दीवारों पर लिक्खा है, 5 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सडक़ों पर नियम तोडऩे का हक महज जुर्माने से अधिक सजा का हकदार

5 अगस्त 2022
   

छत्तीसगढ़ में कल एक बुरा सडक़ हादसा हुआ, जिसमें मौतें तो कुल तीन हुईं, लेकिन उनसे सरकार के इंतजाम की कमजोरी उजागर हुई है। एक नौजवान लडक़े ने अपनी गर्लफ्रेंड को कार का स्टियरिंग थमा दिया जिसे कि कार चलाना आता ही नहीं था। नतीजा यह हुआ कि उसने इलाज के लिए अस्पताल जाते हुए एक बाईक पर सवार तीन लोगों को कार से बहुत बुरी तरह ठोकर मारी, और उसमें तीनों लोगों की मौत हो गई। जख्मी कार सवार लोगों को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, और कार को जब्त किया है। सडक़ों पर इस तरह की गैरकानूनी बददिमाग हरकत छत्तीसगढ़ के शहरों में बड़ी आम बात है। यहां आबादी के एक छोटे तबके के पास इतना अधिक पैसा है कि वह सिर चढक़र बोलता है। शहरों में महंगी गाडिय़ों पर सवार बददिमागी दूसरों के लिए खतरा बनी हुई दिखती ही रहती है। कहने के लिए पुलिस यह आंकड़े पेश कर सकती है कि उसने पिछले कितने हफ्तों में कितने लोगों पर क्या-क्या चालानी कार्रवाई की है, लेकिन कानून तोडऩे वालों के मुकाबले चालान पटाने वालों का अनुपात बड़ा छोटा सा दिखता है, और यही नतीजा है कि सडक़ों पर दूसरों के हक कुचलते हुए बददिमागी दिखाने वाले लोग कभी कम होते नहीं दिखते हैं। अब हिन्दुस्तानी सडक़ों पर बड़ी से बड़ी गाडिय़ां आम दिखने लगी हैं, और एक-एक शहर में लाखों रूपये से अधिक दाम वाली हजारों मोटरसाइकिलें भी दौड़ती हैं। नतीजा यह होता है कि जेब में रखे क्रेडिट कार्ड की ताकत के साथ जब गाड़ी का हॉर्सपॉवर मिलता है, तो मिजाज नीम चढ़े करेले सरीखा हो जाता है।

आज एक दिक्कत यह भी है कि पुलिस अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरा करने के बजाय हर नौबत में यह तौलने में लगी रहती है कि किसी ऐसे का चालान न हो जाए जो कि उनका ही ट्रैफिक से बस्तर के किसी थाने में तबादला करवाने की ताकत रखता हो। और यह डर छोटे-छोटे सिपाहियों का ही नहीं रहता है, आज इस प्रदेश में बड़े से बड़े पुलिस अफसर लगातार इस तनाव में काम करते हैं कि उनके काम से सत्ता में ताकत रखने वाले कोई लोग नाराज न हो जाएं। नतीजा यह होता है कि सत्तारूढ़ बददिमागी या सत्ता तक पहुंच रखने वाली बददिमागी लोगों को रौंदते चलती है। इस नौबत को सुधारने का एक अच्छा तरीका कुछ हफ्ते पहले केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सुझाया था। उन्होंने बताया था कि ऐसा एक कानून लाया जा रहा है जिसमें ट्रैफिक नियम तोडऩे वाले लोगों के वीडियो बनाकर लोग पुलिस को भेज सकेंगे, और अगर वे चालान करने लायक होंगे, तो जुर्माने का एक हिस्सा वीडियो भेजने वाले लोगों को भी मिलेगा। हमने इसकी तारीफ में इसी जगह लिखा था कि इससे लोगों में नियम का सम्मान बढऩे तक कई लोगों को एक मजदूरी या रोजगार सरीखा भी मिल सकेगा। लेकिन इस पर कई जागरूक लोगों ने यह लिखना शुरू कर दिया था कि सरकार की ऐसी सोच लोगों को आपस में लड़वाने की है। यह लोगों का काम नहीं है कि वे ट्रैफिक सुधारें, सरकार अपने हिस्से का काम लोगों पर डाल रही है। ऐसी सोच पर हमें बड़ा अफसोस हुआ था क्योंकि किसी भी सभ्य समाज में नियम-कानून लागू करने का काम अकेले सरकार का नहीं होता है, यह पूरे समाज की जिम्मेदारी होती है। और अगर समाज अपनी किसी भी तरह की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहता है, तो फिर इसकी कीमत उसे बहुत बड़ी संख्या में पुलिस  बढ़ाकर देनी होगी, जिसका आर्थिक बोझ जनता पर ही आएगा। जनता के बीच से अगर ऐसी जागरूकता निकलती है जो कि सडक़ों पर अराजकता करने वाले लोगों को कैमरों पर कैद करके पुलिस को भेजे, और एक ईनाम पाए, तो इससे दोहरा फायदा होगा। जरूरतमंदों को आर्थिक मदद मिलेगी, और नियम तोडऩे वाले लोगों को यह पता होगा कि आसपास पुलिस नहीं दिख रही है तो भी उनके गैरकानूनी काम के सुबूत पुलिस तक पहुंच सकते हैं।

