कौन से जुर्म पुलिस के रोकने लायक हैं, कौन से नहीं, समझें

 27  दिसंबर 2022


जब किसी शहर या प्रदेश में कत्ल या लूट की वारदातें बढऩे लगती हैं, या बलात्कार अधिक होने लगते हैं तो लोगों के बीच यह चर्चा होने लगती है कि पुलिस का खौफ खत्म हो चुका है। और इस एक शब्द, खौफ, के इस्तेमाल को छोड़ दें, तो यह बात सही रहती है कि कई मामलों में लोगों को कानून का डर नहीं रह जाता, उन्हें पुलिस के भ्रष्टाचार पर भरोसा रहता है कि वे कोई केस दर्ज होने से रोक लेंगे, गवाहों और सुबूतों को खरीदने पर भरोसा रहता है, अदालत में वकीलों से लेकर जजों तक को खरीदने का भरोसा रहता है, और वे जुर्म करने के पहले से बाद में बचने का भरोसा रखते हैं। लेकिन जनधारणा को लेकर हमारा कुछ अलग तजुर्बा है। अभी छत्तीसगढ़ में एक परिवार ने बाप-बेटे ने मिलकर भाड़े के कातिलों के साथ साजिश करके परिवार के ही एक बेटे का कत्ल कर दिया। खुली सडक़ पर दिनदहाड़े हुए इस कत्ल को लेकर शहर की पुलिस की बड़ी थू-थू हुई, राजनीतिक बयानबाजी भी हुई, लेकिन पुलिस ने दो दिनों के भीतर सबको गिरफ्तार करके पूरी साजिश उजागर कर दी। अब पुलिस के नजरिए से देखें तो घर के भीतर के लोग परिवार के किसी को कत्ल करना तय कर लें, और इस साजिश में परिवार की औरतें भी शामिल हों, तो पुलिस उसे कैसे बचा सकती है? इसी तरह इन दिनों छत्तीसगढ़ का ही एक दूसरा मामला खबरों में बना हुआ है जिसमें एक उद्योगपति ने अपनी ही 9 बरस की बेटी से बलात्कार किया, और मां-बेटी ने पुलिस में रिपोर्ट की, महीनों बाद जाकर मजिस्ट्रेट के सामने बयान हुआ, और सरकारी कमेटी बच्ची को मां के हवाले करने को तैयार नहीं है, और ऐसा लगता है कि सरकारी अफसर इस उद्योगपति के प्रभाव में हैं, इसीलिए वह गिरफ्तारी से बाहर है, और शिकायतकर्ता मां अपनी बेटी पाने के लिए सडक़ पर धरना दे रही है। यहां पर समझ में आता है कि परिवार के भीतर का बलात्कार तो पुलिस नहीं रोक सकती थी, लेकिन उसके बाद तो उस बच्ची का बयान तुरंत करवाया जा सकता था, उसके बलात्कारी पिता को गिरफ्तार किया जा सकता था, बच्ची को मां के हवाले किया जा सकता था, लेकिन इन सब मामलों में पुलिस की भूमिका संदिग्ध दिखाई पड़ती है। 

जब-जब पुलिस बेअसर होने लगती है, तब-तब लोग कानून अपने हाथ में लेने को मजबूर होने लगते हैं। कई जगहों पर लोग आपस में हिंसा करके हिसाब चुकता करने में लग जाते हैं। आज ही गुजरात की एक खबर छपी है जिसमें बीएसएफ के एक हवलदार ने अपनी नाबालिग बेटी का वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने से जब एक नौजवान को मना किया, तो दोनों परिवारों में झगड़ा हुआ, और इस युवक के परिवार ने इस बीएसएफ हवलदार को पीट-पीटकर मार डाला। जिस गुजरात में कानून-व्यवस्था बेहतर होने का दावा 7वीं बार की भाजपा सरकार करती है, उसके तहत बीएसएफ हवलदार को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी। गनीमत यही है कि देश के आज के नफरती माहौल में ये दोनों ही परिवार गुजराती-हिन्दू परिवार हैं, इसलिए किसी को सबक सिखाने की नौबत नहीं आई है। लेकिन इस हत्या से परे के हिस्से को देखें, तो किसी के ऐसे वीडियो पोस्ट करने और बदनाम करने का काम देश भर में जगह-जगह हो रहा है। इस छोटे राज्य छत्तीसगढ़ में तकरीबन हर दिन ऐसी एक रिपोर्ट लिखाई जाती है कि सोशल मीडिया पर तस्वीरें या वीडियो पोस्ट करके ब्लैकमेल किया, या करने की धमकी देकर ब्लैकमेल किया। 

