दीवारों पर लिक्खा है, 9 अगस्त 2021


 

मुख्य न्यायाधीश की नाक तले, सबसे भयानक सांप्रदायिक हिंसा के नारे लगाती भीड़ की अनदेखी

9 अगस्त 2021

कल दिल्ली में भाजपा के एक नेता की अगुवाई में प्रतिबंधों को तोड़ते हुए प्रदर्शन हुआ, और इस प्रदर्शन में भीड़ ने खुलकर मुस्लिमों पर हिंसा करने के नारे लगाए, और उन नारों के साथ यह नारे भी लगाए कि जब इनको मारा जाएगा तो ये राम-राम चिल्लाएंगे। अपनी हिंसक और सांप्रदायिक सोच में राम को जिस तरह से लपेटा गया है, उससे लगता है कि तुलसी की कहानी से परे अगर सचमुच ही राम कहीं होते तो अपना नाम समेटकर भी यहां से चले गए होते। जिस राम के नाम पर देश के सबसे लंबे मुकदमे के बाद एक मंदिर बन रहा है, उस राम का नाम मुंह से निकलवाने के लिए मुस्लिमों को मारने और काटने के नारे संगठित तरीके से लगवाए जा रहे हैं। और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक छाए हुए इन वीडियो को अगर किसी ने नहीं देखा है तो दिल्ली और उत्तर प्रदेश की पुलिस ने नहीं देखा है जिनकी प्राथमिकता में ऐसी सोच पर कोई कार्यवाही करना रह नहीं गया है। मीडिया के कुछ लोगों ने इस बात को लिखा भी है कि ऐसे नारे लगाने वालों को गिनती के फतवेबाज मान लेना गलत होगा क्योंकि यह उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले हर कुछ दिनों में आगे बढ़ाए जा रहे एजेंडे का एक हिस्सा है, जिसे समझ पाना अधिक मुश्किल बात नहीं है। ऐसा लगता है कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश चुनाव का मतदान उत्तर प्रदेश में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के बीच एक जनगणना की तरह होकर रह जाएगा जो कि धर्म के आधार पर की जाएगी।

जिस तरह एक पत्रकार को जंतर मंतर पर इस सांप्रदायिक भीड़ ने घेर लिया और उससे जबरिया जय श्री राम कहलवाने की कोशिश की गई, और ना कहने पर उसे वहां से निकाल दिया गया, वे तमाम वीडियो देखने के बावजूद दिल्ली की पुलिस तो मौन है ही, अपने आपको भाजपा से अलग बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी ऐसी नौबत के खिलाफ कुछ नहीं बोल रहे जबकि वह आए दिन इस बात की आड़ लेते रहते हैं कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के मातहत काम करती है और दिल्ली का मुख्यमंत्री पुलिस को नियंत्रित नहीं करता। लेकिन दिल्ली का मुख्यमंत्री अपनी जुबान को तो नियंत्रित करता है, वह यह तो तय कर सकता है कि वह किस सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए अपना मुंह खोले? या फिर वह अपनी ही पार्टी के विधायकों की गुंडागर्दी को बचाने के लिए ही मुंह खुलेगा और फिर चाहे उसके राज्य के भीतर इतनी बड़ी-बड़ी सांप्रदायिक हिंसा होती चले उसका मुंह भी नहीं खुलेगा? यह हिंदुस्तान का किस किस्म का निर्वाचित मुख्यमंत्री है जिसका मुंह ही चुनिंदा मुद्दों पर खुलता है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि उसके गुरु अन्ना हजारे का मुंह चुनिंदा मुद्दों पर, चुनिंदा लोगों के खिलाफ ही खुलता था, और पिछले 6 बरस से वह कुंभकरण की तरह सोया हुआ है यह कहकर कि कांग्रेस सरकार आएगी तो उठा देना।

यह सिलसिला बहुत ही शर्मनाक है लेकिन दिक्कत यह है कि दिल्ली की पुलिस और उत्तर प्रदेश की पुलिस इन दोनों की सांप्रदायिकता में कोई फर्क रह नहीं गया है। जो वीडियो बच्चे-बच्चे के हाथ में है, वह वीडियो भी पुलिस को हासिल नहीं हो रहा है। जिस प्रदर्शन की अर्जी खारिज की जा चुकी थी उसके बावजूद वह प्रदर्शन हुआ और इतने भयानक सांप्रदायिक तरीके से हुआ लेकिन फिर भी केंद्र सरकार की इतनी एजेंसियां जो कि लोगों के मोबाइल फोन पर झांकने के लिए इजराइल से अरबों का जासूसी स्पाइवेयर खरीदती हैं, उन्हें सडक़ पर नारे लगाती भीड़ के यह वीडियो भी नहीं मिल रहे जिन्हें पाने के लिए पेगासस की जरूरत नहीं है, महज आंख और कान खोलने की जरूरत है, वे सोशल मीडिया पर चारों तरफ हैं। ऐसी अनदेखी करके केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश की पुलिस देश को किस हालत में धकेल रही है, क्या इन दो पुलिस पर राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश के तहत मुक़दमा दजऱ् नहीं होना चाहिए?

