सूरज की रौशनी पर टिकी एक नई तकनीक मिटा सकती है दुनिया की भूख
21 अगस्त 2022
एक ताजा वैज्ञानिक कामयाबी मिली है जिसमें
सोयाबीन के पौधों को सूरज की रौशनी को बेहतर तरीके से सोखने के लायक तैयार
किया गया है, और इससे उन पौधों से फसल 20 से 24 फीसदी तक अधिक मिली है।
वैज्ञानिकों का यह मानना है कि बाकी पौधों में भी सूरज की रौशनी से खुराक
पाने की फोटो सिंथेसिस की प्रक्रिया इसी तरह की रहती है, और ऐसी कामयाबी उन
फसलों में भी पाई जा सकती है। अमरीका के एक विश्वविद्यालय ने अपने नए शोध
के ये नतीजे अभी प्रकाशित किए हैं, और इन्हें दुनिया की भूख मिटाने के लिए
एक सबसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। सूरज की रौशनी से पौधों में अनाज या
दूसरी उपज प्रभावित होती है, और सोयाबीन में जेनेटिक फेरबदल करके यह
कामयाबी पाई गई है। लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगशाला से निकलकर ये नतीजे जब तक
खेतों तक पहुंचेंगे, और लोगों के खाने में शामिल होंगे तब तक हो सकता है कि
इसमें कुछ और सकारात्मक या नकारात्मक बातें सामने आएं, लेकिन आज जब दुनिया
में चारों तरफ हर किस्म की निराशा की खबरें आ रही हैं, यह एक खबर भुखमरी
की शिकार इस धरती पर एक उम्मीद जगाने वाली है।
आज बहुत से लोगों को जीएम फसलों से परहेज है, और तरह-तरह की आशंका भी है। जेनेटिकली मॉडीफाईड फसलों का कारोबार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ में है, और बहुत से मामलों में किसानों को हर फसल के लिए नए बीज खरीदने पड़ते हैं, जिसकी लागत अधिक रहती है। बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि जीएम बीजों से दुनिया की खेती पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक नाजायज काबू हो जाएगा। हम ऐसी किसी भी तरह की फिक्र को खारिज किए बिना केवल वैज्ञानिक नजरिये से यह देख रहे हैं कि किसी तकनीक से अगर फसल 20 फीसदी या उससे अधिक बढ़ सकती है, तो यह दुनिया की भूख मिटाने में एक बहुत कारगर कदम होगा। हम अपने आसपास यह देखते हैं कि एक वक्त जो देसी अमरूद मिलते थे, वे अब नए किस्म के पौधों से निकलने वाले बड़े-बड़े अमरूद रहते हैं, जिनका स्वाद पुराने देसी अमरूदों जितना अच्छा नहीं रहता है, लेकिन वे धीरे-धीरे बिकने लगे हैं, और लोगों के बीच उसकी जगह बन गई है। यह तो फलों की बात हुई, जिसमें छोटे आकार के देसी पपीते के मुकाबले दो-तीन गुना वजन के नए हाईब्रीड पपीते आने लगे हैं, और भी कई फल-सब्जियों का ऐसा ही नया अवतार सामने आया है।
इससे परे जब अनाज की बात आती है, तो आज दुनिया में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा करीब 70 करोड़ लोगों के भूखे रहने का अंदाज है। यह दुनिया की आबादी का करीब 9 फीसदी है, और यह संख्या बढ़ती चल रही है। कई देश तो इस बुरी तरह भुखमरी के शिकार हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों ने अब आबादी के कुछ हिस्से को ही पेट भर अनाज देना शुरू किया है कि पूरी आबादी को तो बचाना मुमकिन नहीं है, इसलिए आबादी के कुछ हिस्से को ही पेट भर अनाज देकर बचा लेना बेहतर है। कुछ दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों का अंदाज संयुक्त राष्ट्र से भी अधिक खराब है, और 2022 का एक अनुमान करीब 83 करोड़ लोगों के भूखे रहने का है, और यह दुनिया की आबादी का 10 फीसदी है। जब भूख के ऐसे आंकड़ों को देखा जाए तब यह समझ आता है कि अगर किसी तरह से अनाज की उपज 20 फीसदी बढ़ाई जा सकती है, तो उससे दुनिया के भूखे पेटों को भर पेट खाना दिया जा सकता है। अभी यहां पर हम इस पर जाना नहीं चाहते कि ऐसे गरीब देशों के पास अनाज को खरीदने की ताकत कहां से रहेगी। आज भी संयुक्त राष्ट्र सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय संगठन लगातार बहुत से देशों में भूखे लोगों को अनाज पहुंचा रहे हैं, और आज तो एक दिक्कत यह भी है कि रूस और यूक्रेन के बीच जंग के चलते हुए अनाज की उपलब्धता ही घट गई है। इसलिए अगर सोयाबीन पर किया गया यह प्रयोग, वैज्ञानिकों की उम्मीद के मुताबिक अगर बाकी फसलों पर भी कामयाब होता है, तो इससे दुनिया को एक बहुत बड़ी मदद मिल सकती है, दुनिया भुखमरी से उबर सकती है।
