दीवारों पर लिक्खा है, 10 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

...एक टी-शर्ट ने बखिया उधेडक़र धर दी औरों की

10  सितंबर  2022
 

किसी भी बात की प्रतिक्रिया का अंदाज लगाए बिना उसे छेडऩा कई बार आत्मघाती हो सकता है। अभी राहुल गांधी ने एक भाषण देते हुए आटे को किलो के बजाय लीटर के साथ कह दिया, तो उनके आलोचक कुछ सेकेंड की इस वीडियो क्लिप को लेकर सोशल मीडिया पर टूट पड़े। राहुल गांधी को बेवकूफ साबित करने का एक मुकाबला सा चल निकला। और ट्विटर पर जो लोग भाड़े के भोंपुओं की तरह काम करते हैं, उनकी फौज को राहुल गांधी पर छोड़ दिया गया। लेकिन बिना किसी फौज के इस हमले का जवाब आम लोगों ने ही सोशल मीडिया पर दिया जब उन्होंने नरेन्द्र मोदी से लेकर अमित शाह तक दर्जन भर अलग-अलग भाजपा नेताओं के भाषणों के वीडियो निकालकर पोस्ट करना शुरू किए जिसमें

उन्होंने बोलने की वैसी ही चूक कर दी थी जैसी राहुल गांधी से हो गई थी, और राहुल ने तो तुरंत ही उसे सुधारने की भी कोशिश की थी। अब राहुल के विरोधी नेताओं की जिन चूक को लोग भूल चुके थे, वे सब एक बार फिर याद आ गईं। अब उसी तरह राहुल गांधी ने अभी अपनी पदयात्रा के दौरान एक टी-शर्ट पहना जिस पर एक कंपनी का निशान भी था, और लोगों ने उस टी-शर्ट को इंटरनेट पर ढूंढ निकाला कि वह 40 हजार रूपये का है। और इसके बाद भाजपा के अपने ट्विटर हैंडल से, और दूसरे मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी राहुल गांधी की खिंचाई शुरू हुई कि वे 40 हजार का टी-शर्ट पहनते हैं, और जनता की फिक्र करने का नाटक करते हुए पदयात्रा करते हैं। अब इंटरनेट पर कोई सामान अलग-अलग दस किस्म के दामों पर मिलता है, इसलिए राहुल ने वह टी-शर्ट कितने में खरीदा, या ननिहाल जाने पर उसे किसी ने तोहफे में दिया, यह तो बात सामने नहीं आई है, लेकिन इससे दो अलग-अलग बातें सामने आईं। लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बहुत सी तस्वीरें निकालकर यह बताया कि वे किस ब्रांड के जूते पहने हुए हैं जो कितने के हैं, किस ब्रांड का धूप का चश्मा लगाए हुए हैं, जो कितने का है, और किस तरह उनका नाम बुना हुआ सूट पहने हुए हैं जो कि 10 लाख रूपये का आता है। ऐसी तमाम बातों के साथ लोगों ने यह भी याद दिलाया कि राहुल गांधी जिस परिवार के हैं, उसके मोतीलाल नेहरू आजादी की लड़ाई के भी पहले कितने दौलतमंद थे, और इस परिवार ने देश को आज के भाव से किस तरह अरबों की दौलत भेंट की है। इसके साथ-साथ लोगों ने मोदी के बचपन की चाय बेचने की कहानियां भी याद दिलाईं जो कि मोदी ही कई बार सुना चुके हैं। किसी भी बात की एक प्रतिक्रिया होती है, और जब सार्वजनिक जीवन में या राजनीतिक हथियार की तरह किसी बात को इस्तेमाल किया जाता है, तो उसका उल्टा असर भी सोच लेना चाहिए।

