दीवारों पर लिक्खा है, 7 मई 2024


 

राधिका खेड़ा से निकली है तो बात दूर तलक जाएगी..

7 मई 2024

  

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस पार्टी में एक नया बवाल मीडिया का काम देखने वाले उसके लोगों के बीच हुआ। दिल्ली से आई पार्टी की राष्ट्रीय मीडिया समन्वयक राधिका खेड़ा ने रोते हुए ये गंभीर आरोप लगाए कि छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने उनसे बदसलूकी की, और उनकी शिकायतों पर पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से लेकर दिल्ली के बड़े कांग्रेस नेताओं तक किसी ने भी कुछ नहीं किया। ऐसी चर्चा है कि विधानसभा चुनाव के पहले से यह टकराव चल रहा था, और छत्तीसगढ़ में मतदान के बीच आधे से अधिक सीटों पर बाकी मतदान के पहले राधिका खेड़ा ने यह बम फोड़ा है, और इसके पीछे भाजपा हो सकती है। अब आज अगर कांग्रेस पार्टी के भीतर यह बवाल हो रहा है, तो सबसे पहले तो कांग्रेस के नेता जिम्मेदार हैं जिन्हें 6 महीने पहले से टकराव मालूम था, और उन्होंने इसे नहीं निपटाया। आज जब पूरा देश राम से अधिक भाजपा का नाम लेने के माहौल से गुजर रहा है, उस वक्त अपने घर की आग के लिए कांग्रेस भाजपा पर तोहमत लगाए, इससे कुछ अधिक हासिल नहीं होना है। लेकिन इस विवाद से कुछ बातें उठी हैं, और उन पर कांग्रेस पार्टी, और उसे छोड़ देने वाली राधिका खेड़ा दोनों को जवाब देना चाहिए। हम किसी महिला की की हुई शिकायत को पहली नजर में गलत नहीं मानते हैं, लेकिन दोनों तरफ की महज जुबानी तल्खी की शिकायतों का हल वह निकल सकता है जो सुशील आनंद शुक्ला ने सुझाया है, उन्होंने कहा है कि वे नार्को टेस्ट करवाने के लिए तैयार हैं, और उससे इन आरोपों को भी कसौटी पर चढ़ाया जा सकेगा जिनके मुताबिक राधिका खेड़ा अपने साथ कई किस्म की बदसलूकी की बात कहती हैं, रात में होटल के कमरे के दरवाजे पीटने की बात कहती हैं, और शराब पीने के प्रस्ताव का आरोप भी लगाती हैं। नार्को टेस्ट ऐसे विवाद का एक अच्छा हल हो सकता है जिसके अधिक सुबूत नहीं हैं, और जिनके पीछे गहरी राजनीति होने के संदेह या आरोप हैं। सार्वजनिक जीवन में जब बात चाल-चलन पर आती है, तो नार्को टेस्ट की बात पर राधिका खेड़ा को भी हॉं कहना चाहिए। 

चूंकि यह मामला कई दिनों से खबरों में बना हुआ है, और अब कांग्रेस पार्टी पर उसे छोड़ते हुए उसकी एक बड़ी प्रवक्ता ने यह आरोप लगाया है कि चूंकि वे रामलला के दर्शनों को अयोध्या गई थीं, इसलिए हिन्दूविरोधी कांग्रेस पार्टी इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। उन्होंने अपने इस्तीफे में बार-बार राम का जिक्र किया है, और अभी कुछ दिन पहले तक मीडिया से बात करते हुए वे बार-बार इस बात का जिक्र कर रही थीं कि कांग्रेस पार्टी हिन्दूविरोधी नहीं हैं, और उसने उनके (राधिका के) अयोध्या जाने पर भी कोई आपत्ति नहीं की थी। उन्होंने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के संचार विभाग के साथ अपने टकराव के चलते हुए भी एक बार भी अयोध्या का जिक्र नहीं किया था, पार्टी के रामविरोधी या हिन्दूविरोधी होने की चर्चा नहीं की थी। अब एकाएक उन्होंने राम का नाम लेकर जितने गंभीर आरोप लगाए हैं, वे कांग्रेस पार्टी के इस घोषित रूख के ठीक खिलाफ हैं कि उसके नेता-कार्यकर्ता, सदस्य अपनी मर्जी से अयोध्या जाना तय करें। पार्टी ने इसे संगठन का मुद्दा नहीं बनाया था, और लोगों की अपनी पसंद या विवेक पर इसे छोड़ दिया था। अब राधिका खेड़ा उसके ठीक खिलाफ यह बात कह रही हैं। राम के नाम पर अगर इतना बड़ा विवाद हो रहा है, तो नार्को टेस्ट जैसी अग्नि परीक्षा से किसी को परहेज नहीं होना चाहिए। चूंकि बदसलूकी की अधिक शिकायत राधिका खेड़ा को है, इसलिए छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता का नार्को टेस्ट होना बेहतर होगा, और उन्होंने खुद ही इसका प्रस्ताव भी रख दिया है। 

लेकिन इस विवाद में कुछ दूसरी चीजें सामने आई हैं जिनकी भी जांच हो जानी चाहिए। एक आरोप यह आया है कि राधिका खेड़ा की मां की एक कंपनी है जो कि फिल्में बनाती है, और छत्तीसगढ़ में सरकार या कांग्रेस पार्टी से उसे फिल्म बनाने का काम मिला था, और उसके भुगतान का भी कोई विवाद चल रहा है। अगर ऐसा है तो इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि कांग्रेस संगठन के लोग अपनी घरेलू कंपनियों को लेकर संगठन या पार्टी की सरकार को किस तरह दुहते हैं, और क्या इस बारे में पार्टी की कोई नीति है? यह विवाद इसलिए भी सुलझाना चाहिए कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अभी एक ऐसा एग्रीमेंट सामने आया था जिसके मुताबिक तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा के बेटे की कंपनी को कांग्रेस पार्टी से पांच-छह करोड़ रूपए दिए गए थे। इसके अलावा यह बात भी जगजाहिर है कि विनोद वर्मा की कुछ दूसरी कंपनियां भूपेश सरकार का कई तरह का काम कर रही थीं। यह चर्चा भी आम रहती हैं कि कांग्रेस हाईकमान के आसपास के कई बड़े नेता अपनी कुछ बेनामी कंपनियों के नाम से विज्ञापन, चुनाव सर्वे, और रणनीति जैसे कामों के नाम पर पार्टी से मोटी रकम ले लेते हैं। अब अगर राधिका खेड़ा के मामले में ऐसा हुआ है, तो उसका भी खुलासा होना चाहिए, और नार्को टेस्ट होने पर तो तमाम बातों का खुलासा हो सकता है। 