हिन्दुस्तान के कुछ पीढ़ी पहले के लोगों को याद होगा कि किस तरह हरित क्रांति के पहले तक यहां पर अनाज की कमी थी, और हिन्दुस्तान 1960 के पहले अमरीका के साथ हुए एक खाद्यान्न समझौते पीएल480 (पब्लिक लॉ 480) के तहत अनाज पाता था, और लोग अमरीकी गेहूं के लाल होने, और उससे रोटियां बहुत कड़ी बनने की शिकायत करते थे, लेकिन वैसी मदद से ही उस वक्त हिन्दुस्तानी राशन दुकानों के रास्ते लोगों का पेट भरता था, और लोग भूखे मरने से बचते थे। जब धीरे-धीरे हिन्दुस्तान में अनाज का उत्पादन बढ़ा, और यह देश अनाज के मामले में दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रह गया, तब यहां पर भुखमरी धीरे-धीरे खत्म हुई। लेकिन आज दुनिया के दर्जनों देश भुखमरी के शिकार हैं, और जहां पर भूख से मौत हो रही है, वहां पर जिंदा बचे हुए लोगों में भी कुपोषण का कैसा बुरा हाल होगा, यह अंदाज लगाया जा सकता है। इसलिए आज अगर कोई वैज्ञानिक तरीका ऐसा निकल रहा है जो कि महज सूरज की रौशनी के बेहतर इस्तेमाल से उपज बढ़ा सकता है, तो यह बहुत बड़ी कामयाबी है।
जाहिर है कि एक अमरीकी विश्वविद्यालय की ऐसी खोज अमरीका की सरकार या कंपनियों के रास्ते दुनिया भर में तेजी से फैल सकती है, और हिन्दुस्तान कृषि अनुसंधान में एक विकसित देश है। आने वाले बरसों में हम हिन्दुस्तानी खेतों में उपज बढऩे का सपना देख सकते हैं, और आज हिन्दुस्तानी किसान जिस तकलीफ से इस काम को करता है, उसे भी ऐसी नई तकनीक एक नई राहत दे सकती है। हम खबर आने के दो दिन के भीतर ही इतनी सारी उम्मीदें लिख रहे हैं, लेकिन उम्मीदों पर ही तो दुनिया जिंदा है।
एक दवा को बढ़ावा देने के लिए क्या डॉक्टरों को दी हजार करोड़ रिश्वत?
20 अगस्त 2022
यह बात सुनने में कुछ हैरान कर सकती है कि
अदना सी दवा की टेबलेट पर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट
के सामने यह बताया गया है कि पिछले दो दौर की कोरोना महामारी के दौरान
बुखार और बदन दर्द में काम आने वाली पैरासिटामॉल टेबलेट के एक खास ब्रांड
डोलो-650 की बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी ने डॉक्टरों को रिश्वत दी, ताकि वे
इसे अंधाधुंध लिखें। अदालत में यह जनहित याचिका फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड
सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने दायर की है, जिसका कहना है
कि इस कंपनी ने डॉक्टरों को रिश्वत देने पर हजार करोड़ रूपये खर्च किए हैं।
कंपनी ने इस खर्च को गलत बताया है और कहा है कि यह कोरोना के दौरान का
खर्च नहीं है, यह पिछले कई बरसों का मार्केटिंग का खर्च है। अभी यह मामला
अदालत में चलना है, और जज भी इसे गंभीरता से ले रहे हैं। अदालत ने उपहारों
के नाम पर डॉक्टरों को दी गई रिश्वत पर कंपनी से जानकारी मांगी है। कुछ समय
पहले आयकर विभाग ने भी यह दवा बनाने वाली कंपनी के 9 राज्यों के 36
ठिकानों पर छापा मारा था।
लेकिन हम आज की बात को इसी एक दवा पर शुरू और खत्म करना नहीं चाहते, क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत इस पर सुनवाई कर ही रही है, और वहां से कोई न कोई नतीजा सामने आएगा। हम चिकित्सा और दवा कारोबार में फैले हुए भारी भ्रष्टाचार की बात जरूर करना चाहते हैं जो कि बहुत ही संगठित है, इस कारोबार से जुड़े लोगों की नजरों में हैं, लेकिन उसे रोकने की कोशिश नहीं होती है। बड़े-बड़े कामयाब कारोबारी-अस्पताल और डॉक्टर मरीज लेकर आने वाले दलालों को कमीशन देते हैं, मरीज भेजने वाले छोटे डॉक्टरों को इलाज के बाद की निगरानी के नाम पर चेक से भुगतान करते हैं। इसके अलावा तरह-तरह की जांच करने वाले जो मेडिकल सेंटर हैं, वे भी अपने को मरीज भेजने वाले लोगों को संगठित तरीके से कमीशन देते हैं। यह पूरा कारोबार चिकित्सकों के संगठनों की नीतियों के खिलाफ है, वहां से कई बार नोटिस जारी होते भी हैं, लेकिन जिंदगी से जुड़े इस पेशे और कारोबार से इस गंदगी को दूर करने की कोई ठोस कोशिश दिखाई नहीं देती है।