और पूरे देश में पुलिस किस तरह एक अराजक ताकत बन चुकी है इसको देखना हो तो कल देश के मुख्य न्यायाधीश का दिया हुआ यह भाषण सुनना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में मानवाधिकार का सबसे बुरा हनन पुलिस हिरासत में होता है जहां ताकतवर लोगों को भी प्रताडऩा और अत्याचार झेलना पड़ता है। प्रधान न्यायाधीश एन वी रमना ने कहा कि मानवाधिकार और व्यक्ति की गरिमा को सबसे अधिक खतरा पुलिस थाने में होता है। उन्होंने पुलिस में पहुंचने के बाद लोगों के मानवाधिकार के मामले में अमीर और गरीब की ताकत के फर्क के बारे में भी काफी कुछ कहा है। उन्होंने कहा कि अगर हम कानून का राज बनाए रखना चाहते हैं तो न्याय तक पहुंच वाले, और बिना पहुंच वाले गरीब, के बीच का फर्क खत्म करना होगा।

पहुंच और बिना पहुंच वालों के बीच का यह फर्क हिंदुस्तान में आज ना सिर्फ पैसे वालों और गरीब के बीच में है, बल्कि बहुमत की आबादी और अल्पमत आबादी के बीच भी है। आज अल्पमत के लोग अगर बहुमत के खिलाफ इस तरह के नारे लगाते हुए मिलते तो अब तक उनके खिलाफ बड़ी-बड़ी एफआईआर दर्ज हो चुकी रहतीं। देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोग उनके खिलाफ टीवी की बहसों में मुंह से झाग निकालने लगते, और सडक़ों पर राजनेता देश के ऐसे गद्दार तबके को पड़ोस के देश भेज देने की बात कहने लगते। मुख्य न्यायाधीश ने जो बात गरीब और अमीर के बारे में कही है वह दरअसल पैसों की ताकत से जुड़ी हुई बात है, उसे और अधिक बारीकी से देखें तो वह सिर्फ ताकत से जुड़ी हुई बात है जो कि सिर्फ पैसों की ताकत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। आज देश में बहुमत की ताकत और अल्पमत की ताकत का जो फर्क है उसने लोगों की जिंदगी का बुनियादी हक छीन लिया है। आज अल्पमत की भीड़ पर निशाना लगाने के लिए बहुमत की सोच वाली सरकारों की पुलिस कहीं पैलेट गन चलाने तैयार है, तो कहीं बेकसूरों को चौथाई-चौथाई सदी तक जेलों में बंद रखने को तैयार है, तो कहीं उनके खिलाफ अंतहीन झूठे मुकदमे दायर करने को तैयार है।

पता नहीं क्यों मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस तक संपन्न और विपन्न की पहुंच के फर्क को गिनाते हुए बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की पहुंच के फर्क को नहीं गिनाया, जबकि कल जब वे यह भाषण दे रहे थे तकरीबन उसी समय के आसपास उन्हीं की दिल्ली में यह नारे लग रहे थे जिनमें मुस्लिमों को जब मारा जाएगा तो वे राम-राम चिल्लाएंगे के नारे वीडियो कैमरों के सामने लगाए जा रहे थे। या अलग बात है कि बिना इजाजत यह प्रदर्शन जिस भाजपा नेता के संगठन ने किया था वह इसे अपना भारत जोड़ो आंदोलन करार देता है यह किस तरह का भारत जोड़ो है?  क्या इसे उसी दिल्ली में बैठे हुए देश के मुख्य न्यायाधीश को नहीं देखना चाहिए? क्योंकि देश में लोकतंत्र की अन्य संस्थाओं का दिवाला निकल चुका है, और अब थोड़ी बहुत उम्मीद इस नए मुख्य न्यायाधीश से इसलिए है कि इनकी कोई नीयत रिटायरमेंट के बाद किसी कुर्सी को पाने की दिख नहीं रही है। उनके अब तक के फैसले एक ईमानदार अदालत का रुख दिखा रहे हैं।  मुख्य न्यायाधीश भी अगर बुलाकर यह नहीं पूछेगा कि राम का नाम लेने वालों की कमी हो गई है क्या जो कि मुस्लिमों को मार-मारकर राम का नाम लिवाया जाएगा? क्या मुख्य न्यायाधीश की जिम्मेदारी नहीं बनती कि एक मासूम नासमझ बच्चा बनी हुई दिल्ली पुलिस को बुलाकर पूछे कि उसके आंख और कान कुछ चुनिंदा मौकों पर काम करना क्यों बंद कर देते हैं? वह केंद्र सरकार की खुफिया एजेंसियों को यह नहीं पूछ सकती कि ऐसे नारों के पहले और इसके बाद क्या उन्हें देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं दिखता है? लोकतंत्र की बुनियादी समझ को ध्यान में रखते हुए कल की इस वारदात के बाद कोई नतीजा निकाला जाए तो उससे दिल्ली पुलिस के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज हो सकता है कि वह अपनी सरहद में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा के फतवे हवा में गूंजने दे रही है, उसकी अनदेखी कर रही है, और पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा भडक़ने का खतरा खड़ा कर रही है।

