सत्ता की बददिमागी का नतीजा बिहार में दिख रहा है, एमपी में जरूरत

 29 अगस्त 2025 

 

मध्यप्रदेश का एक वीडियो दो दिन से सोशल मीडिया पर घूम रहा है, और इन दिनों किसी वीडियो के साथ जोड़ी जा रही सच्ची या झूठी जानकारी की जांच-पड़ताल के बाद अब उसकी जानकारी सही पाकर अब उस पर लिख रहे हैं। भिंड जिले के कलेक्टर-बंगले के गेट पर विधायक अपने दर्जन-दो दर्जन समर्थकों के साथ नारेबाजी कर रहे हैं, और कलेक्टर को गेट के आर-पार से तरह-तरह की धमकियां दे रहे हैं। बीच-बीच में वे खूब गाली-गलौज पर उतरते हैं, फिर अपने समर्थकों को कलेक्टर चोर होने के नारे लगाने के लिए कहते हैं, और नारेबाजी के बीच एक बार फिर वे कलेक्टर को धमकाने में लग जाते हैं। विधायक समर्थकों का बनाया हुआ वीडियो ही बताता है कि विधायक कलेक्टर को मारने के लिए हाथ उठाते हैं, इस दौरान कोई एक सुरक्षागार्ड बीच-बचाव करता है। झगड़ा खाद संकट का बताया जाता है, लेकिन असल मुद्दा शायद रेप-चोरी का था। जो भी हो, सत्तारूढ़ पार्टी का एक बुजुर्ग सा दिखता विधायक जिस हमलावर हाथापाई के अंदाज में कलेक्टर बंगले पहुंचकर कलेक्टर से बदसलूकी करता है, उससे विधायक के साथ-साथ सरकार के तेवर भी उजागर होते हैं।

कई लोगों का यह मानना रहता है कि चूंकि कलेक्टर जिले का सबसे अधिक अधिकारसंपन्न, और सबसे अधिक जिम्मेदार समझे जाने वाला वरिष्ठ अधिकारी रहता है, इसलिए उसके साथ बदसलूकी बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हम तो ऐसे किसी ओहदे के दिखावे को सही नहीं मानते, और चपरासी से लेकर कलेक्टर तक, या सिपाही से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज तक हर किसी का सम्मान उनके सरकारी, या अदालती, या संवैधानिक कामकाज के हिसाब से बराबर ही रहना चाहिए, लोकतंत्र में सिपाही से बदसलूकी तो ठीक है, लेकिन बहुत बड़े अफसर, या हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जज से बदसलूकी पर जुर्म दर्ज हो जाए, यह तो ठीक नहीं है। यह भी बात समझने की जरूरत है कि बड़े अफसर, नेता, या जज तो अपने से मातहत कर्मचारियों के सुरक्षा घेरे में रहते हैं, और बदसलूकी के उन तक पहुंचने का मतलब नीचे के लोगों से बदसलूकी हो चुकना भी रहता है। इसलिए सरकार हो, अदालत हो, या कोई और संवैधानिक संस्था, इनमें से किसी के भी छोटे या बड़े कर्मचारी-अधिकारी का सम्मान बराबर ही रहना चाहिए, और अगर कोई भी व्यक्ति इनके ओहदों से जुड़े कामकाज को लेकर इन पर हमला करे, तो उसके लिए जो नियम है वे एक बराबरी से लागू होने चाहिए, चाहे  कर्मचारी को थप्पड़ मारने वाले मंत्री-मुख्यमंत्री हों, या मातहत से बदसलूकी करने वाले जज ही क्यों न हों।

भारत में ऐसे तो कहने के लिए लोकतंत्र की पौन सदी पूरी हो रही है, और चारों तरफ जलसे चल रहे हैं, लेकिन लोगों की सोच अब तक सामंती बनी हुई है। किसी के सिर पर सत्तारूढ़ पार्टी का होने का गुरूर रहता है, किसी के सिर पर किसी ‘बड़े’ व्यक्ति की औलाद होने का अहंकार रहता है, और बहुत से लोगों पर अपनी संपन्नता का घमंड उनकी गाड़ी के हॉर्सपावर के साथ जुडक़र काम करता है। बड़े शहरों की जितनी संपन्न रिहायशी इमारतें होती हैं, वहां कर्मचारियों के साथ बदसलूकी हिन्दुस्तानियों के आम मिजाज में बैठी हुई है। कई ऊंची बिल्डिंगों में तो घरेलू कामगारों, और चौकीदारों को लिफ्ट में चढऩे की भी मनाही रहती है, और ढेरों वीडियो आते हैं जिनमें कोई संपन्न महिला संपन्नता और दारू के नशे में छोटे-छोटे कर्मचारियों को मां-बहन की गालियां बकते दिखती हैं। लोगों की सोच ऐसी सामंती है कि वे सरकारी अमले को अपने बाप का नौकर मानकर उनसे बदसलूकी को अपना हक मान लेते हैं। फिर यह भी है कि जिनके पास उस वक्त थोड़ी-बहुत ताकत रहती है, उनके आभामंडल के दूसरे लोग उस ताकत को अपनी बपौती मानकर चलते हैं।

