देश के नक्सल मोर्चे पर छत्तीसगढ़ की असाधारण और अभूतपूर्व कामयाबी
05 अक्टूबर 2024
देश में शायद अब तक की सबसे बड़ी नक्सल-मुठभेड़ में कल बस्तर में सुरक्षाबलों ने 30 से ज्यादा नक्सलियों को मार गिराया। यह मुठभेड़ वहां के नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिलों की सीमा पर हुई, और इसी दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों के दौरे पर ही थे। यह शायद पहला मौका रहा होगा कि इतने करीब मुख्यमंत्री का दौरा चल रहा था, और इतनी बड़ी मुठभेड़ हो रही थी। कल रात तक लाशें बरामद हो रही थीं, और यह छत्तीसगढ़ की अब तक की सबसे बड़ी मुठभेड़ है, और कुछ महीने पहले ही, 16 अप्रैल को बस्तर के ही कांकेर में एक दूसरी मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए थे। प्रदेश में विष्णुदेव साय सरकार के इन 9-10 महीनों में दो सौ से अधिक नक्सली मारे जा चुके हैं, जो कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से लेकर अब तक का अभूतपूर्व और असाधारण रिकॉर्ड है। लेकिन इसके साथ-साथ जो दूसरी बड़ी बात इससे भी महत्वपूर्ण है, वह है सुरक्षाबलों को कम से कम नुकसान पहुंचना। पहले नक्सली हमलों में एक साथ दर्जनों सुरक्षा जवान शहीद होते थे। मुठभेड़ में भी राज्य और केन्द्र के सुरक्षाबलों की शहादत होती थी। लेकिन साय सरकार के आने के बाद से बस्तर की ऐसी कोई मुठभेड़ नहीं हुई है जिसमें सुरक्षाबलों को अधिक नुकसान हुआ हो। इसके साथ-साथ एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बेकसूर लोगों को नक्सली बताकर मार डालने की जो तोहमत सुरक्षाबलों पर हमेशा लगती है, वह भी अब नहीं के बराबर हो गई है, और यह दर्ज करने लायक बात है कि ऐसी मुठभेड़ में आसपास के ग्रामीणों की मौतें भी बहुत ही कम हुई हैं। हम इस नौबत को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की इस घोषणा से जोडक़र नहीं देखते कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। उनके कहने के पहले से राज्य में भाजपा सरकार के तहत पुलिस और सुरक्षाबल लगातार लगे हुए थे, और सरकार बनते ही जल्द ही नक्सल मोर्चों पर कामयाबी मिलने लगी थी।
बस्तर में पुलिस वही है, केन्द्रीय सुरक्षाबल भी वे ही हैं, उनकी गिनती में भी बहुत बड़ा इजाफा नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा लगता है कि बस्तर के भीतर के इलाकों में जिस तरह सुरक्षाबलों के कैम्प आगे बढ़ते जा रहे हैं, और जिस तरह सरकार की नक्सल-समर्पण नीति के तहत बड़ी संख्या में नक्सली या नक्सल-समर्थक आत्मसमर्पण कर रहे हैं, उससे नक्सलियों की पकड़ उनके परंपरागत इलाकों पर से कमजोर हो रही है। जो इलाके पूरी तरह नक्सल कब्जे में थे, वहां भी सुरक्षाबल पहुंच रहे हैं, और उनके पीछे-पीछे सरकार की कुछ योजनाएं भी जा रही हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय दशकों तक शोषण, भ्रष्टाचार, और जुल्म का शिकार रहा बस्तर सरकार पर से इतने लंबे समय तक भरोसा खोया हुआ था कि वहां नक्सलियों को जगह मिली थी, और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता खत्म सरीखी थी। आज की वहां की सुरक्षाबलों की कामयाबी लंबे वक्त की मेहनत, और सरकारी बंदूकों की असाधारण बड़ी मौजूदगी दोनों की वजह से है। साथ-साथ यह भी हुआ है कि सरकार ने अपनी योजनाओं को नक्सलियों के हटने के बाद पैदा एक शून्य ने तेजी से आगे बढ़ाया है। ऐसा लगता है कि ग्रामीण आदिवासियों को कहीं मुखबिर बताकर, तो उन पर कोई और तोहमत लगाकर नक्सली उन्हें जनसुनवाई के नाम पर इंसाफ का आडंबर दिखाते हुए मार डालते आए हैं, उससे भी धीरे-धीरे जनता में नक्सलियों के लिए हमदर्दी खत्म हुई है। इस इलाके में नक्सल मौजूदगी और उनकी हिंसा से ऐसी खतरनाक नौबत बनी हुई थी कि वह न तो सिर्फ जनकल्याणकारी योजनाओं से सुलझनी थी, और न ही सिर्फ सरकारी बंदूकों से। इन दोनों का मिलाजुला इस्तेमाल, और नक्सलियों के आत्मसमर्पण को बढ़ावा देने से ऐसी मुठभेड़ की सुरक्षाबलों की योजना कामयाब हो पाई है।
