दीवारों पर लिक्खा है, 20 फ़रवरी 2020

पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें...

संपादकीय
20 फ़रवरी 2020

दुनिया में जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा, तो एक लतीफा चल निकला कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट छोटा काट दिया है कि अब लोग खुद होकर अपने बारे में इतना कुछ लिखने लगे हैं कि अधिक जासूसी की तो जरूरत ही नहीं रह गई। मानो इतना ही काफी नहीं था, तो अब ट्विटर और फेसबुक जैसी जगहों पर कोई भी व्यक्ति तरह-तरह के सर्वे कर रहे हैं कि लोग किस पार्टी को, किस उम्मीदवार को, किस मुद्दे को चाहते हैं और किसके खिलाफ हैं। लोगों को लगता है कि यह एक मासूम सर्वे है, लेकिन कल्पना करें कि किसी पार्टी या संगठन के आईटी सेल के लोग बैठकर ऐसे सर्वे कर रहे हों, और लोगों के सामाजिक-राजनीतिक रूझान, उनकी पसंद और उनकी नफरत का घर बैठे हिसाब लगा रहे हों। 

अभी-अभी एक किसी संस्था की तरफ से फेसबुक पर एक सर्वे किया जा रहा है जिसमें लोगों से तरह-तरह के सवाल करके उन्हें बताया जाता है कि उनकी सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। जिस दिन सोच के आधार पर समाज में हिंसा की जरूरत पड़ेगी, ऐसे सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों का रिकॉर्ड इस संस्था के पास, या जो भी इससे आंकड़े हासिल कर सके, खरीद सके, या हैक कर सके, उसके पास रहेगा कि कौन से इंसान की सोच कितने फीसदी कम्युनिस्ट है। दुनिया का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग देशों में लोगों को उनकी कम्युनिस्ट सोच की वजह से मारा गया है। हिन्दुस्तान में भी आज विचारधाराओं से नफरत करने वाले लोग कम नहीं हैं, किसी विचारधारा से नफरत कम, किसी से अधिक। ऐसे में लोग ऐसे हर एप्लीकेशन, या ऐसी हर वेबसाईट को मासूम मानकर उसके सर्वे में हिस्सा लेने लगते हैं, ट्विटर पर सवालों के जवाब देने लगते हैं, और चतुर या चालबाज लोग उन्हें उनकी सोच के हिसाब से अलग-अलग लिस्टों में दर्ज करते चल रहे हैं। जिस दिन सोच के आधार पर लोगों को मारने का सिलसिला शुरू होगा, उस दिन सौ फीसदी कम्युनिस्ट पहले मारे जाएंगे, फिर नब्बे फीसदी वाले, और फिर आखिर में जाकर कमजोर कम्युनिस्ट-सोच वालों की बारी आएगी। हत्यारों की ताकत बेकार न जाए इसलिए खालिस वामपंथियों की लिस्ट तैयार रहेगी, और प्राथमिकता के आधार पर लोगों को खत्म किया जाएगा। 

जिन लोगों को भी यह बात कल्पना की एक उड़ान लग रही है, उन्हें इतिहास को भी पढऩा चाहिए, वर्तमान में अपने आसपास का माहौल देखना चाहिए, और भविष्य के खतरों के प्रति सावधान रहना चाहिए। आज किसी एक वेबसाईट पर आप छाता ढूंढ लीजिए, तो बाद में आप इंटरनेट पर चाहे कोई भी पेज खोलें, उस पर छातों का इश्तहार दिखने लगेगा। इंटरनेट ने लोगों को नंगा करके रख दिया है, और ऐसे में जब लोग अपनी जरूरत की सर्च से परे लोगों के किए जा रहे सर्वे में शामिल हो रहे हैं, तो फिर वे अपने दिल-दिमाग पर से, अपने बदन पर से खुद ही तौलिया हटाकर फेंक दे रहे हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि लोगों की सोच, और उनके रूझान के हिसाब से हो सकता है कि सरकारी और निजी नौकरियां तय होने लगें। कल के दिन देश-प्रदेश की सरकारों के हाथ ऐसा डेटा लगे, और वे अपने काबू की कंपनियों को कहें कि इन लोगों को नौकरी पर नहीं रखना है, तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। अपने खुद के उजागर किए बिना भी लोग अपनी डिजिटल जिंदगी में बहुत हद तक उजागर हैं ही, ऐसे में हर किसी को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि आने वाले कल नहीं, आज ही हर कोई खतरे में भी है। इसलिए लोगों को बिना जरूरत अपनी सोच को ऐसे एप्लीकेशन, सर्वे, या अध्ययन में झोंक नहीं देना चाहिए। डिजिटल खतरों का एक फीसदी एहसास भी लोगों को है नहीं, एक मामूली सा गूगल लोकेशन आपके पिछले कई हफ्तों-महीनों की जानकारी आपके फोन पर पल भर में दिखा देता है कि किस दिन, किस वक्त आप कितनी देर कहां गए, कहां रहे। यह पूरा सिलसिला लोगों की कल्पना से बहुत ही अधिक खतरनाक है, इसलिए बाजारू इश्तहार के इस नारे पर भरोसा नहीं करना चाहिए- पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। होना तो यह चाहिए कि पहले विश्वास करें, फिर इस्तेमाल करें...।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 19 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 19 फ़रवरी 2020