देश भर के बहुत से प्रदेशों में ऐसा हाल होगा कि लोग अपने छोटे बच्चों को गाडिय़ां देकर खुश होते होंगे। लेकिन ऐसे बच्चे सडक़ों पर औरों के लिए बड़ा खतरा बनते हैं। इनके अलावा नशे में गाड़ी चलाने वाले, अंधाधुंध रफ्तार से गाड़ी चलाने वाले लोग भी कम नहीं हैं। हम तो आसपास यह देखकर थक जाते हैं कि एक चौथाई दुपहिया वाले एक हाथ में मोबाइल पकडक़र, या सिर और कंधे के बीच उसे फंसाकर सामने तिरछा देखते हुए गाड़ी चलाते जाते हैं। अब इस सिलसिले को रोकने की भी जरूरत है, और कड़े नियमों का इस्तेमाल करके इन लोगों की गाडिय़ां भी राजसात करनी चाहिए, और इनके लाइसेंस भी रद्द करने चाहिए। सडक़ों पर नियम तोडऩे का सीधा मतलब दूसरों की जान के लिए खतरा खड़ा करना होता है, और पुलिस या आरटीओ के लोग ऐसे भ्रष्ट और अराजक लोगों को किसी की जिंदगी नहीं देख सकते। हिन्दुस्तान के प्रदेशों को सभ्य और सुरक्षित बनना चाहिए, और नियम तोडऩे वाले लोगों की सुबूत सहित शिकायत पुलिस को करनी चाहिए, यह काम पुलिस की मुखबिरी करने जैसा नहीं है, यह काम अपने आपको सुरक्षित रखने का भी है। रोजाना कई मौतें छत्तीसगढ़ जैसे छोटे से प्रदेश में भी सडक़ों पर हो रही हैं, और सडक़ से जुड़े सरकारी महकमों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

ताइवान पर अमरीका और चीन में तनाव कहां तक?

 4 अगस्त 2022
    

अभी दुनिया यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद शुरू हुई जंग को ही बड़ी मुश्किल से झेल पा रहा है। इन दो देशों से दूर, धरती के बिल्कुल दूसरी तरफ बसे हुए देशों तक भी इस जंग के धमाकों से अर्थव्यवस्था में दरारें पड़ रही हैं। चारों तरफ पेट्रोलियम और गैस के दाम बढ़ रहे हैं, अनाज और खाद की कमी हो रही है, और महंगाई से परे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो कि अंतरराष्ट्रीय दान में मिले अनाज पर जिंदा है, और वह हिस्सा भूख से मौत की तरफ बढ़ रहा है क्योंकि यूक्रेन में जमा अनाज बाहर निकल नहीं पा रहा है। इस जंग में अपनी फौजें न भेजते हुए भी योरप और अमरीका हथियार भेजकर शामिल तो हो ही चुके हैं, लेकिन इस बीच एक नया टकराव एक नई सरहद पर हो रहा है, वह भी दुनिया के लिए रूस-यूक्रेन से बड़ी फिक्र का सामान हो सकता है।

अमरीकी कांग्रेस (संसद) की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी उस ताइवान में पहुंची हुई हैं जिसे चीन अपना एक हिस्सा मानता है। और दशकों से यह तनाव चल रहा है, चीन अपना फौजी बाहुबल दिखाते रहता है, ताइवान किसी टकराव से बचकर एक कामयाब कारोबारी देश बन चुका है। और इस तनाव के बीच अमरीका अपनी पूरी ताकत के साथ ताइवान के पीछे खड़ा दिखता है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करेगा तो अमरीका उसका जवाब देगा। हालांकि अमरीका की घोषित विदेशनीति में ताइवान की फौजी मदद की घोषणा नहीं है, लेकिन अमरीका की कही बातों का लब्बोलुआब वही रहता है कि वह ताइवान पर किसी भी चीनी हमले के वक्त ताइवान का साथ देगा। अभी जब अमरीकी संसद की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी के ताइवान जाने की खबर आई तो चीन ने जमकर विरोध किया, और उसका यह कहना था कि ताइवान उसी का हिस्सा है, और वहां पर एक प्रमुख अमरीकी नेता का आना चीन बर्दाश्त नहीं करेगा। अमरीकी सरकार ने यह साफ कर दिया कि संसद की अध्यक्ष सरकार के मातहत नहीं आती, और संसद एक स्वायत्त संस्था है, इसलिए उसकी अध्यक्ष का कार्यक्रम अमरीकी सरकार तय नहीं करती। फिलहाल तनातनी के बीच नैंसी पेलोसी ताइवान पहुंच चुकी हैं, और चीन अपना फौजी बाहुबल दिखाते हुए ताइवान के करीब अपने फाइटर प्लेन उड़ा रहा है, करीब के समंदर में चीन और अमरीका के फौजी जहाज पहुंचे हुए हैं, और यह तनाव का एक नया मोर्चा खुला है।