राज्य में पिछली सरकार कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की थी, और अपने मंत्रिमंडल में बेताज बादशाह की तरह वे पूरा पुलिस महकमा भी अघोषित रूप से संभालते ही थे। आज बस्तर में कोई भी बड़े अफसर बदले नहीं हैं, और वे कांग्रेस सरकार के समय से अब तक बने हुए हैं। ऐसे में पांच बरस में कांग्रेस को जो कामयाबी नहीं मिली थी, वह अगर इन 9-10 महीनों में मिली है, तो उसके पीछे राज्य सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति एक बड़ी वजह लगती है। फिर यह बात भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस भाजपा सरकार के कार्यकाल में नक्सल मौतें दो सौ के करीब पहुंचने को हैं, लेकिन मानवाधिकार हनन की शिकायतें भी पांच-दस से अधिक मौतों को लेकर नहीं हैं। एक तरफ सुरक्षाबलों की अपनी हिफाजत, और दूसरी तरफ बेकसूरों को मार डालने की शिकायतें इतनी कम, यह छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से कभी नहीं हो पाया था। भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के कार्यकाल में तो मानवाधिकार हनन की घटनाओं का सैलाब सा था। और उसकी कम से कम एक बहुत बड़ी वारदात में सुरक्षाबलों द्वारा की गई कोई डेढ़ दर्जन हत्याओं की रिपोर्ट आने पर भी पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोई कार्रवाई नहीं की थी।
आज की भाजपा सरकार कम अनुभवी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, और उनके दोनों उपमुख्यमंत्री जिनमें गृहमंत्री विजय शर्मा शामिल हैं, ये सभी पहली बार राज्य सरकार में हैं। विजय शर्मा ने सरकार में विचार-विमर्श के पहले ही खुद होकर नक्सलियों से शांतिवार्ता की पेशकश की थी, और उस बात को दर्जन भर बार दुहराया भी था, लेकिन बातचीत का वह सिलसिला कहीं से शुरू ही नहीं हो पाया। इसी दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कुछ हफ्ते पहले राज्य के एसपी-आईजी की एक बड़ी बैठक ली थी, और उसमें भी नक्सल-मोर्चे को लेकर अमित शाह की तय की गई समय सीमा पर चर्चा हुई थी। गृहमंत्री कोई भी रहें, जिलों के कलेक्टर-एसपी मुख्यमंत्री के प्रति सीधे जवाबदेह भी रहते हैं, और ऐसा लगता है कि बस्तर में अधिकारियों को जुल्म ढहाए बिना कार्रवाई करने की जो छूट दी गई है, उससे यह कामयाबी हासिल हुई है। मुख्यमंत्री ने बार-बार यह भी कहा है कि उन्हें नक्सलियों का भी खून बहना ठीक नहीं लगता है, और उन्हें हिंसा छोडक़र लोकतंत्र की मूलधारा में आना चाहिए। लेकिन अभी तक कोई विश्वसनीय मध्यस्थ न होने से शांतिवार्ता की पहल भी शुरू नहीं हो पाई है।
लोकतंत्र में किसी भी तरह की विचारधारा को हथियारबंद आंदोलन की छूट नहीं मिल सकती है। हमने भारत के पड़ोस में नेपाल में माओवादियों को हथियार छोडक़र संसदीय चुनाव में शामिल होते देखा है। अभी-अभी श्रीलंका में एक माक्र्सवादी-माओवादी नेता राष्ट्रपति चुने गए हैं। दुनिया के कुछ और देशों में भी वामपंथी नेता या उनकी पार्टियां जीतकर सत्ता पर पहुंचे हैं। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि भारत में भी नक्सली इस अंतहीन सशस्त्र संघर्ष को खत्म करें, कोई भरोसेमंद मध्यस्थ ढूंढकर सरकार से जनकल्याण के मुद्दों पर बात करें, और सीधे-सरल आदिवासियों पर बंदूकों की लड़ाई का संघर्ष न थोपें। छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के मोर्चे पर बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। लेकिन जब नक्सली इस हद तक घिर गए हैं, और कमजोर हैं, तो यह एक बड़ा माकूल वक्त है कि उन्हें बातचीत के लिए तैयार किया जा सके। जब कोई हथियारबंद आंदोलन कमजोर होते चलता है, तो वह किसी समझौते या शांतिवार्ता के लिए तैयार भी होता है। फिलहाल जान की बाजी लगाकर, तमाम किस्म के खतरे उठाकर बस्तर के मोर्चे पर राज्य की पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के जो लोग तैनात हैं, कल की कामयाबी उनके नाम है क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए रात-दिन काम करके नक्सलियों को खत्म किया है। नक्सलियों का भी खून बहे बिना अगर उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाया जा सकता है, तो यह राज्य सरकार की एक अधिक बड़ी कामयाबी होगी, और सुरक्षाबलों पर हर दिन होने वाला करोड़ों का खर्च भी बचेगा।
पर्यावरण और किफायत, एक ही बात, अलग नहीं
04 अक्टूबर 2024
कल छत्तीसगढ़ में हुए एक हरित शिखर सम्मेलन में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जलवायु परिवर्तन को दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस खूबी को भी गिनाया कि प्रदेश का 44 फीसदी हिस्सा जंगल या पेड़ों से घिरा हुआ है, और इस बरस राज्य सरकार ने प्रदेश में चार करोड़ वृक्ष लगाए हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ में की जा रही और कोशिशों का भी जिक्र किया। उनकी इस बात पर सोचते हुए यह सूझता है कि छत्तीसगढ़ जैसे किसी भी राज्य को जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। यह राज्य तो आदिवासियों और गरीब जनता से भरा हुआ है, इसलिए यहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना बड़ा सीमित रहता है। जिसके