मध्यप्रदेश के ही एक डीजीपी के बददिमाग बेटे ने उनके एक जिले के दौरे के दौरान पुलिस के एक डीएसपी के साथ बड़ी बदसलूकी की थी, तो जिले के आईपीएस अफसर ने डीजीपी के बेटे को थप्पड़ मारी थी, और बाद में कई तरह की जांच भी भुगती थी। लेकिन ऐसा जवाब देने का हौसला कितने लोगों का हो सकता है कि वे अपने मातहत के सम्मान की रक्षा के लिए खुद का कॅरियर इस तरह दांव पर लगाएं? छत्तीसगढ़ में भी बहुत से ऐसे मौके आए हैं जब सत्ता की बददिमागी में लोगों ने मातहत कर्मचारियों और अधिकारियों को पीटा है, और ऐसे हर मौके पर हमने उसके खिलाफ लिखा है। मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ विधायक, और कलेक्टर के बीच की ऐसी तनातनी सत्ता की बददिमागी का एक बड़ा सुबूत है। कोई पार्टी अपने विधायक का तो तबादला कर नहीं सकती, कलेक्टर को ही वहां से हटा सकती है, लेकिन ऐसे में हमलावर विधायक का दिमाग और आसमान पर पहुंच जाएगा, और वह अगले कलेक्टर को अपने जूते की नोंक पर लेकर चलेगा।

अभी पिछले हफ्ते-दस दिन से बिहार के दो अलग-अलग वीडियो आए हैं जिनमें से एक में किसी सत्तारूढ़ विधायक को भीड़ खदेड़ रही है, और वह किसी तरह वहां से भागकर जान बचा रहा है। दूसरा वीडियो वहां के एक मंत्री का है जो कुछ मौतों के बाद गांव पहुंचे थे, और वहां ऐसा पथराव करके उन्हें भगाया गया है कि वे भागते चले जा रहे हैं, और कार के शायद शीशे भी टूट गए हैं, किसी तरह उनकी जान बची है। बिहार की जनता का मिजाज कुछ अलग है, हर प्रदेश में जनता कानून इस तरह अपने हाथ में नहीं लेती है। लेकिन जैसा कि बहुत सी फिल्मों में होता है, जुल्मी और जुर्मी नेताओं को कहीं पर बागी तेवर वाला कोई पुलिस अफसर घर-दफ्तर से घसीटकर ले जाकर सडक़ पर मारता है, या जनता मंच से उतारकर ऐसे नेताओं को मारती है, ऐसा भी किसी जगह असल जिंदगी में हो सकता है। गुंडागर्दी सिर्फ निर्वाचित या सत्तारूढ़ नेताओं का एकाधिकार तो है नहीं, कभी उन्हें भी इसका स्वाद चखना पड़ सकता है। विपक्ष के नेता अफसरों से टकराएं, यह तो समझ में आता है, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी का बुजुर्ग विधायक कलेक्टर के बंगले पर जाकर हाथापाई पर उतारू हो जाए, मारने को हाथ उठा ले, तो यह विधायक की ही शान (?) के खिलाफ हैं। विधायक में अगर दमखम होता, अगर उनकी बात सही होती, तो वे मुख्यमंत्री से मिलकर इसे निपटाते, मवालियों जैसी हरकत नहीं करते। इस घटना में विधायक की इतनी इज्जत रह गई कि कलेक्टर अपने बंगले के गेट पर शॉल लपेटे शोले के ठाकुर साहब की तरह बिना हाथ उठाए खड़े रहे, वे अगर चाहते तो पुलिस को बुलाकर लाठी भी चलवा सकते थे, क्योंकि उनके ऊपर हमले का तो एक वास्तविक खतरा था ही। फिर सत्तारूढ़ पार्टी की भला क्या इज्जत रह जाती? नेताओं को तैश दिखाने के पहले कानून की भी परवाह रहनी चाहिए, लेकिन उन्हें यह फिक्र तभी होगी जब कोई अदालत उन्हें बुलाकर कटघरे में खड़े करवाएगी।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 29 अगस्त 2025



 

दीवारों पर लिक्खा है, 28 अगस्त 2025



 

मीडिया और सोशल मीडिया की सुनामी में फंसे अखबार..

28 अगस्त 2025 

 

सोशल मीडिया राजनीतिक दलों के लोगों, और उनके खेमेबाज तथाकथित पत्रकारों के बयान लगातार ब्लॉक करने लायक रहते हैं क्योंकि राजनीति घटिया के जवाब में और अधिक घटिया होने के लिए बेसब्र, और उस पर उतारू रहती है। दूसरी तरफ खेमेबाज जर्नलिस्ट किसी नेता या पार्टी के हिमायती और ढिंढोरची एक्टिविस्ट की तरह काम करने, और उस शिनाख्त को अपने माथे पर सजाकर चलने में फख्र हासिल करते हैं। ऐसी खेमेबाजी के बीच किसी ईमानदार अखबारनवीस के लिए अपने को काबू में रखना, और अपने पेशे के साथ ईमानदार बने रहना किसी सुनामी में पैर जमाए रखने की तरह होता है, खासा मुश्किल, तकरीबन नामुमकिन। 

