कमजोर और कुचले तबकों के मुद्दों पर चर्चा की जरूरत

संपादकीय
4 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग इलाकों में किसानों ने आत्महत्या की है। सरकारी अफसर यह साबित करने की कोशिश करते ही हैं कि खुदकुशी कर्ज की वजह से नहीं थी, लेकिन इस कोशिश के बजाय कोशिश यह की जानी चाहिए कि जहां-जहां फसल खराब हुई है, वहां-वहां सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र के सकारात्मक असर रखने वाले लोग बर्बाद हो रहे किसानों के सामने नौबत से उबरने का हौसला रखने की कोशिश करें। हम यह जिम्मा सीधे-सीधे सरकार पर इसलिए नहीं डाल रहे कि सरकार में बैठे लोग किसानों का मनोबल बढ़ाने के नाम पर फिर कुछ हजार एनजीओ बनाकर फिर सौ-पचास करोड़ रूपए इधर-उधर करने का रास्ता निकाल लेंगे। इससे परे जरूरत यह है कि केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं को लेकर खेतिहर-अर्थव्यवस्था के परामर्शदाताओं की एक सोच विकसित की जाए। ऐसे लोग सरकार से परे के होना जरूरी हैं, क्योंकि सरकार में बैठे लोग तो बीज से लेकर खाद तक, और खेती के कर्ज से लेकर बीमा तक किस तरह किसान को लूटने में लगे रहते हैं, इस पर हम इसी जगह कुछ समय पहले लिख चुके हैं। 
अब बात केवल किसानों की नहीं है, बस्तर जैसे इलाके में जहां पर नक्सल हिंसा से घिरे हुए लोगों को पुलिस और सुरक्षा बलों की हिंसा भी झेलनी पड़ रही है, और नक्सलियों की भी। ऐसे पूरे इलाकों में पूरी की पूरी पीढ़ी ही जान का खतरा देखते हुए, और दहशत में जीने को मजबूर है। ऐसे हर गांव में कई लोगों का कत्ल हुआ है, बलात्कार हुए हैं, और आदिवासियों का वह पूरा शोषण जारी है जिसकी वजह से नक्सल हिंसा को बस्तर में जगह मिली थी। अब हिंसा के शिकार ऐसे पूरे-पूरे इलाके की दिमागी हालत के बारे में सोचना कहीं भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि वहां के बच्चे ऐसी दहशत के बीच, ऐसी नफरत के बीच किस तरह की दिमागी हालत में बड़े होंगे, और बड़े होने पर वे नक्सलियों या सरकारी वर्दियों से किस तरह का बदला लेने की सोचेंगे? ऐसी सामाजिक स्थिति में व्यापक स्तर के सामाजिक परामर्श की जरूरत है, जो कि निजी स्तर के मनोवैज्ञानिक परामर्श से अलग बात है। अभी छत्तीसगढ़ में ऐसी कोई बात, ऐसी कोई सोच किसी ने सुनी नहीं है, या कम से कम यहां के संदर्भ में ऐसी कोई बात कही नहीं है, लेकिन समाजशास्त्रियों से मदद लेकर, मनोवैज्ञानिकों को साथ रखकर सरकार को सामाजिक-मनोविज्ञान का ख्याल रखने का जिम्मा निभाना चाहिए। 
समाज का जो हिस्सा दूसरों की मदद करने की ताकत रखता है, जिसके पास साधन और सुविधा हैं, जिसके पास अपनी जरूरत से अधिक पैसा है, जिसकी तकलीफें कम हैं, ऐसे लोग अपने निजी ऐशोआराम से परे और किसी बात के बारे में शायद ही सोच पाते हैं। अब जब देश की राजनीतिक ताकतें गैरमुद्दों पर लोगों को भड़काने में लगी हुई हैं, तब संपन्न लेकिन आम लोगों से किसी कुर्बानी या किसी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी की उम्मीद करना कुछ मुश्किल होता है। लेकिन आज छत्तीसगढ़ की सामाजिक जरूरत यही है कि लोग अपने सरोकार समझें, और दबे-कुचले तबकों का तरह-तरह से साथ देने की कोशिश करें। हमारी बात कुछ अमूर्त जरूर है, यह सरकार के आंकड़ों वाली योजनाओं में ठीक से फिट बैठते नहीं दिखेगी, लेकिन समाज के बीच सकारात्मक मानसिकता को बढ़ाए बिना, मुसीबत और खतरे झेलते तबकों का हौसला बढ़ाए बिना, हम एक असंतुलित सामाजिक विकास ही कर सकते हैं, और इससे देश-प्रदेश बहुत आगे नहीं बढ़ सकते। इस मुद्दे की शुरुआत समाज के कुछ जागरूक लोग कमजोर और कुचले हुए तबकों के मुद्दों पर चर्चा से शुरू कर सकते हैं, फिर यह चर्चा चाय पर हो, या बिना चाय के।

