पोप के पिछले साल के आंसू, और इस साल...
संपादकीय
22 दिसंबर 2019

क्रिसमस के हफ्ते भर पहले पोप ने यह ऐलान किया है कि नाबालिकों के यौन शोषण में चर्च अब गोपनीयता के नियम का इस्तेमाल नहीं करेगा। अब तक चर्च में एक ऐसा नियम लागू था जिसके तहत पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों को छुपा दिया जाता था और किसी भी देश में चर्च सरकारी जांच एजेंसियों को ऐसे मामलों न खबर देते थे, और न ही जांच में सहयोग करते थे। चर्च का यह मानना था कि ऐसा करके वे यौन शोषण के पीडि़तों की निजता, और अभियुक्तों की प्रतिष्ठा की रक्षा करता था। अब वैटिकन से जारी नए आदेश के मुताबिक चर्च ने यह बंदिश हटा ली है।
हम बरसों से चर्च, और बाकी धर्मों की भी बहुत सी संस्थाओं में बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ लिखते आए हैं, और उन कड़ी कार्रवाई की मांग करते रहे हैं। चर्च के भीतर भी बहुत से नेता ऐसी मांग करते रहे हैं, और यह ताजा फेरबदल बच्चों के यौन शोषण में कमी लाने में मदद कर सकता है। चर्च के ही एक सबसे अनुभवी आर्चबिशप का कहना है कि इससे जांच में आने वाली अड़चनें घटेंगी और पारदर्शिता बढ़ेगी। हमने करीब एक बरस पहले इस मामले पर पोप और चर्च की कड़ी आलोचना के साथ उस वक्त की खबरों पर लिखा था- ''पोप फ्रांसिस ने चिली में गिरजाघरों के पादरियों द्वारा दुष्कर्म और यौन शोषण के शिकार बच्चों से मुलाकात की और उनकी आपबीती सुनी। दर्दभरी दास्तां सुनते समय पीडि़त बच्चों के साथ पोप भी रो पड़े। बाद में उन्होंने कहा, यह पीड़ा और शर्म का विषय है। पोप ने बच्चों के कल्याण के लिए प्रार्थना की। चर्च पदाधिकारियों के उत्पीडऩ की घटनाओं से चिली में भारी गुस्सा है। सोमवार को पोप का दौरा शुरू होने से पहले लोगों ने विरोध स्वरूप दो चर्चों में आगजनी भी की। दौरे में यौन शोषण के शिकार लोगों से पोप की यह दूसरी मुलाकात है। इससे पहले 2015 में फिलेडेल्फिया की यात्रा में पोप फ्रांसिस यौन शोषण के शिकार लोगों से मिले थे। पोप की इस ताजा मुलाकात पर अर्जेटीना के बिशप की ओर से अटपटी टिप्पणी आई है। उन्होंने कहा, पोप हमेशा चर्च पदाधिकारियों के यौन शोषण की चर्चा करते हैं। वह राजनीतिज्ञों के ऐसे ही आचरण पर कभी नहीं बोलते।''
हमने उस वक्त लिखा था- ''अब सवाल यह उठता है कि क्या पोप के ऐसे आंसुओं की कोई कीमत है? जब तक किसी देश के कानून के खिलाफ जुर्म करने वाले ऐसे पादरियों को पुलिस, अदालत और जेल का सामना न करना पड़े, तब तक उनसे जख्मी हुए बच्चों के लिए आंसू बहाना एक फिजूल का पाखंड है। यह मामला अपने किस्म का अकेला नहीं है, और वेटिकन के तहत आने वाले ईसाई संगठनों में स्कूलों, हॉस्टलों, और चर्चों में पहले भी ऐसा होते आया है, और ऐसे हर बलात्कारी को चर्च बचाते भी आया है। अभी-अभी लंदन में कुछ मदरसों में बच्चियों के साथ ऐसा हुआ, और किसी धार्मिक संगठन ने उसके खिलाफ कुछ नहीं किया। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले भारत के बाहर सबसे मशहूर हिन्दू संगठन इस्कॉन के हॉस्टलों में इसी तरह बच्चों का यौन शोषण सामने आया था, और उस वक्त शायद इस संगठन ने सैकड़ों करोड़ का हर्जाना देकर अदालत के बाहर उस मामले को खत्म करवाया था। अमरीकी कानून इस तरह के जुर्म पर भी रूपयों से समझौता अदालत के बाहर करने देता है, लेकिन दुनिया के बहुत से देश ऐसे हैं जहां पर यौन शोषण को हर्जाना देकर छोड़ा नहीं जा सकता।''