लेकिन जब बहुत से लोग चुनौती देने के अंदाज में हमारे अखबार को यह  कहते हैं कि फलां ने इस जुबान में कहा या लिखा है, तो उसका जवाब तो इसी जुबान में हो सकता है, तो हम हाथ जोडक़र यह कहते हैं कि किसी भी तरफ की बदजुबानी में हमारी दिलचस्पी नहीं है। और यह बात सच भी है, जब गंदी जुबान के सैलाब, और गढ़ी गई तस्वीरों या वीडियो की आंधी आती है, और वह खासी बड़ी संख्या में पाठक और दर्शक दे जाती है, तो इस धंधे में बने रहने के बावजूद अपने पर काबू रखना कुछ मुश्किल लगता है क्योंकि आखिर जिंदा तो पाठकों या दर्शकों के बल पर ही रहा जा सकता है। यह भी समझने की जरूरत है कि आज जिस तरह की भाषा प्रचलन में आम और सर्वमान्य मान ली गई है, उसके बिना भी लिखते हुए, या बोलते हुए हमें कभी भाषा की किसी खूबी की कमी नहीं खली। अच्छी से अच्छी, और बुरी से बुरी बात बिना घटिया जुबान के कही जा सकती है। फिर हमें यह भी लगता है कि घटिया के मुकाबले घटिया जुबान या बातें बोलना, इससे तो जवाब देने वाले भी अपने आपको घटिया ही साबित करते हैं। आज भी सामान्य शिष्टाचार के दायरे में भी बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, तकरीबन हर बार। 

सार्वजनिक जीवन के मुद्दों और लोगों पर लिखते हुए कई बार विशेषणों की जरूरत पड़ती है, और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प जैसे व्यक्ति के बारे में लिखते हुए हम इसी संपादकीय कॉलम में जब बददिमाग, बेदिमाग, बदचलन, घटिया, तानाशाह जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, तो इनमें से कोई भी विशेषण नहीं रहता, वह इस घटिया आदमी के बारे में अदालतों में साबित हो चुका तथ्य ही रहता है। इसलिए जब किसी के बारे में इस्तेमाल किया जाने वाला आलोचना का विशेषण तथ्यों से साबित हो चुका रहता है, तो वह विशेषण भी नहीं रहता, महज तथ्य हो जाता है। हम अपनी आलोचना या तारीफ की भाषा को इसी सीमा के भीतर रखते हैं। 

अब जब तारीफ की बात निकली है, तो सार्वजनिक रूप से किसी की तारीफ आलोचना की तरह ही होती है, जिसमें विशेषणों का तथ्यों से बड़ा ही कम लेना-देना होता है। किसी के गुजरने पर, या किसी के अभिनंदन के मौके पर, और बहुत से लोगों की जुबान में तो हर बरस आने वाली सालगिरह के मौके पर भी इतने विशेषण इस्तेमाल किए जाते हैं कि उन्हें पाने वाले को भी इस पर भरोसा नहीं होगा कि वे इतने अच्छे हैं। फिर भी किसी की झूठी तारीफ, चाहे वह मुसाहिबी की हद पार करती हो, किसी दूसरे का कोई नुकसान नहीं करती। लेकिन आजकल तारीफ से परे, किसी की आलोचना या निंदा में जिस जुबान का इस्तेमाल हो रहा है, वह तो लोकतांत्रिक, और मानवीय सीमाओं से बाहर-बाहर ही चलती दिखती है। ऐसी जुबान सिर्फ यही साबित करती है कि तथ्य और तर्क चुक चुके हैं, और इन विशेषणों के बाद अगली बारी नाली के कीचड़ की होगी। दिलचस्प यह भी है कि ऐसे कीचड़ के आकांक्षी पाठक और दर्शक बढ़ते चले जा रहे हैं, और कीचड़ के मुकाबले का जीवंत प्रसारण न करना मीडिया के धंधे में खासे घाटे का काम रहता है। 

ऐसी तमाम नौबत के बावजूद अपने अखबार के लिए हमारा यह मानना रहता है कि अखबारों को अपने पुराने दिनों के तौर-तरीकों को याद रखना चाहिए जब वे मीडिया नहीं गिनाते थे, वे सिर्फ प्रेस कहलाते थे। उन दिनों सोशल मीडिया था नहीं, नतीजा यह होता था कि प्रेस को, यानी अखबारों को सोशल मीडिया सरीखे किसी प्लेटफॉर्म से प्रभावित होने की जरूरत नहीं रहती थी। अखबार प्रभावित होते नहीं थे, करते थे। और उनकी मौलिकता ही उनकी ताकत रहती थी जिसकी वजह से वे प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। इन दिनों कल के प्रेस कहे जाने वाले, और आज मीडिया में शुमार होने वाले अखबारों को सोशल मीडिया से प्रभावित होने से कोई परहेज नहीं है, और इसीलिए अब उनसे प्रभावित होने वाले लोगों, और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिनती सीमित होने लगी है। जब सोशल मीडिया, जिस पर कोई संपादक नहीं है, की जुबान अखबार भी इस्तेमाल करने लगे, या संपादक और पत्रकार अपने सोशल मीडिया पेज पर उस जुबान में लिखने और बोलने लगें, तो फिर उनका असर सोशल मीडिया से अधिक कैसे हो सकता है? आज जब अखबार इस बात के लिए बेताब रहते हैं कि वे एक हरकारे या डाकिये की तरह ओछी जुबान में दिए गए एक बयान को दूसरों तक पहुंचाने के बाद उनसे इसका जवाब लेकर बाकियों तक पहुंचाने को अपनी गौरवशाली पत्रकारिता मानें, तो हम इस धंधे में पिछड़ जाना बेहतर समझते हैं। 