अब हम ऐसे सौ फीसदी मामलों को इस तरह का नहीं पाते कि पुलिस उन्हें रोक सकती है। इसकी तोहमत हम पुलिस पर नहीं देते, लेकिन जब ऐसे मामले दर्ज हो जाते हैं, तो उनकी तेजी से सुनवाई, और अदालत से सजा दिलवाने तक का काम पुलिस को मेहनत से करना चाहिए, ऐसा न होने पर उस किस्म के और जुर्म करने की हसरत रखने वाले लोगों का हौसला बढ़ता है। पुलिस की अधिक जिम्मेदारी और जवाबदेही रिपोर्ट होने के बाद शुरू होती है। और यह बिल्कुल अलग बात है कि समाज में, खासकर लड़कियों और महिलाओं में ऐसे साइबर खतरे में न फंसने की जागरूकता बढ़ाई जाए, और यह पुलिस के बुनियादी काम में नहीं आता है। इसे सरकार का दूसरा अमला, या समाज के लोग करें, और ऐसे खतरों को घटाएं। इस मुद्दे पर आज यहां लिखने का मकसद यह है कि पुलिस पर इतनी गैरजरूरी तोहमतें न लग जाएं कि पुलिस का हौसला ही पस्त हो जाए, और जहां उसकी जवाबदेही बनती है, वहां भी उसे लापरवाह होने का मौका मिल जाए। जिम्मेदारी तय करते हुए समाज को यह जिम्मेदारी तो दिखानी ही चाहिए कि अपने हिस्से की तोहमत पुलिस पर न थोप दी जाए। पुलिस सरकार का सबसे सामने दिखने वाला चेहरा रहता है, वर्दी और काम के मिजाज की वजह से पुलिस सबसे सामने दिखती है, और खासकर अप्रिय स्थितियों में और अधिक दिखती है। यह भी एक बड़ी वजह है कि पुलिस पर अधिक तोहमतें लगती हैं, लेकिन यह एक वजह होनी चाहिए कि पुलिस की जिम्मेदारियों की संभावनाओं और सीमाओं को ठीक से समझ लिया जाए, न तो उसके साथ रियायत बरती जाए, और न ही उस पर बिना वजह तोहमतें लगाई जाएं। 

समाज को पुलिस तक पहुंचने की नौबत आने देने से बचना चाहिए। लोगों के बीच जुर्म के खिलाफ, खतरों के बारे में जागरूकता अधिक रहनी चाहिए। लोगों को अपने आसपास के जुर्म पर आमादा लोगों को समझाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। परिवार के भीतर अगर कोई जुर्म हो रहा है, तो लोगों को उस नौबत को भी खत्म करना चाहिए। आज अगर पूरे देश में अदालतों पर अंधाधुंध बोझ होने की बात हर कोई कह रहे हैं, तो इस बोझ को भी समाज की सावधानी से घटाया जा सकता है ताकि बाकी मामलों पर इंसाफ होने की संभावना बन सके। वैसे भी इस बात को समझना चाहिए कि हर जुर्म न सिर्फ सरकार पर बोझ है, अदालत पर बोझ है, बल्कि इस बोझ को ढोने का खर्च तो जनता से ही निकलता है। इसलिए लोगों को अपने परिवार से शुरू करके अड़ोस-पड़ोस और जान-पहचान तक जुर्म से बचने की सावधानी पर भी चर्चा करनी चाहिए, और जुर्म करने पर जिंदगी कैसे बर्बाद होती है इसकी मिसालें भी अपने लोगों को देनी चाहिए। जब आपस के लोग ऐसे खतरों को गिनाते हैं, तो वे लोगों के दिमाग में अधिक पुख्ता तरीके से बैठते हैं, और लोग चौकन्ने रहते हैं। लोगों को अपने आसपास के लोगों को यह भी बताना चाहिए कि आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया, और सीसीटीवी फुटेज जैसे सुबूतों से अधिकतर मुजरिम आनन-फानन पकड़ में आ जाते हैं, इसलिए कभी किसी जुर्म के बारे में सोचें भी नहीं। बढ़ती हुई आबादी के साथ अगर जुर्म इसी तरह बढ़ते चलेंगे, तो जो अधिक पुलिस लगेगी, अधिक अदालतें लगेंगी, वे सब जनता के ही पैसों पर चलेंगी, इसलिए किफायत और बचाव का अकेला तरीका जुर्म के खिलाफ सावधानी है।

(Daily Chhattisgarh)

प्रेमसंबंध टूटने को ही खुदकुशी का उकसावा मान लेना नाजायज होगा

 26  दिसंबर 2022


हिन्दुस्तान में आज छाए हुए हिन्दू-मुस्लिम विवाद के बीच एक और मामला सामने आया जब टीवी अभिनेत्री तुनिषा शर्मा की शूटिंग के दौरान खुदकुशी के बाद उनकी मां की रिपोर्ट पर तुनिषा के दोस्त या प्रेमी शीजान खान को गिरफ्तार किया गया है। इस नौजवान पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने बताया कि इस अभिनेत्री ने अपनी मां को कहा था कि उसका ब्रेकप हो गया है, और लडक़ा उससे बात नहीं करता, अब उसके साथ रिश्ता नहीं रखना चाहता। मां का कहना था कि इस वजह से वो टेंशन में थी और इसलिए उसने आत्महत्या कर ली। 