औरों की जिंदगियां बचाते जान देनी वाली बहादुर छत्तीसगढ़-महतारी महिलाएं

संपादकीय 
3 नवंबर 2015
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीती रात दो ऐसी महिला कामगारों की मौत हुई है, जिनकी बहादुरी की अधिक चर्चा शायद न हो। ये दोनों एक कन्या-छात्रावास में खाना पकाने का काम करती थीं, और वहां रसोई में गैस सिलेंडर में आग लगी, तो जलते हुए सिलेंडर को तीन महिलाओं ने उठाकर बाहर फेंका, और इसी कोशिश में वे बुरी तरह झुलस गईं, और इनमें से दो की मौत अस्पताल में हो गई। इस वक्त हॉस्टल में बहुत सी लड़कियां थीं, और सिलेंडर अगर फटता तो उन सबकी जान जा सकती थी। इन लगभग मजदूर महिलाओं के सामने भी यह रास्ता तो खुला हुआ था ही कि वे भी भागकर अपनी जान बचा लेतीं, और सिलेंडर की आग बुझाने का काम फायर ब्रिगेड जब पहुंचती, तब वह करती। लेकिन इन्होंने जान पर खेलकर जलते सिलेंडर को बाहर निकाला, और अपनी जिम्मेदारी से अधिक का यह खतरनाक काम करते हुए खुद की जान दे दी, लेकिन बाकी लोगों को बचा लिया।  पता नहीं केंद्र या राज्य सरकार के बहादुरी के पुरस्कारों में ऐसी बहादुरी के लिए कोई पैमाना है या नहीं, लेकिन ये गरीब महिलाएं किसी तरह अपने परिवार को चला रही थीं, और इनके चले जाने से इनके घरों की कमर टूट गई होगी। 
बस्तर जैसे नक्सल मोर्चे हों, जहां पर कि तैनात पुलिस को यह पता रहता है कि जान खतरे में डालकर ही ड्यूटी करनी है, तो वहां तो बहादुरी की उम्मीद की जाती है। इसी तरह दमकल कर्मियों से भी आग बुझाते हुए खतरों से जूझने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब मामूली काम में लगे हुए लोग एक गैरमामूली हौसला दिखाते हैं, तो उनकी स्मृतियों का सम्मान सरकार को भी करना चाहिए, और समाज को भी। दरअसल ऐसा हौसला दिखाने वाले लोग बहुत कम होते हैं, अधिकतर लोग तो किसी खतरे के वक्त अपने परिवार की सोचकर पीछे हट जाते हैं, या आंखें बंद कर लेते हैं। जब कोई गरीब-मजदूर महिला खतरे में कूदती है, तो वह अपने पूरे परिवार की हिफाजत को दांव पर लगा देती है। छत्तीसगढ़ में इन तीन महिलाओं ने जो हौसला दिखाया है, उसे हम किसी हादसे में गुजरने वाले आम लोगों की आम मौत की तरह नहीं मानते। हमारा मानना है कि सरकार को इनके लिए आज घोषित मुआवजा बढ़ाना चाहिए, और जिस विभाग के छात्रावास की बच्चियों को बचाने के लिए इन महिलाओं ने अपनी जिंदगी दी है, उस विभाग के नेताओं और अफसरों को भी इनके परिवारों की सीधी मदद करनी चाहिए। ऐसा अगर नहीं होगा, तो बहुत से लोग इस मामले की गंभीरता को भी नहीं समझेंगे, और इनकी बहादुरी का कोई मूल्यांकन भी नहीं होगा।