आज टीवी समाचार चैनल जिस तरह सबसे घटिया बातों को, सबसे घटिया नजारों को बार-बार, बार-बार सुनाकर और दिखाकर टीआरपी बटोरते हैं, अगर उनसे सीखकर वही तरीका अखबारों को भी इस्तेमाल करना है, तो यह बेहतर ही होगा कि वे अपने आपको मीडिया ही कहें, और प्रेस न कहें। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि सोशल मीडिया पर संपादक नाम की कोई संस्था नहीं है। और अखबार किसी संपादक के लिए शान या शर्म का सामान हुआ करते थे। आज जिन लोगों को शान और शर्म के बीच का फर्क नहीं रह गया है, वे अखबार को मीडिया का हिस्सा मानने के साथ-साथ, सोशल मीडिया का हिस्सा भी मान सकते हैं, और उसी अंदाज में छप सकते हैं। फिलहाल आज का यह लिखना सोशल मीडिया पर आज की घटिया बातों के संदर्भ में है कि उनके लिए वही एक बेहतर जगह है जहां कोई संपादक नहीं है। कोई भी जिम्मेदार और आत्मसम्मानी संपादक अपने अखबार को सोशल मीडिया की बदजुबानी से कुछ या अधिक हद तक अनछुआ रखने की कोशिश करते होंगे, ऐसी कम से कम हमारी उम्मीद तो है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 27 अगस्त 2025



 

नशे की जब्ती वाले गुजरात में पार्टियों के नाम पर हजारों करोड़ की अफरा-तफरी!

 27 अगस्त 2025 

 

देश में चुनाव आयोग भारी शक के घेरे में है। जिस तरह से पिछले कुछ चुनावों में शाम को मतदान का समय खत्म होने के बाद एकाएक वोटों का सैलाब आया, उसने बहुत सी सीटों पर नतीजे बदल दिए। अब अगर सचमुच ही किसी मतदान केन्द्र पर वोट का समय खत्म होने के बाद इतनी लंबी कतारें लगी थीं, तो कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग से ऐसे केन्द्रों के वीडियो मांग रही है, और डरा-सहमा चुनाव आयोग भारतमाता के पल्लू के पीछे जा छुपा है, और तर्क दे रहा है कि माताओं-बहनों के वीडियो देना क्या ठीक होगा? माताओं और बहनों के जो वीडियो चुनाव आयोग मतदान केन्द्र पर खुद ही बनाता है, और प्रचार में उसका इस्तेमाल करता है, वही वीडियो तो प्रमुख विपक्षी दल मांग रहा है, उसमें मां-बहन की आड़ क्यों लेना? खैर, चुनाव आयोग के तौर-तरीके एक कांग्रेसविरोधी राजनीतिक दल सरीखे हो गए हैं, और राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस के मिनटों बाद, जब तक सत्तारूढ़ पार्टियों के प्रवक्ताओं के भी बयान नहीं आते, तब तक चुनाव आयोग राहुल गांधी को एक राजनीतिक जुबान वाला नोटिस जारी कर चुका रहता है। ऐसे में गुजरात का एक ताजा मामला जो कि चुनाव आयोग के ही आंकड़ों का है, वह हैरान करता है। 

एक प्रमुख अखबार, भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि गुजरात में दस गुमनाम सरीखे दलों को पिछले पांच बरस में 43 सौ करोड़ रूपए चंदा मिला बताया गया है, और चुनाव आयोग की रिपोर्ट में इनका खर्च कुल 39 लाख बताया गया है जबकि इन पार्टियों की ऑडिट रिपोर्ट में यह खर्च 35 सौ करोड़ रूपए दिखाया गया है। ये पार्टियां कागजी किस्म की दिख रही हैं, और 2019, 2024 के लोकसभा चुनाव, और इनके बीच हुए 2022 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने कुल 43 प्रत्याशी उतारे, किसी को भी पांच हजार वोट भी नहीं मिले, और सभी पार्टियों ने कुल मिलाकर चुनाव आयोग को तो 39 लाख का हिसाब दिया, जबकि सीए की ऑडिट रिपोर्ट में 35 सौ करोड़ खर्च दिखा दिया। पहली नजर में यह पूरा मामला कालेधन का दिखता है कि जिन पार्टियों का किसी ने नाम भी न सुना हो, उन्हें करोड़ों रूपए चंदा मिला, और अधिकतर रकम को सीए की रिपोर्ट में खर्च दिखा दिया। हो सकता है कि कालेधन को सफेद करने की लॉंड्री चलाने वाले लोगों ने इसे कोई तरकीब बना लिया हो, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब इन पार्टियों को इस तरह का अविश्वसनीय चंदा मिल रहा है, तो क्या इस पर इंकम टैक्स या ईडी की नजर नहीं जाती? और फिर जब ये हजारों करोड़ का खर्च दिखा रही हैं, तो भी किसी जांच के घेरे में इनको नहीं लाया जाता? जो चुनाव आयोग राहुल गांधी के जूतों के फीते बंधे न रहने पर उन्हें नोटिस देने के इरादे में दिखता है, उसे इन गैरमौजूद, और कागजी दलों का हजारों करोड़ का लेन-देन नहीं दिखता?

