पत्नी की लाश 33 किमी कंधे पर ढोता विश्वगुरू

 11 फरवरी 2023


आदिवासियों से जुड़े एक ट्विटर पेज पर एक गरीब की तस्वीर और खबर पोस्ट हुई है। ओडिशा के कोरापुट के रहने वाले सामुलु पांगी ने अपनी बीमार पत्नी को विशाखापत्तनम में एक अस्पताल में भर्ती कराया था। उसका गांव वहां से करीब सौ किलोमीटर दूर था। वापस ले जाते समय पत्नी की रास्ते में मौत हो गई तो ऑटो वाले ने शव को ले जाने से मना कर दिया। ऐसे में यह आदमी कंधे पर पत्नी के शव को लिए 33 किलोमीटर पैदल गया। ट्राइबल आर्मी नाम के इस ट्विटर पेज पर इस बात का खुलासा नहीं है कि यह आदमी आदिवासी था या नहीं, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर वह गैरआदिवासी गरीब भी है, तो भी आदिवासियों की हमदर्दी उसके साथ होगी, क्योंकि आदिवासी दूसरे समुदायों के मुकाबले अधिक इंसानियत रखते हैं। वे कुदरत के करीब रहते हैं, और जाहिर है कि उनमें संवेदनशीलता अधिक होगी। एक दूसरी खबर यह कहती है कि पुलिस ने इस आदमी को अपनी पत्नी को कंधे पर ले जाते देखा तो आधे रास्ते से उसकी मदद की, और उसे गांव तक पहुंचाया। सच इन दो खबरों के बीच कहीं भी हो सकता है, और हो सकता है कि 33 किलोमीटर पैदल चलने के बाद बचा रास्ता पुलिस की मदद मिली हो। 

ट्विटर पर बहुत से लोगों ने इस खबर पर लिखा है। एक ने लिखा आखिर लोग कौन सी जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा, प्रथा की आस्था में डूबे हुए हैं जहां इंसान के लिए इंसान की कोई आस्था नहीं है, ज्ञान-विज्ञान संविधान का तर्क व वैज्ञानिक दृष्टिकोण मर गए हैं। कुछ लोगों ने याद दिलाया कि इसी ओडिशा की एक आदिवासी आज देश की राष्ट्रपति है। सैकड़ों लोगों ने इस नौबत को धिक्कारा है, और अलग-अलग सरकारों को अलग-अलग जिम्मेदार तबकों को कोसा है। लोगों ने यह भी हैरानी जाहिर की है कि 33 किलोमीटर के ऐसे पैदल सफर में कोई इंसान नहीं मिला। कुछ लोगों ने यह भी लिखा कि यही असली भारत है, जरूरतमंद को मदद नहीं मिलती, और अरबों-खरबों रूपये अडानी, मेहुल चौकसी जैसे लोग हड़प जाते हैं। एक ने लिखा कि मनुवादियों ने मानवता को खत्म कर दिया एक ऐसी मनुवादी व्यवस्था बनाकर जो लोगों में भेदभाव रखती है। किसी ने लिखा कि इंसान जानवरों से ज्यादा गिर गए हैं, एक ने लिखा हम ऐसे भारत में रहते हैं बिलियन और ट्रिलियन की बात के बीच कोई शव को कंधे पर 25-50 किलोमीटर ढो रहा है। एक ने लिखा है जब देश का मीडिया दलाली में व्यस्त हो तो इस भारत की बात कौन करेगा? किसी ने सही कहा है, दो भारत हैं, एक गरीबों का, दूसरा अमीरों का। एक ने लिखा कि जिस देश में लोग ऐसे मर रहे हैं उस देश में हम हिन्दू-मुस्लिम कर रहे हैं, शर्म आना चाहिए सरकार को। एक ने लिखा इस पर भी कुछ लोग कहते हैं कि यह अमृतकाल है। किसी ने आदिवासियों के संदर्भ में लिखा कि ये बेचारे वहीं के वहीं हैं क्योंकि इनका हक कोई और खा रहे हैं। एक का कहना है कि सरकारें तो सभी जगह मरी हुई हैं, पर लोगों की इंसानियत कहां मर गई है? 