पास खर्च करने को अधिक न हो, वे धरती पर अधिक बोझ भी नहीं बनते। और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य जंगलों के बीच बसाहट की वजह से भी, गरीबी की वजह से भी, और गैरशहरी आबादी भी काफी होने से पर्यावरण को नुकसान कम पहुंचाता है। दूसरी तरफ इस राज्य में पर्यावरण को जितने किस्म के खतरे हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे खनिज और खनिज आधारित उद्योगों की वजह से हैं जो कि राज्य के बाहर भी पूरे देश के काम आते हैं। लोहा, कोयला, और इससे चलने वाले कारखाने, इनकी वजह से पर्यावरण को सबसे बड़ा नुकसान है, लेकिन इनकी खपत स्थानीय कम है, और देश के दूसरे हिस्सों के लिए ज्यादा है।
लेकिन जब पर्यावरण की चर्चा होती है तो एक-एक बूंद पानी को बचाना भी पर्यावरण को बचाना होता है, और इस नाते हमको लगता है कि हर राज्य को यह सोचना चाहिए कि वह बचत किन-किन चीजों की कर सकते हैं। अब जैसे भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों के जितने मंत्री, अफसर, और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे ऐसे लोग जिन्हें जनता के पैसों पर सहूलियत मिलती है, उन पर जनता का खूब सारा खर्च होता है। बिजली, पानी, तनख्वाह, और रखरखाव का खर्च जाता तो जनता की जेब से है, लेकिन यह पर्यावरण पर भी भारी पड़ता है। सरकारी बंगलों और दफ्तरों में अंधाधुंध बड़े-बड़े निर्माण होते हैं, और फिर उसके हर हिस्से को एयरकंडीशंड करके सुख जुटाया जाता है। बहुत बड़े-बड़े लॉन बनते हैं, और फिर उनकी घास को हरा-भरा रखने के लिए अंधाधुंध पानी डाला जाता है। बड़े नेताओं, अफसरों, और बड़े जजों की गाडिय़ों के साथ तरह-तरह की दूसरी गाडिय़ां भी चलती हैं, उनसे ट्रैफिक पर दबाव पड़ता है, और साथ-साथ हर गाड़ी का ईंधन भी खर्च होता है। और अब तो केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग फैसलों से हर प्रदेशों में ऊंचे-ऊंचे ओहदों को दर्जनों तक पहुंचा दिया है, और इनमें से हर किसी को बंगलों की, कर्मचारियों की, और अंधाधुंध बिजली की सहूलियत जनता के पैसों से मिलती है। रिटायर होने वाले अफसर, और जज अब शायद कभी बेरोजगार नहीं रहेंगे, और उनके पुनर्वास के लिए इतने सारे ओहदे बन गए हैं कि वे जनता के हक की हिफाजत के नाम पर बने हैं, लेकिन वे जनता पर परजीवियों की तरह बोझ बन जा रहे हैं।
हमारा मानना है कि किसी भी राज्य को ऐसी बंगला संस्कृति से आजादी पानी चाहिए जो कि जनता के पैसों पर चलती है। इससे बेहतर यह है कि सरकारी और संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोगों को एक ऐसा मकान-भाड़ा मिले जिससे वे अपने खुद के घर में, या किराए के घर में रह सकें, और रखरखाव के एक भत्ते से काम चला सकें। यह बात हम सिर्फ सरकारी खजाने के खर्च को घटाने के लिए नहीं कह रहे, यह बात हम पर्यावरण पर बोझ घटाने के लिए भी कह रहे हैं। जब सब कुछ मुफ्त का मिलता है तो उसका इस्तेमाल भी बड़ी बेरहमी से होता है। कांग्रेस के लोगों के सामने गांधी का जीवन सादगी की एक मिसाल है, दूसरी तरफ भाजपा अपने पितृपुरूष दीनदयाल उपाध्याय की सादगी की चर्चा करती है। देश गरीब बना हुआ है, और जनता की जरूरतें किसी भी कोने से पूरी नहीं हो रही हैं। ऐसे में इन दोनों पार्टियों के नेताओं को सत्ता में आने पर भी सादगी पर बने रहना चाहिए, और जलवायु परिवर्तन में रोकथाम के लिए सादगी की मिसाल इसी स्तर से शुरू होगी, तभी वह नीचे तक असर कर सकेगी। आज जब मंत्री और बड़े अफसर बहुत बड़े-बड़े गैरजरूरी हॉल सरीखे दफ्तर के कमरे बना लेते हैं, और उन्हें खूब बिजली खर्च करके खूब ठंडा करके रखते हैं, तो फिर उनके नीचे के तमाम लोग भी इसी जीवनशैली और कार्य-संस्कृति पर अमल करते हैं। छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री रामचन्द्र सिंहदेव राजघराने के होने के बावजूद जिस सादगी और किफायत से रहते थे, वह देखते ही बनती थी। इसी वजह से जोगी सरकार में वित्तमंत्री की हैसियत से वे सब पर सादगी लाद भी सकते थे। सरकारों को किफायत पर अमल इसलिए भी करना चाहिए कि उनकी अपनी कोई जेब नहीं होती है, और वे जनता के पैसों पर ही सुख-सुविधा जुटाती हैं।
पर्यावरण को बचाना, और किफायत बरतना, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को अपने जीवन को मिसाल की तरह औरों के सामने पेश करना चाहिए। अपने पर एक पैसा भी खर्च करने के पहले उन्हें यह सोचना चाहिए कि क्या इतनी सहूलियत राज्य की बाकी जनता को भी हासिल है जो कि रियायती या बिना भुगतान के अनाज पर किसी तरह जिंदा है।
मध्य-पूर्व में जंग का खतरा, असली जिम्मेदार कौन?
