हर त्यौहार बताता है कि अदालत की इज्जत दो कौड़ी भी नहीं बची है...
15 सितंबर 2022
हिन्दुस्तान के कुछ प्रदेशों में हर त्यौहार
साम्प्रदायिक तनाव की आशंका और खतरे के साथ आता है, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे
प्रदेश में त्यौहार लोगों का जीना हराम करने वाले रहते हैं। कई-कई दिन तक
लाउडस्पीकर पर ऐसा शोर किया जाता है कि इस प्रदेश में कोई कानून ही नहीं
है। अभी गणेश विसर्जन कई दिनों तक चला, और सडक़ों पर आवाजाही बर्बाद हुई, और
शहरों का कोई हिस्सा ऐसा नहीं बचा जहां कान फाड़ देने वाले संगीत ने लोगों
का जीना हराम न किया हो। हाईकोर्ट के कई तरह के आदेश सरकारी अफसरों की
कचरे की टोकरी से होते हुए अब तक कागज कारखानों में लुग्दी बनकर दुबारा
अखबारी कागज बन गए होंगे, लेकिन हाईकोर्ट की हस्ती पर नौकरशाही हॅंसती हुई
दिखती है। किसी आदेश का कोई सम्मान नहीं है, और अगर कोई जज छत्तीसगढ़ के
किसी भी बड़े शहर में विसर्जन-जुलूस के साथ कुछ घंटे चल ले, तो कई हफ्ते
काम करने के लायक नहीं रह जाएंगे। यह एक अलग बात है कि हर शहर में अफसर
इतने चतुर होते हैं कि वे राजभवन, मुख्यमंत्री निवास, जजों के बंगले, और
बड़े अफसरों के रिहायशी इलाकों को लाउडस्पीकरों से दूर रखते हैं। हाईकोर्ट
को कभी जिला प्रशासनों से फाइलें बुलाकर देखनी चाहिए कि जिला मुख्यालय की
किन कॉलोनियों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का उपयोग रोकने के आदेश जारी किए
जाते हैं, और यह भी पूछना चाहिए कि बाकी इलाकों के इंसान इस हिफाजत के
हकदार क्यों नहीं माने जाते हैं?
इस बार गणेश विसर्जन के पहले से सोशल मीडिया पर सामाजिक कार्यकर्ता लगातार अफसरों को आगाह कर रहे थे। और बात सिर्फ गणेशोत्सव की नहीं है, दूसरे धार्मिक त्यौहारों का भी यही हाल रहता है, और शहर के बड़े-बड़े महंगे होटलों और शादीघरों का भी यही हाल रहता है कि उनके आसपास एक-दो किलोमीटर में बसे हुए लोग भी लगातार हल्ले के बीच ही जीते हैं। कहने के लिए पुलिस और प्रशासन हमेशा ही दो-चार आंकड़े दिखा सकते हैं कि उन्होंने लोगों के लाउडस्पीकर जब्त किए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि शहरों में जब बवाल करते हुए ऐसे अराजक जुलूस निकलते हैं जिनसे आसपास रह पाना भी बर्दाश्त के बाहर हो जाता है, तो पुलिस उन जुलूसों का इंतजाम करते चलती है, न कि उन्हें रोकते हुए। अभी विसर्जन के जुलूस में ही छत्तीसगढ़ के एक छोटे जिले में पुलिस ने लाउडस्पीकर बंद करवा दिए, तो वहां के धार्मिक संगठन इसे धर्म पर हमले की तरह करार देते हुए एकजुट हो रहे हैं। यह नौबत इसलिए आई है कि बाकी तकरीबन तमाम जिलों में हर तरह की अराजकता को पूरी छूट दी जा रही है, और किसी एक जिले में कार्रवाई होती है तो वह खटकने लगती है।
जब हाईकोर्ट के आदेश पूरे प्रदेश के लिए हों, और आदेश से परे कोलाहल अधिनियम के तहत पहले से बने हुए नियम हों, उन्हें तोडऩे वालों के लिए सजा का प्रावधान हो, तब अगर इसे पूरे प्रदेश में धड़ल्ले से तोड़ा जाता है तो यह मामला जिला प्रशासन की अनदेखी से परे प्रदेश सरकार की अनदेखी का रहता है। प्रदेश सरकार चला रहे नेताओं और अफसरों की अनदेखी के बिना सारे के सारे जिला प्रशासन एक जैसे लापरवाह और गैरजिम्मेदार नहीं हो सकते। यह तो सरकार की तय की हुई प्राथमिकता दिखती है कि किसी भी धार्मिक अराजकता को न छुआ जाए, ताकि वोटरों का कोई भी एक तबका सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ संगठित न हो सके। नतीजा यह हो रहा है कि वोटों की यह फिक्र लोगों की जिंदगी हराम कर रही है, और धर्मान्ध लोगों को छोडक़र बाकी तमाम लोगों को यह लगता है कि क्या धर्म के लिए ऐसा सारा उत्पात जरूरी है? क्या बिना हंगामे के धार्मिक रीति-रिवाज पूरे नहीं हो सकते?