अब अकेले राहुल के टी-शर्ट को लेकर आज इस मुद्दे पर लिखने की जरूरत नहीं होती अगर ब्रिटेन की राष्ट्रप्रमुख, महारानी एलिजाबेथ के गुजरने के बाद लगातार यह माहौल नहीं बनता कि उन्होंने कितने महान काम किए थे, और किस तरह पूरी दुनिया में लोग उन्हें चाहते थे। वे व्यक्ति के रूप में अच्छी महिला हो सकती हैं, लेकिन उनकी सरकार ने, उनके देश की सरकार ने दुनिया भर को जिस तरह से लुटा है, जितना जुल्म ढहाया है, उसे इतिहास से मिटाना मुमकिन नहीं है। हिन्दुस्तान में जलियांवाला बाग का जो मानवसंहार एक अंग्रेज अफसर ने किया था, जिस तरह अंग्रेजीराज में बंगाल में अकाल में 30 लाख से अधिक लोगों को मर जाने दिया था, वैसी कहानियां दर्जनों देशों में अलग-अलग किस्म के जुल्म की हैं, जो कि ब्रिटिश सिंहासन से जुड़ी हुई हैं। दर्जनों देशों को गुलाम बनाकर अंग्रेजों ने जिस तरह उन देशों को लूटा है, उसे भी कोई भूल नहीं पाए हैं। इसलिए जब एलिजाबेथ को श्रद्धांजलि देते हुए बार-बार यह बात दुहराई जाने लगी कि दुनिया के लोग उन्हें कितना चाहते थे, तो गुलामी के उन दिनों से लेकर अभी इराक पर अमरीका के साथ गिरोहबंदी करके हमला करने में ब्रिटेन की भूमिका सबके सामने है, और एलिजाबेथ ही इस वक्त देश की मुखिया थीं।

इस पर लिखते हुए इंटरनेट पर जरा सा ढूंढें तो 2012 की सोलोमन आईलैंड्स की यह तस्वीर सामने आती है जिसमें ब्रिटिश राजघराने की प्रतिनिधि होकर नौजवान प्रिंस विलियम वहां गए थे, और वहां स्थानीय अफ्रीकी आदिवासियों के कंधों पर ढोए जा रहे सिंहासन पर बैठकर वे खुशी-खुशी घूमे थे। गुलामी के उस इतिहास को अभी दस बरस पहले 2012 में इस तरह दुहराते हुए भी इस शाही घराने को कुछ नहीं लगा था। एलिजाबेथ की ऐसी तस्वीर भी अभी तैर रही है जिसमें उनके मुकुट, उसके हीरे, उनके राजदंड, उनके बाकी गहने, इन सबके साथ लिखा गया है कि उन्हें किस-किस देश से लूटकर ले जाया गया था। हिन्दुस्तान में अंतरराष्ट्रीय परंपराओं के अनुरूप देश में एक दिन का राजकीय शोक रखा गया है, लेकिन लोगों का एक तबका इस पर भडक़ा हुआ है, और यह सवाल किया जा रहा है कि जिन्होंने हिन्दुस्तान को दसियों लाख मौतें दी हैं, उनका ऐसा कोई भी सम्मान क्यों किया जाना चाहिए। यह बात अलग है कि दुनिया में कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के चलते हुए हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराकर लाखों लोगों को मार डालने वाले अमरीका के राष्ट्रपति के जापान पहुंचने पर भी शिष्टाचार की वजह से उनका स्वागत ही होता है, और उसी तरह ब्रिटिश राजघराने से किसी के हिन्दुस्तान आने पर उनका भी स्वागत होता है। लेकिन किसी का गुणगान उनके इतिहास के स्याह पन्नों को भी निकालकर सामने रख देता है। इसलिए चाहे टी-शर्ट की बात हो, चाहे किसी और चीज की, किसी महत्वहीन बात को अंधाधुंध महत्व देने के पहले यह भी सोचना चाहिए कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी, और लोग सौ किस्म की बातें याद करेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 9 सितम्बर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

समकालीन इतिहास की सबसे लंबी गवाह नहीं रहीं

 9  सितंबर  2022
    

दुनिया के इतिहास में सबसे लंबे समय तक राष्ट्रप्रमुख रहीं ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के गुजरने के साथ ही दुनिया के इतिहास का एक बड़ा अध्याय पूरा लिखा गया। वे 70 बरस तक ब्रिटेन के सिंहासन पर रहीं, और 96 बरस की उम्र में चल बसीं। अभी दो दिन पहले ही उन्होंने ब्रिटेन के पिछले प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का इस्तीफा मंजूर किया था, और कंटरवेटिव पार्टी की नई नेता लिज ट्रस को अगला प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। इन दोनों ही तस्वीरों में वे कमजोरी के साथ खड़ी लेकिन हॅंसती-मुस्कुराती दिख रही थीं। कुछ ही समय पहले उनके पति गुजरे थे, और ब्रिटेन की संवैधानिक परंपरा के मुताबिक वे अपने बेटे, अब तक के प्रिंस चाल्र्स, और अब किंग चाल्र्स तृतीय को सत्ता देकर गई हैं।

