दीवारों पर लिक्खा है, 21 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

बाल संन्यासियों से कितना समृद्ध हो सकता है धर्म?

  21 जनवरी 2023

 

हिंदुस्तान की हीरा राजधानी सूरत के एक कारोबारी जौहरी की आठ बरस की बेटी ने अभी सांसारिकता छोडक़र संन्यास लिया तो पहले हीरो से लदी हुई उसकी तस्वीर आई, और फिर सिर मुंडाए हुए जैन साध्वी के सफेद सूती कपड़ों में। उसके आसपास के लोगों का कहना है कि उसकी शुरू से धर्म में दिलचस्पी थी, और उसने कभी टीवी, मोबाइल या फिल्में नहीं देखीं, कभी वह मॉल या रेस्त्रां नहीं गई थी। उसके मां-बाप का कहना है कि वह साध्वी बनना चाहती थी, और अगर वह परिवार में रहती तो अपने करोड़पति-अरबपति पिता की वारिस रहती। जैन समाज में पहले भी बहुत से बच्चे दीक्षा लेकर घर छोडक़र जा चुके हैं, लेकिन आठ बरस की यह लडक़ी शायद उनमें भी कुछ कम उम्र की ही है। गुजरात में एक बड़े समारोह में देवांशी संघवी नाम की इस बच्ची की दीक्षा हुई, और वह बाकी साध्वी के साथ चली गई। 

जैन समाज में नाबालिग और नाबालिगों में भी बहुत कम उम्र के बच्चों के संन्यास ले लेने की खबरें हर कुछ महीनों में आती रहती हैं। इस समाज के भीतर के कुछ लोग, और बाहर के कुछ लोग यह मानते हंै कि यह कम उम्र बच्चों के साथ एक धार्मिक ज्यादती है जिन्होंने अभी दुनिया को ठीक समझा नहीं है। जैन समाज के धर्मालु लोग लगातार ऐसी दीक्षा के हिमायती बने रहते हैं, और उनका यह मानना है कि इसे बच्चों पर जुल्म करार देते हुए अदालत तक जाने वाले लोग गलत थे। यह मामला एक वक्त मुंबई हाईकोर्ट तक पहुंचा था, और उसका नतीजा अभी हमें ठीक से याद नहीं है। लेकिन अदालत ने सुनवाई के दौरान एक वक्त इतना जरूर कहा था कि बच्चों की दीक्षा को लेकर कुछ तय किए जाने की जरूरत है। और जजों ने यह माना था कि आठ बरस की बच्ची की दीक्षा को लेकर मां-बाप के इन तर्कों को नहीं माना जा सकता कि बच्ची ने खुदी ने यह फैसला लिया है। 2008 की उस सुनवाई में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि अदालत इतनी छोटी बच्ची के संन्यास को चुप बैठकर देखते नहीं रह सकती। उसी वक्त मानो इसके जवाब में गुजराती की एक पत्रिका ने जैन धर्म गुरुओं के लेखों का एक विशेषांक निकाला था जिसमें बाल दीक्षा की वकालत की गई थी। बाल दीक्षा विशेषांक में कई अदालतों के ऐसे आदेश अपने तर्क के रूप में छापे गए थे जिनमें अदालतों ने इस रीति-रिवाज का समर्थन किया था। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में यह कहा था कि दीक्षा को लेकर नियम बनाना धार्मिक मामलों में दखल देना होगा। इस अदालत ने बाल दीक्षा को हिंदुओं के जनेऊ संस्कार की तरह माना था। 

बच्चों को धार्मिक दीक्षा दिलाकर उन्हें अगर पारिवारिक जीवन से अलग कर दिया जाता है, और बाकी जिंदगी के लिए संन्यासी जीवन में डाल दिया जाता है, तो यह हमारे हिसाब से उन बच्चों के मानवीय अधिकारों का हनन है। किसी को भी बालिग होने के पहले ऐसे संन्यासी जीवन में डालना उन बच्चों के अपने हितों के खिलाफ है जिन्होंने अभी पूरी दुनिया नहीं देखी है, आगे की पूरी जिंदगी को लेकर जिनका कोई अंदाज नहीं है। अपने परिवार में धार्मिक वातावरण देखकर कई बच्चों का इस तरह का रूझान हो सकता है, लेकिन उससे उनका वह फैसला स्वाभाविक फैसला नहीं माना जा सकता। जिस तरह वोट देने की एक उम्र होती है, गाड़ी चलाने की एक उम्र होती है, सेक्स की सहमति देने की भी एक न्यूनतम उम्र सीमा तय की गई है, एक उम्र के पहले शादी पर कानूनी रोक है। इसी तरह किसी के संन्यास पर उसके बालिग होने तक रोक होनी चाहिए। हमारी सामान्य समझ यह कहती है कि किसी धर्म के लिए भी यह ठीक नहीं है कि वह इतने छोटे बच्चों को परिवारों से अलग करके संन्यासी बनाए। इंसान इसी तरह के सामाजिक प्राणी हैं कि उनका विकास परिवार और समाज के बीच कई तरह के अंतरसंबंधों के चलते होता है, और उन सबसे उन्हें काटकर सिर्फ संन्यास जीवन में रखना उनके अपने शारीरिक और मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास के लिए ठीक नहीं है। जिन बच्चों की धर्म में अधिक दिलचस्पी है, वे परिवार के भीतर रहते हुए भी धर्म को बेहतर हद तक समझ सकते हैं। इसके बाद जब वे बालिग हों, तो वे अपने परिपक्व विवेक का इस्तेमाल करके संन्यास ले सकते हैं।