हम इस मामले की बारीकियों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि इसकी जांच अभी चल ही रही है। लेकिन हम इस तरह के मामलों को लेकर यह सोचने पर जरूर मजबूर हैं कि संबंधों के टूट जाने को आत्महत्या के लिए उकसाना मान लेना कितना ठीक है? दुनिया में दोस्ती और प्रेम स्थाई नहीं हो सकते। स्थाई तो शादियां भी नहीं होतीं, और उनमें भी अलग हो जाने, अलग रहने, या तलाक की गुंजाइश रहती ही है। जब परिवार और समाज के रिवाजों के मुताबिक हुई शादियां भी टूट जाती हैं, तो दोस्ती या प्रेमसंबंध, या लिव इन रिलेशनशिप का खत्म हो जाना कोई अनहोनी बात नहीं मानी जा सकती। ऐसे में अगर हर रिश्ते के टूट जाने को आत्महत्या के लिए उकसाना मान लिया जाएगा, तो फिर किसी रिश्ते के टूटने के साथ हुई आत्महत्या पर जिंदा जोड़ीदार को अनिवार्य रूप से कैद होने लगेगी। इसलिए इस बात को समझना जरूरी है कि रिश्तों को लेकर तोहमत की एक सीमा होना जरूरी है। 

हिन्दुस्तानी अदालतों में ढेर सारे ऐसे मामले पहुंचते हैं जिनमें लोगों के बीच बरसों तक प्रेमसंबंध रहे, और देहसंबंध भी जारी रहा। इसके बाद अगर प्रेमी ने शादी से इंकार कर दिया तो प्रेमिका ने बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी, और प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसी नौबत पर हमने पहले भी इसी जगह कई बार लिखा है कि किसी से प्रेम और देहसंबंध बनते हुए क्या भविष्य में इस हद तक झांककर देखा जा सकता है कि उससे शादी हो ही जाएगी या नहीं? अगर इतनी दूर तक का देख पाना इंसान के लिए मुमकिन होता तो बहुत से प्रेम तो कभी शुरू ही नहीं हुए होते। प्रेमसंबंधों के चलते देहसंबंध एक आम बात है, और बरसों तक अगर दो बालिग लोगों के बीच आम सहमति से देहसंबंध हो रहे हैं, तो शादी भर न हो पाने से उसे धोखा देकर बलात्कार मान लेना बहुत ही नाजायज है। हिन्दुस्तान का कानून ऐसी शिकायत का हक देता है, और पुरूष की गिरफ्तारी की गारंटी भी रहती है। लेकिन इस कानूनी इंतजाम के खिलाफ देश की कई अदालतें समय-समय पर राय दे चुकी हैं। 

इंसान की सोच की इस संभावना को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि आज जो उसे शादी के लायक लग रही है, या लग रहा है, वह हो सकता है कि कल उस लायक न लगे। जिंदगी पत्थर की तरह स्थिर नहीं रहती, वह बहती हुई नदी की तरह आगे बढ़ती है। जिंदगी में कई रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं, साथ रहते हुए लोगों को एक-दूसरे की खूबियां और खामियां दोनों दिखती हैं, और एक-दूसरे के बारे में खयाल बनते और बिगड़ते हैं। प्रेम और देहसंबंधों के बाद भी अगर लोगों को लगता है कि उनकी शादी नहीं निभ पाएगी, तो ऐसी अनचाही शादी और उसके बाद की घरेलू हिंसा या तलाक से बेहतर तो यही है कि लोग प्रेम या लिव इन के दौरान ही अलग हो जाएं। ऐसा संबंध टूट जाना लोगों के लिए, परिवार और समाज के लिए शादी के टूट जाने के मुकाबले कम नुकसान का होता है। शादी के बाद टूटने वाले रिश्तों से बच्चों की जिंदगी भी खराब होती है, अनचाही शादी टल जाने से इसकी नौबत भी नहीं आती। इसलिए दबाव में अनचाही शादी में पडऩे से बेहतर प्रेम और देहसंबंधों का टूट जाना रहता है। 

अब सवाल यह है कि हिन्दुस्तान के मौजूदा कानून के मुताबिक दो बालिग लोगों में भी बरसों तक आपसी सहमति से चले देहसंबंधों के बाद भी महिला जब चाहे तब बलात्कार की रिपोर्ट लिखा सकती है, और कानून पुरूष के खिलाफ है। आज जरूरत तो ऐसे कानून को बदलने की है जो एक बालिग महिला को इस तरह का हक देता है जो कि इंसानी मिजाज और आपसी संबंधों के ठीक खिलाफ है। सच तो यह है कि 21वीं सदी में आकर भारतीय बालिग महिला को यह समझने की जरूरत है कि उसका प्रेम, या कि उसका देहसंबंध किसी तरह के स्थायित्व या शादी की गारंटी नहीं है, हो भी नहीं सकती। जब तक यह परिपक्वता नहीं आ जाती, तब तक हिन्दुस्तानी युवतियां एक नाजायज कानून को सहारा मानकर चलती रहेंगीं, और अपनी जिंदगी के लिए अधिक सुरक्षित और बेहतर फैसला नहीं ले पाएंगी। आज किसी बालिग लडक़ी को देहसंबंध में पडऩे के पहले यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ऐसे रिश्ते शादी तक पहुंचने से पहले खत्म हो सकते हैं। 