बदजुबान नेताओं की गंदगी देश को भारी पड़ती है

संपादकीय
2 नवंबर 2015

भारत के चुनावों में लोगों के मन में बसी हुई गंदगी कुछ उसी तरह फूलकर ऊपर तैरने लगती है जैसा कि किसी कड़ाही में तला जा रहा कोई समोसा या भजिया हो। लोग एक से बढ़कर एक गंदी बातें करने लगते हैं, और लगता है कि शाहिद कपूर के बजाय भारत के नेता नाच-नाचकर गा रहे हैं- गंदी बात, गंदी बात। और मीडिया के लिए यह कुछ मुश्किल बात रहती है कि कितनी गंदगी को दिखाने, सुनाने, या छापने के लायक माना जाए, और कहां पर पूर्णविराम लगाया जाए। मीडिया का आपस का मुकाबला उसे समझदारी का बर्ताव नहीं करने देता, और गंदी बातें पहले पन्ने पर आसानी से अच्छी जगह पा जाती हैं। 
अब जैसे कल ही केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने सोनिया गांधी के बारे में यह कहा कि पाकिस्तान में जब आतंकी ओसामा-बिन-लादेन की मौत हुई, तो सोनिया गांधी रात भर रोती रहीं, सो नहीं पाईं। हमारा ख्याल है कि तर्क से परे, तमीज से परे, और लोकतंत्र से परे की जो सबसे बेहुदी और गंदी बातें जो हो सकती हैं, यह उन्हीं में से एक थी। और यह भारत सरकार के एक मंत्री की कही हुई थीं, जिनकी बेबसी यह भी है कि वे एक हिन्दूवादी भाजपा में एक मुस्लिम नेता होने की अपनी जिम्मेदारी उठाते हुए अपने को कई किस्म के मुस्लिमों का दुश्मन साबित करने के मानसिक दबाव तले जीते हैं। जो लोग अखबारों में काम करते हैं, या कि मुख्तार अब्बास नकवी के बयानों को लगातार पढ़ते आ रहे हैं, उनको यह याद करने में खासी दिक्कत होगी कि पिछली बार नकवी ने कब कोई तर्कसंगत, न्यायसंगत, या अक्ल की बात की थी, अगर की थी तो। जिस तरह कांग्रेस में उसके प्रवक्ताओं में बदजुबानी करने वाले लोगों की भरमार रही, और पार्टी ऐसी बेवकूफी की रणनीति पर चलती रही, कि जब कभी कोई हिन्दू मुद्दा रहा, तो उस पर कांग्रेस की तरफ से लगभग हमेशा ही किसी मुस्लिम प्रवक्ता ने हमला दिखाया। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में मनीष तिवारी जैसे लोग रहे जो कि जब मुंह खोलते थे, सुनने वालों के कानों में कड़वाहट घुल जाती थी। 
पार्टियां जानबूझकर गंदी बात पर डांस करने के माहिर लोगों को प्रवक्ता बनाती है, या कोई और वजह है, यह हमारी समझ से परे है। लेकिन जिस पार्टी के लोग भी ऐसी बदजुबानी करते हैं, उनको अखबारी सुर्खियां चाहे मिल जाएं, उनको इज्जत कभी नहीं मिलती, और न ही उनकी पार्टी का इससे कोई फायदा होता। बिहार के चल रहे चुनाव में अमित शाह से लेकर लालू यादव तक कई तरह की गंदी बातें एक-दूसरे के बारे में करते आ रहे हैं, और ऐसा लगता है कि गंदगी से किसी तबके को कोई परहेज नहीं है, और धर्मनिरपेक्षता हो या साम्प्रदायिकता हो, सबको गंदगी भारी पसंद है। फिर चुनावी भाषणों, बयानों और नारों का अक्ल से कोई भी रिश्ता होना जरूरी नहीं है। पाकिस्तान में बहुत बरस पहले हुए एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की पार्टी ने नवाज शरीफ के खिलाफ जगह-जगह बैनर टांगे थे जिन पर लिखा था- न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ-नवाज शरीफ। 
इन बातों से किसी का मनोरंजन होता होगा तो पता नहीं, लेकिन हवा जहरीली बहुत हो जाती है। देश में अब कौन सा ऐसा तबका है जो कि गाली-गलौज के खिलाफ आवाज उठाए? जहां तक मीडिया का सवाल है, तो घोड़ा अगर घास से दोस्ती करेगा, तो खाएगा क्या? अगर सारे नेता सूफियाना जुबान में बातें करने लगेंगे, तो लोग दो-चार दिन में एक दिन अखबार देख लेंगे। लेकिन समाज के किसी जागरूक तबके को गंदगी के खिलाफ आवाज जरूर उठानी चाहिए। चुनाव के वक्त एक-दूसरे के बारे में कही गई घटिया, हिंसक, और अश्लील बातें बरसों तक लोकतंत्र और संसद का नुकसान करती हैं। भारत इसको भुगत रहा है। लोगों को याद होगा कि सोनिया गांधी का विरोध करते हुए सुषमा स्वराज ने एक वक्त यह कहा था कि अगर सोनिया प्रधानमंत्री बनेंगी, तो वे सिर मुंडा लेंगी। ऐसी नौबत तो नहीं आई, लेकिन अभी जब सुषमा स्वराज ललित मोदी की गैरकानूनी मदद करते हुए पकड़ाईं, तो कांग्रेस ने उनको घेरते हुए पूरी संसद ही ठप कर दी। लोकतंत्र में लोगों को बड़प्पन भी थोड़ा-बहुत सीख लेना चाहिए, वरना उनकी गंदगी देश को भारी पड़ती है। 

