दीवारों पर लिक्खा है, 27 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

अफसरी बंगलों पर मातहत कर्मचारियों की बेहिसाब तैनाती के खिलाफ जंग छिड़े

 27 जनवरी 2023


मध्यप्रदेश में डीआईजी स्तर की एक आईपीएस और उसके आईएएस पति के सरकारी बंगले पर तैनात सिपाहियों को लेकर एक प्रमुख अखबार भास्कर ने एक रिपोर्ट की तो यह पता लगा वहां 44 सिपाही सेवा में लगे हुए हैं। ये सिपाही वहां खाना पकाते, झाड़ू-पोंछा करते हैं, कपड़े धोते हैं, माली का काम करते हैं, और चौकीदारी करते हैं। अखबार का हिसाब है कि इन सिपाहियों को हर महीने 27 लाख रूपए से ज्यादा का भुगतान किया जा रहा है। सिर्फ खाना बनाने के लिए यहां 12 सिपाही तैनात हैं। यह हाल मध्यप्रदेश में तब है जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बंगलों पर सिपाहियों की ड्यूटी के खिलाफ नाराजगी दिखाई थी। इस अफसर जोड़े के बंगले पर आईएएस पति के विभाग के 12 कर्मचारी भी तैनात हैं। 

इन दो अफसरों को कुल मिलाकर पांच लाख रूपए महीने के आसपास तनख्वाह मिलती होगी, लेकिन इनके बंगलों पर तैनात सरकारी कर्मचारियों पर 30 लाख रूपए महीने खर्च हो रहे हैं। यह नौबत अकेले मध्यप्रदेश में नहीं है, उसका हिस्सा रह चुके छत्तीसगढ़ में यही हाल है। एक-एक अफसर के बंगले पर दर्जनों कर्मचारी तैनात हैं, और वे अमानवीय स्थितियों में काम कर रहे हैं। अभी कुछ समय पहले ही ऐसे एक बंगले पर तैनात एक बटालियन के सिपाही ने अफसर के लगातार चल रहे जुल्मों से थककर उसे एक थप्पड़ मारी, और बताया कि वह किस आरक्षित जाति का है, और वह अफसर उसका जो बिगाड़ सकता है बिगाड़ ले, वह खुद ही थाने जाकर एसटी-एससी एक्ट में उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखा रहा है। इसके बाद किसी तरह कई अफसरों ने मिलकर दौड़-भाग करके उस जवान को मनाया, और उसे बस्तर में तैनात उसकी बटालियन वापिस भेजा गया। एक दूसरे बहुत बड़े सवर्ण रिटायर्ड अफसर के बंगले पर दर्जनों कर्मचारी तैनात हैं, और उनमें से जो बंगले के भीतर काम करते हैं, उन्हें आकर नहाकर भीतर जाना पड़ता है। खाना पकाने वाले कर्मचारियों को नहाकर बंगले के धोती-कुर्ते में किचन में जाना पड़ता है, और खाना बनाना पड़ता है। अब एक सवर्ण अफसर को एक एसटी-एससी सिपाही के थप्पड़ के बाद भी अगर बाकी लोगों को खतरा समझ नहीं आ रहा है, तो छोटे कर्मचारियों के साथ ऐसा अमानवीय बर्ताव पुलिस कर्मचारियों के परिवारों के आंदोलन के लिए एक पर्याप्त वजह होनी चाहिए। 

जब लोग पुलिस में भर्ती होते हैं, तो वे ऐसे अमानवीय बर्ताव के लिए नहीं आते हैं। सिपाहियों के साथ जब ऐसा बर्ताव होता है, तो मुजरिमों पर कार्रवाई करने का उनका मनोबल भी टूट जाता है, और वे अपने परिवार के बीच भी सिर उठाकर नहीं जी पाते हैं। विभाग के दूसरे कर्मचारियों के बीच भी वे मखौल का सामान बन जाते हैं, और काम के इस तरह के हालात उनके बुनियादी मानवाधिकार के भी खिलाफ हैं। न सिर्फ सरकार को अपने अमले की ऐसी बर्बादी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि मानवाधिकार आयोग जैसी संस्था को भी खुद होकर हर अफसर से हलफनामा लेना चाहिए कि उनके बंगले पर कौन-कौन लोग काम कर रहे हैं, वे किस-किस विभाग से आए हुए हैं। अब ऐसा तभी हो सकेगा जब मानवाधिकार आयोग जैसी संस्था के अध्यक्ष या सदस्यों के घरों पर इसी तरह से सिपाही या दूसरे कर्मचारी तैनात नहीं होंगे। अगर जजों के बंगलों पर भी यही हाल रहेगा, तो फिर कर्मचारियों के ऐसे बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कोई पिटीशन लगाने का भी कोई फायदा नहीं होगा। 