ऐसी खबरें हर कुछ दिनों में कहीं न कहीं से आती ही रहती हैं। कहीं सरकारी साधन-सुविधा रहने पर भी गरीबों की उन तक पहुंच नहीं रहती, तो कहीं रिश्वत दिए बिना सरकारी सुविधाओं का हक नहीं मिलता। बहुत सी खबरें ऐसी भी आती हैं कि रिश्वत देने से मना करने पर लाश चीरघर में पड़ी रहती है, और उसका पोस्टमार्टम भी तब तक नहीं होता, जब तक रिश्वत न दे दी जाए। सरकारी अस्पतालों में जान बचाने वाले इलाज के पहले भी रिश्वत मांगी जाती है, और कहीं कोई बीमार मुसाफिर रहे, तो भी उसे ट्रेन में बिना रिश्वत बैठने को जगह नहीं मिलती। इस तरह की और भी बहुत सी बातें हिन्दुस्तान में देखने मिलती हैं, और उनसे यही साबित होता है कि यहां लोगों की इंसानियत सच ही मर गई है, या कम से कम वह इंसानियत खत्म हो गई है जिसे लोग इंसानों की खूबी मानते हैं। इंसानों के भीतर की सारी नकारात्मक और हिंसक सोच को लोग इंसानों से परे की कोई बात साबित करना चाहते हैं, और उसके लिए हैवानियत जैसा एक शब्द गढ़ लिया गया है जो कि और कुछ नहीं है, इन्हीं इंसानों के भीतर की ही एक सोच है। हिन्दुस्तान इस कदर गैरजिम्मेदार और मतलबपरस्त देश हो गया है कि लोग गंदगी फैलाते यह नहीं सोचते कि उन्हीं की तरह के कुछ दूसरे इंसान अपनी जाति और गरीबी की वजह से पूरी जिंदगी इस गंदगी को साफ करते गुजार देंगे। लोग सार्वजनिक जगहों, सार्वजनिक चीजों को बर्बाद करते चलते हैं, और इस बात की तरफ से पूरी तरह बेपरवाह रहते हैं कि इसकी लागत उन्हीं पर आनी है। 

ऐसा लगता है कि इस देश में मंत्री, अफसर, जज, कारोबारी, और बाकी तमाम चर्चित लोगों के भ्रष्टाचार को देखकर लोगों के मन में अब लोकतांत्रिक मूल्यों, नियम-कायदों, इंसानियत, इन सबके लिए एक बड़ी हिकारत घर कर गई है। लोगों को लगता है कि जब बड़े-बड़े लोग बलात्कार करके घूम रहे हैं, तो उनके कहीं थूक देने को मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? जब नेता, अफसर, ठेकेदार से सैकड़ों करोड़ रूपये का कालाधन बरामद हो रहा है, तो गरीबों से ईमानदारी से टैक्स पटाने की उम्मीद क्यों की जा रही है? जब हर सरकारी काम में परले दर्जे का भ्रष्टाचार दिख रहा है, तो फिर गरीब भी अपने-अपने स्तर पर कुछ बचाने की कोशिश क्यों न करें? ऐसा लगता है कि लोगों के सामने किसी किस्म की प्रेरणा नहीं रह गई है, नेक और अच्छा काम करने की जो बुनियादी इंसानियत लोगों में रहनी चाहिए थी, वह भी हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, औरत-मर्द के तनाव खड़े करके खत्म कर दी गई है। लोग अब किसी धर्म के हैं, किसी जाति के हैं, किसी प्रदेश के हैं, और किसी संगठन के हैं, लेकिन इंसान नहीं हैं। यह नौबत इस देश को एक घटिया देश बना चुकी है, और झूठे आत्मगौरव से परे यहां गौरव के लायक इंसानियत कम से कम गैरगरीबों में नहीं रह गई है। 

इस देश की पहचान एक बेरहम देश की हो गई है जो कि अपनी लड़कियों और औरतों को काट डाल रहा है। इस देश की पहचान एक हिंसक जाति व्यवस्था वाली जगह की हो गई है जहां पर दलित और आदिवासी कुचले जा रहे हैं। और चारों तरफ माहौल ऐसा बना दिया गया है कि लोगों के सामने इंसान बने रहना आखिरी प्राथमिकता रह गई है, या कि एक पूरी तरह से अवांछित बात बना दी गई है। इस देश में कहीं विश्वगुरू होने के दावे किए जा रहे हैं, कहीं इसका अमृतकाल आया हुआ बताया जा रहा है, कहीं गाय को गले लगाने का सरकारी फतवा जारी होता है, लेकिन दूसरे इंसानों से मोहब्बत करने का कोई सरकारी फतवा जारी नहीं होता, बल्कि नफरत को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिशें जरूर दिखती हैं। एक फर्जी आत्मगौरव में जीते हुए इस आत्ममुग्ध देश को अपनी हिंसा का आत्मविश्लेषण करना चाहिए।  

(Daily Chhattisgarh)

हिंसा या नाजायज काम करने वाली महिलाएं क्या साबित करती हैं?

 10 फरवरी 2023


उत्तरप्रदेश में चार शादीशुदा आदमी सदमे से गुजर रहे हैं क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना का पैसा खाते में आते ही वह पैसा लेकर उनकी पत्नियां अपने प्रेमियों के साथ भाग निकलीं। अब ये चारों आदमी एक और परेशानी में फंसे हुए हैं कि उन्हें सरकार की तरफ से नोटिस मिला है कि उन्होंने पैसा मिलने के बाद भी मकान बनाना शुरू नहीं किया है। अब सरकारी अधिकारी इन पतियों पर दबाव डाल रहे हैं कि वे अपनी पत्नियों को समझाकर घर लेकर आएं और उस पैसे से मकान बनाएं क्योंकि यह पैसा मकान बनाने के लिए ही मिला है। महिला के नाम से बैंक खाता होने की वजह से यह हो पाया है, वरना आमतौर पर तो हिन्दुस्तान में यही होता है कि आदमी ही घर छोडक़र किसी और महिला के साथ रहने चले जाते हैं, या घर पर रहते हुए भी बाहर दूसरा इंतजाम कर लेते हैं। यह खबर दूसरी बहुत सी खबरों की याद दिलाती है जिनमें महिलाएं अपनी परंपरागत तस्वीर से हटकर कई तरह के काम करते दिखती हैं, और लोगों को महिलाओं से ऐसी उम्मीद नहीं रहती। 

