गुलाम नबी आजाद को छोड़ें, लेकिन उनके उठाए मुद्दे नहीं

 27 अगस्त 2022

कांग्रेस छोडऩे वाले पार्टी के एक सबसे पुराने और बड़े नेता गुलाम नबी आजाद पर पार्टी नेताओं के हमले का पहला दौर हो चुका है, और कांग्रेस की कल की प्रेस कांफ्रेंस इस मायने में कुछ गलत होते दिख रही है कि आज गुलाम नबी आजाद ने कश्मीर में नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है, और कहा है कि वे भाजपा में नहीं जा रहे। कल ही कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने तीखे शब्दों में कहा था कि गुलाम नबी आजाद का डीएनए मोदीफाईड हो गया है। कांग्रेस पार्टी का हक बनता था कि पूरी जिंदगी उसके भीतर महत्व पाने वाले आजाद के इस तरह आरोप लगाकर जाने के बाद उनके खिलाफ मनचाही बातें की जाएं, उन्हें धोखेबाज करार दिया जाए, यह भी कहा जाए कि दिल्ली में बंगला बने रहने के लालच में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी है। आने वाले दिनों में गुलाम नबी आजाद के खिलाफ और भी सौ किस्म की बातें हो सकती हैं। उसमें भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि राजनीति में साथ छोडक़र जाने वाले अगर आरोप लगाते हुए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी आरोप लग सकते हैं।

लेकिन फिलहाल हम गुलाम नबी आजाद नाम के इंसान से परे, उनकी कही हुई बातों पर चर्चा करना चाहते हैं जो कि महज उनके दिमाग में ही नहीं है, बहुतों के दिमाग में है। दो बरस पहले जिस तरह कांग्रेस के 23 प्रमुख नेताओं के, जी-23 समूह ने सोनिया गांधी को एक चिट्टी लिखकर पार्टी की दशा और दिशा पर सवाल खड़े किए थे, कुछ मांगें रखी थीं, और कुछ सलाह दी थी, उसमें आजाद अकेले नहीं थे। उस चिट्ठी में दस्तखत करने वाले लोगों मेें से दो-चार अब पार्टी में नहीं हैं, और एक-दो शायद पार्टी के पदाधिकारी बना दिए गए हैं, लेकिन उस चिट्ठी पर अफसोस जाहिर करने वाले भी कोई नहीं है। जिन्होंने उसे लिखा था वे उसके साथ कायम हैं। उस चिट्ठी पर उस वक्त इसी जगह पर लिखना हो चुका था, इसलिए आज उसे दुहराने के बजाय आज गुलाम नबी आजाद के उठाए गए मुद्दों पर चर्चा की जानी चाहिए। इन मुद्दों पर चर्चा आजाद के किसी हक को लेकर नहीं होनी चाहिए, बल्कि कांग्रेस पार्टी के भले के लिए बात होनी चाहिए। और ईमानदारी की बात तो यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव को हारने के बाद राहुल गांधी ने जिस तरह पार्टी और अपने खुद के भले के लिए अध्यक्ष पद छोड़ा था, और उनके परिवार से बाहर के किसी को अध्यक्ष बनाने की मांग की थी, उस पर पार्टी के ही बहुत से चापलूस नेताओं ने अमल नहीं होने दिया। उसका नतीजा आगे देखने मिला जब कांग्रेस ने एक-एक करके तकरीबन तमाम राज्य खो दिए, और अपनी बुनियाद, उत्तरप्रदेश में तो अब उसका नामलेवा भी नहीं दिखता है। ऐसी नौबत में भी अगर आज आधी सदी पार्टी में गुजारने वाले, छोड़क़र जा रहे एक नेता के उठाए मुद्दों को अगर उसके नाम की तख्ती सहित कचरे की टोकरी में डाल दिया जाएगा, तो पार्टी को न अपने भविष्य की फिक्र है, न ही अपने वर्तमान की।

गुलाम नबी आजाद ने जो लिखा है, वह बात कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता बंद कमरों में करते हैं, और जब उन्हें घुटन अधिक होती है, किसी दूसरी पार्टी में संभावना अधिक दिखती है, तो वे वहां भी चले जाते हैं। भारत की आज की राजनीति में इस आवाजाही में कुछ भी अटपटा नहीं है, और हो सकता है कि कांग्रेस से अभी लोगों का जाना जारी भी रहे। इसलिए भी इस पार्टी को अपने बचे हुए जनाधार, बचे हुए नेताओं, बची हुई इज्जत, और बची हुई संभावना की फिक्र करते हुए आजाद की लिखी बातों पर सोचना चाहिए। यह कहते हुए हम पल भर के लिए भी यह नहीं मानते कि कांग्रेस के भीतर के जिस चापलूस और चाटुकार गिरोह का आजाद ने विरोध किया है, वे खुद भी संजय गांधी के वक्त से ऐसे ही गिरोह के सदस्य नहीं थे। लेकिन पार्टी छोड़ते वक्त श्मशान वैराग्य की तरह, या कि निकलते हुए चेहरा छुपाने के लिए तोहमतों का जो नकाब उन्होंने ओढ़ा है, उस पर चर्चा कांग्रेस को अपने भले के लिए करनी चाहिए, गुलाम नबी आजाद तो अपने भले की फिक्र खुद कर लेंगे।

उन्होंने चिट्टी में लिखा है कि कांग्रेस आज अपरिपक्व लोगों के हाथों में है, और इसकी सबसे बड़ी मिसाल है कि राहुल गांधी ने मीडिया के सामने (मनमोहन सिंह सरकार के) एक सरकारी अध्यादेश को फाडक़र फेंका था, जिसे कि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं ने गहन विचार-विमर्श करके तैयार किया था। उन्होंने इस हरकत को बचकाना करार देते हुए कहा- इस हरकत की वजह से प्रधानमंत्री और भारत सरकार की गरिमा को भारी ठेस पहुंची। आजाद की लिखी हुई यह बात थोड़ी सी अधूरी भी है। वह अध्यादेश अकेले कांग्रेस पार्टी का नहीं था, वह यूपीए मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर था जिसमें दूसरी पार्टियां भी शामिल थीं, और किसी भी एक पार्टी के किसी भी नेता को उसे फाडक़र फेंकने का हक नहीं था, जिसके बाद कि उसकी इस मनमानी को सरकार को मानना भी पड़ा था। यह पूरे गठबंधन का अपमान था।