यह पूरा सिलसिला बहुत ही अलोकतांत्रिक और अमानवीय है। यह इंसानों को गुलामों की तरह इस्तेमाल करने का है, और अपनी तनख्वाह से दस-बीस गुना बर्बादी कर्मचारियों की तैनाती की शक्ल में करने का भी है। अब सवाल यह उठता है कि जब तमाम अफसर, रिटायर्ड अफसर, मंत्री, और दूसरे नेता, सभी लोग ऐसी गुलामी-प्रथा का मजा ले रहे हैं, तो कार्रवाई कौन करे? यहां पर पुलिस कर्मचारियों के परिवारों को चाहिए कि इसी एक मुद्दे को लेकर वे जमकर आंदोलन छेड़ें, मीडिया में जाएं, अदालतों में जाएं, तरह-तरह की वीडियो रिकॉर्डिंग जुटाएं, और नेता-अफसर सबका भांडाफोड़ करें। ऐसा लगता है कि अंग्रेज अफसरों के घर पर भी कर्मचारियों की इतनी बड़ी भीड़ नहीं रहती होगी। भोपाल में जिस अखबार के भांडाफोड़ से यह गिनती सामने आई है, वैसे तमाम कर्मचारियों से हलफनामे लेने चाहिए कि वे कहां काम कर रहे थे। उन्हें तैनात करने वाले अफसरों से भी हलफनामे लेने चाहिए कि उन्होंने किस आधार पर कर्मचारियों को किसी बंगले पर भेजा था। हिन्दुस्तान एक गरीब देश है, लेकिन आजादी की पौन सदी बाद भी आज के अफसर अंग्रेज बहादुर की तरह राज कर रहे हैं, और यह सिलसिला सामाजिक दखल से भी खत्म करना चाहिए। जनसंगठनों और राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे छोटे-छोटे बेजुबान कर्मचारियों को गुलामी से आजाद कराने के लिए एक सामाजिक आंदोलन छेड़ें, और ऐसे बंगलों के सामने खड़े रहकर आने-जाने वाले कर्मचारियों की रिकॉर्डिंग करें, और बंगलों पर काबिज लोगों का जीना हराम करें। 

बहुत से अफसरों के परिवार कर्मचारियों के साथ तरह-तरह की बदसलूकी करते हैं। कई जगहों पर वर्दीधारी कर्मचारियों को साहबों के बच्चों का पखाना धोना पड़ता है, और उनके जानवरों को नहलाना भी पड़ता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और एक लोकतांत्रिक समाज में ऐसे सामंती सिलसिले की कोई जगह नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ में भी लोगों को आरटीआई के माध्यम से, या बंगलों की निगरानी करके कर्मचारियों के नाम जुटाने चाहिए। विधानसभा के सदस्य अगर खुद इस तरह का बेजा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें वहां ये सवाल उठाने चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

 

अदालतें बेअसर होने से अलोकतांत्रिक कानून भी अब खटकना बंद हो गए

  25 जनवरी 2023


छत्तीसगढ़ के कोरबा में कल एक आदतन मुजरिम को जिलाबदर किया गया। उसे एक साल के लिए कोरबा जिले से बाहर रहने को कहा गया है। गोपू पांडेय नाम के इस नौजवान के खिलाफ बहुत से हिंसक मामले दर्ज थे, और पुलिस की कार्रवाई का कोई असर न देखते हुए उसे चौबीस घंटे के भीतर जिला छोड़ देने को कहा गया। इसके साथ ही उसे कोरबा से लगे हुए जिलों, बिलासपुर, जांजगीर-चाम्पा, सक्ती, रायगढ़, सरगुजा, सूरजपुर, कोरिया, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, और गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिलों से भी एक साल के लिए बाहर चले जाने के लिए कहा गया। ऐसे जिलाबदर के मामले जिला पुलिस की बनाई गई फाईल के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट के हुक्म से पूरे होते हैं। जिलाबदर के मामले कम होते हैं, और ऐसे ही आदतन गुंडे-बदमाश, मुजरिम के खिलाफ होते हैं जो कि पुलिस की आम कार्रवाई से काबू में नहीं आ रहे हैं। 

अंग्रेजों के वक्त का बना हुआ जिलाबदर कानून आजाद हिन्दुस्तान के मानवाधिकार के किसी पैमाने को देखते हुए नहीं बना था। किसी को पूरे एक बरस के लिए उसके जिले, और आसपास के तमाम जिलों के बाहर भेज देने का मतलब उसके लिए जिंदा रहने की एक चुनौती भी खड़ी कर देना है, क्योंकि अगर वह ऐसा ही आदतन मुजरिम या गुंडा-बदमाश है, तो उसके लिए बाहर जाकर कोई काम करना आसान नहीं होगा। दूसरी बात यह कि जो एक जिले के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, उस खतरे को उठाकर बाकी जिलों पर डाल दिया जाए, यह उनके साथ बेइंसाफी है कि ऐसे गुंडे का जिला अपनी बला दूसरों पर डाल रहा है, और उन दूसरे जिलों में इस अपराधी की कोई शिनाख्त भी नहीं है, वहां पर वह अपने आदतन जुर्म और आसानी से कर सकता है, वहां वह लोगों के लिए एक अधिक बड़ा खतरा बन सकता है क्योंकि उसे आते-जाते देखकर उस पराये जिले की पुलिस मुजरिम की तरह पहचान भी नहीं पाएगी। 