इन दिनों बहुत सी जगहों पर ऐसे जुर्म दिखाई पड़ रहे हैं जिनमें कोई महिला अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार डाल रही है, या परेशान कर रहे प्रेमी से छुटकारा पाने के लिए अपने पति या अपने भाई के साथ मिलकर प्रेमी को मार डाल रही है। हाल के बरसों में ऐसे मामलों की खबरें बढ़ती हुई दिखाई पड़ रही हैं। बहुत से ऐसे वीडियो भी बीच-बीच में सामने आते हैं जिनमें कहीं शराब के नशे में महिला किसी कॉलोनी के सुरक्षा कर्मचारियों को पीट रही है, गंदी गालियां दे रही है। अभी दो दिन पहले ही दिल्ली या उसी किस्म की किसी बस्ती का एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक बाजार में भीड़ के बीच एक आदमी पर छेड़ख़ानी की तोहमत लगाते हुए तीन महिलाएं उसके कपड़े उतार रही हैं, और उसे पूरा नंगा करके उसे पीट रही हैं, उसे तमाम किस्म की गालियां भी दे रही हैं। ऐसे बहुत से मामलों को देखें तो लगता है कि महिलाएं एक नए किस्म की ताकत का इस्तेमाल कर रही हैं, और 25-30 बरस पहले तक ऐसी कल्पना नहीं हो पाती थी। 

दरअसल यह पीढ़ी पढ़ी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, मोबाइल और मोबाइक से लैस लड़कियों और महिलाओं की है जो कि एक-दो पीढ़ी पहले की महिलाओं के मुकाबले बहुत रफ्तार से आगे निकल गई हैं। ये महिलाएं कामकाज में भी कामयाबी की बुलंदी छू रही हैं, और जिस तरह किसी भी कामयाब और ताकतवर, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर के फैसले होते हैं, उस तरह के तमाम फैसले भी महिलाओं की हाल की पीढिय़ां लेने लगी हैं। इनमें बहुत से फैसले लोगों को अच्छे भी लग सकते हैं, और बहुत से खराब भी लग सकते हैं क्योंकि लोग महिलाओं के बारे में ऐसी कल्पना करने के आदी नहीं रहे हैं। इन गिने-चुने दशकों में महिलाओं की ताकत में जो इजाफा हुआ है, वह पूरी तरह उनकी पढ़ाई, आर्थिक आत्मनिर्भरता, आसपास बढ़ते शहरीकरण, और फोन और गाड़ी से मिले आत्मविश्वास से पैदा हुआ है। जब किसी तबके की ताकत बढ़ेगी, आत्मविश्वास बढ़ेगा, तो उस तबके के कुछ लोग मरने-मारने का आत्मविश्वास भी इस्तेमाल करते दिखने लगेंगे, और हाल के बरसों में वही हो भी रहा है। 

बहुत से दकियानूसी मर्दों को यह लग सकता है कि औरत को आजादी देने का यही नतीजा होना था कि वह शादी के बाहर दूसरे प्रेम-संबंधों में पड़ रही है, अवैध कहे जाने वाले संबंध बना रही है, हिंसा कर रही है, और कत्ल की सुपारी दे रही है। लेकिन इन मर्दों को यह भी समझना चाहिए कि ये तमाम मिसालें मर्द जात ही पेश करते आई है, और चूंकि आर्थिक ताकत, सामाजिक ताकत मर्द के ही हाथ थी, इसलिए औरत सब बर्दाश्त करते आ रही थी। अब जब उसके हाथ आर्थिक ताकत लगी है, बंधी-बंधाई सामाजिक भूमिका से परे वह सोच पा रही है, और लोग क्या सोचेंगे इस तरफ से वह कुछ बेफिक्र होने लगी है, तो वह अपनी जिंदगी के अच्छे-बुरे फैसले भी लेने लगी है। हो सकता है कि पिछले 10-15 बरसों में सोशल मीडिया ने भी औरत को एक इंसान की तरह सोचने की ताकत दी है। अब एक लडक़ी या महिला अपने परिवार के मर्दों के बिना भी बाहर किसी अनजान मर्द के साथ ऑनलाईन दोस्ती कर सकती है, दुख-दर्द बांट सकती है, तारीफ पा सकती है, और बहुत से मामलों में ऑनलाईन से हटकर असल जिंदगी में भी उन लोगों से मिल सकती है। इस तरह सोशल मीडिया ने हिन्दुस्तान जैसे समाज की लड़कियों और महिलाओं को अपने बंधे हुए दायरे से बाहर के लोगों से भी जान-पहचान करने की एक संभावना दी है, और आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ मिली हुई ऐसी संभावना से महिला अपने कुछ बड़े फैसले भी लेने लगी है जिनमें से कुछ फैसले लोगों को खटकने वाले भी हो सकते हैं। 

