दीवारों पर लिक्खा है, 6 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

पंचतत्व या खाक में बदलने से बेहतर है खाद बन जाना

6  जनवरी 2023

 

अमरीका के सबसे चर्चित शहर न्यूयॉर्क में वहां के गवर्नर ने मानव शरीर को खाद में बदलने को कानूनी इजाजत दे दी है। इसके पहले अमरीका के कई और प्रदेश ऐसी इजाजत दे चुके हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि किसी शव को खाद के ढेर पर या गड्ढे में डाल दिया जा सकेगा, इसके लिए अलग से बनाए गए अंतिम संस्कार सेंटरों में उसे छोडऩा होगा जहां उन्हें वैज्ञानिक तरीके से ऐसे माइक्रोब के बीच छोड़ दिया जाएगा जहां वे उस शरीर को खाद में बदल देंगे। इससे अंतिम संस्कार में लगने वाले ताबूत, और बाकी दुनिया भर की चीजों, कब्र की जगह, उस पर लगने वाले पत्थर, इन सबसे बचा जा सकेगा, और धरती पर बोझ घटेगा। कुछ धर्मों में वैसे भी मरने के बाद शरीर को पंचतत्वों में विलीन कर देने, खाक में मिला देने, या चील-कौवों को खिला देने जैसी सोच बनी हुई है, अभी अमरीका के इन आधा दर्जन राज्यों में जो किया जाने वाला है, वह बिना कब्र बनाए मिट्टी में दफना देने किस्म का ही काम है जिसमें शरीर तेज रफ्तार से खाद में चाहे न बदले, वह पर्यावरण को अधिक नुकसान पहुंचाए बिना दफन हो जाता है, और जमीन के भीतर जाहिर है कि तरह-तरह के कीड़े उसे खाकर खत्म कर देते हैं। अब ऐसे दफन से, या हिन्दुओं के जलाने वाले अंतिम संस्कार से धरती को कुछ वापिस हासिल नहीं होता, लेकिन अमरीका में यह नया चलन धरती को खाद देता है, और एक शरीर से करीब 36 बोरे खाद मिल सकेगी। लोग जीते-जी अपनी अंतिम इच्छा लिखकर जा सकेंगे कि वे अपना अंतिम संस्कार किस तरह से चाहेंगे, और क्या वे खाद में बदल जाना चाहेंगे।

लोगों को मृतकों के शरीर से निपटने के बेहतर तरीके सोचने चाहिए। हिन्दुस्तान के कुछ शहरों में बिजली से चलने वाले शवदाह गृह काम कर रहे हैं, और कई शहरों में गैस से चलने वाले। इन दोनों का खर्च लकड़ी से शव जलाने के मुकाबले कम आता है, वक्त भी कम लगता है, प्रदूषण भी शायद कम ही होता है, लेकिन कई किस्म के धार्मिक रीति-रिवाजों की गुंजाइश इनमें कम रहती होगी, इसलिए पेशेवर पंडित इसका समर्थन नहीं करते हैं। वैसे भी अगर अंतिम संस्कार के रीति-रिवाजों में कटौती हो जाए, तो फिर पंडितों के जजमान तो खत्म ही हो जाएंगे। लेकिन शव को जलाने का मतलब कुछ क्विंटल लकडिय़ों को साथ जलाना होता है, जिससे धरती पर घटते हुए पेड़ों पर एक हमला होता ही है। फिर इसके साथ-साथ कई किस्म का प्रदूषण भी होता है, और सच तो यह है कि अंतिम संस्कार में पहुंचने वाले लोगों का बहुत सा वक्त भी लगता है। इसलिए अगर कोई बेहतर तरीका सोचा जा सकता है तो उससे कई किस्म की बचत हो सकती है।

सबसे अच्छा तो यही हो सकता है कि लोग मरने के पहले अपने अंगदान करने की घोषणा कर जाएं, और अगर वे ऐसी मेडिकल हालत में पहुंच जाएं कि उनकी दिमागी मौत हो चुकी रहे, तो घरवालों को उनके अंगदान के बारे में सोचना चाहिए। अब तो बहुत से मामलों में छोटे-छोटे बच्चों के गमगीन मां-बाप भी उनका अंगदान करके कई लोगों को जिंदगियां देते हैं, और उनके बच्चे कई अलग-अलग लोगों की शक्ल में जिंदा रहते हैं। अगर ऐसी नौबत न रहे तो भी लोग अपना शरीर मेडिकल कॉलेज को देकर जा सकते हैं जहां पर चिकित्सा-छात्र-छात्राओं को मानव शरीर समझने के लिए मृत शरीरों की हमेशा ही कमी रहती है। ऐसा भी बहुत से लोग करते आए हैं, और इस तरीके से भी अंतिम संस्कार में होने वाली लकड़ी या दूसरे किस्म की बर्बादी बचती है, लोगों का वक्त बचता है।