इस बारे में बात करने पर कुछ पुलिस अफसरों का यह कहना है कि यह बहुत ही दुर्लभ मामलों में होने वाली कार्रवाई है, और ऐसे मामले गिने-चुने रहते हैं, इसलिए इन्हें किसी मानवाधिकार से जोडक़र देखना जायज नहीं है। पुलिस का यह भी तर्क रहता है कि ऐसे लोग स्थानीय स्तर पर अपने बाहुबल, और अपने गिरोह के चलते बाकी तमाम लोगों के मानवाधिकार कुचलने की हालत में रहते हैं, कुचलते ही रहते हैं, और ऐसे लोगों को अगर एक साल बाहर रहकर जिंदा रहने को कहा जाए, तो यह उन्हें उनके गिरोह की ताकत से दूर रखना भी होता है, और आज के वक्त हर किसी के पास किसी न किसी तरह की मजदूरी करने का विकल्प रहता है, इसलिए ऐसे कोई गुंडे दूसरे जिलों में भी जाकर भूखे नहीं मर सकते। अपने खुद के जिलों में ये इतने बड़े दबंग गुंडे रहते हैं कि वहां जुर्म करना उनके लिए आम बात रहती है, और इलाके के लोगों के लिए उनके खिलाफ शिकायत करना खतरे की बात हो जाती है। पुलिस का यह भी कहना रहता है कि यह किसी को भूखे मारने का काम नहीं है, और खुले समाज में मेहनत-मजदूरी करके या अपने हुनर का और कोई काम करके लोग आसानी से जिंदा रह सकते हैं। 

अब मानवाधिाकर के नजरिए से देखें तो ऐसे गुंडे-बदमाश या मुजरिम जुर्म के अलावा भी हो सकता है कि कोई और काम करके अपने परिवार को भी चला रहे हों। जिन्हें कोई अदालती सजा मिले, उनका तो जेल जाना, और परिवार को बेसहारा छोड़ देना एक कानूनी नौबत है, लेकिन बिना सजा मिले जिलाबदर कर देना एक बड़ी सजा है, जो कि पुलिस की कार्रवाई नहीं कही जा सकती, यह कार्रवाई से अधिक है, और सजा है। यह अपने आपमें एक अलोकतांत्रिक बात है कि अदालती कार्रवाई का विकल्प मौजूद रहते हुए पुलिस और प्रशासन मिलकर किसी को जिलाबदर की ऐसी सजा दें, जिसे वे सजा में नहीं गिनते। लेकिन पुलिस का एक तर्क देखने-समझने लायक है कि ऐसे आदतन या पेशेवर गुंडे-बदमाश या मुजरिम आए दिन करने वाले जुर्म के लिए अदालतों से हाथों-हाथ जमानत पा जाते हैं। कायदे से तो होना यह चाहिए कि हर जुर्म के साथ पिछले जुर्मों के रिकॉर्ड भी अदालत में पेश होने चाहिए जिससे न तो ताजा जुर्म पर जमानत मिल सके, और न ही पिछले जुर्म में मिली जमानत जारी रह सके, लेकिन ऐसा होता नहीं है। पुलिस और अदालत का सिलसिला इतना बेअसर और शायद भ्रष्ट भी रहता है कि लोग दस-दस अलग-अलग जुर्मों पर जमानत लिए हुए घूमते रहते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई की बारी नहीं आती, सजा की बात तो दूर रही। 

जिलाबदर के ऐसे मामलों को देखें तो यह साफ दिखाई पड़ता है कि दर्जन-दर्जनभर जुर्म जिन पर दर्ज है, वे हर मामले में जमानत लिए घूम रहे हैं, और हर नए मामले में पुराने तमाम जुर्म का जिक्र भी हो रहा है, और पहले की कोई भी जमानत रद्द भी नहीं हो रही है। मतलब यह कि आज जिलाबदर की नौबत इस बात का सुबूत है कि जुर्म के खिलाफ अदालती कार्रवाई इतनी बेअसर हो गई है कि पुलिस फैसलों और सजा का इंतजार करते-करते जिलाबदर को मजबूर हो रही है। भारत की न्याय व्यवस्था में सुधार की बात करने वालों को यह आसानी से समझ में आएगा कि अदालत की नियमित प्रक्रिया के बेअसर हो जाने से अंग्रेजों के वक्त के ऐसे अलोकतांत्रिक कानूनों का इस्तेमाल जरूरी हो रहा है, या जायज लग रहा है। कायदे की बात यह है कि जिलाबदर की कार्रवाई से होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन पर फिक्र होनी चाहिए, लेकिन अदालती रफ्तार ने उस फिक्र की गुंजाइश को खत्म कर दिया है। जब मौजूदा कानून के तहत, जुर्म के सीधे-सीधे मुकदमों में सजा नहीं हो पाती है, उसमें बरसों लग जाते हैं, तब पुलिस को असाधारण ताकत का इस्तेमाल करना पड़ता है, और लोगों को उसके अलोकतांत्रिक होने का अहसास भी नहीं होता। यह भारत की न्याय व्यवस्था के बेअसर होने के हजार किस्म के नुकसानों में से एक है, और यह इस बात का पुख्ता सुबूत है कि इस व्यवस्था में सुधार की कितनी जरूरत है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

धर्म के नाम पर चमत्कारी और पाखंडी मेले कब तक?