लोगों को याद होगा कि गुजरात में अभी कुछ बरस पहले तक मैत्री करार नाम की एक ऐसी कानूनी व्यवस्था जारी थी जिसे बाद में गैरकानूनी करार दिया गया और बंद करवाया गया। ऐसे मैत्री करार में दो बालिग स्त्री-पुरूष स्टाम्प पेपर पर किसी तय समय के लिए एक-दूसरे के साथ प्रेम और देहसंबंध बनाने का अनुबंध करते थे, और उसके बाद वे एक-दूसरे के लिए जवाबदेह नहीं रह जाते थे। ऐसा शादीशुदा लोगों में भी दूसरों के साथ होता था। समाज में यह आम प्रचलित रिवाज माना जाता था। फिर इसे गैरकानूनी करार दिया गया। अब आज अगर बालिग लोगों में प्रेम और देहसंबंधों के बाद अगर किसी युवक या आदमी को सुरक्षित रहना है, तो क्या उसे स्टाम्प पेपर पर ऐसा एक अनुबंध करना पड़ेगा कि वह शादी के किसी वायदे के बिना ऐसा करने जा रहा है, और इन रिश्तों के चलते अगर कोई तनाव होगा तो उसके लिए वह जिम्मेदार नहीं होगा? हिन्दुस्तान में महिला की सुरक्षा के लिए उसे अधिक अधिकार देने की कई तरकीबें निकाली गई हैं, लेकिन ऐसा कानून बिल्कुल नाजायज है जो कि पुरूष को देहसंबंध के बाद शादी न करने पर बलात्कारी करार दे-दे, या जोड़ीदार की खुदकुशी की नौबत में प्रेमसंबंध टूटने को जिम्मेदार मानकर जोड़ीदार को सजा दे-दे। इक्कीसवीं सदी की भारतीय युवतियों को परिपक्व होने की जरूरत है, और किसी भी तरह के संबंधों में पडऩे के पहले उनके अनिश्चित भविष्य के खतरे को भी उन्हें समझ लेना चाहिए। इसके बाद भी अगर इस बात के कोई सुबूत मिलते हैं कि पुरूष साथी ने उनके साथ बलात्कार किया, या आत्महत्या के लिए उकसाया, तो वह सजा के लायक अलग मामला रहेगा। 

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 26 दिसंबर 2022



 

108 दिनों में निखरा एक व्यक्तित्व, राहुल गांधी..

   25  दिसंबर 2022


केन्द्र सरकार की बेबुनियाद नसीहत के बीच राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कल दिल्ली पहुंची, और लालकिले के पास एक आमसभा में उन्होंने केन्द्र सरकार और देश से जुड़े बहुत से मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार लोगों का ध्यान बुनियादी मुद्दों से भटका रही है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मोदी सरकार नहीं बल्कि अडानी-अंबानी की सरकार है। अब तक 2800 किलोमीटर का सफर पूरा करके दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी तीन जनवरी से आगे रवाना होकर श्रीनगर तक जाएंगे। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास में किसी ने ऐसी पदयात्रा नहीं की थी, और सर्द उत्तर भारत में साथ चलते हुए मोटे गर्म कपड़ों से लदे लोगों के बीच पैदल चलते राहुल जिस तरह एक टी-शर्ट में दिख रहे हैं, वह भी एक उत्साह की गर्मी का सुबूत है जो कि अभूतपूर्व और अप्रत्याशित जनसमर्थन से उपजा हुआ है। 