यह भी समझने की जरूरत है कि जब धर्म बने थे तब न तो बिजली थी और न ही लाउडस्पीकर। अपने-अपने इलाकों में दिन में पांच बार कुछ मिनटों के लिए बजने वाले मस्जिदों के लाउडस्पीकरों के खिलाफ तो कई प्रदेशों में हिन्दुत्ववादी संगठन सडक़ों पर प्रदर्शन कर रहे हैं, और अदालतों तक जा रहे हैं। दूसरी तरफ बर्दाश्त के बाहर का हल्ला करने वाले, शोर करने वाले लाउडस्पीकरों पर रोक की बात ये लोग नहीं करते। एक-एक त्यौहार पर कई-कई दिनों तक लाउडस्पीकरों पर जीना हराम किया जाता है, लेकिन उसे रोकना धर्म पर हमला करार दिया जाएगा या साम्प्रदायिक कहा जाएगा।
जो हाईकोर्ट छोटी-छोटी बातों को अपनी अवमानना से जोड़ता है, उसे छत्तीसगढ़ के तमाम बड़े शहरों से मीडिया और सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई खबरों और वीडियो पर राज्य सरकार से एक रिपोर्ट मांगनी चाहिए ताकि सरकार हलफनामे पर अदालत को यह बताए कि उसके अब तक के दिए गए कई आदेश, और दी गई कई चेतावनियां किस तरह कचरे की टोकरी में हैं। जब प्रदेश में सरकार और अफसरों का ऐसा रूख हो, जब सभी पार्टियों के सारे नेता अपने-अपने इलाके में अराजकता बढ़ाने में लगे हों, तब जनता से यह उम्मीद बेकार है कि वह बार-बार जनहित याचिका लेकर अदालत जाए, या अवमानना याचिका लेकर जजों को याद दिलाए कि गली-गली उनकी बेइज्जती की जा रही है। आम जनता के पास न तो इतना वक्त है और न ही इतना पैसा, लेकिन अदालतों के पास बेहिसाब ताकत है। जनता की जिंदगी को बचाने के लिए न सही, कम से कम अपनी इज्जत बचाने के लिए हाईकोर्ट के जजों को अवमानना की कार्रवाई शुरू करनी चाहिए, और सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए। एक धर्म की अराजकता दूसरे धर्मों को भी बढ़ावा देती है, और इसे हम साल में कई बार देखते आ रहे हैं। अब तो जजों को देखना है कि उनकी कोई ताकत बची है या नहीं, और अपनी इज्जत का कोई अहसास उन्हें है या नहीं।
अंग्रेजों से कुछ सीखा, और बहुत कोसा भी, आज एक और मौका
14 सितंबर 2022
अंग्रेजों की लंबी गुलामी से थके हुए
हिन्दुस्तान में जब राज की चर्चा होती है, तब अंग्रेजों की छोड़ी गई शिक्षा
प्रणाली को कोसा जाता है कि वह बाबू बनाने वाली है, यह भी याद किया जाता
है कि कोहिनूर हीरे सहित और कौन-कौन सी बेशकीमती हिन्दुस्तानी चीजें
अंग्रेज यहां से लूटकर ले गए थे। अंग्रेजों ने जिस तरह बंगाल के अकाल में
दसियों लाख लोगों को मरने दिया, और जिस तरह जलियांवाला बाग जैसा हत्याकांड
किया, उनमें से कुछ भी भूलने लायक नहीं है, और उन्हें अक्सर ही याद भी किया
जाता है। लेकिन इतिहास के जानकार इन बातों के साथ-साथ कुछ और बातों को भी
याद करते हैं कि अंग्रेज अगर न आए होते, तो हिन्दुस्तान के हिन्दू समाज की
बेरहम जाति व्यवस्था का क्या हाल हुआ होता, और इस देश में जो समाज सुधार
कानूनों की वजह से हुए हैं, उनका क्या हाल हुआ होता।
खैर, अंग्रेजों की चर्चा करते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि हिन्दुस्तान में अपने संविधान का बुनियादी ढांचा ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था से लिया है, यह एक अलग बात है कि आज आजादी की पौन सदी के मौके पर इस देश में किसी भी तरह की संसदीय व्यवस्था की जरूरत महत्वहीन हो गई दिखती है। आज ब्रिटेन अपने इतिहास के एक बड़े फेरबदल से गुजर रहा है जब 70 बरस तक राज करने वाली महारानी एलिजाबेथ गुजर गई हैं, और उनके बेटे प्रिंस चाल्र्स अब किंग चाल्र्स तृतीय बनकर ब्रिटेन के संविधान प्रमुख हो गए हैं। इस फेरबदल के मौके पर ब्रिटेन के सार्वजनिक जीवन में जो हो रहा है, उसे भी हिन्दुस्तान को देखना चाहिए क्योंकि इससे भी आज के हिन्दुस्तान को कुछ सीखने की जरूरत है। कल ब्रिटिश पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया क्योंकि उन्होंने महारानी के दर्शनार्थ रखे गए शरीर को देखने के लिए लगी हुई लंबी कतारों के बीच महारानी के खिलाफ नारे लगाए, चिल्लाकर यह सवाल किया कि इन्हें किसने चुना था? कुछ और लोगों को शाही परिवार के खिलाफ नारे लगाने पर पकड़ा गया, लेकिन