खबरों में जो हिंसक या नकारात्मक बातें आती हैं, उनसे भी महिला सशक्तिकरण का एक संकेत मिलता है। जिस समाज में कोई महिला किसी तरह की ताकत हासिल करती है, उसी समाज में कोई-कोई महिला ऐसी हिंसा भी कर सकती है, और अपनी शादीशुदा जिंदगी से बाहर के कोई दूसरे रिश्ते भी बना सकती है। जो महिला हर तरह से कमजोर बनाकर रखी जाती थी, वह जिंदगी के अच्छे, या बुरे, कैसे भी बड़े फैसले नहीं ले पाती थी। इसलिए किसी भी किस्म का बड़ा फैसला आज बदले हुए वक्त का संकेत है जिसमें महिलाएं पहले के मुकाबले अधिक ताकत रखती हैं। हिन्दुस्तान के अधिकतर राज्यों में पंचायत और म्युनिसिपल चुनावों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित हैं, और कई राज्यों में 50 फीसदी निर्वाचित जनप्रतिनिधि महिलाएं हैं। इनके पति और परिवार ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में भी उनकी निर्वाचित ताकत पर काबू करने की पूरी कोशिश कर लेते हैं, लेकिन धीरे-धीरे अधिकतर महिलाएं कुछ या अधिक हद तक अपनी ताकत का इस्तेमाल करने लगी हैं। इससे भी महिलाएं अपनी जिंदगी के बारे में बेहतर और बड़े फैसले ले पा रही हैं। इन तमाम बातों के साथ-साथ हिन्दुस्तान जैसे देश में बढ़ता हुआ शहरीकरण औरत और मर्द के बीच के फासले को कुछ कम करने वाला रहता है क्योंकि गांवों के मुकाबले शहरों में औरतों को बर्दाश्त करने की संस्कृति कुछ अधिक रहती है। कुल मिलाकर महिलाओं द्वारा की गई हिंसा की खबरें भी यह बात साबित करती हैं कि महिलाएं पहले के मुकाबले अधिक ताकतवर हो रही हैं, और वे भी बराबरी से फैसले लेने की ताकत रखती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

 

दीवारों पर लिक्खा है, 10 फरवरी 2023


दीवारों पर लिक्खा है, 9 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

माँ-बाप से लेकर, तुलसी और गाय तक, सबसे प्यार कर लो, जीवनसाथी से नहीं

 9 फरवरी 2023


हिंदुस्तानी बाग-बगीचों और सार्वजनिक जगहों पर बवाल आने में अभी चार दिन बाकी हैं, लेकिन समय रहते इस पर लिख लेना ठीक है। वेलेंटाइन -डे 14 फरवरी को पड़ता है, और तथाकथित भारतीय संस्कृति के स्वघोषित ठेकेदारों ने डंडों पर तेल मलना शुरू कर दिया होगा, और धर्म के झंडे उन पर बांधना भी। हिंदुस्तान के सबसे बेवकूफ प्रदेशों में ये गुंडे लाठियां लेकर निकलेंगे, और नौजवान लडक़े-लड़कियों को साथ देखकर उन्हें पीटना शुरू करेंगे कि कहीं वे मोहब्बत तो नहीं कर रहे हैं। बात नफरत की होती, तो इन लोगों को ठीक लगती, इनके मिजाज की लगती, लेकिन पश्चिम के किसी नाम पर पे्रम के पर्व का नाम होने से इन हिंदुत्ववादियों को कम से कम इस एक दिन तो पे्रम से नफरत हो जाती है। और हिंदुस्तान के बेवकूफ प्रदेशों में सरकारें भी इन गुंडों की लाठियों के सामने आत्मसमर्पण करते हुए अपने शहरों के बाग-बगीचों से नौजवान लडक़े-लड़कियों को दूर भगाने में जुट जाती हंै। यह घोर साम्प्रदायिक, कट्टर, और नफरती सोच के सामने सरकार का समर्पण होता है, और यही बात इन गुंडों को मान्यता देती है। 