इससे एक दूसरा सवाल यह उठता है कि देश में कालेधन का इतना अधिक बोलबाला अभी तक कैसे बना हुआ है? नोटबंदी को बरसों हो चुके हैं, पांच सौ रूपए से बड़े तमाम नोट बंद हो गए हैं, अधिकतर लेन-देन बैंकों के मार्फत होने लगा है, चारों तरफ छोटे-छोटे लेन-देन भी अब मोबाइल फोन के जरिए हो रहे हैं, तो फिर दो-नंबर की इतनी रकम आती कहां से है? अभी भी हर कुछ दिनों में सडक़ों पर ऐसी गाडिय़ां पकड़ाती है जिनमें कोई खुफिया बक्सा बनाया गया है, और करोड़ों रूपए की नगदी ले जाई जा रही है। कारोबारी लोगों से पता लगता है कि हवाला कारोबार उसी तरह चल रहा है, जैसा पहले चलता था। व्यापार में आज भी देश में कहीं से भी, कहीं भी, कितनी भी रकम नगदी भेजी जा सकती है, और इसके लिए नोट सफर नहीं करते, केवल फोन पर सब काम हो जाता है। तो नोटबंदी के बाद क्या नगदी पर कोई भी रोक नहीं लग पाई? अभी दो दिन पहले ही कर्नाटक के कांग्रेस विधायक पर छापा पड़ा, तो दस करोड़ से अधिक के नगदी नोट मिले। पिछले दिनों बिहार में एक-एक करके कई अफसरों पर छापे पड़े, तो वे करोड़ों के नोट जलाते हुए मिले। दिल्ली में हाईकोर्ट के एक जज के बंगले से जले हुए नोटों से भरी हुई बोरियां मिलीं। आखिर इतने नोट जब जलाए जा रहे हैं कि कहीं बोरियां भरी हुई हैं, कहीं नालियां चोक हो जा रही हैं, तो देश में समानांतर अर्थव्यवस्था तो जारी ही है। 

एक अकेले राज्य गुजरात में ऐसे राजनीतिक दलों को हजारों करोड़ रूपए चंदा मिल जाए, जिनका नाम भी किसी ने सुना नहीं था, तो सरकार की एजेंसियां कर क्या रही थीं? क्योंकि जिन पार्टियों का अकाऊंट ऑडिट हो रहा है, उन्हें इंकम टैक्स में हिसाब-किताब देना पड़ता है, चुनाव आयोग को बताना पड़ता है, और चुनाव आयोग में सिर्फ 39 लाख का खर्च इन दस पार्टियों ने मिलकर दिखाया है, और ऑडिट में 35 सौ करोड़! जब आंकड़े ऐसे भयानक है, तो सरकार की एजेंसियों की नजरों में क्यों नहीं आ रहे हैं, और चुनाव आयोग जो कि राहुल गांधी के एक-एक शब्द पर नोटिस जारी करने के लिए कम्प्यूटर-प्रिंटर चालू ही रखता है, उसकी नजर में भी एक राज्य का ऐसा हिसाब-किताब सामने नहीं आए? गुजरात वैसे भी एक संवेदनशील राज्य है। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का अपना राज्य तो है ही, वह समुद्री सरहद वाला राज्य भी है, जहां पर सरकार और अडानी के बंदरगाहों पर हजारों करोड़ का नशा पकड़ा रहा है। जाहिर है कि ऐसे नशे के धंधे में जो पैसा खर्च होता है, या जो कमाई होती है, वे बैंक खातों से तो आते नहीं हैं। ऐसे में गुजरात में जिस तरह हजारों करोड़ की जाहिर तौर पर दिखती अफरा-तफरी पहले ही नजर में आ जानी चाहिए थी। 

देश में एनजीओ, दूसरे तथाकथित समाजसेवी संगठन, और राजनीतिक दल दो-नंबर के पैसों के लिए एक बड़ा अड्डा बने हुए हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि अपने-अपने दायरे में इन पर नजर रखें। फिलहाल तो गुजरात का यह बड़ा बवाल सामने आया है, और इस पर चुनाव आयोग, या केन्द्र सरकार की कोई प्रतिक्रिया भी अभी सामने नहीं आई है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अगस्त 2025


 

पारिवारिक सम्पत्ति की दो खबरें, दो कहानियां..

 26 अगस्त 2025 

 

आज के अखबारों में दो खबरों को मिलाकर देखने की जरूरत है। पहली खबर मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले की है जिसके साथ एक भयानक वीडियो भी है। एनडीटीवी की खबर बताती है कि वहां एक रिटायर्ड डीएसपी को रिटायरमेंट के वक्त जो भुगतान मिला है, उसे पाने के लिए उस बुजुर्ग की बीवी, और उसके दो जवान बेटे मिलकर उसे पीट रहे हैं, और पड़ोसियों की दखल भी उसे बचा नहीं पा रही है। छोटे से अंतरंग कपड़ों में इस बुजुर्ग को जमीन पर गिराकर अलग रहने वाले उसके बीवी-बेटे उस पर जुल्म कर रहे हैं। एक बेटा उसकी छाती पर चढक़र बैठ गया है, और बीवी ने उसके पैरों को रस्सी से बांध दिया है। इसके बाद उसे रस्सी से बांधकर खींचा जा रहा है, और बीवी उसका एटीएम कार्ड छीनकर भाग गई है। यह वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने इसकी जांच शुरू की है। इन दिनों जब उत्तर भारत में, और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे हिन्दीभाषी इलाकों में कई तरह के त्यौहार मनाए जा रहे हैं, महिलाएं कई तरह की कामना करते हुए उपवास रख रही हैं, तब यह वीडियो देखना भी दिल दहलाता है कि एक रिटायर्ड बुजुर्ग से उसकी जिंदगी भर की बचत लूटने के लिए बीवी-बेटे यह कैसी हिंसा कर रहे हैं!