लोगों को यह याद रहना चाहिए कि 2019 का आम चुनाव हारने के बाद जब कांग्रेस पार्टी के भीतर एक चिंतन शिविर करने की बात उठी, तो राजस्थान में मई के महीने में हुए इस आयोजन में उसका नाम ही बदलकर नवसंकल्प चिंतन शिविर कर दिया गया था। जरूरत चिंतन की थी, लेकिन आयोजन को नवसंकल्प का मौका बना दिया गया था, उसमें हारे हुए चुनाव के बारे में कोई भी चर्चा नहीं हुई थी, बस आगे क्या-क्या करना है वही बात हुई थी। लोगों को यह भी याद होगा कि उसमें राहुल गांधी ने बिना किसी प्रसंग के क्षेत्रीय पार्टियों के खिलाफ बहुत कुछ कहा था, और उससे कांग्रेस के साथीदल हक्का-बक्का भी रह गए थे।

गुलाम नबी आजाद ने साफ-साफ लिखा है कि सोनिया गांधी महज नाम की अध्यक्ष हैं, और सारे महत्वपूर्ण फैसले राहुल गांधी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब पार्टी के 22 बड़े नेताओं ने पार्टी की बदहाली की तरफ सोनिया गांधी का ध्यान खींचने के लिए चिट्ठी लिखी, तो चाटुकारों की मंडली ने उन पर हमला बोला, उन्हें विलेन बनाने की कोशिश की, बहुत बुरी तरह अपमानित किया गया, इन्हीं के इशारे पर जम्मू में उनका जनाजा निकाला गया, और जिन लोगों ने यह काम किया उनकी तारीफ पार्टी के महासचिवों और राहुल गांधी ने की। उन्होंने गांधी परिवार के लिए कानूनी मामले लडऩे वाले पार्टी के एक बहुत पुराने और वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल पर भी चापलूसों द्वारा हमला करने का जिक्र चिट्ठी में किया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि यह दुर्दशा इसलिए हुई क्योंकि पार्टी के ऊपर एक ऐसे आदमी (राहुल गांधी) को थोप दिया गया है जो गंभीर नहीं है।

इन बातों को गुलाम नबी आजाद के दस्तखत से हटाकर देखें, तो इनमें कुछ भी नाजायज और अटपटा नहीं है। कांग्रेस पार्टी अगर यह कहती है कि वह ऐतिहासि चुनौती से गुजर रही है, गरीबों के लिए लड़ रही है, साम्प्रदायिकता और तानाशाही के खिलाफ लड़ रही है, और ऐसे में पार्टी छोडक़र जाना इन तमाम सिद्धांतों से गद्दारी है, तो पार्टी को यह भी सोचना चाहिए कि ऐसी ‘गद्दारी’ की नौबत न आने देने के लिए उसने क्या किया है? जी-23 नेताओं ने पार्टी को जो चिट्ठी लिखी उसकी तकरीबन तमाम ही जायज बातों में से किस पर कुछ किया गया? अभी-अभी एक अलग इंटरव्यू में कांग्रेस के एक और बड़े नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि उन्हें कई सालों से राहुल गांधी से मिलने का समय नहीं मिल पाया है। कुछ ऐसी ही बात पंजाब के मुख्यमंत्री रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कही थी। अब अगर बिना किसी ओहदे पर रहते हुए अगर पार्टी के तमाम फैसले राहुल गांधी ही कर रहे हैं, और वे बरसों तक पार्टी के बड़े नेताओं को मिलने का समय भी नहीं दे रहे हैं, वे नियमित रूप से अनियमित रहने वाले पार्टी नेता हैं, तो ऐसे में कोई किस उम्मीद से इस कांग्रेस में रह सकते हैं? आज भारत की चुनावी राजनीति ओवरटाईम करने वाले मोदी-शाह के मुकाबले की है, और यह राजनीति पार्टटाईम काम से नहीं चल सकती है।

(Daily Chhattisgarh)

हेमंत सोरेन का जो भी हो, सोचें कि यह नौबत क्यों?

  26 अगस्त 2022

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लेकर ऐसी खबरें हैं कि चुनाव आयोग ने उन्हें भ्रष्ट आचरण का दोषी पाकर विधानसभा की उनकी सदस्यता खारिज कर देने की सिफारिश की है, या उन्हें अपात्र घोषित कर दिया है। चुनाव आयोग को यह मामला झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने भेजा था, और खबरें हैं कि आयोग ने सीलबंद लिफाफे में अपना फैसला राज्यपाल को भेजा है जो कि अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। इस बीच अलग से खबरें आ रही हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने विधायकों की बैठक लेना शुरू कर दिया है। ऐसी चर्चा है कि अगर उनके हटने की नौबत आती है, तो वे अपनी पत्नी को गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री बना सकते हैं। फिलहाल हम यहां इस बढ़ते और बदलते हुए घटनाक्रम पर नहीं लिख रहे हैं, बल्कि उन वजहों पर लिख रहे हैं जिनकी वजह से यह नौबत आई है।

देश के कुछ विपक्षी राज्यों को लेकर हाल के बरसों में यह चर्चा बहुत बुरी तरह बढ़ी है कि केन्द्र की मोदी-सरकार की अगुवाई में इंकम टैक्स, ईडी, और सीबीआई जैसी एजेंसियां लगातार विपक्षी नेताओं को घेरती हैं, और वे अगर भाजपा में शामिल हो जाते हैं, तो उनके खिलाफ जांच थम भी जाती है। कल ही दिल्ली में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता ने ऐसे कई भूतपूर्व गैरभाजपाई नेताओं के नाम गिनाए जिनके खिलाफ बड़े-बड़े मामले दर्ज हुए, लेकिन वे भाजपा में आ गए, तो उन मामलों को इन्हीं एजेंसियों ने किनारे धर दिया। लेकिन ये आरोप पिछले कई बरसों से लग रहे हैं, इसलिए आज यहां पर एक दूसरे पहलू पर चर्चा करने की जरूरत है।
 
हमने अभी कुछ महीने पहले पश्चिम बंगाल के मामले में देखा कि ममता बैनर्जी के एक विवादित मंत्री की एक महिला मित्र के दो मकानों से 50 करोड़ रूपये की नगदी बरामद हुई। यह रकम अविश्वसनीय किस्म की है, और किसी नेता से जुड़े मामलों में इतनी बड़ी बरामदगी देश में पहली बार हुई। ममता के कई दूसरे मंत्री और नेता पिछले बरसों में चिटफंड कंपनियों के मामलों में फंसे, और फिर उनमें से कुछ भाजपा में जाकर राहत हासिल पाने में कामयाब हुए। लेकिन यह बात तो अपनी जगह थी ही कि वे लोग ऐसे मामलों में शामिल थे। खुद ममता बैनर्जी देश में सबसे अधिक सादगी से जीने वाली नेता हैं, लेकिन उनके करीबी सत्तारूढ़ नेता मोटी कमाई के काम में लगे मिले हैं, और मंत्री रहते हुए अभी कुछ हफ्ते पहले जो गिरफ्तारी हुई है, और जितनी रकम मिली है, वह ममता बैनर्जी की राष्ट्रीय छवि और संभावना दोनों को बर्बाद करने का सामान भी है।