अलग-अलग धर्मों में मृत शरीर के अलग-अलग किस्म के निपटारे के तरीके हैं। पारसी समुदाय में मृतकों की लाश को उनके पूजा स्थल पर एक ऊंचे टॉवर पर रख दिया जाता है, जहां पंछी उन्हें खाकर खत्म कर देते हैं। हिन्दुस्तान में ही कई जगहों पर लकड़ी की कमी से गरीब अपने लोगों के अंतिम संस्कार करने के बजाय लाशों को नदी में बहा देते हैं जिससे प्रदूषण का खतरा रहता है क्योंकि इन्हीं नदियों से किनारे के गांव-कस्बों, और शहरों  में पीने का पानी जाता है। अमरीका में बिना किसी धार्मिक आधार के पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से शव को खाद में बदलने का जो काम शुरू हुआ है, वह बाकी दुनिया के लिए भी बड़ा दिलचस्प हो सकता है जहां कब्रगाह के लिए जगहें कम पड़ रही हैं, और अब तो जमीन न रह जाने से बहुमंजिला कब्रगाह बन रही है जहां लोगों को महज ताबूत जितनी जगह मिलती है, और सामने नाम की तख्ती लग जाती है। अभी ब्राजील में दुनिया के सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले का अंतिम संस्कार ऐसी ही एक बहुमंजिला कब्रगाह में किया गया है जिसमें 32 मंजिला ढांचे में 16 हजार कब्रे हैं। आज बड़े शहरों से लेकर गांवों तक कब्रिस्तान और श्मशान की जगहें कम पडऩे लगी हैं, लोगों में झगड़े हो रहे हैं, एक ही धर्म के भीतर अलग-अलग सम्प्रदायों के लोगों के बीच अंतिम संस्कार की जगह के झगड़े होने लगे हैं। ऐसे में बिना धार्मिक आधार के, सिर्फ वैज्ञानिक सोच के साथ होने वाले ऐसे अंतिम संस्कार शायद सबसे अच्छे हो सकते हैं जो कि जाने के बाद भी खाद बनकर पौधों की शक्ल में जिंदा रह सकें। इस बारे में लोगों को सोचना चाहिए। और यह तकनीक ऐसी हो सकती है कि लोगों के शरीर की खाद उनके ही गांव-कस्बे या शहर के खेतों में काम आ सके। हिन्दुस्तान में वैसे भी बहुत से लोग शवदाह के बाद बचने वाली राख को नदियों में विसर्जित करते हैं, या खेतों में डालते हैं। नेहरू भी अपनी अस्थियों को इन्हीं दो जगहों पर बिखेर देने की इच्छा जाहिर कर गए थे। हालांकि नेहरू यह लिख गए थे कि उनका अंतिम संस्कार किसी धार्मिक रीति-रिवाज से न किया जाए, लेकिन इर्द-गिर्द के नेताओं के दबाव में इंदिरा ने हिन्दू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया था, और फिर उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित की गईं, और विमान से भारत के खेतों पर बिखरा दी गई थीं।

अमरीका में जिस तकनीक से यह अंतिम संस्कार किया जा रहा है, वह कोई मुश्किल बात नहीं है, और हिन्दुस्तान तो किसान आबादी और खेतों से भरा हुआ देश है। अगर यह सोच यहां पर बढ़ निकली, तो यहां के पेड़ों पर से दबाव घटेगा, धरती का बेहिसाब बेजाइस्तेमाल थमेगा, और प्रदूषण भी रूकेगा। और लोग खाद बनकर पौधों और पेड़ों से होकर हमेशा के लिए जिंदा रह सकेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 5 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

अमरीकी संसद-स्पीकर के लिए छह बार मतदान हो चुका, पुराना रिकॉर्ड 133 बार का!

5  जनवरी 2023


अमरीकी संसद के निचले सदन, हाऊस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत के बाद भी उस पार्टी का स्पीकर बनना नहीं हो पा रहा है क्योंकि प्रत्याशी केविन मैक्कार्थी का उन्हीं की पार्टी के कई सांसद विरोध कर रहे हैं, और खुलकर उनके खिलाफ वोट दे रहे हैं। अमरीका की संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह वोटिंग बार-बार होते रहेगी, जब तक कि किसी उम्मीदवार को बहुमत न मिल जाए। अब तक छह बार वोट डल चुके हैं, लेकिन रिपब्लिकन सांसदों में से कुछ लोग अपनी पार्टी के इस उम्मीदवार के खिलाफ हैं, और वोट डालने के अलावा वे बार-बार बयान भी दे रहे हैं। जब तक स्पीकर का चुनाव नहीं हो जाता, तब तक ये वोट इसी तरह डलते रहेंगे, और अमरीकी संसद में यह नौबत करीब सौ साल के बाद आई है। इस संसद के इतिहास में कुल सात बार ऐसा हुआ है जब तीन बार से अधिक वोट डाले गए। जब तक स्पीकर चुन नहीं लिया जाता तब तक न तो नए सांसद शपथ ले सकते, और न ही कोई संसदीय कामकाज हो सकता। एक बार तो इस संसद के इतिहास में स्पीकर चुनने का सिलसिला करीब दो महीने तक चला था, और 133 बार वोट डाले गए थे। यह वाकया 1855 का है, संसद गुलामों के मुद्दे पर बुरी तरह से बंटी हुई थी, और शुरू में स्पीकर के लिए 21 उम्मीदवार थे, जो घटते-घटते कम हुए, लेकिन आखिर में 133वीं बार के मतदान से स्पीकर का चुनाव हुआ था।