एक दूसरी खबर छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की है। दैनिक भास्कर ने इसे पहले पन्ने पर छापा है कि किस तरह जून-जुलाई के महीनों में जिला पंजीयन कार्यालय में 103 मामलों में संपत्ति का हित त्याग किया गया, जिनमें 90 फीसदी हित त्याग बहनों ने किया है। भाईयों के हित में बहनों के इस हित त्याग का बड़ा गुणगान इस खबर में किया गया है कि यह छत्तीसगढ़ की माटी में पली-बढ़ी बहनों का भाई के लिए त्याग है, रिश्तों की गहराई और संवेदनशीलता की सबसे बड़ी मिसाल है। समाचार में ही एक विचार भी लिखा गया है कि मायके से एक लोटा पानी, और तीज की एक साड़ी की ही आस रहती है, और इसके लिए छत्तीसगढ़ की बहन-बेटियां करोड़ों की संपत्ति भी ठुकरा देती है, जबकि कानून बेटे-बेटी दोनों को बराबरी का हक देता है।

परिवार के भीतर संपत्ति के बंटवारे के यह दो मामले एक तो हिंसा का है, और दूसरा त्याग बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि दुर्ग जिले के जिस त्याग की महिमा का गुणगान समाचार में किया गया है, वह त्याग क्या अकेली महिला का ही जिम्मा होता है जो कि 90 फीसदी महिलाएं ऐसा करती हैं? या फिर यह उनके भाईयों का भी जिम्मा होना चाहिए कि वे भी अपनी बहन के लिए कुछ करने को तैयार रहें, और वे भी बहन के लिए हित त्याग करें? भारत में महिला जब छोटी बच्ची रहती है, तब से उसे त्याग सिखाया जाता है, और त्याग का गुणगान किया जाता है। प्रायमरी स्कूल की किताब में पढ़ाया जाता था, कमल घर चल, कमला नल पर जल भर। वही सोच लड़कियों के बड़े होने पर भी जारी रहती है, वही सोच लडक़ों को जुल्मी बनाती है, और लड़कियों को अपार सहने की जिम्मेदारी देती है।

मध्यप्रदेश के मामले में चूंकि पुलिस जुर्म दर्ज करके मां-बेटों को ढूंढ रही है, इसलिए हम उस पर कुछ कहना नहीं चाहते, सिवाय इसके कि हर किसी को ऐसी नौबत का ख्याल रखते हुए अपने पैसों की फिक्र करनी चाहिए, और उन्हें अपने आखिरी वक्त के लिए संभालकर रखना चाहिए। अलग रहने वाले मां-बेटे भी आकर अगर रिटायर्ड की ऐसी दुर्गति करके उसकी बचत नोंचना चाहते हैं, तो बाकी लोगों को भी सावधान रहना चाहिए। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग की जो तथाकथित त्याग की खबर है, उस बारे में समाज को अलग से सोचना चाहिए। भारत के कानून में भाई-बहनों का हक संपत्ति पर बराबरी का है। और समाज के भीतर सोच क्या है, वह इस समाचार में दिए गए आंकड़ों से ही साफ हो जाती है कि हित त्याग करने वालों में 90 फीसदी बहनें हैं। समाज की ऐसी सोच को देखते हुए कानून को अपने आप पर गौर करना चाहिए कि बराबरी का हक देने की बात तो उसने कही है, लेकिन वह बात महिलाओं से त्याग की उम्मीदों के चलते परास्त हो जा रही है। कुछ जगहों पर तो ऐसा हो सकता है कि शादीशुदा बहन को संपत्ति की जरूरत न हो, लेकिन 90 फीसदी मामलों में बहन को जरूरत न हो, और भाई को जरूरत हो, यह बात तो गले नहीं उतर सकती। यह सीधे-सीधे समाज की इस सोच से जुड़ी हुई बात दिखती है कि बहन की शादी में जो देना था दे दिया, अब मां-बाप की संपत्ति पर उसका और कोई हक नहीं होना चाहिए। लडक़ी की शादी में खर्च एक ऐसा सामाजिक दिखावा रहता है जो कि जुर्म की हद तक बिखरा हुआ रहता है, और उससे ब्याह कर जाती हुई बेटी की बाकी जिंदगी कोई मदद नहीं मिलती। लडक़े-लड़कियों के मां-बाप सामाजिक दिखावे के लिए इस तरह का दिखावा करते हैं, और इसके साथ ही मां-बाप, और भाई भी लडक़ी से हाथ धो लेते हैं कि अब तुम्हारी अर्थी ससुराल से ही उठना चाहिए। अब यह अर्थी ससुराल से कैसे उठती है, यह दिल्ली के इलाके में अभी सामने आया है जिसमें दहेज की मांग करते हुए पत्नी को जलाकर मार डालने का जुर्म दर्ज हुआ है।