वैसे तो जब से यूक्रेन पर रूसी हमला हुआ, तभी से यह चर्चा चल रही थी कि क्या इससे प्रेरणा लेकर चीन भी ताइवान पर हमला करेगा? लेकिन यूक्रेन के मुकाबले आज की बाकी दुनिया ताइवान पर अधिक दूर तक टिकी हुई है, और अगर ताइवान किसी जंग में फंसता है, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था इस बुरी तरह गिरेगी कि जिसका अंदाज लगाना भी आज मुश्किल है। दरअसल ताइवान हर किस्म की मशीन और कम्प्यूटर में लगने वाले सेमीकंडक्टर और माइक्रोचिप का दुनिया का सबसे बड़ा निर्माता है। अगर किसी वजह से ताइवान में ये कारखाने थमते हैं, तो पूरी दुनिया में मोबाइल फोन से लेकर कार-टीवी तक, और कम्प्यूटरों तक का उत्पादन ठप्प पड़ जाएगा। एक अकेला देश दुनिया की इलेक्ट्रॉनिक धडक़न को रोकने वाला साबित होगा। ऐसा नहीं कि आज लोगों को इसका अंदाज नहीं है, लेकिन यूक्रेन के तुरंत बाद ताइवान को लेकर एक फिक्र की नौबत इतनी जल्दी आएगी, यह बात किसी को नजर नहीं आ रही थी। फिर लोगों को इस बात पर भी हैरानी हो रही है कि अमरीकी संसद की अध्यक्ष को आज अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ताइवान का साथ देने के लिए इस तरह वहां पहुंचकर चीन के साथ तनाव बढ़ाने की बात क्यों सूझी? अभी यह बात साफ नहीं है कि अमरीकी सरकार और वहां की संसद-अध्यक्ष के बीच इस मुद्दे पर कितनी सहमति बनी है, या नहीं बनी है। लेकिन इस एक दौरे से, नैंसी पेलोसी के लौटते ही चीन ने ताइवान की फौजी नाकेबंदी कर दी है, और उसके आसपास फौजी कसरत छेड़ दी है। मानो इसके जवाब में अमरीका ने अपना एक सबसे बड़ा जंगी जहाज वहीं पास में पहुंचा दिया है। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था ऐसा कोई टकराव झेलने की हालत में नहीं है जिससे कि तमाम देशों के इलेक्ट्रॉनिक कारोबार ठप्प हो जाने का खतरा रहे। इससे दुनिया के कारोबार के सामने यह सोचने का एक सामान भी आ खड़ा हुआ है कि किसी एक नाजुक और जरूरी पुर्जे को लेकर क्या किसी एक देश पर इतना आश्रित रहना समझदारी की बात है?

ताइवान और चीन के बीच ऐतिहासिक तनाव हमेशा से चले आ रहा है, और ताइवान चूंकि चीन की फौजी ताकत के मुकाबले कहीं नहीं टिकता, इसलिए वह बिना टकराव अपनी आर्थिक तरक्की करने में लगे रहता है। अमरीका की कोई अतिरिक्त हमदर्दी ताइवान से हो, ऐसी कोई वजह नहीं है, लेकिन आज दुनिया के फौजी भूगोल में दुश्मन के दुश्मन देश को दोस्त बनाने का जो सिलसिला चलता है, उसी के तहत चीन के दुश्मन अमरीका को, चीन का दूसरा दुश्मन ताइवान सुहाता है। लेकिन ताइवान आज अपने कारोबारी एकाधिकार को लेकर दुनिया पर एक खतरनाक नौबत खड़ी करता है कि अगर उसके कारखाने ठप्प हुए, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था ठप्प हो जाएगी। और यह अर्थव्यवस्था उन कारोबारों की ठप्प होगी जो कि रूस-यूक्रेन जंग से प्रभावित नहीं हैं। दुनिया का इलेक्ट्रॉनिक कारोबार अगर ठप्प होगा, तो दुनिया भर की सरकारों का टैक्स भी मार खाएगा। इसलिए यह खतरा रूस-यूक्रेन के खतरे से बड़ा हो सकता है।

आज चीन और अमरीका, ये दोनों ही देश अपनी ताकत को बढ़ाने और अपने प्रभाव क्षेत्र को फैलाने का कोई भी मौका नहीं चूकते हैं। फिर आज रूस की घेरेबंदी करते हुए पश्चिमी देशों ने रूस के चीन पर आश्रित होने को भी बढ़ा दिया है। दुनिया की महाशक्तियों के बीच संतुलन की यह एक नई नौबत है, और अभी तस्वीर साफ भी नहीं है। इसलिए आने वाला वक्त यह बताएगा कि ताइवान को लेकर अमरीका और चीन के बीच तनाव बढ़ता है, या कि बांहें फडक़ाने के बाद ये दोनों देश चुप बैठेंगे। फिलहाल ऐसे कोई भी अंतरराष्ट्रीय तनाव फिक्र तो खड़ी करते ही हैं क्योंकि दुनिया मौजूदा तनावों से भी उबर नहीं पा रही है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

बच्चों के पोर्नो फैलाने पर गिरफ्तारियां बंद नहीं, इसका इलाज क्या है?