हम भारत जैसी, गटर के पानी से भी गंदी हो चुकी, राजनीति में नार्को टेस्ट को फिटकरी की तरह का देखते हैं जो कि गंदे पानी को साफ करने के लिए सदियों से इस्तेमाल हो रही है। न सिर्फ कांग्रेस के इस मामले में, बल्कि सत्ता पर बैठे तमाम लोगों का कार्यकाल खत्म होने पर अगर उनका अनिवार्य रूप से नार्को टेस्ट करवाया जाए, और उनके बारे में हवा में चल रहे तमाम विवादों पर सवाल किए जाएं, तो हो सकता है कि यह आधुनिक फिटकरी राजनीति से गंदगी कुछ दूर तक तो कम कर दे। ऐसा होने पर जनता का भी अधिक भरोसा राजनीति, और कुल मिलाकर लोकतंत्र पर लौट सकता है। आज जनता सरकार को टैक्स देने से इसलिए भी बचना चाहती है क्योंकि उसे मालूम है कि सरकारें बहुत भ्रष्ट रहती हैं, और उसके दिए हुए टैक्स जनता के काम कम आते हैं, भ्रष्टाचार में अधिक जाते हैं। आज का मुद्दा वैसे तो कांग्रेस संगठन के भीतर के विवाद से शुरू हुआ था, लेकिन इसका विस्तार नार्को टेस्ट के व्यापक इस्तेमाल तक करने के बारे में जनमत तैयार करने के लिए होना चाहिए। वैसे भी जो लोग संविधान की शपथ लेकर पांच बरस अप्सरा की तरह रिझाने वाली सत्ता पर सवार रहते हैं, उन्हें इतना त्याग तो करना ही चाहिए कि सत्ता की शानदार इनिंग के बाद वे नार्को टेस्ट को उसी तरह तैयार रहें जिस तरह कि ओलंपिक में शामिल होने तमाम खिलाड़ी नशे की जांच के लिए तैयार रहते हैं। और राधिका खेड़ा ने कांग्रेस से दिए इस्तीफे में जितने दर्जन बार राम का नाम लिया है, उसे देखते हुए उन्हें भी सुशील आनंद शुक्ला के साथ-साथ नार्को टेस्ट के लिए तैयार रहना चाहिए, आखिर अग्निपरीक्षा गौरवशाली भारतीय परंपरा रही है, और राम के युग से ही इसका चलन भी रहा है। 

(Daily Chhattisgarh)

कल वोट डालने से पहले वोटर को सोचना चाहिए..

मई 2024

  

छत्तीसगढ़ की बाकी लोकसभा सीटों के साथ देश में सौ से जरा कम, 95 सीटों पर 7 मई को वोट डलने जा रहे हैं। इनमें 12 राज्यों और केन्द्र प्रशासित प्रदेशों की सीटें हैं। ये राज्य इतने बिखरे हुए हैं कि इनमें किसी एक पार्टी या गठबंधन का बोलबाला नहीं दिख रहा है लेकिन खेमों में बंटा हुआ मीडिया, और सोशल मीडिया इसके पहले के दो दौर के मतदान का अपने-अपने हिसाब से विश्लेषण करते हुए, अपने पसंदीदा लोगों की जीत की मुनादी कर रहा है। दुनिया के 60 देशों में इस बरस चुनाव हो रहे हैं, और दुनिया के आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस विशेषज्ञ यह मान चुके हैं कि इस बार चुनावों को प्रभावित करने की कोशिशों में एआई के इस्तेमाल को रोक पाने का वक्त अब जा चुका है, और अब दुनिया की यह ताकत नहीं है कि चुनावों को इस प्रभाव से बचा सके। 60 देशों का मतलब दुनिया के चुनाव-आधारित देशों में से करीब एक तिहाई देश होता है, और अगर इनमें घरेलू पार्टियां, या विदेशी सरकार-कारोबार एआई की ताकत से वोटरों को प्रभावित करते हैं, तो जाहिर है कि चुनकर आने वाले लोकतंत्र बड़ी ताकतों की मर्जी के रहेंगे, और शायद बड़ी ताकतों के पांव दबाएंगे। 

भारत में भाजपा को छोड़ बाकी राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के अपने परंपरागत तरीकों से निकल ही नहीं पा रहे हैं। भाजपा अकेली ऐसी पार्टी है जिसने अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूद हर किस्म के औजार और हथियार का इस्तेमाल अपने चुनाव प्रचार में किया है, और लोकतंत्र इसकी इजाजत भी देता है। भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए, और देश की बाकी राजनीतिक पार्टियों के बीच दूसरे तमाम मुद्दों को लेकर गैरबराबरी के हालात हो सकते हैं, शायद हैं भी, लेकिन कल्पनाशीलता और उसके आधार पर चुनावी तैयारी करने से तो भारत की सत्तारूढ़ पार्टी दूसरी पार्टियों को रोक नहीं सकती है। इस मामले में भी भारत का विपक्ष बुरी तरह पिछड़ा हुआ है। लेकिन इसके साथ-साथ देश की चुनाव आयोग सरीखी संवैधानिक संस्थाओं से लेकर देश की जांच एजेंसियों तक का जैसा अभूतपूर्व और असाधारण इस्तेमाल आज की मोदी सरकार कर रही है, वह भी अब तक सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने लोकतांत्रिक-संवैधानिक सीमाओं और संभावनाओं के लचीलेपन का ऐतिहासिक इस्तेमाल है। अब सवाल यह भी उठता है कि अगर ऐसे इस्तेमाल के खिलाफ देश का विपक्ष और बाकी लोकतांत्रिक ताकतें सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर गुहार नहीं लगा रही हैं, तो सुप्रीम कोर्ट अकेले तो विपक्ष की भूमिका निभा भी नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को नापसंद आने वाले बहुत से फैसले पिछले कई महीनों में दिए हैं, इसलिए यह मानने की कोई वजह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग जैसी सत्ता-प्रतिबद्ध संस्था बन चुका है। अदालत के कई फैसले मोदी सरकार के लिए खासी दिक्कतें खड़ी कर चुके हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया की बुरी से बुरी विपरीत परिस्थिति से भी उबर जाने की अपनी क्षमता का सुबूत गुजरात के वक्त से देते आए हैं, और आज वह जारी भी है। ऐसे में देश में हाल के हफ्तों तक बिखरे, कमजोर, और असंगठित विपक्ष को लेकर अगर जनता में उत्साह कुछ कम दिखा है, तो यह भी सत्तारूढ़ पार्टी की कामयाबी रही है। 