(Daily Chhattisgarh)

मीडिया का कार्पोरेट कारोबार और उसके सरोकार पर चर्चा

   8 अगस्त 2021

 जिंदगी के बहुत से असल मुद्दों पर लगातार लिखने वाली एक महिला पत्रकार दोस्त ने एक वक्त लिखा था कि वह एक स्थानीय अखबार में पढ़ रही थी कि किस तरह हाथियों ने एक बस्ती में तोड़-फोड़ की। और साथ यह लिखा कि ऐसी खबरों के बाद उसे शाहरूख खान के डॉन-2 के बारे में पढऩे की क्या जरूरत है? यह बात रोज ही हमारे सामने आती है क्योंकि अखबार के कई पन्ने रोज तैयार करते हुए दिन की शुरुआत से लेकर रात काम खत्म होने तक दुविधा खत्म ही नहीं होती। अखबार पढऩे वालों की उम्मीदों के मुताबिक अखबार निकाला जाए, या उन्हें उनकी उम्मीदों के बारे में कुछ सलाह देता हुआ अखबार निकाला जाए? अखबार का मकसद कारोबार हो, या सरोकार हो? ऐसे बहुत से सवाल बहुत सी खबरों को लेकर और उन खबरों से छांटे गए किसी मुद्दे पर इस तरह का, इस जगह पर संपादकीय लिखते हुए सामने आकर खड़े हो जाते हैं। जब हम जिंदगी की तकलीफों और समाज में बेइंसाफी के बारे में लिखते हैं तो बहुत से लोगों को लगता है कि लिखने को कोई अच्छी बात बची ही नहीं है क्या? कुछ अखबारों ने अपनी यह नीति बना रखी है कि वे पहले पन्ने पर दुख-तकलीफ की कोई खबर नहीं छापते हैं, जब तक कि वह किसी बड़ी ताजा घटना की खबर न हो, और जिसे छोड़ देना लापरवाही लगे।

जो जुबान खबरों को छांटने के लिए इस्तेमाल होती है वह बहुत दिलचस्प है। हिंदुस्तान में हिंदी में अंग्रेजी के बहुत से शब्द घुल-मिल चुके हैं और ऐसा ही एक शब्द अखबारनवीसी में इस्तेमाल होता है-पब्लिक इंटरेस्ट। बारीकी से देखें तो हिंदी में इसके दो अलग-अलग मायने निकलते हैं, एक तो इसका मतलब जनहित होता है और दूसरा मतलब जनरुचि होता है। अखबार की खबरें तय करते हुए, विचारों के मुद्दे और विचारों को तय करते हुए, इन सबकी प्राथमिकताएं और इनका महत्व तय करते हुए, जब बात पब्लिक इंटरेस्ट की होती है तो कारोबारी अखबार (बिजनेस न्यूजपेपर नहीं, बिजनेस के लिए फिक्रमंद न्यूजपेपर) उसे जनरुचि मानकर एक ऐसा अखबार पाठकों के सामने रखता है जैसा कि दस-बीस बरस पहले एक तांत्रिक अंगूठी के इश्तहार में दावा किया जाता था-जो मांगोगे वही मिलेगा। और पब्लिक इंटरेस्ट का यह मतलब अखबार की रगों में दौडऩे वाले इश्तहार वाले फायदे की बात भी होती है। दूसरी तरफ जो लोग अखबार को कारोबार से कुछ अधिक, सरोकार से जुड़ा हुआ मानते हैं, वे पब्लिक इंटरेस्ट के जनहित वाले अर्थ को ढोकर चलते हैं, जो कि खासा भारी होता है और कमर भी तोड़ देता है। हम अभी बात मोटे तौर पर अखबारों की इसलिए कर रहे हैं कि देश का लंबा अनुभव इन्हीं के बारे में अधिक है और टीवी के समाचार चैनलों को आए अख़बारों के मुकाबले कम दिन हुए हैं और उनका सरोकारों से, जनहित से लेना-देना उसी वक्त जरा सी देर के लिए शुरू होता है जब कोई स्टिंग ऑपरेशन उनके हाथ ऐसा लग जाता है जो लोगों को टीवी के सामने कुछ देर बांध सके। भारत के समाचार चैनलों को हम आज के इस गंभीर विश्लेषण में जोडऩे की कोशिश करने पर भी नहीं जोड़ पाएंगे।