अब महाराष्ट्र के बहुत से नेताओं को देखें, तो संजय राऊत जैसे शिवसेना के एक सबसे दिग्गज नेता के बारे में वहां की जमीन को लेकर जिस तरह के घोटाले की खबरें आ रही हैं, वे संजय राऊत और शिवसेना दोनों की साख को खराब करती हैं। यह पूरी तरह से मुमकिन है कि केन्द्र सरकार की एजेंसियां छांट-छांटकर भाजपा के विरोधियों के दरवाजे जा रही हैं, लेकिन इस बात को भी समझने की जरूरत है कि क्या ये एजेंसियां किसी ईमानदार नेता के घर भी जा रही हैं? हेमंत सोरेन से जुड़े हुए कुछ लोगों पर कुछ महीने पहले भी छापे पड़े थे, अब जिस मामले को लेकर चुनाव आयोग से उनकी अपात्रता की चर्चा है वह मामला भ्रष्ट आचरण का है जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए एक खदान अपने ही नाम आबंटित कर ली, जो कि बहुत बचकाने किस्म का लालच था, और बहुत ही सतही दर्जे की बेवकूफी भी थी। कोई व्यक्ति कुर्सी पर रहते हुए अपने को ही कुछ आबंटित कर दे, तो वह तो भ्रष्ट आचरण है ही। अब चुनाव आयोग केन्द्र सरकार की एक एजेंसी नहीं है, और उसने उसे मिली हुई शिकायत पर यह कार्रवाई अगर की है, तो हेमंत सोरेन की एक गलती, या उसके एक गलत काम की वजह से ही ऐसा हो पाया है।

हम राजनीतिक बदले की भावना से अपने से असहमति रखने वाले लोगों पर केन्द्र सरकार की कार्रवाई से इंकार नहीं कर रहे, लेकिन ऐसे असहमत नेताओं में से जो भ्रष्टाचार में शामिल हैं, या दूसरे किस्म के जुर्म में शामिल हैं, वे अपने आपको कुछ या बहुत हद तक खतरे में तो खुद ही डालते हैं। अब इसी झारखंड की चर्चा करें तो इसी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता शीबू सोरेन को 2006 में अपने ही एक भूतपूर्व निजी सहायक के अपहरण और कत्ल के मामले में कुसूरवार पाया गया था। वे उस समय मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में कोयला मंत्री थे, और देश के इतिहास में पहली बार एक केन्द्रीय मंत्री को हत्यारा करार दिया गया था। उन्हें उम्रकैद सुनाई गई थी, और अदालत ने उन्हें जमानत भी नहीं दी थी। लेकिन जल्द ही हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। उनके साथ और भी कई तरह के विवाद जुड़े हुए थे, और उस वक्त तो वे केन्द्रीय मंत्री थे, और जांच सीबीआई ने ही करके उन्हें हत्या में शामिल साबित किया था।

बगल के बिहार में लालू यादव कई मामलों में सजा पाकर, इलाज की छुट्टी पर अभी घर बैठे हैं, कुछ और मामलों में उन्हें सजा होने के आसार भी हैं, और यह सब उनके अपने ही कुकर्मों की वजह से हुआ है। इसलिए उन पर अगर छापे पड़ रहे हैं, तो वे बदनीयत तो हो सकते हैं, लेकिन उनका खतरा तो लालू यादव और उनके परिवार का खुद ही का खड़ा किया हुआ है। ऐसा हाल महाराष्ट्र में एनसीपी के कई नेताओं का है, या दूसरे कई प्रदेशों में भी है। जब सत्ता की ताकत लोगों को पकड़ में आने लायक परले दर्जे के भ्रष्टाचार करने का हौसला भी देती है, तो फिर वे अपने आपको आसान निशाना बनाकर पेश कर देते हैं, और उसके बाद यह महज वक्त की बात रहती है कि उनसे असहमत और सत्तारूढ़ राजनीतिक ताकत कब उनके घर अपनी एजेंसियों को पहुंचाती है। इसी देश की राजनीति में कई ऐसे मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं जिनके बारे में किसी भ्रष्टाचार की कल्पना भी किसी ने नहीं की, और जो कार्यकाल खत्म होने के बाद एक रिक्शे में सामान लादकर सरकारी घर छोडक़र चले गए थे।

हम किसी केन्द्र या किसी राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा बदनीयत से की जा रही कार्रवाई का बचाव करना नहीं चाहते, लेकिन सार्वजनिक जीवन के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि वे क्या भ्रष्टाचार से जरा भी दूर नहीं रह सकते? और आज जब देश में असहमति के खिलाफ जांच एजेंसियों का माहौल बना हुआ है, तो यह भी सोचने की जरूरत है कि क्या ऐसी जांच और कार्रवाई के दबाव में देश में भ्रष्टाचार कुछ कम भी हो सकता है? यह एक अलग बात है कि टैक्स और कालेधन से जुड़े हुए मामलों की जांच और उन पर कार्रवाई करने की एजेंसियां सिर्फ केन्द्र सरकार के हाथ हैं, और वहां सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक विरोधी ही निशाने पर हैं, लेकिन राज्य सरकारों के हाथ भी कुछ दूसरे किस्म के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस और कुछ मामूली एजेंसियां हैं। राजनीतिक दलों के बीच पसंद और नापसंद, सहमति और असहमति पर टिकी ऐसी जांच और कार्रवाई देश में राजनीतिक कटुता तो बढ़ा रही हैं, लेकिन हो सकता है कि इससे राजनीति में संगठित और व्यापक भ्रष्टाचार घट भी सके। दिक्कत यही रहेगी कि केन्द्र और अधिकतर राज्यों में जिस एक पार्टी की सरकार है, उसके भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई मुमकिन नहीं हो सकेगी। लेकिन लोकतंत्र में हर समस्या का तो कोई इलाज भी नहीं है। अपने को नापसंद भ्रष्ट लोगों पर कार्रवाई होती रहे, और अपने को पसंद भ्रष्ट बचे रहें, यह आज भारतीय राजनीति का एक आम नजारा हो गया है, और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता के बिना यह नजारा बदलने वाला भी नहीं है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

कभी बाढ़, तो कभी सूखा, कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा, इसके लिए क्या तैयारी?