अब तक यह पदयात्रा सौ-सवा सौ दिन चल चुकी है, और दस राज्यों के लोगों से मिल चुकी है। बिना किसी चुनावी एजेंडा के राहुल गांधी जिस तरह देश को जोडऩे की जरूरत बताते हुए, उसकी कोशिश करते हुए चल रहे हैं, और जिस तरह आम लोग उनके गले लगकर खुशी और गम बांट रहे हैं, वैसा हिन्दुस्तानी राजनीति में किसी ने देखा नहीं था। इस देश की बड़ी-बड़ी ताकतों ने सैकड़ों या हजारों करोड़ रूपये खर्च करके, दस बरस की मेहनत से राहुल गांधी को बेवकूफ साबित करने की एक कोशिश की थी, और खरीदे हुए मीडिया या सोशल मीडिया की मेहरबानी से राहुल पर पप्पू नाम चिपका दिया था, वह सब कुछ इस पदयात्रा से धुल गया है। आज देश में नफरत की जो जहरीली हवा भर गई है, जिस तरह अलग-अलग तबकों को एक-दूसरे के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा के लिए खड़ा कर दिया गया है, जिस तरह तथाकथित हिन्दू समाज के भीतर ही दलितों को कुचला जा रहा है, आदिवासियों से उनकी जिंदगी की बसाहट छीनी जा रही है, जिस तरह देश की संवैधानिक संस्थाओं का भगवाकरण किया जा चुका है, और जिस तरह हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की आधी-पौन सदी की शोहरत को खत्म कर दिया गया है, उस बीच राहुल से परे भी अनगिनत अमन-पसंद लोगों को देश को जोडऩे की जरूरत लग रही थी। और हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की त्रासदी यह है कि देश के समाज के टुकड़े-टुकड़े करने में कामयाब हो चुके लोग दूसरों को टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते नहीं थकते हैं। देश को इस हद तक साम्प्रदायिकता में झोंक दिया गया है कि अब सरकार, अदालत, और दीगर संवैधानिक संस्थाओं में बैठे लोग खुलकर साम्प्रदायिक बातें करते हैं, और किसी किस्म की शर्म का भी कोई सवाल नहीं उठता। ऐसे कतरा-कतरा बांटे गए भारतीय समाज में आज राहुल गांधी अगर नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो का नारा लगाकर बिना कुछ मांगते हुए इस तरह की एक पदयात्रा कर रहे हैं, तो यह ताजा लोकतांत्रिक इतिहास की एक बड़ी घटना है। खासकर इसलिए भी कि अपनी दादी और पिता को उन्होंने जैसे आतंकी हमलों में खोया है, वैसे किसी हमले का खतरा राहुल पर कम नहीं हैं, लेकिन वे बिना किसी परवाह के जिस तरह देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चल रहे हैं, वह एक बहुत बड़े हौसले की बात भी है। हर दिन सैकड़ों-हजारों लोगों से गले मिलते हुए, हाथ में हाथ डाले हुए वे जिस तरह चलते चले जा रहे हैं, भीड़ के सैलाब के बीच बिना किसी मुमकिन हिफाजत के भी उनका हौसला देखने लायक है। सच तो यह है कि इन सवा सौ से कम दिनों में राहुल गांधी ने जो एक नई इज्जत कमाई है, एक नई साख पाई है, वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में भी इतना कुछ हासिल नहीं कर पाए थे। और यह बिल्कुल ही अटपटी, अनोखी, और अजीब बात यह साबित करती है कि लोकतंत्र में जनता से संपर्क से बड़ा कुछ भी नहीं होता है। गांधी पूरी जिंदगी जनता के बीच ही जीते और मरते रहे, लोगों के बीच खाते रहे, पखाने धोते रहे, अनशन करते रहे, और जान देने में भी वे पीछे नहीं रहे। उनके बाद की आधी सदी में किसी ने जनता से जुडऩे की ऐसी ताकत का इस्तेमाल शायद इस हद तक नहीं किया था जिस हद तक राहुल गांधी कर रहे हैं। शायद उन्हें खुद भी इस बात का अहसास नहीं रहा होगा कि उन्हें इतना जनसमर्थन मिलेगा, और हिन्दुस्तानी मीडिया में अघोषित ब्लैकआउट सरीखी नौबत के रहते भी वे सोशल मीडिया के सैलाब से लोगों के दिलों तक पहुंचेंगे, और लोग उन तक पहुंचेंगे। इस पदयात्रा की खूबी यही रही कि इस दौरान हुए चुनावों में राहुल गांधी ने न पार्टी को हार से बचाने की कोशिश की, और न ही पार्टी की जीत का सेहरा खुद बंधवाने की कोशिश की। वे मोटेतौर पर इस पदयात्रा को गैरचुनावी बनाकर चले, और यही वजह है कि अब तक दर्जन भर पार्टियों के नेता, और अनगिनत लेखक, पत्रकार, कलाकार उनके साथ अपनी एकजुटता दिखाते हुए चले हैं।

पदयात्रा की इस हकीकत के साथ अब दो मिनटों में वह भी देख लेने की जरूरत है जो कि राहुल ने दिल्ली पहुंचकर सभा में कहा है। उन्होंने मीडिया पर चौबीसों घंटे नफरत की खबर दिखाने के लिए कहा है कि लोगों का ध्यान भटकाकर पैसा मीडिया-मालिकों की जेब में जाता है। उन्होंने आज के हिन्दुत्व के हमलावर तेवरों को लेकर भी हिन्दू धर्म की बुनियादी सोच याद दिलाई है, और पूछा है कि हिन्दू धर्म में कहां लिखा है कि गरीबों को कुचलना चाहिए, कमजोरों को मारना चाहिए? उन्होंने चीन के मोर्चे पर सरकार की नाकामयाबी की बात की है, और देश के अडानीकरण और अंबानीकरण पर भी हमला किया है। राहुल की कही बातों को देश के मीडिया में चाहे कुछ भी जगह न मिले, सोशल मीडिया और मीडिया के एक छोटे तबके की मेहरबानी से उनकी बातें लोगों तक पहुंच रही हैं, और नफरत के खिलाफ एक उम्मीद जगा रही हैं। 

कांग्रेस पार्टी का समर्थन करने, या मोदी सरकार का विरोध करने की किसी नीयत के बिना आज हम देश को जोडऩे की जरूरत को बहुत तल्खी से महसूस कर रहे हैं, और इसीलिए अब तक की 108 दिनों की इस पदयात्रा पर दो-चार बार इसी जगह पर लिख चुके हैं। नफरत से उबरने की अहमियत को कम नहीं आंकना चाहिए। लोकतंत्र में आने वाली पीढ़ी के लिए नफरती हिंसा की विरासत छोड़ जाने का मतलब लोकतंत्र को कभी सभ्य और विकसित न होने देना भी होगा, इसलिए राहुल की पदयात्रा को आज राजनीतिक सहमति और असहमति से परे भी समझने की जरूरत है कि आज देश को जोडऩे की कितनी जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 दिसंबर 2022



 