दरअसल चिकित्सा से जुड़ा हुआ यह पूरा कारोबार निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले में होने वाले पूरी तरह से संगठित भ्रष्टाचार से शुरू होता है, और सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए दी जाने वाली रिश्वत पर खत्म होता है। फिर एक बात यह भी है कि इलाज के तौर-तरीके, जांच का फैसला, और दवाओं की पसंद, इन सबमें अलग-अलग डॉक्टरों की अलग-अलग सोच हो सकती है, और किसी को भी तेजी से तब तक खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक उनके इन फैसलों को किसी रिश्वत से प्रभावित साबित न किया जा सके। अभी सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स का जो संगठन कंपनी और डॉक्टरों के बीच बेईमान रिश्ते का आरोप लेकर पहुंचा है, वह एक जागरूक संगठन है, और वह समय-समय पर कंपनियों की बेईमानी के खिलाफ लड़ते भी रहता है। हिन्दुस्तान में मरीजों का तो कोई संगठन न है, और न बन सकता, लेकिन मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स का संगठन ही दवाओं की बढ़ती हुई कीमतों के खिलाफ हर समय आवाज उठाते रहता है, और दवा उद्योग के दूसरे नाजायज तौर-तरीकों का भांडाफोड़ भी करता है। इसलिए ऐसे संगठन की कोशिशों का साथ देने की जरूरत है ताकि वह मरीजों के हित के लिए लड़ सके, और दवा कंपनियों और डॉक्टरों के अनैतिक गठबंधन के खिलाफ भी।
आज हिन्दुस्तान में निजी चिकित्सा कारोबार लगातार बढ़ते चल रहा है, और केन्द्र और राज्य सरकारें भी मरीजों को दिए जाने वाले स्वास्थ्य बीमा कार्ड को इन अस्पतालों से जोड़ते जा रही हैं। नतीजा यह है कि आज सरकारी अस्पताल लगातार उपेक्षित हो रहे हैं, और निजी चिकित्सा कारोबार बढ़ते ही जा रहा है। जब गरीब बीमार होते हैं, तो अगर सरकारी स्वास्थ्य बीमा कार्ड उस खर्च को नहीं उठा पाता, तो लोग गहने और मकान बेचकर भी इलाज करवाते हैं। ऐसे में उनके साथ अगर दवाओं के रेट को लेकर बेईमानी होती है, गैरजरूरी जांच करवाई जाती है, जांच में कमीशन लिया जाता है, तो इन सबका भांडाफोड़ होना चाहिए। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले जब कई अस्पतालों ने अपने दलालों के मार्फत यह पाया कि लोगों के स्वास्थ्य बीमा कार्ड पर अभी और इलाज करवाने लायक रकम बाकी है, तो कुछ अस्पतालों ने गांव के गांव की महिलाओं को उठवा लिया, और उनकी उम्र देखे बिना भी उनके गर्भाशय निकाल दिए गए थे। अस्पतालों ने तो छप्पर फाडक़र कमाई कर ली थी, लेकिन बाद में जब यह पूरी धोखाधड़ी उजागर हुई तो कई डॉक्टरों और अस्पतालों को ब्लैकलिस्टेड किया गया था, और उनका कारोबार रोका गया था। इसलिए सरकारी स्वास्थ्य बीमा जहां सबसे गरीब लोगों के लिए मुफ्त इलाज का एक जरिया है, वहीं गैरजरूरी इलाज करके गरीबों के बदन का नुकसान भी किया जाता है, और सरकार को चूना भी लगाया जाता है। लोगों को याद होगा कि कुछ अरसा पहले मेडिकल कॉलेजों के दाखिलों को लेकर बड़ा भ्रष्टाचार पकड़ाया था, और मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने वाली कमेटी एमसीआई में भी फेरबदल किया गया था। आज जरूरत यही है कि जिस तरह दवा प्रतिनिधियों के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट तक पहल की है, बाकी सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी चिकित्सा कारोबार की बाकी गड़बडिय़ों के खिलाफ पहल करनी चाहिए, और जरूरत हो तो स्टिंग ऑपरेशन भी करना चाहिए। देश की राजधानी में यह बात आम प्रचलित है कि निजी मेडिकल कॉलेजों से लेकर निजी अस्पतालों, और दवा कंपनियों तक के खेमे सरकारी नीतियों को अपने पक्ष में करने की अपार ताकत रखते हैं। ऐसी लॉबियों की मर्जी के खिलाफ कुछ कर पाना सरकारों के लिए भी आसान नहीं रहता है। ऐसे में सुबूतों और स्टिंग ऑपरेशनों के साथ अदालतों तक जनहित याचिका लेकर जाना एक असरदार तरीका हो सकता है।
दलित-विरोधी, महिला-विरोधी जजों को कुर्सियों पर आने से रोकने, या हटाने की जरूरत..
