और ऐसे दिनों में पूरे वक्त की मौजूदगी की गारंटी भी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से कभी-कभी ऐसी पहल शुरू भी हुई, लेकिन नियम-कायदों को नापसंद करने वाले लोगों ने आनन-फानन ऐसी व्यवस्था को चौपट कर दिया। इसलिए हमारा यह मानना है कि राज्य में वही व्यवस्था लागू हो सकती है जो कि मुख्यमंत्री के स्तर से शुरू हो, और जिसे वे अपने ऊपर भी लागू करें। सरकार को जनता से अपना फासला घटाना चाहिए, और इसके लिए सरकारी दफ्तरों को जनता के प्रति जवाबदेह रहते हुए हर हफ्ते काफी वक्त के लिए हर अफसर-कर्मचारी की मौजूदगी घोषित करनी चाहिए। देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसी पहल हो भी रही है, और हम पिछले बरसों में इसी जगह लगातार यह सलाह देते भी आए हैं।
लोक सुराज निपटाने के साथ-साथ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सरकार की जनता के लिए उपस्थिति की ऐसी गारंटी लागू करनी चाहिए, और इससे जनता की शिकायतें दूर भी होंगी।

खुफिया निगरानी के जमाने में नसीहतों की क्लास की जरूरत

संपादकीय
03 मई 2017


दिल्ली में इन दिनों एक चटपटा केस खबरों में हैं कि गुजरात से आए हुए एक भाजपा सांसद ने एक महिला के साथ बलात्कार किया, या कि उस महिला ने इस सांसद को अपने सेक्स-जाल में फांसकर उसका वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया। दोनों तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई है, और मामला जांच के बाद साफ हो पाएगा। सांसद और महिला, दोनों ही वयस्क हैं, और दोनों ही अनुभवी लोग दिखते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को अपने आपको किस हिसाब से बचाकर रखना चाहिए ताकि उनका राजनीतिक या सामाजिक जीवन किसी एक स्कैंडल के साथ खत्म न हो जाए।
यह बात सिर्फ राजनीति के लोगों को समझने की जरूरत नहीं है, बल्कि घर से लेकर कारोबार तक, और सरकारी दफ्तरों से लेकर खेल के मैदान तक, सभी जगहों पर लोगों को सावधान रहना चाहिए। अब चौथाई सदी पहले जैसा माहौल नहीं रहा, जब लोग अपने घर या दफ्तर की महिला कर्मचारी का देह शोषण करके भी बच निकलते थे, क्योंकि ऐसे मामलों की शिकायत ही आमतौर पर नहीं होती थी। लेकिन आज कानून की जागरूकता भी बढ़ गई है, और कानून तक लोगों की पहुंच भी बढ़ गई है। ऐसे में लोगों को अपना चाल-चलन साफ-सुथरा रखने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। सार्वजनिक जीवन से परे भी निजी जिंदगी के बहुत से मामले आज अदालतों तक पहुंच रहे हैं जिनमें आमतौर पर एक लड़की या महिला की शिकायत रहती है कि किसी आदमी ने उनसे शादी का वायदा करके उनका देह शोषण किया और उसके बाद शादी से इंकार कर दिया। ऐसी वायदाखिलाफी और सेक्स-संबंध को लेकर अदालतों का एक नया रूख सामने आ रहा है जिसमें अदालतें यह मान रही हैं कि हर वायदाखिलाफी को बलात्कार करार नहीं दिया जा सकता, और एक वयस्क लड़की को संबंध बनाने के पहले यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे हर संबंध शादी में बदलें यह जरूरी भी नहीं है। हमने भी पहले कई बार इस बात को लिखा था कि शादी का वायदा करने के बाद आपसी सहमति से बने देह संबंधों को वायदाखिलाफी की नौबत आने पर बलात्कार कहना सही बात नहीं होगी। कई बरस पहले हमने इसी जगह यह बात लिखी थी और पिछले साल-छह महीने में कई प्रदेशों के हाईकोर्ट इस तरह की बात लिख चुके हैं।
आज जब चारों तरफ खुफिया कैमरों और मोबाइल फोन से होने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग का जमाना है, तब लोगों को अपनी पतलून के बेल्ट, और पजामों के नाड़े मजबूती से बांधकर रखना चाहिए। पुराने जमाने में किसी की तारीफ करते हुए कहा जाता था कि वह लंगोट का पक्का आदमी है। इसका मतलब होता था कि वह आदमी राह चलते देह संबंधों में नहीं उलझता है। आज हर किसी को यह सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि एक महिला के अधिकार ऐसे मामलों में आदमी के मुकाबले अधिक वजन रखते हैं, और उसकी बात पर अदालत भी अधिक गौर करती है। लोगों को यह समझना चाहिए कि कानूनी या सेहत के खतरे उठाते हुए ऐसे संबंध न सिर्फ लोगों की निजी साख को खत्म करते हैं, बल्कि उनके परिवार की साख भी ऐसे विवादों के बाद आंच झेलती है। यह दौर टेक्नालॉजी के अंतहीन खुफिया इस्तेमाल का है, और लोग तो आज किसी को एक तस्वीर भेजकर, या कुछ शब्द भेजकर भी इतने सुबूत खड़े कर देते हैं कि किसी शिकायत की नौबत आने पर वे जेल भेजे जा सकें। हमारा ख्याल है कि सरकार, समाज, परिवार, और राजनीतिक दल, इन तमाम जगहों पर लोगों को अब हमेशा के लिए खड़े हो चुके ऐसे कानूनी खतरे पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, और लोगों में समझ पैदा करनी चाहिए कि कुछ मिनटों के देह सुख के लिए वे न तो बीमारियों के खतरे में पड़ें, और न ही कानूनी खतरे में पड़ें। खासकर जो राजनीतिक  दल अपने लोगों के चुनाव में जीतकर आने और उनकी साख को लेकर फिक्रमंद रहते हैं, उन्हें तो बंद कमरे के भीतर अपने लोगों के लिए नसीहतों की ऐसी क्लास लगानी चाहिए, और पार्टियों को खुद भी अपने लोगों पर ऐसी नजर रखनी चाहिए। 