जो लोग इसे एक धार्मिक रिवाज मानते हैं, और इसके लिए नियम बनाने को धर्म में दखल मानते हैं, उन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि एक वक्त हिंदू समाज में, और शायद कुछ दूसरे समाजों में भी बालविवाह प्रचलित थे, और उसके खिलाफ कड़े कानून बनाने, सामाजिक जागरूकता फैलाने, और सरकारी रोकथाम करने के बावजूद आजतक दस-बीस फीसदी शादियां  बालविवाह हो रही हैं। इसी तरह एक वक्त हिंदू धर्म में पति खो चुकी महिला को सामाजिक दबाव में सती बनाने की अमानवीय परंपरा थी, जिसे कड़ा कानून बनाकर किसी तरह रोका गया। आज भी मुस्लिमों के बीच नाबालिग लडक़ी की शादी को सामाजिक, और मुस्लिम विवाह कानून के तहत मंजूरी हासिल है, और इसके खिलाफ भी एक जनमत तैयार किया जा रहा है। जैन समाज को भी यह सोचना चाहिए कि अपरिपक्व उम्र में बच्चों का लिया गया फैसला इस समाज को बेहतर साधू-साध्वी नहीं दे सकता। अगर समाज को अपने धर्म को परिपक्व बनाकर रखना है, तो उसे कम उम्र बच्चों को संन्यास में भेजने का काम बंद करना होगा। यह तर्क किसी काम का नहीं है कि ये छोटे बच्चे अपनी मर्जी से संन्यास लेते हैं। इतने छोटे बच्चे अपनी मर्जी से पिकनिक पर भी नहीं जा सकते, कोई फिल्म देखने भी नहीं जा सकते, किसी दोस्त या सहेली के घर की दावत में भी नहीं जा सकते, इसलिए यह मान लेना निहायत गलत बात होगी कि वे संन्यास में जाने का फैसला लेने के काबिल हैं। जब परिवारों का माहौल बहुत अधिक धार्मिक होता है, जब परिवार ऐसी ही सामाजिकता के बीच जीता है, जब ऐसे बच्चों के सामने बार-बार ऐसी कहानियां आती हैं कि किस शहर में जैन समाज के किस उम्र के बच्चे या बच्ची ने संन्यास ले लिया है, तो उनकी बचपन की सोच उसी के असर से प्रभावित होने लगती है। ऐसे असर के बीच लिया गया कोई फैसला उन बच्चों का परिपक्व फैसला नहीं माना जा सकता। हमारा यह भी मानना है कि कोई भी धर्म बाल संन्यासियों से समृद्ध नहीं हो सकता, उसके लिए कम से कम बालिग हो चुके, सांसारिकता को देख चुके, और उसके बाद उसे छोडऩे का फैसला ले चुके संन्यासियों की जरूरत होती है। हिंदुस्तान का अदालती कानून धार्मिक मामलों से बचते हुए चलता है, लेकिन जैन समाज को किसी अदालत का इंतजार नहीं करना चाहिए, उसे खुद होकर ऐसा सुधारवादी कदम उठाना चाहिए कि सिर्फ वयस्क लोग ही संन्यास का फैसला ले सकें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 जनवरी 2023

 

(Daily Chhattisgarh)

केन्द्र और कोर्ट में अब आमने-सामने बातचीत

 20 जनवरी 2023

 

सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार के बीच का टकराव कल एक नई ऊंचाई पर पहुंच गया जब मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अपने छांटे गए जजों के नाम पर केन्द्र की आपत्ति को सार्वजनिक किया, और उसका सार्वजनिक रूप से जवाब भी दिया। केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू पिछले कुछ महीनों से लगातार एक या दूसरी वजह निकालकर सुप्रीम कोर्ट पर हमले कर रहे थे, और सुप्रीम कोर्ट ने उनसे जख्मी होने के बजाय सार्वजनिक रूप से उनका सामना करना तय किया। अदालत से मिली जानकारी के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने जजों के नाम तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बाकी सदस्यों से चार दिनों तक चर्चा करने के बाद यह फैसला लिया कि उसके भेजे नामों पर केन्द्र की आपत्ति को सार्वजनिक कर दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की आपत्ति में शामिल खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट को भी उजागर कर दिया। यह एक अभूतपूर्व कदम है, और मौजूदा सीजेआई के बाद जो सीजेआई बनेंगे, वे भी इस कॉलेजियम में शामिल थे, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट जजों के बीच एक व्यापक सहमति से की गई आपत्ति माना जाना चाहिए। 

केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के भेजे गए नामों पर लंबे समय तक बैठने की आदी रही है, और जिन नामों से वह सहमत नहीं रहती है, उन्हें अंतहीन समय तक रोकते रही है। पिछले कुछ दिनों में कानून मंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जजों को लिखा है कि जज छांटने वाले कॉलेजियम में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि भी रहना चाहिए। एक दूसरी बात यहां पर यह भी प्रासंगिक है कि देश के अलग-अलग बहुत से तबकों के जानकार लोग भी यह मानते हैं कि संविधान निर्माताओं की ऐसी कोई सोच नहीं थी कि जजों को छांटने का काम जज ही करें। इस पर केन्द्र सरकार से परे भी कई लोग लिखते और बोलते आए हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जज छांटने के लिए कॉलेजियम की जो व्यवस्था खुद तय कर ली है, वह संविधान की भावना के अनुकूल नहीं है, और इसके लिए कोई दूसरी व्यवस्था होनी चाहिए। इसलिए केन्द्रीय कानून मंत्री की यह ताजा मांग बहुत अटपटी, अनोखी, और अभूतपूर्व नहीं है। लेकिन पिछले काफी समय से केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो तनातनी चल रही है, उसे देखते हुए कल का सुप्रीम कोर्ट का जनता की अदालत में जाने का फैसला पूरी तरह से अनोखा और अभूतपूर्व है। खासकर दिल्ली हाईकोर्ट के लिए एक वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल के नाम को कॉलेजियम ने डेढ़ बरस से भी पहले केन्द्र सरकार को भेजा था, और केन्द्र ने इस नाम पर इसलिए आपत्ति की थी कि सौरभ कृपाल एक स्वघोषित समलैंगिक हैं, और उनका साथी स्विस नागरिक है। केन्द्र की इस आपत्ति पर कॉलेजियम ने कल सार्वजनिक रूप से कहा कि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि जज-उम्मीदवार का साथी जो स्विस नागरिक है, हमारे देश के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करेगा क्योंकि उसका मूल देश भारत का एक मित्रराष्ट्र है। कॉलेजियम ने केन्द्र सरकार को यह भी याद दिलाया कि संवैधानिक पदों पर मौजूदा और पिछले कई ऐसे लोग रहे हैं जिनके पति-पत्नी विदेशी नागरिक थे, और हैं। 

हम इस बहस के सार्वजनिक होने के पहलू को लेकर खुश हैं। हम बार-बार इसी जगह जजों की नियुक्ति के लिए अमरीकी व्यवस्था का हवाला देते आए हैं जिसमें वहां के सुप्रीम कोर्ट के लिए अमरीकी राष्ट्रपति अपनी पसंद से जज छांटते हैं, लेकिन फिर ऐसे उम्मीदवारों को संसद की एक समिति के सामने लंबी खुली सुनवाई का सामना करना पड़ता है जिसमें उनकी पिछली जिंदगी, पिछले काम, पिछली और मौजूदा सोच, ऐसे हर पहलू पर सवालों का सामना करना पड़ता है, और जवाब देना पड़ता है। इसके बाद संसदीय कमेटी ही ऐसे उम्मीदवार को जज बनाना पसंद या नापसंद करती है। यह खुली सुनवाई अमरीकी टीवी पर भी आती है, और वहां की जनता को यह अच्छी तरह मालूम रहता है कि अगर इस व्यक्ति को जज बनाया गया तो उनकी सोच क्या रहेगी, उनके पहले के फैसले कैसे रहे हैं, वे गर्भपात से लेकर महिला अधिकारों और रंगभेद के मुद्दों पर क्या सोचते रहे हैं। जनता को जजों के इतिहास और उनकी सोच के बारे में सब पता रहे, यह एक अधिक पारदर्शी व्यवस्था है। इस हिसाब से हम सुप्रीम कोर्ट के इस अभूतपूर्व फैसले से सहमत हैं कि जजों के बारे में कॉलेजियम और केन्द्र के बीच जो कुछ चर्चा होती है, वह देश की जनता के सामने रखी जानी चाहिए। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ हफ्ते पहले ही ठीक यही सिफारिश की थी कि इन बातों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। 