इन तकरीबन तमाम लोगों को छोड़ भी दिया गया। जब दसियों लाख ब्रिटिश लोग शाही परिवार से अपने लगाव के चलते गमी में हैं, तब इस तरह के नारे लगाने वालों को पकडऩे पर भी वहां के कई संगठनों ने सवाल उठाए, और गिरफ्तारी का विरोध किया। खुद लंदन पुलिस ने कहा कि लोगों को विरोध करने का हक है। वहां के जनसंगठनों ने कहा कि गिरफ्तारी चिंता का विषय है क्योंकि अभिव्यक्ति की आजादी नागरिकों का अधिकार है। महारानी के अंतिम दर्शनों के लिए आ रहे लोगों के भी हक हैं, लेकिन इसके साथ-साथ दूसरे लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी भी है। एक संस्था ने कहा कि विरोध करने का हक राष्ट्र की तरफ से लोगों को मिला तोहफा नहीं है, यह लोगों का बुनियादी हक है। पुलिस ने एक बयान जारी करके यह कहा कि हम अपने सभी अधिकारियों को यह बता रहे हैं कि विरोध करना जनता का हक है, और उसका सम्मान किया जाना चाहिए, और यह हक लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
आज जब हिन्दुस्तान में बात-बात पर लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं, गिरफ्तारियां हो रही हैं, लोगों के एक-एक बयान को लेकर उन्हें बरसों तक जेल में बंद रखा जा रहा है, तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह ब्रिटिश पैमाना देखने, और उससे सीखने लायक है। आज तो हिन्दुस्तान में केन्द्र और राज्य सरकारों की पुलिस थाने के स्तर पर ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तय कर रही है, लोगों का मान-अपमान तय कर रही है, यह तय कर रही है कि क्या अश्लील है, और क्या देशद्रोह है। ऐसे में देश को एक बार फिर यह सोचना चाहिए कि ब्रिटिश या अमरीकी लोकतंत्र की तारीफ करते हुए, या अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बतलाते हुए यह देश खुद कैसी मिसाल पेश कर रहा है? यहां के पत्रकार, यहां के सोशल मीडिया आंदोलनकारी, और कार्टूनिस्ट से लेकर फिल्मकार तक जिस तरह के फर्जी मामलों में उलझाए जा रहे हैं, क्या कोई यह कल्पना भी कर सकते हैं कि इस देश के किसी संवैधानिक प्रमुख की मौत हो जाने पर उसके खिलाफ सार्वजनिक जगहों पर नारे लगाए जाएं, और जनसंगठनों से लेकर पुलिस तक इस बात का सम्मान करे कि यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। जिन लोगों को भी यह धोखा है कि लोकतंत्र कोई सस्ती शासन प्रणाली है, उन्हें अपनी समझ सुधार लेनी चाहिए। लोकतंत्र एक बहुत ही लचीली व्यवस्था है, और यह नियम-कानून के बेजा इस्तेमाल से नहीं चलती, यह गौरवशाली और उदार परंपराओं से चलती है। हिन्दुस्तान का लोकतंत्र बिगड़ते-बिगड़ते आज इस बदहाली में पहुंच गया है कि कायदे से तो 75वीं सालगिरह मनाने का इसे कोई हक नहीं होना चाहिए, पौन सदी पहले किसने यह सोचा होगा कि आज इस देश में लोकतांत्रिक अधिकार इस हद तक कुचल दिए जाएंगे।
अमरीका में जिस तरह वहां के शासन प्रमुख, अमरीकी राष्ट्रपति के खिलाफ बोलने, लिखने, चंदा देने, और चुनाव अभियान में शामिल होने की आजादी लोगों को रहती है, और किसी भी कारोबारी को यह डर नहीं रहता कि राष्ट्रपति का विरोधी होने की वजह से सरकारी एजेंसियां उन पर टूट पड़ेंगी। उससे भी हिन्दुस्तान को सीखने की जरूरत है, और ब्रिटेन के इस ताजा मामले से भी। लोकतंत्र में कोई भी सरकार अपने आपको लोगों की आलोचना से फौलादी जिरहबख्तर पहनकर नहीं बच सकती। अगर सरकारें इस तरह से बचती हैं, तो उसका मतलब यही है कि लोकतंत्र नहीं बचा। इसलिए एक परिपक्व लोकतंत्र को आलोचना की कई किस्म की आग से तपकर खरा साबित होना पड़ता है। चापलूसी से महज तानाशाही खरी साबित होती है, लोकतंत्र नहीं। हिन्दुस्तान में आज हर स्तर पर लोकतंत्र की इस बुनियादी समझ पर बात करने की जरूरत है, और यह देखने की जरूरत है कि किसी देश की करीब पौन सदी की महारानी गुजरने पर उसके शव के अंतिम दर्शनों में भी लोग उसके खिलाफ, राजपरिवार के खिलाफ किस तरह नारे लगा सकते हैं, और पुलिस को यह सिखाया जा रहा है कि यह लोगों का बुनियादी हक है।
यह आग चड्डी में नहीं, राहुल की लोकप्रियता की संभावनाओं में...