03 अक्टूबर 2024
फिलीस्तीनियों पर दशकों से चले आ रहे इजराइली फौजी जुल्म साल भर पहले इसी हफ्ते इजराइल पर फिलीस्तीनी हथियारबंद हमले की शक्ल में सामने आए, जिसमें हजार से कुछ अधिक नागरिकों को मार डाला गया, और सौ दो सौ इजराइलियों का अपहरण करके उन्हें फिलीस्तीनी ले जाया गया। इसके जवाब में इजराइल के फौजी हमलों ने फिलीस्तीन के गाजा शहर के मलबे में तब्दील कर दिया है, और 40 हजार से अधिक फिलीस्तीनियों को मार डाला है। जिन्हें इतिहास की न समझ है, और न उसमें दिलचस्पी है, वे इस मौजूदा टकराव को साल भर पहले शुरू हुआ मान रहे हैं, दूसरी तरफ इतिहास के जानकार लोग इसे पौन सदी पुराना इजराइली जुल्म जानते हैं जो कि फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध कब्जे से शुरू हुआ, और अब फिलीस्तीन को दुनिया की सबसे बड़ी खुली जेल बनाकर इजराइली फौज उसे चारों तरफ से बंद करके बैठी है। आज फिलीस्तीनियों के हक की लड़ाई में भारत जैसा उसका परंपरागत दोस्त रहा देश दूर चले गया है, और उसकी सारी भागीदारी इजराइल से कारोबारी लेन-देन की वजह से इजराइल तक सीमित रह गई है। हालत यह है कि पिछले एक बरस में जब इजराइल को मजदूरों की भयानक कमी पड़ी, तो भारत सरकार ने देश के कुछ प्रदेशों में अभियान चलाकर इजराइल के लिए भारतीय कामगार जुटाए, और उन्हें जंग के दौर से गुजरते हुए देश में भेजा, जबकि आमतौर पर लड़ाई के खतरे से घिरे हुए देश से अपने नागरिकों को निकाला जाता है। यह तो खाड़ी के कुछ मुस्लिम देशों से, और ईरान से भारत का कई किस्म का मतलब जुड़ा हुआ है, इसलिए हिन्दुस्तान खुलकर इजराइल के साथ खड़ा हुआ नहीं है, लेकिन वह फिलीस्तीन को दवाईयां और राहत सामग्री भेजने से परे किसी भी तरह से फिलीस्तीन के हक के साथ नहीं है।
फिलीस्तीन के बगल में लेबनान में मौजूद फिलीस्तीन के हिमायती, और ईरान से फौजी मदद पाने वाले एक मुस्लिम हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला के साथ इजराइल का एक नया मोर्चा खुल गया है, और हिजबुल्ला पर हमले के लिए इजराइल ने लेबनान पर फौजी चढ़ाई कर दी है। फिर ईरान और इजराइल के बीच अभी प्रतीकात्मक हमले हो रहे हैं, लेकिन एक खतरा यह दिख रहा है कि क्या यह मध्य-पूर्व में एक व्यापक जंग में तब्दील हो सकता है? पहले भी इस इलाके में हुए अलग-अलग जंग में आसपास के आधा दर्जन से अधिक देश काफी बर्बादी झेल चुके हैं, और इस बार एक खतरा यह दिखता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब पहुंचा हुआ देश है, और ऐसी आशंका से इजराइल उसके परमाणु ठिकानों को खत्म करने पर लंबे समय से आमादा है, और अगर ईरान पर इतना बड़ा इजराइली हमला होता है, तो आसपास के देश किसी न किसी तरफ से इसमें शामिल हो सकते हैं। अब दुनिया में सवाल यह उठ रहा है कि इजराइल की फौजी गुंडागर्दी के पीछे कौन जिम्मेदार है?