छत्तीसगढ़ में पिछली भाजपा की डॉ. रमन सिंह की सरकार ने बलात्कारी आसाराम (उस वक्त बलात्कार कर चुका था, पर कैद नहीं हुई थी) के एक साम्प्रदायिक फतवे पर अंगे्रजी कैलेंडर के वेलेंटाइन-डे के दिन को मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाना शुरू किया था। उसी वक्त हमने इसी जगह पर उसका विरोध किया था कि माता-पिता की पूजा तो साल भर की जा सकती है, और इस पूजा को पे्रमी जोड़ों के पे्रम का कत्ल करके करवाने की जरूरत नहीं है। जिस आसाराम को अपने बुढ़ापे में पहुंचकर भी नाबालिग शिष्याओं से बलात्कार ठीक लगता था, उस आसाराम को नौजवान जोड़ों में पे्रम ठीक नहीं लग रहा था, और भाजपा की सरकार ने उसके दिए फतवे को सिर-आंखों पर उठाया था। एक तो आसाराम, ऊपर से भाजपा, और उनसे भी ऊपर उन्मादी हिंदू संगठन, इन सबने एक ऐसा माहौल बना रखा है कि मोहब्बत से बड़ा कोई जुर्म नहीं है। वैसे तो ये सब कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त कराने में लगे हुए हैं, लेकिन उन्हें कृष्ण का बचपन ही पसंद है, पे्रम करने की उनकी जवानी पसंद नहीं है। कृष्ण के वक्त से, कृष्ण के पहले से, और हाल के संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य से ये लोग पे्रम को अनदेखा करना चाहते हैं। इन्हें सबसे बड़ा डर यह है कि पे्रम धर्म और जाति के दायरों को तोडऩे की ताकत रखता है, और अगर ये दायरे टूट गए, तो फिर हिंदुत्व की बुनियाद ही हिल जाएगी। इसलिए पे्रम का अंकुर निकले, और उसे कुचल देना चाहिए। फिर इसके बाद भले मध्यप्रदेश के भाजपा मंत्री अपने नौकर से बलात्कार करते पकड़ाएं, या तरह-तरह के बलात्कार करते हुए हिंदुत्व के झंडाबरदार जगह-जगह पकड़ाएं, वह सब ठीक है, लेकिन दो बालिग लोगों के बीच सार्वजनिक जगह पर बैठ जाना भी इन लोगों की नजरों में जुर्म है, और इनकी नफरत के लिए हिंदुस्तान के बेवकूफ राज्यों में मोहब्बत से अधिक इज्जत है।

और मानो तुलसी पूजन दिवस, मातृ-पितृ पूजन दिवस काफी न हों, अब भारत सरकार के पशु पालन मंत्रालय के पशु कल्याण बोर्ड की तरफ से एक अपील जारी की गई है कि 14 फरवरी को काऊ-हग दिवस मनाया जाए। अंगे्रजी का शब्द हग, गोबर से अलग है, और इसका मतलब लिपटाना होता है। इस सरकार अपील में कहा गया है कि गौमाता कामधेनु होती है और पश्चिमी संस्कृति के बढऩे की वजह से वैदिक परंपराएं खत्म होने को हैं। चौदह फरवरी को सभी गौ पे्रमी गौमाता को लिपटाकर यह दिन मनाएं। यह अपील केंद्र सरकार के निर्देश पर जारी करने की बात भी लिखी गई है। मतलब यह कि इंसानी जोड़े एक-दूसरे को गले लगाने के बजाय, और ऐसा खतरनाक धर्मनिरपेक्ष, जातिनिरपेक्ष काम करने के बजाय तुलसी की पूजा कर लें, माँ-बाप के चरणों की पूजा कर लें, गाय को गले लगा लें, लेकिन जिन जोड़ों को अगली पीढ़ी लानी है, वे एक-दूसरे के गले न लगें। मोहब्बत जिन लोगों में इतनी दहशत पैदा करती है, और जो हर दिन नफरत फैलाने की कोई वजह तलाशते रहते हैं, आज अगर हिंदुस्तान में वही लोग इतिहासकार हो गए हैं, वही लोग संस्कृति के ठेकेदार हो गए हैं, चौकीदार हो गए हैं, तो फिर यह देश, इसकी जवान पीढिय़ां अंतरिक्ष की तरफ नहीं, घसीटकर गुफा की तरफ ले जाई जा रही हैं।

हिंदुस्तान की एक ऐसी काल्पनिक संस्कृति का इतिहास लेखन चल रहा है जिसमें मोहब्बत की कोई जगह नहीं थी। विरोध करने वाले ऐसे मवालियों को बलात्कार से परहेज नहीं है, बल्कि बलात्कारी कोई हिंदू हो तो उसके समर्थन में ये देश के तिरंगे झंड़े से लेकर, हिंदू झंड़ों तक को लेकर जुलूस निकालते हैं, आसाराम जैसे भयानक बलात्कारी के समर्थन में आज भी परिवार के बच्चों सहित जुलूस निकालते हैं, लेकिन जिन नौजवानों से वे हिंदुओं की अगली पीढ़ी लाने की उम्मीद करते हैं, उन नौजवानों को वे मिलने से तब तक रोकना चाहते हैं, जब तक उनके माँ-बाप अपने धर्म के भीतर, अपनी जाति के भीतर, अपनी मर्जी से उनके लिए जीवनसाथी तय न कर दें। ऐसे गिरोह की दहशत सिर्फ पश्चिमी संस्कृति से नहीं है, हिंदुस्तान के भीतर रक्त की शुद्धता खत्म हो जाने की दहशत भी उन पर हावी है, अगर नौजवान दूसरे धर्म, दूसरी जाति में शादी करने लगेंगे, तो अपने धर्म के कट्टर लोगों, धर्मांध हिंसकों की लठैती उन पर से खत्म हो जाएगी। ये लोग वेलेंटाइन-डे पर सिर्फ ईसाई इतिहास से आए हुए शब्द का विरोध नहीं कर रहे हैं, ये लोग भारत की जाति-व्यवस्था को जारी रखने के लिए मेहनत भी कर रहे हैं। और बेवकूफ सरकारें इन गिने-चुने मुट्ठी भर गुंडों को जेल में डालने के बजाय पे्रम जोड़ों को भगाकर कानून व्यवस्था बनाए रखने का झूठ गौरव पाती हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 8 फरवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

अपने ईश्वर की फोटो लगा दूसरे के ईश्वर के खिलाफ साजिश से बेइज्जती किसकी?