13 सितंबर 2022
किसी अच्छे-भले काम को तबाह कैसे किया जाए,
यह सीखना हो तो कांग्रेस से बेहतर आज कोई शिक्षक नहीं है। राहुल गांधी की
पदयात्रा कन्याकुमारी से शुरू होकर केरल पार करके आगे बढ़ रही है, डेढ़ सौ
दिनों में पैंतीस सौ किलोमीटर का यह सफर दर्जन भर से अधिक राज्यों से
गुजरते हुए पूरा होने वाला है, और राहुल गांधी के अभूतपूर्व उत्साह की और
सडक़ पर जनता की ओर से अभूतपूर्व स्वागत की सकारात्मक तस्वीरें रोजाना ही आ
रही हैं। सोशल मीडिया इन तस्वीरों से भरा हुआ है, और देश के प्रमुख मीडिया
से कोई अधिक उम्मीद वैसे भी नहीं की जा सकती थी। जब चारों तरफ राहुल की
मुस्कुराहट तैर रही है, और जब स्मृति ईरानी सरीखी गांधी परिवार से नफरत
करने वाली बेकाबू नेता ऐसा खुला झूठ बोल रही है कि वह पल भर में पकड़ा जा
रहा है, तब भी कांग्रेस शांत रहकर अपना काम नहीं कर पा रही है। कल ही
कांग्रेस पार्टी ने इसी पदयात्रा को लेकर एक पोस्टर बनाया जिसमें आरएसएस के
पुराने चले आ रहे प्रतीक चिन्ह, खाकी हाफपैंट को सुलगते हुए दिखाया है, और
लिखा है कि अभी 145 दिन और बाकी हैं। कांग्रेस का निशाना इस बात पर है कि
अगले 145 दिन में सुलग रहा यह हाफपैंट बचेगा भी नहीं। लेकिन सवाल यह है कि
राहुल गांधी तमाम पार्टियों और जनसंगठनों के लोगों को जोडक़र जब यह पदयात्रा
करना चाहते हैं, तो उस बीच कांग्रेस को आरएसएस पर हमले को इस यात्रा से
क्यों जोडऩा चाहिए? क्या इस यात्रा से परे कांग्रेस के पास आरएसएस पर हमले
का कोई सामान नहीं है? या फिर इस यात्रा को कांग्रेस अपनी डूबती हुई नाव के
लिए एक तिनका मानकर उसका भी इस्तेमाल इस हमलावर तरीके से कर लेना चाहती
है? जब राहुल गांधी भारत जोड़ो के नारे के साथ यह लंबी पदयात्रा कर रहे
हैं, तो इस ऐतिहासिक मौके को बर्बाद करने के लिए इसे आरएसएस तोड़ो पदयात्रा
में क्यों बदला जा रहा है?
