ऐसे गौभक्त कोरोना वायरस से अधिक खतरनाक हैं...
संपादकीय
04 मार्च 2020

दुनिया के दर्जनों देशों में जिस रफ्तार से कोरोना वायरस फैल रहा है, वह भयानक नजारा है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में जिम्मेदार ओहदों पर काबिज लोग जिस तरह से अज्ञान फैलाकर लोगों को अंधविश्वासी बना रहे हैं, वह और भी भयानक है। वैज्ञानिक सोच-समझ वाले लोग इस बात का अंदाज लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान में अगर कोरोना फैला, तो वह अपनी पूरी ताकत से जितने लोगों को मार सकेगा, उससे अधिक लोगों को अंधविश्वास मार डालेगा कि गोबर और गोमूत्र से लोग इस वायरस से बच जाएंगे। जिन लोगों की धार्मिक आस्था के चलते उन्हें गाय एक पवित्र पशु लगती है, उन्हें अपनी इस सोच को फैलाने के पहले यह हलफनामा देना चाहिए कि वे किसी दूसरी पद्धति का कोई इलाज कभी नहीं करवाएंगे, और सिर्फ गोबर और गोमूत्र से अपनी सभी बीमारियों का इलाज करेंगे। ऐसे हलफनामे के बाद ही इन लोगों को यह नैतिक हक रहेगा कि वे अफवाह फैलाकर दूसरों को बरगला सकें, खतरे में डाल सकें।
आज चीन जैसा मजबूत सरकारी पकड़ वाला देश जिस मजबूती से कोरोना वायरस से निपट रहा है, हिन्दुस्तानी सरकार की क्षमता और समाज की जागरूकता उसका एक फीसदी भी नहीं कर सकते। यह तो गनीमत है कि चीन के पहले यह हमला हिन्दुस्तान पर नहीं हुआ, वरना यहां के अस्पतालों में ऐसी अराजकता फैली रहती, राजनीतिक दल प्रदर्शन करते रहते, अफसर दवाईयों की खरीद में भ्रष्टाचार के लिए ओवरटाईम करते रहते, और गौभक्त लोगों को बरगलाते रहते। यह तो ठीक हुआ कि कोरोना वायरस ने पहले दूसरे देशों पर हमला किया और हिन्दुस्तान के भीतर एक बहस की गुंजाइश खड़ी कर दी। एक तरफ तो प्रधानमंत्री कोरोना वायरस के चलते होली न मनाने का फैसला ले रहे हैं क्योंकि जहां भीड़ जुटेगी वहां इस वायरस के फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। दूसरी तरफ उन्हीं की पार्टी की एक विधायक विधानसभा के भीतर गोबर-गोमूत्र पद्धति का इलाज कर रही है, उसका दावा कर रही है। एक हिन्दू संगठन का कोई भगवाधारी गाय की इन दो चीजों का एक स्टॉल लगाकर इलाज या बचाव करने वाला है।
कोई जिम्मेदार लोकतंत्र होता तो वहां सरकारें खुद होकर इस किस्म के फैलाए जा रहे उच्च स्तरीय अंधविश्वास का विरोध करतीं, और जनता को जागरूक करने का काम करतीं। लेकिन आज गाय के नाम पर हर किस्म का फरेब फैलाना कुछ पार्टियों को चुनावी फायदे का दिख रहा है, और बाकी अधिकतर पार्टियों को ऐसे फरेब का पर्दाफाश करना चुनावी नुकसान का दिख रहा है। नतीजा यह है कि नेहरू के वक्त की वैज्ञानिक सोच को तबाह करके आज देश को एक धार्मिक और साम्प्रदायिक अंधविश्वास में डुबाया जा रहा है, जिसके चलते कोरोना का हमला अगर हुआ, तो वह बहुत तबाही फैलाएगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि धर्मान्धता और कट्टरता से जल रहे पाकिस्तान में आतंकियों ने बच्चों को पोलियो का टीका पिलाने वालों को गोलियां मारीं, और लोगों को कहा कि इस दवा में मुस्लिम