24 जनवरी 2023


पिछले कुछ दिनों से पहले नागपुर और अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर बागेश्वर धाम के एक स्वघोषित चमत्कारी धीरेन्द्र शास्त्री नाम के नौजवान को लेकर खबरों में उबल रहे हैं। यह नौजवान कहने के लिए प्रवचनकर्ता या कुछ और है, लेकिन उसकी शोहरत धर्मालुओं के बीच मंच पर चमत्कार दिखाने की है। बहुत से लोगों का कहना है कि ये गढ़े गए चमत्कार रहते हैं, और यह एक पाखंड है, धोखा है। यह नौजवान अपने आपको अलौकिक शक्तियों वाला बताता है, मंच और माइक से धर्म के कपड़े ओढ़े हुए घोर साम्प्रदायिकता की बात करता है, तरह-तरह की धमकी देता है, और नागपुर में जब अंधविश्वास विरोधियों ने इसे चमत्कार साबित करने की चुनौती दी, तो यह वहां से भाग निकला। अब छत्तीसगढ़ में राजधानी के एक कांग्रेस विधायक विकास उपाध्याय ने अपनी धार्मिक गतिविधियों की कड़ी में इस धीरेन्द्र शास्त्री का एक और कार्यक्रम कराया जिसे कि टीवी समाचार चैनलों की मेहरबानी से एक बार फिर चमत्कार साबित करने की कोशिश की गई। अब यह तो वक्त बताएगा कि इस ‘चमत्कारी’ की साख बची या टीवी चैनलों की साख गई। 

लोगों के मन की बात बताने, उनका भूतकाल बताने, या भविष्य बताने, उनकी समस्याओं के समाधान बताने वाले ढेर सारे फर्जी और पाखंडी बाबाओं का हिन्दुस्तान में बोलबाला है। ये सिर्फ हिन्दू धर्म में नहीं हैं, ईसाईयों की चंगाई सभाएं होती थीं, जिनमें पोस्टर यही लगते थे कि अंधे देखने लगेंगे, लंगड़े चलने लगेंगे, बहरे सुनने लगेंगे। इसके बाद ईसाई धर्म प्रचारक मंच पर तैयार किरदारों को लाकर पहले उनके विकलांग होने का नाटक पेश करते थे, और फिर उन्हें ठीक करने का। अभी भी इंटरनेट पर ऐसे अनगिनत वीडियो तैर रहे हैं जिनमें मानसिक रूप से परेशान दिखती हुई महिलाएं ऐसे ईसाई धर्म प्रचारकों के छूते ही स्टेज पर झटके से गिरकर लोटपोट होने लगती हैं। हिन्दुस्तान में समाजसेवा का बहुत बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को भी वैटिकन ने संत की उपाधि तभी दी थी जब वैटिकन की टीम ने किसी एक मरीज का यह बयान दर्ज किया कि मदर टेरेसा के चमत्कार से उसकी बीमारी ठीक हुई। बिना चमत्कार किसी को संत का दर्जा वैटिकन नहीं देता। यह एक अलग बात है कि आज हिन्दुस्तान में कई राज्यों में ऐसे कानून हैं जो चमत्कार से किसी बीमारी को ठीक करने के दावे को जुर्म करार देते हैं, और उन पर सजा है। अब मदर टेरेसा के मामले में तो ऐसे चमत्कार पर ही उनकी संत की उपाधि टिकी हुई है, यह एक अलग बात है कि ऐसा कोई दावा उन्होंने खुद ने नहीं किया था। 

एक ऐसे मुस्लिम बाबा का वीडियो भी कुछ समय से सोशल मीडिया पर चल रहा है जो कि विचलित और बीमार महिलाओं के दरबार में बच्चों की खेल की बंदूकों को उनकी तरफ तानकर, चलाकर उनका इलाज कर रहा है। हिन्दुस्तान में प्रचलित अन्य धर्मों में इस तरह के पाखंड की बात याद नहीं पड़ रही है। जैन, सिक्ख, बौद्ध धर्मों की नसीहत हो सकता है कि पाखंडों से परे ले जाती हो। लेकिन हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी ऐसे पाखंड की सबसे बुरी जकड़ में है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब समाज में डॉक्टरी इलाज ठीक से हासिल नहीं रहता, मनोचिकित्सा हिन्दुस्तान में नहीं के बराबर मौजूद है, और हजार मनोरोगियों में से शायद वह सौ-पचास को भी हासिल नहीं है, तब ऐसे चमत्कारी पाखंडियों की दुकान चल निकलती है। कहीं कोई दरबार लगता है, कहीं प्रवचन के बीच इलाज होता है, तो कहीं पर निर्मल बाबा नाम का एक प्राणी इंटरनेट पर एडवांस बुकिंग से लोगों को टिकटें बेचता है, और हॉल में इक_ा लोगों को दुनिया के सबसे अनोखे समाधान सुझाता है। शुक्रवार को काले कुत्ते को पीले कपड़ों में जाकर लाल समोसा खिलाने से कृपा बरसेगी, जैसा समाधान बतलाने वाला निर्मल बाबा अभी पता नहीं कुछ समय से टीवी से गायब क्यों है, वरना कुछ टीवी चैनल उसी को समर्पित रहते थे। कई और बाबाओं की कई तरह की शोहरत रही, उन्होंने समाजसेवा के कुछ बड़े काम भी किए, लेकिन उनकी महिमा भी चमत्कार के रास्ते स्थापित हुई। पुट्टपर्थी के सत्य सांई बाबा हवा में हाथ उठाकर कई तरह की चीजें पैदा कर देते थे। किसी भक्त को घड़ी, किसी को गहने, और किसी को कुछ और मिल जाता था। उनके भक्त पिछले एक प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव से लेकर बड़े-बड़े जज भी रहे, और ऐसी भक्त मंडली के चलते सत्य सांई बाबा का धार्मिक-आध्यात्मिक कारोबार बहुत फैला। उन्होंने हार्ट के ऑपरेशन के लिए अस्पताल बनाए जिनका गरीबों की जिंदगी में बहुत बड़ा योगदान है, और छत्तीसगढ़ में उनके अस्पताल के कम्प्यूटरों पर बिल बनाने और भुगतान लेने का कॉलम ही नहीं है। यहां सौ फीसदी इलाज मुफ्त होता है। अलौकिक चमत्कारों से जुटाए गए दान का आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पर खर्च समझ आता है। लेकिन आज के कई बाबा जिस तरह नफरत फैलाते हुए घूम रहे हैं, साम्प्रदायिकता की बातें कर रहे हैं, वह हिन्दुस्तान को तोडऩे वाली बातें हैं। 