लेकिन अचानक ही मतदान शुरू होने के बाद इस देश में इन कुछ हफ्तों में मोदी की अगुवाई में भाजपा के चुनावी एजेंडा में जो फेरबदल देखने मिल रहा है, वह लोगों को मतदाताओं के रूझान में एक फेरबदल सुझा रहा है। ऐसा है या नहीं, इसे परखने का हमारे पास कोई सर्वे नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि पिछले कुछ हफ्तों में मोदी और उनकी पार्टी ने दस साल की अपनी कामयाबी के दावों को छोडक़र जिस तरह बहुत ही सतही और खूंखार मुद्दों को उठाया है, उससे लोगों को हैरानी हो रही है। आमतौर पर जो लोग मोदी के लिए हमदर्दी और तारीफ रखते हैं, वे भी कुछ हैरान दिख रहे हैं कि मुस्लिम से लेकर मंगलसूत्र तक जैसे गैरमुद्दों को सच से एकदम परे जाकर क्यों उठाया जा रहा है? क्या सरकार की सरकारी और निजी एजेंसियां देश में हवा के रूख के बदलने का इशारा कर रही हैं? 

मतदाताओं का रूझान और हवा का रूख, ये बातें बड़ी अमूर्त रहती हैं। इनका न चेहरा-मोहरा होता, न कद-काठी होती, ये सिर्फ कल्पना की बातें रहती हैं। इसलिए हम इनके आधार पर कल के मतदान के लिए लोगों को कुछ नहीं सुझा रहे हैं, लेकिन इतना जरूर है कि मतदाताओं को अधिक से अधिक वोट डालने के लिए जरूर कहना चाहते हैं। हमारा ख्याल है कि घर बैठने वाले वोटरों में से एक चौथाई भी अगर घंटे भर का वक्त निकालकर वोट डालने चले जाएंगे, तो नेताओं के कपड़े गीले हो जाएंगे। आज हर तरह की राजनीतिक अटकलबाजी, योजना, और चुनावी रणनीति पिछले चुनावों में वोटरों की गिनती पर आधारित रहती है। अगर वह गिनती ही दस-पन्द्रह फीसदी बदल जाएगी, तो नेताओं और पार्टियों के होश उड़ जाएंगे। लोकतंत्र में जनता को सबसे पहले तो यही करना चाहिए कि हर किसी को वोट डालने निकलना चाहिए, फिर चाहे वह वोट नोटा को ही क्यों न जाए। 

दूसरी बात यह है कि लोगों को अपने और अपनी अगली पीढ़ी के भले के लिए देश के असल मुद्दों को पहचानना सीखना चाहिए। किसी नाटक में मुखौटे लगाए हुए लोगों को देखना, उस प्रदर्शन के वक्त तक ही ठीक रहता है, उससे परे लोग अगर उन मुखौटों को ही हकीकत मान लेते हैं, तो इससे उनका नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होता। लोगों को जिस नेता और पार्टी को वोट देना हो, उन्हें अपना फैसला जिंदगी और देश-प्रदेश के असल मुद्दों के आधार पर करना चाहिए। धर्म, जाति, अंधभक्ति, नफरत और हिकारत से लोकतांत्रिक फैसले नहीं करने चाहिए। अपने बच्चों को मकान की दीवारें चाहे कमजोर देकर जाएं, लोकतंत्र मजबूत देकर जाना चाहिए। भारत दुनिया का एक इतना बड़ा देश है कि यहां एक अच्छी या बुरी सरकार का बनना इस देश से परे, दुनिया को भी बहुत प्रभावित कर सकता है। इसलिए लोगों को पूरी धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी देखते हुए, देश के मुद्दों को देखते हुए, लोकतंत्र की बुनियादी समझ को ध्यान में रखते हुए वोट देना चाहिए। आज के वक्त यह कहना भी जरूरी है कि हिन्दुस्तान में चुनावों को ही लोकतंत्र मान लेना गलत है। चुनाव सिर्फ एक औजार है जो कि देश की अगली सरकार बनाने में काम आता है, लोकतंत्र तो सरकार से भी बहुत ऊपर होता है, दूसरी लोकतांत्रिक संस्थाओं से भी ऊपर होता है, वह बहुत ही व्यापक और अमूर्त होता है। ऐसे बेचेहरा लोकतंत्र को सिर्फ चुनाव की शक्ल में पहचानना सही नहीं होगा। सही तो यह होगा कि लोग चुनाव नाम के औजार का इस्तेमाल करने के पहले अपने देश के असल मुद्दों के बारे में सोचें, और उसके बाद वोट दें। जिंदगी की हकीकत, और उसके असल मुद्दों की फिक्र करने वाले तमाम लोगों को इस, और अगले कई चुनावों के लिए हमारी शुभकामनाएं।

(Daily Chhattisgarh)

संगठित भ्रष्टाचार से बचने के लिए देश के तरीके बदलना जरूरी

5 मई 2024

 