अमरीकी संसद की प्रतिनिधि सभा में कौन स्पीकर बने इसमें हमारी इतनी अधिक दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन इस पर लिखने की एक वजह है। इससे यह पता लगता है कि एक पार्टी का उम्मीदवार संसद के भीतर अपनी ही पार्टी के 18-20 सांसदों का विरोध किस तरह झेलता है, और स्पीकर नहीं बन पाता। इसके लिए किसी दूसरी पार्टी को सांसद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, बगावत करवाने की जरूरत नहीं पड़ती, और वहां की प्रचलित संसदीय व्यवस्था, और राजनीतिक परंपराओं के तहत ही ऐसा हो रहा है। अब अगर हिन्दुस्तान में मुख्यमंत्री या विधानसभा अध्यक्ष चुनने की बात आए, तो पहले थोड़े-बहुत विधायक बिकते थे, अब दल-बदल विधेयक की वजह से वे थोक में बिकते हैं, और एक अनुपात से अधिक फूट होने पर ही विधायक दल बंटा हुआ माना जाता है, और उसे दल-बदल नहीं माना जाता। मतलब यह कि थप्पड़ मारना जुर्म है, और कत्ल करने पर कोई सजा नहीं है। अमरीका के इस ताजा मामले को देखते हुए हिन्दुस्तान के दल-बदल कानून के बारे में एक बार फिर सोचने की जरूरत है कि क्या यह सचमुच ही असरदार साबित हो रहा है, या फिर यह सांसदों और विधायकों की मंडी में थोक में खरीद-बिक्री को बढ़ाने वाला साबित हो रहा है?

आज भारतीय संसदीय व्यवस्था में संसद और विधानसभाओं में किसी छोटे से छोटे मुद्दे पर भी अगर वोट डालने की नौबत आती है, तो तमाम राजनीतिक दल अपने सांसदों या विधायकों को एक पार्टी व्हिप जारी करते हैं जिसके बाद वे अगर उसके खिलाफ वोट डालते हैं, तो उनकी सदस्यता खत्म हो सकती है। मतलब यह कि विधायकों या सांसदों के निजी विवेक को पार्टी के फैसले से एक फौलादी जंजीर से बांध दिया गया है, और वे उससे परे नहीं जा सकते। यह बात तो वोटिंग के समय की है, वोटिंग से परे की भी सोचें, तो संसदीय बहस के दौरान भी हिन्दुस्तान के सांसदों और विधायकों को यह आजादी नहीं रहती कि वे पार्टी की तय की गई सोच से परे की कोई बात कर सकें। पार्टी अनुशासन के नाम पर निजी विवेक को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है, और अब वह किसी पार्टी के संसदीय दल के सामूहिक फैसले से परे कुछ भी नहीं है। यह बात पहले भी हमें खटकती रही है कि भारतीय मतदाता किसी को अपना सांसद या विधायक सिर्फ पार्टी निशान पर नहीं बनाते हैं, बल्कि वे उम्मीदवार के निजी व्यक्तित्व, उनकी निजी सोच को भी ध्यान में रखकर उसे वोट देते हैं। लेकिन एक बार चुन लिए जाने के बाद संसद या विधानसभा में उनके सारे फैसले पार्टी के हुक्म के मुताबिक होते हैं जिससे कि उनके मतदाताओं की उम्मीद भी पूरी नहीं हो सकती, और ऐसे निर्वाचित सदस्यों की निजी सोच और समझबूझ का कोई फायदा भी सदन को नहीं मिल पाता। जब कभी एक निर्वाचित प्रतिनिधि के हिस्से का फैसला उसका संगठन करने लगता है, तो उस सांसद या विधायक की प्रतिभा का फायदा संसदीय व्यवस्था को नहीं मिल पाता। भारत में आज अगर कोई पार्टी कोई बुरे से बुरा उम्मीदवार खड़ा कर दे, तो उसके खिलाफ पार्टी के लोग तभी वोट दे सकते हैं जब वे बिक चुके हों, उसके पहले तक उन्हें पार्टी के सामूहिक फैसले को ही मानना पड़ता है।

हर लोकतांत्रिक और संसदीय व्यवस्था को इस किस्म की दूसरी व्यवस्थाओं के तजुर्बों और उनकी मिसालों से सीखना चाहिए। इसीलिए हम अलग-अलग देशों से सामने आने वाली अलग-अलग व्यवस्थाओं पर चर्चा करते हैं। अमरीका में किसी को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाते हुए जिस तरह वहां की संसदीय कमेटी उस संभावित जज के इतिहास से लेकर उसकी आत्मा तक सबको टटोल लेती है, वह भी हमें भारत में अमल में लाने लायक एक बात लगती है जहां पर आज सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम नाम तय करने का एकाधिकार रखता है, और उसे मंजूर या नामंजूर करने का काम केन्द्र सरकार के हाथ रहता है। इस व्यवस्था को लेकर भी आज कई लोगों का यह मानना है कि भारतीय संविधान बनाने वाले लोगों ने ऐसी कॉलेजियम प्रणाली की कल्पना नहीं की थी। ठीक उसी तरह आज यह मामला भी लग रहा है कि संसद के भीतर क्या सांसदों को पार्टी अनुशासन से परे अपने निजी विवेक से वोट देने का हक रहना चाहिए? और खासकर दल-बदल कानून आने के बाद से चिल्हर में दल-बदल गैरकानूनी, और थोक में दल-बदल कानूनी हो जाने का तजुर्बा देखते हुए क्या ऐसे कानून का कोई फायदा दिखता है?