19 अगस्त 2022
हिन्दुस्तान के हजारों बरस पुराने कहे जाने
वाले कई किस्म के धर्म और दूसरे ग्रंथों में महिलाओं के खिलाफ जितनी हिंसक
बातें लिखी गई हैं, जिनका हिन्दुस्तान में खुलकर इस्तेमाल भी होता है, उन
बातों ने हिन्दुस्तान की अदालतों के जजों के दिल-दिमाग पर बहुत गहरा असर
किया हुआ है। और यह असर कभी-कभार किसी एक मामले में दिखता है तो लोग हैरान
हो जाते हैं कि ऐसी सोच वाले लोग अगर फैसले कर रहे हैं, तो वे फैसले किस
कदर महिला-विरोधी होंगे। केरल के एक जिले कोझीकोड के एक जज ने यौन उत्पीडऩ
के एक मामले में अभियुक्त को जमानत दे दी क्योंकि उसका यह तर्क था कि
शिकायतकर्ता महिला ने उस वक्त उत्तेजक कपड़े पहन रखे थे। मतलब यह कि अगर
किसी महिला के कपड़े उत्तेजक हैं, तो वह महिला बलात्कार के लायक है। यह जज
एस. कृष्णकुमार इसके दस दिन पहले यौन उत्पीडऩ के एक दूसरे मामले में भी
आरोपी को जमानत दे चुका है, और उसने लिखा था- यह मानना विश्वास से बिल्कुल
परे है कि अभियुक्त ने यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि पीडि़ता दलित है,
उसे छुआ होगा।
इन दो आदेशों ने इस जज की सोच भयानक स्तर पर महिला-विरोधी भी है, और दलित-विरोधी भी है। वह महिला के कपड़ों की पसंद के आधार पर उसे एक किस्म से बलात्कार के लायक पा रहा है, और दूसरी तरफ एक दलित महिला के बारे में कह रहा है कि उसे दलित जानते हुए भी कैसे कोई छू सकता है? जज का नजरिया तालिबानों सरीखा दिखता है जो कि महिला की पोशाक तय कर रहे हैं। लेकिन यह अकेला जज ऐसा नहीं है, अभी हफ्ते भर पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट की एक महिला जज प्रतिभा एम.सिंह के एक बयान के खिलाफ बहुत सी महिला कार्यकर्ताओं ने जमकर बयान दिया था जिसमें इस जज ने मनुस्मृति की वजह से भारतीय महिला को सम्मानजनक स्थान मिलने की बात कही थी। मनुस्मृति की चर्चा हिन्दुस्तान में महिलाओं को नियंत्रित करने वाली सोच की तरह होती है, और उसमें महिलाओं के लिए बहुत ही अपमानजनक बातें लिखी हुई हैं। ऐसे में अगर हाईकोर्ट की एक जज मनुस्मृति से प्रभावित है तो जाहिर है कि उसके फैसले इस सोच से प्रभावित होंगे। मनुस्मृति के मुताबिक एक महिला को पुरूष द्वारा सुरक्षित किया जाता है। जब वह बालिका है तो उसकी रक्षा की जिम्मेदारी उसके पिता की है, शादी के बाद वह अपने पति की जिम्मेदारी है, और अगर वह विधवा हो जाए तो वह उसके पुत्र की जिम्मेदारी है। मनुस्मृति महिलाओं के न करने के छह काम गिनाती है जिनमें से एक शराब पीना है। महिलाओं को बिना काम के इधर-उधर घूमने की मनाही की गई है। महिलाओं को बेवक्त और देर तक सोने की मनाही की गई है। मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में लिखा गया है कि वे हमेशा दूसरे मर्दों को आकर्षित करने और संभोग के लिए आतुर रहती हैं। वे अपने पति के प्रति भी वफादार नहीं रहतीं। लेकिन इस तरह की अनगिनत भेदभाव की बातें उसमें महिलाओं के खिलाफ हैं, और इसके साथ-साथ मनुस्मृति बहुत बुरी तरह ब्राम्हणवादी और पुरूषवादी सोच भी है। इसमें शूद्रों को नीच माना गया है, और कहा गया है कि अगर कोई शूद्र ब्राम्हण को धर्मउपदेश दे, तो राजा को उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए। शूद्रों के पास सम्पत्ति होने का भी विरोध किया गया है, शूद्र अगर ब्राम्हण या उसकी जाति का नाम बदतमीजी से ले, तो उसके मुंह में दस अंगुल लंबी लोहे की दहकती हुई कील डाल देना चाहिए।