 25 अगस्त 2022

योरप के बारे में डरावनी रिपोर्ट है कि वह पिछले पांच सौ साल का सबसे भयानक सूखा झेल रहा है। यूरोपियन यूनियन की रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि फसलों का इलाका घटते चल रहा है, बिजली उत्पादन घटते चल रहा है, जंगलों की आग बढ़ते जा रही है, और अंधाधुंध बढ़ी हुई गर्मी से हवाई आवाजाही पर असर पड़ा है, हजारों लोग बेघर हुए हैं, और गर्मी और लू की वजह से सैकड़ों मौतें हुई हैं। यह रिसर्च रिपोर्ट कहती है कि करीब आधा योरप चेतावनी जारी करने के स्तर पर चल रहा है। बिजली से लेकर अनाज तक का उत्पादन इस गर्मी और सूखे की वजह से गिर गया है। नदियां सूख गई हैं, और कई बड़ी नदियों में पानी की कमी से सैकड़ों बरस से चले आ रहा जल परिवहन भी रोक दिया गया है। बांधों में पानी इतना कम है कि पनबिजली  का उत्पादन एक चौथाई तक कम हो गया है। साठ हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जल चुके हैं। पिछले दस बरस में जंगल हर बरस जितने जलते थे, उससे यह साढ़े चार गुना अधिक है।

अब योरप से बिल्कुल परे के एक दूसरे इलाके को देखें तो चीन से पिछले कुछ दिनों से खबर आ रही है कि वहां के बहुत से बड़े शहरों में शॉपिंग मॉल बंद करवा दिए गए हैं, पर्यटन केन्द्र बंद कर दिए गए हैं, कारखानों में उत्पादन बंद कर दिया गया है, और शहरी इलाकों में भी बिजली काट दी गई है, क्योंकि नदियां सूख गई हैं, बांधों में पानी नहीं है, और पनबिजली बन नहीं पा रही है। चीन में यह 61 साल की सबसे भयानक गर्मी बताई जा रही है, और इसकी वजह से बिजली की खपत भी बढ़ी है, और नदियां सूखने से बिजली का उत्पादन गिरा है। डेढ़ सौ से अधिक शहरों में बुरी लू की चेतावनी जारी की गई है, और लोगों को घर पर ही रहने कहा गया है। कोरोना लॉकडाउन की वजह से महीनों से चीन के कई शहरों की जिंदगी थमी हुई थी, कारोबार रूका हुआ था, और अब वहां खेती से लेकर कारखाने तक, सभी कुछ बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। चीन की सबसे लंबी, और दुनिया की तीसरे नंबर की लंबी नदी, यांग्त्जी से 40 करोड़ लोगों को पानी मिलता है, और खेतों को भी, लेकिन पिछले पांच बरस में इसमें पानी पचास फीसदी से भी कम रह गया है, जो कि पिछले डेढ़ सौ बरस का रिकॉर्ड है।

लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले जब ब्रिटेन के ग्लास्गो में क्लाइमेट समिट हुई थी तो दुनिया के बहुत से देशों के शासन प्रमुख वहां पहुंचे थे, और वहां इस बात पर बड़ी फिक्र हुई थी कि दुनिया का तापमान जो लगातार बढ़ते चल रहा है, उसकी बढ़ोत्तरी को रोकना जरूरी है, वरना दुनिया में बड़ी तबाही आएगी जिसे झेल पाना मुश्किल होगा। लेकिन जिस तरह श्मशान वैराग्य के माहौल में बहुत सी बातें की जाती हैं, उसी तरह देशों ने ग्लास्गो में तरह-तरह के वायदे किए, घोषणापत्र पर दस्तखत किया, और अपने-अपने देश लौटकर सब भूल गए। अमरीका में पर्यावरण को बचाने के लिए वाइडन सरकार जो कोशिश कर रही थी, उस पर वहां के सुप्रीम कोर्ट ने ही रोक लगा दी है। इस अदालती फैसले को बहुत ही निराशाजनक कहा जा रहा है, लेकिन उसके खिलाफ कुछ इसलिए नहीं किया जा सकता कि वहां का सुप्रीम कोर्ट पिछले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की सोच वाले जजों के बहुमत का हो चुका है, और वहां से किसी सुधारवादी, प्रगतिशील, उदारवादी फैसले की कोई उम्मीद नहीं की जा रही है।

लेकिन सिर्फ योरप, चीन, और अमरीका की फिक्र करना आज का मकसद नहीं है। आज हिन्दुस्तान के कितने ही प्रदेशों में जैसी बुरी बाढ़ आई हुई है, बादल फटने से उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में जितनी तबाही हो रही है, वह सब बेकाबू लग रहा है। एक तरफ तो पिछले कई महीनों से हिन्दुस्तान में चल रही बेमौसम की अंधाधुंध गर्मी ने गेहूं जैसी परंपरागत फसल को तबाह किया है, तो दूसरी तरफ आने वाले बरसों में यह गर्मी कम होते नहीं दिख रही है, और इस पूरी सदी में यूपी, राजस्थान, और गुजरात में बहुत बुरी गर्मी पडऩे का मौसम का अंदाज सामने आया है। एक तरफ कई प्रदेश बाढ़ से बेहाल हैं, दूसरी तरफ कई प्रदेश भयानक गर्मी और सूखा झेल रहे हैं, ऐसे में मौसम की सबसे बुरी मार भी बढ़ते चल रही है, और वह बार-बार भी हो रही है। फिर मौसम सडक़ के ट्रैफिक जैसा नहीं होता है जिसे कि लालबत्ती दिखाकर रोक दिया जा सके।

लोगों को याद होगा कि पिछले एक बरस में ही इसी योरप में भयानक बाढ़ आई थी जिसमें विकसित देशों के जमे-जमाए शहर तबाह हुए थे। और मौसम की उस एक किस्म की मार से ठीक उल्टे जाकर अब सूखे की मार आ रही है। अब सवाल यह है कि क्या बाढ़ के वक्त का पानी किसी तरह धरती के भीतर बचाने की कोई योजना बनाई जा सकती थी जो कि उस वक्त बाढ़ की मार को कम करती, और आज पानी की जरूरत को? हिन्दुस्तान में नदियों को जोडऩे की एक योजना सुप्रीम कोर्ट तक जाकर वहां के हुक्म से चल रही है, लेकिन उसकी किसी रफ्तार की कोई खबर सुनाई नहीं पड़ती है। पर्यावरण शास्त्रियों और आंदोलनकारियों की एक बड़ी फिक्र उससे जुड़ी हुई यह है कि धरती के ढांचे में फेरबदल करके नदियों को दूसरी तरफ भी कुछ हद तक मोड़ा जाएगा, तो उससे नदियों के प्राणियों की जिंदगी पर कैसा असर पड़ेगा? अभी वह बहस चल ही रही है, नदी-जोड़ योजना से अधिक रफ्तार से चल रही है, लेकिन इसी बीच देश के किसी हिस्से में बाढ़ से तबाही, और किसी दूसरे हिस्से में सूखे से तबाही दोनों साथ-साथ चल रही हैं, और नदियां जोडक़र, पानी मोडक़र संतुलन बनाने के अलावा और कोई रास्ता सूझ भी नहीं रहा है। महाराष्ट्र जैसे कई प्रदेश हैं जहां पर ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी कुओं में उतरकर खतरनाक तरीकों से रोज पानी निकालने में गुजर जा रही है, और असम, बिहार जैसे प्रदेश हैं जहां पर हर बारिश में लोगों की जिंदगी बचाव दल की बोट की वजह से बच पाती है।