जजों की पांच-पांच बरस से खाली कुर्सियों पर भी नाम नहीं सुझा रहे हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट !

संपादकीय
19 फ़रवरी 2020

हिन्दुस्तान के किसी भी मामूली खाते-पीते आम घर में रसोई का सामान खत्म होने के हफ्ता-दस दिन पहले सामान लाकर रख दिया जाता है। उस घर को बहुत ही बुरे इंतजाम का शिकार माना जाता है जहां शक्कर, नमक, चायपत्ती, अदरक जैसे सामान खत्म हो जाते हों। ऐसे में जब हिन्दुस्तान के सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर भारत सरकार का वकील अदालत को कहता है कि देश की अदालतों में सैकड़ों पद इसलिए खाली पड़े हैं कि अदालतें समय पर भावी जजों के नाम केन्द्र सरकार को नहीं सुझाती हैं। अदालतों के खाली पदों को लेकर चल रही एक बहस में अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि उच्च न्यायालयों में जजों के 36 फीसदी पद खाली होने के लिए न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। उन्होंने गिनाया कि अभी उच्च न्यायालयों के 396 खाली पदों में से 199 के लिए केन्द्र सरकार को कोई नाम भेजे ही नहीं गए हैं। उन्होंने कहा कि कई मामले तो ऐसे हैं जिनमें हाईकोर्ट कॉलेजियम पद खाली होने के पांच बरस बाद भी उसके लिए नाम नहीं सुझा रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में अदालत के चक्कर में फंसने वाले लोगों की लोकतंत्र और न्यायपालिका पर आस्था पूरी ही खत्म हो जाती है। कई मामलों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अदालत में खड़े रहते हैं, कई मामलों में फैसला सामने आने तक दोनों ही पार्टियां कंगाल हो जाती हैं, और हिन्दी के एक मशहूर उपन्यास में वर्णन के मुताबिक, जीतने वाले से अदालत के बाबू उसकी लंगोट भी उतरवा लेते हैं। ऐसे में जो एक सबसे बड़ी वजह इंसाफ में लेट-लतीफी की है, वह जजों की खाली कुर्सियां हैं। एक तिहाई से अधिक कुर्सियां खाली हैं, तो जाहिर तौर पर हर मामला एक तिहाई अधिक वक्त लंबा खिंच ही जाएगा। अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति में सरकार को औसतन 127 दिन लगे हैं क्योंकि उसे प्रस्तावित नामों के बारे में खुफिया रिपोर्ट भी बुलानी पड़ती है। लेकिन दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कॉलेजिमय में ही नाम बढ़ाने में 119 दिन लगाए। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने मिलाकर 18 दिनों में ही फाईल क्लीयर कर दी। उन्होंने अदालती बहस के दौरान यह सुझाया कि चूंकि जज नियुक्त करने में अदालत और सरकार-राष्ट्रपति को एक साल लग जाता है, इसलिए जज रिटायर होने के एक साल पहले से नए जज के लिए नाम तय कर लिए जाने चाहिए ताकि कुर्सी खाली न रहे। पटना और राजस्थान हाईकोर्ट में तो जजों की 50 फीसदी से अधिक कुर्सियां खाली हैं। 