8 फरवरी 2023


लोग सुबह-सुबह पूजा करने की तैयारी में निकलते हैं, और किसी बगीचे, किसी कॉलोनी, या किसी सरकारी अहाते के फूल तोडऩे लगते हैं कि मानो पूजा के लिए कहीं से भी हर फूल को तोड़ लेने का ईश्वर का आदेश उनके पास है। धर्म लोगों को कई तरह के गलत काम करने का हौसला देता है जिनमें फूल तोडऩा सबसे ही छोटा जुर्म है। इसके बाद सार्वजनिक जगहों पर देखें तो धार्मिक प्रतीकों को ढो रहे लोग तरह-तरह के गलत काम करते दिखते हैं, जो अपने ईश्वर को बताने वाले प्रतीक सिर पर, चेहरे पर, कपड़ों की शक्ल में, या धागे या ताबीज की तरह दिखाते चलते हैं, उन्हें ऐसी नुमाइश के साथ-साथ गलत काम करने में कोई हिचक नहीं रहती। अभी कुछ महीने पहले एक धर्मांध और कट्टर इस्लामी हमलावर ने विख्यात लेखक सलमान रूश्दी पर जानलेवा हमला किया था जिसमें वे खुद तो किसी तरह बच गए, लेकिन उनकी एक आंख चली गई। अब उनकी उस तस्वीर के साथ उनके नाम से मुसलमानों और कुरान के खिलाफ एक बात चिपकाकर लोग चारों तरफ फैला रहे हैं, और हिंदुस्तान से की गई एक हिंदू की ऐसी ट्वीट की तस्वीर लगाकर सलमान रूश्दी ने यह लिखा है कि यह उनके नाम से फैलाया जा रहा झूठ है जो कि उन्होंने नहीं कहा है। 

अब पिछले दो दिनों से इस लेखक की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उनकी वजह से साथ की खबरों पर भी ध्यान जा रहा है, और काफी दिनों बाद सलमान रूश्दी ट्विटर पर दिखे हैं। लेकिन यह देखना हैरानी की बात थी कि   मुसलमानों और कुरान के खिलाफ दिखती हुई रूश्दी का नाम लगाकर की गई यह पोस्ट हिंदुस्तान के एक हनुमान-भक्त की की हुई थी जिसके सारे ही ट्वीट मुस्लिम विरोधी हैं, या भाजपा और अदानी के समर्थन की हैं, या मोदी की भक्ति के हैं। तमाम हिंदुत्व की ट्वीट, मुस्लिम विरोधी ट्वीट से यह अकाउंट भरा पड़ा है। अब ऐसा व्यक्ति मुस्लिमों के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने के लिए रूश्दी के नाम से झूठ को फैला रहा है। अब सवाल यह उठता है कि ऐसा व्यक्ति अपनी फोटो की जगह बजरंग बली की फोटो लगाता है, ट्विटर पेज की तस्वीर की जगह मंदिरों की फोटो लगाता है, तो क्या वह अपने ऐसे झूठ के साथ, अपनी ऐसी नफरत के साथ काम करते हुए हिंदू धर्म का भी अपमान करता है? 

आज यह बात जरूरी इसलिए है कि हिंदुस्तान जैसे देश में किसी धर्म का अपमान सिर्फ धर्मांध लोगों को दिख रहा है। आम अमनपसंद लोग जिन बातों में अपनी धार्मिक भावनाओं का कोई अपमान नहीं देखते हैं, उन बातों में भी कट्टर धर्मांध लोगों को अपमान दिखता है, और वे पुलिस और अदालतों तक भी दौड़ते हैं, और सडक़ों पर भी हिंसा करते हैं। दूसरी तरफ जब वे अपने धर्म को बचाने के नाम पर तरह-तरह की हिंसा करते हैं, सोशल मीडिया पर कत्ल और बलात्कार की धमकी देते हैं, गालियां लिखते हैं, अश्लील बातें पोस्ट करते हैं, तो उन्हें यह नहीं लगता कि उनके धर्म और उनके ईश्वर का असली अपमान तो इससे हो रहा है। 