हमने लिखा था- ''हमारा यह मानना है कि पोप सरीखे दुनिया के सबसे अधिक अनुयायियों वाले अकेले धार्मिक मुखिया को इंसानियत और कानून इन दोनों के लिए कुछ अधिक सम्मान दिखाना चाहिए था। यह सिलसिला गलत है कि धर्म का चोगा पहनने वाले बलात्कारियों को अफसोस जाहिर करके और आंसू बहाकर छोड़ दिया जाए। इससे इस धर्म के बाकी संस्थानों में भी यह संदेश जाता है कि वे कुछ भी करके बच सकते हैं। ऐसे लोगों को पूरी जिंदगी के लिए धार्मिक संस्थानों से बाहर तो करना ही चाहिए, उन्हें कानून के हवाले भी तुरंत ही करना चाहिए।''
हमने लिखा था- ''भारत में हम लगातार देख रहे हैं कि धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए संगठनों ने तरह-तरह के बाबा और बापू लोग नाबालिग बच्चियों से बलात्कार को एक आदतन हरकत बनाकर चल रहे हैं, और यौन शोषण की भयानक कहानियां सामने आ रही हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए, और हमाराख्याल है कि जिस धर्म या आध्यात्म के संगठन या मुखिया ऐसे जुर्म करते पकड़ाते हैं, उनकी संस्थानों की दौलत जब्त करने का भी कानून बनाना चाहिए। फिलहाल पोप के आंसुओं पर महज रोया जा सकता है, क्योंकि वे एक पाखंड के अलावा कुछ नहीं हैं।''
अब करीब साल भर बाद हम अपनी ऊपर लिखी हुई किसी भी बात की गंभीरता को कम नहीं आंक रहे, और पोप की इस ताजा घोषणा के असर को देखने में कई बरस लग जाएंगे कि यह सचमुच ही पादरियों के हाथ बच्चों के यौन शोषण को रोकने में कारगर कदम रहेगा, या यह महज दिखावे का एक ढोंग साबित होगा। यह बात याद रखने की जरूरत है कि धर्म में जहां-जहां ब्रम्हचर्य की शर्त लादी जाती है, वहां-वहां बच्चों और महिलाओं के यौन शोषण की घटनाएं होती ही हैं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
झूठ, हिंसा और नफरत के सैलाब को उजागर करें
संपादकीय
21 दिसंबर 2019

देश के बहुत बड़े हिस्से में और कई प्रदेशों में कॉलेज के छात्रों के अलावा मुस्लिम और हिन्दू दोनों समुदायों के लोगों के साथ दूसरे धर्म-जातियों के लोग भी सड़कों पर हैं। नागरिकता संशोधन और नागरिकता रजिस्टर, इन दोनों के खिलाफ जिस तरह का माहौल देश भर में दिख रहा है, वह शायद छह बरस की मोदी सरकार को पहली बार ही नसीब हुआ है। संसद में बाहुबल के चलते अपनी पसंद का कानून बना लेना एक अलग बात है लेकिन कम्युनिस्टों से लेकर हिन्दूवादी पार्टी शिवसेना तक, और एनडीए के साथी दल नीतीश कुमार के जेडीयू जैसे लोग अब नागरिकता विधेयक से अलग हो रहे हैं कि वे अपने राज्यों में इसे लागू नहीं करेंगे। कांग्रेस के मुख्यमंत्री पहले ही इसके खिलाफ बोल चुके हैं, पूरा उत्तर-पूर्व आंदोलन में झुलस रहा है, कई जगहों पर हालात बेकाबू हैं, और सरकार के कुछ मुंह