आज इस बात पर लिखने की कुछ जरूरत इसलिए भी लग रही है कि पाकिस्तान में एक कमजोर और खतरे में चल रहे लोकतंत्र के भीतर वहां के मीडिया को लेकर खुली बहस चलती है और लोग जिस तरह उसकी आलोचना भी करते हैं, वह बात हिंदुस्तान में शायद इसलिए कम है क्योंकि यहां मीडिया उस तरह के किसी फौजी, खुफिया, आतंकी और कट्टरपंथी हमलों का शिकार नहीं है। अधिक आजादी ने भारत के मीडिया को आत्ममंथन से परे कर दिया है और तरह-तरह के दबावों के तले पाकिस्तानी मीडिया चर्चा का सामान बनता है। अखबारों के पन्नों के लिए रोजाना धरती के अनगिनत पेड़ कटते हैं, ये पन्ने कम से कम ऐसे तो हों कि वे पेड़ों की कुर्बानी को सही ठहरा सकें! प्रेस काउंसिल के एक वक़्त के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने अपनी कुछ बातों को लेकर मीडिया के बीच एक हलचल खड़ी की थी, और एक नाराजगी भी। लेकिन ‘उनकी’ बातों को लेकर उन्हें भला-बुरा कहने के साथ-साथ, उनके नाम को अलग करके च्उनज् बातों पर चर्चा की जरूरत क्या आज नहीं है? न सिर्फ उनकी कई बातें खरी हैं, बल्कि मीडिया में आज जो खोट है उसे लेकर आपस में ही कुछ खरी-खोटी करने की जरूरत है ताकि अगर किसी किस्म की बेहतरी मुमकिन है तो वह तो हासिल हो सके।

अखबारों के बाजारू मुकाबले के चलते कुछ ऐसी हरकतें हो रही हैं जो कि हमारी इस फिक्र को जायज और जरूरी ठहराती हैं। किसी का नाम लेकर उसे बुरा कहने या बदनाम करने का आज कोई मौका नहीं है इसलिए बिना नाम दो अलग-अलग मामलों की चर्चा यहां करना हमें माकूल लग रहा है। एक शहर में एक बड़े अखबार का स्थानीय संस्करण शुरू होने को था। वहां पहले से निकल रहे एक अखबार को यह फिक्र खड़ी हो गई थी कि नए अखबार के आने से लोग उसकी तरफ ध्यान न दें। उसने नए अखबार के पहले ही दिन, अपने अखबार में शहर की एक इतनी सनसनीखेज खबर छापी कि जिस पर पूरा देश हिल उठा। और तीन हफ्ते बीतते न बीतते देश के एक तीसरे, बड़े और जिम्मेदार अखबार ने यह रिपोर्ट छापी कि वह सनसनीखेज रिपोर्ट पूरी की पूरी झूठी थी, और सोच-समझकर उसे सच से दूर महज सनसनीखेज बनाया गया था। एक दूसरा प्रदेश और दो दूसरे अखबारों के बीच का मुकाबला। वहां भी पुराने जमे हुए अखबार ने नए अखबार के पांव न जमने देने के लिए एक इतनी बड़ी खबर छापी, जिसे पढक़र लोग हिल जाएं। एक बेटे ने अपने मां को मारकर, काटकर, पकाकर खा लिया। इससे बड़ी खबर किसी इलाके के लिए और क्या हो सकती है? और फिर वहां शायद चौथाई या आधी सदी से निकलते अखबार में अगर यह सबसे बड़ी सुर्खी हो, तो फिर लोग और क्या पढऩा चाहेंगे? कम से कम इसके मुकाबले किसी नए अखबार को तो पढऩा नहीं ही चाहेंगे। नतीजा यह हुआ कि नया अखबार बुरी तरह से पिटा हुआ सा लगने लगा। लेकिन उस प्रदेश के पाठकों की हैरानी की कोई सीमा न रही जब नए अखबार ने उस औरत को लाकर पुलिस और पाठकों के सामने पेश कर दिया जिसे कि मार, काट, पकाकर खा चुका गया बताया गया था।
 
लेकिन मीडिया के ऐसे झूठ पर बात आमतौर पर तभी होती है जब बाजार में मुकाबले के लिए किसी को किसी दूसरे अखबार को नीचा दिखाना हो। पर जहां कोई बाजारू टकराव न हों, और जहां अखबारी परंपरागत जुबान के मुताबिक, कुत्ता, कुत्ते को न काट रहा हो, वहां पर लोगों को झूठ की ऐसी साजिशों का क्या पता लगेगा? हम उसी बात पर लौटें, जिस बात से हमने आज लिखना शुरू किया था। जनहित और जनरुचि के फर्क को लेकर मीडिया पर अगर बात नहीं होगी तो यह तो वैसे भी संसद की एक बहस के मुताबिक कार्पोरेट हाऊसों का एक कारोबार बन ही चुका है। कार्पोरेट कारोबार की जुबान में सरोकार सिर्फ हाथीदांत की तरह का होता है। यहां पर चलते-चलते हम एक और अखबार और उसकी खबर का जिक्र करना चाहेंगे। टाईम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली के संस्करण में नोएडा इलाके के लिए निकलने वाले पन्नों पर एक बार एक खबर छपी थी जिसमें एक कार दुर्घटना में मारे गए एक युवक और एक युवती के बारे में कुछ आपत्तिजनक बातें थीं। इस पर अखबार ने अपनी कुछ जानकारियों का खंडन उसी बरस कर दिया था। लेकिन कुछ बरस बाद जाकर, शायद अदालत के बाहर समझौते के लिए, इस खबर को लेकर एक बड़ा सा माफीनामा अखबार ने एक रिपोर्ट की तरह छापा है कि उसकी खबर में कौन-कौन सी बातें झूठी थीं। एक मीडिया वेबसाईट ने हिसाब लगाया है कि करीब सवा दो सौ वर्ग सेंटीमीटर जगह में छपे इस माफीनामे का इस अखबार के विज्ञापन रेट से बिल बनता तो वह करीब आठ लाख रूपए का होता। हम अभी रूपयों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन हम मीडिया की गलतियों, उसके गलत कामों, और उनमें सुधार की ऐसी मिसालों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाना चाहते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 अगस्त 2021


 

दूसरे देशों की कलाकृतियों पर अवैध कब्जा जमाए देश सभ्य लोकतंत्र कैसे हो सकते हैं?