यह बात हमने उस वक्त भी लिखी थी जब स्वर्ण मंदिर पर ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार नाम की फौजी कार्रवाई हुई थी, और सिख लोगों ने उसे पवित्र स्वर्ण मंदिर को अपवित्र करने की कार्रवाई माना था, और बाद में उसी का बदला लेने के लिए सिख अंगरक्षक ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी। उस वक्त भी हमने लिखा था कि स्वर्ण मंदिर की पवित्रता को उन लोगों ने खत्म की थी जिन लोगों ने इस मंदिर परिसर को आतंकियों का डेरा बना दिया था। भिंडरावाले के आतंकी वहां से निकलते थे, चुनिंदा कत्ल करते थे, और लौटकर आ जाते थे। स्वर्ण मंदिर की पवित्रता तो ऐसे आतंकियों ने खत्म की थी जिन्होंने उसे आतंकियों की पनाहगाह बना रखा था, और धर्म से जुड़े लोगों ने उसका कोई विरोध भी नहीं किया था। आज भी हिंदुस्तान में अपने-अपने धर्म के बलात्कारियों को बचाने के लिए उस धर्म के लोग अपने झंडे-डंडे लेकर तो निकलते ही हैं, जम्मू में मुस्लिम खानाबदोश बच्ची से मंदिर में बलात्कार और उसका कत्ल कर देने वाले पुजारी से लेकर हिंदू पुलिसवाले तक को बचाने के लिए जिस तरह धर्म का इस्तेमाल किया गया था, उसके बाद इस धर्म का अपमान करने की किसी और को कोई जरूरत पड़ सकती है? 

कोई धर्म उतना ही इज्जतदार हो सकता है जितना इज्जतदार उस धर्म को मानने वाले आम और औसत लोगों का बर्ताव होता है। अपने मानने वाले लोगों के औसत से अधिक सम्मान कोई धर्म नहीं पा सकता। आज हिंदुस्तान में अपने घर बैठे घायल रूश्दी के नाम से मुसलमान और कुरान के खिलाफ झूठ फैलाकर कोई व्यक्ति बजरंग बली की तस्वीर का सम्मान बढ़ा रहा हो, ऐसा कोई बेवकूफ ही सोच सकते हैं। इसलिए जिन लोगों को अपने धर्म की इज्जत की बड़ी फिक्र है, वे अपने धर्म को मानने वाले लोगों के बर्ताव की फिक्र करें। यह बात तमाम धर्मों पर लागू होती है, और हर किसी को पहले अपने घर में झांकना चाहिए, अपना घर सुधारना चाहिए, फिर दूसरे धर्म, और उसके ईश्वर पर सवाल उठाने चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 7 फरवरी 2023


 

(Daily Chhattisgarh)

नफरत की बातों के सैलाब अदानी की तरफ से नजरें दूसरी तरफ खींचने के लिए

 7 फरवरी 2023


हिंदुस्तान में धार्मिक और साम्प्रदायिक नफरत की बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं। महीनों गुजर गए जब सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के अफसरों को यह खुली चेतावनी दी थी कि उनके इलाकों में अगर कोई नफरत की बातें करें, और उनके खिलाफ जुर्म दर्ज न हों, तो अफसरों का ऐसा निकम्मापन और उनकी ऐसी अनदेखी अदालत की अवमानना मानी जाएगी। लेकिन महीनों गुजर गए, नफरत का सैलाब उसी रफ्तार से चल रहा है, और देश की सरकारें, अधिकतर सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं। अभी जरा से दिन पहले राजस्थान में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से अपने-आपको बाबा कहने वाले रामदेव ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ माईक से इतना जहर उगला, इतना जहर उगला कि उसे उनके कारखानों के सारे मिलावटी शहद से भी मीठा नहीं किया जा सकता था। और कई दिन तक जब रामदेव का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तैरते रहा, तब जाकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने रामदेव के खिलाफ जुर्म दर्ज किया। 

कल ही सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की एक बेंच ने नफरत की बातों को लेकर कहा है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के आधार पर नफरती-जुर्मों की कोई गुंजाइश नहीं है, हेट स्पीच को लेकर कोई समझौता नहीं हो सकता। अदालत ने साफ-साफ कहा कि अगर सरकारें नफरत की ऐसी बातों को एक समस्या मानेंगी, तो ही उनका समाधान निकल सकेगा। जजों ने कहा कि अपने नागरिकों को ऐसे घृणित अपराधों से बचाना राज्य की बुनियादी जिम्मेदारी है। कल जब सुप्रीम कोर्ट सरकारी वकील को उत्तरप्रदेश के एक मुस्लिम के साथ हुए साम्प्रदायिक जुल्म पर रिपोर्ट दर्ज न करने पर फटकार रहा था, तो अदालत की फिक्र साफ दिख रही थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में हुई धर्म-संसद नाम के एक धर्मांध और साम्प्रदायिक हिंदू जमावड़े के जो वीडियो तैर रहे हैं, वे साम्प्रदायिक फतवे देने वाले तमाम लोगों की गिरफ्तारी के लिए काफी होने चाहिए थे, लेकिन खुलेआम मुस्लिमों और ईसाईयों के जनसंहार के आव्हान भी दिल्ली पुलिस को जुर्म दर्ज करने के लिए काफी नहीं लगे, और यह इसी दिल्ली के दिल में बैठे हुए सुप्रीम कोर्ट के लिए आत्मविश्लेषण का एक मौका भी है कि क्या वह एक लोकतंत्र में  बोल रहा है, या किसी गुफा में अकेले कुछ बड़बड़ा रहा है।