हिन्दुस्तान में निचली अदालतों के जजों को लिखित इम्तिहान के मुकाबले से छांटा जाता है, और उनकी राजनीतिक-सामाजिक सोच के बारे में कभी सोचा भी नहीं जाता है। नतीजा यह होता है कि उनका दलित-विरोधी, महिला-विरोधी पूर्वाग्रह सिर चढक़र बोलता है, और उन अदालतों से इन तबकों को किसी इंसाफ की गुंजाइश भी नहीं रहती है। हमारा तो ख्याल यह है कि लिखित परीक्षा में कामयाब होने के बाद ऐसे उम्मीदवारों को सामाजिक कार्यकर्ताओं के सवालों का सामना करना चाहिए या लिखित परीक्षा में ही सामाजिक सोच के बारे में पूछना चाहिए, और उस आधार पर उनका मूल्यांकन करना चाहिए। अब सवाल यह भी उठेगा कि ऐसा मूल्यांकन कौन करेंगे, क्योंकि जिन लोगों को यह काम दिया जाएगा उनकी अपनी सोच पुरूषवादी और दलित-विरोधी होने का पूरा खतरा रहेगा। पिछले एक दशक में हिन्दुस्तान में मनु के प्रशंसकों, और भारत की हजारों साल पुरानी सोच के प्रशंसकों के दिन निकल आए हैं। यही वजह है कि दलितों को देश भर में तरह-तरह से मारा जा रहा है, और बलात्कारियों का तरह-तरह से अभिनंदन हो रहा है।
केरल के इस जज की सोच के खिलाफ तो वहां लोगों की आवाज उठने लगी है। कुछ रिटायर्ड जजों ने यह भी कहा है कि इस जज की टिप्पणियों के खिलाफ ऊपर की अदालत में जाने की जरूरत है। आज हिन्दुस्तान में सामाजिक न्याय के आंदोलनकारियों के बीच इस सक्रियता की जरूरत है कि अदालतों की बेइंसाफ बयानबाजी, और उनके फैसलों के खिलाफ एक सामाजिक जागरूकता फैलाई जाए। जब तक ऐसे जजों के खिलाफ सार्वजनिक और सामाजिक सवाल नहीं उठेंगे, तब तक उनका ऐसा ही रूख जारी रहेगा। इसलिए जब कभी ऐसा कोई अपमानजनक बयान या फैसला किसी अदालत का आता है, तो तुरंत उसका विरोध करने की जरूरत है। केरल के एक जिले के इस जज की टिप्पणियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर खूब लिखा जा रहा है, और इस बात को आगे बढ़ाना चाहिए।
दूसरे केस छोडक़र, मुफ्त और रेवड़ी की परिभाषा तय करने में लगा सुप्रीम कोर्ट!
18 अगस्त 2022
सुप्रीम कोर्ट में अभी इस बात पर बहस चल रही
है कि हिंदुस्तान के चुनावों में राजनीतिक दल मुफ्त के तोहफों के जो वायदे
करते हैं, क्या उन पर रोक लगाई जानी चाहिए? यह मामला चुनाव आयोग के सामने
भी आया था, और देश के कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने इस आधार पर ऐसी घोषणाओं
पर रोक लगाने की मांग की थी कि उनसे राज्यों के बजट पर गैरजरूरी बोझ बढ़ता
है, और विकास कार्य के लिए रकम नहीं बचती है। पिछले कुछ दशकों में
हिंदुस्तानी चुनावों में ऐसा हुआ भी है कि राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे से
आगे बढक़र ऐसी लुभावनी घोषणाएं की हैं कि जिनसे सत्ता पर पहुंचने से पहले ही
वे बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर चुके होते हैं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम
कोर्ट से ही कहा है कि वह एक संवैधानिक संस्था है, और सुप्रीम कोर्ट चुनावी
तोहफों को लेकर जो विशेषज्ञ पैनल बना रहा है, उससे आयोग को बाहर रखा जाए।
आयोग का यह मानना है कि यह तय करना अदालत का काम होना चाहिए कि चुनावी
घोषणाओं में क्या-क्या कहा जा सके और क्या-क्या नहीं कहा जा सके। सुप्रीम
कोर्ट में यह बहस चल ही रही है कि इस दौरान संसद में मोदी सरकार के
मंत्रियों ने जनता को दिए जाने वाले अनाज को मुफ्त का तोहफा करार देकर यह
बहस शुरू कर दी है कि जिंदा रहने के लिए जनता का जो बुनियाद हक है, उसे
मुफ्त का कैसे कहा जा सकता है? विपक्ष के बहुत से नेताओं ने इस पर संसद के
भीतर और बाहर, दोनों जगह आपत्ति की है कि इसे मुफ्त कहना देश की जनता के हक