अमरीका को दूसरे देशों पर फौजी हमले करने की पुरानी लत लगी हुई है। उसने एक-एक करके दुनिया के कितने ही देशों पर फौजी हमले किए, वहां की सरकारें बदलीं, इराक जैसे देश पर उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे सुबूतों का हवाला देते हुए हमला किया था कि वहां पर जनसंहार के हथियार मौजूद हैं जिनमें रासायनिक हथियार भी शामिल हैं, लेकिन पूरे देश पर कब्जा कर लेने के बाद अमरीका को वहां एक धेले जितना सुबूत भी नहीं मिला, और बाद में अमरीकी पत्रकारों ने ही यह भांडाफोड़ किया कि राष्ट्रपति बुश ने सुबूतों का झूठा हवाला देते हुए यह हमला किया था। ऐसा अमरीका इजराइल की पीठ पर हाथ रखकर, उसे फौजी ताकत से लैस करके, मध्य-पूर्व में अपना मवाली बनाकर तबाही फैला रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल पांच देशों के पास किसी भी प्रस्ताव और फैसले को वीटो करने का अधिकार है, और अमरीका में शायद अपने इतिहास के 89 वीटो में से 47 बार के वीटो का इस्तेमाल महज इजराइल की गुंडागर्दी, और उसके जुर्म को बचाने के लिए किया है। दुनिया के अधिकतर देश मिलकर भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इजराइल का कुछ नहीं बिगाड़ सके क्योंकि अमरीका उसे अपनी गोद में बिठाकर रखता है। आज भी अमरीका एक तरफ फिलीस्तीनियों के लिए राहत भेजने का नाटक कर रहा है, और दूसरी तरफ वह इजराइल को लगातार बम भेज रहा है जिन्हें बेकसूर फिलीस्तीनियों पर थोक में बरसाया जा रहा है। बमों की यह सप्लाई गाजा में अब तक 41 हजार से अधिक लोगों को मार चुकी है जिनमें 18 हजार से अधिक तो महिलाएं और बच्चे हैं।
अमरीका सीरिया से लेकर अफगानिस्तान, और इराक तक अपनी सीधी फौजी दखल रख रहा है, और इन देशों में वह जितने लोगों को चाहे, उतने लोगों को मार रहा है, सरकारें पलट रहा है, वहां अपने पिट्ठू बिठा रहा है। ऐसे में फिलीस्तीन उसकी आंखों की किरकिरी बना हुआ है जो कि अपनी जमीन पर अमरीका के लठैत-गुंडे इजराइल को कब्जा करने के खिलाफ अब तक अड़ा हुआ है। आज मध्य-पूर्व और बाकी जगहों के मुस्लिम देश भी फिलीस्तीनियों का साथ देने के लिए नहीं खड़े हैं, क्योंकि अधिकतर पर अमरीका का किसी न किसी किस्म का दबदबा रहता है। और बहुत से मुस्लिम देश तो अमरीका की जेब में हैं, जो कि दिखावे के लिए भी फिलीस्तीनी जनाजों और कब्र के बगल से बिना रूके निकल जाते हैं। इसलिए जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अमरीकी वीटो बताता है, अमरीका इजराइल की शक्ल में अपने भाड़े के हत्यारे को हथियार देकर उसे मध्य-पूर्व को काबू में करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। अपने शूटर का घर बसाने के लिए अमरीका को बेकसूर फिलीस्तीनियों को उनके अपने घरों से बेदखल करने में कुछ भी दुविधा नहीं हो रही, और इजराइल की हत्यारी साजिशों को बचाने के लिए अमरीका कहीं वीटो लेकर खड़ा है, तो कहीं अपने सांभा और कालिया की तरह के ब्रिटेन जैसे कुछ देशों का साथ भी जुटा लेता है। इस तरह आज इजराइल दुनिया के सबसे बड़े गुंडे, और माफिया सरदार का चहेता कातिल बना हुआ है, और मुस्लिम देशों के बीच का तथाकथित भाईचारा भी किसी को इजराइल के खिलाफ खड़े नहीं होने दे रहा। आज मध्य-पूर्व में जो नौबत आई है, उसके लिए अमरीका और इजराइल की यह गिरोहबंदी ही जिम्मेदार है, जो कि लाखों बेकसूरों को मारकर भी तेल के कुओं वाले इस इलाके पर कब्जा और एकाधिकार चाहती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो के प्रावधान को एक बार फिर तौलना चाहिए कि आज इससे अधिक अलोकतांत्रिक, और दुनिया के लिए घातक और कोई बात रह गई है क्या?
मन, वचन, और कर्म से जो गांधी हैं, उनकी कहानी...
02 अक्टूबर 2024
अभी दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में एक सम्मेलन में भाषण देने आए आईआईटी मुम्बई के एक प्रोफेसर की एक तस्वीर चारों तरफ फैल रही है। बड़े ऑलीशान होटल में बैठे वे लैपटॉप पर काम कर रहे हैं, और उनके मोजे बुरी तरह फटे हुए दिख रहे हैं। इस तस्वीर पर प्रो.चेतन सिंह सोलंकी की प्रतिक्रिया सामने आई है, उन्होंने कहा है-हाँ, मेरे मोजे फट गए हैं, उन्हें बदलने की जरूरत है, मैं ऐसा कर सकता हूं लेकिन प्रकृति ऐसा नहीं कर सकती, प्रकृति में सब कुछ सीमित है, प्रकृति अधिक बर्बादी बर्दाश्त नहीं कर सकती। उन्होंने आगे लिखा है- मैं जो भी खरीदता हूं उसका पूरा-पूरा इस्तेमाल करता हूं। अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए सबसे अच्छे गैजेट का उपयोग कर सकता हूं, लेकिन धरती पर कार्बन प्रदूषण कम से कम करने के लिए कम से कम चीजों का इस्तेमाल करता हूं। उन्होंने लिखा कि मोजे तो दूसरे आ सकते हैं मगर प्रकृति सीमित है। प्रो.