छत्तीसगढ़ में पिछली भूपेश सरकार के दौरान हुए कई किस्म के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में से एक अभी सामने आया है जिसमें केन्द्र सरकार की भारतीय संचार सेवा से प्रतिनियुक्ति पर आए एक अफसर को गिरफ्तार किया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार किसानों से धान खरीदती है, और फिर राईस मिलों से उसकी मिलिंग करवाकर उसे एफसीआई को देती है, या केन्द्र और राज्य की किसी दूसरी योजना में इस्तेमाल करती है। अभी दो बरस पहले तक यह मिलिंग रेट 40 रूपए क्विंटल था, और कहा जाता था कि राज्य सरकार की संस्था मार्कफेड इस काम में 20 रूपए क्विंटल का कमीशन लेती थी। इसके बाद भूपेश मंत्रिमंडल ने एक दिन अचानक राईस मिल एसोसिएशन की एक चिट्ठी के आधार पर 40 रूपए की इस रेट को तीन गुना बढ़ा दिया, और 120 रूपए कर दिया। इसके बाद मार्कफेड के एमडी रहे मनोज सोनी नाम के भारतीय संचार सेवा से आए अफसर ने 60 रूपए क्विंटल की वसूली की। जाहिर है कि एक अफसर अपने खुद के भ्रष्टाचार के लिए न तो राज्य में चले आ रहे किसी रेट को कैबिनेट में तीन गुना करवा सकता था, और न ही सौ-दो सौ करोड़ जैसी बड़ी रकम वसूल सकता था। पिछली सरकार के वक्त सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल थे, जो पुराने राईस मिल कारोबारी हैं, और कारोबारियों के संगठन में बड़े पदाधिकारी भी रहे हैं। अभी वे साल भर से ईडी के शिकंजे से बचने के लिए फरार चल रहे हैं, लेकिन उनके कोषाध्यक्ष रहते यह तो हो भी नहीं सकता था कि उनके धंधे से उनकी पार्टी की सरकार में उनकी जानकारी के बिना इतनी संगठित उगाही हो जाए। साधारण समझबूझ तो यही कहती है कि रामगोपाल अग्रवाल जैसे जानकार व्यक्ति ने ही ऐसी योजना बनाई होगी क्योंकि पार्टी फंड आना तो उन्हीं के पास था। आज हालत यह है कि मार्कफेड के एमडी रहे दो-दो लोग जेल में हैं। यह एक अलग बात है कि इन दोनों के ठीक पहले किरण कौशल नाम की जो आईएएस अफसर इस कुर्सी पर थी, उन्होंने सत्ता के अंधाधुंध दबाव के बाद भी गलत भुगतान करने से मना कर दिया था, और भूपेश सरकार ने उन्हें तुरंत वहां से हटाया था। अगले दो एमडी उगाही में जुट गए, और अब ईडी की गिरफ्तारी के बाद जेल में पड़े हुए हैं। 

कारोबारियों से सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के लोग उगाही करें, इसमें कुछ भी नया या असाधारण नहीं है। ऐसा हमेशा ही होता है। लेकिन सरकार के खर्च को जिस तरह तीन गुना करके चावल की कस्टम मिलिंग से उगाही की गई थी, वह छुपने लायक जुर्म नहीं था। सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिरकर, और भागीदारी की वजह से भ्रष्टाचार करने वाले अफसरों की जो मिसालें छत्तीसगढ़ में सामने आई हैं, वैसा इस प्रदेश में तो पहले कभी नहीं हुआ था। यह एक अलग बात हो सकती है कि केन्द्र सरकार की जांच एजेंसियां सिर्फ कांग्रेस सरकारों और नेताओं के भ्रष्टाचार पकड़ रही हैं, लेकिन इनमें किसी मासूम या ईमानदार के फंसने की आशंका अभी भी नहीं लगती है। लोगों को पहली नजर में यह दिखता है, और मालूम है कि यह सब भ्रष्टाचार सचमुच ही हुआ था। चावल हो, शराब, या कोयला ट्रांसपोर्ट, इन सबमें जो संगठित भ्रष्टाचार हुआ था, उसने आईएएस-आईपीएस अफसरों की साख को चौपट कर दिया क्योंकि वे खुलकर इस माफिया-कारोबार में भागीदार हो गए थे। यही वजह है कि साल भर बाद भी ऐसे बड़े अफसरों को जमानत भी नहीं मिल पा रही है। कारोबारियों से राजनीतिक चंदा शिष्टाचार के दायरे में हमेशा से चले आ रहा था, लेकिन उसे चाकू की नोंक पर, कारखाने बंद करवा देने की धमकी देकर, या गिरफ्तारी का डर दिखाकर इस भयानक अंदाज में कभी नहीं वसूला गया था। इसलिए अब जब ईडी दिलचस्पी लेकर भूपेश सरकार के वक्त के जाने कितने ही मामलों में कार्रवाई कर रही है, तो संबंधित कारोबारियों से प्रदेश के प्रमुख और जानकार लोगों को तो यह जानकारी मिल ही रही है कि सचमुच ही ऐसा भ्रष्टाचार हुआ था। 

यूपीएससी के चुने हुए ऐसे अफसरों का संगठित माफिया की तरह नेताओं के साथ मिलकर जबरिया उगाही का धंधा चलाना बताता है कि भारत में ऐसी अखिल भारतीय सेवाएं भ्रष्टाचार का एक ढांचा बन चुकी है। इन सेवाओं के अफसर अंधाधुंध ताकत के ओहदे पाते हैं, और उनके सौ किस्म के गलत काम जांच से परे रह जाते हैं। अब भारत सरकार और राज्यों के सामने विचार-विमर्श का एक यह मुद्दा रहना चाहिए कि अखिल भारतीय सेवाओं का क्या बेहतर विकल्प हो सकता है, या किस तरह उनके कामकाज को बदला जाए ताकि वे केन्द्र और राज्य सरकारों के नाजायज दबाव झेल सकें। आज देश भर में इंकम टैक्स विभाग ने जिस तरह करदाताओं के मामले कम्प्यूटर से बिना पसंद-नापसंद छांटकर पर्ची निकालने के अंदाज में देश में किसी भी राज्य में भेज देना चालू किया है, और करदाता और अफसर एक-दूसरे का चेहरा भी नहीं देख पाते, क्या उसी तरह का कुछ काम अखिल भारतीय सेवाओं के अफसरों की राज्यों में तैनाती को लेकर हो सकता है? या राज्यों के भीतर अफसरों को अलग-अलग जिम्मेदारी मिलने के वक्त कुछ ऐसा किया जा सकता है कि नेताओं की पसंद पर किसी अफसर को कोई कुर्सी न मिले? हमारी समझ इस मामले में बड़ी सीमित है, और इसलिए सत्ता के संगठित भ्रष्टाचार को रोकने की कौन सी तरकीबें हो सकती है, इस पर और अधिक जानकार लोग शायद कुछ बेहतर सुझा सकते हैं। देश के बेदाग भूतपूर्व अफसरों से भी राय लेनी चाहिए कि यह देश नौकरशाही के संगठित भ्रष्टाचार, और नेताओं से भागीदारी से छुटकारा कैसे पा सकता है? जब टेलीफोन सेवा का कोई अफसर राज्य में धान की मिलिंग का बहुत बदनाम और बहुत कमाऊ दफ्तर पा सकता है, और वहां बैठकर लूटमार कर सकता है, तो फिर इस व्यवस्था को सुधारने या बदलने की जरूरत है। और बात सिर्फ छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार की नहीं है, बहुत से प्रदेशों में दूसरी पार्टियों की भी बहुत सी सरकारें कमोबेश इसी तरह का काम करती हैं, और पूरे देश को जनता के पैसों की इस लूटमार को रोकने का रास्ता तलाशना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 5 मई 2024


 

इक्कीसवीं सदी का भारत का संविधान भी महिला को क्या सेक्स-सामान मानेगा?