  3 अगस्त 2022
     

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अभी 11 लोगों को बच्चों के पोर्नो वीडियो इंटरनेट पर डालने और उन्हें फ़ैलाने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। हर कुछ महीनों में इस राज्य में ऐसी गिरफ्तारी हो रही है, और देश में तो हर दिन कहीं न कहीं ऐसा हो रहा है। बच्चों के पोर्नो का एक मतलब यह भी होता है कि उनका देह-शोषण भी हो रहा है।

दो बरस पहले उत्तरप्रदेश से बच्चों के सेक्स-शोषण का एक भयानक मामला सामने आया था जिसमें सिंचाई विभाग का एक इंजीनियर, रामभवन सिंह, बच्चों को इधर-उधर से जुटाकर उनका यौन शोषण करता था, और उनके वीडियो बनाकर इंटरनेट पर बेचता था। दस साल से वह यह काम करते आ रहा था, लेकिन उसके रिश्तेदारों को भी इसकी भनक नहीं लगी थी। फिर जब किसी सुराग से पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, तो उसके पास बच्चों के पोर्नो का जखीरा मिला है। अब तक की जांच से पता लगा है कि वह गरीब परिवारों के 5 से 16 बरस तक की उम्र के बच्चों को अपना निशाना बनाता था। उसके पास से इतने डिजिटल सुबूत बरामद हुए थे कि इस मामले में शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। इसकी जांच सीबीआई कर रही थी. यह अफसर बच्चों को मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने के बहाने बुलाता था और उनका सेक्स-शोषण करता था।

इसके पहले 2017 में केरल में पुलिस ने लोगों के एक ऐसे समूह को पकड़ा था जो कि आपस में अपने बच्चों के अश्लील वीडियो बनाकर, उनकी नग्न तस्वीरें खींचकर शेयर करते थे, और इस समूह को चलाने वाले ने ऐसे पांच हजार लोगों को जुटा लिया था। यह मुस्लिम नौजवान इस बात की वकालत करता था कि जब तक बच्चियां चार बरस की रहें, उनसे बलात्कार करने में कोई हर्ज नहीं है क्योंकि इस उम्र की बातें उनको याद नहीं रहती। यह आदमी अपनी ही बच्चियों से बलात्कार करते उनके भी वीडियो पोस्ट करता था। केरल पुलिस ने इन पांच हजार लोगों को पकडऩे की पूरी कोशिश की थी, लेकिन ये लोग मोबाइल फोन के एक ऐसे मैसेंजर, सिग्नल, का इस्तेमाल करते हुए जहां किसी को पकड़ा नहीं जा सक रहा है। इन लोगों ने अपने सरीखे हजारों लोगों के साथ ऐसे वीडियो शेयर करने का काम कर रखा था और इसमें गिरफ्तारियां शुरू हो गई है।

लेकिन इतने बड़े मामलों का भांडाफोड़ होने से इसकी गिरफ्तारी के साथ-साथ अब आगे उन लोगों की गिरफ्तारी भी होनी चाहिए जो कि बच्चों के पोर्नो खरीदते हैं। इंटरनेट के जानकार लोग यह जानते हैं कि इंटरनेट पर आसानी से पकड़ में न आने वाला एक डार्क वेब होता है जिस पर तरह-तरह के मुजरिम काम करते हैं और वहां ऐसे वीडियो की खरीद-बिक्री भी होती है। हिन्दुस्तान में सीबीआई को तलाशते हुए योरप की किसी पोर्नो वेबसाईट पर एक हिन्दुस्तानी बच्चे का ऐसा पोर्नो मिला और वहां से ढूंढते हुए जांच एजेंसी रामभवन तक पहुंची।

इस मामले का भांडाफोड़ होने से हिन्दुस्तान के लोगों की आंखें खुलनी चाहिए कि बच्चों का यौन-शोषण कोई विदेशी सोच नहीं है, यह देशों की सरहदों से परे इंसानों के बीच एक आम बात है, और ऐसे अधिकतर लोग बच्चों का सेक्स-शोषण करने के बाद भी बच निकलते हैं क्योंकि बच्चे अपने घर या स्कूल में अपने शोषण की बात बताते भी हैं तो भी उनके ही लोग उस पर भरोसा नहीं करते। धीरे-धीरे बच्चों में बताने का हौसला खत्म होने लगता है। अब अगर एक अफसर 50 से अधिक बच्चों का शोषण कर चुका है, उसके कब्जे से दर्जनों वीडियो और सैकड़ों तस्वीरें मिली हैं, वह इंटरनेट पर पोर्न साईट्स को ये वीडियो बेच देता था, और बच्चों से सेक्स भी करते रहता था, 10 बरस तक उसका कोई भांडाफोड़ नहीं हो सका, तो यह नौबत भारतीय समाज के एक खतरनाक हाल को बताती है।