सोशल मीडिया ने देशप्रेम के झांसे का बहुत बड़ा मौका जुटा दिया है

संपादकीय
02 मई 2017


इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को लेकर कम से कम भारत में जो लोग हमें सोशल मीडिया पर दिख रहे हैं, वे राष्ट्रभक्ति, देशप्रेम के साथ-साथ राष्ट्रवाद से सराबोर हैं, और वे इस अंदाज में फेसबुक या ट्विटर पर नारे लिख रहे हैं कि वे खुद ही जाकर एक हिन्दुस्तानी सैनिक के कटे सिर के बदले पचास पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट लाएंगे। यह सिलसिला कुछ नया नहीं है, और सोशल मीडिया के पहले जब टीवी चैनल सड़क किनारे लोगों को रोककर उनकी प्रतिक्रिया लेते थे, तब भी इसी किस्म की बात कही जाती थी, और दिखाई जाती थी।
अब इसे कुछ समझने की जरूरत है कि लोगों की ऐसी सोच की वजह क्या है, और उससे नफा-नुकसान क्या है। दरअसल इंसानी सोच बहुत किस्म के झांसे को अपने खुद के लिए खड़ी करती है, और अपने शरीर को तकलीफ से बचाकर चलती है। लोग इन दिनों प्रचलन में आ चुके फिटनेस बैंड पहनकर यह समझ लेते हैं कि वे अपनी फिटनेस के लिए चौकन्ने हैं। यह एक किस्म की मनोवैज्ञानिक तसल्ली होती है, जो कि अपने आपके दिमाग को संतुष्ट कर देती है, और चर्बी को तकलीफ नहीं देती। और सदियों से यह भी चले आ रहा है कि लोग पुण्य कमाने के लिए, अपने पाप धोने के लिए, कहीं मछली को आटे की गोलियां डालते हैं, कहीं बंदर को चना खिलाते हैं, कहीं पंछी के लिए पानी के कटोरे रखते हैं, कहीं गाय ढूंढकर उसे एक रोटी दे देते हैं, और सबसे लोकप्रिय झांसा है जाकर ईश्वर को थोड़ा सा चढ़ावा चढ़ाना, और फिर उससे बड़ी सी उम्मीद कर लेना।
ऐसी हरकतों से भला तो शायद ही किसी का होता हो, सिवाय अपने आपके। यह झांसा तरह-तरह के अपराधबोध से मुक्ति पाने में मदद करता है, और लोगों को लगातार एक आत्मसंतुष्टि और एक गौरव में जीने का मौका देता है। लोग अपने को दानी और समाजसेवी कहने का एक मौका पाते हैं, एक वजह पाते हैं, और बाकी वक्त उसकी चर्चा का रास्ता निकाल लेते हैं। आमतौर पर जो लोग रात-दिन टैक्स चोरी में लगे रहते हैं, जो मिलावट करते हैं, नाप-तौल की चोरी करते हैं, और दूसरे तरह के जुर्म में शामिल रहते हैं, वे लोग जरूर ईश्वर को भी झांसा देने का काम नियमित रूप से करते हैं, वे तरह-तरह की मनौतियां भी मान लेते हैं, और अपनी आत्मा को मानो किसी लॉंड्री में ले जाकर