 4 मई 2024

 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पत्नी के साथ अप्राकृतिक सेक्स करने के आरोपी पति को बरी कर दिया है। पत्नी ने यह रिपोर्ट लिखाई थी, और अदालत ने यह मान लिया है कि पत्नी के साथ किसी भी तरह का सेक्स अपराध नहीं है। जिसे अप्राकृतिक कहा जाता है, और जो धारा 377 के तहत अपराध है, वह भी पत्नी के मामले में पुरूष पर लागू नहीं होता। जस्टिस जी.एस.अहलूवालिया ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर एक वैध पत्नी विवाह के बाद पति के साथ रह रही है, तो उसके द्वारा किया गया कोई भी सेक्स जुर्म नहीं माना जा सकता, अगर पत्नी 15 बरस से छोटी नहीं है। जज ने कहा कि शादीशुदा जोड़ों में रेप को अभी तक कानूनी रूप से नहीं माना गया है, इसलिए यह मामला रद्द किया जा रहा है। पत्नी ने रिपोर्ट लिखाई थी कि पति ने उसके साथ कई बार अप्राकृतिक सेक्स किया, और किसी को बताने पर तलाक की धमकी भी दी थी। 

अब यहां पर कई सवाल खड़े होते हैं, जो कि कानून को लेकर भी हैं, बड़ी अदालतों द्वारा कानून की व्याख्या को लेकर भी हैं, और कानून बनाने वाली संसद को लेकर भी हैं। क्या सचमुच ही आज 21वीं सदी के हिन्दुस्तान में महिला के इतने भी हक नहीं हैं कि वह पति द्वारा जबर्दस्ती करके किए जा रहे अप्राकृतिक सेक्स का विरोध कर सके? क्या संविधान की व्याख्या करने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट आज के वक्त में भी भारतीय महिला को एक इंसान की तरह देखने से इंकार कर सकते हैं? क्या मौजूदा कानूनों की इतनी संकुचित व्याख्या की जा सकती है जो कि महिला के बुनियादी इंसानी हकों को भी नकार दे? अगर भारतीय संवैधानिक अदालतों की सोच महिला को मनुस्मृति के नजरिए से देखती है, तो यह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाती। हमारा ख्याल है कि यह मामला जबलपुर हाईकोर्ट के बाद अगर किसी तरह सुप्रीम कोर्ट पहुंच पाएगा, और वहां पर इसकी संवैधानिक व्याख्या के लिए कोई संविधानपीठ बैठेगी, तो वह महिला के अधिकारों की एक बेहतर व्याख्या करेगी। अभी जबलपुर हाईकोर्ट के जज ने भारतीय पति को जो खुली छूट दी है, उसने भारतीय शादीशुदा महिला को हर किस्म के बलात्कार का सामान करार दिया है। यह फैसला दिल दहलाता है, और महिला अधिकारों के लिए लडऩे वाले कुछ वकीलों को खुद होकर सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ जाना चाहिए क्योंकि जब तक सुप्रीम कोर्ट इसके खिलाफ कोई राय जाहिर नहीं करेगी, तब तक इस हाईकोर्ट का यह फैसला एक नजीर की तरह निचली अदालतों में इस्तेमाल किया जाता रहेगा। 

ऐसा लगता है कि भारत में शादीशुदा जोड़ों के बीच बलात्कार की बात को मानने से कानून जिस तरह इंकार करता है, उस पर भी एक बार और गौर करने की जरूरत है, फिर चाहे इस देश की सरकारें, राजनीतिक दल, और सुप्रीम कोर्ट भी अब तक पत्नी की बलात्कार की शिकायत को किसी सजा के लायक नहीं मान रहे हैं। पुरानी चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में फेरबदल आसानी से नहीं होता है। सतीप्रथा से लेकर बाल विवाह तक के खिलाफ कानून आसानी से नहीं बन पाए थे, और उन पर अमल तो और भी मुश्किल से हो पाया था, और आज दशकों बाद भी हम अपने आसपास गांव-कस्बों के मामले देखते हैं जहां पुलिस और प्रशासन जाकर बाल विवाह को रोकते हैं। इसलिए जिस देश में हाईकोर्ट के कई जज बहुत से फैसलों में औपचारिक रूप से मनुस्मृति का हवाला देते हैं, वहां महिला अधिकार की बात करना आसान नहीं है। जहां बड़ी अदालतें अपने लिखत फैसलों में महिलाओं के अधिकार कुचलने में जरा भी लिहाज नहीं करती हैं, वहां पर सुप्रीम कोर्ट ने अगर शादीशुदा महिला की रेप की शिकायत को किसी लायक नहीं माना है, तो उसमें हैरानी नहीं होती है। यह बात सिर्फ हिन्दुस्तान की नहीं है, हम अमरीका की बात करें तो वहां सदियों के लोकतंत्र के बाद भी 1920 तक तो महिलाओं को वोट डालने का हक नहीं मिला था, जबकि इसके पहले आधी सदी से देश भर में इसके लिए संघर्ष चल रहा था। दुनिया के बाकी देशों का इतिहास भी अलग-अलग दर्जों का तालिबानी इतिहास रहा है, जो कि आज हम अफगानिस्तान में देख रहे हैं। और जब जजों का यह हाल रहता है कि वे महिला के किसी बुनियादी अधिकार के बारे में नहीं सोचते हैं, तो उनके नीचे के, कानून की और इंसाफ की कुछ कमसमझ रखने वाले वकील और अफसर और क्या सोच सकते हैं? नतीजा यह होता है कि थाने से लेकर हाईकोर्ट तक महिला के हक अलग-अलग कई तरह के बूटों से कुचले जाते हैं। फिलहाल तो सुप्रीम कोर्ट भी महिलाओं को बराबरी के नागरिक अधिकार और मानवाधिकार देते हुए नहीं दिख रहा है, और राजनीतिक दल और संसद तो दकियानूसी रहते ही हैं। सुधारवादी, प्रगतिशील, और न्यायप्रिय नजरिया जब किसी तबके का नहीं रहता, तो महिला को अपनी लड़ाई खुद ही लडऩी पड़ती है। हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद इसकी जरूरत और अधिक लग रही है कि महिला को सेक्स के सामान की तरह इस्तेमाल किए जाने पर रोक कैसे लग सकती है। 

