हिंदुस्तानी शासन की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाले अफसरों की अभूतपूर्व नाकामयाबी

  हिंदुस्तान भी बड़ा अजीब देश है। यहां से आईआईएम से निकले हुए नौजवान दुनिया भर की बड़ी-बड़ी कंपनियां चला रहे हैं, यहां के आईआईटी से निकले हुए इंजीनियर दुनिया भर में तकनीक विकसित कर रहे हैं, लेकिन जब देश के भीतर पिछले एक बरस से छाए हुए कोरोना वायरस के खतरे से जूझने की बात आई, तो ऐसे तमाम मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग के जानकार लोगों का हुनर धरे रह गया क्योंकि भारत सरकार ने शायद ऐसे हुनर को छुआ भी नहीं। नतीजा यह निकला कि आज देश में कोरोना से मौतों का जो सिलसिला चल रहा है, न तो उसे रोका जा सक रहा है, और ना ही मौतों के बाद लोगों को एक इज्जत का अंतिम संस्कार नसीब हो रहा है। 

 कहने के लिए तो इस देश में आपदा प्रबंधन की योजनाएं दिल्ली से निकलकर जिलों तक पहुंचती हैं, और बाढ़ के महीनों में लोगों को बचाने के लिए रबर की बोट तक पहले से खरीदकर रख ली जाती है। लेकिन जिस कोरोना का प्रकोप साल भर पहले शुरू हो चुका है, उस कोरोना से जूझने के लिए इस देश ने इस साल में कोई योजना बनाई हो ऐसा दिख नहीं रहा है। जिस देश में केंद्र सरकार चला रही पार्टी आधा दर्जन प्रदेशों में चुनाव लडऩे की अभूतपूर्व तैयारी कर सकती है, देश के साथ-साथ विदेश तक जाकर प्रचार कर सकती है, तो क्या उस पार्टी की सरकार केंद्र सरकार की सारी ताकत रखते हुए भी हिंदुस्तान के नक्शे को देखकर कोरोना के आज के हाल का अंदाज नहीं लगा सकती थी? क्या वह राज्यों को इस हिसाब से तैयार नहीं कर सकती थी? लेकिन यह सवाल तब अप्रासंगिक हो जाते हैं जब केंद्र सरकार चला रही पार्टी इतनी गैरजिम्मेदारी के साथ चुनावी राज्यों में चुनाव प्रचार करने में लगी है, और करोड़ों लोगों के भीड़ वाले कुंभ को इजाजत दे रही है। यह पूरा सिलसिला इस देश में राजनीतिक मनमानी के सामने सरकारी ढांचे के दंडवत हो जाने का है और ऐसा लगता है कि इस लोकतंत्र में बहुमत से बनी हुई सरकार की राजनीतिक मनमानी सबसे ऊपर है,  और शासकीय तंत्र उसके सामने बेबस रह गया है.

बहुत मामूली समझ रखने वाले नौकरशाह भी यह तैयारी कर सकते थे कि कोरोना की पहली लहर के बाद और दूसरी लहर के पहले, किन-किन राज्यों में तैयारियां कैसी हैं, और जहां पर तैयारियों में कमी है वहां पर क्या किया जाना है। वैसे तो एक तरफ महामारी एक्ट के तहत देश के सारे अधिकार अपने हाथों में लेकर केंद्र सरकार ने राज्यों को पिछले बरस के लॉकडाउन के दौरान घंटे-घंटे में हुक्म भेजे, और क्या खुला रहेगा क्या बंद रहेगा, इन नियमों को राज्यों पर लादा। राज्यों से हर घंटे में जवाब मांगे, जानकारी मांगी, उन्हें नोटिस दिए। लेकिन किस राज्य में कोरोना की दूसरी लहर कहां तक पहुंच सकती है उसमें कितने लोग बीमार हो सकते हैं,  कितने को ऑक्सीजन लग सकती है, और कितने को वेंटिलेटर लगेंगे, इसका कोई अंदाज भी शायद लगाया नहीं गया। ना तो केंद्र सरकार ने यह अंदाज लगाया, और ना ही महाराष्ट्र जैसे संपन्न और विकसित राज्य से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे नए और छोटे राज्य तक किसी भी राज्य में कोरोना की इस दूसरी लहर से निपटने की तैयारी नहीं की। 

नतीजा यह है कि आज बीमार को अस्पताल का बिस्तर नसीब नहीं है, जिसे बिस्तर मिल गया उसे ऑक्सीजन नहीं है, और जिसे ऑक्सीजन के बाद भी बचाया नहीं जा सका उसके अंतिम संस्कार के लिए मरघट में भी जगह नहीं है। ना दवाई है, न ऑक्सीजन है, न वेंटीलेटर हैं, और ना ही एंबुलेंस है। कुल मिलाकर तस्वीर ऐसी है कि कोरोना की पहली लहर के बाद से कोरोना की दूसरी लहर के बीच इस देश और इसके प्रदेशों ने कुछ भी नहीं सीखा। जब कोरोना का दूसरा वार हुआ तो घुटनों पर लगी चोट से बिलबिलाने के अंदाज में सरकारों ने आनन-फानन घटिया, कामचलाऊ इंतजाम किए जो कि नाकाफी तो थे ही, जो जनता के पैसों की बर्बादी भी थे, और इंसानी जिंदगी की बर्बादी तो सबसे ऊपर है ही। आज देश के अधिकतर प्रदेशों का हाल देखें तो केंद्र और राज्य सरकारों ने निजी अस्पतालों को लेकर, कोरोना की जांच से लेकर, वेंटिलेटर तक, किसी इंतजाम को खुद परखा नहीं है। सरकार ने अपने खुद के मरघटों की क्षमता को भी नहीं परखा और अब बदहवास के अंदाज में रातों-रात कहीं भी अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है। यह पूरा सिलसिला बतलाता है कि सरकारों की प्राथमिकताएं महज राजनीतिक रहीं, चुनावी रहीं, आत्मरक्षा की रहीं, जीत की महत्वाकांक्षा की रहीं, लेकिन कोरोना के, सामने खड़े हुए दूसरे दौर से लडऩे की तैयारी की बिल्कुल नहीं रही। आज की यह पूरी नौबत भारत और इसके प्रदेशों की सरकारों की नाकामयाबी की है, और इनसे यह भी पता लगता है कि सरकारों में स्थाई रूप से बसे हुए अफसरों में से अधिक की यह क्षमता नहीं रह गई है कि वह देश-प्रदेश के राजनेताओं की मनमानी को ना कह सके। राष्ट्रीय स्तर पर जो चुने जाने वाले अफसर हैं, उनके बीच 5 बरस के राजनीतिक मुखियाओं की यह दहशत अभूतपूर्व है। किसने यह सोचा था कि अंग्रेजों के वक्त से एक कड़ी शासन व्यवस्था चलाने के लिए नौकरशाही का जो ढांचा खड़ा किया गया था, वह नेताओं के सामने इस तरह दंडवत पड़े रहेगा?