दीवारों पर लिक्खा है, 24 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

सामाजिक वर्जनाएं किसी तरह हिफाजत की गारंटी नहीं, सेफ्टी वॉल्व जरूरी

  24  दिसंबर 2022


रूस के एक सैनिक की बीवी को दुनिया के ऐसे मुजरिमों की लिस्ट में जोड़ा गया है जिनकी किसी जुर्म के लिए तलाश है। इस महिला ने यूक्रेन के मोर्चे पर लड़ रहे अपने पति को फोन पर कहा था कि वहां जो यूक्रेनी महिलाएं हैं उनसे बलात्कार करना, लेकिन लौटकर कुछ मत बताना। इस पर उसका पति और खुलासे से पूछता है, तो वह इसी बात को दुहराती है और कहती है कि बस इतना ध्यान रखना कि कंडोम का इस्तेमाल करना। जब इस टेलीफोन कॉल को यूक्रेन की सुरक्षा एजेंसी ने इंटरसेप्ट किया तब यह सैनिक यूक्रेनी जमीन पर था, और बाद में इनके टेलीफोन नंबरों से इनकी शिनाख्त की गई, आवाज का मिलान किया गया, इनके सोशल मीडिया अकाऊंट देखे गए, और इसकी पुख्ता खबर भी बनी। इस जोड़े का चार बरस का एक बेटा भी है। जब इनकी शिनाख्त के साथ खबरें चारों तरफ फैलीं तो इस महिला ने अपना सोशल मीडिया अकाऊंट डिलीट कर दिया। दुनिया भर की जंग में यह बात बहुत अटपटी नहीं है कि फौजी दुश्मन देश में महिलाओं और बच्चों के हाथ लग जाने पर उनसे बलात्कार करें, लेकिन अगर किसी फौजी की महिला उसे ऐसा जुर्म करने के लिए कहती है, तो यह उसके खिलाफ भी कार्रवाई की वजह तो बनती है। लोगों को याद होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ की एक बड़ी अधिकारी ने कुछ अरसा पहले यह कहा था कि यूक्रेन के मोर्चे पर जाने वाले  रूसी सैनिकों को उत्तेजना बढ़ाने वाली वियाग्रा नाम की दवाई दी जा रही है जिससे कि वे यूक्रेनी महिलाओं से बलात्कार कर सकें। 

दुनिया की सरकारें तो कई किस्म के अमानवीय काम कर सकती हैं क्योंकि वे एक इंसान की तरह नहीं सोचतीं, लेकिन जब इंसान इस तरह की हरकतें करने लगते हैं कि उन्हें देखते हुए इंसानियत शब्द की परिभाषा को ही बदलने की जरूरत लगने लगे, तो फिर यह सोचना पड़ता है कि इंसानों के भीतर ही वह तथाकथित हैवान छुपा रहता है जिसे इंसान अपने जुर्म छुपाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। तमाम किस्म के जुर्म और जुल्म करते तो इंसान ही हैं, लेकिन ये इसकी तोहमत ऐसी हैवानियत पर मढ़ देते हैं जो कि मानो इंसानों से परे की कुछ हो। नतीजा यह होता है कि इंसानियत शब्द जरूरत से अधिक सकारात्मक बने रहता है, और ऐसा लगता है कि इंसान के भीतर कुछ बुरा नहीं रहता, और जो बुरा रहता है वह इंसान से परे का एक हैवान रहता है। यह बात कुछ वैसी ही है कि इंसान का बायां हाथ बलात्कारी हो जाए, और दायां हाथ सज्जन बना रहे। 
आज जब हम यह लिख रहे हैं उसी समय बिलासपुर का एक मामला सामने आया है जिसमें 9 साल की एक बच्ची से दो महीने पहले पिता द्वारा बलात्कार करने की रिपोर्ट लिखाई गई। एफआईआर उसी वक्त हो गई, लेकिन बाल कल्याण समिति ने लंबे समय तक इस बच्ची का अदालती बयान नहीं करवाया, इस बच्ची को उसकी मां की हवाले नहीं कर रहे, और बाल कल्याण समिति के बारे में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा है कि वह पूरी तरह से बलात्कारी पिता को बचाने में लगी हुई है, और इस चक्कर में वह बच्ची को मां के पास नहीं जाने दे रही। इसी बिलासपुर में अभी हफ्ते-दस दिन पहले दिनदहाड़े सडक़ पर एक कत्ल हुआ जिसे पुलिस ने आनन-फानन सुलझा भी लिया। इसमें बाप और भाई ने बाकी परिवार के साथ मिलकर एक बेटे का कत्ल करवा दिया, और पूरे परिवार ने इसकी साजिश बनाई, कत्ल के बाद लोगों को छुपाने का काम किया। इसी कत्ल के सिलसिले में यह बात भी सामने आई कि बाप ने एक बच्ची को गोद लिया हुआ था, और अब वह बड़ी महिला है, जिसके साथ बाप-बेटे दोनों बलात्कार करते आए थे, और उससे अवैध संबंध बनाकर रखा था। एक परिवार के भीतर ही इतने किस्म के जुर्म, इतने किस्म की अनैतिक और वर्जित बातें सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या ऐसे परिवारों के भीतर इंसानियत कही जाने वाली कुछ बातें भी लागू होती हैं, या नहीं? 
हर दिन कोई न कोई ऐसी वारदात सामने आ रही है जिसमें पति-पत्नी, या प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का कत्ल कर रहे हैं, या करवा रहे हैं। और यह भी किसी क्षणिक उत्तेजना में कर दिया गया जुर्म न होकर ऐसी लंबी-चौड़ी साजिश के तहत किए गए जुर्म हैं जिनसे कि अपराध कथाओं के आदी पाठकों के भी दिल हिल जाएं। जबकि समाज की हकीकत यह है कि वह अपने बनाए गए रीति-रिवाजों को हकीकत में अमल होते मान लेता है, और उसने सामाजिक-पारिवारिक बचाव के बहुत ही कम तरीके लागू किए हैं। अनगिनत परिवारों में बाप ही बेटी से बलात्कार करते हैं, जिनमें से गिने-चुने मामले ही पुलिस तक पहुंचते हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में बाप घर का कमाऊ सदस्य होता है, और उसे जेल भिजवाकर बाकी परिवार के भूखे मर जाने की नौबत आ जाएगी। इसके अलावा बाकी परिवार बेहिसाब दबाव डालते रहता है, समाज के लोग यही समझाते हैं कि जो हो गया है उसे भूलकर परिवार को बचाया जाए, और इससे बचता सिर्फ बलात्कारी है जिसे यह समझ आ जाता है कि उसका जुर्म जारी रहने पर भी शायद ही उसके खिलाफ कोई कार्रवाई हो। इसलिए लोगों को यह समझने की जरूरत है कि वर्जित संबंधों को लेकर जो किताबी बातें हैं, हकीकत उनसे काफी परे चलती है। असल की जिंदगी में परिवार के भीतर, या स्कूल में गुरू कहे जाने वाले लोग, या खेल सिखाने वाले लोग कब बलात्कारी हो जाते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। और आज की यह बात जिस रूसी महिला के उकसावे से शुरू की गई है, उसे अगर देखें तो एक महिला दुश्मन देश की महिला को शिकस्त देने के लिए, उसका मनोबल तोडऩे के लिए अपने पति को उकसाती है कि वह जाकर उनसे बलात्कार करे, जबकि सामाजिक वर्जनाएं तो यह कहती हैं कि अगर पति-पत्नी में से कोई बेवफा हो जाए तो उसे तलाक दे देना भी जायज है। 
कुल मिलाकर इस मुद्दे पर लिखने का मकसद यही है कि सामाजिक वर्जनाओं को पूरी तरह असरदार मान लेना ठीक नहीं है, लोगों को इन वर्जनाओं के नाकामयाब होने पर बचाव की नौबत की तरकीबें सोच रखना चाहिए, और उनका उसी तरह इस्तेमाल करना चाहिए जिस तरह आग बुझाने के उपकरणों का इस्तेमाल होता है। यह मानकर चलना चाहिए कि आसपास के लोगों के तन-मन में लगी आग में सारी नैतिकता, सारे सामाजिक प्रतिबंध जाने कब जल जाएंगे, और जिंदगियों और रिश्तों को जलने से बचाने के लिए इंतजाम रखना हर किसी की खुद की जिम्मेदारी है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 दिसंबर 2022