का अपमान है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के तय किए गए विशेषज्ञ पैनल के लोग यह तय करेंगे कि चुनावी घोषणापत्र में राजनीतिक दल जनता से किन चीजों का वायदा कर सकते हैं, और किन चीजों का नहीं? इस बात में जागरूक और जानकार सामाजिक कार्यकर्ता एक बड़ी खामी देखते हैं कि देश के तथाकथित विशेषज्ञ एक अलग ही दुनिया में जीते हैं, और वे देश के सबसे गरीब लोगों की जरूरतों का अहसास ही नहीं रखते। ऐसे सामाजिक आंदोलनकारियों का यह मानना है कि अपने-आपको अर्थशास्त्र का जानकार समझने वाले ये लोग आमतौर पर सरकारों की पूंजीवादी सोच का साथ देते हैं, और जिंदा रहने के लिए जो न्यूनतम जरूरतें आम जनता को चाहिए, ये उन्हें भी रियायत या राहत की तरह देने के खिलाफ रहते हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह बड़े-बड़े सरकारी अर्थशास्त्री मनरेगा जैसी योजना के खिलाफ थे, जो कि आज हिंदुस्तान में एक बड़ी आबादी को जिंदा रखने का सबसे बड़ा जरिया साबित हो रही है। किस तरह सरकारी अर्थशास्त्री रियायती राशन या स्कूलों में दोपहर के भोजन के खिलाफ थे जिनकी वजह से आबादी के एक बड़े हिस्से का पोषण आहार संभव हो सका, और करोड़ों बच्चों का विकास बेहतर हो सका। सामाजिक विकास के पैमानों को अगर तात्कालिक आर्थिक विकास और उत्पादकता से जोडक़र देखा जाएगा, तो वह एक गड़बड़ अनुमान ही सामने रखेगा। सरकार की ऐसी जनकल्याणकारी योजनाओं का दीर्घकालीन फायदा होता है, और कुछ दशक इनके चलते रहने के बाद इनका फायदा पाने वाली आबादी की औसत उम्र में भी बेहतरी दिखेगी, और इनकी उत्पादकता में भी। अब पूरे देश में यह बात निर्विवाद रूप से मान ली गई है कि देश की करीब आधी आबादी को रियायती या नि:शुल्क अनाज देना जरूरी है, और उसे पाना उनका बुनियादी हक है।
लोगों ने सुप्रीम कोर्ट की इस अतिरिक्त दिलचस्पी को लेकर भी उसकी कड़ी आलोचना की है कि उसके सामने देश की राजनीति को साफ करने के लिए दर्जनों जलते-सुलगते मामले खड़े हैं, लेकिन वह उनकी सुनवाई नहीं कर रही है, बल्कि चुनावी लुभावनी घोषणाओं का विश्लेषण करने में लगी है जो कि संसद और विधानसभाओं का काम होना चाहिए। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार का यह हक रहता है कि वह संविधान के दायरे के भीतर अपनी मर्जी से बजट के मुद्दे तय करे। अगर वह गलत फैसले लेती है तो पांच बरस बाद उसे फिर जनता के बीच जाना पड़ता है, और उसका हिसाब-किताब जनता ही चुकता करती है। जहां तक लुभावनी घोषणाओं पर सरकारों का दीवाला निकल जाने के खतरे की बात है, तो उसके लिए भी देश-प्रदेश में विपक्ष भी है, केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक के सलाह-मशविरे भी हैं, मीडिया भी है, और जनता के बीच से भी आवाज उठती है। इसलिए अगर कोई विशेषज्ञ कमेटी बुनियादी लोकतांत्रिक मुद्दों को तय करेगी, तो उसका सोचने का नजरिया गरीबों के खिलाफ होने का एक बहुत बड़ा खतरा है।
यहां पर तमिलनाडु के वित्त मंत्री पीटीआर का कल का एक टीवी इंटरव्यू देखने लायक है जिसमें उन्होंने सवाल पूछ रहे उत्साही चैनल-मुखिया को बेजवाब कर दिया। प्रधानमंत्री ने जनता को दिए जाने वाले रियायती सामानों को लेकर या दूसरी छूट को लेकर रेवड़ी जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था, और इस बारे में तमिल वित्त मंत्री ने कहा कि राज्यों से किस आधार पर प्रधानमंत्री अपनी नीतियां बदलने को कह सकते हैं? उन्होंने कहा कि या तो कोई संवैधानिक आधार होना चाहिए तो आप जो कहेंगे उसे हम सब सुनेंगे, या फिर आपकी कोई ऐसी विशेषज्ञता होनी चाहिए, आपके पास अर्थशास्त्र में दोहरी पीएचडी होनी चाहिए, या फिर आपको नोबेल पुरस्कार मिला होना चाहिए, या फिर कोई ऐसी बात होनी चाहिए जो बताए कि आप हमसे बेहतर हैं। या आपका काम का रिकॉर्ड ऐसा हो जो बताए आपने अर्थव्यवस्था को आसमान पर पहुंचा दिया है, या कर्ज को जमीन पर ला दिया है, या प्रति व्यक्ति आय बढ़ा दी है, या रोजगार खड़े कर दिए हैं। तमिलनाडु के वित्त मंत्री ने कहा कि जब इनमें से कोई बात सच नहीं है तो हम उनके नजरिए से क्यों देखें? उन्होंने कहा कि तमिलनाडु ने बहुत से पैमानों पर केंद्र सरकार से बेहतर काम किया है, ऐसे में यह राज्य प्रधानमंत्री के कहे अपनी नीतियां क्यों बदले? उन्होंने कहा कि क्या यह स्वर्ग से आ रहा कोई संविधानेतर हुक्म है? तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके सुप्रीम कोर्ट गई है और उसने इस मामले में फ्रीबीज (बोलचाल की जुबान में रेवड़ी) की परिभाषा तय करने की मांग की है, और कहा है कि जनजीवन को सुरक्षित रखने के लिए और आर्थिक न्याय के लिए लिए जाने वाले फैसले फ्रीबीज नहीं कहे जा सकते।