अब ऐसे अंधविश्वास और साम्प्रदायिकता को और ताकत तब मिल जाती है जब स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस पार्टी के मंत्री-मुख्यमंत्री, या विधायक-सांसद ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाते हैं, उनके पांवों में पड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि बलात्कारी आसाराम के अनगिनत वीडियो आज मौजूद हैं जिनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आसाराम की स्तुति करते दिखते हैं। लेकिन उन्हीं वीडियो के साथ-साथ कुछ ऐसे वीडियो भी मौजूद हैं जिनमें कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह भी अपने मुख्यमंत्री होने के वक्त आसाराम के पैरों पर पड़े हैं। जिस देश में नेहरू ने एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, जहां उन्होंने धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा था, हर किस्म के अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया था, हिन्दुस्तान की संस्कृति को धर्मान्धता से अलग करने का बहुत बड़ा काम किया था, आज उन्हीं की पार्टी के नेता पाखंडियों के आयोजन कर रहे हैं जो कि धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता दोनों को फैला रहे हैं। यह बात बहुत हैरान नहीं करती क्योंकि नेहरू की कांग्रेस में उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच, और पाखंड का उनका विरोध उन्हीं की बेटी इंदिरा ने खत्म कर दिया था जब वे मचान पर बैठे देवरहा बाबा के लटके हुए पांव के नीचे अपना सिर टिकाने जाकर खड़ी हुई थीं। उसके बाद तो कांग्रेस में धर्मान्धता को औपचारिक मंजूरी ही मिल गई थी, जो आज भी जारी है। कांग्रेस में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता से पूरी तरह बचे हुए सोनिया परिवार के बावजूद पार्टी मोटेतौर पर धर्म के नाम पर धर्मान्धता को बढ़ा रही है। और भाजपा की तो पूरी बुनियाद ही धर्म पर टिकी हुई है। पूरे देश में फैली हुई महज दो ही पार्टियां हैं, और जब ये दोनों हिन्दुत्व की ए और बी टीम की तरह काम कर रही हैं, तो फिर वैज्ञानिक सोच की गुंजाइश कहां है? 

हम देश में फैल रही धर्मान्धता को लेकर महज भाजपा को कोसना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि कांग्रेस उसी के पदचिन्हों पर चलते हुए उससे आगे निकलने की हड़बड़ी में दिख रही है। यह एक अलग बात है कि धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोगों को कांग्रेस के मुकाबले भाजपा अधिक माकूल बैठती है, और वे किसी बी टीम पर दांव क्यों लगाएंगे, जब खालिस और असली ए टीम अभी बाजार में मौजूद भी है, और अधिक कामयाब भी है। धर्मान्ध आयोजन करवाने वाले कांग्रेस नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि वे इस पाखंड में सडक़ों पर कितना ही नाचें, वोट के दिन धर्मान्ध लोगों को कांग्रेस सबसे बेहतर पार्टी नहीं लगने वाली है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस एक मामले में समझदारी दिखाई कि उन्होंने अपने ही विधायक और संसदीय सचिव के इस पाखंडी आयोजन में जाने से इंकार कर दिया, और नर्म शब्दों में सही, इसकी आलोचना भी की। धर्म पर आधारित नफरत की लड़ाई में कांग्रेस कभी भी भाजपा से नहीं जीत पाएगी, और उसे ऐसी कोशिश बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसी कोशिश के चलते हुए वह अपना चरित्र खो बैठ रही है, और उसके परंपरागत मतदाताओं को यह अब उनकी पसंदीदा पार्टी नहीं दिख रही है। (Daily Chhattisgarh)