ब्रिटेन को दुनिया में लोकतंत्र की मां कहा जाता है, लेकिन एक विरोधाभासी बात यह भी है कि एक शाही परिवार अब भी न सिर्फ ब्रिटेन का राष्ट्रप्रमुख है, बल्कि राष्ट्रमंडल देशों के कुछ और बड़े देश भी महारानी को अपना शासनप्रमुख मानते हैं। ये देश ब्रिटिश साम्राज्य से अलग-अलग वक्त पर आजाद हुए हैं, लेकिन अपनी पसंद से वे ब्रिटिश महारानी को ही अपना संवैधानिक प्रमुख मानते हैं। ऐसे पन्द्रह देशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे बड़े देश भी शामिल हैं। इसके अलावा क्वीन एलिजाबेथ राष्ट्रमंडल देशों की प्रमुख भी थीं जिसमें शामिल 56 देशों में से तकरीबन तमाम देश ब्रिटेन के गुलाम देश रहे हुए हैं, और इन्हें देखने का एक नजरिया यह भी हो सकता है कि मुक्त कराए हुए बंधुआ मजदूरों ने अपने ही पिछले जमींदार-मालिक के मातहत एक संघ बना लिया। खैर, एलिजाबेथ के जाने के बाद किंग चाल्र्स तृतीय इसके मुखिया हो गए हैं। महारानी एलिजाबेथ उस ब्रिटिश शासन की सबसे लंबी राष्ट्रप्रमुख रही हैं जिसके राज में सूरज कभी डूबता नहीं था, मतलब यह कि दुनिया भर में बिखरे हुए देशों में से इतने देशों पर ब्रिटेन का राज रहता था जिनमें से कुछ में हर वक्त दिन रहता था।

लोगों को यह बात कुछ अजीब भी लग सकती है कि वे इतने बरस राजगद्दी पर रहीं कि उनके वारिस प्रिंस चाल्र्स पूरी जिंदगी से ही उन्हें महारानी देखते रहे, और खुद उनके महाराजा बनने की बारी 73 बरस की उम्र में आई। कई बरस से एलिजाबेथ की सेहत ठीक नहीं चल रही थी, और वे चाहतीं तो पहले भी गद्दी अपने बेटे के लिए खाली कर सकती थीं। लेकिन ब्रिटेन की शाही परंपराओं, और उसके लोगों की सोच के बारे में हमें अधिक पता भी नहीं है, और न ही उसका यहां कोई महत्व है। लेकिन एक सवाल यह उठता है कि जिस देश को दुनिया में लोकतंत्र का जन्मदाता माना जाता है, उसने राष्ट्रप्रमुख मनोनीत करने के लिए कोई लोकतांत्रिक तरीका क्यों ईजाद नहीं किया?

लोकतंत्र के ब्रिटिश मॉडल को ही लेकर आगे बढऩे वाले हिन्दुस्तान ने एक बेहतर मिसाल पेश की जहां आज देश की हर जाति के, और तकरीबन हर धर्म के लोग राष्ट्रपति बन चुके हैं। ब्रिटिश जनता राजघराने का लंबा-चौड़ा खर्च उठाती है, और इस परिवार के लोगों की निजी दौलत अरबों-खरबों में है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में निर्वाचित राष्ट्रप्रमुख की व्यवस्था कायम होने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के राजाओं को सरकार से मिलने वाला प्रिवीपर्स नाम का भत्ता भी बंद करवा दिया, और राजा धीरे-धीरे करके आम जनता की बराबरी पर ही आ गए। ब्रिटिश गुलामी से बाहर निकले हिन्दुस्तान ने एक बेहतर मॉडल पेश किया, लेकिन परंपराओं को पसंद करने वाले ब्रिटिश लोगों ने राजघराने की व्यवस्था को जारी रखा, और देश के दूसरे बहुत से लोग भी ब्रिटिश महारानी, अब महाराजा को अपना राष्ट्रप्रमुख बनाकर चलते हैं। जो देश ब्रिटिश गुलामी से बाहर हो चुके हैं, वे भी अब अगर राजसिंहासन की इस व्यवस्था को ढो रहे हैं, तो यह उनकी अपनी पसंद की बात है।