ड्राईक्लीन करवाने के अंदाज में धर्मस्थान जाकर काली कमाई का थोड़ा सा हिस्सा चढ़ाकर आ जाते हैं। लोगों को याद होगा कि इमरजेंसी के वक्त खबरों में आए और जेल गए, देश के एक सबसे बड़े तस्कर हाजी मस्तान को मुंबई शहर में गरीब मरीजों के लिए कुछ एंबुलेंस चलाने के लिए भी जाना जाता था, हालांकि उस दौर में भी उनका मुख्य काम तस्करी था, और समाजसेवा के काम में अपनी कमाई की थोड़ी सी जूठन खर्च करके वे ढेर सी तसल्ली पा जाते रहे होंगे।
देशप्रेम और राष्ट्रवाद कुछ इसी किस्म की बातें हैं, और लोगों को सरहद पर कुर्बानी देने के नारे सुहाते हैं, क्योंकि वे खुद सरहद से बहुत दूर हैं, और फौज में भी नहीं हैं। उनको पाकिस्तान पर हमला करने, जंग छेड़ देने की बात सुहाती है, क्योंकि उनका अपना घर सरहद पर बसा हुआ नहीं है, और वे जंग के धमाकों को घर बैठे टीवी पर देखेंगे, न कि उनकी छत को तोड़ते हुए कोई गोला भीतर पलंग पर गिरेगा। एक दूसरी दिक्कत यह है कि ऐसे लोग अपनी नासमझी में युद्धोन्माद को देशप्रेम मान बैठते हैं, और देशप्रेम की बाकी तमाम जरूरतों को किनारे रख देते हैं। सोशल मीडिया पर भी किसी ने कुछ समय पहले यह लिखा था कि देशप्रेम के लिए सरहद पर जाकर लडऩा ही जरूरी नहीं है, देश के भीतर साफ-सुथरी जगह पर थूकना बंद करके भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है, पार्किंग ठीक करके, या कि ट्रैफिक नियमों को मानकर भी देशप्रेम दिखाया जा सकता है। आमतौर पर देशप्रेम और राष्ट्रवाद की बातें करने वाले लोग अपनी जिम्मेदारी सरहद पर शहादत की चर्चा में साबित कर लेते हैं, क्योंकि वहां उनका खुद का सिर दांव पर नहीं लगा है।
इसलिए जिस तरह लोग अपने अपराधबोध से मुक्त होने के लिए कहीं पशु-पक्षियों को झांसा देते हैं, कहीं ईश्वर को झांसा देते हैं, ठीक उसी तरह देश को भी झांसा देते हैं, यह साबित करते हुए कि वे देश की फिक्र में दुबले हुए जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने लोगों को एक नए किस्म का धर्मस्थल दिला दिया है जहां पर वे झांसा देने का काम कुछ और कर सकते हैं, और हो सकता है कि उनके दिमाग का एक हिस्सा उनके ही दिमाग के बाकी हिस्से को अंधेरे में रखते हुए ऐसा झांसा दे रहा हो, और दिमाग के ऊपर का सिर देशप्रेमी होने के गौरव में तना हुआ भी हो।

बिना सिर ढांके जर्मन चांसलर मार्केल पहुंचीं सउदी अरब...