   8 अगस्त 2021

 इराक के प्रधानमंत्री अभी अमेरिका की सरकारी यात्रा पर पहुंचे तो लौटते हुए वे युद्ध के दौरान इराक से लूटी गई 17000 कलाकृतियों को वापस लेकर आए। ये कलाकृतियां एक संग्रहालय और एक प्रमुख अमेरिकी विश्वविद्यालय की तरफ से वापिस की गईं। अभी हाल ही में एक दूसरी खबर भी आई थी जिसके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया ने भी भारत से जुड़ी हुई कुछ पुरानी कलाकृतियां लौटाने का फैसला लिया है। जो विकसित और सभ्य देश हैं वे अपने देश के कलाकृतियों के व्यापारियों और संग्रह कर्ताओं, दोनों पर कई तरह के नियम लागू करते हैं कि वे दूसरे देशों से चुराई गई या लूटी गई कलाकृतियों को न लें।

यहां पर यह भी देखने की जरूरत है कि ब्रिटेन के बड़े-बड़े संग्रहालयों में भारत की कलाकृतियां उस वक्त पहुंचीं जब भारत पर अंग्रेजों ने कब्जा कर रखा था। एक गुलाम देश की कलाकृतियों, पुरातत्व, और संस्कृति को इस तरह से ले जाना एक निहायत नाजायज बात थी, और एक सभ्य लोकतंत्र होने का दवा करने वाले ब्रिटेन को अपने गुलाम देशों से जबरिया ले जाई गईं तमाम चीजों को वापस करना चाहिए। किसी भी देश को यह हक नहीं कि वे खुद दूसरे देशों से लुटेरों की तरह कलाकृतियां ले जाएं या कि चोरों और लुटेरों से उन कलाकृतियों को खरीदें जिन पर किसी दूसरे देश का हक है। सभ्य लोकतंत्र की यह जिम्मेदारी होती है कि वह कोई अंतरराष्ट्रीय कानून लागू हुए बिना भी दुनिया के हर देश के अधिकारों का सम्मान करें। इसलिए अभी इराक की जो कलाकृतियां वहां की सरकार को लौटाई गईं वह एक अच्छी पहल है क्योंकि आज इराक ऐसी हालत में भी नहीं था कि वह अमेरिका पर कोई दबाव बना सके, और ऐसे में अमेरिकी संग्रहालय और एक विश्वविद्यालय ने अगर ऐसी पहल की है तो उससे दुनिया के बाकी लोगों को भी सबक लेना चाहिए। भारत का कलाकृतियों का और पुरातत्व का सैकड़ों बरस पुराना एक संपन्न इतिहास रहा है और अविभाजित भारत-पाकिस्तान के वक्त से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की संस्कृति बहुत ही पुरानी रही है। जाहिर है कि पुरातत्व के ऐसे शोध कार्यों से उस वक्त जो चीजें निकली होंगी उनमें से बहुत सी इधर-उधर हो गई होंगी। जिन देशों में दूसरे देशों की ऐसी कलाकृतियां है उन्हें अपने विकसित और सभ्य लोकतंत्र होने का सबूत देते हुए और अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का सम्मान करते हुए ऐसी तमाम चीजों को उनके मूल देश को वापिस करना चाहिए।

दिक्कत यह भी है कि ब्रिटेन जैसे हमलावर और नाजायज कब्जा करने वाले देश अपने गुलाम देशों से लूटी गई चीजों को यह कह कर न्यायोचित ठहराते हैं कि वहां के भूतपूर्व राजाओं ने यह सामान उन्हें तोहफे में दिए थे। ब्रिटेन की महारानी के ताज पर जो कोहिनूर जड़ा हुआ है उस कोहिनूर को लेकर भी यही तर्क दिया जाता है कि इसे भारत के एक शासक महाराज रंजीत सिंह ने युद्ध में अंग्रेजों द्वारा की गई मदद के एवज में तोहफे में दिया था, लेकिन ब्रिटेन के कई संग्रहालयों में भारत की अनगिनत कलाकृतियां सजी हुई हैं और अंग्रेजों की सरकार को इन्हें रखने का कोई भी हक नहीं है। पूरी दुनिया में कलाकृतियों को उनके मालिकों तक वापस पहुंचाने की एक मुहिम चलाने वाले लोगों का एक बड़ा आसान सा तर्क है उनका मानना है इतिहास भूगोल के आधार पर तय होगा, यानी जिस जगह का सामान है उसी जगह उसे भेजना न्याय उचित होगा।  एक बात यह भी है कि ऐसे एक अभियान से जुड़े हुए लोगों ने ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बहुत से संग्रहालयों में ऐसी कलाकृतियां ढूंढ निकाली हैं जो कि भारत के मंदिरों से 1947 के बाद चोरी की गई हैं। अभी-अभी, 2 बरस पहले जर्मनी ने भारत से चुराकर वहां ले जाई गई एक कलाकृति को भारत को वापिस भी किया है। लेकिन यह काम बहुत धीमे हो रहा है और अधिकतर देश इसमें खुलकर साथ नहीं दे रहे हैं।