महारानी एलिजाबेथ ने अपने जीते जी द्वितीय विश्वयुद्ध भी देखा, और दुनिया भर की पिछली करीब पौन सदी की तरह-तरह की राजनीतिक उथल-पुथल भी देखी। वे समकालीन इतिहास की एक सबसे बड़ी गवाह रहीं, और अगर उन्होंने कहीं इतिहास दर्ज कर रखा होगा, तो वह बहुत खास इस मायने में भी होगा कि पिछली सदी के सन् 50 के दशक से अब तक लगातार इतनी अहमियत वाले तख्त पर बैठकर दुनिया को देखने का ऐसा मौका किसी भी और को नहीं मिला है। ब्रिटिश लोगों का बहुमत राजघराने का हिमायती है, और इसी के साथ इस व्यवस्था की कोई भी आलोचना बेमायने हो जाती है। हर देश को अपनी व्यवस्था तय करने का हक है, और ब्रिटिश राष्ट्रप्रमुख को तो इतने सारे दूसरे देश अपना प्रमुख मानते हैं जिन पर कोई ब्रिटिश दबाव भी नहीं है। यह आम हिन्दुस्तानी समझ के मुताबिक समझ से परे की बात है, लेकिन हकीकत यही है।

ब्रिटेन की एक बात को लेकर तारीफ करनी होगी कि ऐसी शाही व्यवस्था वहां एक प्रतीक के रूप में तो कायम है, लेकिन वह मीडिया और समाज को नहीं रोकती कि उन्हें राजघराने की आलोचना नहीं करनी चाहिए। देश के नोटों और डाकटिकटों पर जिस परिवार की तस्वीरें हैं, उस परिवार के सेक्स-स्कैंडल ब्रिटिश अखबारों में एक आम बात रहते हैं। आज वहां राजगद्दी पर बैठे चाल्र्स जब प्रिंस चाल्र्स थे, तब उनके और उनकी पत्नी डायना के विवाहेत्तर संबंधों के स्कैंडल ब्रिटिश अखबारों को दिलचस्प बनाए रखते थे। अभी भी शाही परिवार के एक प्रमुख सदस्य को अदालतों में यह मुकदमा झेलना ही पड़ रहा है कि उसने एक नाबालिग लडक़ी से सेक्स किया था। ब्रिटिश मीडिया इस बारे में बेरहम है, और शाही परिवार की व्यवस्था चाहने वाली ब्रिटिश जनता भी ये सेक्स कहानियां चाहती है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि टैक्स देने वाली जनता को इतना सनसनीखेज मनोरंजन इससे सस्ते में नहीं मिल सकता था। किसी का भी गुजरना कमउम्र में और किसी हादसे से न हो, तो उसमें अधिक दुख मनाने का कुछ नहीं रहता। और जितनी लंबी और जितनी महत्वपूर्ण जिंदगी महारानी एलिजाबेथ गुजारकर गई हैं, उसका एक छोटा हिस्सा भी शायद उनके वारिसों को नसीब नहीं होगा। हमारे लिए यह निधन समकालीन इतिहास के सबसे लंबे गवाह का गुजरना है, और हम उम्मीद करते हैं कि उनका लिखा या दर्ज करवाया हुआ सामने आएगा।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 सितम्बर 2022


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कहीं जंग तो कहीं मौसम की मार, यह वक्त बहुत चौकन्ना रहने का है...