देश में सूचना का अधिकार लागू है। इसके तहत जनता सरकार और सार्वजनिक संस्थाओं से कई किस्म की जानकारी मांग सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने आपको इसकी पहुंच से भी बहुत हद तक बाहर रखा था, इसलिए जनता अदालतों के रहस्य से दूर ही रह जाती है। अब यह वक्त आ गया है कि देश में सूचना पाने के अधिकार को बदलकर सूचना देने की जिम्मेदारी बनाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को भी जनता को यह बताना चाहिए कि किन लोगों के नाम जज बनाने के लिए किस वजह से छांटे गए हैं, और सरकार को भी यह बताना चाहिए कि उसे इनमें से कौन से नाम किस वजह से नामंजूर हैं। इसे कॉलेजियम के एकाधिकार और केन्द्र सरकार के एकाधिकार के खोल से ढांककर नहीं रखना चाहिए। केन्द्र सरकार आज यह मांग कर रही है कि कॉलेजियम में उसका प्रतिनिधि भी होना चाहिए। हमारा मानना है कि जजों के नाम तय करने में सरकार के बजाय संसद का प्रतिनिधि होना बेहतर होगा, और जिस तरह सीबीआई के डायरेक्टर, और कुछ दूसरे लोगों को चुनने के लिए प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता एक कमेटी में होते हैं, उसी तरह संसद की एक कमेटी होनी चाहिए जिसकी कि जजों के चयन में हिस्सेदारी हो। अब हमारी यह भावना किस तरह अमल में आ सकती है, इसके लिए एक संवैधानिक व्यवस्था जरूरी होगी, और देखना होगा कि यह नौबत कैसे लाई जा सकती है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सत्ता को छोडक़र यूं चले जाना तो हिन्दुस्तानियों की बड़ी बेइज्जती करना है...

  19 जनवरी 2023

 

हिन्दुस्तान का वैसे तो न्यूजीलैंड से कुछ अधिक लेना-देना नहीं है, लेकिन आज की वहां की एक खबर कुछ सोचने, और उस पर लिखने का मौका दे रही है जो कि हिन्दी और हिन्दुस्तानी पाठकों की दिलचस्पी का भी हो सकता है। वहां की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने कहा है कि वे 7 फरवरी के पहले इस्तीफा दे देंगी। उनका कहना है कि वे 6 साल तक इस चुनौतीपूर्ण ओहदे को सम्हालने के बाद अब महसूस करती हैं कि उनके पास योगदान देने के लिए कुछ खास नहीं बचा है, इसलिए वे अगला चुनाव भी नहीं लड़ेंगीं। वे 2017 में ही 37 साल की उम्र में दुनिया की सबसे कम उम्र की महिला प्रधानमंत्री बनी थीं। और अब 42 बरस की उम्र में वे एक कार्यकाल खत्म करके सरकार से हट भी जा रही हैं। 

हिन्दुस्तान के लोगों को यह बात बड़ी अजीब लग सकती है। यहां पर 75 बरस की उम्र पार करने के बाद अगर किसी को संसद या विधानसभा का चुनाव लडऩे से रोका जाता है, तो वे हाथ में थमी छड़ी को उठाकर बगावत पर उतारू हो जाते हैं, खुद तो चुनाव लड़ ही लेते हैं, अपने कुनबे को भी बगावत में उतार देते हैं। पार्टियां भी सयान के ऐसे तेवरों से बचने के लिए उनके जीते जी ही उनके कुनबे को उनकी सीट पर टिकट देने का समझौता कर लेती हैं। कुल मिलाकर एक नेता एक सीट पर अपने कुनबे का पीढ़ी-दर-पीढ़ी कब्जा मानकर चलते हैं। फिर अगर राजनीति में कुनबापरस्ती है, तो फिर लालू, मुलायम, सोनिया, फारूख, मेहबूबा, बादल, चौटाला, पवार, ठाकरे, शुक्ल परिवारों के एक से अधिक लोग भी एक समय सांसद-विधायक हो सकते हैं, एक से अधिक सरकारों में हिस्सेदार हो सकते हैं, संसद, विधानसभा, और पार्टी संगठन सब पर काबिज हो सकते हैं। फिर यह भी है कि वे मरने तक सत्ता पर काबिज रहते हैं, और उनके बाद अगली पीढ़ी चिता की आग से तपी हुई ही शपथ ले लेती है। इसलिए न्यूजीलैंड की इस नौजवान प्रधानमंत्री की बात भारत के बहुत से लोगों को बेइज्जत करने वाले आईने की तरह लग सकती है जिसमें वे सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग से होते हुए कलियुग तक अपने कुनबे के लिए सीट की गारंटी कर लेते हैं। 

न्यूजीलैंड के इस ताजा फैसले से हिन्दुस्तान के बारे में यह भी सीखने और समझने मिलता है कि एक नौजवान प्रधानमंत्री कुल 6 बरस काम करने के बाद अगर यह पाती है कि उसके पास और अधिक योगदान देने को कुछ नहीं है, तो वह अपनी पार्टी के दूसरे नेता के लिए कुर्सी खाली करके हट जाती है। और यह महिला किसी कुनबापरस्ती के चलते इस जगह नहीं पहुंची थी, उसने योरप के समाजवादी आंदोलन में 17 बरस की उम्र से काम करना शुरू कर दिया था, और राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेने लगी थी। एक बहुत लंबे और बहुत सक्रिय राजनीतिक जीवन के बाद वह पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री के ओहदे के लिए चुनी गई थी। और उसने इराक पर हमले के फैसले को लेकर 2003 के ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर से रूबरू कड़े सवाल किए थे। ऐसे सक्रिय जीवन और सब कुछ अपने बूते हासिल करने के बाद एक महिला अपने देश के इस सबसे बड़े ओहदे को छोडक़र जिस आसानी से, जिस स्वाभाविक तरीके से चली जा रही है, वह सीखने लायक बात है। हिन्दुस्तान में लोग अपनी पार्टी को बेच खाते हैं, पार्टी के सांसदों और विधायकों की थोक पैकिंग बनाकर उसे दुश्मन पार्टी के हाथ बेच देते हैं, और कुर्सी पर बने रहते हैं, या पहुंच जाते हैं। कुर्सी ही हिन्दुस्तान में सब कुछ है, वह महज कामयाबी नहीं है, वही महानता भी है। जिसे कुर्सी हासिल नहीं हुई, उसे कभी महान का दर्जा नहीं मिल सकता, और जिसे कुर्सी हासिल हो गई, वह हजार जुर्म, और हजार नाकामयाबी के बाद भी महान गिनाते हैं। 