दुनिया के बाकी तमाम देशों के साथ-साथ हिन्दुस्तान के समाज को जागरूक होने की जरूरत है क्योंकि गरीब और बेघर बच्चे, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, शिक्षकों और खेल प्रशिक्षकों की पहुंच के भीतर के बच्चे हमेशा ही खतरे में रहते हैं। हिन्दुस्तान में मां-बाप अपने बच्चों की शिकायतों को इसलिए भी सुनना नहीं चाहते क्योंकि ये शिकायतें कई तरह की असुविधा खड़ी करने वाली रहती हैं, रिश्तेदारों या पहचान वालों से रिश्ते बिगड़ते हैं, पुलिस थाने और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगते हैं, और जैसे कि आम हिन्दुस्तानी सोच है, सेक्स-हमले के शिकार लोगों के लिए ही यह मान लिया जाता है कि उनकी इज्जत लुट गई है। इस देश में बलात्कारी की इज्जत नहीं लुटती, बलात्कार के शिकार की इज्जत लुटती है। ऐसे देश में शिकायत लेकर किसी बच्चे का सामने आना नामुमकिन सा रहता है।

हिन्दुस्तान अपने डिजिटल विकास पर बड़ा गर्व करता है। लेकिन यहां चारों तरफ साइबर-ठगी चलती रहती है, साइबर-जालसाजी, और साइबर-जुर्म एक बड़ा कारोबार बन चुका है। ये तमाम जुर्म सरकार के काबू के बाहर दिखते हैं। इसी तरह चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर सरकार की पकड़ बहुत कम दिख रही है जबकि कई अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियां और दूसरे संगठन लगातार चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर नजर रखकर संबंधित सरकारों को सावधान करने का काम करते हैं। हिन्दुस्तान सरकार को ऐसे डिजिटल औजार विकसित करने चाहिए जो कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी का किसी भी शक्ल में इस्तेमाल करने वाले लोगों को पकड़े। हाल के महीनों में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में भी बहुत से लोग दिल्ली से मिली सूचना के आधार पर गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन वॉट्सऐप जैसे तकनीक के चलते लोग दूसरे किस्म के सेक्स-पोर्नो के साथ-साथ बच्चों के सेक्स-पोर्नो भी एक-दूसरे को भेजते रहते हैं। ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि उनकी खबरें पढक़र बाकी लोगों को एक सबक मिल सके।

लेकिन बच्चों के सेक्स-शोषण का मुद्दा एक अलग पहलू भी रखता है। छोटे-छोटे सामानों का लालच, कई बार तो बेघर बच्चों के लिए एक रात सिर छुपाने की जगह या कंबल मिल जाना भी उन्हें अपने बदन का समझौता करने पर मजबूर कर देता है। इस देश में जब तक बच्चों की आम हालत नहीं सुधरेगी, जब तक वे बेघर और अनाथ बने रहेंगे, तब तक मोटे तौर पर उनका शोषण नहीं थम सकेगा। इसलिए चाइल्ड पोर्नोग्राफी का यह मामला बच्चों से बलात्कार के अनगिनत मामलों का एक पुख्ता सुबूत भी है। और सरकार को इस जुर्म का व्यापक प्रचार करके देश के बाकी मां-बाप, समाज के लोगों को सावधान भी करना चाहिए कि उनके इर्द-गिर्द ऐसी कोई हरकत दिखे तो वे तुरंत पुलिस को खबर करें। एक अफसर 10 बरस तक दर्जनों बच्चों का सेक्स-शोषण करते रहा, उसकी रिकॉर्डिंग करते रहा, उसे दुनिया भर में बेचते रहा, और किसी को उसकी खबर नहीं लगी, यह बात भी हैरान करने वाली है।

यह मामला सरकार और समाज दोनों के सावधान और चौकन्ने होने का है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