फिलहाल अमरीकी संसद का निचला सदन, प्रतिनिधि सभा, को छह बार वोट डालने के बाद भी थकान नहीं है, क्योंकि उसके पास 133 बार के मतदान की एक ऐतिहासिक मिसाल है। वहां की संसद सदन में सांसदों की निजी राय को पार्टी के किसी भी हुक्म के ऊपर महत्व देते दिख रही है, और शायद यह लोकतंत्र की जिंदादिली का एक सुबूत भी है। अमरीकी राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनने के पहले अपनी पार्टी के भीतर देश भर में घूमकर पार्टी के वोटरों के बीच अपनी काबिलीयत साबित करने की व्यवस्था सबकी देखी हुई है, और विपक्षी उम्मीदवार से मुकाबले के पहले अपनी ही पार्टी के प्रतिद्वंद्वी से कड़े मुकाबले की परंपरा पार्टी के भीतर के सबसे लोकप्रिय और कामयाब व्यक्ति को सामने रखती है। इसके मुकाबले भारत के राजनीतिक दलों में उम्मीदवार तय करना पूरी तरह से अलोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसमें कुछ भी पारदर्शी नहीं है। जरूरी नहीं है कि इसमें से हर बात हिन्दुस्तान में अमल के लायक हो, लेकिन दूसरी संसदीय व्यवस्थाओं की ऐसी मिसालों को ध्यान से देखते हुए ही बाकी लोकतंत्र परिपक्व हो सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

पेले के अंतिम दर्शन के मौके पर खेलों पर चर्चा

3  जनवरी 2023


आज जब ब्राजील अपने इतिहास के सबसे महान, और दुनिया के भी सबसे महान फुटबॉल खिलाड़ी पेले के अंतिम दर्शन कर रहा है, तभी फुटबॉल की दुनिया में पुर्तगाल के फुटबॉलर क्रिस्टियानो रोनाल्डो ने सऊदी अरब के एक क्लब के साथ तीन बरस का एक समझौता किया है जिसके तहत उन्हें हर साल करीब 1773 करोड़ रूपये मिलेंगे। यह करार उस वक्त हुआ है जब दुनिया के एक सबसे फुटबॉल क्लब मेनचेस्टर यूनाईटेड के साथ रोनाल्डो का करार खत्म हुआ ही था, और कुछ लोग उनका कॅरियर ढलान पर होने की बात करने लगे थे। ऐसे में इतना महंगा अनुबंध उनके बारे में अटकलों को लगाम लगाता है। ब्राजील के पेले का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था, और जब पिता बिना रोजगार थे तो घर चलाने के लिए पेले जूते पॉलिश करने का काम भी किया था, और उसी कमाई से अपना पहला अच्छा फुटबॉल भी खरीदा था। फुटबॉल के साथ जुड़े हुए कई सबसे कामयाब खिलाड़ी ब्राजील, अर्जेंटीना, पुर्तगाल जैसे कई देशों के गरीब परिवारों से निकलकर आए, और कामयाबी और शोहरत के आसमान पर पहुंचे। खुद रोनाल्डो की प्रतिभा को पहचानकर जब उनके शहर के एक क्लब ने उन्हें आने का न्यौता दिया, तो शहर के दूसरे सिरे पर बसे उस क्लब तक पहुंचने का भाड़ा भी उनके पास नहीं था, और ऐसे में उन्हें करीब के एक दूसरे औसत दर्जे के फुटबॉल स्कूल तक पैदल जाना पड़ता था क्योंकि परिवार के पास बस खाने को पैसा था।

चूंकि अभी-अभी विश्वकप फुटबॉल हुआ है, और उसकी कई टीमों के कई खिलाड़ी ऐसी ही गरीबी से निकलकर आए हैं, इसलिए गरीब बच्चों के बारे में सोचने का यह सही मौका है। ब्राजील के फुटबॉल खिलाडिय़ों को लेकर पिछले बरस छपे एक लेख में यह नजरिया सामने रखा गया था कि किस तरह वहां खिलाडिय़ों की गरीबी ने उनके हुनर और खूबी को गढ़ा है। ब्राजील दुनिया के फुटबॉल देशों में चर्चित रहा है, और वहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बहुत गरीब है। अपनी गरीबी से लडऩे के लिए ही मानो वहां के बच्चे बड़े खिलाड़ी बनते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि कामयाबी उनकी गरीबी दूर सकती है। और यह नौबत दुनिया में किसी भी जगह आ सकती है कि अभाव और गरीबी में बड़े होने वाले बच्चों में संघर्ष करने की क्षमता और हसरत औरों के मुकाबले अधिक हो। ऐसा इसलिए भी होता है कि उन्हें यह मालूम रहता है कि उनकी मेहनत और उनका हुनर ही उन्हें गरीबी के दलदल से निकलने में मदद कर सकते हैं।