दुनिया में लोग भारतवंशियों के साथ रहने से कतराएंगे

संपादकीय
1 नवंबर 2015

न्यूजीलैंड की एक खबर है कि वहां एक फ्लैट में साथ रहने के लिए कोई दूसरा किराएदार छांटते हुए एक आदमी ने विज्ञापन में लिखा कि उसे हिन्दुस्तानी या एशियाई लोग नहीं चाहिए। इस बात पर वहां बसे हिन्दुस्तानियों ने विरोध करना शुरू किया, तो उस आदमी ने यह साफ किया कि वह नस्लभेदी नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तानी या एशियाई लोग अच्छी अंग्रेजी नहीं बोलते, और वे रोज करी पकाते हैं, जो कि उसे पसंद नहीं है। जो हिन्दुस्तानी वहां पर इस बात का विरोध कर रहे हैं, उनको हिन्दुस्तान में भी झांककर देखना चाहिए। यहां तो मुम्बई जैसे बड़े और आधुनिक महानगर में बड़े-बड़े रिहायशी कॉम्पलेक्स ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म या किसी जाति के लोगों के मकान खरीदने पर मनाही है, या उनके किराए पर भी वहां रहने की मनाही है। लोग ऐसी कड़ी नापसंद को लेकर अदालती लड़ाई तक लड़ रहे हैं, लेकिन शाकाहारी लोगों की बहुतायत वाली रिहायशी इमारतों में दूसरे घरों में मांसाहार का भी तगड़ा विरोध किया जा रहा है। ऐसी लड़ाई में वहां शिवसेना भी शामिल हो चुकी है, और ठाकरे परिवार के दूसरे नेता राज ठाकरे भी। ऐसे टकराव के कई मामले पुलिस तक जा चुके हैं। 
इस बात से बिल्कुल अलग एक दूसरी बात यह है कि एक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने दो दिन पहले ही भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार को आगाह किया है कि उसके मंत्री जिस तरह से गोमांस को लेकर या धर्म और जाति के मुद्दों को लेकर आक्रामक बयान दे रहे हैं, उससे दुनिया में भारत और मोदी सरकार की साख को नुकसान पहुंच चुका है। और इस बात को जानने के लिए भारत के समझदार लोगों को मूडीज की जरूरत नहीं है, यहां पर देश के एक सबसे प्रतिष्ठित कम्प्यूटर-उद्योगपति नारायण मूर्ति ने कल ही यह चेतावनी दी है कि देश में अल्पसंख्यक डरे हुए जी रहे हैं, और ऐसे माहौल से देश की आर्थिक तरक्की को भी नुकसान पहुंच रहा है। 
हिन्दुस्तान में मोदी सरकार से जुड़े हुए जो लोग आज देश में बहुत हमलावर तेवरों के साथ धर्मान्धता और कट्टरता फैला रहे हैं, उनको यह अंदाज नहीं है कि दुनिया के दूसरे देशों में जाकर मोदी भारतवंशियों के बीच जिस तरह की लोकप्रियता साबित कर रहे हैं, वे भारतवंशी भारत की आज की धर्मान्ध हवा का नुकसान उन देशों में काम करते हुए भी झेल रहे हैं। भारत के लोगों को पूरी दुनिया में शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है कि जो देश इक्कीसवीं सदी की दुनिया की एक सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने का दावा कर रहा है, वह अठारहवीं सदी के भी पहले की सोच को लगातार बढ़ाते चल रहा है, और उसी सोच से सड़कों पर कत्ल कर रहा है। जिन लोगों को हिन्दुस्तान में झंडे-डंडे लेकर एक फर्जी इतिहास को दुबारा भविष्य बनाने का अभियान सुहा रहा है, वे पूरे देश के भविष्य को तबाह कर रहे हैं। धर्मान्धता और कट्टरता के चलते खाड़ी के बहुत से देश, भारत के पड़ोस का पाकिस्तान, और अफ्रीका के कुछ देश इस तरह की तबाही में पहुंच चुके हैं कि वहां पहुंचकर दुनिया के कोई पूंजीनिवेशक एक चवन्नी  भी न लगाएं। 
भारत के लोगों की ऐसी तस्वीर दुनिया में बन रही है कि दूसरे देशों में बसे हुए हिन्दुस्तानियों के साथ शादी करने के पहले भी दूसरी संस्कृतियों के लोग चार बार सोचेंगे, और उनके साथ एक फ्लैट में रहने से भी कतराएंगे। और ऐसा भी नहीं है कि दुनिया में नौकरी देने वालों, कारोबार करने वालों के मन में किसी व्यक्ति को लेकर उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक सोच मायने नहीं रखती। आज का भारत जिस तरह का धब्बा बाहर के भारतवंशियों पर लगा रहा है, उससे एक अघोषित नुकसान उन सबको झेलना पड़ रहा है। भारत में जो मूढ़ लोग गाय को बचाकर, और झूठे आरोप लगाकर इंसान मारकर खुश हो रहे हैं, उनको बाकी दुनिया का कोई अंदाज ही नहीं है। लेकिन नरेन्द्र मोदी अगर अपने बचे कार्यकाल में देश को आगे ले जाना चाहते हैं, तो उनको अपने धर्मान्ध और हिंसक साथियों को काबू में रखना होगा, अगर वे ऐसा चाहते हैं तो। 