जिस तरह बहन के त्याग का गुणगान होता है, उस तरह के गुणगान का हकदार बनकर भाई को भी दिखाना चाहिए। आज हालत यह है कि देश में अंगदान करने वालों में 90 फीसदी महिलाएं हैं, और अंग पाने वालों में 90 फीसदी पुरूष हैं। दुर्ग जिले में दो महीने में हित त्याग करने वालों में भी स्त्री-पुरूष का यही अनुपात है। ऐसा लगता है कि भारत की महिला की सोच सिर्फ त्याग के लिए ही तैयार की जाती है, और पुरूष की सोच उस त्याग का फायदा पाने वाले की। भारत में परिवार के लिए भूखे रहकर भी पति और बच्चों का पेट भरने वाली महिला का खूब गुणगान किया जाता है। सती सावित्री भी महिला को ही बनना रहता है, और जब पति घर से निकाले, तो महिला को ही चुपचाप चले जाना पड़ता है, फिर चाहे वह गर्भवती ही क्यों न हो। युग-युग से चली आ रही यह सोच आज जब अखबार के पहले पन्ने पर तारीफ भी पाती है, तो लगता है कि इसे अभी और युग-युग तक जारी रहना है। ज्यादा अच्छा तो यह हो कि बाप-भाई बैठकर शादी के खर्च का हिसाब निकालकर रखें, और संपत्ति में जो कानूनी हिस्सा बनता है, उस हिस्से से वह खर्च घटाकर बाकी रकम महिला को देने का रिवाज भी बन जाए, और कानून भी बन जाए। इस तरह का हित त्याग एक सामाजिक हिंसा का पुख्ता सुबूत है, और संसद को भी इस पर विचार करना चाहिए। एक लोटा पानी, और एक साड़ी को हर बरस महिला का मायके से कुलजमा हक मानना नाजायज सोच है।  

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 25 अगस्त 2025



 

कुत्तों के नाम पर इंसानों की तो ऐश हो गई...

25 अगस्त 2025 

 

सरकारों के काम करने का तरीका बड़ा दिलचस्प रहता है कि हर सरकार, और सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने से नीचे के लोगों पर जिम्मेदारियां डालते चलते हैं, और वे बेअक्ली की हद तक नीचे चली जाती हैं मानो कोटवार ही हर समस्या को हल करेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने सडक़ों से कुत्तों को हटाने का फैसला बदला तो जिम्मेदारी सरकार पर आ गई कि कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए क्योंकि सडक़ों से हटाना तो अब है नहीं। केन्द्र सरकार ने सभी राज्यों को चिट्ठी लिख दी कि 70 फीसदी कुत्तों की नसबंदी करवाई जाए, और उन्हें एंटी रेबिज टीका लगाया जाए। समाचार बताता है कि अब तक केन्द्र इस बारे में केवल सुझाव देते आया था, लेकिन अब उसने राज्यों को एक स्पष्ट लक्ष्य दिया है, और हर महीने इसके पूरे होने के आंकड़े भेजने को भी कहा है। केन्द्र सरकार नसबंदी और टीकाकरण पर हर कुत्ते पर आठ सौ रूपए, और हर बिल्ली पर छह सौ रूपए राज्य को देगी। इसके अलावा संक्रमित या हिंसक कुत्तों को रखने के लिए अलग से आश्रय केन्द्र बनाने के लिए भी केन्द्र सरकार कुछ रकम देगी। जब सुप्रीम कोर्ट अगली किसी पेशी पर सरकार से इस बारे में पूछेगा, तो केन्द्र सरकार के पास चिट्ठियों की फाइल रहेगी कि उसने राज्यों को क्या-क्या लिखा है, और कितने पैसे दिए हैं। राज्य सरकारें यह काम म्युनिसिपल और पंचायतों को देगी, और ये स्थानीय संस्थाएं कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण करने वाली कुछ एजेंसियों, या कुछ एनजीओ के मार्फत इस काम को करवाएंगी। 

भारत में सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार और बेईमानी के आम पैमानों को देखें तो लगता है कि जहां सडक़, बांध, पुल, या इमारत बनाने में भी परले दर्जे का भ्रष्टाचार होता है, वहां पर कुत्तों को टीका लगा है या नहीं, उनकी नसबंदी हुई है या नहीं, इसकी जांच-परख कैसे हो सकेगी? अगर निगरानी का काम किसी और संस्था को दिया जाएगा, तो वह संस्था भी रहेगी तो हिन्दुस्तानियों की ही, देश के प्रति ईमानदार रहने वाले जापानी तो हिन्दुस्तान की फुटपाथी-कुत्ता योजना चलाएंगे नहीं। जहां स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की गिनती ज्यादा बताकर, उनके नाम पर यूनिफॉर्म, दोपहर का भोजन, किताब-कॉपी का घोटाला चलते ही रहता है, जहां पर मेडिकल कमिशन ऑफ इंडिया की जांच टीम को धोखा देने के लिए भाड़े के मरीज लाकर अस्पतालों में भर्ती कराए जाते हैं, वहां पर सडक़ों के कुत्तों की नसबंदी और उनका टीकाकरण कितनी ईमानदारी से हो सकेंगे? यह योजना सरकारों को बहुत सुहा सकती है, क्योंकि इसमें लंबी-चौड़ी ‘गुंजाइश’ रहेगी। 