अब देश भर में इतनी सारी लॉ यूनिवर्सिटी खुली हुई हैं, अदालतों में लाखों वकील प्रैक्टिस कर रहे हैं, निचली अदालतों में दसियों हजार, या लाखों जज काम करते हैं, ऐसे में हाईकोर्ट जज बनाने के लिए लोगों के नाम की कमी तो होनी नहीं चाहिए। कुर्सियां खाली रहें, और मामलों के ढेर शहरी कचरे के ढेरों से ऊंचाई का मुकाबला करते रहें, तो लोकतंत्र तो गटर में ही चले गया मान लेना चाहिए। जब गरीब और बेबस लोग इंसाफ की उम्मीद में अदालती फैसला पाने के लिए पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, और उसके बाद भी जरूरी नहीं है कि उन्हें इंसाफ मिले, हो सकता है कि उन्हें सिर्फ फैसला मिले, तो वैसे में रसोई के नमक-शक्कर की तरह अदालतों में जजों का इंतजाम समय रहते क्यों नहीं किया जा सकता? यह सिलसिला बहुत ही निराश करने वाला है। जो अदालत देश के हर व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाती है, उसके खुद के घर का हाल गड़बड़ है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के बड़े-बड़े जज समय रहते अदालती रसोई के लिए अदरक-चायपत्ती का इंतजाम नहीं करते तो यह छोटी बात नहीं है। 

जून 2019 में केन्द्रीय कानून मंत्री ने संसद को बताया था कि देश के 25 हाईकोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 8 लाख से अधिक एक दशक से अधिक पुराने हैं। उस दिन सुप्रीम कोर्ट में डेढ़ लाख से अधिक मामले चल रहे थे। इसके एक बरस पहले का एक और आंकड़ा है, जिसमें तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि भारतीय अदालतों में तीन करोड़ तीस लाख मामले लंबित हैं। इनमें 16.58 लाख मामले अकेले बिहार में लंबित थे, जहां के हाईकोर्ट में जजों की आधी कुर्सियां खाली पड़ी हैं।

एक तरफ तो देश में आए दिन अलग-अलग किस्म के जुर्म के लिए अलग-अलग फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने की बात होती है, पूरे देश में चुनाव याचिकाओं की जल्द सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनी हुई हैं ताकि सांसद या विधायक का कार्यकाल खत्म हो जाने के पहले उनकी पात्रता-अपात्रता पर फैसला हो सके। अदालतों के बड़े-बड़े जज अपने बीच के वकीलों या छोटे जजों के नामों में से अगर हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के लिए नाम तय नहीं कर सकते, तो यह हैरान करने वाली तकलीफदेह बात इसलिए भी है कि कुर्सी खाली होने के पहले ही उस कुर्सी के काबिल दावेदार-हकदार सामने रहते हैं, और जिस तरह लोक अदालतें लगाकर मामलों का बोझ खत्म करने की कोशिश होती है, अदालतों को अपने कॉलेजियम को भी लोक अदालत की तरह बिठाना चाहिए, हर खाली कुर्सी को भरने का काम भी करना चाहिए। कायदे की बात तो यह होगी कि किसी जज के रिटायर होने के पहले ही उसकी जगह नियुक्त होने वाले वकील और छोटे जज छांट लिए जाने चाहिए जिन्हें यह पता हो कि किस तारीख से उन्हें कहां काम सम्हालना है। हम जजों के नाम छांटकर सरकार को सुझाने की हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की प्रक्रिया को कम नहीं आंक रहे, उसका अतिसरलीकरण नहीं कर रहे, लेकिन उसे वक्त पर करने की जरूरत जरूर बता रहे हैं। आज हिन्दुस्तानी अदालतें जब अपनी खुद की खाली कुर्सियों के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे, वे किसी दूसरे के साथ क्या इंसाफ करेंगी?
  
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

मां को कुतिया कहने वाले भगवों से भरा हिंदुस्तान...