दुनिया में बहुत से ऐसे खेल हैं जिनमें बहुत महंगा प्रशिक्षण लोगों को आगे बढऩे के लिए जरूरी सा रहता है, लेकिन हर देश में कुछ न कुछ बच्चे ऐसे रहते हैं जो बिना महंगे प्रशिक्षण के, बिना महंगे साज-सामान और जूतों के, अभाव में भी आगे बढ़ते हैं, और हिन्दुस्तान जैसे देश के लोगों को ऐसी ही मिसालों से सीखना चाहिए। जब दुनिया में तीन-चार करोड़ आबादी के गरीब देश भी विश्वकप फुटबॉल के सेमीफाइनल तक पहुंच सकते हैं, तो फिर हिन्दुस्तान जैसा देश अपनी 140 करोड़ आबादी को लेकर अपने बच्चों में हौसला क्यों नहीं भर सकता? और हम यह जिम्मा इस देश की सरकार का नहीं मान रहे, बल्कि समाज और आम लोगों का मान रहे हैं कि किस तरह बच्चों को बढ़ावा देकर उन्हें दुनिया के मुकाबले खड़ा किया जा सकता है। अब फुटबॉल जैसे गरीबों के खेल में आसमान पर पहुंचे हुए गरीब देशों के मुकाबले भी हिन्दुस्तान जैसा अपने को विकसित कहने वाला देश जमीन पर औंधे मुंह इसलिए गिरा हुआ है कि यहां खेल पर दूसरी तमाम चीजों का कब्जा है।

इस देश में खेल के मैदानों को देखें तो सुप्रीम कोर्ट के बहुत साफ-साफ चेतावनी वाले फैसले के बाद भी बहुत से प्रदेशों में स्थानीय संस्थाएं मैदानों को काट-काटकर खाने-पीने के बाजार बना रही हैं, जिनमें छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर शायद सबसे ही आगे है। एक भी मैदान बिना काटे, बिना छोटा किए छोड़ा नहीं गया है, और अब तो इन हमलावर तेवरों के साथ मैदानों को खाने-पीने की चौपाटी बनाया जा रहा है कि कहीं खिलाडिय़ों के खेलने को कोई जगह न बच जाए। इसके अलावा साल भर खेल मैदानों पर सरकारी प्रदर्शनियां, बाजारू मेले, धार्मिक कार्यक्रम, सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम चलते ही रहते हैं, और किसी मैदान को खेलने के लायक छोड़ा नहीं जाता। खेल संघ भी सरकार से टकराव लेने की हिम्मत नहीं कर पाते, और दम तोड़ते मैदानों को देखते हुए अपने संगठन की राजनीति में लगे रहते हैं। ऐसे देश ब्राजील या अर्जेंटीना जितने गरीब न भी हों, वहां पर कोई खिलाड़ी पैदा नहीं हो सकते। जिन अंग्रेजों की गुलामी में हिन्दुस्तान ने डेढ़ सौ बरस गुजारे हैं, उनके छोड़े हुए क्रिकेट पर यह देश फिदा है, और इस खेल के लिए इस देश में पैसा ही पैसा है। लेकिन बाकी किसी खेल के लिए किसी मैदान को भी छोडऩे की जरूरत किसी को नहीं लगती है। जिस तरह देश की सरकार पिछली पौन सदी में बनी हुई सरकारी कंपनियों को बेचने में लगी हुई है, उसी तरह प्रदेश, और शहरों की स्थानीय सरकारें मैदानों को काट-काटकर बाजार बनाने में लगी हुई हैं। कोई बच्चे खुद होकर फुटबॉल खेल सकें, इसकी भी गुंजाइश सरकारें नहीं छोड़ रही हैं। बार-बार अदालतों तक ये मामले जाते हैं कि खेल मैदानों का कोई गैरखेल इस्तेमाल न हो, लेकिन फिर पूरे वक्त गैरखेल इस्तेमाल ही होता है।

हिन्दुस्तान जैसे दुनिया के आज के दूसरे सबसे बड़े देश, और बहुत जल्द आबादी के मामले में दुनिया के सबसे बड़े देश को सोचना चाहिए कि जब छोटे-छोटे देश खेलों में आसमान पर पहुंचते हैं, तब हिन्दुस्तान चने के झाड़ पर चढक़र तिरंगा फहराकर गौरव हासिल करते क्यों बैठे रह जाता है? बिना सरकारी मदद के भी गरीब खिलाड़ी शायद आगे बढ़ जाएं, अगर उनके हिस्से के मैदानों बेच खाने पर सत्तारूढ़ नेता आमादा न हों। ऐसे बाजारूकरण के खिलाफ लोगों को उठकर खड़ा होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

 

हिन्दुस्तानी सडक़ों पर अराजक गुंडागर्दी के जिम्मेदार कौन?