सोलंकी को भारत के सोलर मैन या सोलर गांधी के रूप में जाना जाता है, और वे लगातार ऊर्जा और पर्यावरण बचाने की कोशिश में लगे दिखते हैं। वे आईआईटी मुम्बई में दो दशकों से पढ़ा रहे हैं, और सोशल मीडिया सहित दूसरी जगहों पर वे सामानों की कम खपत की वकालत करते हैं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम भी लगातार खपत घटाने की वकालत करते रहते हैं। कई बार हम इसी कॉलम में लिखते हैं कि लोगों को अपने पास गैरजरूरी बच गए सामानों को उन लोगों के बीच बांट देना चाहिए जिन्हें उनकी जरूरत हो। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह हमने लिखा था कि लोगों को अपने उत्साही परिचितों के छोटे-छोटे समूह बनाकर और लोगों से संपर्क करके उनके पास के जरूरत खो चुके सामानों को जुटाना चाहिए, और उन्हें सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का एक संगठन बनाना चाहिए। इससे धरती पर अधिक चीजों का बनना रूकेगा, और चीजों के निर्माण में पैदा होने वाला कार्बन भी बढऩा थमेगा। दिलचस्प बात यह है कि आज आईआईटी के एक प्रोफेसर अपनी खुद की मिसाल से बिना कुछ कहे हुए जिस तरह एक सोच को बढ़ा रहे हैं, उस सोच को तो एक सदी के भी पहले से गांधी बढ़ाते आए ही हैं। सादगी और किफायत, गांधी के बुनियादी उसूल थे, और उन्होंने अपनी खुद की जिंदगी को इसकी सबसे बड़ी मिसाल बनाकर रखा हुआ था। उन्होंने लोगों के सामने मिसाल पेश करने के लिए यह काम नहीं किया था, उनके लिए यह जीने का एक तरीका ही था, और शायद यही एक तरीका उनके लिए था। गांधी शायद अपनी आखिरी की आधी जिंदगी और किसी भी तरह से नहीं गुजार सकते थे, बजाय अंतहीन सादगी के।
हमने बीच-बीच में यह कोशिश भी की कि कोई मशहूर और लोकप्रिय खिलाड़ी या कलाकार इस बात के लिए तैयार हों कि वे एक-एक बच चुके दो अलग-अलग किस्म के मोजों को पहनना शुरू करें, तो उससे जो फैशन चलेगी, उससे लोगों के पास के इस तरह के कई सामान इस्तेमाल होने लगेंगे। धरती पर जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़े पर्यावरण को बचाने में बहुत मददगार हैं क्योंकि टी-शर्ट को धोना आसान भी है, और जींस को रोज धोना भी नहीं पड़ता है। इन्हें इस्त्री भी नहीं करवाना पड़ता। ये घिस-घिसकर, रंग खोकर, और कहीं-कहीं से फटकर भी फैशन में बने रहने वाले कपड़े हैं, और बरस-दर-बरस इनका कुछ नहीं बिगड़ता। फेसबुक की कंपनी मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग तकरीबन तमाम वक्त एक ही तरह की जींस, और एक ही रंग के टी-शर्ट पहने हुए दिखते हैं, और बड़े सीमित कपड़ों में काम चल जाता है। दुनिया का एक सबसे बड़ा कारोबारी इस तरह रहता है, और गरीबों के जनकल्याण के एक सबसे बड़े अर्थशास्त्री, भारत में बसे हुए यूरोपीय मूल के ज्यॉं द्रेज को भी बहुत साधारण सी जींस और बड़ी कम लंबाई के सूती कुर्ते में देखा जा सकता है, और वे बस एक जोड़ी अतिरिक्त कपड़ा लेकर सफर कर लेते हैं, कहीं सार्वजनिक नल पर भी नहा लेते हैं, और सडक़ किनारे बैठकर खा लेते हैं। होनहार वे इतने हैं कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने ज्यॉं द्रेज के साथ मिलकर आधा दर्जन से अधिक किताबें लिखी हैं, और वे लिखने का सारा श्रेय ज्यॉं को ही देते हैं। प्रो.सोलंकी और ज्यॉं द्रेज दोनों ही विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले लोग हैं, और सादगी से रहते हैं।
हमारे पाठकों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने या तो इसी जगह एडिटोरियल में, या हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, के वीडिटोरियल में स्टारबक्स नाम की एक महंगी खानपान की चेन के बहिष्कार की बात कही थी। अभी इस अमरीकी कंपनी ने अपना नया मुखिया नियुक्त किया है जो अमरीका के कैलिफोर्निया में रहता है। कंपनी का मुख्यालय टेक्सास में है, और कंपनी की नीति के हिसाब से हफ्ते में कम से कम तीन दिन ऑफिस आकर काम करना जरूरी है। कंपनी ने अपने इस नए मुखिया से हुए अनुबंध में उसे घर से दफ्तर आने-जाने के लिए कंपनी का जेट विमान दिया है, और हर दिन 16 सौ किलोमीटर का सफर करके यह व्यक्ति ऑफिस पहुंचेगा, और फिर इतने ही सफर से घर लौटेगा। दुनिया में पर्यावरण की फिक्र करने वाले लोगों ने इस हत्यारे दर्जे की बर्बादी का विरोध किया है, और हमने भी कहा है कि हम इस ब्रांड का बहिष्कार करेंगे। यह एक अलग बात है कि वैसे भी इतनी महंगी जगह पर अपनी जेब के खर्च से जाना हमारे लिए आसान नहीं था।