आज हिंदुस्तान के प्रदेशों की शासन की क्षमता को देखें तो यह साफ दिखता है कि क्षमता तो बहुत है, लेकिन उसके इस्तेमाल की कोई तैयारी नहीं थी। जिन अफसरों पर 5 बरस की सरकारों के पहले और बाद भी, सरकार की जिम्मेदारी रहती है, उन्होंने वक्त पर अपना काम नहीं किया, वक्त पर तैयारी नहीं की, ऑक्सीजन की जरूरत का हिसाब नहीं लगाया, अस्पतालों के बिस्तर तैयार नहीं किए, जांच का इंतजाम नहीं किया, टीकों का इंतजाम नहीं किया, और अंतिम संस्कार का इंतजाम भी नहीं किया। राजनीतिक मुखिया तो अपने अच्छे और बुरे कामों से 5 बरस बाद अपनी पार्टी सहित बाहर जा सकते हैं, लेकिन जो अफसर अपनी पूरी कामकाजी जिंदगी के लिए ऊंचे ओहदों पर आते हैं, उन अफसरों ने इस देश में अपने-आपको पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है। 

नेताओं से तो बहुत अच्छी नीयत की उम्मीद नहीं की जाती, लेकिन जिन अफसरों पर नेहरू और पटेल के वक्त से जिम्मा डाला गया था, उन अफसरों ने अपने-आपको राजनीतिक मनमानी के सामने रबड़ का बबुआ साबित किया है। ऐसा लगता है कि भारत और उसके प्रदेशों की प्रशासनिक व्यवस्था में अपने ही देश के आईआईएम और आईआईटी की विशेषज्ञता को लेकर न सम्मान हैं और न भरोसा। इन संस्थानों से निकले हुए लोग दुनिया भर में बड़े-बड़े कारोबार चला रहे हैं, बड़ी-बड़ी जगहों पर गैर सरकारी काम भी कर रहे हैं और सरकारी काम भी, लेकिन प्रशासन की ताकत अफसरों को इतना बददिमाग कर देती है कि वे हर मामले में अपने-आपको जानकार और विशेषज्ञ मान लेते हैं, और असल जिंदगी की जो असल विशेषज्ञता रहती है उसके लिए इनके मन में एक आला दर्जे की हिकारत बैठी रहती है। यह नौबत कोरोना से निपट जाने के बाद यह सोचने की है कि इस देश की शासन प्रणाली में बड़े अफसरों की कौन सी भूमिका आगे काम में ली जानी चाहिए।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 अप्रैल 2021

 


एक बहुत बड़ी मुसीबत, एक बहुत ताकतवर फण्ड से जुड़े हुए खतरे भी देखें

  जब कोई प्राकृतिक विपदा बहुत लंबी खिंचती है, जैसे कि आज की कोरोना की महामारी चल ही रही है, चलती ही जा रही है, तो ऐसे में जिंदगी के बाकी दायरों के जरूरी काम बहुत बुरी तरह बिछड़ जाते हैं। लोगों की जिंदगी में किसी भी तरह की परेशानी में दूसरों की मदद करने की क्षमता की एक सीमा रहती है, दानदाताओं की सीमा रहती है, बड़ी-बड़ी कंपनियों के भी समाजसेवा के बजट सीमित रहते हैं। जिस बरस ओडिशा में बड़ा तूफान आया, और बड़ी संख्या में मौतें हुईं, उस बरस देश के बाकी बहुत से जरूरी कामों के लिए दान ही नहीं मिला। अब जो लोग समाज से दान मिलने की उम्मीद में अनाथाश्रम या वृद्धाश्रम शुरू कर लेते हैं, उन्हें तो ऐसा अंदाज नहीं रहता कि किसी एक बरस उन्हें मिलने वाला दान तूफानपीड़ितों के लिए चले जाएगा या कि कोरोनाग्रस्त लोगों के लिए बनने वाले अस्थाई अस्पतालों के लिए चले जाएगा। दुनिया में बहुत किस्म के मदद के कार्यक्रम चलते हैं, और जब ऐसी कोई विकराल परेशानी आती है, तो बाकी सबके भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

समाज की मदद करने की एक सीमा रहती है, और वह मदद उस वक्त के, या कि उस बरस के, सबसे अधिक मानवीय लगने वाले मुद्दे की तरफ मुड़ जाती है, तो जरूरत के जो बाकी रास्ते रहते हैं उनके किनारे खड़े हुए जरूरतमंद लोग देखते रह जाते हैं, लेकिन मदद किसी एक तरफ जब मुड़ती है तो पूरी तरह मुड़ जाती है। जिन लोगों को उड़ीसा के समुद्री तूफान जैसी प्राकृतिक विपदा का तजुर्बा है वे जानते हैं कि एयरपोर्ट से निकलने के बाद तूफानग्रस्त इलाकों तक पहुंचने के रास्ते में बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन सबसे पहले अपने नाम और निशान वाले तंबू लगाना चाहते थे ताकि वहां पहुंचने वाले मीडिया और बाकी लोगों को सबसे पहले यह दिखे कि वे वहां पर काम कर रहे हैं। यह संगठन बहुत ही ईमानदार नीयत से काम करते हो सकते हैं, लेकिन उनके सामने सबसे पहले अपने खुद के अस्तित्व का सवाल रहता है। अगर उन्हें ही दान नहीं मिलेगा, तो वे आगे किसकी मदद कर पाएंगे? और फिर ऐसे बहुत से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठनों का ऑडिट बताता है कि कई संगठन तो उन्हें मिलने वाले दान का आधा हिस्सा तक अपने पर खर्च कर देते हैं। ऐसे संगठनों के लिए कुछ जानकार लोग तंज कसते हुए यह भी कहते हैं कि दूसरों के दर्द में इनकी दवा है, दूसरों के भूखों मरने में इनका पेट भरता है। यह देखने का एक नजरिया जरूर हो सकता है लेकिन यह बात पूरी तरह सच भी नहीं है।

किसी देश या पूरी दुनिया में जरूरत के जितने प्रोजेक्ट चलते हैं, उनमें से अधिकतर बिना मदद के एक बरस भी नहीं गुजार सकते, और लोगों की हमदर्दी अगर किसी एक तरफ पूरी तरह मुड़ गई, तो बाकी प्रोजेक्ट बंद होने के कगार पर आ जाते हैं। ऐसे में ही अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और सरकारों की जरूरत पड़ती है, ऐसे में ही संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था की जरूरत पड़ती है जो कि एक व्यापक नजरिए से ऐसे प्रोजेक्ट बचा सके। ऐसे प्रोजेक्ट बच्चों के हो सकते हैं, बीमारों और बूढ़ों के हो सकते हैं, बेघरों के हो सकते हैं, कुदरत और पशु पक्षियों के हो सकते हैं, और हो सकता है कि किसी लोक कला को या लोक भाषा को बचाए रखने के, संरक्षण वाले ऐसे प्रोजेक्ट हों जो कि कोरोना से हो रही मौतों के बीच में गैरजरूरी लगें लेकिन जब दुनिया की लंबी जिंदगी को देखते हैं, तो ऐसे कई मुद्दे जरूरी लगते हैं जिनका बंद होना एक संभावना के खत्म होने सरीखा हो जाएगा।