 (Daily Chhattisgarh)

अब यह भी सुप्रीम कोर्ट को अपनी अवमानना नहीं लगती, तो फिर और क्या बात लगेगी?

  23  दिसंबर 2022


पिछले दिनों इसी जगह पर दो अलग-अलग दिन हमने दो अलग-अलग मुद्दों पर लिखा था, और आज उन दोनों को जोडक़र लिखने का एक मौका है। शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के एक फिल्मी डांस में दीपिका की भगवा-केसरिया बिकिनी को लेकर हिन्दुस्तान का एक बड़बोला तबका उबला हुआ है, और मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा से लेकर तथाकथित साधू-संत तक सार्वजनिक रूप से कानूनी और गैरकानूनी धमकियां दे रहे हैं। दूसरा मुद्दा अमरावती का था जहां पर एक भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा के मोहम्मद पैगंबर के बारे में दिए गए आपत्तिजनक बयान को लेकर देश में कत्ल के जो फतवे चल रहे थे, उसमें नुपूर शर्मा के बयान के पक्ष में अमरावती के एक हिन्दू दुकानदार ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, और इसे लेकर मुस्लिमों के एक तबके ने इस दुकानदार के 16 बरस पुराने एक दोस्त की अगुवाई में उसका गला काटकर उसे मार डाला था। धर्म ने इंसानियत का गला काट दिया था, दोस्ती की मिसालों को भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया था। इन दोनों बातों पर हमने खुलासे से लिखा था, लेकिन हिन्दुस्तान में साम्प्रदायिकता और धार्मिक हिंसा का नंगा नाच खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, इसलिए आज उस पर एक बार फिर लिखने की जरूरत है। 

शाहरूख खान और दीपिका पादुकोण के फिल्मी डांस को लेकर अयोध्या के एक तथाकथित महंत परमहंस आचार्य ने यह धमकी दी है कि शाहरूख खान अगर मिल गया तो उसे वे जिंदा जला डालेंगे, और अगर किसी और ने शाहरूख को जलाने का साहस किया तो उसका मुकदमा वे (महंत) खुद लड़ेंगे। खबरें बताती हैं कि यह तथाकथित महंत पहले भी एक बार घोषणा कर चुका है कि अगर भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया तो वह जल समाधि ले लेगा, लेकिन फिर शायद धरती का जल उसके लिए कम पड़ गया। एक दूसरे तथाकथित महंत राजूदास ने लोगों से कहा है कि जहां भी पठान फिल्म दिखाई जाए, उस थियेटर को आग लगा दें, नहीं तो बात उनकी समझ में नहीं आएगी। हिन्दुत्व के हमलावर फौजियों ने सोशल मीडिया पर इस किस्म की बहुत सारी धमकियां लिखी हैं, जिनका अलग-अलग जिक्र मुमकिन नहीं है। 