बहुत से लोगों को महानता और कामयाबी ठीक से पच नहीं पाती है। आज जब तमाम चीजें एक सद्भावना को लेकर चल रही हैं, आम जनता के साथ राहुल गांधी की अनगिनत तस्वीरें उनका एक बहुत ही मानवीय पहलू दिखा रही हैं, जब सोशल मीडिया पर ही लोग यह बात लिख रहे हैं कि यह सद्भावना और मुस्कुराहट राहुल के विरोधियों को परेशान कर रही है, तब फिर कांग्रेस पार्टी को आरएसएस की चड्डी में आग लगाकर सद्भावना को पटरी से क्यों उतारना चाहिए? आज तो शायद आरएसएस ने राहुल गांधी पर कोई ताजा हमला भी नहीं किया है, हमला भाजपा के कई लोगों ने किया है, और आदतन स्मृति ईरानी बिना सोचे-समझे इस आग में कूद पड़ी हैं, और अपने ही हाथ-पांव जला बैठी हैं। जब विरोधी और आलोचक खुद ही अपने हाथ-पांव जला रहे हैं, तो कांग्रेस पार्टी को आरएसएस की चड्डी में आग क्यों लगानी चाहिए? अपने आपको बहुत महान मानने वाले कांग्रेस के नेताओं को शायद इस बात का अहसास और अंदाज नहीं होगा कि यह आग सद्भावना को महान बनाने की संभावनाओं में लग रही है, आरएसएस की चड्डी में नहीं। इस एक पोस्टर ने राहुल गांधी की सारी मुस्कुराहट पर पानी फेर दिया है, और उनके चेहरे पर एक अलग किस्म की क्रूरता मल दी है।
कांग्रेस की यह भारत जोड़ो यात्रा दलगत राजनीति से परे होती दिख रही थी। इससे कांग्रेस के लोग जुड़े हुए जरूर थे, लेकिन कांग्रेस से परे के भी कई लोग इससे जुड़े हैं, और कांग्रेस और भी लोगों के जुडऩे की उम्मीद कर रही है। ऐसे में जब देश के एक व्यापक हित के लिए बिना किसी आक्रामक नारे के भारत जोडऩे की बात हो रही है, तब किसी को भी तोडऩे की बात क्यों होनी चाहिए? देश की जनता के सामने यह बात साफ है कि देश को कौन तोड़ रहे हैं। उनके पोस्टर बनाने की जरूरत भी नहीं है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस संगठन इस पदयात्रा में राहुल गांधी की दिखती लोकप्रियता का नगदीकरण करवाने की हड़बड़ी में है, और कांग्रेस में जो लोग घोषित तौर पर आरएसएस के खिलाफ हैं, उन लोगों में इस लोकप्रियता का इस्तेमाल इस अभियान को आरएसएस के खिलाफ झोंकने में कर दिया है। यह सिलसिला कांग्रेस को फायदा तो दिलाने वाला है ही नहीं, बल्कि राहुल गांधी का नुकसान करने वाला है। जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तब भी कुछ लोगों का मिजाज उसका फायदा पाने का नहीं रहता। उन्हें लगता है कि उनके हुनर के बिना ही यह फायदा हासिल हो जाए, तो उनका तो अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। कांग्रेस के अतिउत्साही लोग ऐसी ही कोशिशों में जुट गए हैं। अगर कांग्रेस में कोई सचमुच ही राहुल गांधी के शुभचिंतक हैं, तो उन्हें पार्टी के नेताओं के हाथों से माचिस छीन लेनी चाहिए, ताकि वे और कई जगहों पर आग न लगा सकें। कुछ अभियान बड़प्पन और महानता के साथ चलने चाहिए, इस बात को कांग्रेस के कुछ समझदार नेताओं को समझना चाहिए, और पदयात्रा पूरी होने तक ऐसी हमलावर पोस्टरबाजी किनारे रखनी चाहिए। अगर इस बीच कांग्रेस को भाजपा या आरएसएस, या किसी और पर भी हमले की जरूरत लगती है, तो वह इस पदयात्रा से परे अलग हमला करे। गांधी ने इस देश को पदयात्रा के साथ-साथ मौन रहना भी सिखाया था।
छोटे बच्चों के लतीफों से ही शुरुआत हो रही है महिलाविरोधी सोच की..