अभी यह बहस अगले कुछ हफ्ते या कुछ महीने चलती रहेगी, और सुप्रीम कोर्ट शायद ही सरकार से यह पूछ सकेगी कि देश के बड़े कारोबारियों को बैंकों से दिए गए कर्ज का दस-दस लाख रुपया डूब जाना किस आकार की रेवड़ी कहलाएगा? और यह भी कि राष्ट्रीय सूचना आयोग के बार-बार के आदेश के बाद भी देश के राजनीतिक दल उन्हें मिले चंदे का हिसाब देने को तैयार क्यों नहीं हैं? क्या बड़े कारोबारियों से उन्हें मिलने वाला मोटा देशी और विदेशी चंदा भी रेवड़ी कहलाएगा, या कुछ और?
गुजरात में हत्यारे-बलात्कारी लोगों की रिहाई को दिसंबर के चुनाव से जोडक़र देखें!
17 अगस्त 2022
गुजरात में गोधरा कांड के बाद 2002 में हुए
मुस्लिम विरोधी दंगों में एक मुस्लिम युवती बिलकिस बानो के परिवार पर हमला
हुआ था, भीड़ ने इस पांच महीने की गर्भवती युवती की तीन साल की बेटी को मार
डाला था, परिवार के सात लोगों का कत्ल कर दिया था, और बिलकिस के साथ
गैंगरैप किया था। 2002 के इस मामले पर प्रदेश के बाहर हुई सुनवाई में 2008
में सीबीआई कोर्ट ने मुंबई में ग्यारह लोगों को उम्रकैद सुनाई थी जिसे कि
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कायम रखा था। इसके बाद पन्द्रह बरस कैद काटने के बाद
इन्होंने सजा माफी के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की, और अदालत ने राज्य
सरकार को इस पर विचार करने कहा। राज्य सरकार की एक कमेटी ने इन सारे लोगों
को पन्द्रह अगस्त को उस वक्त रिहा किया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ
घंटे पहले ही लालकिले पर से महिलाओं के सम्मान की अपील करके हटे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों की सजा माफी करने को नहीं कहा था, उस पर विचार
करने कहा था, और यह गुजरात सरकार का अपना फैसला है, जिसे वह आज सुप्रीम
कोर्ट का नाम लेकर बचने की कोशिश कर रही है। इस एक खबर ने प्रधानमंत्री की
एक बड़ी घोषणा को पल भर में खोखला साबित कर दिया क्योंकि गुजरात की राज्य
सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी ही है, और ऐसा तो हो नहीं सकता
कि वह राज्य सरकार अपनी पार्टी और अपने गृहमंत्री, प्रधानमंत्री को बताए
बिना इतना नाजुक फैसला ले। यह भी समझने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार के
ऐसे बहुत से निर्देश पहले से हैं, 2014 की एक सजामाफी नीति भी है जिसमें
साफ लिखा है कि बलात्कार जैसे भयानक अपराधों के मुजरिमों को माफी नहीं दी
जाएगी। गुजरात सरकार के इस फैसले के बाद जानकार वकीलों का कहना है कि राज्य
का यह फैसला केन्द्र की इसी नीति के तहत होना था।
लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी में अदालतों से विचाराधीन कैदियों को जल्द छोडऩे के बारे में कुछ कहा था। यह मामला विचाराधीन कैदियों का तो नहीं है, लेकिन यह राज्य सरकार के विवेक का मामला जरूर है जो कि सजा का एक वक्त पूरा हो जाने के बाद सजामाफी की अपील पर विचार कर सकती है। अब जब गुजरात सरकार के इस फैसले के बाद प्रधानमंत्री की हाल ही में कैदियों की रिहाई के बारे में कही गई बातों को देखें तो ऐसा लगता है कि क्या वे गुजरात की इस कार्रवाई के पहले एक जमीन तैयार कर रहे थे?