यह बोलने में लगाए गए हैं कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का काम अभी शुरू नहीं हो रहा है, और लोगों को इससे दिक्कत नहीं होने दी जाएगी। कुल मिलाकर देश में केन्द्र सरकार के इन दो कानूनों को लेकर इतना बड़ा अविश्वास खड़ा हुआ है कि वह अभूतपूर्व है। दूसरी बात जो सरकार के लिए अधिक फिक्र की हो सकती है वह यह कि लोग इसकी दहशत से उबरकर अब झंडे-डंडे लेकर खड़े हैं, और संविधान के राज की मांग कर रहे हैं। यह पूरी नौबत एकदम ही अभूतपूर्व है, और एक कार्टूनिस्ट ने आज का सही नजारा दिखाया है कि देखने में अक्षम विपक्ष छात्रों की ऊंगली पकड़कर चल रहा है। छात्रों के आंदोलन को पप्पू या बबुआ कहकर खारिज करना मुमकिन नहीं होगा, और शायद इसीलिए झूठ की एक बड़ी जंग छेड़ दी गई है, जिस पर आज चर्चा होनी चाहिए।
पुराने वक्त से यह बात प्रचलन में है कि तस्वीर झूठ नहीं बोलती। बाद में जैसे-जैसे वीडियो का चलन बढ़ा तो लोगों को वीडियो पर तिलस्म सा भरोसा होने लगा कि जब एक तस्वीर झूठ नहीं बोलती तो वीडियो कैसे झूठ बोलेगा? लेकिन आज सोशल मीडिया देखें तो हिंसा की पुरानी तस्वीरें निकालकर, अड़ोस-पड़ोस के देशों के हिंसा के कुछ पुराने वीडियो निकालकर उन पर हिन्दुस्तानी शहरों के नाम चिपकाकर उन्हें फैलाया जा रहा है, और लोगों के नाम से बयान बनाकर उनको फैलाना तो और भी आसान है। कहने के लिए हिन्दुस्तान का सूचना तकनीक कानून देश के सबसे कड़े कानूनों में से है, लेकिन न तो उसका कोई असर दिखता, और न ही किसी को उसकी परवाह लगती। इक्का-दुक्का केस कहीं-कहीं पर दर्ज होते दिखते हैं, लेकिन किसी को सजा की कोई परवाह नहीं दिखती, और सोशल मीडिया का सबसे बड़ा इस्तेमाल नफरत और हिंसा फैलाने के लिए किया जा रहा है। एक दूसरी दिक्कत यह भी है कि यह काम कोई अनजाने में नहीं कर रहे हैं, जानते-बूझते बदनीयत से कर रहे हैं, और ऐसी जनचर्चा है कि नफरत का सैलाब फैलाने वाले इसका भुगतान भी पाते हैं।
आज जरूरत यह भी है कि सोशल मीडिया या और किसी जगह पर सोची-समझी साजिश के तहत अगर नफरत और हिंसा फैलाने का काम हो रहा है, तो कम से कम उन राज्यों में तो सरकारों को केन्द्र सरकार के बनाए कानून के तहत कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जिन राज्यों में सरकारें नफरत फैलाने में हिस्सेदार नहीं हैं। यह न सिर्फ ऐसी राज्य सरकारों का अधिकार है, बल्कि उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। यह उन लोगों की भी सामाजिक जिम्मेदारी है जो दूसरों को नफरत फैलाने के लिए झूठी तस्वीरों और झूठे वीडियो का इस्तेमाल करते देख रहे हैं। ऐसा देखते हुए भी अगर दूसरे गैरनफरतजीवी लोग चुप रहेंगे, तो समाज में लगती आग से किसी दिन उनकी कुनबा भी जल सकता है। जब देश जलने-सुलगने लगता है, तो वह आग छांट-छांटकर नहीं फैलती, और महज छांटे हुए निशानों को नहीं जलाती। सोशल मीडिया और मीडिया पर झूठ फैलाने वालों का भांडाफोड़ करने के लिए देश में कुछ जिम्मेदार वेबसाईटें बड़े सीमित साधनों में काम कर रही हैं, और वे लगातार साजिश का भांडाफोड़ करती