नस्ल को खत्म करने के लिए चीजें मिली हुई हैं। नतीजा यह है कि आज दुनिया में जिन गिनी-चुनी जगहों पर पोलियो बाकी है, उनमें पाकिस्तान अव्वल हो गया है। धर्मान्धता और कट्टरता जब मिलकर विज्ञान का गला घोंटते हैं, तो उसके बचने की गुंजाइश कम हो जाती है। वह तो जवाहर लाल नेहरू थे जिन्होंने सारे धार्मिक पाखंडों को नकारते हुए देश में एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, बढ़ाई थी, और मजबूत की थी। उन्होंने ही इस देश में बड़े-बड़े वैज्ञानिक संस्थानों की स्थापना की थी, जिसकी वजह से आज दुनिया भर में हिन्दुस्तानी इंजीनियरों का बोलबाला है।
जहां कोरोना वायरस का खतरा एक बड़ी वैज्ञानिक और मेडिकल चुनौती रहनी चाहिए, जहां इससे बचने और जूझने की तैयारी में देश के बड़े-बड़े विशेषज्ञों को लगना चाहिए, वहां पर आज दुनिया के इस एक सबसे बड़े खतरे से जूझने का जिम्मा उस गाय को दे दिया जा रहा है जिसे उसके भक्तजन खाना नहीं देते, और वह घूरों पर प्लास्टिक की थैलियां खाकर जीने को मजबूर है। ऐसे अंधभक्तों से यह सवाल भी जायज होगा कि घास खाने वाली गाय के गोबर-गोमूत्र से ही कोरोना का इलाज होगा या फिर पॉलीथीन से भरे हुए पेट वाली गाय का गोबर-गोमूत्र भी हिन्दुस्तान को बचा लेगा? देश का यह सिलसिला इसलिए बहुत ही निराश करता है क्योंकि वैज्ञानिक सोच के कत्ल से निकला हुआ लहू उसकी लाश पर ही नहीं थमेगा, वह दूर तक रहेगा, और हिन्दुस्तानी आबादी को विज्ञान के पहले के जमाने में ले जाकर छोड़ेगा। कोरोना आज इस देश में छोटा खतरा है, ऐसे गौभक्त उससे अधिक खतरनाक वायरस हैं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
पांच सौ करोड़ की शादी से किसका नफा, किसका...
संपादकीय
03 मार्च 2020

कर्नाटक के एक भाजपा मंत्री की बेटी की शादी में चालीस एकड़ जमीन पर सजावट हो रही है, और पांच सौ करोड़ रुपये खर्च होने का अंदाज लगाया जा रहा है। इस जलसे की और भी बहुत सी जानकारी अलग-अलग खबरों में आ रही है, और उन सबकी लिस्ट गिनाए बिना भी हम अपनी बात सीधे आ सकते हैं।
न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि दक्षिण भारत में दूसरे राज्यों में भी इस किस्म की महंगी शादियों का चलन है। जनता के बीच से चुनकर आने वाले लोग सरकार में रहते हुए कब अरबपति और कब खरबपति हो जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता, और फिर वे अपनी दौलत से ऐसे बड़े निजी समारोह करते भी हैं। यह तो केंद्र सरकार के सोचने की बात है कि क्या इतना बड़ा खर्च पूरे का पूरा हिसाब-किताब में दिखाया जाता है, या फिर वह दो नंबर के पैसों से होता है? यह भी सत्तारूढ़ पार्टी के सोचने की बात है कि क्या सार्वजनिक जीवन के लोगों को इस किस्म का खर्च करना चाहिए जिसे आम लोगों की जुबान में आमतौर पर अश्लील और हिंसक भी कहा जाता है। जब हिंदुस्तान की जनता इतनी गरीब है, कुपोषण की शिकार है, गरीब बच्चे लाखों की संख्या में हर बरस बेमौत मर रहे हैं, तो क्या वैसे में ऐसा खर्च एक हिंसक फिजूलखर्ची है, या इससे कोई नुकसान नहीं है?