यह बात तो निर्वाचित नेताओं को लेकर है, लेकिन लोग अपने राजनीतिक संगठन के भीतर भी कोई कुर्सी छोडऩा नहीं चाहते। अपने चुनाव क्षेत्र को अपनी जागीर मानकर चलते हैं, अपने साथ-साथ धीरे-धीरे जीवनसाथी और आल-औलाद, और बहू-दामाद, सबको संसद-विधानसभा, और पार्टी में घुसाने में लगे रहते हैं। मरने के बाद भी वे अपने कुनबे से किसी को अनुकम्पा टिकट दिलाने में कामयाब हो जाते हैं। यह बात तो राजनीति के लोगों की हुई, लेकिन हिन्दुस्तान में गौशाला, अनाथाश्रम, शिक्षा समिति और दूसरे किस्म के ट्रस्ट या सभा समितियों में लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी काबिज रहते हैं, सरकारी अनुदान पर पलते हैं, और वह अनुदान मानो उनके डीएनए को मिला हो। वे संस्थाओं की ‘समाजसेवा’ में इतने समर्पित रहते हैं कि धरती पर कोई और काबिल इंसान उन्हें दिखते ही नहीं। ऐसे देश में मोटी कमाई वाली राजनीतिक और सरकारी कुर्सियों के लिए लोग पंचतत्व में विलीन हो जाने के बाद भी, कब्र में दफन हो जाने के बाद भी ‘सेवा’ करने पर आमादा रहते हैं। ऐसे तमाम लोगों को न्यूजीलैंड की 42 बरस की भूतपूर्व प्रधानमंत्री बेइज्जती का सामान ही लग सकती है। 

भारत में न सिर्फ राजनीति में, बल्कि अदालतों में जजों के बीच भी, वकालत और डॉक्टरी जैसे पेशों में भी, और कारखानों से लेकर कारोबार तक कुनबापरस्ती का जो बोलबाला है, और लोग जिस तरह पहले कब्जे के बाद अंतिम संस्कार तक काबिज रहते हैं, उसे देखते हुए यह सोचने की जरूरत है कि क्या वे सचमुच मरने तक योगदान देने की हालत में रहते हैं, और क्या उनका डीएनए ही सामाजिक संगठनों को चलाने के लिए सबसे हुनरमंद डीएनए है? हिन्दुस्तान के लोगों को अपने इर्द-गिर्द देखना और सोचना चाहिए, आज की यह चर्चा बस इसी मकसद से है।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 17 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

कड़े कानून कड़ी नीयत ही नहीं बताते, वे बचने की बड़ी कोशिश भी बताते हैं

  17 जनवरी 2023

 

सभ्य दुनिया वह होती है जो एक-दूसरे से कुछ सीखने को तैयार रहती है। अलग-अलग बहुत से देशों में किसी एक चर्चित जुर्म के बाद कानून बनाने वाली संसद या विधानसभा के सामने यह बड़ा तनाव खड़ा हो जाता है कि वोटरों से भरे समाज को संतुष्ट कैसे किया जाए। ऐसे में जुर्म को सुलझाने, मुजरिमों को पकडऩे, और अदालत में सजा दिलवाने में कामयाबी का काम आसान नहीं रहता है, और बहुत से मामलों में मुमकिन भी नहीं रहता है। ऐसे में निर्वाचन से संसद और विधानसभा तक पहुंचने वाले नेताओं के लिए सबसे सहूलियत का काम रहता है कि बेअसर कानून, बेअसर इंतजाम को छुपाने के लिए उसके सामने और कड़े कानून की एक दीवार खड़ी कर दी जाए। जिस तरह परदेसी मेहमानों की नजरों से छुपाने के लिए अहमदाबाद और इंदौर में गरीब बस्तियों के सामने दीवारें खड़ी कर दी गई थीं, ताकि संपन्न मेहमानों को यहां के गरीब न दिखें, ठीक उसी तरह एक नाकामयाब प्रशासन के सामने अधिक कड़े कानून की दीवार खड़ी कर दी जाती है। हिन्दुस्तान में निर्भया नाम से चर्चित बलात्कार और भयानक हिंसा के एक मामले के बाद देश भर में उठ खड़े हुए जनआक्रोश को देखते हुए अलग से कानून बनाया गया, और कई राज्यों में सामूहिक बलात्कार या बच्चों से बलात्कार पर मौत की सजा जोड़ दी। इससे नेताओं और राजनीतिक दलों को अपनी सरकारों की नाकामयाबी की तरफ से ध्यान मोडऩे की एक तरकीब मिली, और आम लोगों को ऐसा लगा कि इससे बलात्कार थम जाएंगे। सच तो यह है कि उसके बाद से बलात्कार के साथ हत्याएं अधिक होते दिख रही हैं क्योंकि जब बलात्कार पर भी सजा उतने ही मिलनी है जितनी कि कत्ल से मिलनी है, तो फिर एक गवाह और सुबूत को छुपा क्यों न दिया जाए? 