दुनिया में सबसे अधिक चर्चित, अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनल्ड ट्रंप, या कमला हैरिस के राष्ट्रपति बनने से पर्यावरण पर क्या फर्क पड़ेगा, इस पर भी अभी चर्चा चल रही है। इन दोनों की पर्यावरण नीतियां एकदम अलग-अलग हैं, और डोनल्ड ट्रंप की बददिमाग कारोबारी अक्ल का हाल यह है कि वह पर्यावरण बचाने की तमाम कोशिशों को ग्रीन-फ्रॉड कहता है। दूसरी तरफ मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने पिछले करीब चार बरस में लगातार पर्यावरण बचाने, और जलवायु परिवर्तन को धीमा करने की कोशिशें की हैं। कल ही एक पॉडकास्ट की चर्चा में एक विशेषज्ञ ने यह बात गिनाई कि एक औसत अमरीकी की साल भर की सामानों की औसत खपत, चीनी के मुकाबले दो गुना है, और हिन्दुस्तानी के मुकाबले आठ गुना है। अब अमरीकियों से बहुत कम खपत वाले हिन्दुस्तानियों में भी सामानों की खपत और बर्बादी संपन्नता के अनुपात में साथ-साथ बढ़ती चलती हैं। लोग एक वक्त खदान मजदूरों के लिए बनाई गई जींस का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उसे भी भारी बर्बादी से बनने वाली बिजली की इस्त्री से ऐसा प्रेस करके पहनते हैं जिसका कुछ मिनट बाद ही पता नहीं चलता।
इसलिए चाहे प्रो.सोलंकी से हो, चाहे ज्यॉं द्रेज जैसे लोगों से हो, कहीं न कहीं सादगी और किफायत पर चर्चा जारी रहनी चाहिए। इस बात को शुरू करते समय हमको याद भी नहीं था कि आज 2 अक्टूबर, गांधी जयंती है। और गांधी जयंती के दिन सादगी और किफायत से अधिक आज और किस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत है? कहने के लिए तो भारत के कुछ धर्मों में भी लोगों को गैरजरूरी संग्रह के खिलाफ नसीहत दी गई है, कुछ धर्मों में दान की महिमा गिनाई गई है, लेकिन लोगों से अपने सामानों का मोह छूटता नहीं है, और गैरजरूरी खरीददारी की हसरत बाजार के हमलावर इश्तहारों की मेहरबानी से लगातार बनी रहती है, बढ़ती चली जाती है। लोगों के इलेक्ट्रॉनिक सामान अपनी जिंदगी जी नहीं पाते हैं, और नए मॉडल्स आ जाने से लोग सबसे नया सामान अपने पास रहने की चाह से नई खरीदी करते रहते हैं। आईआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान की तनख्वाह में नया मोजा खरीदना कोई बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन खरीदने की ताकत रहते हुए फटी जुराबों से काम चलाना बड़ी बात है। यह एक अलग बात है कि आज की भौतिकतावादी दुनिया में बड़प्पन की पहचान कोई रखना भी नहीं चाहते।
तीन ने दो मोबाइल के लिए एक को मार डाला
01 अक्टूबर 2024
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि मोबाइल फोन पाने के लिए तीन नौजवानों ने ऑनलाईन ऑर्डर किया, और कैश ऑन डिलीवरी से पहुंचे मोबाइल को मुफ्त में पाने के लिए कुरियर कंपनी के डिलीवरी मैन को मार डाला, उसकी लाश उसी के सामानों के बैग में भरकर एक नहर में फेंक दी गई। उसके सामानों से दो मोबाइल मिले, और कुछ नगद रकम भी। मारने वाले दो लोग पकड़ा गए हैं, और एक की तलाश जारी है। यह मामला भयानक इसलिए है कि आज इस्तेमाल हो रहे या सील पैक मोबाइल को भी उनके हैंडसेट सीरियल नंबरों से तलाशा जा सकता है। इसके बाद भी मोबाइल लूटने और उसके लिए कत्ल करने का खतरा इन तीन नौजवानों को समझ नहीं आया। अब जेल के भीतर उम्र गुजारते हुए मोबाइल किसी काम का भी नहीं रहेगा। एक बड़े शहर में रहने वाले नौजवान जो कि ऑनलाईन खरीदी जानते हैं, वे न तो मारे गए नौजवान के मोबाइल फोन से अपने पकड़े जाने का खतरा समझ पाए, न ही लूटे गए मोबाइल फोन के संभावित उपयोग का खतरा उन्हें दिखा। यह तो लखनऊ पुलिस ने बात की बात में डिलीवरी मैन के फोन की आखिरी लोकेशन, उससे किए गए आखिरी कॉल, और इस टेलीफोन नंबर की आखिरी लोकेशन को देखकर ही लाश तलाश ली थी। टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से अब सब कुछ इतना आसान हो गया है कि पुलिस पुख्ता सुबूतों के साथ कुछ घंटों या एक-दो दिनों में ही इस किस्म के अधिकतर जुर्म सुलझा लेती है।