हम यहां पर ग्लास्गो के बड़े-बड़े और 2070 तक के वायदों के बारे में अधिक कहना नहीं चाहते, लेकिन इस पर सोचने की जरूरत है कि इंसानों की जिंदगी के लिए पर्यावरण, पेड़ और पशु के साथ-साथ पानी और फसल भी उतने ही जरूरी माने जाएं या नहीं? न सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि दुनिया के हर देश को अंधाधुंध बारिश के दौरान गिरने वाले पानी को जमीन के भीतर डालने की वैज्ञानिक तरकीब पर अमल करना होगा, उसी से बाढ़ घटेगी, समुद्र का जलस्तर बढऩा कम होगा, और अधिक गर्मी के वक्त वह पानी जमीन से निकाला जा सकेगा। दुनिया के अधिक बारिश वाले इलाकों में बंजर जमीनों पर ऐसे विशाल जलाशय बनाने की जरूरत है जो कि पानी को सहेजकर रख सकें, और वह पानी भूजल भंडारों की भरपाई कर सके। सिर्फ यही नुस्खा कोई रामबाण दवा नहीं है, और मौसम में बदलाव के जिम्मेदार बाकी भी बहुत से पहलुओं पर सोचना होगा। कुल मिलाकर यह है कि इन बातों पर चर्चा बढऩी चाहिए, उसे बढ़-बढक़र जागरूकता में तब्दील होना चाहिए, और वह जागरूकता अमल में आनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 24 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

लोकतंत्र नाम का बस शब्द ही एक है, वरना अलग-अलग जगह...

 24 अगस्त 2022

मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरमथंगा की बेटी का एक वीडियो खबरों में आया जिसमें वह एक क्लिनिक में डॉक्टर को पीट रही है। समाचार बताता है कि वह बिना समय लिए डॉक्टर से मिलने गई थी, और डॉक्टर ने जब अपाइंटमेंट लेकर आने कहा तो भडक़कर उसने डॉक्टर पर बुरी तरह हमला किया। इसके खिलाफ पूरे मिजोरम के डॉक्टरों ने विरोध करते हुए काली पट्टी लगाकर काम किया, और आईएमए ने बयान जारी किया। यह सब देखते हुए मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से इस डॉक्टर से माफी मांगी, और कहा कि मेरी बेटी के व्यवहार के बचाव में मैं कुछ कहना नहीं चाहता, हम जनता और डॉक्टर से माफी मांगते हैं। उन्होंने लिखा कि उनकी बेटी पर कठोर कार्रवाई न करने को लेकर वे आईएमए के आभारी हैं। इसके पहले मुख्यमंत्री के बेटे ने भी सोशल मीडिया पर माफी मांगी थी कि मानसिक तनाव की वजह से उनकी बहन बेकाबू हो गई थीं।

मिजोरम देश के उन बेहतर प्रदेशों में से है जहां कानून का राज कुछ अधिक कड़ाई से चलता है, और इसीलिए मुख्यमंत्री-परिवार की तरफ से ऐसे माफीनामों की नौबत आई है। शायद वहां पर शराफत के पैमाने भी थोड़े अलग होंगे, और जनता शायद अधिक संवेदनशील होगी। वरना ऐसी ही हरकत देश के कई दूसरे प्रदेशों में होकर गुजर गई होती, और पिटा हुआ डॉक्टर खुद छुपते रहता कि मीडिया उससे कोई बयान न निकलवा ले। लोगों को याद होगा कि किस तरह मध्यप्रदेश के इंदौर में भाजपा के एक सबसे बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे ने क्रिकेट के बल्ले से खुलेआम एक म्युनिसिपल अफसर को पीटा था जो कि एक अवैध निर्माण गिराने वाले दस्ते के साथ गया था। क्रिकेट बैट से बार-बार मारते हुए इसका साफ वीडियो चारों तरफ आया था, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उसे गिरफ्तार किया था, जमानत पर छूटने पर भाजपा ने उसका ऐसा जमकर स्वागत किया था कि उसमें हवाई फायर तक किए गए थे। दूसरी तरफ जब इस मामले की सुनवाई हुई तो इसी अफसर ने अदालत में यह बयान दिया कि वह नहीं देख पाया कि उस पर किसने हमला किया। देश के अधिकतर हिस्सों में मिजोरम जैसी माफी कम दिखेगी, इंदौर की तरह पिटने के बाद की मुकरी हुई गवाही अधिक दिखेगी, क्योंकि सत्ता का आतंक कम नहीं रहता है।

आज इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए सूझी कि अभी-अभी योरप के एक देश फिनलैंड की खबर आई थी जिसमें वहां की काफी कम उम्र की महिला प्रधानमंत्री सना मारिन कुछ नशे की हालत में एक पार्टी में खुलकर डांस करते दिख रही हैं, वहां के विपक्ष ने उनके व्यवहार को लेकर आपत्ति की, और यह शक जाहिर किया कि हो सकता है कि उन्होंने ड्रग्स (प्रतिबंधित नशा) भी ली हो। इसके जवाब में 36 बरस की इस प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक घोषणा की कि वे आरोपों का जवाब देने के लिए मेडिकल जांच करवा रही हैं जिससे यह साफ हो जाएगा कि उन्होंने ड्रग्स ली थीं, या नहीं। लेकिन यह अकेली बात नहीं है जो कि सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही दिखा रही है। एक और खबर अमरीका से आई है जहां अमरीकी निर्वाचित संसद की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी के पति पॉल पेलोसी को शराब के नशे में गाड़ी चलाने के आरोप में पांच दिन जेल की सजा सुनाई गई है। उन्होंने नशे में गाड़ी चलाते हुए उनके घर के पास ही खड़ी एक दूसरी गाड़ी को टक्कर मार दी थी जिससे दोनों गाडिय़ां टूट-फूट गई थीं। 82 बरस के पॉल पेलोसी को अब कार चलाते हुए हर बार कार के उपकरण पर अपनी सांस का नमूना देना होगा जिससे यह पता लगेगा कि उन्होंने शराब तो नहीं पी रखी है, और अगर वे नशे में मिले तो गाड़ी शुरू नहीं होगी।