देश-प्रदेश की सरकारों को यह भी देखना चाहिए कि उनकी तात्कालिक प्राथमिकता ऐसी ना हो जो कि दूसरे तमाम दीर्घकालीन महत्व के मुद्दों को कुचल कर रख दे। जब शासन से लेकर प्रशासन तक की प्राथमिकता किसी एक जलते हुए मुद्दे से निपटना हो, तो ऐसा कई बार होता है। पिछले बरस कोरोना के बीच जब प्रधानमंत्री राहत कोष से परे एक रहस्य में फंड पीएम केयर्स के नाम से बनाया गया, और उसे किसी भी जवाबदेही से मुक्त रखा गया, और उसे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और साख से जोड़कर पेश किया गया. भारत सरकार की नवरत्न कंपनियों से लेकर देश की बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों तक ने अपने साल भर के अधिकतर सीएसआर फंड इसी एक कोष में दे दिए। नतीजा यह हुआ कि इन कंपनियों से देशभर के दूसरे बहुत से समाजसेवी कामों के लिए जो मदद मिलती थी वह सिमट गई, और आज जब देश भर में मदद की जरूरत है करोना से बचाव के लिए भी पीएम केयर्स के उस फंड का क्या इस्तेमाल हो रहा है, लोगों की जानकारी में नहीं है। कुल मिलाकर देश की मदद करने की सारी निजी और सरकारी क्षमता का ऐसा केंद्रीकरण भी नहीं करना चाहिए जिससे मदद के हकदार दूसरे तमाम दायरे भूखे ही मर जाएं।

(Daily chhatisgarh)

कोरोना के बीच, और कोरोना से परे ऐसी मुसीबत की भी सोचें....

  कोरोना को देखकर यह लगता है कि हिंदुस्तान अभी एक ऐसी मंझधार में फंसा हुआ है जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। बीमारी और बंद का यह दौर जब तक चलेगा, तब तक लोगों का रोजगार खत्म रहेगा, और कोरोना पहले खत्म होगा या लोग पहले खत्म होंगे, इनमें से किसी भी बात का कोई ठिकाना नहीं है। ऐसे में ना तो वैक्सीन के असर का कोई अंदाज लग रहा है, न ही यह समझ पड़ रहा है कि वैक्सीन कब तक हासिल होगी, और फिर उसे रिपीट कब करना होगा। एक अंदाज यह भी है कि यह वैक्सीन हर बरस लगवानी होगी, तब तक, जब तक कि कोरोना वायरस पूरी तरह से चल ना बसे।

लेकिन जिन लोगों को कोरोना के मौजूदा खतरे का अंत दिख रहा है उन्हें यह भी सोचने की जरूरत है कि कोरोना वायरस से अधिक बुरी, अधिक जानलेवा कोई बीमारी भी आ सकती है, और बीमारियों से परे की भी कोई मुसीबत आ सकती है। पिछले बरस जब कोरोनावायरस, और लॉकडाउन की मुसीबत चल रही थी उस वक्त भी हमने इसी जगह पर यह लिखा था कि जैसा वायरस आज इंसानी देह को खत्म करने के लिए आया हुआ है, वैसा ही जानलेवा वायरस कंप्यूटरों के लिए भी आ सकता है। और सच तो यह है कि दुनिया के बहुत से देशों के पास आज ऐसे साइबर अटैक की ताकत है, जिसके मुकाबले हिंदुस्तान जैसे देश अपने को बचाने में शायद बहुत मजबूत साबित नहीं होंगे। वैसे भी आज दुनिया के कुछ सबसे बड़े कंप्यूटर कारोबार पर जिस तरह के साइबर अटैक हो रहे हैं, और एक-एक बार में दसियों लाख लोगों की जानकारियां लूट ली जा रही हैं, उसे देखते हुए भारत जैसे कंप्यूटर मामलों के लापरवाह देश की नाजुक हालत का अंदाज लगाया जा सकता है। अभी कुछ महीने पहले ही यह खबर आई थी कि आंध्र और तेलंगाना के बिजलीघरों की कंप्यूटर प्रणाली पर दूसरे किसी देश से साइबर अटैक की, साइबर घुसपैठ की शिनाख्त हुई है, और उस सिलसिले में चीन का नाम लिया गया था। चीन आज दुनिया की बिरादरी में एक शैतान बच्चे की तरह मान लिया गया है कि कहीं कुछ गलत हो रहा है तो उसमें चीन का हाथ जरूर होगा। 

दूसरी तरफ अमेरिका में अगर चुनाव को प्रभावित करने की विदेशी घुसपैठ हो हो रही है तो उसके रूसी अधिक होने का खतरा है। फिर हॉलीवुड की फिल्मों में परमाणु हथियारों के साथ अगर कोई साजिश होती है तो उसके पीछे कोई महत्वोन्मादी खरबपति कारोबारी होता है जिसे कि पूरी दुनिया पर काबू करने की हसरत रहती है। अगर कोई गिरोह ऐसा करता है तो वह तो वह साइबर घुसपैठ की ताकत भी रख सकता है, परमाणु हथियार भी रख सकता है और किसी देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम तक भी पहुंच रख सकता है। अगर पाकिस्तान की जमीन से ऐसी साजिश की कल्पना की जाती है, तो उसके पीछे वहां के धर्मांध आतंकियों का हाथ माना जाता है। अब सवाल यह है कि जब दुनिया में इतने किस्म की साजिशें हो सकती हैं, हो रही है, और लगातार साइबर घुसपैठ भी बैंकों को लूट रही है, तो ऐसे में हिंदुस्तान कब तक महफूज रहने जा रहा है? 

यह समझने की जरूरत है कि आज कोरोना के बीच इस देश के नेताओं की मेहरबानी से इस देश का जो हाल हुआ है, वही हाल कोई कंप्यूटर वायरस, या हमला, किसी देश की सार्वजनिक व्यवस्थाओं से जुड़े कंप्यूटरों का क्यों नहीं कर सकता? जिस तरह आज इस देश में कोरोनावायरस आया, अमेरिकी राष्ट्रपति के विमान पर चढ़कर आया, और हिंदुस्तान में राजकीय अतिथि बनकर आया, कोई ऐसी नौबत दूर नहीं है कि ऐसा कोई कंप्यूटर वायरस फिर किसी रास्ते से सरकार की बेखबरी से हिंदुस्तान में आ जाए और तबाही मचा दे। एक ऐसी नौबत की कल्पना सबको जरूर करनी चाहिए जिसमें बैंकों के कंप्यूटर ध्वस्त हो जाएं, नतीजतन एटीएम बंद हो जाए, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल बंद हो जाए, ट्रेन और प्लेन के रिजर्वेशन खत्म हो जाएं, आधार कार्ड से जुड़ी तमाम जानकारियां खत्म हो जाएं, बिजलीघरों का पूरा इंतजाम चौपट हो जाए, अगर ऐसा कोई दिन आएगा तो क्या होगा? रेलगाड़ियों की आवाजाही, उनके सिग्नल, प्लेन का उड़ना या उतरना, यह सब खत्म हो जाए, मोबाइल फोन और इंटरनेट खत्म हो जाए तो क्या होगा? 