अभी धरती के दूसरे सिरे, अमरीका में एक मामला हुआ जिससे वहां के कानून की बेइंसाफी का इतिहास सामने आया। खुद अमरीका में तो यह कभी इतिहास बना ही नहीं था क्योंकि एक नाजायज कड़ा कानून बनाकर जुर्म रोकने की यह कोशिश वहां तो हमेशा चर्चा में थी, लेकिन हमारे सरीखे दूर बैठे हुए लोगों को इसके बारे में मालूम नहीं था। अभी वहां की जेल से 20 बरस कैद के बाद 55 बरस के एक आदमी को जब रिहा किया गया, तो वहां के एक कानून की बेइंसाफी फिर खबरों और चर्चा में आई। वैसे तो कैलिफोर्निया अमरीका का सबसे प्रगतिशील और उदार राज्य माना जाता है, लेकिन वहां 1990 के दशक में 12 बरस की एक बच्ची का अपहरण हुआ था, और उसका कत्ल कर दिया गया था। उस वारदात को लेकर न सिर्फ इस अमरीकी राज्य में, बल्कि पूरे देश में जुर्म की दहशत फैल गई थी, और कैलिफोर्निया में तीसरे जुर्म (थ्री स्ट्राइक्स) नाम का एक कुख्यात कानून बनाया था जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को किसी अहिंसक तीन अपराधों पर भी उम्रकैद सुनाई जा सकती थी। अगर वे किसी दुकान में सामान चुराते पकड़ा गए, या उनके पास कोई नशा मिल गया, या उन्होंने कोई उठाईगीरी कर दी, तो ऐसा तीसरा जुर्म साबित होते ही उन्हें उम्रकैद की सजा देने का कानून बनाया गया। एक अपहरण और कत्ल से फैली दहशत से जूझती हुई राज्य और संघीय सरकारों के सामने जनता को संतुष्ट करने की एक चुनौती थी, और उस वक्त के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भी इस कानून को मंजूरी दे दी थी। करीब आधे अमरीकी राज्यों ने इस कानून को अपना लिया था। ऐसे ही कानून के तहत कैलिफोर्निया में एक बेघर, बेरोजगार नौजवान डेविड को जब एक घर के गैरेज से कुछ सिक्के चुराने पर गिरफ्तार किया गया, तो उसके पास से 14 डॉलर (हिन्दुस्तान के स्तर से 14 रूपये के बराबर) मिले थे, और पहले के दो अहिंसक जुर्म के साथ इस ताजा जुर्म को जोडक़र जज ने उसे 35 बरस या उम्रकैद की सजा सुनाई थी। दरअसल 1994 में जब यह थ्री स्ट्राइक्स कानून बना था, तब इस राज्य में दस बरस के भीतर छोटे-छोटे तीसरे जुर्म पर करीब 35 सौ लोगों को उम्रकैद सुना दी गई थी, और वे मरने के लिए जेल भेज दिए गए थे। डेविड को 14 डॉलर चुराने के जुर्म में उम्रकैद भी दी गई थी, और 10 हजार डॉलर का जुर्माना भी सुनाया गया था। वह अफ्रीकी मूल का एक बेघर बेरोजगार था, जिसने इतनी रकम अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखी थी। वह बचपन से परिवार और जगह बदलते जाने का शिकार था, और गरीबी के चलते वह किसी काम के लायक भी नहीं बन पाया था, और राह से भटक गया था। बहुत बाद में जाकर 2012 में अमरीका ने यह पाया कि इस तरह की सजा नाजायज है, और फिर ऐसे कैदियों के मामलों को देखकर उनमें से कुछ को छोडऩा शुरू किया गया, और उसी के तहत 20 बरस की कैद के बाद डेविड रिहा किया गया, और उसका परिवार उसके स्वागत को बांहें फैलाए तैयार था।