सिखों पर लतीफे, चलें या थमे, मामला सुप्रीम कोर्ट में

संपादकीय
31 अक्टूबर 2015

सुप्रीम कोर्ट में वैसे तो सिवाय बहुत गंभीर मुद्दों पर बहुत गंभीर बहस के और कुछ होता नहीं, लेकिन कल अदालत कुछ लतीफेबाजी के मूड में थी। नतीजा यह हुआ कि उसने सिखों के हास्यबोध को लेकर ढेरों तारीफ की, और सिख-लतीफों पर रोक लगाने की याचिका के खिलाफ अपना विचार व्यक्त किया। इस पर अभी फैसला नहीं आया है, और जिस सिख-पंजाबी महिला-वकील ने यह याचिका लगाई है, उसने अदालत से अपने तर्कों को विस्तार से सामने रखने के लिए कुछ और वक्त मांगा है। इस महिला-वकील ने अदालत से यह कहा था कि सिखों को लेकर जितने तरह के मजाक बनाए जाते हैं, उनसे इस समुदाय के लोगों की भावनाएं आहत होती हैं, और उन्हें सामाजिक मजाक-मजाक में मानसिक तकलीफ झेलनी पड़ती है। अदालत ने एक बड़ी खिलाड़ी भावना का इस्तेमाल करते हुए यह जवाब दिया कि सिख खुद भी अपने पर बनाए हुए लतीफों का मजा लेते हैं, और उनका हास्यबोध बहुत ही जबर्दस्त होता है। जज का यह भी कहना था कि अगर सिख-लतीफों पर रोक लगाई जाएगी तो हो सकता है कि सिख खुद भी इसका बुरा मान लें। 
लतीफों को लेकर यह एक बड़ा गंभीर मुद्दा है, और यह महज हिन्दुस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में धर्म को लेकर, जाति को लेकर, ईश्वर और रंग को लेकर, मोटापे को लेकर इतने तरह के लतीफे चलते हैं कि उन्हें अगर न्याय और अन्याय के हिसाब से देखा जाए तो उनमें से बहुत से बदनीयत से बने हुए रहते हैं, और किसी न किसी तबके पर हमला करने वाले रहते हैं, किसी तबके का अपमान करने वाले रहते हैं। और यह दुनिया की अलग-अलग संस्कृतियों की सहनशीलता रहती है कि कौन उसे कितना बर्दाश्त कर सकते हैं। पश्चिमी देशों में जहां पर सबसे अधिक आबादी ईसाई धर्म को मानने वालों की है, वहां पर ईसा मसीह को लेकर, कुंवारी मां को लेकर, चर्च और पादरी को लेकर, सलीब को लेकर इतने तरह के लतीफे चलते हैं, कि वे भारत में इस्तेमाल हों, तो धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने के हजारों मामले दायर हो जाएं। लेकिन पश्चिमी देशों में बर्दाश्त कुछ अलग किस्म की है, और वहां के लोगों का हास्यबोध बहुत अलग किस्म का है। पिछले दिनों पेरिस की जिस कार्टून-व्यंग्य पत्रिका के