दुनिया पर मंडराता आर्थिक खतरा समझने की जरूरत

 23 जनवरी 2023


दुनिया की सबसे बड़ी, कामयाब और मुनाफा कमा रही टेक्नालॉजी कंपनियों ने पिछले एक बरस में 70 हजार से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है। इन कंपनियों में तनख्वाह की जो हालत रहती है, उसके मुताबिक बाकी कंपनियों के कर्मचारियों से वे काफी अधिक पाते हैं, और ऐसे लोगों की नौकरी जाने का एक मतलब यह भी है कि बाजार में उनका खर्च कम या बंद हो जाएगा, और अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना कुछ धीमा हो जाएगा। इसे इस तरह देखना भी ठीक होगा कि इन कंपनियों में जो हिन्दुस्तानी काम करते थे, वे अब भारत में बसे अपने परिवारों तक पैसे नहीं भेज पाएंगे, इससे यहां के परिवार अपना खर्च घटाएंगे, कोई नई खरीदी करने की तैयारी रही होगी, तो वह भी घट जाएगी। इसलिए दुनिया में कहीं भी बड़े पैमाने पर रोजगार जाते हैं, तो दूसरे कई देशों तक भी उसका असर होता है। और रोजगार जाने का यह सिलसिला सिर्फ टेक्नालॉजी कंपनियों या अमरीकी कंपनियों तक सीमित नहीं है, यह दुनिया में तरह-तरह के देशों में तरह-तरह से हो रहा है। रूस के यूक्रेन पर हमले, और उसके बाद की जंग के चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था बहुत बुरी तरह चौपट हुई है, और उससे भी कामकाजी देशों के सामने रोजगार की दिक्कत आ गई है, खाते-कमाते लोगों पर महंगाई की मार दिख रही है, और भुखमरी के शिकार देशों में इंसानों के कुपोषण और भूख से मरने का सिलसिला बढ़ गया है। 

कल ही पाकिस्तान की एक रिपोर्ट है कि वहां से कपड़े के निर्यात में आई गिरावट की वजह से करीब 70 लाख लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है, और वहां का कपड़ा उद्योग गर्त में चले गया है। एक वक्त यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बड़ा कारोबार था, लेकिन अब न तो घरेलू ग्राहक रह गए, न ही निर्यात रह गया, और न ही उस कपास की फसल बची जिससे बना सूती कपड़ा दूसरे देशों में जाता था। पिछले बरस आई बाढ़ में पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा ऐसा डूबा कि वहां सडक़, पुल, इमारतें, गांव-कस्बे सभी कुछ बह गए या डूब गए। इस बाढ़ से साढ़े 3 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, कपास की फसल का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया था, किसान तो बर्बाद हुए ही, ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हुई, और अब नतीजा यह दिख रहा है कि कारखानेदार भी डूब रहे हैं, और मजदूर तो नौकरी खो ही बैठे हैं। पाकिस्तान के निर्यात का आधा हिस्सा कपड़े का निर्यात था, जो ठप्प पड़ा है। नतीजा यह होगा कि देश में आने वाली विदेशी मुद्रा नहीं आएगी, स्थानीय कारखानेदारों, कारोबारियों, और मजदूरों के पास खर्च का पैसा नहीं रहेगा, और स्थानीय अर्थव्यवस्था का चक्का घूमना धीमा हो जाएगा। 

हिन्दुस्तान में कुछ दिन पहले ही आई ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट को गौर से देखने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में बताया है कि देश की 40 फीसदी दौलत सिर्फ एक फीसदी अमीर लोगों के पास है, और नीचे की आधी आबादी के पास सिर्फ तीन फीसदी दौलत है। यह रिपोर्ट बताती है कि हिन्दुस्तान के 10 सबसे अमीर लोगों की दौलत में 2021 के मुकाबले एक बरस में 32.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत में अरबपतियों की संख्या 2020 में 102 थी, जो बढक़र 2021 में 142, और 2022 में 166 हो गई। इसके साथ यह जोडक़र देखने की जरूरत है कि देश में करीब 23 करोड़ लोग गरीबी में जी रहे हैं, जो कि दुनिया के किसी भी एक देश में गरीबों की सबसे बड़ी संख्या है। अब अडानियों और अंबानियों के साथ इन 23 करोड़ लोगों की दौलत को जब मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़े तैयार किए जाते हैं, तो वे सुहाने लगने लगते हैं, यह लगने लगता है कि हिन्दुस्तान दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन देश के भीतर संपत्ति और साधनों के बंटवारे की हालत क्या है, इस बदहाली को न देखकर, न समझकर, महज जश्न मनाने वाले लोग ही इसे तीसरी-चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनते देख रहे हैं। आठ बरस पहले मोदी सरकार ने देश में हर बरस दो करोड़ रोजगार या नौकरियों की बात कही थी, और उसके बाद के आंकड़े बताते हैं ऐसे अच्छे दिन का वायदा अभी तक सिर्फ एक मृगतृष्णा बना हुआ है। 