 2  जनवरी 2023


नए साल के मौके पर दिल्ली में सुबह के अंधेरे में एक कार में सवार पांच लोगों ने एक स्कूटी सवार युवती को टक्कर मार दी, और उसकी लाश कार में फंसे हुए चार किलोमीटर तक घिसटती चली गई। सुबह तीन बजे की इस वारदात को देखने वाले एक दूध वाले ने पुलिस वैन को खबर करने की कोशिश की, लेकिन उसे पुलिस वाले नशे में मिले। फिर किसी और ने इस महिला या उसकी लाश को घसीटती जा रही कार के बारे में पुलिस को खबर की, और तब जाकर पांच लोगों सहित इस गाड़ी को पकड़ा गया। यह मामला देश की राजधानी दिल्ली में 31 दिसंबर की आधी रात के बाद हुआ जिसमें कि ऐसे हादसों की बड़ी आशंका थी, और पुलिस को खास चौकन्ना रहने की हिदायत तो इस रात देश भर में दी ही जाती है।

हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बसे हुए इस शहर में रोजाना ही सडक़ों पर तरह-तरह से नियमों के खिलाफ चलने वाली गाडिय़ों को देखते हैं, और उन गाडिय़ों को देखती चुपचाप खड़ी पुलिस को भी देखते हैं। हो सकता है कि देश के कुछ प्रदेश ट्रैफिक को लेकर अधिक चौकन्ने हों, लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे बर्बाद प्रदेश भी कम नहीं होंगे। हमारा यह भी देखा हुआ है कि जो लोग सडक़ों पर नियम तोड़ते हैं, वे वहीं पर नहीं थमते हैं, वे और सौ किस्म की गुंडागर्दी करते हैं, और सडक़ों पर अराजकता का माहौल बनाते हैं। साइलेंसर फाड़ी हुई जो मोटरसाइकिलें लाखों रूपये की आती हैं, जिनकी आवाज एक किलोमीटर दूर से सुनाई देती है, वे सडक़ों पर रात-दिन चौराहे पार करते हुए दौड़ती हैं, और ऐसी हर फटफटी दिन भर में दर्जनों पुलिसवालों के सामने से निकलती होगी, लेकिन पुलिस ने इन्हें छूना भी बंद कर दिया है। हेलमेट लगाना छत्तीसगढ़ के एक छोटे से इलाके, दुर्ग-भिलाई में पुलिस बार-बार लागू करती है, लेकिन मानो सडक़ की यह जीवनरक्षक सावधानी राजधानी की शान के खिलाफ है, यहां पुलिस का हौसला लोगों को हेलमेट पहनाने का भी नहीं होता, बल्कि कुछ बरस पहले राजधानी में पुलिस ने जनसहयोग से हेलमेट खरीदकर लोगों को मुफ्त पहनाए थे, और उस वक्त भी हमने इसे नियम तोडऩे वालों को पुरस्कार देना करार दिया था। हालत यह है कि 25-50 लाख की गाडिय़ों पर आड़े-तिरछे नंबर लिखे रहते हैं, गैरकानूनी सायरन और लाईटें उन पर तनी रहती हैं, लेकिन पुलिस इनका कुछ नहीं करतीं। आम जनता की जिंदगी में सडक़ पर हिफाजत रखने में पुलिस का कोई योगदान नहीं दिखता। हम इसी शहर को एक नमूना मानकर यह बात लिख रहे हैं कि दर्जनभर पुलिस अफसर आए और चले गए, और किसी ने भी ऑटोरिक्शा की संगठित अराजकता पर काबू की कोशिश नहीं की। न आरटीओ, और न ट्रैफिक पुलिस, किसी की कोई नीयत भी संगठित कारोबारी गाडिय़ों पर कार्रवाई की नहीं दिखती है, और इसकी वजह समझना कोई पहेली सुलझाना भी नहीं है।

हर कुछ हफ्तों में देश के तमाम शहरों से ऐसे वीडियो सामने आते हैं कि बददिमाग पैसे वाले किस तरह दारू और पैसों के मिलेजुले नशे के साथ सडक़ों पर गुंडागर्दी करते हैं, और जब ऐसे सुबूत सामने रख ही दिए जाते हैं, तब पुलिस के पास कार्रवाई करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहता। वरना आम जिंदगी में जितने किस्म की गुंडागर्दी वीडियो पर आए बिना सडक़ों पर होती है, पुलिस उसकी अनदेखी करते हुए कारोबारी गाडिय़ों में अपनी दिलचस्पी पूरी करने में लगी रहती है। यह सिलसिला किसी अफसर के आने और जाने से जब नहीं बदलता है, तो यह बात समझ में आती है कि सत्ता की मंजूरी ऐसे अफसरों को रहती है, और छांटकर कुछ चुनिंदा अफसर सबसे बड़ी उगाही की जगह पर बार-बार तैनात होते हैं।

अब सरकार की हर नाकामी पर अदालत जाने का तो कोई मतलब भी नहीं रह गया है क्योंकि जब अदालतें लाउडस्पीकरों के शोर पर सीधे कलेक्टर और एसपी को जवाबदेह ठहराते हुए चेतावनी जारी करती है, और उसके बाद भी उस पर जब कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ रहता है कि अदालतें बेअसर हो गई हैं। छत्तीसगढ़ में तो हमने हाईकोर्ट के साफ फैसलों और कड़ी चेतावनियों को सिर्फ कूड़े के ढेर में जाते देखा है, और जजों को भी इसकी कोई परवाह होती हो, ऐसा कोई सुबूत सामने नहीं आया है। इसलिए सरकारी अफसरों की गैरजिम्मेदारी और नाकामी की किन-किन बातों को लेकर लोग अदालत जा सकते हैं? और क्यों जाएं, जबकि अदालत का कोई असर ही सरकार पर नहीं बच गया है। शहरी जिंदगी की अराजकता अंधाधुंध है, और अपने-अपने शहर में जाने-माने, या थोड़ा-बहुत असर रखने वाले लोग भी जब अफसरों से की गई शिकायत को सिर्फ अनसुनी पाते हैं, तो वे किस मुंह से अदालत तक जाएं, और अदालत से क्या उम्मीद करें?

ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में शहरी जिंदगी को नियम-कायदे से चलाने का जिम्मा जिन अफसरों पर है, उनके ऐसे रूख से या तो सरकार सहमत है, या सरकार खुद ही उन्हें ऐसा ही रूख रखने के लिए कहती है ताकि सत्ता के पसंदीदा अराजक गुंडों को कोई असुविधा न हो। किसी देश-प्रदेश में लोकतंत्र का विकास इन बातों से भी आंका जाता है कि वहां जनजीवन में आम लोगों के अधिकारों का कितना सम्मान होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में ऐसे अधिकार मिट्टी में मिले हुए हैं, और किसी को इसकी कोई फिक्र भी नहीं है कि आम जनता की कोई विपरीत प्रतिक्रिया किसी चुनाव में सामने आ सकती है। एक के बाद दूसरी सरकार के राज में माहौल ऐसा ही रहने से यह साफ है कि किसी पार्टी की सरकार को सार्वजनिक जीवन में आम लोगों के अधिकार कायम करने की फिक्र नहीं है। इसके साथ-साथ स्थानीय स्तर पर निर्वाचित नेताओं को भी नियम-कायदे पसंद नहीं रहते, क्योंकि वे भी अपने-अपने अराजक लोगों की गुंडागर्दी को बढ़ावा देना चाहते हैं, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बाजार का एक फेरा लगाकर इस बात को अच्छी तरह समझा जा सकता है कि किस तरह नियमों को मार-मारकर उनमें भूसा भर देने का काम चल रहा है। ऐसी ही नौबत आगे जाकर सडक़ों पर मौत लाती है, और देश के बहुत से प्रदेशों के अधिकतर इलाके जुर्म का यह दर्जा देखते आ रहे हैं। यह हर शहर के बाशिंदों को खुद ही तय करना है कि वे अपनी अगली पीढ़ी को कितना खतरनाक शहर देकर जाना चाहते हैं, या वे आज कोई नागरिक-पहल करके चीजों को सुधार भी सकते हैं?

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 2 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 1 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

एक पिछले पोप के गुजर जाने पर याद आती है बच्चों से बलात्कार की अनदेखी...

 1  जनवरी 2023


दुनिया के अकेले जिंदा भूतपूर्व पोप, पोप बेनेडिक्ट 95 बरस की उम्र में गुजर गए। 2013 में उन्होंने पोप रहते हुए अपनी बढ़ती उम्र और खराब सेहत का हवाला देते हुए यह पद छोड़ दिया था। ऐसा करने वाले वे 6 सौ बरस में पहले व्यक्ति थे। लेकिन इसके बाद वे रोमन कैथोलिक धर्म के मुख्यालय, वेटिकन में ही बने रहे। उनके बाद बनने वाले पोप, पोप फ्रांसिस ने दो-तीन दिन पहले ही दुनिया भर के कैथोलिक लोगों से भूतपूर्व पोप के लिए प्रार्थना करने को कहा था, जाहिर है कि उनकी हालत खराब दिख रही होगी, और आखिरी दौर में वे ऐसी अपील कर रहे थे। पोप बेनेडिक्ट न सिर्फ वेटिकन में रहते थे, बल्कि वे पोप की पोशाक भी पहनते थे, और मीडिया को इंटरव्यू भी देते थे। ईसाई धार्मिक मामलों के जानकार लोगों का यह मानना है कि एक बार पोप का पद छोड़ देने के बाद  उन्हें इस धार्मिक सत्ता से दूर भी रहना चाहिए था, और चुप भी रहना चाहिए था। खैर, इस मुद्दे पर आज लिखने का मकसद पिछले पोप के इस फैसले पर चर्चा नहीं है, बल्कि उन्होंने दुनिया के दूसरे जरूरी मुद्दों पर 21वीं सदी में आकर भी जो रूख दिखाया था, उस पर चर्चा करना है।