लोगों पर हमला करके उन्हें मार डाला गया था, उस पत्रिका के कार्टून को नापसंद करने वाले अनगिनत लोग हैं, लेकिन ऐसे लोग भी उस पत्रिका के अभिव्यक्ति की आजादी के हक को पसंद करते हैं, और इस नाते उसके मजाक को, उसके तानों को बर्दाश्त करते हैं। अमरीका के बारे में लोगों को याद होगा कि वहां पर एक ईसाई पादरी ने किस तरह मुनादी करके कुरान के पन्ने जलाए, और वहां की सरकार ने, वहां के कानून ने उसे बर्दाश्त किया। 
लेकिन हम फिर से आज के मुद्दे पर लौटें, तो सिखों को लेकर जो लतीफे चलते हैं, वे आज मानो दूसरी बार बहस का मुद्दा बने हैं। पहली बार इनको लेकर तब तनाव हुआ था जब पंजाब में आतंक चल रहा था, और तब देश भर में सिखों को कहीं मजाक में, तो कहीं गंभीरता से, खाड़कू (आतंकी के लिए इस्तेमाल होने वाला एक शब्द) कहा जाने लगा था, और पहली बार सिखों को उसका बुरा लगना शुरू हुआ था। इसके अलावा यह बिरादरी बहुत ही जिंदादिल, बहुत ही यारबाज, और बहुत ही मजाकपसंद मानी जाती है, और इसके खुशवंत सिंह सरीखे गंभीर लेखकों से लेकर आम सिखों तक लोगों की सहनशीलता बहुत रही। लेकिन आज अदालत को अगर इस पर फैसला करना है, तो हमारा यह मानना है कि अदालत का कल का रूख एक उदारवादी और स्वस्थ रूख था, और अगर इसे बर्दाश्त किया जा सकता है, तो यह एक बेहतर नौबत होगी। लेकिन दूसरी तरफ एक धार्मिक समुदाय को इस बात के लिए बेबस भी नहीं किया जा सकता कि वह दूसरों के मजाक बर्दाश्त करे, और यह कोई दूसरे तय नहीं कर सकते कि सिखों को कितना मजाक बर्दाश्त करना चाहिए। भारत में सहनशीलता घटती चल रही है, और धार्मिक आधार पर बना हुआ कोई समुदाय शायद ही एक समुदाय के रूप में अपनी मजाक को उतना बर्दाश्त करता हो, उसका उतना मजा लेता हो जितना कि फनजाबी कहे जाने वाले पंजाबी-सिख लोग करते हैं। यह बात मजाक की है, लेकिन है बहुत गंभीर। हमारी निजी राय अगर कोई पूछे, तो हम यही कहेंगे कि देश के बाकी धर्मों के लोगों को भी सिखों जितना उदार इस मामले में होना चाहिए, और एक बेहतर हास्यबोध, एक बड़ा सेंस ऑफ ह्यूमर एक सेहतमंद दिमाग का सुबूत भी होता है। सिखों के दिमाग को लेकर अनगिनत लतीफे और मजाक चलते हैं, लेकिन हमारा मानना है कि ऐसे मजाक के लिए बर्दाश्त एक बड़े दिलवाले, और एक बड़े दिमाग वाले ही रखते हैं। 