इस बात को समझने की जरूरत है कि इस शादी, या ऐसी और शादियां पर होने वाले सैकड़ों करोड़ के खर्च को अगर नहीं किया गया होता? तो क्या वह रकम देश के किसी बांध या पुल जैसे उत्पादक काम में लगी होती? या फिर वह रकम ऐसे ही किसी पूंजीनिवेश में चली जाती जिससे अर्थव्यवस्था में आगे और कुछ नहीं होता। जमीन, हीरे-जवाहरात, या विदेशी बैंकों में नामी-बेनामी रकम से देश की अर्थव्यवस्था का क्या भला हुआ होता? अभी जो पचास करोड़ या पांच सौ करोड़, जो कुछ भी इस शादी पर खर्च हो रहा है, उससे हजारों मजदूरों और कारीगरों का काम मिलेगा, खर्च का कम से कम एक हिस्सा तो अकाउंट में भी होगा, और उस पर सरकार को टैक्स मिलेगा। जब तक इस बात की गारंटी न हो कि ऐसा खर्च अगर न हुआ होता और वह रकम किसी उत्पादक काम में, या किसी समाजसेवा में खर्च हुई होती, तब तक तो ऐसी बचत भी किसी काम की नहीं हो सकती। जहां तक जनता के बीच से इतनी कमाई करके उसके बीच ऐसे हिंसक खर्च की बात है, तो यह समझना चाहिए कि भारत की राजनीति में अब संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है, और जनता की भावना की परवाह करना राजनीति में अब खत्म हो चुका है। इसलिए इस बात पर अधिक फिक्र करने से कुछ हासिल नहीं होना है कि जिंदगी में किफायत बरती जानी चाहिए। ऐसे किफायत तभी काम की है, जब उसका समाज के लिए कोई बेहतर इस्तेमाल किया जाना हो। फिलहाल तो यह मानना चाहिए कि अगर सचमुच ही इस शादी में पांच सौ करोड़ खर्च हो रहे हैं, तो पच्चीस-पचास करोड़ पर तो सरकार को कुछ टैक्स मिलेगा और बाकी खर्च से लोगों को मजदूरी मिलेगी, काम मिलेगा। यह देश इसी किस्म का है कि यहां संसद और विधानसभाओं के अहाते में गांधी की प्रतिमा बिठा दी जाए और उसके साथ ही सादगी और किफायत का जिम्मा उस प्रतिमा को दे दिया जाए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
दबाव में कोयले को हीरा बनते देखा था, अब हीरे को कोयला...
संपादकीय
02 मार्च 2020

दिल्ली में भाजपा की कुछ नेताओं के बयानों को नफरत की आग करार देते हुए उसके खिलाफ दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अभूतपूर्व और हैरान करने वाली बेबसी दिखाई है। मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबड़े ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट शांति चाहता है, लेकिन हिंसा पर काबू करने के इसके अधिकार सीमित हैं। उन्होंने कहा- हम ऐसी बातों को होने से रोकने की ताकत नहीं रखते हैं, हम इनसे तभी निपट सकते हैं जब ऐसी नौबत आकर जा चुकी रहती है। यह हम पर एक किस्म का दबाव है। हम इतना दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकते।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील का तर्क था कि दिल्ली हिंसा के शिकार लोगों की तरफ से हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी, वहां से पुलिस को नोटिस भी जारी हुआ था, लेकिन जज का तबादला हो गया, और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने केस को छह महीने आगे बढ़ा दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, और वहां मुख्य न्यायाधीश का यह रूख सामने आया।
सुप्रीम कोर्ट हर सुनवाई पर कोई फैसला नहीं देता है, कागजों पर हर बात को लिखकर दस्तखत नहीं करता है, लेकिन जजों की कही जुबानी बातों को भी देश और दुनिया गौर से देखते हैं। उनकी कही बातें फैसले से एक ही कदम पीछे रहती हैं, और उनका दिया हुआ फैसला कई मौकों पर मौजूदा कानून को खारिज करते हुए आता है, और उसके बाद यह संसद के पाले में पहुंची हुई गेंद बन जाता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को खारिज करने के लिए संसद संविधान संशोधन करे। हिन्दुस्तान में एक सबसे ताकतवर संस्था का मुखिया अपनी नाकतले, अपनी आंखों के सामने सत्ता की चप्पी के बीच, और सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के खुले भड़काऊ-हिंसक भाषणों, पुलिस के तमाशबीन-किरदर के देखते हुए चल रही ऐसी भयानक हिंसा पर अगर महज इतना ही कह और कर सकता है, और दबाव बर्दाश्त न कर पाने की बात कहता है, तो यह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र और जनता दोनों को पूरी तरह निराश करने वाली, और बेसहारा छोड़ देने वाली बात है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर इस देश ने ऐसे लोग देखे हैं जिन्होंने मौजूदा कानूनों को गलत मानकर उनके खिलाफ फैसले दिए थे, जिनको संसद के बाहुबल से ही पलटा जा सका था। आज यह सुप्रीम कोर्ट अपनी ही सहूलियत की बस्ती में किए जा रहे कत्लेआम पर मुंह भी न खोल पाने की बेबसी जाहिर कर रहा है, और सदमा पहुंचाने वाले उसके शब्द हैं कि वह तभी कुछ कर सकता है जब हिंसा हो चुकी रहेगी। साम्प्रदायिक हिंसा चाहने और बढ़ाने, कहने और करने वालों को इससे अधिक और चाहिए भी क्या? सुप्रीम कोर्ट जब दबाव न झेल पाने की बात कहता है, तो कोयले की खदानों के भीतर दबाव से हीरे में बदल जाने वाले कोयले की याद आती है। आज हिन्दुस्तान के सबसे बड़े अदालती हीरे एक औसत से सतही राजनीतिक-साम्प्रदायिक दबाव में कोयले में तब्दील हो रहे हैं। जाहिर है कि दिल्ली में हत्यारों और दंगाईयों के लिए आज न सिर्फ राहत का दिन है, बल्कि बड़ी खुशी का दिन भी है कि देश की सबसे बड़ी अदालत का सबसे बड़ा जज उनके दबाव को झेल नहीं पा रहा है, और लाशों के गिराए जाने के पहले तक हत्याओं को रोक पाने में अपनी बेबसी जाहिर कर रहा है।
हिन्दुस्तान दुनिया का एक बहुत बड़ा और ताकतवर लोकतंत्र माना जाता रहा है, और जाहिर है कि ऐसे देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले दुनिया के बाकी लोकतांत्रिक देशों में भी कानून पढ़ाने के दौरान चर्चा में आते होंगे, उन्हें कई जगहों पर किताबों में लिखा जाता होगा। अब हैरानी इस बात की है कि जिस कुर्सी से निकले हुए शब्द न महज हिन्दुस्तान में, बल्कि बाकी दुनिया में भी इतिहास में दर्ज होते हैं, वह कुर्सी अपनी एक ऐसी बेबसी का रोना रो रही है जो कि लोकतंत्र के भीतर कानून की एक मामूली समझ को भी गले नहीं उतरती है। कुल मिलाकर आज हिन्दुस्तान में हिंसा के मारे गए लोगों की बात सुनने के लिए, और मौतों को रोकने के लिए महज संसद-अहाते की गांधी प्रतिमा बची है जिसके सामने जाकर विपक्ष एक प्रतीकात्मक-प्रदर्शन कर सकता है, सुप्रीम कोर्ट तो एक प्रतीकात्मक बात कहने की हालत में भी नहीं दिख रहा है, क्योंकि वह और दबाव बर्दाश्त करने की हालत में अपने को नहीं पा रहा है। वैसे सुप्रीम कोर्ट से कौन यह पूछ सकता है कि यह किस दबाव की चर्चा हो रही है?
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
ऐसे हौसलामंद अफसरों को सलाम कि उन्होंने...
संपादकीय
01 मार्च 2020
दिल्ली में साम्प्रदायिक हमलों के शिकार बीएसएफ के एक मुस्लिम सिपाही के घर को जलाकर राख कर दिया गया, और वह सिपाही ओडिशा में तैनात था। बीएसएफ के एक डीआईजी अपने विभागीय सहयोगियों के साथ खाने-पीने का सामान लेकर उसके घर पहुंचे, उसके पिता से मिलकर दिलासा दिलाया, और उनकी तकलीफ बांटी। उन्हें यह खबर इस सिपाही से नहीं मिली थी, बल्कि अखबारी खबरों से मिली थी कि सिपाही के नाम की तख्ती के साथ बीएसएफ का जिक्र भी था, लेकिन हमलावरों ने उसके बावजूद वह घर जलाकर राख कर दिया था। डीआईजी पुष्पेन्द्र सिंह राठौर वहां बीएसएफ के इंजीनियरों के साथ पहुंचे थे, और उन्होंने अपने संगठन की ओर से इस मकान को बनवाने की घोषणा की, और परिवार को बीएसएफ कल्याण कोष से दस लाख रूपए की मदद देने की भी। उन्होंने इस मुस्लिम सिपाही का ओडिशा से दिल्ली तबादला करने की बात भी कही।
बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल। मोटेतौर पर इस सशस्त्र बल के जवान देश की सरहदों पर तैनात रहते हैं, या बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे पर भी वे जान खतरे में डालकर काम करते हैं। बीएसएफ का एक मुस्लिम जवान जब पाकिस्तान या बांग्लादेश की सरहद पर तैनात रहता है, तो उसे सरहद के पार मुस्लिम बहुतायत वाले देश दिखते हैं, और वहां से होने वाले किसी हमले, किसी घुसपैठ के खिलाफ वह खतरे झेलते खड़े रहता है। ऐसे वक्त उस सिपाही की दिमाग की बात सोचना मुश्किल है जब उसे यह खबर लगी होगी कि देश की राजधानी दिल्ली में उसके घर को आग लगा दी गई है, और मुस्लिम होने की वजह से उस इलाकों में बहुत से लोगों का कत्ल हुआ है, बहुत आगजनी हुई है, और लोगों को इलाका छोड़कर भागना पड़ा है। जिस वक्त यह सिपाही बीएसएफ में नौकरी पर पहुंचा होगा, और किसी सरहद पर तैनात हुआ होगा, या किसी दूसरे खतरनाक हथियारबंद मोर्चे पर रहा होगा, तो जाहिर है कि वह हिन्दू बहुतायत आबादी वाले इस देश की हिफाजत के लिए खतरे की एक नौकरी कर रहा था। अब अचानक इस हिन्दू बहुतायत आबादी के कुछ चुनिंदा साम्प्रदायिक-हिंसक मुजरिम मुस्लिमों को इस तरह से मार रहे थे, और केन्द्र सरकार, संसद, सर्वोच्च न्यायालय, मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग के इस मुख्यालय में तीन दिनों तक हिंसा चल रही थी जिसमें दिल्ली की पुलिस मौजूद रहते हुए भी गायब थी, तो उसके दिल पर क्या गुजरा होगा? सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी फौज के इतिहास के सबसे बहादुर शहीद कैप्टन हमीद की आत्मा पर क्या गुजर रही होगी जब वे यह देख रहे होंगे कि देश की राजधानी में मुस्लिमों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है? उन्होंने तो एक मुस्लिम देश के खिलाफ हिन्दुस्तान की फौज की तरफ से लड़ते हुए जान गंवाने की गारंटी वाली बहादुरी दिखाई थी, और शायद ऐसे किसी दिन की कल्पना नहीं की थी।
खैर, देश में आज जो लोग हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच एक गहरी खाई खोदने में ओवरटाईम कर रहे हैं, वे आज दिल्ली जला रहे हैं, और कल कोई और शहर जलाएंगे। ऐसे में अगर केन्द्र सरकार के एक अर्धसैनिक संगठन बीएसएफ ने ऐसी एक पहल करने का हौसला दिखाया है, तो उससे भी देश के बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए जो कि अधिकार तो रखते हैं, और केन्द्र सरकार के अधीन काम भी नहीं कर रहे हैं। उन्हें सोचना चाहिए कि वे अपने आसपास के लोगों की किस तरह, क्या मदद कर सकते हैं। देश में धर्म के नाम पर दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, आध्यात्मिक गुरूओं के नाम पर भी दान देने वाले करोड़ों लोग हैं, लेेकिन साम्प्रदायिक हिंसा में परिवार के लोगों को, घर-दुकान, कारोबार-रोजी गंवा देने वाले लोगों की मदद के लिए दान देने का एक शब्द भी अब तक हिन्दुस्तान में गूंजा नहीं है। और कोई सभ्य देश होता तो इस बात को दान भी नहीं कहा जाता, सहयोग कहा जाता, और उसके लिए कतार लग गई होती। आज महज दिल्ली की राज्य सरकार ने लोगों को मुआवजा देने की एक घोषणा की है, जिसके इश्तहार में शिनाख्त के कुछ कागज मांगे हैं। इसी धुआं उठती दिल्ली में आज भी दंगाई सोच वाले ऐसे नफरतजीवी मौजूद हैं जो कि इस इश्तहार की तस्वीर के साथ ट्वीट करके मुस्लिमों पर तंज कस रहे हैं कि उन्हें (नागरिकता) कागज नहीं दिखाने के अपने नारे, और अपने ऐलान पर कायम रहना चाहिए (ताकि वे मुआवजा न पा सकें)। सब कुछ जलाने और जान ले लेने के बाद भी जिनकी हवस पूरी नहीं हुई है, वे अब मुआवजा न लेने की चुनौती दे रहे हैं, जिससे कि उनकी खुद की सोच उजागर हो रही है।
इस देश में धर्म और जाति के आधार पर चुन-चुनकर भेदभाव, कत्ल और आगजनी का सिलसिला न किसी मुआवजे से पूरा होगा, न ही 25-50 बरस बाद अदालत से आए किसी फैसले से ही। ये जख्म पीढिय़ों तक रिसते रहेंगे जब बच्चों को मां-बाप और दादा-दादी से हिंसा की ये कहानियां सुनने मिलेंगी। साम्प्रदायिक आगजनी किसी हादसे की तरह नहीं होती हैं जो कि बीमे की रकम से उबर जाए। साम्प्रदायिक हत्या किसी सड़क-दुर्घटना मौत की तरह नहीं होती कि वह दर्द से उबर जाए। आज देश में ताकतवर तबकों ने मिलकर जो माहौल बनाया है, उसकी आग किस दिन उनके अपने घर तक, और उनके अपने घरवालों तक पहुंचेगी इसका अंदाज उन्हें नहीं लगेगा, और उन्हें वैसे किसी दिन बस उसकी खबर लगेगी। फिलहाल बीएसएफ के ऐसे हौसलामंद अफसरों को सलाम जिन्होंने अपने एक सिपाही के परिवार के साथ जाकर इस तरह की हमदर्दी दिखाई है, और दंगाईयों को नकार दिया है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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