जैसा कि ईसाई धर्म में होता है, पोप बनने वाले लोग उसके पहले कई दशक पोप से नीचे के ओहदों पर रहते हैं, और अपने ऐसे ही लंबे कार्यकाल के दौरान भूतपूर्व पोप बेनेडिक्ट ने अपने पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों से निपटने में जो ढीला-ढाला रूख दिखाया था, और मुजरिमों को जिस तरह बचाया था, वह भयानक बात थी। ईश्वर का नाम लेकर मासूम बच्चों का यौन शोषण करने वाले लोगों को बचाना यौन शोषण करने से कम बड़ा जुर्म नहीं था। इसी बरस जनवरी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह कहा गया था कि ये भूतपूर्व पोप 1977 से 1982 तक जर्मनी के म्युनिख में आर्कबिशप रहते हुए अपने पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण से वाकिफ थे, लेकिन उन्होंने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने 2004 से लेकर 2014 के बीच बच्चों के यौन शोषण और उनसे बलात्कार के मामलों में चर्च के भीतर कार्रवाई करते हुए 848 पादरियों को हटाया था, और ढाई हजार से अधिक को कुछ कम सजा दी थी, लेकिन ऐसी 34 सौ शिकायतों पर उन्होंने देश के कानून के मुताबिक कोई कार्रवाई नहीं होने दी। उन्हीं के दौर में कई ऐसे पादरी चर्च की अंदरुनी कार्रवाई से भी बच निकले जिन पर दो-दो सौ बच्चों के यौन शोषण के आरोप थे। ऐसे सभी जुर्म पर उन्होंने एक आम माफीनामा जारी करते हुए यौन शोषण के शिकार लोगों से शर्मिंदगी जाहिर करते हुए माफ कर देने की अपील की थी। जबकि इन मामलों में अदालती कार्रवाई की जरूरत थी। धर्म हर कुकर्म को छुपाने की ताकत रखता है, और रोमन कैथोलिक ईसाईयों के सबसे बड़े धर्मगुरू, पोप बनने वाले बेनेडिक्ट ने इसे सही साबित किया था। इसके अलावा उन्होंने समलैंगिक लोगों का खुलकर विरोध किया था।

सिर्फ इसी धर्म की बात नहीं है, बहुत से और धर्मों का भी यही हाल है  कि वहां हर किस्म के जुर्म खप जाते हैं। आज भी हिन्दुस्तान में अलग-अलग बहुत से धर्मों से जुड़े हुए धर्मगुरू या पादरी, या प्रचारक, या तथाकथित संत बलात्कार की सजा काट रहे हैं, और बाहर निकलकर और बलात्कार करने की हड़बड़ी में भी हैं। यह देखकर तकलीफ होती है कि आसाराम जैसा बलात्कारी जिसे देश के सबसे बड़े वकीलों के रहते हुए भी सुप्रीम कोर्ट तक ने जमानत या पैरोल के लायक भी नहीं पाया, आज भी उसका प्रचार करने के लिए उसके भक्त अपने परिवारों के नाबालिग बच्चों के साथ सडक़ों पर पर्चे बांटते दिखते हैं, जबकि आसाराम को अपने एक भक्त परिवार की नाबालिग लडक़ी से बलात्कार के जुर्म में ही सजा हुई है। ऐसी ही सजा बाबा राम-रहीम कहे जाने वाले एक और नौटंकीबाज को मिली है, जो पंजाब-हरियाणा में अपने भक्तों की बड़ी संख्या के चलते चुनाव के आसपास पैरोल पर बाहर दिखाई पड़ता है। हाल के बरसों में लगातार मुस्लिम धर्म से जुड़े हुए बच्चों और नाबालिग लड़कियों से बलात्कार करने वाले लोग पकड़ाए हैं, लेकिन धर्मों को मानने वाले लोगों का हाल यह रहता है कि वे अपने बलात्कारियों पर भी आस्था रखते हैं। धर्म के झंडों की आड़ में हजार किस्म के जुर्म चलते हैं, और लोकतांत्रिक देशों में भी सरकारें इन पर कार्रवाई करने से हिचकती हैं।

इसकी एक मिसाल छत्तीसगढ़ के इतिहास में है जब आधी सदी पहले एक मठ के महंत एक महिला से अपने अनैतिक संबंधों के चलते अपने गुंडों से एक कत्ल करवा बैठे थे, और उस वक्त के ब्राम्हण मुख्यमंत्री की छाती पर यह बात बोझ थी कि उनके सीएम रहते एक हिन्दू महंत को फांसी हो सकती है, तब उन्होंने वह केस रफा-दफा करवाया, और उस मठ-महंत से सैकड़ों एकड़ जमीन दान करवाई, जिस पर आज कॉलेज चल रहे हैं। धर्म और जुर्म की साठगांठ वेटिकन से लेकर तालिबान तक, और हिन्दुस्तान के मठों तक, सब जगह शान से चलती है, और कानून को कुचलते चलती है। दुनिया के वे देश कम जुर्म झेलते हैं जहां धर्म का बोलबाला घट रहा है, धर्म को मानने वाले लोग घट रहे हैं, नास्तिक बढ़ रहे हैं। ऐसा शायद इसलिए भी हो रहा होगा कि नास्तिकों के पास प्रायश्चित करके अपने पापों से मुक्ति पाने का विकल्प नहीं रहता है, इसलिए वे पाप कहे जाने वाले जुर्मों से दूर रहते होंगे। जिनके पास चर्च के कन्फेशन चेंबर की सहूलियत रहती है, कोई दान देकर पापों से छुटकारा पाने की आजादी रहती है, वे लोग फिर नए सिरे से पाप करने का उत्साह पा लेते हैं। इसलिए धर्म के जुर्म को गिनाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहिए। धर्म लोगों के सोचने-समझने की ताकत को जितना कमजोर कर देता है, और जुर्म करने के हौसले को जितना मजबूत कर देता है, उसकी इन दोनों खामियों को बार-बार गिनाया जाना चाहिए, ताकि किसी में समझ आने की थोड़ी सी गुंजाइश अगर बाकी हो, तो वह आ जाए।

(Daily Chhattisgarh)