हिन्दुस्तान में असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की हालत खराब है। सरकारी या गैरसरकारी आंकड़े आमतौर पर संगठित क्षेत्र तक सीमित रह जाते हैं, असंगठित क्षेत्र को लेकर लोग भी कम फिक्रमंद रहते हैं, और वहां के आंकड़े भी मौजूद नहीं रहते हैं। कोरोना और लॉकडाउन के चलते हुए पिछले दो बरस से अधिक का वक्त ऐसा रहा है जिसमें असंगठित क्षेत्र के भूखों रहने की नौबत आ गई है। अब कामकाज शुरू हुआ है, लेकिन कारोबार और रोजगार में अनिश्चितता बनी हुई है। सरकार अपना कामकाज किस हद तक टैक्स की कमाई से चला रही है, और किस हद तक सार्वजनिक कंपनियों को बेचकर चला रही है, इसका आर्थिक विश्लेषण देखने और समझने की जरूरत है। हिन्दुस्तान में आज कई किस्म के आर्थिक आंकड़े लोगों के सामने रखना बंद कर दिया गया है, और बहुत किस्म के विश्लेषण अब हो नहीं पा रहे हैं। 

लेकिन हम इस बात को दुहराना चाहते हैं कि दुनिया का सबसे बुरा वक्त आना अभी बाकी है। अभी बहुत से विशेषज्ञों की यह भविष्यवाणी है कि दुनिया में मंदी का दौर आने वाला है। जिस रूस-यूक्रेन जंग से दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ाई है, उस नौबत के और बुरे होने की एक आशंका बनी हुई है। यह जंग कहीं से कम होते नहीं दिख रही है, और इसके चलते बाकी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय राहत संस्थानों के काम में कमी आई है क्योंकि लोगों की सामाजिक-आर्थिक मदद यूक्रेन की तरफ मुड़ गई है। इन तमाम बातों के साथ कुदरत की मार को जोडक़र भी देखना चाहिए कि किस तरह एक बाढ़ ने पाकिस्तान का वर्तमान और भविष्य तबाह कर दिया है, योरप और अमरीका मौसम की मार से इतिहास का सबसे बड़ा नुकसान झेल रहे हैं। भारत जैसे देशों को भी यह सोचना चाहिए कि बदलते मौसम की मार और तबाह पर्यावरण के असर से आने वाला वक्त और तबाही देख सकता है। ऐसे में उन लोगों को अधिक सावधान रहना चाहिए जो अपनी आज की कमाई के आधार पर कर्ज लेकर किस्तें पटाने का बोझ पाल रहे हैं। कल को रोजगार और कारोबार ही नहीं रहा तो वे किस्तें आएँगी कहां से? यह वक्त बहुत सावधान रहने का है, अपना काम-धंधा बचाकर रखने का है, रोज की जिंदगी में किफायत पर अधिक से अधिक अमल करने का है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 23 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 22 जनवरी 2023


 

सरकार और अदालत के टकराव को अनदेखा करने का नुकसान लोकतंत्र को..

  22 जनवरी 2023


भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ बंगाल के राज्यपाल के रूप में ममता बैनर्जी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने वाले एक आंदोलनकारी की तरह बरसों जुटे रहे। अब वे उपराष्ट्रपति हो गए हैं, तो इस हैसियत से वे राज्यसभा के उपसभापति रहते हैं, और वहां उन्हें बोलने का मौका कोलकाता के राजभवन के मुकाबले काफी अधिक मिल रहा है। लेकिन राज्यसभा से परे भी वे सार्वजनिक रूप से बहुत से मुद्दों पर अपनी राय रखते रहते हैं। अभी उन्होंने संसद और विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों के एक सम्मेलन में कहा कि संसद के बनाए कानून को किसी आधार पर अगर अदालत खारिज करती है तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा। उन्होंने बहुत खुलासे से सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि संसद सबसे ऊपर है, और किसी भी लोकतांत्रिक समाज में जनमत की प्रधानता ही उसके मूल ढांचे का आधार है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका या कार्यपालिका संसद में कानून बनाने, या संविधान संशोधन करने की ताकत को नामंजूर नहीं कर सकतीं। उन्होंने 1973 के सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत ही चर्चित केशवानंद भारती मामले की चर्चा करते हुए कहा कि इस फैसले ने गलत मिसाल पेश की है, और अगर कोई भी संस्था संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं। सुप्रीम कोर्ट का इतिहास बताता है कि केरल सरकार के खिलाफ केशवानंद भारती के मामले में 13 जजों की बेंच के सामने देश के एक सबसे बड़े वकील नानी पालखीवाला ने जिरह की थी, और सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि संविधान में संशोधन तो किया जा सकता है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता। केशवानंद भारती केस पर इस फैसले की वजह से इस मामले को संविधान का रक्षक कहा जाता है।