एक वक्त आधी दुनिया पर कब्जा करने वाले अंग्रेजों की सोच आज भी ऐसी है कि ब्रिटेन के दो बड़े संग्रहालयों का यह कहना है कि वे अलग-अलग देशों की ऐसी ऐतिहासिक कलाकृतियों या पुरातत्व कृतियों को इसलिए नहीं लौटा सकते क्योंकि ब्रिटेन का म्यूजियम एक्ट इसकी इजाजत नहीं देता, या फिर इन कलाकृतियों का ब्रिटेन में बने रहना विश्व के हित में है। यह सोच आज भी एक सामंती और साम्राज्यवादी सोच बनी हुई है जो कि दूसरे देशों का भला अपने अधिकारों में अलग देख रही है। ऐसे चोर देशों के भीतर वहां के सांसदों को भी संसद में आवाज उठानी चाहिए कि क्या अपने को लोकतंत्र की जननी कहने वाले देश को ऐसी गुंडागर्दी का हक़ है?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 अगस्त 2021


 

दीवारों पर लिक्खा है, 6 अगस्त 2021


 

एक ऐसी अफीम जिसने संघर्ष की ताकत ही खत्म कर दी लोगों की, धर्म और कर्म की कुछ चर्चा

   6 अगस्त 2021

 ईसाई धर्म से जुड़ी हुई संस्कृति में क्रिसमस के मौके पर एक काल्पनिक सांता क्लॉज रात में आकर बच्चों के लिए तोहफे छोड़ जाता है। शायद यह रिवाज इसलिए शुरू किया गया है कि ऐसे तोहफे अच्छे बच्चों को ही मिलने की बात उनके ध्यान में डाली जाती है और ऐसा बताया जाता है कि खराब काम करने वाले बच्चों को सांता क्लॉज कोई तोहफे नहीं देता। धर्म से जुड़ी हुई बहुत सी बातें इस किस्म की होती हैं जो लोगों को सपनों में जीने का मौका देती हैं। कहीं पर पूर्वजन्म के किए का फल इस जन्म में, और इस जन्म में किए का फल अगले जन्म में पाने की बात सिखाई जाती है तो कहीं यह सिखाया जाता है कि जिनको कम मिल रहा है, वह उनके कर्मों का फल है। सांता क्लॉज की धारणा तो कम नुकसानदेह है क्योंकि यह ईसाई संस्कृति में या पश्चिमी जीवन-शैली में समारोह को मनाने के एक तरीके के रूप में इस्तेमाल की जाती है और छोटे बच्चों को तोहफे देने का यह एक रास्ता होता है। लेकिन धर्म जब बहुत सी दूसरी बातों को कर्म से अलग करके स्थापित करने की कोशिश करता है तो वह कार्ल मार्क्स के शब्दों में अफीम की तरह लोगों को सुस्त और मंद करके सोचने और संघर्ष करने से दूर कर देता है।

हम किसी एक धर्म के त्यौहार के मौके पर इस चर्चा को नहीं छेड़ रहे हैं क्योंकि बहुत से धर्मों में, या शायद सभी धर्मों में, धर्म लोगों को कर्म से दूर रखने का एक जरिया रहता है, और इस कर्म में सामाजिक जागरूकता और अपने हक़ ले लिए संघर्ष भी शामिल रहते हैं। यह सिलसिला भारत सहित बहुत से देशों में बहुत खतरनाक हद तक लोगों को ऐसा भाग्यवादी और ऐसा निराश बना देता है कि लोग अपने साथ हो रहे किसी भी किस्म के अन्याय को अपनी किस्मत मान बैठते हैं और उसके लिए जो अच्छा-बुरा कहना रहता है वह ईश्वर को कहकर, उसके लिए असल जिम्मेदार इंसानों को बख्श देते हैं, जिससे कि समाज के भीतर अन्याय के खिलाफ संघर्ष की संभावना खत्म हो जाती है। धर्म को बनाया इसी हिसाब से गया है कि वह ताकतवर शोषक को कमजोर बहुसंख्यक तबके का निशाना कभी न बनने दे। इसलिए हम भारत में लगातार देखते हैं कि जनता को, देश को और धरती को लूटने वाले सबसे बड़े लोगों से किसी धर्मगुरु को कोई परहेज नहीं होता और उनके प्रवचनों में, धार्मिक अनुष्ठानों में हर किस्म के अपराधी ताकतवर लोग सबसे ऊपर, सबसे सामने जगह पाते हैं और एक किस्म से प्रवचन करने वाले गुरु ऐसे लोगों का सम्मान करते भी दिखते हैं, इन्हीं के डेरों में महीनों गुजारते हैं। यह पूरा सिलसिला माक्र्स की जुबान की अफीम की तरह लोगों को सामाजिक और आर्थिक शोषण और अन्याय को समझने से भी दूर रखता है और इस तरह धर्म, और उसकी एक दूसरी शक्ल आध्यात्म, में पूंजी निवेश करके ताकतवर, अत्याचारी और शोषक तबके उसी तरह एक बीमा पॉलिसी और चौकीदार खरीद लेते हैं जिस तरह वे अपने कारखानों और दुकानों के लिए खरीदते हैं।