अब यह सब कुछ केन्द्र सरकार, अलग-अलग राज्य सरकारों, और देश की तमाम अदालतों, संवैधानिक आयोगों की नजरों के सामने हो रहा है। ऐसी हालत में एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि अपने नाम और चेहरे सहित जो लोग अपने को एक धर्म का महंत बताते हुए हिंसा का फतवा दे रहे हैं, खुद कत्ल करने की घोषणा कर रहे हैं, उनके खिलाफ सरकारों की पुलिस कोई जुर्म दर्ज क्यों नहीं कर रही है? सुप्रीम कोर्ट ने अभी कुछ महीने पहले ही नफरती बयान देने वाले लोगों पर मुकदमे दर्ज करने का जिम्मा उनके इलाके की पुलिस पर डाला था, और यह भी कहा था कि अगर अफसर यह काम नहीं करेंगे, तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा। अब एक गाने में एक हिन्दू अभिनेत्री के पहने हुए कपड़े के रंग को लेकर अगर मुस्लिम अभिनेता को जिंदा जलाने की बात हो रही है, तो इससे बड़ी हेट-स्पीच और क्या हो सकती है? यह फिल्म एक हिन्दू सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी है, इसकी कहानी एक और हिन्दू श्रीधर राघवन ने लिखी है, फिल्म का निर्माण आदित्य चोपड़ा नाम के प्रोड्यूसर ने यशराज फिल्म्स नाम की एक हिन्दू की कंपनी के लिए किया है। इसके बाद अगर फिल्म के अभिनेता को मुस्लिम होने की वजह से जिंदा जलाने की बात हो रही है, उसकी ऐसा करने की कसम खाई जा रही है, दूसरों को उकसाया जा रहा है कि अगर वे शाहरूख को जिंदा जला दें तो वे (महंत) उसका मुकदमा लड़ेंगे, तो फिर इस हेट-स्पीच पर अगर यूपी की पुलिस मुकदमा दर्ज नहीं कर रही है, तो क्या वह सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के दायरे में नहीं आ रही है? 

सुप्रीम कोर्ट को तो मध्यप्रदेश के गृहमंत्री से भी सवाल करना चाहिए कि संविधान की शपथ लेने के बाद वे संविधान को कुचलने वाला यह बयान कैसे दे रहे हैं, और इसे संविधान के खिलाफ किया गया काम मानकर उन पर कार्रवाई क्यों न की जाए? सरकारी और अदालती कामकाज में कुछ बातें नजीर बन जाती हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस किस्म के कुछ मामलों में लोगों को कटघरे में घसीटना चाहिए, और वहां से जेल भेजना चाहिए। धर्म के नाम पर दुकानदारी करने वाले 10-20 लोग और संविधान की शपथ लेकर संविधान पर थूकने वाले 10-20 लोग अगर जेल भेजे जाएंगे तो इस देश से हिंसक, साम्प्रदायिक, और नफरती बकवास कम हो सकेगी। आज तो सुप्रीम कोर्ट अपनी खुद की दी गई चेतावनी को लेकर नाखून और दांत खो बैठे एक ऐसे प्राणी की तरह दिख रहा है जो कि लाचार है, और जिसके बस का कुछ नहीं रह गया है। जब देश में इस तरह की साम्प्रदायिक हिंसा की एक परंपरा विकसित की जा रही है, तब अदालत को दखल देनी होगी क्योंकि देश की सरकार, अधिकतर प्रदेशों की सरकारें इस हिंसा के साथ खड़ी दिख रही हैं, सरकारों में बैठे हुए बड़े-बड़े मंत्री ऐसे खुले फतवे दे रहे हैं, संसद में बाहुबल का संतुलन साम्प्रदायिकता के पक्ष में इतना अधिक झुका हुआ है कि साम्प्रदायिकता विरोधी लोग पासंग में भी नहीं बैठ रहे हैं। ऐसे माहौल में देश की न्यायपालिका की एक बड़ी जिम्मेदारी बनती है, और उसे इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को उठाना चाहिए, वरना इतिहास में यह अच्छी तरह दर्ज होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जज महज अपनी सहूलियतों को लेकर, अपनी लंबी छुट्टियों के हक को लेकर लड़ते रहे हैं, और देश की आम जनता को उन्होंने एक छोटे और हिंसक तबके के सामने ठीक उसी तरह छोड़ दिया जिस तरह रोम में शेर के सामने निहत्थे इंसान को छोडक़र स्टेडियम में बैठे बाकी लोग उसका मजा लेते थे। सुप्रीम कोर्ट अगर अपनी ही चेतावनी, अपने ही हुक्म की अवमानना की फिक्र नहीं कर रहा है, तो इससे देश की जनता के हक कुचले जा रहे हैं, और देश की हवा जहरीली होती जा रही है। 

(Daily Chhattisgarh)