भोपाल की खुदकुशी ने साबित कर दी चैनलों की साम्प्रदायिक-हिंसक साजिश

2 अगस्त 2022
    

मध्यप्रदेश में भोपाल में बीटेक की पढ़ाई करने वाले 21 बरस के एक छात्र, निशांक राठौर की लाश एक पटरी पर कटी हुई मिली, और उसके फोन से उसके पिता को भेजा गया ऐसा मैसेज मिला जो मुस्लिमों द्वारा दी गई धमकी सरीखा लग रहा था। उसमें लिखा था- नबी से गुस्ताखी नहीं, राठौर साहब आपका बेटा बहुत बहादुर था। इस छात्र के इंस्टाग्राम अकाऊंट पर भी ऐसा लिखा मिला- सारे हिन्दू कायरों देख लो, अगर नबी के बारे में गलत बोलोगे तो यही हश्र होगा। इससे अधिक टीवी चैनलों को और क्या लगता था। भडक़ाने वाले पोस्टर बनाकर टीवी समाचार बुलेटिन चलने लगे, और इस घटना को राजस्थान में कन्हैयालाल हत्याकांड और अमरावती के उमेश कोल्हे हत्याकांड की अगली कड़ी की तरह पेश किया जाने लगा। अब भाजपा शासित मध्यप्रदेश की पुलिस ने इस मामले की जांच करने के बाद यह पाया है कि इस नौजवान का फोन स्क्रीन लॉक किया हुआ था, और उसे किसी और ने नहीं खोला था। पुलिस ने जांच में यह भी पाया कि इस छात्र ने कर्ज न चुका पाने की वजह से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी, न कि उसकी हत्या हुई। जांच अफसर ने बताया कि उसने करीब 18 ऑनलाईन ऐप्प से लोन ले रखा था, और दोस्तों से भी कर्ज ले रखा था, और चुकाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। ऐसे में उसने आत्महत्या करने के पहले अपने पिता को साम्प्रदायिक किस्म का मैसेज भेजा जिसमें सिर तन से जुदा करने की बात लिखी, ऐसी ही बात उसने अपने इंस्टाग्राम अकाऊंट पर डाली।

लेकिन 24 जुलाई की शाम मिली इस लाश को लेकर 25 जुलाई से ही सोशल मीडिया पर इसे एक हिन्दू पर मुस्लिम हमला बताते हुए, इसे एक साम्प्रदायिक हत्या बताते हुए मुहिम छेड़ दी गई थी, जो कि टीवी चैनलों की मेहरबानी से जंगल की आग की तरह फैल रही थी। यह तो गनीमत है कि यह हादसा एक भाजपा शासित राज्य में हुआ है जहां एक हिन्दू नौजवान की ऐसी मौत का शक मुस्लिमों पर होने के बावजूद पुलिस ने यह पाया है कि इसमें कोई बाहरी व्यक्ति शामिल नहीं था, और यह आत्महत्या थी। अगर यह मामला किसी गैरभाजपा राज्य का रहता, तो वहां की पुलिस पर मुस्लिमों को बचाने की तोहमत लग सकती थी, कम से कम भाजपा के राज्य में यह तोहमत तो नहीं लग सकती। लेकिन अब ऐसे में सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वाले लोगों, और देश के टीवी समाचार चैनलों के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है कि किसी एक घटना की जांच भी पूरी होने के पहले उसे लेकर नफरत का सैलाब फैला देने की इनकी नीयत का क्या किया जाए? अभी चार दिन पहले ही देश के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने बड़ी तल्खी के साथ देश के टीवी समाचार चैनलों को कोसा था, और सोशल मीडिया को उससे भी अधिक खराब बताया था। सोशल मीडिया तो खैर किसी एक दिमाग से नियंत्रित मीडिया नहीं है, और वहां पर करोड़ों लोग लगातार लिखते रहते हैं। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो मीडिया को मिलने वाले तमाम किस्म के विशेषाधिकार, और पहुंच का इस्तेमाल करता है, और उसके बाद नफरत फैलाने का गैरजिम्मेदार काम, बल्कि बेहतर यह कहना होगा कि जुर्म भी करता है। अब भोपाल की यह घटना इसका एक ताजा सुबूत है कि मुस्लिमों की तरफ इशारा करने वाले ऐसे संदेशों के बीच एक हिन्दू मौत की जांच कर रही पुलिस वैसे ही दुनिया भर के दबाव में रही होगी, और उस पर सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हमला होते रहा। यह तो गनीमत है कि पुलिस ने एक हफ्ते की शुरुआती जांच में ही पूरी तरह से यह स्थापित कर दिया कि यह बिना किसी बाहरी हरकत के, सीधी-सीधी आत्महत्या है, वरना अब तक तो सडक़ों पर मुस्लिमों पर हमले होने लगते।