लोगों को याद होगा कि कुछ देशों में आईएसआईएस, अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों ने इस्लाम की एक किसी बहुत ही तंगनजरिए की व्याख्या करते हुए महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाने को भी जायज ठहराया था। ऐसे सैकड़ों मामले मीडिया में बड़ी बारीकी से दर्ज हैं जिसमें इस्लामिक स्टेट नाम के आतंकी संगठन ने हजारों महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाया, और औपचारिक रूप से उसे धर्म के अनुरूप भी कहा। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में मुस्लिम महिलाओं पर बुर्का और हिजाब लादकर रखा जाता है, जो कि सीधे-सीधे उन्हें समाज के भीतर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का काम है। इसके अलावा चार शादियां, तीन तलाक जैसे और रिवाज भी हैं जो कि महिलाओं के इंसानी हकों के खिलाफ हैं। इसलिए लड़ाई सिर्फ किसी एक धर्म की महिला की अपनी सामाजिक व्यवस्था, या अपने देश के कानून से लड़ाई की नहीं है, उसे कदम-कदम पर संघर्ष करना रहता है, और जबलपुर हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ भी भारत की महिलाओं को संघर्ष करना रहेगा। अभी हम मौजूदा कानूनों की बेहद तकनीकी व्याख्या करके महिला की शिकायत को खारिज करने पर अधिक कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन प्राकृतिक न्याय की हमारी बड़ी साधारण समझ यह कहती है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिकपीठ में टिकना नहीं चाहिए, फिर चाहे वह संवैधानिकपीठ संसद को ही यह सिफारिश क्यों न करे कि उसे महिला के साथ पति द्वारा जबरिया सेक्स के खिलाफ कानून बनाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 मई 2024


 

दीवारों पर लिक्खा है, 3 मई 2024


 

वक्त की किफायत बड़ी कीमती, लेकिन इस्तेमाल करने वालों के लिए ही..

 3 मई 2024

  

अमरीका में शेयर मार्केट से जुड़े हुए कम्प्यूटर एल्गोरिदम बनाने वाले एक विशेषज्ञ ने अभी एक किताब लिखी है कि किस तरह वक्त बचाया जा सकता है। इस लेखक, निक सॉनेनबर्ग कई जगह भाषण देते हैं, और दुनिया के कामयाब कामगारों को उनके रोज के काम में वक्त बचाने की तरकीबें बताते हैं। दरअसल शेयर मार्केट का कारोबार ऐसा होता है कि किसी कंपनी के शेयरों में पूंजीनिवेश करते हुए अगर एक सेकेंड की भी देरी होती है, तो उसमें भाव ऊपर-नीचे हो सकता है, और नफा नुकसान में बदल सकता है। एक-एक पल की कीमत वहां समझ आती है। और ऐसे एक-एक पल न सिर्फ फैसले लेते वक्त महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि जिंदगी में हर जगह महत्वपूर्ण रहते हैं, हर दिन, और हर वक्त। लोग रोज के कामकाज में अगर कुछ वक्त बचा सकते हैं, तो उस वक्त का एक उत्पादक उपयोग हो सकता है। यह वक्त बचाना रोज के ऐसे छोटे-छोटे कामों में हो सकता है कि वहां पर वक्त की बर्बादी का किसी को ध्यान भी नहीं रहता। 

कामयाब लोगों में से कुछ लोग जो कि अपनी कल्पनाशीलता की वजह से आगे बढ़ते हैं, उनकी बात छोड़ दें, तो बाकी अधिकतर लोग वक्त को लेकर किफायत बरतने वाले भी रहते हैं। दिन में घंटे तो चौबीस ही रहते हैं, सोने के वक्त में तो कटौती हो नहीं सकती है, लेकिन काम और निजी जिंदगी की बाकी चीजों में रात-दिन का दोतिहाई वक्त गुजरता है, और इन्हीं 16 घंटों में खासी किफायत और खासी बचत की जा सकती है। हर किसी की जिंदगी में तरीके और कामकाज बहुत अलग-अलग रहते हैं, इसलिए कोई एक फॉर्मूला हर किसी पर फिट नहीं बैठ सकता, लेकिन यह चौकन्नापन हर किसी के काम आ सकता है कि एक-एक सेकेंड की बचत के कौन-कौन से तरीके इस्तेमाल किए जाएं। रोज कपड़ों को किस तरह रखा जाए, लैपटॉप बैग, और कपड़ों की जेब में कौन सा सामान कहां रखा जाए, ताकि ढूंढने में कुछ पल भी खराब न हो, किस तरह कागजों के गट्ठे को व्यवस्थित करके रखा जाए, ताकि अलग-अलग कागज तुरंत हाथ आ जाएं, चाबियां कैसे जगह पर रखें ताकि ढूंढने में समय बर्बाद न हो, बाजार से लाने वाले सामान किस तरह सामानों की लिस्ट किस तरह बनाई जाए ताकि दुबारा चक्कर न लगे, और कम से कम समय में खरीददारी पूरी हो जाए, ऐसी हजार किस्म की बातें हो सकती हैं जिनमें से कुछ दर्जन बातें तो हर किसी के काम आ सकती है। लोगों को रोज दवाईयां लेनी रहती हैं, और उन्हें एक साथ इस तरह व्यवस्थित नहीं रखा जाता कि वक्त बर्बाद किए बिना उन्हें निकाला जा सके। ऐसा ही रसोई के कामकाज में होता है, ऑफिस के कामकाज में होता है, और रोजाना आवाजाही के रास्तों को तय करने में भी होता है कि किस वक्त कौन सी सडक़ खाली रहती है। कुछ लोग ऑनलाईन कुछ कामों को घर पर करने के बजाय ऑफिस में आकर करें, तो हो सकता है कि घर से जल्दी निकलने पर सडक़ खाली मिले, और ऑफिस में आकर उसी काम को करते हुए सफर का वक्त बच जाए। आमतौर पर लोग अपने खुद के वक्त को इतना कीमती नहीं मानते कि वे अलग-अलग वक्त पर सडक़ों पर ट्रैफिक के दबाव को ध्यान में रखकर काम को पहले या बाद में कर लें, लेकिन जिंदगी में कामयाब होना है तो वक्त की जरा-जरा सी बर्बादी को रोकना जरूरी है। आज का वक्त कई तरह के डिजिटल उपकरणों का है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, और दूसरी चीजों को चार्ज करने की जगह और वक्त से भी कई बार समय बचता है, और कभी-कभी तो किसी नाजुक मौके पर इनमें चार्जिंग न रहने से काम ही ठप्प हो जाता है। इसलिए वक्त और मेहनत, इन दोनों की किफायत का मिजाज ही बनाना पड़ता है। जो लोग चौकन्ने रहेंगे, वे लोग हर मामले में चौकन्ने रहेंगे, और जो लोग लापरवाह रहेंगे, वो हर काम में वक्त बर्बाद करते रहेंगे। 