8  सितंबर  2022
    

छह महीने से अधिक हुए जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया जिसकी चेतावनी कई दिन पहले से अमरीका देते आ रहा था, और अमरीका यह चेतावनी भी दे रहा था कि अगर रूस ने ऐसा किया तो उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे। रूस ने हमला किया, और अमरीका ने योरप के देशों के साथ मिलकर रूस पर अभूतपूर्व कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इसके पहले पश्चिमी देश कभी अफगानिस्तान पर, कभी ईरान, उत्तर कोरिया और वेनेजुएला पर ऐसे प्रतिबंध लगाते आए हैं, उनका भी असर इन देशों पर अलग-अलग सीमा तक पड़ा, लेकिन रूस पर लगाए गए प्रतिबंध बहुत अधिक कड़े थे, और रूस इसी दौरान एक बड़े खर्चीले युद्ध को भी छेड़ बैठा था। नतीजा यह हुआ कि रूस के साथ दुनिया के एक बड़े हिस्से का कारोबार थम गया, और ऐसा माना जा रहा है कि रूस को जंग लडऩे के लिए भी तंगी हो रही है। दुनिया भर में रूसी सरकार, बैंकों, और कारोबारियों के बैंक खाते जब्त कर लिए गए हैं, फिर भी पश्चिम की उम्मीद पूरी नहीं हो पाई है, और रूस की घरेलू अर्थव्यवस्था की कमर नहीं टूटी है।

कल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक आर्थिक मंच पर एक लंबे भाषण में पश्चिमी प्रतिबंधों पर जमकर हमला किया, और कहा कि इससे रूस का तो कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन पश्चिमी देशों की हालत खराब हो गई है। पश्चिम की कोशिश तो रूसी अर्थव्यवस्था को खत्म करने की थी, लेकिन इन प्रतिबंधों से बाकी दुनिया की अर्थव्यवस्था चौपट हुई है। पुतिन की कही हुई बात इस मायने में तो सही है ही कि आज दुनिया भर के देश रूस-यूक्रेन जंग के चलते अभूतपूर्व महंगाई झेल रहे हैं, ईंधन की कमी है, साथ ही अनाज से लेकर खाद तक की कमी है, और इस जंग के खत्म होने तक नौबत सुधरने के आसार भी नहीं है। इसलिए पुतिन की कही बात को इस संदर्भ में देखने की जरूरत है कि इस जंग की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों का नुकसान बाकी दुनिया को कितना झेलना पड़ रहा है? और पश्चिम के देश तो फिर भी संपन्न हैं, और वहां पर महंगाई को लोग किसी तरह झेलकर जिंदा भी रह लेंगे, लेकिन बाकी दुनिया के गरीब देश बिल्कुल भी इस हालत में नहीं हैं कि इस जंग और आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से पैदा हालात झेल सकें। हिन्दुस्तान के एकदम करीब के देश देखें तो श्रीलंका और पाकिस्तान बहुत खराब हालत में हैं, बांग्लादेश अच्छी हालत में नहीं है, और अफगानिस्तान में भुखमरी की नौबत अधिक दूर नहीं है। बाकी दुनिया के जो सबसे बदहाल देश हैं, उनमें यमन से लेकर सोमालिया तक बहुत से देश बिना रूसी-यूक्रेनी अनाज के भुखमरी की कगार पर हैं। जंग के बीच संयुक्त राष्ट्र की दखल से यूक्रेन से कुछ अनाज निकला है, जिसके बारे में पुतिन ने यह आरोप लगाया है कि वह गरीब देशों के नाम पर निकला है, लेकिन वह योरप ले जाया जा रहा है।
अब हिन्दुस्तान ने अमरीका और बाकी योरप के दबाव को झेलते हुए भी रूस के बहिष्कार का फतवा नहीं माना था। भारत ने यह भी साफ कर दिया था कि जब योरप रूस से गैस और तेल लगातार ले रहा है, तब भारत से रूस के बहिष्कार की उम्मीद करना नाजायज है। यह भी कह दिया गया था कि भारत में गरीबी अधिक है, और ऐसे देश को दूसरी जगहों से महंगा तेल लेने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। भारत के रूस से जो पुराने दोस्ताना रिश्ते रहे हैं, उनका भी असर था कि भारत अमरीकी और पश्चिमी दबाव के सामने नहीं झुका। चीन, हिन्दुस्तान, और ईरान जैसे देश रूस के साथ कारोबारी रिश्ते बनाए चल रहे हैं, और रूस में इस वजह से भी हालात खराब नहीं हो पाए हैं।