क्या हिन्दुस्तान में कोई लोकसभा अध्यक्ष के जीवनसाथी के बारे में ऐसी कल्पना कर सकते हैं? इस देश में तो सत्तारूढ़ छोटे से नेताओं के जुर्म भी ढांकने के लिए पुलिस आमतौर पर अपनी पूरी ताकत से टूट पड़ेगी, और जरूरत पडऩे पर किसी दूसरे बेगुनाह को तलाशकर, छांटकर उसे मुजरिम बताकर पेश भी कर दिया जाएगा।

इन तीन-चार घटनाओं से दो बातें सामने आती हैं, एक तो यह कि कानून लागू करने वाली पुलिस अगर अमरीकी कड़ाई वाली हो, तो छोटे-बड़े किसी भी तरह के लोग जुर्म करने से पहले हिचकेंगे। संसद की अध्यक्ष के पति को आखिर पकड़ा तो किसी सिपाही ने ही होगा, जिसे यह भी मालूम हो चुका होगा कि वह किसका चालान कर रहा है, किसे जेल ले जा रहा है। यहां पिछले बरस कोरोना लॉकडाउन के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री निवास पर हुई दारू पार्टी की जांच करने वाली लंदन पुलिस को भी याद करना ठीक होगा जिसने कि जांच के बाद पार्टी में मौजूद लोगों पर जुर्माना भी लगाया। क्या हिन्दुस्तान में कोई किसी थानेदार के घर पर भी हुई पार्टी पर जुर्माने की कल्पना कर सकते हैं? दूसरी बात यह कि जहां नेताओं के मन में जनता के प्रति जवाबदेही और सम्मान रहता है, वहां पर वे फिनलैंड की प्रधानमंत्री की तरह अपनी खुद की जांच को भी तैयार हो जाते हैं, या मिजोरम के मुख्यमंत्री की तरह खुलकर माफी भी मांग लेते हैं।

हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोकतंत्र इतना बदहाल हो चुका है कि हत्यारे और बलात्कारी लोगों को सरकार नाजायज तरीके से रिहा कर रही है, और समाज उन्हें माला पहनाकर, मिठाई खिलाकर उनका स्वागत कर रहा है। हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में कानून और तथाकथित इंसानियत की बस इतनी ही इज्जत रह गई है। एक वक्त था जब इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी और उसके गिरोह की गुंडागर्दी के बारे में जनता पार्टी की सरकार आने पर फिल्म भी बनाई गई, कई किताबें भी लिखी गईं। लेकिन क्या आज सत्ता पर काबिज लोगों की गुंडागर्दी पर खबरें भी दो-चार दिन में दम नहीं तोड़ देती हैं? हिन्दुस्तानी लोकतंत्र सभ्यता में जहां तक भी पहुंचा था, वह बहुत तेज रफ्तार से वापिस जा रहा है। हवा में न सिर्फ साम्प्रदायिकता का हिंसक जहर बढ़ते चल रहा है, बल्कि लोगों के बीच कानून का किसी भी तरह का सम्मान तेज रफ्तार से खत्म हो रहा है। यह देश खुद दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने का दंभ भर रहा है, लेकिन यहां लोकतंत्र, सभ्य जीवन, और तथाकथित इंसानियत के बुनियादी पैमानों पर भी लगातार गिरावट जारी है, और सबसे बड़ी बात यह कि यह गिरावट न सिर्फ राजनीतिक सत्ता की ताकत से हो रही है, बल्कि इसमें न्यायपालिका और मीडिया की ताकत से भी गिरावट हो रही है।

(Daily Chhattisgarh)

जेएनयू वीसी के जाति और मनुस्मृति विरोधी भाषण के पीछे का राज

  23 अगस्त 2022

दुनिया में अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ लंबे समय से वामपंथी रूझान के लिए पहचाने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की साख बड़ी ऊंची है। हाल के बरसों में किसी भी वामपंथी रूझान के खिलाफ देश भर में चलाए जा रहे अभियान के तहत जेएनयू में भी केन्द्र सरकार की तरफ से दक्षिणपंथी कोशिशें हुईं, और वहां कुलपति से लेकर कोर्स तक कई फैसलों पर सरकारी रूझान की झलक दिखाई दी। लेकिन अभी मोदी सरकार की मनोनीत कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित का एक लंबा व्याख्यान अचानक खबरों में आया है जो कि दक्षिणपंथी लोगों में खासी असुविधा पैदा कर सकता है। वे दिल्ली में केन्द्र सरकार की एक अम्बेडकर व्याख्यान माला के दौरान ‘जेंडर जस्टिस पर अम्बेडकर के विचार : समान नागरिक संहिता की व्याख्या’ विषय पर बोल रही थीं। उनकी बातों को काफी खुलासे से यहां लिखना पड़ेगा जो कि खबर सरीखा लगेगा, लेकिन उसके बिना उस पर कोई टिप्पणी करना ठीक नहीं होगा।

वाइस चांसलर शांतिश्री ने कहा कि हिन्दुओं के कोई भी देवता अगड़ी जातियों के नहीं हैं, भगवान शिव भी दलित या आदिवासी रहे होंगे, भगवान जगन्नाथ भी आदिवासी थे, और ऐसी स्थिति में अगर हम (हिन्दू) अभी भी जातियों को लेकर भेदभाव बनाए हुए हैं, तो यह बहुत ही अमानवीय है। उन्होंने भारत की हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था पर तगड़ी मार करते हुए यह कहा है कि हमारे देवताओं की उत्पत्ति को मानव शास्त्र या वैज्ञानिक लिहाज से समझना चाहिए, कोई भी देवता ब्राम्हण नहीं है, सबसे ऊंचा देवता भी क्षत्रिय है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव भी एससी या एसटी समुदाय के होंगे क्योंकि वे श्मशान में गले में सांप डालकर बैठते हैं, उनके पास पहनने के लिए कपड़े भी बहुत कम है, मुझे नहीं लगता कि ब्राम्हण श्मशान में बैठ सकते हैं। वाइस चांसलर ने आगे कहा कि लक्ष्मी, शक्ति, या भगवान जगन्नाथ भी मानवविज्ञान के लिहाज से अगड़ी जाति के नहीं हैं, ऐसे में आज समाज इस जाति व्यवस्था को क्यों ढो रहा है?