जो पढ़ाई करने वाले लोग हैं, या कि किसी मुकाबले की तैयारी कर रहे हैं, उनके लिए तो वक्त और अधिक मायने रखता है, और उन्हें अपने नोट्स, अपनी किताबें, इंटरनेट पर सर्च की गई जानकारी को अलग-अलग फाईल और फोल्डर बनाकर रखना आना चाहिए। जिन लोगों को बार-बार सफर पर जाना पड़ता है, और कई तरह के सामान रखने पड़ते हैं, वे अगर कोई छोटा सा सामान भूल जाएं, तो हो सकता है कि दूसरे शहर में रात-बिरात दवा की एक टेबलेट ढूंढते हुए पांच रूपए की दवा पर पांच सौ रूपए की टैक्सी का खर्च भी जुड़ जाए। हर किसी की जिंदगी में ऐसी अलग-अलग बातें रहती हैं, जिन पर ध्यान देने से, और अपने वक्त की कीमत समझने से लोग खुद भी सुधार कर सकते हैं, लेकिन ऐसा न हो पाए, तो उसके लिए हर शहर में कुछ जानकार लोग ऐसी क्लास भी ले सकते हैं, कि हर दिन कुछ वक्त कैसे बचाया जाए, और उसका बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए। कहने-सुनने में यह बात कुछ हल्की और कम महत्वपूर्ण लग सकती है, लेकिन जब हम बचाए गए ऐसे पलों को पूरी जिंदगी के हर दिन के साथ जोडक़र देखेंगे, तो समझ पड़ेगा कि हम कितनी बड़ी बचत या कितनी बड़ी बर्बादी की बात कर रहे हैं। जो लोग किसी किताब को पढ़ते हुए बीच में छोडऩे पर बुकमार्कर नहीं लगाते हैं, वे दुबारा शुरू करने पर दो-चार पन्ने दुबारा पढऩे बैठ जाते हैं। दूसरी तरफ हमने ऐसे लोग भी देखे हैं जो बुकमार्कर पर ऊपर-नीचे होने वाला तीर का ऐसा निशान भी बनाकर रखते हैं कि किसी लाईन पर ले जाकर उसे रख दिया जाता है कि किताब बंद करते समय उसे कहां तक पढ़ा गया था। 

यह चौकन्नापन एकाएक नहीं आ सकता, और जिंदगी के किसी एक दायरे में अलग से नहीं आ सकता, इसके लिए लोगों को अपना स्वभाव ही सावधानी का ढालना पड़ता है, और लगातार ध्यान भी रखना पड़ता है कि कहां लापरवाही से समय बर्बाद हो रहा है। अगर किसी शहर में टाईम मैनेजमेंट सिखाने वाले कुछ अच्छे लोग हो सकते हैं, तो वे बहुत से लोगों को यह अहसास करा सकते हैं कि वे हर दिन किन कामों में कितना वक्त बचा सकते हैं। लेकिन यह किफायत उन्हीं लोगों के काम की है जो कि अपने बचे हुए वक्त को किसी तरह इस्तेमाल करते हैं। जो लोग रोजाना टीवी या मोबाइल फोन की स्क्रीन पर घंटों तक रील्स देख सकते हैं, वे वक्त बचाकर भी क्या कर लेंगे, बिना काम की कुछ और रील्स देख लेंगे। 

फिलहाल यह याद रखने की जरूरत है कि गया हुआ वक्त कभी लौटता नहीं, इसलिए आए हुए वक्त का अच्छे से अच्छा, और अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

फिलीस्तीन के समर्थन में अमरीकी छात्र आंदोलन से सीखने की जरूरत..

 1 मई 2024

  

अमरीका के इतिहास में ऐसा कम ही होता है कि किसी विश्वविद्यालय में पुलिस घुसे। न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय में फिलीस्तीन के समर्थन में कई दिनों से छात्रों के प्रदर्शन चल रहे हैं जो कि अब बढ़ते-बढ़ते दो दर्जन अमरीकी विश्वविद्यालयों सहित पश्चिम के कोई आधा दर्जन देशों में फैल चुके हैं। और ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन की अर्जी पर पुलिस यूनिवर्सिटी में घुसी, और छात्रों को गिरफ्तार किया। ये छात्र अपने आंदोलन को पूरी तरह शांतिपूर्ण और छात्रों तक सीमित रख रहे हैं, और एक छात्र नेता ने इजराइल के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी की थी, तो उसे आंदोलन से तुरंत ही अलग कर दिया गया। गैरछात्रों के भी इस आंदोलन में आने पर रोक लगाई गई है, और जगह-जगह चल रहे ये आंदोलन विश्वविद्यालय के इजराइल से जुड़े किसी भी अनुदान, रिसर्च ग्रांट, शैक्षणिक संबंध खत्म करने की बात कह रहे हैं। अमरीकी विश्वविद्यालयों का इजराइल के साथ गहरा रिश्ता है, और गाजा पर इजराइल की बमबारी को देखते हुए अमरीकी नौजवानों का एक मुखर तबका झंडे उठाए खड़ा है कि ऐसे हमलावर देश से उनके विश्वविद्यालय का कोई भी संबंध नहीं रहना चाहिए। यह आंदोलन कोलंबिया विश्वविद्यालय से शुरू होकर बहुत सी दूसरी जगहों पर फैला है, और अब यह ऑस्ट्रेलिया, इटली, ब्रिटेन जैसे दूसरे पश्चिमी देशों तक पहुंच गया है। अमरीका में ही अब तक हजार से अधिक छात्र गिरफ्तार किए जा चुके हैं, और ये छात्र अमरीकी विश्वविद्यालयों के ऐसे किसी भी कंपनी से लेन-देन और रिश्ते खत्म करने की मांग कर रहे हैं जो कि गाजा पर हो रहे हमलों से किसी भी तरह की कमाई कर रही हैं। इसमें अमरीकी कंपनियां भी हैं। यह बात याद रखने की है कि फिलीस्तीन के गाजा पर चल रहे इजराइली हमलों से अब तक 34 हजार से अधिक फिलीस्तीनी मारे गए हैं। 