किसान की मौत के सिवा और कुछ मुमकिन नहीं

संपादकीय
30 अक्टूबर 2015

देश के एक प्रमुख सामाजिक विचारक रहे, और आम आदमी पार्टी में जाकर अपना महत्व खो बैठे योगेन्द्र यादव ने किसानों के मुद्दों के अध्ययन के बाद कहा है कि बैंक और बीमा कंपनियां किसानों के साथ तरह-तरह की बेईमानी कर रही हैं। उनका कहना है कि जब किसान बैंक से कर्ज लेता है तो बिना उससे पूछे, बिना उसकी अनुमति लिए जबर्दस्ती उसके अकाउंट से पैसा काटकर बीमा करवा दिया जाता है। बीमा करवाना है या नहीं इसका फैसला किसान नहीं ले सकता। बीमा किस कंपनी से करवाना है, किन शर्तों पर करवाना है यह भी किसान के हाथ में नहीं। बैंक खुद फैसला करता है। बीमे के बाद कोई कागज किसान के हाथ में नहीं होता। दुर्घटना की हालत में उसे नहीं पता होता कि उसे बीमे का क्या भुगतान मिलना चाहिए। जब फसल खराब होती है तो भी किसान को नहीं मालूम कि वह कहां जाए, कहां दावा करे।
छत्तीसगढ़ में भी किसानों के फसल बीमा को लेकर तरह-तरह की साजिशें होती रही हैं। कहीं किसान के बोए हुए रकबे से अधिक का बीमा करवाकर सहकारी समितियां या बैंक उसका प्रीमियम उसके खाते से सीधे ही घटा देते हैं, तो कभी मौसम आधारित बीमा होने से उसको किसी तरह का फायदा, फसल बर्बाद होने पर भी नहीं मिल पाता। दरअसल किसान की बदहाली सरकार और बाजार की मिलीजुली साजिश का नतीजा है। एक तरफ तो घटिया बीज की शिकायत बनी रहती है, दूसरी तरफ खेतों में सरकार की तरफ से जो योजनाएं लागू होती हैं, उनमें बीज, पौधों, खाद, मशीनों, सिंचाई पंपों से लेकर खेत के भूमि-सुधार तक, बहुत सी बातों में सरकारी दखल भ्रष्टाचार से भरी हुई है। नतीजा यह होता है कि गरीब किसान मौसम की मार भी झेलता है, और सरकार की मार भी, और इससे भी आगे बढ़कर जब वह बाजार की मार झेलता है, तो फिर वह टूट ही जाता है। जब उसकी खेती सरकारी कर्ज पर टिकी रहती है, तो जो बैंक और जो सहकारी समितियां उसके कर्ज से लेकर खाद-बीज तक के काम में लगी रहती हैं, वे सब एक बड़े संगठित भ्रष्टाचार में भागीदार बन जाती हैं। 
आज हिन्दुस्तान के शहर सोने की महंगाई की शिकायत नहीं करते, पेट्रोलियम के दाम जब चाहे तब पांच-दस फीसदी घट-बढ़ जाते हैं, लेकिन उसकी शिकायत कोई नहीं करते। लेकिन जब किसान की उपज के दाम बढ़ते हैं, तो शहरों को लगता है कि उनका खून चूसा जा रहा है। बाजार किसान की उपज के बाद जितना मोटा मुनाफा कमाता है, उतना किसान पूरी जिंदगी में कभी नहीं कमा सकता। और अब तो वायदा कारोबार के नाम पर, कभी आयात और कभी निर्यात के फैसलों के रास्ते, बाजार जैसा मोटा मुनाफा कमाता है, उसका कोई हिस्सा किसान तक कभी नहीं पहुंच पाता। यही वजह है कि देश भर में जगह-जगह किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और राज्य सरकारें लगातार यह साबित करने में लगी रहती हैं कि ये आत्महत्या खेती की वजह से नहीं हैं, किसी निजी वजह से हैं। भारत में खेती की अर्थव्यवस्था को इस तरह खत्म किया जा रहा है, कि बड़े-बड़े पूंजीपति ही बड़ी-बड़ी खर्चीली खेती कर सकें, और छोटे किसान पानी को तरसते रह जाएं, और बैंक-बीमा कंपनियों से कभी कोई मुआवजा न पा सकें। 
आज देश की सरकार की जो सोच है, उसमें खेती की कोई प्राथमिकता नहीं है। किसानों के बजाय सरकार की दिलचस्पी उन लोगों में हैं जो कि बड़ा-बड़ा आयात कर सकते हैं। कभी प्याज तो कभी दाल, तो कभी तेल, इन सबकी महंगाई को पहले सोच-समझकर आसमान पर ले जाया जाता है, और उसके बाद इन सामानों को आयात करने का एक माहौल बनाया जाता है, ताकि गिने-चुने इम्पोर्टर रातों-रात अरबों की कमाई कर सकें। देश के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सरकारों की दिलचस्पी जरा भी नहीं है। हम पहले भी इस जगह लिख चुके हैं कि भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती के साथ-साथ बहुत से और स्वरोजगार जब तक नहीं जोड़े जाएंगे, तब तक किसान का जिंदा रहना मुश्किल होगा। लेकिन हस्तशिल्प से लेकर दूध, फल, सब्जी, शहद, और फूल जैसे दर्जनों दूसरे काम हैं जिनको गांवों से जोडऩे पर किसान मौसम की मार को बर्दाश्त करने लायक बन सकेेगा। अभी तो जब कुदरत ऊपर से मार करती है, तब बैंक, बीमा, बाजार, और सरकार जमीन पर से उस पर मार करते हैं। ऐसे में किसान की मौत के सिवाय और कुछ मुमकिन नहीं है। 