हैं। समाज के जिम्मेदार लोगों को ऐसे भांडाफोड़ को भी देख परखकर, सच पाए जाने पर उनको आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए क्योंकि झूठ फैलाने में तो करोड़ों लोग लगे हैं, कुछ लाख लोग झूठ का भांडा फोडऩे में भी हाथ बंटाएं। कुल मिलाकर आज हिन्दुस्तान में एक बहुत बड़े तबके की झिझक पूरी तरह खत्म हो गई है, और बेशर्मी ने उनकी आत्मा पर ऐसा कब्जा कर लिया है कि नफरत और झूठ फैलाते उन्हें जरा भी हिचक नहीं लगती। लेकिन लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ऐसे लोगों के हवाले करके चुप बैठ जाना ठीक नहीं है। देश के तमाम जिम्मेदार लोगों को हर दिन थोड़ा सा वक्त निकालना होगा, और झूठे इतिहास, झूठे वर्तमान, और भविष्य को लेकर बेबुनियाद आशंकाओं की नफरत फैलाने वालों की हकीकत उजागर करनी होगी। हर जिम्मेदार व्यक्ति को पहले तो अपने परिवार, फिर अपने दोस्त, फिर दफ्तर या कारोबार के साथियों से बातचीत में सच और झूठ का फर्क बताना होगा, तभी आने वाली पीढिय़ां बिना नफरत और खतरे के जी सकेंगी।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जीभ को नाराज करके बाकी बदन पर एहसान की जरूरत
संपादकीय
20 दिसंबर 2019

देश की सबसे बड़ी पर्यावरण-संस्था सेंटर फॉर साईंस एंड इनवायरमेंट, सीएसई ने पर्यावरण के परंपरागत मुद्दों से कुछ हटकर खानपान पर अभी एक बहस रखी जिससे यह सामने आया कि हिन्दुस्तान में पैकेटबंद मीठा-नमकीन किस्म के सामान किस कदर सेहत के खिलाफ हैं। ऐसे सामानों में शक्कर, नमक, या कुछ रसायन इतने अधिक हैं कि उनसे सेहत को नुकसान पहुंचना तय है। बाजार में अधिक चलने वाले कई ब्रांड के अधिक चलने वाले सामानों का रासायनिक विश्लेषण करके सीएसी ने एक चार्ट भी प्रकाशित किया है कि किस-किसमें कितना फीसदी नुकसानदेह सामान मिला हुआ है। देश में शायद यह अपने किस्म का एक पहला बड़ा आयोजन था जो कि किसी स्वास्थ्य-संस्था के बजाय पर्यावरण संस्था ने खानपान को लेकर देश के सबसे चर्चित पांच सितारा रसोईयों को भी साथ रखा, और चर्चा को महज कागजी होने से बचाया।
देश में खानपान का हाल एक बहुत फिक्र की बात है। यह बात जरूर है कि यह अमरीका जैसे देश से बहुत बेहतर है क्योंकि वहां पर लगातार जंक कहे जाने वाले बहुत ही नुकसानदेह खानपान की वजह से आबादी का एक बड़ा हिस्सा इतने भारी मोटापे का शिकार हो चुका है कि वह एक किस्म का राष्ट्रीय खतरा माना जा रहा है। भारत में भी दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय शहर में महंगे स्कूल-कॉलेज को देखें, महंगे बाजारों में घूमते लोगों को देखें, तो अंधाधुंध मोटे लोग सबसे नुकसानदेह चीजें खाते-पीते दिखते हैं। इस नौबत को सुधारने में लोगों की दिलचस्पी धीरे-धीरे इसलिए कम हो रही है कि उनकी खर्च की ताकत में हासिल महंगे इलाज पर उन्हें बहुत भरोसा है कि आखिर में जाकर बाईपास से सब ठीक हो जाएगा, खाओ-पिओ ऐश करो। देश में ऐसी सोच महज उसी पीढ़ी का नुकसान नहीं कर रही है, बल्कि वह इस पीढ़ी के डीएनए से आगे बढऩे वाली तमाम पीढिय़ों को दिक्कत वाले जींस देकर जा रही है। इसके साथ-साथ देश की सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं पर ऐसे लोग इतना अधिक बोझ डाल रहे हैं कि कम आय वाले लोगों को ऊंचा इलाज पाने की कतार में जगह ही नहीं मिल रही है।