12 सितंबर 2022
एक ब्रेक के बाद हिन्दुस्तान के सबसे मशहूर
कॉमेडी शो, कपिल शर्मा का नया सीजन शुरू हो गया है, और इसके साथ ही गरीबों
और महिलाओं की बेइज्जती का नया सैलाब भी इस कार्यक्रम में आ गया है जिस पर
हिन्दुस्तानी परिवार में महिलाएं भी बैठकर हॅंस रही हैं। दरअसल यह देश ऐसा
है कि किसी के नाली में गिरने पर, या केले के छिलके पर से फिसलकर सडक़ पर
गिरने पर लोग पहले हॅंसते हैं, और फिर दिल करता है तो मदद करते हैं। दूसरे
की तकलीफों पर हॅंसना, लोगों की शारीरिक दिक्कतों पर हॅंसना, और महिलाओं की
खिल्ली उड़ाने वाली हर बात पर हॅंसना आम हिन्दुस्तानी मिजाज है।
अभी किसी ने फेसबुक पर एक ऐसे रियलिटी शो का वीडियो पोस्ट किया है जिसमें पांच-छह बरस के छोटे बच्चे किसी कॉमेडी मुकाबले में शामिल हैं, और वे महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक लतीफे सुनाते जा रहे हैं, और फूहड़ बातें करने वाले जज उन पर जोरों से हॅंसते जा रहे हैं। इन बच्चों के, शायद, मां-बाप भी वहां बैठे हुए हॅंस रहे हैं, और जजों में शामिल महिलाएं भी। सोशल मीडिया पर अच्छे-खासे पढ़े-लिखे दिखने वाले लोग भी महिलाओं पर बनाए गए लतीफों पर हॅंसते हैं, जिनमें महिलाएं भी शामिल रहती हैं। इन दिनों वॉट्सऐप जैसे मैसेंजर की मेहरबानी से लोग अपनी एक-एक फूहड़ बात एक क्लिक से ढाई सौ से अधिक लोगों को भेज सकते हैं, और बहुत से लोग महिलाओं की बेइज्जती करने वाले कार्टून या लतीफे आगे बढ़ाते हुए थकते नहीं हैं। अभी दो-चार दिन पहले ही लोगों ने अंग्रेजी शब्द वाईफ के हिज्जों से एक नई परिभाषा बनाकर कई जगह पोस्ट करना शुरू किया- वरी इनवाइटेड फॉर एवर।
जब छोटे-छोटे बच्चे स्टेज पर यह लतीफा सुना रहे हैं कि दुनिया का सबसे पुराना एटीएम औरत की मांग का सिंदूर है, जिस पर हाथ फिराते ही वह अपने आदमी की जेब से कितना भी पैसा निकाल सकती है, तब यह आसानी से समझा जा सकता है कि बड़े होकर इन बच्चों की सोच किस तरह की रहेगी। लोगों को यह भी याद होगा कि अभी हाल फिलहाल तक स्कूली किताबों में किस तरह कमल घर चल, कमला नल पर जल भर पढ़ाया जाता था। हो सकता है अभी भी कई किताबों में यही सुझाया जाता हो कि घर में लडक़े और लडक़ी के दर्जे में मालिक और गुलाम जैसा फर्क रहता है। हकीकत भी यही है कि बहुत से हिन्दुस्तानी परिवारों में अगर साधन सीमित हैं, तो लडक़े को बेहतर पढ़ाई, बेहतर खाना, और बेहतर इलाज मिलता है। मुम्बई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के एक अध्ययन के बारे में इसी जगह पर हम पहले भी लिख चुके हैं कि वहां बच्चों में कैंसर होने की शिनाख्त हो जाने पर किस तरह लडक़ों को तो इलाज के लिए वापिस लाया जाता है, लेकिन लड़कियों को मां-बाप आमतौर पर इलाज के लिए लाते ही नहीं हैं। एक भयानक तस्वीर छत्तीसगढ़ के गांवों की स्कूलों की कई जगहों से आ चुकी है जिनमें दोपहर के भोजन के वक्त स्कूली लडक़े पालथी मारकर बैठकर खा रहे हैं, और लड़कियां ऊकड़ू बैठकर। यह पता चला कि कई गांवों में यह परंपरा है कि घर में भी लड़कियां ऊकड़ू बैठकर खाती हैं क्योंकि ऐसे बैठकर खाने पर खाना कम होता है। इस तरह हिन्दुस्तानी कॉमेडी से लेकर हिन्दुस्तानी जिंदगी की असल हकीकत तक लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ जो हिंसक भेदभाव है, वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते जा रहा है।