अब एक सवाल यह उठता है कि महंगे मोबाइल का इस किस्म का शौक लोगों को किस तरह मुजरिम बना रहा है। हम लगातार देख रहे हैं कि समाज में एक-दूसरे के देखादेखी, या इश्तहार देख-देखकर लोगों को महंगे गैजेट्स की चाह इतनी हो रही है कि कोई मां-बाप के पैसे चुराकर शौक पूरा कर रहे हैं, कोई मां-बाप से सामान न मिलने पर खुदकुशी कर रहे हैं, और कुछ लोग ब्लैकमेलिंग जैसे कई तरह के जुर्म करते हुए मर्जी के सामान जुटा रहे हैं। कई मामलों में यह भी सुनाई देता है कि नौजवान पीढ़ी किस तरह सामानों के मोह में तन बेचने को भी तैयार हो जाती है। ऐसा लगता है कि अपनी असल हैसियत को याद रखने के बजाय लोग दूसरों की नकल करने पर अपने को बेबस पाते हैं। बहुत से किशोर-किशोरियां अपने आसपास के बच्चों के महंगे सामान देखकर हीनभावना के शिकार होने लगते हैं, और ऐसे में आसपास के कुछ चालाक लोग उन्हें कुछ तोहफे देकर उनका शोषण करना बड़ा आसान पाते हैं। न सिर्फ महंगे सामान, बल्कि महंगी जीवनशैली लोगों की समझ छीन ले रही है, और लोग सोशल मीडिया पर अपनी एक बड़ी चकाचौंध और चमकीली दिखने वाली तस्वीर को गढऩे में लग जाते हैं। टीन एज बच्चों से लेकर किसी भी बड़ी उम्र के लोगों तक अब यह दबाव बने रहता है कि वे अपने आसपास के ऑनलाईन दोस्तों की बराबरी करते हुए अपने महंगे सामानों की नुमाइश करते चलें, ताकि किसी भी तरह से पीछे न रह जाएं। आज ऑनलाईन और दूसरे किस्म के बहुत से जुर्म शान-शौकत की चाह या उसके दिखावे की वजह से भी हो रहे हैं, और लोग दूसरों के फैशन के सामान, दूसरों के फोन जैसे गैजेट्स देख-देखकर हीनभावना में जा रहे हैं, और फिर उससे उबरने के लिए या तो अपने मां-बाप को ब्लैकमेल करते हैं, या फिर खुली दुनिया में किसी और को ब्लैकमेल करके जुर्म की कमाई से खर्च करना चाहते हैं।
आज की न सिर्फ नौजवान, बल्कि किसी भी तरह की पीढ़ी की इस दिक्कत का कोई आसान इलाज नहीं है। बाजार लोगों को खरीदी के लिए उकसाने में लगे रहता है, और इस उकसावे से बच पाना खासा मुश्किल काम रहता है। नई पीढ़ी तो क्या, अब तो पुरानी पीढ़ी को भी सादा जीवन-उच्च विचार की नसीहत देना आसान काम नहीं रह गया है। जब एक-दूसरे के देखादेखी हर किस्म के खर्चीले काम करने का एक दबाव बने रहता है, तो फिर आसपास के समझदार लोगों की नसीहत बहुत काम नहीं आती है। सादा जीवन एक किस्म की हीनभावना भरने लगता है, और आसपास के अपने से अधिक संपन्न लोगों का जीवन एक दबाव बनाने लगता है कि कुछ भी करके उनकी नकल की जाए।
देखादेखी का दबाव, और दिखावे की चाह मिलकर लोगों से कई तरह के गलत काम करवाते हैं। इसमें लोग दूसरों को मारने को भी तैयार हो जाते हैं, जैसा कि अभी लखनऊ की इस वारदात में हुआ है, या अपने आपको खत्म करने को भी तैयार हो जाते हैं जैसा कि देश में हर दिन कहीं न कहीं से आता है कि मनपसंद मोबाइल न मिलने पर किसी बच्चे ने अपने को खत्म कर लिया। अब ऐसी एक-एक खबर हजारों दूसरे लोगों पर एक दबाव पैदा करती है कि वे चाहे कर्ज लेकर ही सही, अपने बच्चों की फरमाइश पूरी करें, क्योंकि ऐसा न करने पर उनकी जिंदगी पर एक खतरा मंडरा सकता है। बहुत कम मां-बाप ऐसे होंगे जो कर्ज लेकर भी अपने बच्चों की नाजायज मांगों को भी पूरा न करें। यह सिलसिला बच्चों और नई पीढ़ी को यह भी सिखा देता है कि वे जिद करके क्या-क्या हासिल कर सकते हैं।
इसका एक ही आंशिक इलाज हमें दिखता है कि बच्चों के सामने सादगी को एक मिसाल की तरह पेश किया जाए। मां-बाप खुद भी अगर सादगी बरतेंगे, उपकरणों, और फैशन पर सीमित खर्च करेंगे, अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज में, और दोस्तों के बीच सादगी से रहना सिखाएंगे, तो हो सकता है धीरे-धीरे उन पर भी असर हो, और उनके आसपास के दायरे पर भी। लेकिन कुछ अतिसंपन्न और गैरजिम्मेदार लोग ऐसे भी रहते हैं जो अपने बच्चों को अपनी संपन्नता का एक टुकड़ा देने को ही अपनी मोहब्बत मान लेते हैं। नतीजा यह होता है कि संपन्नता की ताकत इन बच्चों को औरों के लिए एक बुरी मिसाल तो बना ही देती है, इसके साथ-साथ यह ताकत उन्हें कुछ और किस्म के जुर्म में भी फंसा देती है, जो कि एक अलग मुद्दा है, और उसे हम आज यहां जोडऩा नहीं चाहते हैं। बच्चों को विरासत में अगर सादगी सिखाएंगे, तो वे जिंदगी में कई किस्म की दिक्कतों से बच जाएंगे। सादगी सिर्फ गरीबों के लिए जरूरी नहीं है, अमीर लोग भी अगली पीढ़ी को सादगी सिखा सकते हैं।