उन्होंने महिलाओं के बारे में कहा कि मनुस्मृति के अनुसार सभी महिलाएं शूद्र हैं, इसलिए कोई भी महिला ये दावा नहीं कर सकतीं कि वे ब्राम्हण या कुछ और हैं। महिलाओं को जाति केवल पिता या विवाह के जरिये पति से मिलती है, और मुझे लगता है कि ये पीछे ले जाने वाला विचार है। शांतिश्री ने आगे कहा कि महिलाओं के लिए आरक्षण की जरूरत है क्योंकि आज भी देश के 54 विश्वविद्यालयों में से कुल 6 में महिला कुलपति हैं। वाइस चांसलर का मनुस्मृति के बारे में दिया गया यह बयान इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि अभी-अभी एक हाईकोर्ट महिला जज ने मनुस्मृति को महिलाओं का सम्मान बढ़ाने वाला कहा था। जेएनयू वीसी ने कहा कि कुलपति के लिए कुलगुरू शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए, और वे विश्वविद्यालय कार्य परिषद में यह प्रस्ताव रखेंगी।

लेकिन जेएनयू वीसी का केन्द्र सरकार के कार्यक्रम में समान नागरिक संहिता को लेकर अम्बेडकर के विचारों पर दिया गया यह व्याख्यान इतना मासूम भी नहीं दिख रहा है कि वह हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था पर चोट करने, और मनुस्मृति की आलोचना करने के लिए आयोजित किया गया हो। वाइस चांसलर की आगे की बात इस कार्यक्रम के रूझान को साफ करती है जिसमें वे कहती हैं कि जेंडर जस्टिस के प्रति सबसे बड़ा सम्मान यह होगा कि हम बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की महत्वाकांक्षा के अनुरूप समान नागरिक संहिता लागू करें। उन्होंने मिसाल दी कि गोवा में पुर्तगालियों ने अपने शासन के दौरान इसे सभी धर्मों के लिए लागू किया था, और सभी ने इसे मंजूर कर लिया है, तो बाकी देश में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने कहा कि यह नहीं हो सकता कि देश में अल्पसंख्यकों को सारे अधिकार दे दिए जाएं, लेकिन बहुसंख्यकों को वे सभी अधिकार न मिले। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा होता रहा तो एक दिन यह चीज इतनी उल्टी पड़ जाएगी कि इसे सम्हालना मुश्किल हो जाएगा। वाइस चांसलर ने कहा कि अम्बेडकर पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे, आधुनिक भारत का कोई भी नेता उनके जितने महान विचारक नहीं था।

जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी जेएनयू वीसी के व्याख्यान का देवी-देवताओं के ब्राम्हण न होने, और महिलाओं को लेकर मनुस्मृति के खिलाफ कहा हुआ बयान ही सुर्खियों में आया है। खबरें बहुत आसान चीजों को ही, बहुत आकर्षक बातों को ही सुर्खियां बनाती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि कुलपति की कही हुई इन बातों के भीतर इस आयोजन का मकसद समान नागरिक संहिता को अम्बेडकर की कही बातों से जोडक़र लोगों के सामने दुहराना था, और वह मकसद कामयाब भी रहा है। जेएनयू वीसी को मौजूदा केन्द्र सरकार ने ही मनोनीत किया है इसलिए उनकी विचारधारा को लेकर कोई संदेह करने की जरूरत नहीं है। आज उनसे दूसरी बातों के साथ-साथ समान नागरिक संहिता की जरूरत को बखान करवाना एक राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने का काम भी है, और वह खबरों में जगह पाते हुए केन्द्र सरकार ने ठीक तरीके से करवा दिया है। जब सरकार आयोजक हो, और सरकार की मनोनीत वीसी वक्ता हो, तो इसमें कोई दिक्कत होनी भी नहीं थी। दूसरी बात यह कि जब समान नागरिक संहिता जैसे व्यापक असर वाले एक राजनीतिक इरादे को लागू करना हो, तो कुछ देर के लिए हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था की आलोचना में भी कोई बुराई नहीं है, और मनुस्मृति की महिलाओं पर ज्यादती गिनाने में भी कोई नुकसान नहीं है। जब भारत के आम चुनावों में सभी जातियों के लिए वोटर रहते हैं, और वोटरों में महिलाओं की आधी संख्या रहती है, तो उनकी हिमायती दिखती ऐसी बातें भी किसी नुकसान की न होकर फायदे की ही हैं। इस व्याख्यान से ऐसा लगता है कि केन्द्र सरकार का अगला एक बड़ा फैसला समान नागरिक संहिता का हो सकता है, जो कि भाजपा के राजनीतिक घोषणापत्र की एक पुरानी बात भी है। ऐसे में इसे एक अग्रिम सूचना मानना चाहिए कि सरकार अगले आम चुनाव के पहले एक समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगी, और जिन लोगों को इसकी बारीकियां मालूम हैं, उन लोगों को अभी से इस मुद्दे पर अपने तर्क तैयार कर लेने चाहिए। आज अलग-अलग कई धर्मों के लिए अलग-अलग नागरिक संहिताएं हैं, उन सबको मिलाकर एक करना कई किस्म की जटिलताएं पैदा कर सकता है। खासकर अल्पसंख्यकों की अलग खास धार्मिक पहचान, उनके सांस्कृतिक रीति-रिवाज को समान नागरिक संहिता कुचल सकती है, इसलिए उन्हें और उनके हिमायती लोगों को कागज-कलम लेकर बहस की तैयारी रखनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

आम हो या खास, वीडियो और सोशल मीडिया दबाव से कार्रवाई आसान हुई है..

  22 अगस्त 2022

पिछले दस दिनों में हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली के आसपास के इलाकों से निकले कुछ ऐसे वीडियो आए हैं जिनमें संपन्न तबके की महिलाएं अपनी दौलत और अपनी ताकत का दंभ दिखाते हुए रिहायशी इलाकों के सुरक्षा कर्मचारियों को पीट रही हैं। इसके साथ-साथ वे उन्हें ऐसी गंदी गालियां भी दे रही हैं जिन्हें आमतौर पर मर्दों की जुबान से ही सुना जाता है। ये महिलाएं सिर्फ संपन्नता के नशे में थीं या उन्होंने कोई और भी नशा कर रखा था, इसे वे ही जानें। लेकिन भारत की आम संस्कृति में महिला का सार्वजनिक रूप से ऐसा अश्लील बर्ताव करना भी अटपटा लगता है, और जब संपन्नता की गुंडागर्दी छोटे और मजबूर कर्मचारियों पर हिंसा करती है, तो वह गैरकानूनी तो होता ही है। ताजा मामले में नोएडा में सुरक्षा कर्मचारी को पीटने वाली और अश्लील बर्ताव करने वाली, वीडियो पर कैद महिला को गिरफ्तार करके 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया है। यहां पर हम मर्दों के किए हुए ऐसे ही जुर्म की बात नहीं कर रहे हैं, जिनके बारे में अक्सर ही लिखना हो जाता है, और वे बहुत आम भी हैं। एक महिला का मर्दों के साथ ऐसा करना कोई अतिरिक्त बड़ा जुर्म नहीं है, लेकिन इसमें जिस बात को समझना चाहिए वह संपन्नता से जुड़ी हिंसा की है। एक अकेली महिला तीन-चार वर्दीधारी सुरक्षा कर्मचारियों को मां-बहन की गालियां देते हुए धक्के दे रही है, और अधिक हिंसा करने की धमकी दे रही है, तो उस हिंसक अहंकार को जरूर समझना चाहिए।