जिस पति की मंगलकामना करते हुए, या जिसके नाम की तख्ती लगाने के नाम पर महिलाएं सिंदूर भरती हैं, बाकी दुनिया को यह बताते चलती हैं कि वे अब उपलब्ध नहीं हैं, उनका वह सिंदूर भी तरह-तरह से मखौल उड़ाने का सामान बना दिया जाता है। वे पति के लंबे जीवन के लिए करवाचौथ जैसा व्रत रखती हैं, और उस पर यह लतीफा बना दिया जाता है कि वे साल भर बाकी हर दिन पति का खून पीती हैं, और इस एक दिन उपवास करती हैं। इस देश में हिन्दी, और शायद कुछ और भाषाओं में भी, का बहुत सारा हास्य महिलाओं की बेइज्जती पर टिका होता है। राजस्थान के एक बड़े ही मशहूर मंच के कवि की पूरी जिंदगी ही अपनी बीवी पर तरह-तरह के अपमान के लतीफे बनाते हुए गुजर गई है, और उन्हें सुनकर हॅंसने वालों में महिलाएं भी रहती हैं। हिन्दी के कहावत-मुहावरों में सैकड़ों बरस से महिलाओं के अपमान का सिलसिला चले आ रहा है, उनके चाल-चलन के खिलाफ गंदी से गंदी बातें लिखी जाती हैं, उनके नि:संतान होने के खिलाफ, उनके पति खोने के खिलाफ दर्जनों कहावतों और मुहावरों को गढ़ा गया है। आज भी पुराने साहित्य को उठाकर देखें तो प्रेमचंद से लेकर गांधी तक हर महान लेखक की भाषा में औरत को बराबरी का दर्जा देने का व्याकरण ही नहीं है। मर्द में ही औरत को शामिल मान लिया गया है।
यह देश अपने साहित्य में, महान लोगों की सूक्तियों में, भाषाओं के व्याकरण में, कहावतों और मुहावरों में, स्कूली किताबों से लेकर कॉमेडी शो तक महिलाओं के अपमान की कलंकित परंपरा को जारी रखे हुए है। दिक्कत यह भी है कि इनकी शिकार महिलाओं को भी इस बात का अहसास नहीं होता है कि वे इस लैंगिक-हिंसा का निशाना हैं, उसका शिकार हैं। वे भी आए दिन किसी अफसर या नेता की नालायकी और निकम्मेपन का विरोध करने के लिए जुलूस लेकर उसे चूडिय़ां भेंट करने जाती हैं। भाषा और संस्कृति, रिवाज और सोच की यह हिंसा आसानी से खत्म नहीं होगी, क्योंकि अभी तो इसकी पहचान भी शुरू नहीं हो पाई है। लेकिन सोशल मीडिया एक ऐसी बड़ी सार्वजनिक जगह है जहां पर यह जागरूकता लाने का अभियान चल सकता है। इसके लिए लोगों को अपनी हिचक छोडक़र खुलकर लिखना होगा, इस भेदभाव का विरोध करना होगा, महिलाओं के अपमान के खिलाफ खड़े होना पड़ेगा। कुछ लोगों को ऐसा विरोध अप्रासंगिक लगेगा, और लगेगा कि इससे तो जिंदगी की खुशी छिन ही जाएगी। लेकिन लोगों को याद रखना होगा कि एक वक्त तो लोग अपनी खुशी के लिए एक गुलाम और एक शेर के बीच मुकाबला करवाकर उसका भी मजा लेते थे, जो कि आज के लोकतांत्रिक विकास के बाद संभव नहीं है। हिन्दुस्तान आज महिलाओं पर हिंसा के हास्य का मजा ले रहा है, लेकिन जागरूकता जैसे-जैसे बढ़ेगी, वैसे-वैसे यह साबित होगा कि यह ताजा इतिहास भी कितना बेइंसाफ था।
निकम्मी न्याय व्यवस्था को और रकम की जरूरत है?
11 सितंबर 2022
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा आमतौर
पर मुस्लिम विरोधी नफरती बातों के लिए ही खबरों में आते हैं। लेकिन कल की
एक खबर इससे कुछ अलग है, और उन्होंने कहा कि अदालती ढांचे को बेहतर बनाने
के लिए केन्द्र सरकार पूरे देश को 9 हजार करोड़ रूपये दे रही है जिसमें से
असम को तीन सौ करोड़ रूपये मिलने हैं, और राज्य सरकार निचली अदालत में नए
जज नियुक्त करेगी ताकि लोगों को इंसाफ जल्दी मिल सके। उनकी बाकी बातों से
परे, हम उन्हें भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति
मानकर उनकी इस बात को आगे बढ़ाना चाहते हैं कि अदालतों में अधिक
नियुक्तियां की जाएंगी। अब उनके बयान के मुताबिक तो देश के हर राज्य को
केन्द्र सरकार की तरफ से अदालत के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए बजट
मिलना है, और अधिकतर राज्यों के सामने निचली अदालतों की चुनौतियां भी
कमोबेश एक सरीखी हैं, और संभावनाएं भी।
देश के किसी भी राज्य को देखें तो निचली अदालतें सिवाय पेशी बढ़ाते चलने के बहुत ही कम दूसरा काम कर पाती हैं। बहुत कम फैसले होते हैं, और अधिकतर लोग उन्हीं मामलों में कार्रवाई जरा भी आगे बढ़े बिना बार-बार अदालत जाते हैं, हर बार रिश्वत देकर अगली तारीख सुनकर लौटते हैं, और पूरी तरह, बुरी तरह भ्रष्टाचार पर टिका हुआ यह अदालती ढांचा इंसाफ करने का एक ढकोसला करते दिखता है। देश की अधिकतर आबादी जिला अदालत से ऊपर किसी अदालत में मुकदमा लडऩे के लायक नहीं हैं, बल्कि जिला अदालत में ही अधिकतर लोग कर्ज से लद जाते हैं, हरिशंकर परसाई की लिखी एक बात पिछले लंबे समय से बार-बार सोशल मीडिया पर दुहराई जाती है जिसका मतलब यह है कि गरीब एक बार अदालत पहुंच जाए, तो उसकी सबसे अधिक मेहनत अपने ही वकील से अपने को बचाने में लग जाती है। और केन्द्र सरकार ने अभी जो रकम मंजूर की है उसका कोई भी असर वकील और मुवक्किल के बीच के रिश्तों को बेहतर बनाने वाला नहीं है। जो राज्य इस रकम का बेहतर इस्तेमाल करेंगे, या अपने खुद के बजट से भी खर्च करेंगे, वहां इतना ही हो सकता है कि सबसे गरीब लोग अपने जीते जी फैसला पा सकें।