लेकिन कल पुतिन की कही बातों को इस संदर्भ में भी देखने की जरूरत है कि यूक्रेन की स्वायत्तता का साथ देने के नाम पर नैटो देशों, और अमरीका ने जिस तरह से यूक्रेन को जंग के मोर्चे पर डटाकर रखा है, वह यूक्रेन के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने सरीखा मामला है। ये देश रूस के खिलाफ यूक्रेन को इतने हथियार दे रहे हैं कि वह जवाबी जंग जारी रख सके। इनका एक मकसद तो यह है कि यूक्रेनी फौज की शहादत की कीमत पर भी रूस को फौजी और आर्थिक रूप से कमजोर करना। इसके पीछे की रणनीति यह भी हो सकती है कि एक कमजोर रूस किसी और मोर्चे पर पश्चिमी देशों के खिलाफ बहुत हमलावर नहीं हो सकेगा। अगर सिर्फ कल्पना की बात की जाए तो जिस तरह यूक्रेन पर रूसी हमला हुआ, उसी तरह किसी भी दिन ताइवान पर अगर चीनी हमला होता है, तो उस नौबत में एक मजबूत रूस पश्चिमी फौजी हितों के खिलाफ रह सकता है। इसलिए भविष्य के किसी युद्ध की आशंका या संभावना देखते हुए पश्चिम आज से ही चीन के एक साथी देश को कमजोर कर रहा है, और इस काम में यूक्रेन उसे बंदूक टिकाने के लिए कंधे की तरह मिल गया है। पश्चिमी देशों की इस रूस विरोधी फौजी जरूरत, और चीन विरोधी संभावना से भारत का अधिक लेना-देना नहीं है। जंग के ये मोर्चे हिन्दुस्तान से बहुत दूर हैं, और हिन्दुस्तान ऐसे किसी भी दुस्साहसी फैसले का बोझ उठाने की हालत में भी नहीं है। इसलिए भारत अपने तात्कालिक सीमित राष्ट्रीय हितों के मुताबिक आज के इन अंतरराष्ट्रीय तनावों में किसी भी हिस्सेदारी से बच रहा है।

लेकिन आज जब रूस-यूक्रेन जंग का बोझ पूरी दुनिया की कमर तोड़ रहा है, तो ऐन उसी वक्त पाकिस्तान की विकराल बाढ़, और चीन से लेकर योरप तक के भयानक सूखे की विरोधाभासी प्राकृतिक विपदाएं एक साथ टूट पड़ी हैं। इन सबका भी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। ये जिन देशों में हैं, उन पर तो बुरा असर है ही, लेकिन इनके अलावा वे देश भी बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं जो यहां से सामान खरीदते थे, या बेचते थे। कुल मिलाकर आज दुनिया का हाल न सिर्फ जंग से बदहाल है, बल्कि यह मौसम की मार का भी बुरा शिकार है। यह अर्थव्यवस्था दुनिया के किस हिस्से को कहां ले जाकर पटकेगी, इसका कोई ठिकाना अभी नहीं है। लेकिन इस नौबत से एक सबक सबको लेना चाहिए कि किसी को आज यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि आज उनके दिन जैसे हैं, उतने अच्छे आगे भी बने रहेंगे। ऐसी आशंका के साथ ही हर किसी को खर्च के लिए मुट्ठी भींचकर रखनी चाहिए, और मेहनत करने के लिए कमर कसकर तैयार रहना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 6 सितम्बर 2022


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साइरस मिस्त्री की मौत से शुरू हुई चर्चा का इस्तेमाल बाकी जिंदगियां बचाने में हो

6  सितंबर  2022
   

दो दिनों से हिन्दुस्तान का मीडिया टाटा के एक भूतपूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री की सडक़ हादसे में मौत को लेकर अटकलें लगा रहा है कि एक नामी-गिरामी कंपनी की सुरक्षित कार के हादसे में किस तरह सामने बैठे दो लोग तो बच गए, पीछे बैठे दोनों लोग मर गए, और कार का बोनट तक नहीं टूटा है। कुछ लोग पेशेवर अपराधकथा-लेखक की तरह जुट गए हैं कि इस हादसे के पीछे कोई साजिश तो नहीं है। कार सवार चारों लोग पारिवारिक दोस्त थे, और कोई पेशेवर ड्राइवर इसके लिए नहीं रखा गया था। इस बात को भी लोग संदिग्ध और रहस्यमय मान रहे हैं कि इतने लंबे सफर में कोई ड्राइवर क्यों नहीं रखा गया था। खैर, साइरस मिस्त्री टाटा की कंपनियों में सबसे अधिक शेयरों के मालिक हैं, और कंपनी के साथ लंबी कानूनी लड़ाई के चलते वे कुछ बरस खबरों में भी थे, और दो बड़े कारोबारियों के बीच कत्ल करवाना फिल्मों में दिखते भी रहता है, इसलिए इस मामले में भी ऐसे शक पर टिकी चर्चाएं जारी हैं।