संपादकीय
01 मई 2017


जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल अभी दुनिया के सबसे कट्टर, और मुस्लिम-विरोधी इस्लामी देश सउदी अरब पहुंचीं तो उन्होंने अपना सिर नहीं ढांका। इसके पहले पश्चिमी देशों से भी जो शासन प्रमुख या राष्ट्र प्रमुख महिलाएं, मंत्री, वहां पर जाती रही हैं, उनमें से अधिकतर स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों के मुताबिक अपना सिर ढांक लेती थीं। लेकिन जर्मनी में पिछले दिनों मार्केल ने बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया था, और उसके बाद अब वहां पहुंचने पर उन्होंने पोशाक की अपनी आजादी का इस्तेमाल करते हुए सउदी अरब को एक संदेश भी दे दिया। कहने और करने के बीच यह ईमानदारी और यह हौसला आज की दुनिया में जरूरी इसलिए है कि जगह-जगह कट्टरपंथी लोग अपने धर्म के नाम पर दूसरों की आजादी को खत्म करने पर उतारू रहते हैं।
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ ही दिन हुए जब एक पर्यटक या मॉडल युवती ताजमहल पहुंची, और उसने धूप से बचने के लिए रामनामी दुपट्टा लपेट रखा था, और वहां मौजूद हिन्दू संगठनों के लोगों ने उससे वह दुपट्टा उतरवाया, तब ताजमहल में जाने दिया। आज दुनिया भर में पोशाक को एक तरफ तो व्यक्तिगत आजादी मानकर अपनी पसंद इस्तेमाल करने का दावा किया जा रहा है, दूसरी तरफ बुर्के जैसे पुराने रिवाज के खिलाफ पश्चिमी देशों में जगह-जगह कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को भी उससे आजादी दिलाई जा रही है, या कि उनकी पसंद की आजादी छीनी जा रही है। यह इन दोनों में से क्या है, यह सोचने के नजरिए पर निर्भर करता है। कोई इसे मुस्लिम महिला की आजादी को बढ़ावा देना कह सकते हैं, तो कोई इसे मुस्लिम महिला की आजादी को छीनना भी कह सकते हैं।
दरअसल धर्म और लोकतंत्र इन दोनों के बीच हमेशा ही हर दूरी तक तालमेल बैठ नहीं सकता। जो लोग धर्म को लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं, उन लोगों का आतंक न सिर्फ इस्लामी देशों में देखने मिलता है, बल्कि अब तो हिन्दुस्तान में भी गाय के नाम पर, पहरावे और खानपान के नाम पर, रीति-रिवाज के नाम पर भारत में भी जगह-जगह देखने मिलता है। और हमारा यह मानना है चाहे भारत में तीन तलाक के खिलाफ पहल हो, चाहे वह पश्चिमी देशों में बुर्के के खिलाफ रोक हो, इससे अगर मुस्लिम महिला या किसी और धर्म के मानने वाले लोगों को अलोकतांत्रिक प्रतिबंधों से आजादी मिलती है, तो उसे बढ़ावा देना चाहिए। आज योरप के देशों में बुर्के पर रोक से एक बदलाव आ रहा है, चाहे वह थोपकर क्यों न लाया जा रहा हो। हम किसी धर्म की ऐसी आजादी को सही नहीं मानते जिसमें औरत और मर्द के बुनियादी हकों में इतना बड़ा फर्क किया जाता हो, और छोटी-छोटी बच्चियों को भी बुर्के से लाद दिया जाता हो। यह बात जाहिर है कि पोशाक की ऐसी रोक से मुस्लिम महिलाओं के आगे बढऩे की संभावनाएं कम होती हैं, और उसका नुकसान उनके परिवारों के बच्चों को भी होता है। इसलिए कई बार धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देते हुए भी आज के जमाने, लोकतंत्र, और इंसाफ, इन सबको देखते हुए दुनिया के ताकतवर देशों को, उनके भीतर के ताकतवर नेताओं को पहल करनी ही चाहिए। जिस तरह कुछ महिला राष्ट्र प्रमुख और शासन प्रमुख सउदी अरब जैसे देशों में अपनी पोशाक से यह साफ कर रही हैं कि वे अपनी पोशाक की आजादी छोडऩे वाली नहीं हैं, वह एक हौसलामंद कदम है, और इसे आगे बढ़ाना चाहिए।