ईश्वर को न मानने वाले हमारे किस्म के नास्तिक इतने कम हैं, और उनकी प्रचार की ताकत इतनी कम है कि वे ईश्वर की धारणा का भांडाफोड़ नहीं कर पाते। दूसरी बात यह कि ईश्वर की धारणा, धर्म की बातें दिमाग पर जोर नहीं डालतीं, वे चूंकि तर्कों से परे की होती हैं इसलिए वे लोगों को कीर्तन में सिर हिलाने की तरह का आसान काम लगती हंै। धर्म पर सवाल खड़े करना, उसकी वैज्ञानिकता और उसकी सामाजिक उपयोगिता के बारे में बात करना बहुत तकलीफ का काम होता है। और किसी भी जगह किसी भी आबादी या भीड़ में यह न तो लोकप्रिय काम होता और न ही लुभावना काम। लेकिन हम ऐसा काम करने से परहेज नहीं करते और लोगों को धर्म के बजाय कर्म की तरफ देखने को सलाह देते रहते हैं। धर्म का राज जब तक समाज के लोगों के दिल-दिमाग पर चलता रहेगा तब तक समाज के सबसे ताकतवर लोग सबसे कमजोर तबकों पर राज करते रहेंगे, उनके हक लूटते रहेंगे। कबीलों के जमाने से लेकर आज की 21वीं सदी तक धर्म ने कमजोर लोगों को लूटने का, लुटवाने का काम ही किया है, और जब हिटलर ने लाखों को मारा, तब भी पोप चुप ही रहा। कहने को यह बात कही जा सकती है कि ईश्वर, धर्म और धर्मगुरुओं में फर्क है। किसी तर्क से बचने के लिए, किसी बहस से बचने के लिए धर्म के झंडाबरदार अक्सर यह तर्क उठा लेते हैं कि धर्म का यह बिगड़ा हुआ चेहरा ईश्वर नहीं है। लेकिन समाज पर राज तो धर्म का बिगड़ा हुआ चेहरा ही करता है। यह चर्चा हमने छेड़ी तो आज है लेकिन इसका किसी एक धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और हर धर्म के लोग अपने-अपने भीतर यह झांक सकते हैं कि वहां पर किस-किस किस्म का शोषण उनके ईश्वर और धर्म के बैनर तले चल रहा है, चलता रहेगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 5 अगस्त 2021


 

रेप की शिकार बच्चियों की जात और बलात्कारियों की जात को देखने-समझने की भी जरूरत है

  5 अगस्त 2021

 दिल्ली में अभी एक दलित बच्ची से गैंग रेप के बाद उसका कत्ल कर दिया गया। 9 साल की बच्ची से बलात्कार के बाद हत्या में पुजारी सहित चार गिरफ्तार  किये गए हैं। दिल्ली के  मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल फांसी की मांग की है। लेकिन बलात्कारी हत्यारा एक पुजारी दिख रहा है, और मरने वाली बच्ची एक दलित, तो उससे एक बड़े तबके की जुबान बंद हो गयी है। जो लोग इसी दिल्ली में निर्भया के बलात्कार के बाद कह रहे थे कि वोट डालते हुए निर्भया को यद् रखना, वे अभी चुप हैं। देश भर में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब ऐसे दस-बीस मामले अस्पताल और पुलिस तक न पहुंचते हों। दिल्ली चूंकि कैमरों के घेरे में रहती है इसलिए वहां की छोटी-छोटी बात भी खबर बन जाती है। फिर दूसरी बात यह कि जब परिवार के लोग यह तय करते हैं कि ऐसे बलात्कार या देहशोषण के मामले पुलिस तक ले जाए जाएं, तभी वे मीडिया की नजर में भी आते हैं। लेकिन इससे कई गुना अधिक मामले सामाजिक शर्मिंदगी या पारिवारिक असुविधा की बात सोचकर घर में ही दबा दिए जाते हैं।