आज कोरोना की वजह से आबादी का एक हिस्सा मौत की कगार पर है, लेकिन बाकी आबादी कुछ या अधिक हद तक कई किस्मों के काम कर पा रही है। अगर कोई कंप्यूटर वायरस, या कंप्यूटर हमला ऊपर लिखी तमाम बातों को खत्म कर दे तो क्या उससे यह देश बरसों तक उबर पाएगा? और यह नौबत फिल्मी नहीं है, यह हकीकत के अधिक करीब है और फिर ऐसे हमलावर ऐसी जानकारियों से आगे भी जा सकते हैं कि वे इस देश को कैसे अधिक तबाह करें। दुनिया में साइबर अटैक से सबसे अधिक सुरक्षित देशों में से एक अमेरिका के एक प्रदेश में अभी कुछ हफ्ते पहले ही एक जानलेवा साइबर अटैक हुआ। वहां लोगों के घरों तक पहुंचने वाले पीने के पानी को साफ करने वाले कारखाने में कंप्यूटरों से छेड़खानी करके कुछ रसायनों को इतनी अधिक मात्रा में पानी में घोल दिया गया कि अगर वह पानी लोग पी लेते, तो बड़ी संख्या में मौतें हो सकती थी। लेकिन वक्त रहते यह साइबर हमला पकड़ा गया। 

आज जो हिंदुस्तान एक दवा ठीक से नहीं बांट पा रहा है, और जैसे जीवनरक्षक इंजेक्शन बांटना एक राजनीतिक शोहरत का मुद्दा बना लिया गया है, वह हिंदुस्तान ऐसे किसी भी साइबर अटैक का सामना करने के लिए बिल्कुल भी तैयार देश नहीं है। ऐसे किसी हमले के बाद कुछ हिंदुस्तानी, चीनी झंडे जलाकर इस हमले का सामना करने लगेंगे, और कुछ हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी झंडे जलाकर। लेकिन हिंदुस्तानी फौज हो सकता है कि ऐसे किसी साइबर हमले के बाद कोई हवाई, या जमीनी हमला करने के लायक बच भी ना जाए। आज जब हम कोरोना के हमले से ही उबरने की ताकत नहीं रख रहे हैं तब ऐसे किसी दूसरे हमले के बारे सोचना कुछ लोगों को महज एक दिमागी शगल लग सकता है, लेकिन दुनिया पर आने वाली मुसीबतों का अंदाज ऐसे शगल से ही लगाया जा सकता है. इसलिए आज जितनी सफाई और सावधानी की जरूरत लग रही है, उतनी ही सावधानी इस देश के कंप्यूटर सिस्टम को लेकर भी बरतनी चाहिए। दुनिया का साइबर जुर्म का इतिहास बताता है कि ऐसे हमलों के लिए किसी देश की सरकारी साइबर फौज जरूरी नहीं रहती, दुनिया में अकेले काम करने वाले कोई नौजवान भी एक लैपटॉप लेकर दुनिया पर ऐसी तबाही लाने की ताकत रखते हैं.

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अप्रैल 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 अप्रैल 2021


 

कोरोना के टीके लगवाएं या नहीं, एक दुविधाभरा सवाल

  जो लोग आज कोरोना के शिकार हो चुके हैं या जो लोग आज कोरोना से बचे हुए हैं, ऐसे तमाम लोगों के सामने एक दुविधा है कि वे टीका लें या ना लें। यह दुविधा भी तब है जब वे अपने देश में मिल रहे टीकों को पाने के हकदार माने जा रहे हैं। हिंदुस्तान में जहां कि आज केंद्र सरकार ही टीके देना तय कर रही है और यह भी तय कर रही है कि किस उम्र के किन लोगों को ये पहले मिलें तो ऐसे में यह पसंद या नापसंद की दुविधा भी इसी उम्र के लोगों के सामने है या ऐसी ही बीमारी वाले लोगों के सामने है। दूसरी तरफ दुनिया के बहुत से देशों में जहां आज लोग अपनी मर्जी से टीके लगवाने की आजादी रख रहे हैं वहां भी उनके सामने यह दुविधा है कि कोरोना से बचाव के टीके के बारे में जितनी खबरें आ रही हैं उन्हें देखते हुए वे टीका लगवाएं या ना लगवाएं?

इस बात को समझने के लिए सबसे पहले तो इस बात पर गौर करना जरूरी है कि कोरोना वायरस करीब एक बरस ही पुराना है। और उसका टीका शायद आधा बरस पुराना ही है। इतिहास गवाह है कि टीकों के विकास में लंबा समय लगता है और क्योंकि यह महामारी बहुत सी जिंदगियां ले रही है इसलिए आधी-अधूरी तैयारी के साथ ही इन टीकों को परीक्षण के तौर पर लगाया जा रहा है। आज जब यह सवाल उठता है कि इन टीकों का असर कितने समय तक रहेगा, तो इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि उतना तो समय ही इन्हें बने हुए नहीं हुआ है, ऐसे में यह टीके परीक्षण ही हैं। और इसीलिए हिंदुस्तान जैसे कड़ाई से नियम लागू करने वाले देश में भी लोगों को यह छूट दी गई है कि वे चाहें तो टीके लगवाएं, और ना चाहें तो ना लगवाएं।
 
हिंदुस्तान के अधिकतर लोग टीका लगाते दिख रहे हैं, जबकि कुछ लोगों के मन में लगातार यह संदेह है कि दुनिया भर में जगह-जगह इस टीके के लगने के बाद, इस टीके के लगने की वजह से बहुत से लोगों की तबियत बिगड़ी है और मौतें भी हुई हैं। कुछ देशों ने कुछ टीकों पर रोक भी लगाई है कि नौजवानों पर ऐसे टीकों का बुरा असर हो रहा है और उनके खून में थक्के जम रहे हैं। लेकिन एक सवाल यह भी उठता है कि टीका लगाने के बाद लोगों को होने वाले कोरोना वायरस में जितनी कमी आई है, और कोरोना होने पर भी उनके लक्षण जितने कम खतरनाक दिखे हैं, टीका लगे हुए लोग जितने दूर तक मौत से बचे हुए हैं, उसे देखते हुए क्या टीका लगवा लेना चाहिए? यह सवाल छोटा नहीं है, यह सवाल बड़ा है, लेकिन इस सवाल से भी अधिक बड़ा एक दूसरा सवाल है कि आज सार्वजनिक जीवन में जिस रफ्तार से कोरोना का संक्रमण फैल रहा है, वैसे में क्या इंसानों को सचमुच ही इस बात का सामाजिक और नैतिक हक है कि वे अपने निजी फैसले से समाज के बाकी लोगों को खतरे में डालें? यह बात छोटी नहीं है क्योंकि दुनिया के तकरीबन तमाम लोकतांत्रिक देशों ने लोगों को छूट दी है कि वे चाहें तो ही टीके लगवाएं। 