हर कुछ दिनों में ऐसी नौबत आती है जब हमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक बड़े हिस्से के बारे में यह बात लिखनी पड़ती है कि भारत सरकार अपने पास सुरक्षित बड़े कड़े अधिकारों पर बैठी हुई क्यों है, और देश में नफरत और साम्प्रदायिकता फैलाकर अपना कारोबार बढ़ाने की ऐसी खुली साजिश के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करती है? देश के मुख्य न्यायाधीश कुछ ही दिन पहले सार्वजनिक भाषण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में दुनिया भर का कहकर जाते हैं, और उसके बाद भी आज ऐसी हरकत जारी है। बल्कि मुख्य न्यायाधीश के बयान के दिन से ही यह ताजा नफरती सैलाब चल रहा है। इस देश में केन्द्र सरकार ने टीवी चैनलों के कामकाज की निगरानी के लिए एक संस्था बना रखी है, दूसरी तरफ पहले से चली आ रही प्रेस कौंसिल है जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज रहते हैं, हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट को चाहिए कि भोपाल के इस मामले को ही एक नमूना मानकर इस पर टीवी चैनलों के कवरेज की जांच करवाए, और उस पर केन्द्र सरकार को कार्रवाई करने के लिए कहे। आज टीवी समाचार चैनलों का एक बड़ा हिस्सा देश के किसी भी साम्प्रदायिक संगठन के मुकाबले अधिक साम्प्रदायिक हो चुका है, और वह किसी भी दूसरे साम्प्रदायिक संगठन के मुकाबले अधिक सक्रिय भी है। देश में बनाए गए बड़े कड़े कानून धरे हुए हैं, और हिंसा भडक़ाने की यह हरकतें चल रही हैं जिनके बारे में मुख्य न्यायाधीश यह भी कह चुके हैं कि मीडिया पर मानो एक मुकदमा चलाया जाता है, और उसके दबाव में जजों के लिए भी काम करना मुश्किल हो जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, हम आज की बात को खत्म करते हुए एक बार फिर दुहरा रहे हैं कि अखबारों को मीडिया नाम की इस बड़ी छतरी से बाहर निकल जाना चाहिए, और अपने को टीवी से अलग, अपने पुराने नाम प्रेस का इस्तेमाल करना चाहिए। नफरती टीवी मीडिया के खिलाफ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगनी चाहिए, और देखें कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश अपने कार्यकाल के इन आखिरी कुछ हफ्तों में उस पर कुछ करते हैं या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

धर्म और ट्रैफिक, दो किस्म की अराजकता ऐसी जानलेवा हुई..

   1 अगस्त 2022
    

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में एक मालवाहक गाड़ी में 27 तीर्थयात्रियों को ले जाया जा रहा था, अचानक इस पिकअप वैन में करंट दौड़ा, और 10 लोगों की मौत हो गई, कई लोग करंट से जख्मी हो गए। पुलिस का अंदाज यह है कि इस गाड़ी में डीजे सिस्टम चलाने के लिए जनरेटर लगाया गया था, और उसी की वायरिंग की गड़बड़ी से यह करंट दौड़ा हो सकता है। इस हादसे के बाद ड्राइवर गाड़ी छोडक़र भाग गया है, और शिवभक्तों के परिवारों को खबर की गई है। ऐसा हादसा हिन्दुस्तान के दो अलग-अलग पहलुओं पर फिक्र खड़ी करता है, एक तो यह कि धर्म का स्वरूप पूरी तरह अराजक हो गया है, वह आत्मघाती होने की हद तक लापरवाह हो गया है, और कई मामलों में हत्यारा होने की हद तक हिंसक भी हो गया है। दूसरा पहलू यह है कि सडक़ों पर हादसों में मरने वाले लोगों में दुनिया में हर दस में से एक हिन्दुस्तान में होते हैं, लेकिन देश-प्रदेशों में किसी को इसकी अधिक फिक्र नहीं दिखती है। धर्म पर आस्था के प्रदर्शन के लिए सार्वजनिक जगहों पर लोग नियम-कानून के खिलाफ किसी भी हद तक जाते हैं, और यह हादसा उसी का एक नमूना है।

हिन्दुस्तान में आज धर्म तरह-तरह से जानलेवा साबित हो रहा है। अभी चार ही दिन हुए हैं, उत्तर भारत में कांवडिय़ों के एक जत्थे ने एक दूसरे कांवडिय़े को पीट-पीटकर मार डाला जो कि थलसेना का फौजी है, और अपनी आस्था के चलते कांवड़ लेकर जा रहा था। इससे परे भी जगह-जगह आस्थावान लोगों की हिंसा सामने आती रहती है, और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच टकराव भी होते ही रहता है। फिर मानो एक धर्म के कट्टर और धर्मान्ध प्रदर्शन के मुकाबले किसी दूसरे धर्म के लोग उससे अधिक बढ़-चढक़र प्रदर्शन में लग जाते हैं। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक जगहें धार्मिक, कट्टर, और बढ़ते-बढ़ते साम्प्रदायिक मुकाबले का मैदान बन जाती हैं, और हर धार्मिक त्यौहार पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आता है। उत्तरप्रदेश जैसे कुछ राज्यों में बहुसंख्यक हिन्दू धर्म को राजकीय धर्म सरीखा अघोषित दर्जा देकर धार्मिक टकराव की नौबत घटा दी गई है, क्योंकि गैरहिन्दुओं, और खासकर मुस्लिमों को यह अच्छी तरह मालूम है कि कांवडिय़ों पर हेलीकॉप्टर से या सडक़ किनारे खड़े होकर फूल बरसाने वाले आला पुलिस अफसरों का रूख उनके प्रति कैसा रहेगा अगर वे सडक़ पर कुछ मिनटों की नमाज पढ़ते दिख जाएंगे। जब प्रदेश का राज इस दर्जे का धार्मिक भेदभाव करने लगता है, तो सत्ता की ताकत के सामने टकराव की नौबत घट जाती है। राज्य-धर्म के मानने वाले लोगों, और दूसरे दर्जे के नागरिकों के बीच टकराव की गुंजाइश नहीं रह जाती है, क्योंकि सरकारी इंसाफ कमजोर तबके को हासिल नहीं रहता है।