जब सुप्रीम कोर्ट के कहे हुए किसी बात को कड़ाई से लागू करवाना रहता है, तो ऊपर से लेकर नीचे तक उस काम के लिए बजट भी मंजूर हो जाता है, और काम को समय पर करने के लिए दबाव भी बने रहता है। लेकिन सडक़ों पर कुत्तों की बढ़ती हुई आबादी से जूझ पाना सुप्रीम कोर्ट के जजों के काबू के बाहर का है। सरकार खर्च के आंकड़े जरूर अदालत को बताती रहेगी, लेकिन वह खर्च कितना काम में आएगा, कितना नाली में बहते जाएगा, यह समझना मुश्किल है। भारत के कुछ आंकड़े बताते हैं कि देश में सिर्फ एक महानगर मुम्बई में पिछले एक दशक में बड़े पैमाने पर नसबंदी से कुत्तों की संख्या में 21 फीसदी गिरावट हुई है। लेकिन चेन्नई के आंकड़े बताते हैं कि 2018 से 2024 तक वहां सडक़ों पर कुत्ते तीन गुना से अधिक हो गए हैं। अकेली दिल्ली में 10 लाख कुत्तों का अनुमान है, जिनमें से पिछले छह महीने में 65 हजार कुत्तों की नसबंदी का दावा किया गया है, लेकिन एक लाख के करीब लोगों को इस शहर में कुत्तों ने काटा भी है। भारत में करीब सवा पांच करोड़ फुटपाथी कुत्तों का अंदाज है, और एक कुत्ते के नसबंदी और टीकाकरण पर डेढ़-दो हजार रूपए का खर्च आम है, कहीं-कहीं यह दो हजार रूपए से अधिक भी है। जिस तरह इंसानों की दवाईयां, इंसानों के बाकी चिकित्सा-उपकरण की खरीदी भारी भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, उससे यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि बेजुबान, महज भोंकने वाले कुत्तों को महंगे टीके लगे, या सिर्फ कागजों पर टीकाकरण हो गया, नसबंदी ऑपरेशन हुआ, या कागजों पर नसबंदी दिखा दी गई, इसकी जांच कौन करेंगे? इसी देश में आपातकाल के दौरान सबका देखा हुआ है कि नसबंदी के आंकड़े किस तरह फर्जी भरे जाते थे ताकि संजय गांधी को खुश किया जा सके। 

सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि जिस इलाके से कुत्तों को उठाया जाए, उनके टीकाकरण, उनके पेट से कृमि हटाने, और नसबंदी करने के बाद उन्हें उसी इलाके में वापिस छोड़ा जाए। यह मानवीय लगता आदेश देश में दसियों लाख लोगों की कमाई का एक जरिया बन जाएगा, क्योंकि पूरी दुनिया का यह तजुर्बा है कि कुत्तों के टीकाकरण की जांच कर पाना संभव नहीं है। फिर यह भी है कि कुत्तों को रैबिज का टीका हर साल लगाने पर ही उसका असर रहेगा। आज तो इस देश में इंसानों की मतदाता सूची तय नहीं हो पा रही है, सडक़ के, या पालतू कुत्तों के नाम और फोटो से वोटर कार्ड, या निवासी कार्ड बन जा रहे हैं, डोनल्ड ट्रम्प को बिहार का निवासी बना दिया गया है, ऐसे में एक सरीखे दिखने वाले फुटपाथी कुत्तों का भला क्या रिकॉर्ड रह सकेगा कि उसे अगले साल फिर टीका लगाया जा सके? 

दरअसल सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला लोगों को कुत्तों की आजादी का हिमायती लग रहा है, लेकिन सच तो यह है कि उस पर अमल किसी तरह से मुमकिन नहीं है। यह देश जितनी बेईमानी के सरकारी इंतजाम का शिकार है, उसमें इस तरह की कोई जटिल व्यवस्था कामयाब नहीं हो सकती। इस देश में अदालतों के साफ-साफ फैसलों के बाद कई-कई महीने तो कैदी रिहा नहीं हो पा रहे हैं, यहां पर सडक़ के कुत्तों का हिसाब-किताब भला कौन रखेंगे? फिलहाल सवा पांच करोड़ कुत्तों में से 70 फीसदी कुत्तों के नसबंदी और टीकाकरण में बहुत से लोगों के घर पैसों से भर जाएंगे, और उन्हें चाहिए कि वे कम से कम एक-दो फुटपाथी-कुत्ते तो पाल ही लें। आने वाले वक्त में यह देश कुत्तों के नाम पर कमाई का एक बड़ा सिलसिला देखेगा, और टीके बनाने वाली कंपनियां आज जश्न मना रही होंगी। फिलहाल अगर आप सडक़ पर पैदल, या दुपहिए पर चलते हैं, तो अपने आपको बचाकर चलें, क्योंकि देश का सुप्रीम कोर्ट भी अब आपको कुत्तों से बचाने वाला नहीं है। चलते-चलते सोशल मीडिया पर चल रहा एक पोस्टर बता देना ठीक होगा जो कह रहा है, इस देश में कुत्ते ही सबसे अधिक ताकतवर हैं, रातों-रात तीन जजों की बेंच बनवा दी, और दस दिनों में अपनी आजादी का फैसला पा लिया! 

(Daily Chhattisgarh)