हिंदुस्तान भी ऐसे ही देशों में से एक है जो कि आज बढ़ते हुए कोरोना संक्रमण की वजह से दुनिया में सबसे ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान की सीमाओं के सीमित रहते हुए भी सवाल यह उठता है कि उन सीमाओं के भीतर अगर कोई संभावना दिख रही है तो क्या उन संभावनाओं पर काम करना हमारी सामाजिक जवाबदेही और जिम्मेदारी नहीं है? यह बात निर्विवाद रूप से साबित होते दिख रही है कि कोरोना वायरस से बचाव के टीकों से संक्रमण कम हो रहा है और संक्रमण की मार भी कम हो रही है। आज टीका कितने महीने काम करेगा, कितने महीने बाद उसका असर खत्म हो जाएगा, जैसे कई सवाल लोगों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं, वह रातों-रात हर सवाल का जवाब ढूंढकर पेश नहीं कर सकता। आज दवा उद्योग से निकली खबरें यह भी बताती हैं कि हो सकता है कि लोगों को हर बरस यह टीके लगवाने पड़े, और टीकों के जानकार वैज्ञानिक इस बात पर भी मेहनत कर रहे हैं कि क्या किसी एक टीके के दो या अधिक डोज के मुकाबले अलग-अलग टीमों को देना अधिक असरदार हो सकता है?
 
ऐसे बहुत से सवालों के जवाब आते-जाते रहेंगे, लेकिन मौत बहुत रफ्तार से आ रही है, हिंदुस्तान में तो सरकार और म्युनिसिपल की मुर्दों के जलाने की क्षमता से अधिक रफ्तार से मौतें आ रही है। और यह सब हो रहा है जब चारों तरफ तरह-तरह से लॉकडाउन लगाया गया है, रात का कफ्र्यू लगाया गया है। लेकिन यह रोक-टोक पूरी जिंदगी तो चल नहीं सकती, और ऐसे में रोक-टोक उठने के बाद फिर कोरोना अधिक रफ्तार से बढ़ सकता है।  इसलिए लोगों को अपने टीके लगवाने के फैसले के वक्त यह भी सोचना चाहिए कि समाज के प्रति, परिवार और बाकी लोगों के प्रति, उनकी क्या जवाबदेही है, और अगर टीकों का असर कुछ महीनों के लिए भी उनको कोरोना से या उसकी गहरी मार से बचाकर रख सकता है तो क्या वह भी कोई छोटी बात रहेगी? दुनिया में हमेशा ही बहुत से ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें हवा में भूत दिखते हैं जो कि शंकाओं से भरे रहते हैं, जिनका मन तरह-तरह की साजिशों की कहानियां पर बहुत भरोसा करता है, ऐसे लोगों को आज भी कोरोना के टीकों में खामियां ही खामियां दिख रही हैं, लेकिन जिनको यह भी लग रहा है कि यह टीके लगवाने में कोई खतरा हो सकता है, उन्हें भी यह समझना चाहिए कि अपने परिवार और समाज के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी है। उनकी जिद, उनका दुराग्रह, उनका आशंकाओं से भरा मन कहीं बाकी तमाम लोगों के लिए खतरा तो नहीं बन रहा है। 

हम तो महज इतना लिख सकते हैं, इसके बाद जब तक लोकतंत्र लोगों को टीके लगवाने या ना लगवाने का फैसला करने की छूट दे रहा है, तब तक वे जितना चाहे समय ले लें, लोगों को जितना चाहे उतना खतरे में डाल दें। दुनिया के इतिहास में बीमारियों से बचाव के टीके लगवाने के वक्त बहुत से लोग पीछे हटते रहे, हिंदुस्तान में अभी कुछ बरस पहले तक पोलियो का टीका अपने बच्चों को लगवाने से मुस्लिम समाज के बहुत से लोग हिचकते रहे कि वह टीका अमेरिका का बनाया हुआ था और उस टीके से उनके बच्चे कुनबे को आगे बढ़ाने की क्षमता खो बैठेंगे। ऐसी क्षमता तो किसी ने नहीं खोई, लेकिन ऐसे मां-बाप के बच्चे पोलियो के शिकार जरूर हुए। इसलिए यह वक्त अपने पूर्वाग्रहों को अलग रखकर समाज के व्यापक भले को समझने का है।

(Daily chhatisgarh)

हर कुछ महीनों में बिखरी चुनावी गंदगी लोकतंत्र का क्या भला कर रही?

  जब जनतंत्र और जिंदगी में से किसी एक को बचाने की प्राथमिकता तय करना हो तो जाहिर तौर पर पहले जिंदगी को छांटना चाहिए क्योंकि जन है तो ही तंत्र है, जनतंत्र तो बाद में बना है, पहले तो जन ही था, और आखिरी तक जन ही रहने चाहिए। अब यह सवाल हम आज इसलिए उठा रहे हैं कि हिंदुस्तान में जनतंत्र जारी और कायम रखने के नाम पर चुनाव नाम का जो ढकोसला चल रहा है, उस ढकोसले को समझने की जरूरत है। अगर यह नहीं होता तो लोगों के मन में बेचैनी रहती कि देश में लोकतंत्र नहीं है अब यह है तो कम से कम एक दिखावा है कि लोगों को वोट डालने मिलता है, और उनके वोटों से चुनी हुई सरकार बनती है। यह एक अलग बात है कि वह बनी हुई सरकार कितने समय में गिर जाती है, यह देख-देखकर भी लोग थक गए हैं। फिर भी पाखंडपसंद हिंदुस्तानी इस बात को बहुत पसंद करते हैं कि चुनाव होते रहना चाहिए। 