अमरीका में छात्र आंदोलनों की यह ताजा लहर, ताजा हवा का एक झोंका है। यह नौजवान पीढ़ी में अपने देश से परे के मुद्दों से भी जुडऩे, और उनके प्रति जागरूक रहने का एक बड़ा सुबूत है। फिलीस्तीनी अपनी ही जमीन पर शरणार्थी की तरह बेघर जी रहे लोग हैं, जिनसे अमरीकी विश्वविद्यालयों या छात्रों का कोई भला नहीं हो सकता। उनका भला तो अतिसंपन्न इजराइली सरकार, वहां की कंपनियां, और वहां से जुड़े हुए कारोबारियों से हो सकता है क्योंकि अमरीकी विश्वविद्यालय निजी क्षेत्रों के साथ मिलकर हजारों किस्म के शोध करते हैं, ग्रांट पाते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय छात्र-छात्राओं के समूह अगर फिलीस्तीन के साथ खड़े हैं, और विश्वविद्यालय के इजराइल से किसी भी तरह के संबंध तोडऩे पर अड़े हैं, तो यह अपने हितों के खिलाफ जाकर एक सार्वजनिक हित की बात करने की मिसाल है, और इसके लिए अमरीकी छात्र आंदोलन की तारीफ की जानी चाहिए। जो नौजवान पीढ़ी अपने देश में वोट डालने के लायक हो जाती है, उस पीढ़ी को अपने देश-प्रदेश से लेकर दुनिया के बाकी हिस्सों के मुद्दों पर सोचना-विचारना भी चाहिए, और जिस देश की युवा पीढ़ी ऐसी नहीं रहती, और मुर्दा सरीखी रहती है, जैसी कि आज हिन्दुस्तान में है। 

हिन्दुस्तान का एक हिस्सा मणिपुर देश के इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है, लेकिन सैकड़ों लाशें गिर जाने पर भी बाकी हिन्दुस्तान के लोगों के माथों पर शिकन नहीं आई, और वे मणिपुर को हिन्दुस्तान के बजाय पड़ोसी म्यांमार का हिस्सा अधिक मानते रहे। ऐसी मुर्दा हिन्दुस्तानी नौजवान पीढ़ी को अमरीका का आज का छात्र आंदोलन दिखाना चाहिए कि दुनिया के किसी दूसरे कोने में हो रही बेइंसाफी पर नौजवान पीढ़ी का क्या रूख रहना चाहिए। यह एक अलग बात है कि अमरीका के छात्र आंदोलन हो सकता है कि नवंबर में वहां होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव पर कोई निर्णायक असर न डाल सकें, लेकिन अगर चुनाव में मुकाबला बहुत कड़ा रहेगा, तो टक्कर की ऐसी नौबत में छात्रों का रूख तय कर सकता है कि फिलीस्तीन के मुद्दे पर अमरीका के किस राष्ट्रपति को चुनना बेहतर होगा। हम अमरीकी चुनाव को लेकर कोई भविष्यवाणी करने की हालत में नहीं हैं, लेकिन वहां ऐसा माना जाता है कि डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के गोरे वोटरों के बीच फिलीस्तीन को लेकर हमदर्दी नहीं रहती है, लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन की डेमोक्रेटिक पार्टी में ऐसे हमदर्द अधिक हैं। ऐसे में इन छात्र आंदोलनों का नुकसान किसे झेलना पड़ेगा यह बता पाना अभी आसान नहीं है, लेकिन अमरीका का इतिहास बताता है कि वियतनाम पर अमरीका के हमले के खिलाफ भी वहां के छात्र उठ खड़े हुए थे। और यह कैसा गजब का संयोग है कि 2 मई 1964 को इसी न्यूयॉर्क के इसी कोलंबिया विश्वविद्यालय में चार सौ छात्रों ने वियतनाम पर अमरीकी हमले के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था, और न्यूयॉर्क शहर में जुलूस निकाला था। इसके बाद अमरीकी सरकार के खिलाफ यह आंदोलन जगह-जगह कई विश्वविद्यालयों में फैला था। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ भी अमरीकी विश्वविद्यालयों ने आंदोलन किया था, और ऐसी कंपनियों से विश्वविद्यालय के रिश्ते तोडऩे की मांग की थी जो रंगभेदी दक्षिण अफ्रीकी सरकार के साथ कारोबार करती हैं। खुद अमरीका के भीतर रंगभेद के खिलाफ अमरीकी छात्रों के सभी नस्लों के नौजवान आंदोलन करते रहे हैं। 

हिन्दुस्तान में छात्र आंदोलन या नौजवान आंदोलन मुर्दा पड़े हुए हैं। यह नौबत इस देश के लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक है। लोग 18 बरस की उम्र से वोट डालने का हक पा लेते हैं, लेकिन उन्हें अपने देश-प्रदेश के असल जलते-सुलगते मुद्दों की जानकारी पाने की भी फुर्सत नहीं है। उन्हें काम धेले का नहीं है, और जागरूकता पाने के लिए वक्त घड़ी का नहीं है। आज लोकतंत्र के बहुत से पहलुओं को देखकर अगर कलेजा ठंडा करने की जरूरत लगती है, तो हिन्दुस्तान के बाहर देखना पड़ता है। हिन्दुस्तान के नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा आज धर्म के चक्कर में इस हद तक डूब गया है कि उसे धर्म ही सबसे बड़ा कर्म लगने लगा है। यह धर्म हिन्दुस्तानी जनचेतना पर अफीम की तरह असर कर रहा है, और लोगों की लोकतंत्र के प्रति जागरूकता को संवेदनाशून्य बना चुका है। इस देश की नौजवान पीढ़ी को आज इस वक्त अमरीकी विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र आंदोलन को देखना चाहिए, और फिर यह सोचना चाहिए कि क्या हिन्दुस्तान में छात्र फिलीस्तीन के लिए न सही, अपने खुद के लिए आवाज उठाने का हौसला रखते हैं?

(Daily Chhattisgarh)