स्वतंत्रता दिवस के दिन जब इन कैदियों को रिहा किया जा रहा था तो जिस तरह से उन्हें मालाएं पहनाई गईं, उनकी आरती उतारी गई, उससे भी देश बहुत विचलित है। प्रधानमंत्री के भाषण को लेकर देश भर में यह विवाद चल ही रहा था कि देश में उनके समर्थक और प्रशंसक महिलाओं पर सबसे अधिक ओछे हमले करने के लिए जाने जाते हैं, और खुद प्रधानमंत्री ने पिछले बरसों में महिलाओं के बारे में बहुत से आपत्तिजनक बयान दिए थे। इसके ठीक बाद जब गुजरात में हत्यारों और बलात्कारियों की रिहाई ऐसे दिन को छांटकर की गई, तो उसकी तस्वीरें और उसके वीडियो देखकर लोग हक्का-बक्का रह गए। यहां पर इस बात को समझने की जरूरत है कि चार महीने बाद दिसंबर में गुजरात में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और वहां के पिछले कई चुनाव हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच एक आक्रामक ध्रुवीकरण करके भाजपा ने जीते थे, और 2014 के पहले तक तो नरेन्द्र मोदी ही वहां के कई बार के मुख्यमंत्री थे। ऐसे में अभी हिन्दुस्तान के इतिहास के सबसे चर्चित साम्प्रदायिक हमले के इन ग्यारह गुनहगारों को जिस तरह जेल से छोड़ा गया है, जिस तरह उनका स्वागत हुआ है, उससे लगता है कि यह चुनाव के ठीक पहले का एक ऐसा सरकारी फैसला है जिसका निशाना तात्कालिक ध्रुवीकरण पर है। देश के सबसे मुखर मुस्लिम नेता, असदुद्दीन ओवैसी ने कल से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा, और गुजरात की भाजपा सरकार पर बड़ा तीखा हमला शुरू कर दिया है, और कल ही विश्व हिन्दू परिषद ने उसका बड़ा लंबा आक्रामक जवाब दिया है। मतलब यह कि यह नूरा कुश्ती अगले कुछ महीनों में चुनाव का एक अखाड़ा बनाने में लग गई है। ओवैसी को हम पहले भी भाजपा के चुनाव अभियान में शामियाना खड़ा करने वाला लिख चुके हैं, और आज वे जितने अधिक हमलावर तेवर दिखाएंगे, वह दिसंबर के चुनाव में भाजपा के उतने ही अधिक काम आएगा। जाहिर है कि इस रिहाई से गुजरात की मुस्लिम बिरादरी बहुत बुरी तरह विचलित रहेगी, और गुजरात का इतिहास बताता है कि विचलित मुस्लिम बिरादरी हिन्दुओं के ध्रुवीकरण का काम करती है। इस बात को कुछ हफ्ते पहले उन दो लोगों की गिरफ्तारी से न जोडऩा ठीक नहीं होगा जिन्हें गुजरात दंगों के बाद मोदी सरकार के खिलाफ बागी तेवरों वाला माना गया था क्योंकि वे मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ रहे थे, या दंगों में मोदी सरकार के रूख को लेकर जिन्होंने बयान दिए थे। सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़, और एक रिटायर्ड आईपीएस पुलिस अफसर आर.बी. श्रीकुमार को गिरफ्तार किया गया, और जिला अदालत से उन्हें जमानत देने से मना कर दिया गया है। दिसंबर के चुनावों के पहले कुछ महीने पहले की इन घटनाओं को चुनाव से न जोड़ऩा मुमकिन नहीं है, खासकर तब, जब मोदी की भाजपा चुनाव के वक्त के एक-एक दिन को अपने पक्ष में तय करने की चतुराई रखती है। वह हिन्दुस्तान के किसी मतदान के दिन नरेन्द्र मोदी को नेपाल के मंदिरों में घूमता दिखाती है, तो किसी और मतदान के दिन बांग्लादेश के मंदिरों में। टीवी पर दिन-दिन भर मंदिरों में छाए हुए मोदी भारत की किसी चुनावी आचार संहिता से भी बचे रहते हैं। इसलिए अभी गुजरात में हक्का-बक्का कर देने वाली यह रिहाई पूरी तरह से कानून की भावना के खिलाफ है, केन्द्र सरकार की 2014 की नीतियों के खिलाफ है, और चुनावी ध्रुवीकरण की गारंटी करने वाली है।