अब इस बार जब इन चुनावों को कोरोना के खतरे के साथ मिलाकर देखें तो लगता है कि क्या सचमुच यह चुनाव इस तरह से, इस कीमत पर होते रहना चाहिए? यह साफ-साफ दिख रहा है कि हिंदुस्तान के जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें से अधिकतर में कोरोना के खतरे को कम दिखाने के लिए आबादी के अनुपात में जांच कम हो रही है, आंकड़ों को छुपाया जा रहा है, और एक अविश्वसनीय तस्वीर पेश की जा रही है कि मानो कुछ हुआ ही नहीं है। हिंदुस्तान के कार्टूनिस्टों ने अब तक 100 से अधिक कार्टून इस बात पर बना लिए हैं कि चुनावों के बीच कोरोना वायरस किस तरह खत्म हो जाता है और किस तरह पूरे देश को कोरोना वायरस  से बचाना हो तो पूरे देश में चुनाव की घोषणा कर देनी चाहिए। अभी यह भी समझने की जरूरत है कि कुछ समय पहले से देश के मोदीमय हो जाने पर यह मांग उठने लगी थी कि वन नेशन वन इलेक्शन करवाया जाए। मतलब यह कि पूरे देश में एक साथ चुनाव हो, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हों, और हो सके तो स्थानीय संस्थाओं के चुनाव भी साथ-साथ हो जाएं ताकि पंचायत और म्युनिसिपल तक भी मोदी के नाम पर चुनाव लड़े जा सकें, जीते जा सकें । 

हम तकनीकी रूप से ऐसे किसी विकल्प के पक्ष में लिख चुके हैं कि एक साथ होने वाले चुनाव से देश में एक तो चुनाव का खर्च घटेगा, दूसरी तरफ चुनाव को देखते हुए राजनीतिक दल जिस तरह के समझौते करते हुए सरकारी फिजूलखर्ची करते हैं, जिस तरह से नाजायज वायदे करते हैं, वह सब भी घटेगा।  हम इस हद तक तो वन नेशन वन इलेक्शन के हिमायती रहते आए हैं। अभी दो और वजह से हम इसके बारे में सोच रहे हैं। बंगाल के चुनाव को लेकर वहां राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के बीच जितने किस्म की चुनावी गंदगी हुई है वह भयानक है। केंद्र और राज्य के संबंध जिस हद तक खराब हुए हैं वह भी अभूतपूर्व है। और अभी तो चुनावी नतीजे आना बाकी हैं, जिसके बाद हो सकता है कि तोडफ़ोड़ और खरीदी-बिक्री का एक नया सिलसिला नई ऊंचाइयों तक पहुंचे। फिर जिस तरह मेहरबान चुनाव आयोग ने 8 किस्तों में बंगाल का मतदान बांटकर दिल्ली के बड़े नेताओं को बंगाल की तकरीबन हर विधानसभा सीट तक पहुंचने का एक अभूतपूर्व मौका दिया है, वह भी देखने लायक है। बंगाल का पूरा सिलसिला देखें तो समझ पड़ता है कि क्या इतनी गंदगी देश के अलग-अलग राज्य में घूम-घूमकर हर कुछ महीनों के बाद करना ठीक रहेगा जब वहां विधानसभा चुनाव हो रहे होंगे? यह सिलसिला केंद्र और राज्य के संबंधों को तबाह करने वाला भी है। जब लोगों के बीच आपस में बातचीत के भी रिश्ते ना रह जाएं, और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को यह लगने लगे कि प्रधानमंत्री के उस राज्य में आने पर भी उन्हें लेने जाना, उनके कार्यक्रम में जाना अपनी बेइज्जती करवाना होगा, यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। 

ऐसा लगता है कि वन नेशन वन इलेक्शन चाहे पूरे देश में एक नेता के पक्ष में सुनामी की तरह क्यों ना हो, सच तो यह है कि उससे चुनावी गंदगी कुछ महीनों में निपट जाएगी जो कि आज बारहमासी हो चुकी है। अगली जिस बात पर पर हम सोच रहे हैं वह कोरोना का खतरा है या कि ऐसी आने वाली किसी दूसरी महामारी का। असम से लेकर बंगाल तक और तमिलनाडु से लेकर केरल तक यह देखने में आ रहा है कि राजनीतिक दलों के मन में चुनाव की कीमत पर कोरोना के खतरे के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है। राजनीतिक दलों ने चुनाव के लिए मतदाताओं की लाखों की भीड़ को जिस तरह कोरोना के खतरे में झोंक दिया है, उससे भी लगता है किसी देश में लोकतंत्र को बचाने का पाखंड आखिर किस कीमत पर किया जाए? अगर करोड़ों की आबादी वाले राज्यों को वहां एक-एक सीट पर लाखों वोटरों को इस तरह लापरवाह करके, कोरोना के हवाले करके, चुनाव लड़ा और जीता जाना है, तो देश पर इस खतरे से बेहतर यह है कि जिसे चुनाव जीतना है वह जीत ले, लेकिन बयानों की गंदगी से लेकर कोरोना के खतरे तक इन सबको 5 बरस में एक बार के लिए कर दिया जाए। 

जिस तरह कुंभ मेला 12 बरस में एक बार होता है, और दो कुंभ के बीच 6 बरस के फासले पर अर्धकुंभ होता है, वैसे ही चुनाव भी इस देश में एक फासले पर हो जाने चाहिए ताकि उनके बीच की गंदगी खत्म हो जाए। चुनाव के बीच जिस तरह कुंभ को लेकर नेता और सरकार लापरवाह हैं, धार्मिक नेता इसका मजा ले रहे हैं, देश की अदालतें अपने आपको सुरक्षित कमरों में बंद करके आंखें बंद किए बैठी हैं, उससे भी लगता है कि देश के चुनावों को कुंभ के साथ भी जोड़ देना चाहिए। जिस बरस कुंभ हो, उसके आगे-पीछे चुनाव भी हो जाने चाहिए ताकि सभी किस्म की गंदगी का खतरा, और महामारी का खतरा एक साथ चले जाएं। हर कुछ महीनों में देश में खतरे कहीं ना कहीं खड़े होते रहे वह ठीक नहीं है, तमाम किस्म के खतरे एक साथ आ जाने चाहिए, एक साथ चले जाने चाहिए।  ताकि उससे उबरकर हिंदुस्तानी जनता आगे देख सके, आगे तकरीबन 4 बरस काम कर सके। 

देश में चुनावों के दौर में जिस हद तक नफरत के उन्माद को बढ़ाया जा रहा है, उतनी नफरत और उतना उन्माद हर दो-चार महीने में अलग अलग राज्य चुनाव में सामने आता रहे वह भी ठीक नहीं है। जिस नेता की पार्टी को वन नेशन वन इलेक्शन से सबसे अधिक उम्मीदें हैं, वही जीत जाए, यह देश नफरत से परे रह ले, महामारी के खतरे से बच जाए। लोकतंत्र पर नाजायज चुनावी वायदों का बोझ ना पड़े वह अधिक जरूरी है। यह सिलसिला खतरनाक हो गया है, राज्यों के चुनाव लोकतंत्र के बदन को चकलाघर पर खरीदने बेचने का एक और मौका बनकर आने लगे हैं, ऐसी कमाई से भला किस लोकतंत्र की इज्जत बढ़ रही है? जिन पार्टियों को वन नेशन वन इलेक्शन में हार जाने का खतरा दिखता है, उन पार्टियों की वैसे भी आज के भारतीय लोकतंत्र में क्या गुंजाइश बच गई है? ये तमाम सवाल बहुत तकलीफदेह हैं, लेकिन यही साफ दिख रहा है कि चुनावी गंदगी से लेकर कोरोना की गंदगी तक, मरना तो लोकतंत्र को है लोक को है, और तंत्र तो लोक से वैसे भी कट चुका है।