यह लोकतंत्र की एक सबसे बुरी शिकस्त है कि लोग कानून को अपने हाथ में न लेकर, कानून पर भरोसा करके अदालत जाते हैं, और वहां पर पूरी जिंदगी गलियारों में गुजार देते हैं। इंसाफ के नाम पर जो फैसले होते हैं, वे भी अक्सर ही महज फैसले होते हैं, उनका इंसाफ से कम ही लेना-देना होता है। बहुत से अदालती मामलों में तो यह होता है कि ताकतवर अपने हक में फैसले खरीद लेते हैं, और इंसाफ गलियारे में गरीब के साथ चुपचाप खड़े रह जाता है। यह नौबत तब और भयानक हो जाती है जब न्याय व्यवस्था अमानवीय हो जाती है, और वह बिना यह सोचे लोगों को पूरी जिंदगी अदालत बुलाते रहती है कि उनकी जिंदगी के उतने दिन बर्बाद होने का उन्हें कितना नुकसान होगा। हिन्दुस्तान सचमुच ही बहुत ही अमन-पसंद लोगों का देश है, वरना पूरी जिंदगी अदालतों में बर्बाद करने को मजबूर लोग कानून अपने हाथ में ही ले चुके होते, और अपने हिसाब से फैसला कर चुके होते।
इस देश के बड़े-बड़े तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों से निकले हुए लोग दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां चलाते हैं, लेकिन इस देश के अदालती ढांचे को सुधारने का काम मानो किसी सरकार की दिलचस्पी का नहीं है। न तो टेक्नालॉजी से, और न ही मैनेजमेंट से अदालतों को सुधारा जाता है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी अदालतों को अधिक उत्पादक और तेज रफ्तार बनाना नहीं चाहतीं क्योंकि ऐसा होने पर सत्ता के लोग ही सबसे पहले जेल जाएंगे। इसलिए अदालतों को निकम्मा बनाए रखने में सत्ता की निजी दिलचस्पी हो सकती है। दिक्कत यह है कि छोटी से छोटी अदालत भी अपने आपको अवमानना के ऐसे फौलादी कवच से ढांककर रखती है कि उससे कोई सवाल नहीं किया जा सकता। छोटे से जज के सामने उसी अदालत में बैठा बड़ा सा बाबू हर मुवक्किल और हर वकील से हर पेशी पर रिश्वत लेते हुए दराज में रखते चलता है, और जज-मजिस्ट्रेट कानून की देवी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे इस दराज को अनदेखा करते चलते हैं। यह पूरा सिलसिला किसी नए खर्च का मोहताज नहीं है, बल्कि एक नई नीयत का मोहताज है कि अदालतों से भ्रष्टाचार खत्म करना है, और उनकी उत्पादकता बढ़ाना है। आज जिस ढर्रे पर हिन्दुस्तानी न्याय व्यवस्था की छोटी अदालतें काम करती हैं, उनमें सुधार के रास्ते कोई मामूली इंसान भी बता सकते हैं, लेकिन ये बातें अगर किसी को नहीं सूझती हैं, तो यह बड़े-बड़े जजों को नहीं सूझती हैं।
अदालतों के जज, बाबू, वकील, और पुलिस, इन सबके निजी फायदे में यही होता है कि मामले अंतहीन चलते रहें। दो लीटर दूध में मिलावट का मामला अगर 29 बरस के बजाय 29 दिनों में तय हो गया होता, तो इनमें से हर किसी को सौ-सौ पेशी पर होने वाले फायदे का नुकसान हो गया रहता। यह पूरा सिलसिला सुधारने की जरूरत है, और इसके लिए कई किस्म के आयोग भी बनते आए हैं, उनकी रिपोर्ट भी आती रही है, लेकिन हुआ कुछ नहीं है। अब जब यह खबर आई है कि केन्द्र सरकार 9 हजार करोड़ रूपये राज्यों को दे रही है, तो राज्यों के जनसंगठनों को सरकार के सामने यह मुद्दा उठाना चाहिए कि नए खर्च के साथ ही पुराने इंतजाम को भी सुधारा जाए, वरना नया खर्च सिर्फ भ्रष्ट लोगों को फायदा पहुंचाएगा, और पुरानी अदालतें बदहाल बनी रहेंगी।