यह भी याद रखने की जरूरत है कि किस तरह कुछ बरस पहले जब जम्मू में एक खानाबदोश बच्ची से गैंगरेप में एक पुजारी सहित आधा दर्जन लोग गिरफ्तार हुए थे, तो किस तबके ने वहां पर देश का झंडा लेकर बलात्कारियों को बचाने के लिए जुलूस निकाला था और उस मुस्लिम खानाबदोश बच्ची की वकील के ऊपर अंधाधुंध दबाव डाला गया था कि वह मुजरिमों को सजा दिलाने की कोशिश ना करें। इसलिए जब इस देश में बलात्कारियों को धर्म और जाति के आधार पर बचाने की कोशिश होगी तो लोगों को यह याद रखना चाहिए कि ऐसी बचाने वाली जाति और ऐसे धर्म के लोगों के बच्चे भी खतरे में आएंगे, और उनको बचाते हुए ये जाति और धर्म किसी काम के नहीं रहेंगे।

अब बच्चों से बलात्का की ऐसी तरह-तरह की नौबत को देखते हुए पूरे देश में जिन बातों की जरूरत है, उनमें पहली तो यह है कि छोटे बच्चों को बिना हिफाजत न छोड़ा जाए। बेंगलुरू जैसे एक बड़े शहर में स्कूली बच्चियों से स्कूलोंं में ही लगातार बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं, और सबसे पढ़े-लिखे शहर का यह हाल है। गांवों में नौबत और खराब होगी, यह तय है। इसलिए पूरे देश में बच्चों की हिफाजत को लेकर न सिर्फ सरकार को बल्कि समाज और परिवार को भी एक नई जागरूकता के साथ और एक नई सावधानी के साथ सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह कि समाज को यह भी समझना पड़ेगा कि बच्चों का देहशोषण करने वाले लोग उसके अपने बीच के होते हैं, और बहुत से मामलों में उनकी परिवार तक, स्कूल तक पहुंच होती है। इसलिए अपने पारिवारिक परिचितों के बारे में ऐसा अंधविश्वास ठीक नहीं है कि वे भला ऐसा कैसे कर सकते हैं।

तीसरी बात यह कि बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो शायद किशोरावस्था से भी पहले, आठ-दस बरस की उम्र से उन्हें उनके बदन के बारे में, और सावधानी बरतने के बारे में सिखाना बहुत जरूरी है। भारत में दरअसल जब कभी बच्चों को सिखाने के मामले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल भी होता है, तो संस्कृति के ठेकेदारों का एक ऐसा तबका उठकर खड़ा हो जाता है जो सोचता है कि यह बच्चों को सेक्स करना सिखाने की योजना है। बच्चों को उनके बदन की जानकारी देना, और सेक्स के प्रति सावधान करना भी एक जरूरी शिक्षा है, और देश का कट्टरपंथी माहौल इसकी इजाजत ही नहीं देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे किशोरावस्था से पार होने लगते हैं, और अपने बदन से लेकर देहसंबंधों तक की उनकी जानकारी पोर्नोग्राफी या अश्लील फिल्मों से मिली रहती है, उन्हें किसी तरह की वैज्ञानिक या मानसिक सीख नहीं मिल पाती।

देश भर में सेक्स-अपराध बहुत बढ़ रहे हैं, और बच्चों की जिंदगी में सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। स्कूलें दूर-दूर हैं, वहां आना-जाना पड़ता है, खेलकूद में बच्चों को दूर तक जाना पड़ता है, और जब मां-बाप दोनों कामकाजी रहते हैं तो भी बच्चों को घंटों तक अकेले रहना पड़ता है। ऐसे में कम उम्र से भी उनको एक सावधानी सिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि बच्चे परिवार से जुड़े किसी के बारे में मां-बाप को शिकायत करते हैं, तो मां-बाप उनको ही झिडक़कर चुप करा देते हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए, क्योंकि सेक्स-अपराधी चारों तरफ फैले हुए हैं, और मौकों की तलाश में रहते हैं। पश्चिमी देशों में साइबर-पुलिस लगातार ऐसे मुजरिमों को इंटरनेट पर तलाशती रहती है, और पकडक़र सजा भी दिलवाती रहती है। लेकिन भारत अभी तक बच्चों के यौन शोषण के खतरों की तरफ से आंखें बंद किए बैठा है कि मानो यह कोई पश्चिमी समस्या है।

एक खबर के मुताबिक़ - ‘‘बिहार के मुंगेर में कल ही दूसरी कक्षा में पढने वाली 8 साल की बच्ची की रेप के बाद निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। मछली मारने वाले की बेटी का क्षत विक्षत शव बरामद हुआ। मृत बच्ची की बलात्कार के बाद साक्ष्य छिपाने को लेकर हत्या निर्मम तरीके से की गई थी। रेप के बाद हत्या की गई और फिर आंख निकाल ली।’’ जिस बात को आज अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए वह यह है कि हिंदुस्तान में सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समझी जाने वाली जातियों और वैसे धर्मों के बच्चों और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं ज्यादा होती हैं। भारत की जाति व्यवस्था को लेकर भी एक बार यह सोचने की जरूरत है कि बलात्कारियों में ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग अधिक क्यों हैं, और बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं में नीची कहीं जाने वाली जातियों की लड़कियां और महिलाएं अधिक क्यों है? 

(Daily Chhattisgarh)