संपादकीय
18 फ़रवरी 2020

पहले गाय को बचाने के नाम पर मरे जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को निशाना बनाया गया, और गुजरात के उना की वे तस्वीरें भूलती नहीं हैं जिनमें दलितों की नंगी पीठ पर दिनदहाड़े खुली सड़क पर बेल्ट से कोड़े लगाए गए। इसके बाद देश के आदिवासियों के खानपान पर हमला हुआ, दलितों और अल्पसंख्यकों के खानपान पर हमला हुआ, मांसाहारियों पर हमले हुए, और हिंदू धर्म के अलावा बाकी किसी भी धर्म को मानने वाले पर जुबान से और हथियारों से हमले हुए। इस हद तक हुए कि जब आरएसएस ने सिखों को हिंदू करार दिया, तो अकाली दल से लेकर अकालतख्त तक ने इसका विरोध किया। हिंदू धर्म के भीतर एक सनातनी व्यवस्था को न मानने वाले तमाम लोगों को गद्दार कहा गया, जो जय श्रीराम न कहे उसे पाकिस्तान जाने कहा गया, और जो मोदी की जरा भी आलोचना करे उसे देशद्रोही कहकर देशनिकाले के फतवे दिए गए। लेकिन नफरत और हिंसा के मुंह खून लग जाता है, और वे रूकने से मना कर देते हैं। जंगल के जानवरों के बारे में मानवभक्षी हो जाने की बात कही जाती है कि उनके मुंह इंसानों का खून लग जाए तो वे इंसानों को मारने लग जाते हैं, जानवरों का तो पता नहीं, लेकिन धर्म के नाम पर, एक आक्रामक राष्ट्रीयता के नाम पर हिंसा करने वाले लोगों के मिजाज में हिंसा घर कर जाती है, और वे हिंसा करने के लिए नए निशाने ढूंढने लगते हैं। पिछले तीन दिनों में एक ऐसा निशाना सामने आया हैै जिसने पूरे के पूरे हिंदू-समुदाय को जन्म दिया है, हिंदू महिला।

गुजरात में वहां के एक प्रमुख हिंदू समुदाय, स्वामीनारायण सम्प्रदाय के चलाए जाने वाले एक कन्या कॉलेज से खबर आई कि वहां माहवारी की किसी लड़की का एक पैड खुले में पड़े मिला तो पूरे कॉलेज की लड़कियों के कपड़े उतरवाकर जांच की गई कि किस-किस की माहवारी चल रही है। अब उस धार्मिक कॉलेज की बाकी खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह वहां लड़कियों को माहवारी के दिनों में तलघर में अलग रखा जाता था। फिर मानो यह भी काफी नहीं था, तो इस कॉलेज ट्रस्ट के एक भगवा स्वामी, स्वामी कृष्णस्वरूप दासजी का यह बयान आया कि अगर कोई महिला माहवारी के दिनों में खाना पकाती है, तो वह अगले जन्म में कुतिया बनती है। जिन लोगों को न मालूम हो वे यह जान लें कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रमुख स्वामी को महिलाओं से इस हद तक परहेज रहता है कि वे जिस सभा भवन में बैठते हैं, उसके बाहरी दरवाजों के सामने से भी किसी महिला के गुजरने पर रोक रहती है ताकि स्वामी की नजरें किसी महिला पर न पड़ें। 

दूसरी तरफ आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अपनी घिसीपिटी दकियानूसी बातों को फिर दुहराया है कि शिक्षित घरों में तलाक के अधिक मामले होते हैं। वे एक किस्म से शिक्षा को खतरनाक बता रहे हैं, और इसके पहले वे कई बार यह बात कह चुके हैं कि महिला को घर संभालना चाहिए, और परिवार चलाने के लिए कमाई का जिम्मा आदमी पर छोडऩा चाहिए। अलग-अलग समय पर दिए गए उनके इन बयानों को देखें तो यह समझ आता है कि उन्हें पढ़े-लिखे परिवारों में महिला की पढ़ाई-लिखाई ही खतरनाक दिख रही है। महिलाओं के खिलाफ दकियानूसी बातें कहते हुए उनके भाषण आते ही रहते हैं, और पिछले चार दिनों में आई इन दोनों बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि हिंदू समाज के दो अलग-अलग किस्म के स्वघोषित नेता अब अपना निशाना अल्पसंख्यकों के बाद हिंदू महिलाओं की तरफ मोड़ चुके हैं। 

यह नौबत एक दिन आनी ही थी क्योंकि हिंसा करने और धार्मिक भेदभाव करने के आदी लोग हमेशा से महिलाओं को एक पसंदीदा-निशाना मानते आए हैं, और अब फिर थोड़े समय तक गाय, गोबर, गोमूत्र, हिंदुत्व, मंदिर के मुद्दे इस्तेमाल कर लेने के बाद अब वे फिर महिलाओं को कुतिया बनाने के अपने पसंदीदा शगल में लग गए हैं। ऐसी बकवास करते हुए लोगों को यह भी नहीं दिख रहा कि वे एक औरत की माहवारी की वजह से, उसके माहवारी के खून के बीच नौ महीने गुजारने के बाद ही पैदा हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान जिस तरह बलात्कारी आसाराम के भक्तों से भरपूर है, मां को कुतिया कहने वाले के भक्तों की भी यहां कमी नहीं रहेगी, इनके खिलाफ अदालत तक जाने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

बात की बात, 18 फ़रवरी 2020

दीवारों पर लिक्खा है, 18 फ़रवरी 2020