लेकिन हम इस हादसे के एक तकनीकी पहलू पर बात करना चाहते हैं जिससे बाकी हिन्दुस्तान भी सबक ले सकता है। शुरुआती पुलिस जानकारी से पता लगता है कि सामने की दोनों सीटों वाले लोगों ने सीट बेल्ट लगाए हुए थे, और पीछे के दोनों लोगों ने नहीं लगाए थे। ऐसा अंदाज है कि पीछे के लोग दोनों सीटों के बीच दबकर ही मर गए। अब तमाम महंगी कारों में पीछे भी सीट बेल्ट रहते हैं, और किसी टक्कर की नौबत में हर सीट बेल्ट उस मुसाफिर को सीट से बांधकर रखता है, इसलिए जान बचाने में सीट बेल्ट का सबसे बड़ा योगदान रहता है। फिर जो जानकार लोग लिख रहे हैं, उसके मुताबिक कारों में लगे हुए एयरबैग किसी टक्कर की हालत में तभी काम करते हैं जब सीट बेल्ट लगा होता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि अगर कार सडक़ किनारे बंद खड़ी है, उसमें कोई मुसाफिर नहीं है, सीट बेल्ट नहीं लगा है, तो टक्कर की हालत में उसके सीट बेल्ट खुलने की जरूरत नहीं रहती जिसे वापिस लगवाने में खासा खर्च भी होता है। इसलिए अगर चलती हुई कार में भी सीट बेल्ट नहीं लगे हैं तो उसके एयरबैग नहीं खुलते, और कार की यह पूरी सुरक्षा-प्रणाली बेकार हो जाती है। आज हिन्दुस्तान में हालत यह है कि कुछ महानगरों को छोड़ दें, तो बाकी पूरे देश में लोग सीट बेल्ट लगाने जितना आसान काम भी नहीं करते हैं जिससे कि उनकी जिंदगी जुड़ी हुई है।

अब यहां पर सरकार की जिम्मेदारी आती है कि वह अपनी पुलिस से ऐसे तमाम लोगों का चालान करवाए जो कि बिना सीट बेल्ट चलते हैं, दुपहिया पर बिना हेलमेट चलते हैं, या मोबाइल फोन पर बात करते हुए चलते हैं, नशे में या अधिक रफ्तार से चलते हैं। इनमें से हर बात को अब कैमरों में भी दर्ज किया जा सकता है, और हर चौराहे पर पुलिस की तैनाती भी जरूरी नहीं है। लेकिन आमतौर पर यह देखने में आता है कि सत्तारूढ़ पार्टी अराजक जनता पर भी कोई कार्रवाई करवाना नहीं चाहती कि नाराज वोटर अगली बार खिलाफ वोट न दे दें। दुनिया के दूसरे विकसित देशों में 25 बरस पहले से सुरक्षा कैमरे चौराहों पर नियम तोडऩे वाली गाडिय़ों की तस्वीर सहित कम्प्यूटर से बने चालान लोगों के फोन पर एक मिनट के भीतर ही पहुंचा देते हैं, और ईमेल आने की बीप सुनते ही लोग समझ जाते हैं कि लालबत्ती तोडऩे का सैकड़ों डॉलर का चालान आ गया है। हिन्दुस्तान कहने के लिए विकसित देश होने का दावा करता है, लेकिन यहां सार्वजनिक जगहों पर नियमों को लागू करवाने का काम सबसे ढीला है। जब सरकारें यह मान लेती हैं कि अराजक को भी नाराज नहीं करना है, तो हालत लगातार बिगड़ते चले जाना तय रहता है।