अब इस पर लिखने की अधिक जरूरत इसलिए है कि उपराष्ट्रपति के न्यायपालिका पर हमले के एक पखवाड़े के भीतर ही, मानो उन्हें जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने इसी फैसले को अभूतपूर्व बताया, और कहा कि संविधान को समझने और उसे लागू करने के मामले में यह फैसला एक ध्रुव-तारे की तरह जजों को रास्ता दिखाता है। उन्होंने बॉम्बे बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित पालखीवाला स्मृति व्याख्यान माला में कहा कि बदलते वक्त में जज संविधान में लिखी बातों की व्याख्या करते हैं, और केशवानंद भारती मामले में दिया गया फैसला भारतीय संविधान की आत्मा को बनाए रखने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि 1973 की फैसला सफलता की ऐसी दुलर्भ कहानी है जिसका भारत के पड़ोसी देशों, नेपाल, बांग्लादेश, और पाकिस्तान ने भी अनुकरण किया। उन्होंने कहा कि जब जजों के सामने एक जटिल रास्ता होता है उस वक्त हमारे संविधान की मूल संरचना एक तारे की तरह इसकी व्याख्या करने वालों, और इस पर अमल करने वालों को एक दिशा देती है, और उनका मार्गदर्शन करती है। 

यह मामला हिन्दुस्तान के संविधान के तहत सरकारों की कानून बनाने और संविधान संशोधन करने की ताकत को सबसे बड़ी चुनौती था। मामला केरल से जुड़ा था लेकिन जब इस मामले पर फैसला आया तो इसने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी विचलित किया था। और 13 जजों की बेंच में से असहमति रखने वाले एक जज अजीतनाथ रे को फैसले से सहमति रखने वाले तीन सीनियर जजों के ऊपर ले जाकर भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था। यह अपने आपमें एक अनोखा मामला था जब न्यायपालिका में इस तरह मनमानी से किसी को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। केशवानंद भारती का यह मामला इस मामले में भी अनोखा था कि 13 जजों में से 9 जजों ने तो फैसले पर दस्तखत किए थे, लेकिन 4 जजों ने इस पर दस्तखत भी नहीं किया था।

लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का मकसद 1973 के उस ऐतिहासिक मामले और फैसले की चर्चा करना नहीं है। हमने उसकी चर्चा सिर्फ एक प्रसंग के रूप में की है जिसे लेकर आज सरकार के मनोनीत उपराष्ट्रपति, और देश के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़़ के बीच एक अघोषित बहस छिड़ी है। सुप्रीम कोर्ट में 13 जजों से बड़ी कोई बेंच आज तक बनी नहीं है। ऐसे में यह कल्पना नहीं की जा सकती कि केन्द्र सरकार की तमाम हसरत के बावजूद संविधान की मूल संरचना को बदलना आसानी से मुमकिन होगा। बार-बार ऐसा लगता है कि मोदी सरकार संविधान की कुछ बुनियादी बातों को बदलना चाहती है, लेकिन संसद में अपार बहुमत होते हुए भी, अधिकतर राज्यों में बहुमत होते हुए भी ऐसा कोई संशोधन उसके लिए आज मुमकिन नहीं दिख रहा है क्योंकि 14 जजों की संविधानपीठ के 1973 के फैसले को पार पाना आसान नहीं है। सिर्फ संसद और विधानसभाओं से यह बुनियादी फेरबदल शायद नहीं किया जा सकेगा। 

हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की यह एक खूबी है कि लोकसभा और राज्यसभा में अलग-अलग पार्टियों या गठबंधनों के बहुमत होने का एक इतिहास रहा है। केन्द्र और राज्यों में ऐसी ही अलग-अलग सरकारों का इतिहास रहा है। न्यायपालिका में कार्यपालिका या विधायिका से असहमति का एक इतिहास रहा है। यही वजह थी कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा के चुनाव को अवैध ठहराया था, बाद में आपातकाल से जुड़े हुए कुछ संविधान संशोधनों को खारिज किया गया था, और सुप्रीम कोर्ट और संसद के बीच असहमत होने पर सहमति का एक रिश्ता बना हुआ था। लोगों को याद होगा कि एक अभूतपूर्व संसदीय बाहुबल के चलते प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले को संविधान संशोधन करके खारिज कर दिया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो तनातनी सार्वजनिक रूप से बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए यह सोचने की जरूरत लग रही है कि अगर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा छांटे गए जजों के नामों को मंजूरी देने के अधिकार को केन्द्र सरकार एक रणनीति की तरह इस्तेमाल करेगी, तो हो सकता है कि धीरे-धीरे करके सुप्रीम कोर्ट में वह अपनी सोच से सहमति रखने वाले जजों का बहुमत बनाने में कामयाब हो जाए। ऐसा दिन देश के लिए अच्छा नहीं होगा क्योंकि आपातकाल में इंदिरा गांधी की ओर से प्रतिबद्ध न्यायपालिका का एक नारा दिया गया था, और वह अगर कामयाब हो जाता, तो देश में संसदीय लोकतंत्र के बजाय महज सरकारी लोकतंत्र रह जाता। 

देश के कानूनी समझ रखने वाले तबके को इन बातों को गौर से देखना चाहिए, और देश की आज की नाजुक जरूरतों पर, आगे खड़े हुए खतरों पर भी गौर करना चाहिए। ऐसी संवैधानिक जटिलताएं कोई लुभावना चुनावी नारा तो नहीं बन सकतीं, लेकिन विचार गढऩे वाले तबकों में से कुछ लोग तो इस मुद्दे को समझ सकते हैं, और देश के व्यापक लोकतंत्र के हित में बाकी जनता के लिए इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश कर सकते हैं। 

(Daily Chhattisgarh)