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धर्म, राजनीति, और बाजार का खतरनाक मेल जुटा हुआ है कोरोना के स्वागत के लिए

  राजनीति और धर्म दोनों अपने आपमें पर्याप्त जानलेवा होते हैं, और जब इन दोनों का एक घालमेल होता है तो वह लोकतंत्र को भी खत्म करने की ताकत रखता है, और इंसानियत को तो खत्म करता ही है। उत्तराखंड में कल हरिद्वार में कुंभ मेले के दौरान सुबह से शाम तक 31 लाख लोग पहुंचे। राज्य सरकार ने खुद ही यह मान लिया है कि वह लोगों पर काबू नहीं रख सकी, और इस विकराल भीड़ के बीच कोरोना की सावधानी लागू कर पाना उसके लिए नामुमकिन था। देश में आज कोरोना जिस तरह छलांग लगाकर आगे बढ़ रहा, जिंदा लोगों के लिए अस्पताल की बात तो छोड़ ही दें, मुर्दों के लिए भी चिताओं की जगह कम पडऩे लगी है, वैसे में इस धार्मिक आयोजन को छूट देना अपने आपमें एक भयानक फैसला था, लेकिन जब राजनीति और धर्म एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर नाचते हैं तो लोकतंत्र उनके पैरों तले कुचलते ही रहता है।

उत्तराखंड के हरिद्वार के स्थानीय लोग दहशत में हैं कि बाहर से आई हुई इतनी भीड़ उनके शहर और पूरे इलाके को कोरोना हॉटस्पॉट बनाकर छोड़ेगी। आज देश के किसी प्रदेश में कोरोना वायरस पर काबू पाना वहां की सरकार के बस में नहीं दिख रहा है, और देशभर में लोगों को टीकाकरण के लिए टीके दे पाना केंद्र सरकार के बस में नहीं दिख रहा है। ऐसे में किसी भी भीड़ से बचने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन दसियों लाख लोगों की भीड़ के अंदाज वाले इस कुंभ को इजाजत देकर राज्य सरकार ने, और केंद्र सरकार ने एक आपराधिक जिम्मेदारी का काम किया है, जिसके नतीजे पूरा देश लंबे समय तक भुगतेगा, यहाँ से लौटते लोग कोरोना पूरे देश में फैलाएंगे।

देश में वैसे भी कोरोना के मोर्चे पर राजनीति इतना नंगा नाच कर रही है कि उसे देखना भी मुश्किल हो रहा है। गुजरात में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने यह सार्वजनिक मुनादी की कि एक जीवन रक्षक इंजेक्शन जो कि बाजार में नहीं मिल रहा है, उन्होंने उसके 5000 इंजेक्शन जुटा लिए हैं और भाजपा कार्यालय से उन्हें बांटा जाएगा। ऐसा हुआ भी उन्होंने भाजपा कार्यालय से यह इंजेक्शन बांटे जिनके बारे में केंद्र और राज्य सरकारों ने सख्त आदेश निकाले हैं कि जिस दुकानदार के पास इस इंजेक्शन का स्टॉक हो, वे तुरंत इस बारे में प्रशासन को खबर करें ताकि अधिक जरूरतमंद लोगों को यह इंजेक्शन मिल सके और इसकी कालाबाजारी ना हो सके। लेकिन ऐसी घोषणा भी लोगों को रोक नहीं पाई मध्यप्रदेश में कई दुकानदार इसकी कालाबाजारी करते हुए मिले, और गुजरात में तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष खुद ही सरकार से परे यह इंजेक्शन बांटते हुए दिखे। अब सवाल यह है कि जैसे एक इंजेक्शन के लिए लोग दिन-दिन भर कतार में लगे हैं, वह 5000 की संख्या में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को कैसे मिल गया?

राजनीति सिर्फ इतना नहीं कर रही है, और धर्म भी सिर्फ इतना नहीं कर रहा है, लोगों को याद रहना चाहिए कि पिछले एक बरस में हिंदू धर्म का एक सबसे चर्चित प्रतीक बना हुआ बाबा रामदेव कितनी बार अपनी कितनी दवाइयों को लेकर झूठे दावे करते पकड़ाया, और किस तरह उसके दावों का साथ देने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी उसके दावों में मौजूद रहे। यह एक अलग बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जब रामदेव के दावों में अपने नाम के बेजा इस्तेमाल पर विरोध किया, तब जाकर धर्म और राजनीति का यह एक बाजारू मेल, रामदेव कुछ चुप हुआ। यह समझने की जरूरत है कि रामदेव को पिछले वर्षों में हिंदू धर्म का, आयुर्वेद और योग के गौरवशाली इतिहास का, सबसे बड़ा प्रतीक बनाकर उसे कांग्रेस के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में इस्तेमाल किया गया है, और आज भी वह रामदेव इस्तेमाल किया जा रहा है। एक नजरिया यह भी हो सकता है कि एक तरफ भाजपा उसका इस्तेमाल कर रही है, और दूसरी तरफ वह भाजपा का इस्तेमाल करके अपने कारोबार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले टक्कर में खड़ा कर रहा है। आज जब देश सचमुच खतरे में पड़ा हुआ है, तो रामदेव का बाजारू दवा उद्योग चुप बैठा है। कोरोना के लिए, कोरोना के इलाज के लिए, या कि कोरोना से मरने वालों के मुर्दे जलाने के लिए भी रामदेव का मुंह नहीं खुल रहा कि उसके लिए पतंजलि का कौन सा सामान इस्तेमाल किया जाए। यह सिलसिला भयानक है। हरिद्वार के कुंभ से लेकर गुजरात के भाजपा दफ्तर में बंटते इंजेक्शन, और हरिद्वार में ही बसे रामदेव के बाजार को खड़ा करने तक का पूरा सिलसिला धर्म और राजनीति का खतरनाक मेल है। यह मेल उन दिनों से चले आ रहा है जब कबीले का सरदार इलाके के पुजारी के साथ मिलकर जनता का शोषण करने के लिए धर्म का आविष्कार कर रहे थे।

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महज अपने-आपको बचाता आत्मकेंद्रित सुप्रीम कोर्ट !