हम सेहत के बचाव और चुस्त-दुरूस्त रहने के बारे में हर बरस एक-दो बार लिखते हैं कि बीमारियों से बचाव ही एकमात्र इलाज है, और कोई तरीका नहीं है कि एक बार खो चुकी सेहत को दुबारा पाया जा सके। देश के जो सबसे महंगे अस्पताल लोगों को यह भरोसा हासिल कराते हैं कि उनके पास तमाम बड़ी बीमारियों का इलाज है, उनको भी मालूम है कि इलाज की उनकी सीमा है, मेडिकल साईंस की भी एक सीमा है, और बदन को पहुंचा हुआ हर नुकसान दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को एक तरफ तो जनता को जागरूक करना चाहिए कि वे सेहत के लिए नुकसानदेह खान-पान से कैसे बचें। दूसरी तरफ उन्हें होटलों और बाकी खानपान के धंधों पर यह नियम भी लागू करना चाहिए कि वे हर सामान छोटी प्लेट में भी उपलब्ध कराएं ताकि लोगों को मजबूरी में अधिक खाना न पड़े, या प्लेट में जूठा न छोडऩा पड़े। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक फिट-इंडिया का नारा दिया है जो कि एक अच्छी जागरूकता हो सकता है अगर इसके साथ-साथ देश भर के शहरों में सैर के लिए बाग-बगीचे, और योग-ध्यान करने की जगह, उन्हें सीखने की सहूलियत उपलब्ध कराई जा सके। ये दोनों बातें मिलीजुली हैं, एक तरफ जागरूकता बढ़ाई जाए, सेहतमंद रहने की प्राकृतिक सहूलियत मुहैया कराई जाए, और दूसरी तरफ बाजार में खाने के लिए मजबूर लोगों को कम मात्रा में भी खरीदने की सुविधा रहे। छोटी प्लेट अनिवार्य करने की बात लंबे समय से चल रही है, लेकिन इस पर अमल हो नहीं पाया है। पता नहीं राज्य सरकारें अपने अधिकारों से अपने इलाकों में ऐसा कर सकती हैं या नहीं, लेकिन अगर ऐसे अधिकार हों तो जागरूक राज्यों को ऐसा करना ही चाहिए। फिर समाज के भीतर, परिवार के भीतर लोगों को तमाम डिब्बाबंद, पैकेट वाले, और टेलीफोन से ऑर्डर करके बुलाए जाने वाले खाने का इस्तेमाल कम से कम करना चाहिए। सबसे सेहतमंद खाना वह होता है जो घर पर बनता है, जिसमें घी-तेल का कम इस्तेमाल होता है, जिसमें चर्बी कम होती है, और जिसमें फल-सब्जी का अधिक से अधिक उपयोग होता है। इस जगह पर इससे ज्यादा खुलासे से चर्चा नहीं हो सकती, लेकिन लोगों को अस्पतालों से अधिक भरोसा अपनी जीवनशैली पर करना चाहिए कि अस्पतालों की नौबत ही न आए। यह जानकारी कोई परमाणु-रहस्य नहीं है, और कदम-कदम पर उपलब्ध है। जरूरत महज इतनी है कि अपनी जीभ पर काबू रखकर, उसे नाराज करके, बाकी बदन पर एहसान किया जाए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
मोदी सरकार और किसी की न सही, चेतन भगत की लिखी बात तो सुन ले
संपादकीय
19 दिसंबर 2019