नफरत की बातें करने वाले तथाकथित धार्मिक लोग हिंदुस्तान में एक तालिबानी व्यवस्था लाना चाह रहे हैं, और इसके लिए ओवरटाईम मेहनत भी कर रहे हैं। चारों तरफ बहुसंख्यक हिंदू समुदाय, और उसके वोट बैंक पर राजनीति करने वाली पार्टी या गठबंधन को भी लोगों में यह उन्माद ठीक लग रहा है क्योंकि यह सत्ता पर वापिसी का सबसे कामयाब फॉर्मूला साबित हो चुका है। ऐसी उन्मादी भीड़ यह अच्छी तरह जानती है कि लोकतांत्रिक मुद्दों को लेकर होने वाले मतदान के मुकाबले धार्मिक ध्रुवीकरण के बाद होने वाला साम्प्रदायिक जनमत संग्रह उनके लिए अधिक संभावनाएं रखता है। इसलिए एक-एक करके हिंदू-मुस्लिम खाई खड़ी करने वाले मुद्दों को उठाया जा रहा है, और मुस्लिमों के प्रतीक के रूप में पाकिस्तान को इस तरह खलनायक पेश किया जाता है कि मानो वह हिंदुस्तानी मुस्लिमों का प्रतिनिधि है, हिंदुस्तानी मुस्लिमों को इस तरह पेश किया जाता है कि वे पाकिस्तान के यहां पर छूट गए प्रतिनिधि हैं। और इन तमाम तरकीबों से हिंदुओं के मन में यह दहशत पैदा की जाती है कि हिंदू खतरे में हैं। कल सोशल मीडिया पर किसी समझदार ने यह बात लिखी है कि पहले हिंदू सिर्फ खतरे में था, अब हिंदू (अदानी की वजह से) घाटे में भी है। अब जब अदानी की वजह से सरकारी बैंकों और एलआईसी के मार्फत दसियों हजार करोड़ का घाटा, और उससे कई गुना अधिक का खतरा जनता के मत्थे मढ़ दिया गया है, तो उसके दर्द की तरफ से ध्यान बंटाने के लिए देश में तेजी से बाबाओं की जुबानी हिंदू-मुस्लिम नफरत फैलाई जा रही है ताकि अदानी से जख्मी जनता अपन दर्द भूलकर साम्प्रदायिकता में उलझी रहे। यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान में अदानी की मिल्कियत, एनडीटीवी, ने भी अदानी की तरफ से किसी पर साजिश की तोहमत नहीं लगाई, लेकिन आरएसएस के अखबार पांचजन्य ने भारत के कई विश्वसनीय मीडिया संस्थानों पर अदानी के खिलाफ साजिश का आरोप लगा दिया, कई पत्रकारों के नाम गिना दिए, और कई सामाजिक संगठनों पर विदेशी साजिश में हिस्सेदारी की तोहमत लगा दी। रातों-रात एक स्वघोषित सांस्कृतिक संगठन, आरएसएस, के अखबार ने खोजी अखबारनवीसी करके कई बरसों से अदानी के खिलाफ चल रहे इस राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘षडयंत्र का भांडाफोड़’ किया और अदानी को एक क्लीनचिट देकर देश के हिंदुओं को यह संदेश दिया कि परेशानी में घिरे अदानी का साथ देना है। और मानो यह काफी नहीं था तो आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने अभी दो दिन पहले हिंदू समाज की वर्णव्यवस्था को लेकर एक अविश्वसनीय किस्म का बयान दिया, और फिर उस पर एक स्पष्टीकरण आया, और मीडिया का एक हिस्सा अदानी को छोड़ इन बयानों में उलझ गया। यह सब कुछ बहुत मासूम सिलसिला हो, ऐसा गले नहीं उतरता है। कुल मिलाकर दिखता यह है कि अदानी को बचाने के लिए भी जगह-जगह हिंदू-मुस्लिम मुद्दों के टायर जलाकर सडक़ों पर रखे जा रहे हैं, ताकि लोगों का अदानी की तरफ से ध्यान हट जाए। यह तमाम कोशिशें उस वक्त हो रही हैं जब संसद चल रही है, और वहां पर सरकार अदानी के नाम पर घिरी हुई है। 

साम्प्रदायिकता की बातें, मुस्लिम समाज के रीति-रिवाज को लेकर कानून, ईसाईयों पर धर्मांतरण की तोहमतें, भारत के खिलाफ पाकिस्तान की तरफ से आतंकी साजिशें, जाति-व्यवस्था का विवाद, ये तमाम चीजें हाल के बरसों में बड़ी सहूलियत के साथ जनधारणा प्रबंधन के काम आ रही हैं, और देश को इन खतरों की शिनाख्त करना अब तक सीख लेना चाहिए था। सोशल मीडिया इस काम में एक बड़ा औजार बनकर मौजूद है, और देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मानो इसके मुकाबले अपने-आपको धारदार हथियार बनाकर पेश कर रहा है। देश की थोड़ी बहुत रही-सही उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से है, लेकिन उसकी मजबूरी यह है कि वह अदानी, संघ, और हेट स्पीच को एक साथ मिलाकर नहीं देख सकता है, लेकिन जनता तो देख सकती है।

(Daily Chhattisgarh)