जिस धर्म को निजी आस्था का सामान होना चाहिए था, वह राजनीतिक बढ़ावे से विकराल होते चल रहा है। त्यौहारों या तीर्थयात्राओं के मौके पर सडक़ों पर परले दर्जे का उत्पात दिखता है। और यह भी कम इसलिए दिखता है कि अधिकतर सीधे-सरल लोग सडक़ों पर अपना अधिकार भूलकर धार्मिक गुंडागर्दी के सामने खड़े नहीं होते। वे चुपचाप किसी और रास्ते से निकल जाते हैं, और किसी टकराव का खतरा नहीं उठाते। लेकिन सार्वजनिक जीवन में साल भर किसी न किसी तरह से अड़ंगा बनने वाले धर्म लोगों की उत्पादकता को भी कम करते हैं, और उनके जीवन का सुख-चैन भी छीनते हैं। चौबीसों घंटे धार्मिक लाउडस्पीकर बजते हैं, सडक़ों पर शामियाने तानकर कार्यक्रम होते हैं, भंडारे लगाकर चारों तरफ गंदगी छोड़ दी जाती है, विसर्जन से नदियों और तालाबों में अपार कचरा इकट्टा होते जाता है। इन सबसे परे लगातार बढ़ते साम्प्रदायिक तनाव और टकराव से लोगों की आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। धार्मिक हिंसा में धर्म से परे चल रहे लोग भी घिर और फंस जाते हैं।

अब इससे जुड़े हुए दूसरे पहलू पर आएं, तो हिन्दुस्तान में सडक़ों पर गाडिय़ां धर्म से परे भी बहुत बुरी तरह बेकाबू हैं। गाडिय़ों से जुड़ा हुआ सारा ही सरकारी अमला संगठित भ्रष्टाचार चलाता है, और सामान ढोने वाली गाडिय़ों में मजदूरों और मुसाफिरों को ढोना रोजमर्रा की एक आम बात है। अब ऐसी गाडिय़ों में किसी हिफाजत का कोई इंतजाम तो हो नहीं सकता, इसलिए इनके हादसों में लोग बड़ी संख्या में मरते हैं। सरकारी नियमों का यह हाल है कि एक तरफ तो केन्द्र सरकार हर कार में आधा दर्जन एयरबैग लगाने का कानून बना रही है, ताकि लोगों की जिंदगी किसी हादसे में भी बच सके, दूसरी तरफ मजदूरों से लेकर तीर्थयात्रियों तक को सामान की तरह ढोने वाले ट्रकों और दूसरे कारोबारी वाहनों पर कोई रोक नहीं है। हालत यह है कि सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए भी सभी तरह की मालवाहक गाडिय़ों में जिंदगियां ढोई जाती हैं। अब देश में ऐसे दोहरे कानून से क्या फायदा जिसमें पैसे वाले लोगों की निजी कारों में भी हर मुसाफिर की जिंदगी बचाने एयरबैग लगाए जाएं, और गरीबों की जिंदगी जानवरों से भी कम कीमती मानी जाए। अगर मालवाहक गाडिय़ों में लोगों को ढोना बंद होगा, ऐसी गाडिय़ों को राजसात किया जाएगा, तो धीरे-धीरे मुसाफिर गाडिय़ां बढऩे लगेंगी। लेकिन नियमों का कोई सम्मान न करने की वजह से आज ऐसी अराजक नौबत है कि सामान या जानवर की तरह ठूंसकर इंसानों को ले जाया जाता है, और उस पर कोई रोक नहीं है। फिर जब ऐसी गाडिय़ों पर धार्मिक लोग सवार रहते हैं, तो उन्हें छूने की हिम्मत किसकी हो सकती है। राजनीतिक दलों का यह चरित्र बीते दशकों में लगातार अधिक उजागर होते चल रहा है कि वे सार्वजनिक-धार्मिक आयोजनों में भीड़ को बढ़ावा देकर अपनी जमीन बनाने की कोशिश करते हैं, और भीड़ अपने मिजाज के मुताबिक अराजकता पर चलते हुए राजनीतिक संरक्षण का अधिक मजा भी लेते चलती है।

लेकिन हर कुछ बरसों में किसी न किसी चुनाव में जाने वाली पार्टियों की हांकी जाती सरकारें कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती हैं। तो क्या अब सरकार की रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के लिए भी लोग अदालत जाएं? और अब तो यह भी खतरा हो गया है कि जनहित याचिका लेकर जाने वाले लोगों पर सुप्रीम कोर्ट पांच लाख रूपये तक का जुर्माना लगा सकता है, कैद सुना सकता है।

(Daily Chhattisgarh)