जब किसी नेता या सरकार के सामने बहुत विरोध हो रहा हो, उसके फैसलों पर सवाल उठ रहे हों, और पिछले फैसले एक के बाद एक नुकसानदेह साबित हो रहे हों, तो यह वक्त ऐसा रहता है कि अपने दरबार से परे के लोगों की बात भी सुननी चाहिए। और यह बात हम पिछले बरसों में मोदी सरकार के बारे में ऐसे कई मौकों पर लिख चुके हैं जब एनडीए में उसकी भागीदार रही शिवसेना ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या केन्द्र की किसी नीति या फैसले का विरोध किया हो। शिवसेना भाजपा के मुकाबले अधिक उग्र हिन्दुत्ववादी पार्टी रही है, और भाजपा के सबसे पुराने भागीदारों में से एक भी, इसलिए जब तक वह केन्द्र और महाराष्ट्र के गठबंधन में भाजपा के साथ थी, उसकी की गई आलोचना किसी कंपनी या संस्था के भीतर बैठकर काम करने वाले बाहरी ऑडिटर की आपत्ति सरीखी थी, जिसे अनदेखा करना खतरनाक था। अब पिछले दो-तीन दिनों में दो ऐसे लोगों ने मोदी-अमित शाह की ताजा नागरिकता-नीति को लेकर, छात्र आंदोलनों पर सरकार की कड़ी मार को लेकर लिखा है जिस पर सरकार को गौर करना चाहिए। देश के एक वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक कोई वामपंथी पत्रकार नहीं रहे हैं, और भाजपा के भी अनगिनत नेताओं से उनके मधुर और अंतरंग संबंध रहे हैं। उन्होंने केन्द्र सरकार के ताजा फैसलों को लेकर खासी आलोचना की है, जबकि उनकी सोच किसी भी तरह से मुस्लिमों से किसी रियायत की नहीं है।
वेदप्रकाश वैदिक ने लिखा है कि पड़ोसी देशों से भारत आए लोगों को शरण देने के लिए जो शर्त रखी है वह अधूरी है, अस्पष्ट है, और भ्रामक है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि क्या पाकिस्तान से मुस्लिम लोग प्रताडऩा की वजह से छोड़कर दूसरे देशों में नहीं भागते हैं? उन्होंने लिखा- इस कानून के पीछे छिपी साम्प्रदायिकता दहाड़ मार-मारकर चिल्ला रही है, भाजपा ने अपने आपको मुस्लिमविरोधी घोषित कर दिया है, भाजपा जब विपक्ष में थी तब वोट पाने के लिए यह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण समझ में आता था, पर अब तो वह सत्ता में है। उन्होंने आगे लिखा है कि बंगाल, असम, त्रिपुरा, और पूर्वोत्तर के अन्य प्रांतों में सारे हिन्दू क्यों भड़के हुए हैं? वहां की भाजपा सरकारें क्यों हक्का-बक्का हैं? भाजपा के इस कानून ने देश के परस्पर विरोधी दलों को भी एकजुट कर दिया है। उन्होंने भाजपा के छेड़े हुए नागरिकता के इस ताजा मुद्दे को फर्जी करार दिया है, और सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद की है कि वह इसे असंवैधानिक घोषित करे तो वह भारत को इस निरर्थक और फर्जी संकट से बचा सकता है।
इसी के ठीक अगले दिन एक अलग पीढ़ी के एक गैरपत्रकार, उपन्यासकार चेतन भगत ने एक बड़ा लेख लिखा है जिसे देखकर पहली नजर में ऐसा लगता है कि किसी और के लिखे लेख में उनका नाम चिपक गया है। वे आमतौर पर हिन्दुत्ववादियों की तारीफ करते दिखते हैं, मोदीभक्त रहते आए हैं, और देश के उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष, और प्रगतिशील लोग उन्हें हिकारत से देखते हैं। वे हिन्दुस्तान के अंग्रेजी लेखकों में सबसे अधिक संख्या में बिकने वाले उपन्यासों के लिए इतने मशहूर हैं कि उन्हें अंग्रेजी का गुलशन नंदा कहकर साहित्यिक-गाली दी जाती है, लेकिन वे सोशल मीडिया पर आए दिन ताजा मुद्दों पर भी