जनता के पैसों से स्मारक पर रोक, का मोदी का फैसला सही, लेकिन खुद भी तो वही किया है

संपादकीय
29 अक्टूबर 2015

दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के जीवनकाल का सरकारी बंगला उनके स्मारक में बदलने से मोदी सरकार ने मना कर दिया है। यह सरकार के उस फैसले के तहत है जो कुछ महीने पहले घोषित किया जा चुका था, कि किसी मंत्री-सांसद, या किसी और की स्मृति में किसी सरकारी बंगले को स्मारक में नहीं बदला जा सकता। इस बात को लेकर कुछ लोग सरकार की आलोचना कर रहे हैं, और इसे डॉ. अब्दुल कलाम का अपमान करार दे रहे हैं, लेकिन हम सरकार के इस फैसले के हिमायती हैं। 
इस देश में स्मारकों के नाम पर जनता की छाती पर खूब बोझ डाला हुआ है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपने पिता बाबू जगजीवन राम की स्मृति में उनका रहा हुआ बंगला स्मारक बनवाने के लिए अपनी ही पार्टी की यूपीए सरकार से खासी खींचतान की थी। उनके अलावा भी कभी चौधरी चरणसिंह के रहे हुए बंगले को स्मारक बनाने की बात उठती है, तो कभी किसी और की याद को जनता के खर्च से जिंदा रखने की। दिल्ली में महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव की समाधियों के साथ-साथ उन्हीं के टक्कर की एक समाधि ