हथियारबंद नक्सल मोर्चे से परे भी एक कोशिश की जरूरत है, उसे भी आजमाएं
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दो दिन पहले नक्सल हमले में बाईस सुरक्षाकर्मियों की शहादत के बाद आज केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बस्तर पहुंचे और शवों की घर रवानगी के पहले राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के साथ मिलकर श्रद्धांजलि दी। इसके बाद केंद्र और राज्य के बड़े सुरक्षा अफसरों की बैठक हुई और उससे निकलकर अमित शाह और भूपेश बघेल ने नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई को निर्णायक अंत तक ले जाने की घोषणा की। राजनीतिक रूप से परस्पर विरोधी इन दोनों नेताओं ने भी इस कठिन मौके पर एक-दूसरे के साथ पूरी तरह खड़े रहने की बातें कहीं। दोनों ही नेताओं ने नक्सलियों को बुरी तरह धिक्कारते हुए उनके खात्मे की बात दुहराई है।
जाहिर है कि केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों ने दो दिन पहले ही अपने बाईस साथियों को खोया है और बहुत से जख्मी साथी अस्पतालों में अभी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। ऐसे में अपने सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाने के अलावा नेता और कर भी क्या सकते हैं? और फिर यह जितनी बड़ी हिंसक घटना हुई है, लोकतंत्र को बचाने में लगे हुए सुरक्षा कर्मचारी जितनी बड़ी संख्या में मारे गए हैं, ऐसे में केंद्र और राज्य की यह जवाबदेही भी होती है कि नक्सलियों के खिलाफ हथियारबंद कार्रवाई की जाए। इसलिए यह मौका किसी और बात का रहता नहीं है, खासकर ऐसे में शांति सुझाना एक बहुत ही अलोकप्रिय बात होना तय है। फिर भी सरकारें अपना काम कर रही हैं, हम अपना काम कर रहे हैं।
आज बस्तर के इस मोर्चे पर एक और खबर आई है कि इस मुठभेड़ के बाद से लापता सीआरपीएफ का एक जवान नक्सलियों के कब्जे में है। ऐसा पता लगा है कि नक्सलियों ने ही पुलिस और मीडिया को फोन पर यह खबर दी है और इस जवान की जम्मू में रह रही पत्नी से भी फोन पर बात करके कोई नुकसान न करने का भरोसा दिलाया है। इसके पहले भी कुछ ऐसे मौके आए हैं जब कुछ छोटे पुलिस कर्मचारी नक्सलियों के कब्जे में पहुंच गए थे, और बाद में उन्हें रिहा किया गया। इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि बड़ा अफसर न होने पर भी इस जवान की रिहाई के लिए केंद्र और राज्य सरकार वही लचीलापन दिखाएंगी जो कि दस बरस पहले एक आईएएस के अपहरण के बाद दिखाया गया था, या जो कंधार विमान अपहरण के बाद तालिबानी आतंकियों को रिहा करके दिखाया गया था।
आज चूंकि नक्सली हथियारबंद होकर मोर्चे पर डटे हुए हैं, और वे सुरक्षाकर्मियों को मारने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं, इसलिए उन पर जवाबी हथियारबंद कार्रवाई न करने की कोई वजह नहीं है। केंद्र और राज्य के सुरक्षाबल अब मिलकर और अधिक ताकत से उन पर हमला बोलेंगे, ऐसे आसार हैं। लेकिन इस बीच इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान जैसे दुश्मन समझे जाने वाले देश के साथ भी अभी सरहद पर अमन कायम रखने का जो समझौता निचले फौजी स्तर पर हुआ है, उसके पीछे भारत और पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकारों के बीच मध्यस्थों के मार्फत लंबी बातचीत बताई जाती है। वैसे भी कूटनीति में या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परदे के पीछे की कोशिशें जब किसी कामयाबी तक पहुंचाने के करीब रहती हैं, तभी परदे के बाहर कैमरों के सामने औपचारिक बातचीत होती है। इसलिए नक्सलियों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई अपनी जगह चलती रहे, लेकिन परदे के पीछे ऐसी कोशिशें जरूर करनी चाहिए जो कि लोकतंत्र के हिमायती लोगों के बीच तो हो, लेकिन जिसमें ऐसे लोग भी शामिल हों जिन पर कि नक्सलियों का भी भरोसा हो। बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे पर जो भी कार्रवाई हो रही है, वह दोनों ही पक्ष रातों-रात तो बंद करने से रहे, लेकिन बस्तर से दूर किसी और शहर में बैठे विचारवान और विश्वसनीय लोग हिंसा को खत्म करने और लोकतंत्र को जीत दिलाने के लिए काम कर सकते हैं। ऐसी बातचीत के बिना मोर्चों पर छोटे सुरक्षा कर्मचारी उसी तरह शहीद होते रहेंगे जिस तरह शतरंज की बिसात पर प्यादे खत्म होते रहते हैं और वजीर पीछे बैठे नजारा देखते रहते हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और केंद्र या राज्य की सरकारों की कामयाबी हथियारबंद उग्रवादियों या आतंकवादियों को मारने में नहीं है, उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाने में है। हिंदुस्तान में कोई भी नेता नक्सलियों को पांच बरस भी मारते रहकर न तो उन्हें खत्म कर सकते हैं, और न ही खुद महानता का दर्जा पा सकते हैं। लेकिन अगर कोई नेता नक्सल हिंसा को ही खत्म करके नक्सलियों को लोकतंत्र में ला सकें, तो वह बहुत बड़ी ऐतिहासिक कामयाबी होगी। इसलिए हम बंदूकों के लिए कोई मनाही किए बिना भी लोकतांत्रिक ताकतों को लोकतांत्रिक समाधान तलाशने की एक नई पहल सुझाना चाहते हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि ऐसी कोशिश तेजी से कामयाब हो जाए, लेकिन तेजी से तो दसियों हजार सुरक्षा कर्मचारी मिलकर भी एक अकेले बस्तर से नक्सलियों को खत्म नहीं कर पा रहे हैं। नक्सलियों के साथ औपचारिक शांतिवार्ता की कोई जमीन अभी तैयार नहीं है, लेकिन यह लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकार का जिम्मा है कि अनौपचारिक बातचीत से ऐसी जमीन तैयार करे। और इस सिलसिले में कामयाबी मिले या न मिले, नक्सलियों के दिल-दिमाग की बात जानने वाले जो मध्यस्थ सरकार के प्रतिनिधियों के साथ बैठेंगे, वे कम से कम सरकारी-लोकतंत्र की खामियों पर तो चर्चा करेंगे ही, और उससे सरकार को अपनी व्यवस्था को सुधारने का एक मौका भी मिलेगा।
देश के आधा दर्जन राज्यों और केंद्र सरकार के सामने मनमोहन सिंह-सरकार के वक्त से ही माओवादी या नक्सली कही जाने वाली हिंसा देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बनी हुई है। इसे खत्म करने के लिए जिस तरह कई किस्म के सुरक्षा बल, कई किस्म के हथियार, और कई किस्म की रणनीति का इस्तेमाल पिछले कई दशकों से चले आ रहा है, वैसी ही एक अलग शांतिवार्ता की रणनीति हम सुझा रहे हैं, इस पर भी कोशिश करनी चाहिए।
नक्सल मोर्चे पर एक और बड़ी शहादत सरकारों से पूछती है एक अप्रिय सवाल
छत्तीसगढ़ के नक्सलग्रस्त बस्तर के बीजापुर जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर कल दोपहर नक्सलियों के हमले में 22-24 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए हैं। इनमें दो तिहाई राज्य पुलिस के बताए जा रहे हैं और एक तिहाई सीआरपीएफ के। इस इलाके में नक्सलियों की तलाश और मुठभेड़ में राज्य और केंद्र के सुरक्षा बल मिलकर काम करते हैं, और किसी नाकामयाबी की हालत में आम तौर पर दोनों ही एक-दूसरे से तोहमत से बचते हैं और जिम्मेदारी बंद कमरे की बैठक में तय होती है, और बाहर दोनों एकजुट नजर आने की कोशिश करते हैं। नक्सल मोर्चे पर यह हाल-फिलहाल में एक बड़ी शहादत है, और कुल एक या दो नक्सलियों की लाशें मिलने की सरकारी खबर से यह बात साफ होती है कि यह कोई मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि सुरक्षा बल नक्सलियों के बिछाए हुए किसी जाल में फंस गए थे, और उन पर दो-तीन तरफ से हुई गोलीबारी में दिन की रौशनी में भी वे कोई जवाबी कार्रवाई नहीं कर पाए और उनकी एकमुश्त शहादत हुई है। लेकिन यह कैसे हुआ इसकी बारीकियां आज यहां लिखने का मकसद नहीं है, मुद्दे की बात यह है कि चौथाई सदी से अधिक हो चुका है कि अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सबसे अधिक दूरी पर बसा हुआ बस्तर नक्सल प्रभावित चले आ रहा है, और मौतों के आंकड़ों में उतार-चढ़ाव से परे यह समस्या कभी खत्म नहीं हो पाई है। इसने भोपाल और रायपुर में बैठे कई मुख्यमंत्री देख लिए हंै, केंद्र में कई सरकारें देख ली हैं, लेकिन सुरक्षाकर्मियों को इस मोर्चे पर झोंकने से परे केंद्र और राज्य की कोई नीति अब तक सामने नहीं आई है। जब निर्वाचित-लोकतांत्रिक सरकारों के पास भी रणनीति ही अकेली नीति हो, तो फिर ऐसी जटिल हथियारबंद सामाजिक-राजनीतिक समस्या आखिर खत्म कैसे होगी?
जब कभी नक्सलियों से बातचीत की कोई सलाह दी जाए तो तुरंत ही सरकारों की तरफ से यह प्रतिक्रिया आती है कि नक्सलियों की कोई एक लीडरशिप, उनका कोई एक संगठन तो है नहीं, बात करें तो किससे करें? और फिर सत्तारूढ़ पार्टियां, सरकार, और नक्सल संगठन इनकी तरफ से तरह-तरह की शर्तें सामने आने लगती हैं कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं बशर्तें दूसरा पक्ष हथियार डाल दे, या नक्सल-इलाकों से सुरक्षाबलों को हटा लिया जाए। ऐसी शर्तों को खारिज करने से आगे बढक़र और कोई बात अभी तक हो नहीं पाई है, और अकेले बस्तर के नक्सल मोर्चे पर सैकड़ों जवान शहीद हो चुके हैं, ग्रामीण-आदिवासियों और नक्सलियों की मौतों को भी गिनें, तो कुल मिलाकर यह गिनती हजारों तक भी पहुंच सकती है।
नक्सलियों से बातचीत का कोई गंभीर और ईमानदार इरादा इस चौथाई सदी में हमें सुनाई भी नहीं पड़ा है। छत्तीसगढ़ में एक दशक से पहले बस्तर के एक कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था, और चूंकि वह बड़ा अफसर था, राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक खासे दबाव में थीं कि उसे रिहा कराया जाए। उसे छोडऩे के एवज में नक्सलियों ने कई मांगें रखी थीं, जिन पर गौर करने और चर्चा करने के लिए नक्सलियों और सरकार की आपसी और मिलीजुली पसंद के कुछ लोगों की एक कमेटी बनाई गई थी जिसकी सिफारिशों पर बस्तर की जेलों में सड़ रहे बहुत से बेकसूर लगने वाले आदिवासियों को छोड़ा भी गया था। बहुत से लोगों के खिलाफ मामले वापस लिए गए थे और वह नौजवान आईएएस कलेक्टर रिहा होकर लौटा था। लेकिन उस वक्त की छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार, और केंद्र की यूपीए सरकार ने बातचीत की इस अस्थाई मेज को स्थाई बनाकर बातचीत आगे बढ़ाने की कोई कोशिश नहीं की, और अखिल भारतीय सेवा के महज एक अफसर को बरी कराने के साथ ही यह संभावना भी खत्म कर दी।
नक्सलियों को गैरराजनीतिक मुजरिम करार देना इस मुद्दे का एक सरकारी-अतिसरलीकरण है। दुनिया का इतिहास है कि हथियारबंद राजनीतिक-आंदोलनों को कभी महज सरकारी हथियारों से खत्म नहीं किया जा सका है। हर कहीं बातचीत जरूरी साबित हुई है, और हिंदुस्तान में भी पंजाब के आतंकी दिनों से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्यों के बहुत से हथियारबंद आंदोलनों तक समाधान बातचीत से ही निकला है। हिंदुस्तान के बाहर भी इतिहास के सबसे लंबे, उत्तरी आयरलैंड के हथियारबंद और आतंकी आंदोलन का खात्मा बातचीत से ही हुआ था, और आखिरी दौर के समझौते के लिए उस वक्त के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उत्तरी आयरलैंड पहुंचकर मध्यस्थता की थी। छत्तीसगढ़ में एक अफसर की रिहाई के लिए ऐसी मध्यस्थता कायम होने के बाद भी उसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाने का मौका सरकारों ने गंवा दिया, और मौतें जारी हैं।
लोकतांत्रिक-निर्वाचित सरकारों की कामयाबी बंदूकों से नक्सलियों को मारने में नहीं है, अगर उन्हें पूरी तरह खत्म करना मुमकिन मान भी लिया जाए, तो भी। कामयाबी इसमें है कि देश के भीतर के किसी भी किस्म के हथियारबंद-आंदोलनकारियों को लोकतंत्र की मूलधारा में वापिस लाया जाए। कोई भी लोकतांत्रिक देश दूसरे देशों से भी बातचीत करके अमन कायम करने और मौतों को रोकने की कोशिश करते हैं। ऐसे में अपने देश के भीतर के असहमत लोगों को बातचीत के लिए तैयार करना निर्वाचित सरकारों की जिम्मेदारी है। नक्सली तो लोकतंत्र पर ही भरोसा नहीं करते हैं, सरकार और संविधान पर भरोसा नहीं करते हैं, इसलिए उनसे तो ऐसी पहल की उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन लोकतांत्रिक सरकार की यह बुनियादी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वह देश के भीतर के लोगों को बातचीत के लिए सहमत करे, और फिर कोई रास्ता निकाले। इस चौथाई सदी में एक भी सरकार ऐसा कोई ईमानदार कदम उठाते नहीं दिखी है, न छत्तीसगढ़ की, और न ही देश के बाकी आधा दर्जन नक्सल-प्रभावित राज्यों की, और न ही केंद्र में सत्ता संभालने वाले अलग-अलग गठबंधनों ने ऐसी कोशिश की है। यह सिलसिला फौजी-रणनीति या पुलिसिया नजरिए से तो ठीक है, लेकिन लोकतंत्र के नजरिए से यह नाकाफी है। इस देश को अपने छोटे सुरक्षाकर्मियों को इस तरह शहादत की तरफ धकेलना बंद करना चाहिए, और बातचीत की अधिक बड़ी चुनौती मंजूर करना चाहिए।
लॉकडाउन प्रशासन का हथियार तो है लेकिन नाकामयाबी का सुबूत भी
हिन्दुस्तान में सबसे तेज रफ्तार से जिन दो-चार राज्यों में कोरोना बढ़ रहा है, उनमें छत्तीसगढ़ एक है। आबादी के अनुपात में संक्रमण और मौत अगर देखें तो छत्तीसगढ़ देश के बहुत से दूसरे प्रदेश और महानगरों से भी आगे निकल गया है। और इसके बढऩे के रूकने का कोई ठिकाना नहीं दिख रहा है। पूरे देश में कोरोना पिछले पूरे एक बरस के सारे रिकॉर्ड को तोडऩे के करीब है, और एक दिन में कोरोना पॉजिटिव लोगों की बढ़ोत्तरी दो-चार दिनों में ही पिछले साल का रिकॉर्ड तोडऩे जा रही है। श्मशानों की तस्वीरें दिल दहलाने वाली हैं कि वहां पर चिता की राख ठंडी होने का वक्त भी नहीं मिल रहा है, और अगल-बगल दूसरी लाशें बिछा दी जा रही हैं। महाराष्ट्र के एक शहर की खबर है कि वहां कोरोना-मौतों में अंतिम संस्कार का जिम्मा परिवार का ही रहेगा, जबकि अब तक देश भर में परिवार को इससे दूर रखा जाता था, और पीपीई पोशाक पहने हुए कर्मचारी अंतिम संस्कार करते थे।
देश भर में तरह-तरह के लॉकडाउन, नाईट कफ्र्यू का वक्त आ गया है, और राज्य के शासन से लेकर जिलों के प्रशासन तक बंद और प्रतिबंध ही सबसे आसान औजार माने जाते हैं। छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने जिला प्रशासनों पर लॉकडाउन या नाईट कफ्र्यू का फैसला छोड़ा है, और एक-एक करके कई जिले इसकी घोषणा भी करते जा रहे हैं। लॉकडाउन से लोगों में बेकारी, और बेरोजगारी बड़े पैमाने पर शुरू हो जाएगी, और कारोबार-कारखाने बंद होने से रोजगार और मजदूरी करने वाले लोग बड़ी संख्या में बिना काम के रह जाएंगे। इसलिए लॉकडाउन की नौबत आए बिना अगर कोरोना संक्रमण के बढऩे पर रोक लगाने का कोई जरिया निकाला जा सकता है, तो प्रशासन की वह अधिक बड़ी कामयाबी होगी।
आज शहरी जिंदगी में जहां कोरोना संक्रमण बढऩे के खतरे सडक़ों पर दिखते हैं, वहां कोई कार्रवाई होते नहीं दिखती है। पुलिस को रिश्वत देकर जो ओवरलोड ऑटोरिक्शा चलते हैं, वे आज भी उसी तरह ओवरलोड चल रहे हैं, और इस खतरे को रोकना बहुत आसान हो सकता था, लेकिन पुलिस और प्रशासन की ऐसी कोई नीयत भी नहीं दिखती है। दूसरा एक खतरा सडक़ किनारे ऐसे खाने-पीने के ठेलों पर है जहां प्लेट-चम्मच या कप-ग्लास एक ही बाल्टी में बार-बार धोकर ग्राहकों को दिए जाते हैं। इन पर भी कोई कार्रवाई इतने महीनों में भी नहीं हुई, और अब आम हिन्दुस्तानी लोग कोरोना के खतरे से बेफिक्र हो चुके हैं, और ऐसी जगहों पर खाना-पीना बेबसी न होने पर भी वह धड़ल्ले से जारी है। बेघर लोग रोज का खाना बाहर खाने को तो बेबस हो सकते हैं, लेकिन स्वाद के लिए इस तरह खाना गैरजरूरी है, और लोगों को खतरे की समझ खत्म हो चुकी है।
प्रशासन के पास लॉकडाउन करने का अधिकार तो है, लेकिन यह तो एक आखिरी रास्ता रहता है जिससे अर्थव्यवस्था भी चौपट होती है, और गरीब सबसे अधिक बदहाल हो जाते हैं। इसलिए यह नौबत आने के पहले ही दूसरी तरकीबों से संक्रमण को रोकने की समझदारी अगर दिखाई जाती, तो वह एक कामयाब प्रशासन होता। लॉकडाउन जैसा प्रतिबंध लगाकर तो संक्रमण को रोकना एक भारी नुकसान वाला आसान रास्ता है, जिसमें प्रशासनिक-कामयाबी कुछ भी नहीं है।
पिछले कुछ बरसों में शहरों की सार्वजनिक जगहों पर, बगीचों में, तालाब किनारे, और फुटपाथों पर कसरत की बहुत सी मशीनें लगाई गई हैं जिनमें से हरेक का सैकड़ों लोग इस्तेमाल करते हैं। ये सारे लोग इन मशीनों के गिने-चुने हिस्सों को थामते हैं, और ये संक्रमण का एक बड़ा खतरा हो सकता है, लेकिन इन पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। छत्तीसगढ़ में तो जागरूक लोगों से लेकर सरकार तक सभी बहुतायत आबादी की गैरजिम्मेदारी देखकर हक्का-बक्का हैं कि इतनी मौतों के बाद भी लोग मास्क तक लगाने को तैयार नहीं हैं। यहां सडक़ों पर महिला कर्मचारियों के जत्थे लोगों की गाडिय़ों को घेर-घेरकर उन पर जुर्माना लगा रही हैं, उसकी तस्वीरें रोज छप रही हैं, फिर भी लोग सुधर नहीं रहे हैं। जिन दुकानों में रोज सैकड़ों ग्राहक पहुंच रहे हैं, वहां भी दुकानदार खुद मास्क लगाने को तैयार नहीं हैं। अब सवाल यह है कि इतने गैरजिम्मेदार और लापरवाह लोग बर्दाश्त क्यों किए जाएं? जब ये लोग दूसरे जिम्मेदार लोगों की जिंदगी पर खतरा बनकर खड़े हैं, तो इन पर मामूली जुर्माने से अधिक बड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाए? आज कोरोना के संक्रमण का खतरा इतना अधिक है कि किसी को जेल भेजने की सलाह देना गलत होगा, लेकिन कारोबार के आकार और लापरवाही का दर्जा देखकर इन पर इतना तगड़ा जुर्माना तो लगाना ही चाहिए कि और लोगों को सबक मिल सके।
महामारी से आबादी को बचाना आसान नहीं है, दसियों लाख सावधान लोगों के बीच अगर दसियों हजार लापरवाह हैं, तो वे बीमारी को फैलाने के लिए काफी हैं। इसलिए प्रशासन को लापरवाह लोगों पर बड़ी सख्ती बरतनी चाहिए, और ऐसी कड़ी कार्रवाई का प्रचार भी करना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ बड़ी बात यह है कि संक्रमण फैलने के खतरे वाले कारोबार, कार्यक्रम की शिनाख्त करके उन्हें तुरंत रोका जाना चाहिए। अगर बीच के कुछ महीनों में जब कोरोना का हमला कुछ कम था, उस वक्त कारोबार और कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने सावधानी बरती होती, तो ऐसी नौबत नहीं आई होती। दुनिया भर के चिकित्सा वैज्ञानिकों और महामारी के जानकारों का यह मानना है कि कोरोना का टीका लगाने की जरूरत हर बरस पड़ सकती है, और मास्क तो बरसों तक लगाना ही पड़ेगा, तो ऐसी नौबत में हर राज्य और जिले को सख्ती से सावधानी लागू करने का काम करना चाहिए। जिन लोगों को कोरोना से होने वाली मौतें अभी भी काफी नहीं लग रही हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि कोरोना से उबरने के बाद भी लोग बदन से हुए नुकसान से नहीं उबर सकते, और वे बाकी जिंदगी कई किस्म की दिक्कतें झेलते रहेंगे। लोगों के पास, लापरवाह लोगों के पास गैरजिम्मेदारी दिखाने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए, और उन पर सख्त कार्रवाई प्रशासन का जिम्मा है।
बलात्कारियों के पक्ष में तिरंगे झंडे, और शिकार लडक़ी की प्रताडऩा...!
मध्यप्रदेश दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के साथ बहुत ही परले दर्जे के जुल्मों के लिए हमेशा से जाना जाता है। सतना-रीवां से लेकर ग्वालियर तक का इलाका सामंती असर में जीता है, और कल के सामंत, आज के नेता, इनके जुल्मों में कोई बहुत फर्क आ गया हो, ऐसा भी नहीं दिखता है। अभी वहां 16 बरस की एक नाबालिग लडक़ी से एक बालिग ने बलात्कार किया तो गांव ने दोनों को बांधकर साथ-साथ परेड निकाली। जब इसका वीडियो चारों तरफ फैल गया, तब पुलिस के पास भी बलात्कार के इस आरोपी और परेड निकालने वाले पांच लोगों को गिरफ्तार करने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था। दिल दहलाने वाला यह वीडियो बताता है कि लोगों की भीड़ इन दोनों को बांधकर पीटते हुए इनका जुलूस निकाल रही थी, और भारत माता की जय के नारे लगा रही थी। अब जब चारों तरफ थू-थू होते कुछ दिन हो गए तो भारतीय बाल अधिकार संरक्षण परिषद ने मध्यप्रदेश के पुलिस प्रमुख से इस पर रिपोर्ट मांगी है।
यह घटना याद दिलाती है कि किस तरह कुछ बरस पहले जब जम्मू-कश्मीर एक राज्य था, और वहां पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार थी तब जम्मू में एक खानाबदोश मुस्लिम बच्ची से एक मंदिर में पुजारी समेत आधा-एक दर्जन लोगों ने बलात्कार करके उस बच्ची को मार डाला था, तो इनके नाम सामने आने पर इन्हें बचाने के लिए भाजपा नेताओं की अगुवाई में जम्मू में तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे। जम्मू हिन्दू बहुतायत वाला इलाका है, और वहां पर सिर्फ हिन्दुओं वाली इस बलात्कारी-टोली को बचाना एक बड़ा हिन्दूवादी मुद्दा बनाया गया था। और तो और इस मुस्लिम बच्ची की तरफ से जो हिन्दू महिला वकील खड़ी हुई थी, उसे भी हिन्दू संगठनों की ओर से तरह-तरह की धमकियां दी गई थीं, उसका सामाजिक बहिष्कार किया गया था।
किसी धर्म की महानता इस बात से तय नहीं होती कि उसकी किताबों में कैसी नसीहतें लिखी हुई हैं। यह तो उस धर्म को मानने वाले लोगों के चाल-चलन और बर्ताव से तय होने वाली बात रहती है। फिर अधिकतर धर्मों में धार्मिक किताबों से लेकर मानने वालों के चाल-चलन तक कुछ बुनियादी बेइंसाफी चली ही आती है। कहीं दलितों के खिलाफ, तो कहीं पति खो चुकी महिला के खिलाफ, तो कहीं किसी लांछन की शिकार महिला के खिलाफ, त्रेता और द्वापर युग से लेकर अब तक यह चले ही आ रहा है। और यह बात सिर्फ हिन्दू धर्म में है, ऐसा भी नहीं है। दूसरे भी बहुत सारे धर्मों में महिलाओं और दीगर कमजोर तबकों के खिलाफ बेइंसाफी की बातें भरी हुई हैं। नतीजा यह होता है कि जब मध्यप्रदेश में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर बारात के साथ निकलता है, तो उस पर गांव के सवर्ण पथराव करते हैं। शर्मिंदगी की ऐसी तस्वीरें भी मध्यप्रदेश से कई बार सामने आती हैं जब ऐसी बारात को सुरक्षा देते हुए साथ चलती पुलिस हेलमेट लगाकर पैदल चलती है, और दूल्हे को भी घोड़ी पर हेलमेट पहना दिया जाता है।
यह पूरा सिलसिला किसी धर्म, किसी देश, किसी प्रदेश, या किसी जाति के लोगों को शर्मिंदगी में डुबाने के लिए काफी होना चाहिए, लेकिन ये तमाम तबके ऐसे चिकने घड़े बन चुके हैं जिन पर शर्मिंदगी की एक बूंद भी नहीं टिक पाती, उसे छू भी नहीं पाती।
जब देश में एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए भडक़ाया और उकसाया जाता है, जब दूसरे धर्म का एक काल्पनिक खतरा सामने खड़ा किया जाता है, और फिर कुछ ऐसा ही एक जाति में दूसरी जाति के खिलाफ पैदा किया जाता है, ऊंची कही जाने वाली जातियों को यह खतरा दिखाया जाता है कि नीची कही जाने वाली जातियां एकजुट होकर एक दिन हमलावर हो जाएंगी, तो ऐसे में सदियों से चले आ रहा सामाजिक तनाव पिछली पौन सदी के लोकतंत्र को अनदेखा करके सडक़ों पर हिसाब चुकता करने में लग जाता है। आज यह सामाजिक तनाव बढ़ाते-बढ़ाते इस हद तक पहुंचा दिया गया है कि लोगों को अपनी जाति के बलात्कारी सुहाने लगे हैं, और दूसरी जाति की बलात्कार की शिकार लडक़ी भी सजा की हकदार लगने लगी है। यह सिलसिला देखकर किसी की लिखी यह लाईन याद आती है कि जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं?
दो राष्ट्रवाद लोगों के बीच एक अभिमान भरने वाला होना चाहिए, उसे अभिमान के लायक तो कुछ मिल नहीं रहा है, और शर्मिंदगी उसे होना बंद हो चुकी है। यह सिलसिला इस देश को टुकड़े-टुकड़े कर रहा है, लेकिन लोगों को ये दरारें अभी दिख नहीं रही हैं क्योंकि लोगों को अपने ही तबकों, अपनी बिरादरियों के भीतर मगन रहना सिखा दिया गया है। अपने तबके के बलात्कारियों को बचाने में जिस तबके को गौरव हासिल होता हो तो उस तबके के लोगों के धर्म और जाति अपनी इज्जत की फिक्र खुद कर लें।
तीर्थयात्रियों से अधिक कोरोना कर रहा है हरिद्वार कुंभ का इंतजार
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि हरिद्वार में होने जा रहे कुंभ मेले में आने वाली अपार भीड़ की कोरोना-जांच के लिए मेला स्थल पर हर दिन 50 हजार कोरोना जांच की जाए। अदालत ने इसके लिए पार्किंग और घाट के इलाकों में मोबाइल मेडिकल सुविधाओं सहित प्रशिक्षित मेडिकल टीम तैनात करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा दिए गए कोरोना-निर्देशों पर सख्ती से अमल किया जाए। यह आदेश ऐसे वक्त आया है जब आज पहली अप्रैल से हरिद्वार महाकुंभ की औपचारिक शुरूआत हो रही है, और 30 अप्रैल तक यह मेला चलेगा। इसमें दसियों लाख लोग पहुंचने वाले हैं, और राज्य सरकार का कहना है कि कोरोना से अधिक प्रभावित एक दर्जन राज्यों से आने वाले लोगों पर खास नजर रखी जाएगी। सरकार ने यह भी कहा है कि पहुंचने के पिछले 72 घंटों के भीतर ही आरटीपीसीआर निगेटिव रिपोर्ट और फिटनेस प्रमाणपत्र कुंभ मेले की वेबसाईट पर अपलोड करने के बाद उसकी रसीद दिखाने पर ही श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र में प्रवेश दिया जाएगा। जो लोग हरिद्वार जैसे नदी किनारे बसे हुए शहर से वाकिफ हैं वे समझ सकते हैं कि शहर की सरहद पर हर दिन पहुंचने वाले लाखों लोगों के कागजातों की इतनी जांच कैसे हो सकेगी, और कैसे हाईकोर्ट के हुक्म के मुताबिक रोज 50 हजार लोगों की आरटीपीसीआर जांच हो सकेगी।
अभी चार दिन पहले ही महाराष्ट्र के नांदेड़ में सिक्खों के एक बड़े महत्वपूर्ण माने जाने वाले गुरूद्वारे के बाहर पुलिस ने जब धार्मिक जुलूस निकालने से रोका, तो सैकड़ों सिक्खों की भीड़ ने पुलिस पर हमला कर दिया। इनमें से दर्जनों लोग तलवारें लेकर पुलिस पर टूट पड़े। इस हमले का वीडियो भी चारों तरफ फैला है। धक्का-मुक्की वाला ऐसा जुलूस, और धार्मिक लोगों का ऐसा हथियारबंद हमला झेलती हुई पुलिस न सिर्फ जख्म पा रही थी, बल्कि कोरोना का खतरा भी पा रही थी। ऐसी ही नौबत उत्तराखंड में आ सकती है जहां लाखों लोगों से हर दिन उनकी कोरोना रिपोर्ट इंटरनेट पर डालने की उम्मीद की जाएगी, और मोबाइल फोन पर उसकी रसीद दिखाने की भी। ऐसी अपार धार्मिक भीड़ से अदालत और सरकार किस किस्म के अनुशासित होने की उम्मीद कर सकती है? और सवाल यह भी उठता है कि जब पिछले एक बरस में महीनों तक इस देश में तमाम ईश्वरों के दरवाजे बंद देखे हैं जिन्हें खोलने के लिए ईश्वरों ने भी अपनी दैवीय ताकत या करिश्मे का कोई इस्तेमाल नहीं किया, तो आज दुनिया के एक सबसे बड़े धार्मिक आयोजन, कुंभ की इस जानलेवा धक्का-मुक्की वाली भीड़ को कोरोना के खतरे से कोई कैसे बचा सकेंगे? अगर लोगों को अपनी धार्मिक भावनाओं को पूरा करते हुए यह याद नहीं पड़ रहा है कि आज हिन्दुस्तान में कोरोना का खतरा कितना गंभीर है, तो उन्हें यह याद दिलाना जरूरी है। पिछले बरस जब कोरोना इस देश में सबसे खतरनाक हाल पैदा कर चुका था, तब हर दिन हिन्दुस्तान में एक लाख से कुछ कम लोग कोरोना पॉजिटिव मिल रहे थे। वह नौबत कई महीनों के कोरोना-संक्रमण के बाद आई थी। लेकिन अभी हाल के कुछ हफ्तों में कोरोना पॉजिटिव तेजी से छलांग लगाकर अब कल एक दिन में 72 हजार पार कर चुकी है और कल के एक दिन में 459 कोरोना मौतें हुई हैं। जो कि पिछले बरस के सर्वाधिक आंकड़ों से अधिक पीछे नहीं है। ऐसे में हिन्दुओं का एक बहुत बड़ा मेला जिसमें एक महीने में दसियों लाख लोग पहुंचेंगे, वह किसका भला करने जा रहा है? अगर देश के हालात और अधिक बिगड़े तो महाराष्ट्र की तरह दूसरे राज्य भी ईश्वरों को बचाने के लिए धर्मस्थलों को बंद कर देंगे, लेकिन इंसान कहां जाएंगे? नांदेड़ में चार सौ लोगों की भीड़ जब सैकड़ों पुलिसवालों पर टूट पड़ी तो उसने कई पुलिसवालों को बुरी तरह जख्मी कर दिया। अब कुंभ में धर्मालु भीड़ अगर किसी वजह से हिंसक या बेकाबू हुई तो किस धर्म के लोगों का सबसे अधिक नुकसान होगा? कुंभ से लौटकर आने वाले श्रद्धालु जाहिर तौर पर अपने हिन्दू परिवारों में ही लौटेंगे, और अगर वे संक्रमण लेकर आते हैं तो देश के हिन्दुओं को ही कोरोना का प्रसाद देंगे। ऐसे में कोरोना के इस खतरनाक और जानलेवा दौर में जिस धर्म के लोग इकट्ठा हो रहे हैं उसी धर्म का सबसे बड़ा नुकसान है। उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने औपचारिक रूप से यह कहा है कि पूरे कुंभ के दौर में हरिद्वार में देश-विदेश के श्रद्धालु रहेंगे, और कोरोना संक्रमण का खतरा बने रहेगा। तमाम सावधानी के बावजूद वहां के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और उनकी पत्नी दोनों कोरोना पॉजिटिव हैं, पूर्व सीएम और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भी कोरोना पॉजिटिव हैं। महामारी के इस भयानक दौर में इस धार्मिक आयोजन पर अड़े रहना राज्य सरकार के लिए, बाकी देश के लिए जितना भी बड़ा खतरा है, उससे कहीं अधिक बड़ा खतरा वह इस धर्म के लोगों और उनके परिवारों के लिए है।
लोगों को याद होगा कि पिछले बरस इन्हीं दिनों में दिल्ली में तब्लीगी जमात के कुछ हजार लोगों के बीच से कोरोना देश भर में फैलने को लेकर दिल्ली की सरकारों ने कुछ इस किस्म का हंगामा खड़ा किया था कि उस पर देश की कई अदालतों ने बहुत बुरी नाराजगी जाहिर की है, और सरकार और मीडिया की कड़ी आलोचना भी की है। अब कुछ हजार लोगों के एक धार्मिक आयोजन से तो दसियों लाख लोगों के गंगा स्नान वाले कुंभ की कोई तुलना भी नहीं की जा सकती। उस वक्त अगर लौटे हुए तब्लीगी जमातियों से कोरोना फैला था, तो अब दसियों लाख हिन्दुओं के कुंभ-स्नान से लौटने के बाद क्या वैसा कोई खतरा नहीं हो सकता? देश में धार्मिक भावनाएं उबाल पर हैं, और हिन्दुस्तानियों की सोच में जितनी कुछ भी वैज्ञानिक सोच आधी सदी में विकसित हो पाई थी, उसे धर्मान्धता की धार मार-मारकर धो दिया गया है। कुंभ का जितना इंतजार तीर्थयात्री नहीं कर रहे हैं, उनका ईश्वर नहीं कर रहा है, कुंभ का उतना इंतजार कोरोना कर रहा है।