अमरीका के इस कानून को लेकर सामाजिक इंसाफ और समानता पर भरोसा रखने वाले लोगों को कभी भरोसा नहीं रहा। उन्होंने यह माना कि इसकी सबसे बुरी मार उन लोगों पर पड़ी जो कि सामाजिक गैरबराबरी के शिकार थे। कैलिफोर्निया में इस कानून के तहत उम्रकैद पाने वाले लोगों में अधिकतर लोग गरीब थे, काले थे, दूसरे अश्वेत थे, और हालात के मारे हुए लोग थे। कानून ही ऐसा था कि बहुत मामूली से अहिंसक जुर्म के लिए भी गरीबों को पूरी जिंदगी के लिए जेल में डाल दिया जा रहा था। अमरीका के इन मामलों को देखकर हिन्दुस्तान के बारे में सोचें, तो यहां पर दलित-आदिवासी, गरीब, मुस्लिम अल्पसंख्यक तबकों के लोग ही जेलों को भरे हुए हैं। उनकी गरीबी और सामाजिक हालत उन्हें जुर्म की ओर मोड़ भी देती है, और हिन्दुस्तान की महंगी और मुश्किल अदालतें उन्हें इंसाफ पाने का अधिक मौका भी नहीं देती हैं। नतीजा यह होता है कि वे फैसले के इंतजार में ही संभावित सजा से अधिक वक्त जेल में गुजार देते हैं। और जैसा कि अमरीका के इस कानून का तजुर्बा रहा है कि इसकी वजह से कहीं जुर्म कम नहीं हुआ, जबकि इस कड़े कानून को बनाने का सबसे बड़ा मकसद ही जुर्म में कमी लाना था। इसी तरह हिन्दुस्तान में बलात्कार पर मौत की सजा से बलात्कार में कोई कमी हुई हो ऐसा नहीं दिख रहा है, बल्कि बलात्कार के बाद हत्या अधिक सुनाई दे रही है। अब अमरीका में लोग खुलकर यह मान रहे हैं कि एक अपहरण और कत्ल से फैली दहशत कम करने के लिए निर्वाचित सरकारों ने इस तरह का कड़ा कानून बनाया था, और यह कि निर्वाचित लोगों के बनाए सारे कानून जायज नहीं होते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

आईआईटी के मन में तुलसी के प्रति अपार सम्मान जारी है

  16 जनवरी 2023

 

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस को लेकर छिड़ी ताजा बहस में दलितों का मुद्दा भी सामने आ रहा है कि किस तरह उन्होंने शूद्रों को प्रताडऩा (ताडऩ या पिटाई) का हकदार लिखा था। अब वह बहस तो बहुत से और लोग आगे बढ़ा रहे हैं, हम भी कल इसी पेज पर उस बारे में लिखा है, लेकिन आज हिन्दुस्तान के शूद्रों के बारे में। विख्यात अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका नेचर ने अभी दुनिया के कुछ देशों के बारे में रिपोर्ट छापी है कि किस तरह वहां पर विशेष दर्जे के लोग प्रमुख विश्वविद्यालयों में अधिकतर सीटों पर काबिज हो जाते हैं। दुनिया के कुछ और देशों के बारे में भी इसमें है, और साथ-साथ हिन्दुस्तान के बारे में भी इसमें एक रिपोर्ट है। भारत में दलित और आदिवासी सबसे ही पिछड़े हुए तबके हैं, और रिजर्वेशन के बावजूद उनकी हालत आज कैसी है, यह इन आंकड़ों से दिखाई पड़ता है। इस पत्रिका की रिपोर्ट बताती है कि देश भर के विश्वविद्यालयों में अगर ग्रेजुएशन तक की गिनती देखें, तो आदिवासी छात्र-छात्राओं की सीटें आधी भी नहीं भरी हैं। इसके बाद देश के आईआईटी में देखें, तो वहां आदिवासी कोटा पीएचडी छात्रों में शायद चौथाई के करीब भरा है, वहां असिस्टेंट प्रोफेसर इस तबके की आरक्षित कुर्सियों पर दो-चार फीसदी ही हैं, और प्रोफेसर हंै ही नहीं। इस पत्रिका में प्रकाशित चार्ट देखकर हम अंदाज से इन आंकड़ों को देख रहे हैं। देश भर में दलित छात्रों की आरक्षित सीटों से अधिक छात्र-छात्राएं ग्रेजुएशन तक हंै। आईआईटी में पीएचडी छात्रों में भी दलितों की संख्या आरक्षित कोटे से कुछ अधिक है। लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसर आरक्षित कोटे से करीब एक तिहाई ही हैं, एसोसिएट प्रोफेसर और भी कम हैं, और प्रोफेसर गिनती के हैं। जब देश में हर तरह के छात्र-छात्राओं और प्राध्यापकों को मिला लिया जाए, तो दलित और आदिवासी अपने निर्धारित कोटे से बहुत ही कम हैं, ओबीसी में भी ग्रेजुएशन के छात्रों को छोडक़र बाकी की हालत यही है। लेकिन अनारक्षित वर्ग के प्राध्यापक लगभग सौ फीसदी सीटों पर काबिज हैं, एसोसिएट प्रोफेसर की 90-95 फीसदी सीटों पर अनारक्षित वर्ग के लोग हैं, और सहायक प्राध्यापक की कुर्सियों पर भी 90 फीसदी से अधिक सामान्य वर्ग के लोग हैं। ये सारे आंकड़े 2019-20 तक के हैं, और ये सरकार और आईआईटी जैसे संस्थानों से लिए गए हैं। इस रिपोर्ट के आंकड़े सब कुछ कह रहे हैं, इसलिए हम अपनी अधिक टिप्पणियों के बिना भी इन आंकड़ों को लिखते चले जा रहे हैं। भारत के सबसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थान, आईआईटी में प्रोफेसरों की कुर्सियों पर दलित-आदिवासी तबकों के एक फीसदी से कम प्रोफेसर हैं। इस बारे में इस पत्रिका से एक रिटायर्ड दलित वरिष्ठ प्राध्यापक ने कहा कि यह सोची-समझी नौबत है, वे लोग हम लोगों को कामयाब नहीं होने देना चाहते। ये उच्च शिक्षा संस्थान आरक्षण के नियम नहीं मान रहे, और सरकारें इन पर कुछ नहीं कर रहीं। कुछ प्राध्यापकों का मानना है कि अगर आरक्षित तबकों को उनका जायज हक दिलाना है, तो ऐसे बड़े इंस्टीट्यूट के डायरेक्टरों को जब तक सजा नहीं दी जाएगी, तब तक वंचित तबकों को उनका हक नहीं मिलेगा। 