  सुप्रीम कोर्ट में कुछ कर्मचारियों के कोरोनावायरस निकलने के बाद जजों ने यह तय किया है कि वे अपने घरों से ही वीडियो कांफ्रेंस पर मामलों की सुनवाई करेंगे। सुप्रीम कोर्ट में करीब 34 सौ कर्मचारी हैं, जिनमें से 44 कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे, उसके बाद आनन-फानन यह फैसला लिया गया है। दूसरी तरफ कल बड़ी संख्या में हरिद्वार में लोग कोरोनाग्रस्त मिले हैं और उसके बाद भी आज वहां कुंभ मेले के शाही स्नान में लाखों लोगों को एक साथ नहाने की छूट दी गई है। वहां की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं उनसे लगता है कि कोरोना को बंगाल की चुनावी रैलियों के बाद देश का सबसे बड़ा निशाना कुंभ में ही मिला है। अब सवाल यह उठता है कि जिस सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने देश में कई राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव में लोगों की यह अंधाधुंध भीड़ देखने मिल रही है और मीडिया का, अब तक बाकी, एक तबका इस भीड़ के खतरे भी गिना रहा है, देश का शायद ही कोई ऐसा कार्टूनिस्ट हो जिसने ऐसी अंधाधुंध चुनावी भीड़ को लेकर कई-कई कार्टून ना बनाए हों, लेकिन देश की जनता पर छाए हुए इस भयानक और अकल्पनीय खतरे से अगर कोई नावाकिफ है तो वह सुप्रीम कोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट मानो अपने खुद के हितों से परे कुछ देखना-सुनना छोड़ ही चुका है।

इस देश का चुनाव आयोग वैसे भी लोगों की आलोचना का इस हद तक शिकार हो चुका है कि काफी लोग यह लिख रहे हैं कि एक वक्त के चुनाव आयुक्त रहे टी एन शेषन के नाम को इस चुनाव आयोग ने डुबा कर रख दिया है। इसलिए अपने बंद कमरे में महफूज इस चुनाव आयोग को और कुछ सूझे या न सूझे, कम से कम सुप्रीम कोर्ट को तो अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। इसके पहले भी बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब व्यापक जनहित के किसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने खुद होकर सुनवाई शुरू कर दी है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश होना भी जरूरी नहीं रहा है। जब किसी जज को दिल्ली की ट्रैफिक से शिकायत हुई तो कुछ मिनटों के भीतर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को सुप्रीम कोर्ट जज ने कटघरे में खड़ा किया है। आज जब देश में चारों तरफ कोरोना से लाशें गिर रही हैं,  देश के अधिकतर मरघटों पर दो-दो, चार-चार दिनों की कतारें लगी हुई हैं, उस वक्त भी अगर सुप्रीम कोर्ट को यह समझ नहीं पड़ रहा कि चुनावी रैलियां और कुंभ जैसे आयोजन देश की जनता पर कितना बड़ा खतरा है तो सिवाय इसके क्या माना जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने-आपको इतने ऊपर बिठा लिया है कि उसे हिंदुस्तानी जमीन की हकीकत दिखना भी बंद हो गया है, हिंदुस्तानियों पर मंडराते इतिहास के सबसे बड़े खतरे भी दिखना उसे बंद हो चुका है। 

ऐसे में राजनीतिक दलों की इस मनमानी और केंद्र-राज्य सरकारों की चुनावी जिद्द के खिलाफ कोई जाए तो कहां जाए? यह समझने की जरूरत है कि आज कोई भी लापरवाह तबका देश के दूसरे तमाम घर बैठे सावधान तबकों के लिए भी खतरा है, तब किसी को ऐसी लापरवाही की छूट कैसे दी जा सकती है? जब सड़कों पर मास्क ना लगाए हुए गरीबों की पीठ पर पुलिस अपनी लाठियां तोड़ रही है, तब देश के बड़े-बड़े नेता जिस तरह खुली हुई गाडिय़ों पर लदकर हजारों लोगों के साथ चुनावी रैलियां कर रहे हैं, उनमें से कोई भी मास्क नहीं पहन रहे हैं, तब उन पर कौन सी कार्रवाई हो रही है यह सवाल सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। लेकिन चूंकि यह सवाल प्रशांत भूषण का उठाया हुआ किसी सुप्रीम कोर्ट जज के बारे में नहीं हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को इस सवाल को पढऩे की फुर्सत भी नहीं है। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र को खत्म करने से आगे बढ़कर इस लोकतंत्र के लोगों को खत्म करने वाला साबित हो रहा है।

लोगों को याद होगा कि पिछले बरस जब कोरोना की शुरुआत हुई और दिल्ली की तबलीगी जमात में कुछ हजार लोग इक_ा हुए जिन्हें पुलिस ने वहां से भगाया और जिनमें से कई लोग कोरोना पॉजिटिव होकर देश भर में अपने-अपने इलाकों में लौटे तो मुस्लिमों के खिलाफ एक किस्मत से दहशत और नफरत का माहौल बना था। वे तो 10-20 हजार के भीतर लोग थे, लेकिन आज तो 10-20 लाख से अधिक लोग हरिद्वार के कुंभ में इक_ा है  जिनके लिए न केंद्र सरकार के कोई नियम दिख रहे, और ना ही राज्य सरकार के कोई कोरोना प्रतिबन्ध उन पर लागू हो रहे हैं। यह नौबत सबसे अधिक भयानक तो सबसे पहले इन तीर्थ यात्रियों के परिवारों के लिए है जिनके बीच वे लौटेंगे। लेकिन इनसे परे भी वे ट्रेन और बसों में आते-जाते लोगों को कोरोना का प्रसाद देते जाएंगे, अपने-अपने शहर लौटने के बाद वहां के दूसरे धर्म के लोगों को भी तीर्थ का प्रसाद देंगे, और आगे जो चिकित्सा ढांचा अपनी कमर तुड़ाकर बैठा है, उस पर और बोझ भी डालेंगे। 

एक तरफ तो इस देश में संसद को चलने नहीं दिया गया, सत्र नहीं होने दिया गया क्योंकि कोरोना वायरस का खतरा दिख रहा था, दूसरी तरफ जिस तरह विधानसभा के चुनावों में प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक को भीड़ जुटाने का मौका दिया गया है, छूटें दी गई हैं,  वह महामारी को बढ़ावा देने के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसे चुनाव प्रचार से जो लोग लौट रहे हैं उनमें से कोरोनावायरस से लोगों का मरना भी शुरू हो चुका है। अगर इस देश के सुप्रीम कोर्ट को लोगों की जरा भी परवाह है, तो उसे कुंभ और चुनाव जैसे मामलों पर केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब तलब करना चाहिए। महज अपने-आपको अपने बंगलों में कैद करके सुप्रीम कोर्ट के जज एक गैरजिम्मेदारी का रुख दिखा रहे हैं अगर उन्हें चुनावी रैलियों और कुंभ की लाखों लोगों की बिना मास्क की लापरवाह भीड़ की अगुवाई करते नेता नहीं दिख रहे हैं। महज अपने-आपको बचा लेना, और देश की आम जनता को नेताओं और सरकारों की रहमो-करम पर छोड़ देना किसी इज्जतदार अदालत का काम नहीं हो सकता।

(Daily chhatisgarh)