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पुलिस ने यह करके देखा है कि चौराहों पर लगे कैमरों से मिली तस्वीरों से लोगों के घर चालान भेजा जा सकता है। लेकिन मानो यह कोई वैज्ञानिक परीक्षण रहा हो, इसके कुछ नमूने जनता के सामने पेश करने के अलावा इसका बड़े पैमाने पर कोई इस्तेमाल नहीं किया गया। इससे सरकार को कमाई ही होती है, और लोगों की जिंदगी बचती है, लेकिन अलग-अलग जगहों पर पुलिस या तो भ्रष्ट रहती है, या लापरवाह और निकम्मी, और कई जगहों पर ये दोनों ही बातें लागू होती हैं। यह तो राज्य के राजनीतिक नेतृत्व के भी समझने की बात रहती है कि किसी भी सभ्य प्रदेश में सार्वजनिक जीवन में लोगों को जिम्मेदार बनाने का काम उस प्रदेश की तस्वीर बेहतर बनाने के काम भी आता है। दूसरे प्रदेशों से जो लोग किसी भी सिलसिले में आते हैं, वे शहरी विकास देखने के साथ-साथ ट्रैफिक देखकर भी समझ जाते हैं कि राज्य में नियमों का कितना पालन हो रहा है।

लेकिन इससे भी अधिक जरूरी एक बात यह है कि लोग जिंदगी में पहली बार अगर कोई कानून तोड़ते हैं, तो सबसे अधिक संभावना इसी बात की रहती है कि वह ट्रैफिक कानून हो। यहां से नियम-कानून की हिकारत का जो सिलसिला शुरू होता है, वह फिर आगे बढ़ते चलता है। अभी जिन शहरों में नौजवान रोजाना चाकूबाजी कर रहे हैं, हमारा अंदाज है कि इन्होंने ट्रैफिक नियम तोडऩे से गुंडागर्दी शुरू की होगी, और जब उस काम से उन्हें किसी ने नहीं रोका होगा, उस पर कोई जुर्माना या सजा नहीं भुगतना पड़ा होगा, तो फिर धीरे-धीरे वह अराजकता बढक़र उन्हें कातिल तक बना देती है। आम लोगों की जिंदगी का पहला जुर्माना हर मामले में ट्रैफिक चालान ही होता होगा, और अगर वहीं से उन्हें एक सबक मिलते चलता है, तो वे आगे अधिक बड़े मुजरिम बनने का खतरा कुछ कम रखते हैं। इसलिए ट्रैफिक नियम तोडऩे वालों पर तुरंत ही कड़ी कार्रवाई इसलिए होनी चाहिए कि आगे जाकर ये लोग कोई कत्ल या बलात्कार करने का हौसला न जुटाएं। शुरुआत में ही पुलिस से वास्ता पड़ जाए, जो जुर्माना देना पड़े, वह नुकसान उन्हें याद रहता है।

कहने के लिए सरकार और उसके अफसर यह कह सकते हैं कि जिन लोगों को अपनी जान की फिक्र नहीं उन्हें सरकार भी क्या बचा लेगी। लेकिन हकीकत यह है कि लोगों को जिम्मेदार बनाना सरकार की एक जिम्मेदारी रहती है। पहले लोग सिनेमाघरों में सिगरेट पीते थे, सरकार ने उस पर जुर्माना लगाया, और दूसरी कई सार्वजनिक जगहों पर भी रोक लगाई, और नतीजा यह है कि आने वाले बरसों में उस पर बहुत हद तक अमल भी होने लगा। आज सच तो यह है कि सरकार के ट्रैफिक से जुड़े विभागों को अराजक लोगों के साथ किसी रियायत करने का हक भी नहीं है, क्योंकि ऐसे लोग अपनी और दूसरों की जिंदगी के लिए खतरा रहते हैं। एक बड़े कारोबारी की ऐसी मौत के बाद लगातार खबरों में सीट बेल्ट की चर्चा को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस को हर जगह कड़ाई बरतनी चाहिए, और एक-एक बार जुर्माना देने के बाद कम ही लोग होंगे जो कि दुबारा जुर्माना देने का नुकसान उठाएंगे। दुनिया के जिम्मेदार देशों में बार-बार नियम तोडऩे वाले लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने का भी नियम रहता है, और हिन्दुस्तान में भी जिम्मेदार आम लोगों की जान बचाने के लिए ऐसी सजा देनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)