इस रिपोर्ट के आगे के आंकड़े भी दिलचस्प हैं कि देश भर के विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन में दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं की गिनती उनके वर्गों के आरक्षण से कुछ अधिक दिखती है, लेकिन जब बारीकी से देखें तो यह दिखता है कि यह सिर्फ आर्टस् के विषयों में है, दूसरी तरफ इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, और टेक्नालॉजी में आदिवासी सीटें खाली पड़ी हैं, और यही हाल दलितों में भी है। मतलब यह है कि गांवों से निकलकर आने वाले दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को विज्ञान की अच्छी पढ़ाई नहीं मिलती है, इसलिए वे कॉलेज पहुंचकर भी आर्टस् के विषय लेकर पढ़ते हैं। इनके मुकाबले ओबीसी की हालत कुछ बेहतर है जो कि अपने आरक्षित कोटे से अधिक सीटों पर हैं, लेकिन उनकी आबादी शायद सीटों के इस अनुपात से और अधिक मानी जाती है। 

तुलसीदास का शूद्रों को लेकर जो लिखा हुआ है, वह आज भी हिन्दू धर्म और समाज के अधिकतर हिस्सों में चले आ रहा नजरिया बना हुआ है। वो जिन तबकों को पिटाई के लायक पाते हैं, उन तबकों की आज भी देश भर में जमकर पिटाई हो रही है। वीडियो-कैमरों के सामने महिलाएं भी पीटी जा रही हैं, दलित तो पीटे ही जा रहे हैं, इनके मुकाबले जानवरों की हालत बेहतर है क्योंकि पशु प्रताडऩा के खिलाफ कड़ा कानून बन गया है। तुलसीदास ने ऐसी बातें लिखते समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि अनपढ़ लोगों के बीच भी मशहूर उनकी रामचरितमानस की उनकी सोच 21वीं सदी में देश की दिग्गज आईआईटी में अमल में आती रहेगी। हिन्दुत्ववादी लोगों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि दूसरे धर्म के लोगों के मुकाबले अपनी अधिक आबादी गिनाने के लिए तो वे दलित और आदिवासी तबकों को हिन्दू समुदाय में गिन लेते हैं, लेकिन जैसे ही दूसरे धर्मों के साथ कोई तुलना बंद होती है, तो घर के भीतर वे दलित-आदिवासी तबकों को मारने के लिए अपने चमड़े के बेल्ट उतार लेते हैं, इन तबकों के खानपान से लेकर इनके कामकाज तक को कुचलने की कोशिश करते हैं, और उन्हें एक सवर्ण जीवनशैली का गुलाम बनाने में जुट जाते हैं। यह पाखंड ही लोगों को, दलितों और आदिवासियों को कभी बौद्ध धर्म की तरफ ले जाता है, तो कभी ईसाई धर्म की तरफ। और फिर ऐसे एक-एक मामले को लेकर वे धर्मांतरण का हल्ला बोलने लगते हैं, और जब ऐसा हल्ला बोलने का मौका नहीं मिलता, तो फिर वे अपने घर के भीतर वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे वाले दलित-आदिवासियों को कूटने में लग जाते हैं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि तुलसी की रामकथा के वानर कौन थे? क्या वे जंगलों में बसे हुए आदिवासी ही नहीं थे जो कि वहां से गुजरते हुए राम के साथ हो गए थे, और जिन्हें सवर्ण, शहरी कथाकारों की कल्पना में वनवासी आदिवासी की जगह बंदर का रूप दे दिया गया था? आज कम से कम यह तो अच्छा हुआ कि बिहार के एक मंत्री ने रामचरितमानस को नफरत फैलाने वाला ग्रंथ करार दिया, तो रामचरितमानस के बचाव में, और उसके खिलाफ लोग टूट पड़े हैं, और ‘वानरों’ से लेकर दलितों तक का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है। 

(Daily Chhattisgarh)