आज हिन्दुस्तान में मोबाइल फोन के कैमरों की मेहरबानी से ऐसे सुबूत जुट जा रहे हैं जो कि तरह-तरह के जुर्म, और ज्यादतियों को साबित करते हैं। अगर ये न रहें तो संपन्न तबके के लोगों के खिलाफ छोटे कर्मचारी भला कौन सी शिकायत कहां कर सकते हैं, और उसे किस तरह से साबित कर सकते हैं? इस हिसाब से अगर देखें तो एक छोटे से सामान ने आज समाज के सबसे कमजोर लोगों को भी एक अभूतपूर्व ताकत दे दी है, और वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की कुछ उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन इन दो-चार महिलाओं के जो वीडियो सामने आए हैं, उनमें से एक वीडियो में वह इलाके के कुत्ते भगाने के खिलाफ सुरक्षा कर्मचारियों को लाठी से पीट भी रही है, और उसे धमकी भी दे रही है कि वह मेनका गांधी को फोन करने वाली है। लोगों को याद होगा कि एक-दो बरस पहले मेनका गांधी के एक सरकारी पशु चिकित्सक को फोन पर धमकाने की रिकॉर्डिंग सामने आई थी जिसमें वे उस सरकारी डॉक्टर को सेक्स से जुड़ी बड़ी असंभव किस्म की हरकतों वाली धमकियां दे रही थीं। मेनका गांधी केन्द्रीय मंत्री और सांसद रहते हुए भी इस तरह की जुबान और धमकियों के लिए जानी जाती हैं, और इसीलिए खुद हिंसा कर रही एक संपन्न महिला गंदी गालियां बकते हुए मेनका गांधी को भी बीच में लाने की बात कहती है।

कुल मिलाकर यह संपन्न तबके का एक ऐसा हिंसक अहंकार है जो कि संपन्न बस्तियों में अलग-अलग कई शक्लों में देखने मिलता है। बीच-बीच में सोशल मीडिया पर महानगरों के कई ऐसे नोटिस दिखते हैं जिनमें बहुमंजिली इमारतों में काम करने वाले लोगों के लिफ्ट इस्तेमाल करने पर मनाही लिखी रहती है। अब पांच-दस मंजिल ऊपर बसे घरों तक काम वाले लोग किस तरह जाएंगे, किस तरह सामान ले जाएंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी इमारतों में जब कामगारों या बाहर से पार्सल लेकर आने वाले लोगों के लिफ्ट इस्तेमाल करने पर रोक रहती है, तो वह मानवाधिकारों के खिलाफ रहती है। हमारा ख्याल है कि इन प्रदेशों के मानवाधिकार आयोगों को ऐसे किसी भी नोटिस पर तुरंत कार्रवाई करना चाहिए, और इमारत का मैनेजमेंट देखने वालों पर जुर्माना लगाना चाहिए।

आम जिंदगी में यही देखने में आता है कि जैसे-जैसे संपन्नता बढ़ती है, वैसे-वैसे इंसानियत घटने लगती है। ये महिलाएं अपने महिला होने की वजह से हिंसा नहीं कर रहीं, ये अपनी संपन्नता की बददिमागी में हिंसा कर रही हैं, और इसे उनकी संपन्नता से ही जोडक़र देखना चाहिए। फिलहाल तो ऐसी एक महिला की गिरफ्तारी से सभी किस्म के संपन्न औरत-मर्दों को थोड़ी सी समझ मिल सकती है कि उनकी बदसलूकी की वीडियो रिकॉर्डिंग उन्हें जेल भेज सकती है, और सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम तो कर ही सकती है। कमजोर तबकों को अपने बराबरी के लोगों का साथ देने के लिए ऐसे वीडियो सुबूत जुटाने की कोशिश करनी चाहिए, जहां कहीं सरकारी अमला ज्यादती करे, या कोई भी ताकतवर अमला कमजोर पर जुल्म करे, उसकी रिकॉर्डिंग करके उसे फैलाना चाहिए, और पुलिस तक भी पहुंचाना चाहिए। अगर ऐसे सुबूत न रहें तो भला कमजोर की बात का कौन भरोसा करे? करोड़ों रूपये के फ्लैट में रहने वाले अरबपति के खिलाफ एक मामूली सुरक्षा कर्मचारी की शिकायत पर शायद जिंदगी भर कोई पुलिस कार्रवाई न करती, लेकिन वीडियो सुबूत सोशल मीडिया पर फैल जाने के बाद इन दोनों के मिलेजुले दबाव ने पुलिस से कार्रवाई करवाई। इसलिए आम लोगों को इन दोनों चीजों की ताकत को अच्छी तरह समझना चाहिए, ऑडियो-वीडियो सुबूत भी जुटाने चाहिए, और उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाना भी चाहिए।

अब आम और संपन्न लोगों की इस चर्चा के बीच एक खास आदमी की चर्चा और हो जानी चाहिए। राजस्थान के एक भूतपूर्व भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे लोगों के बीच में गर्व से कहते दिख रहे हैं कि उन्होंने अब तक पांच (लोगों को) मारे हैं, लालवंडी में मारा, चाहे बहरोड़ में मारा, अब तक पांच मारे हैं। आहूजा लोगों को कह रहे हैं कि मैंने खुल्लम-खुल्ला छूट दे रखी है कार्यकर्ताओं को कि जो गाय को मारते दिखे, उसे मारो, हम जमानत भी करवाएंगे, बरी भी करवा देंगे। आहूजा जिन दो गांवों का जिक्र कर रहे हैं, उनमें लालवंडी में 2018 में रकबर खान, और बहरोड़ में पहलू खान की भीड़त्या की गई थी। कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस वीडियो सुबूत पर कार्रवाई करने की मांग की थी, और राजस्थान पुलिस ने अभी जुर्म दर्ज कर लिया है। इस सुबूत को देखते हुए राजस्थान भाजपा ने पार्टी को अपने पूर्व विधायक के बयान से अलग कर लिया है, और कहा है कि पार्टी कानून अपने हाथ में लेने के पक्ष में नहीं है। कुल मिलाकर बात यह है कि वीडियो सुबूतों के आधार पर कई तरह की कार्रवाई मुमकिन है, और पुलिस को इसका इस्तेमाल करते हुए तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)