कुछ-कुछ लिखते हैं। उनका लिखा हुआ कोई भी ट्वीट याद करें तो वह मोदी की तारीफ से स्तुति के बीच का याद पड़ता है, लेकिन आज का उनका लेख मोदी के बारे में कहता है- हां में हां मिलाने वाले यसमैन से घिरा नेतृत्व। उन्होंने राजनीति के पाठकों को इस लेख से हक्का-बक्का किया है कि चेतन भक्त कहे जाने वाले इस लेखक को क्या हो गया है। और हमें पूरा भरोसा है कि इस लेख के सामने आते ही नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा और संघ के लोग भी हैरानी और सदमे के बीच कहीं होंगे। लेकिन चेतन भगत की लिखी हुई बातों को अगर मोदी सरकार नहीं पढ़ेगी, या उस पर गौर नहीं करेगी, तो वह नुकसान छोड़ कुछ नहीं पाएगी। उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी, 370 के खात्मे, और अब नागरिकता संशोधन कानून इन सभी की आलोचना करते हुए इनसे हुए नुकसान गिनाए हैं, और लिखा है कि नागरिकता संशोधन कानून को किसी अच्छे समय, अच्छे शब्दों, आम राय बनाने के लिए लंबे जनविमर्श, और स्पष्ट तौर पर कहें तो अच्छे इरादे की जरूरत थी। इस आखिरी शब्द से यह साफ है कि भाजपा के इस सबसे पसंदीदा अंग्रेजी उपन्यासकार नौजवान को नागरिकता संशोधन के पीछे एक बदनीयत दिख रही है जिसे वे खुलकर लिख रहे हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि भाजपा के बड़े फैसलों का नियमित अंतराल में ऐसा विरोध होते चल रहा है। चेतन भगत ने यह भी लिखा कि हिन्दू-मुस्लिम के सामाजिक समीकरणों से बार-बार छेड़छाड़ भारत जैसे देश में कभी भी एक अच्छा विचार नहीं रहा। उन्होंने लिखा कि अगस्त में 370 हुआ, करीब एक महीने पहले राम मंदिर का फैसला हिन्दुओं के पक्ष में आया, क्या मुस्लिमों को एक और चोट देना जरूरी था?
इसके बाद चेतन भगत ने गिनाया है- क्या भाजपा को नहीं पता है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर छह सालों में सबसे कम है? क्या वह नहीं जानती कि बार-बार हिन्दू-मुस्लिम के सामाजिक ताने-बाने को छेडऩे से निवेशकों पर गलत प्रभाव पड़ता है, और यह हमारे विकास पर असर डालता है? उन्होंने लिखा कि नेतृत्व को यसमैन घेरे हुए हैं, समझदार बातों, प्रतिभाशाली और स्वतंत्र राय रखने वालों को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। भाजपा की लगातार हो रही राजनीतिक विजय ने इस संस्कृति को इतना अधिक कड़ा कर दिया है कि इसे बदलना मुश्किल है। लेकिन अगर इसे न बदला गया, तो एक दिन ऐसी स्थिति आ सकती है कि चारों तरफ आग ही आग होगी।
इन दो पत्रकार-लेखकों की बातों को यहां लिखकर हम यही कहना चाहते हैं कि मोदी सरकार को कम से कम ऐसे लोगों की बात तो सुननी चाहिए जो कि या तो उनके खुद के हैं, हिमायती हैं, या कम से कम मोदीविरोधियों के पैरोकार नहीं हैं। देश भर के विश्वविद्यालयों में चल रहे आंदोलनों की गिनती को घटाकर बताने से हकीकत नहीं छुपेगी, और इस देश को ऐसी आग में झोंकना भी ठीक नहीं है जो अगली पांच-दस सरकारों पर भी भारी पड़ेगी।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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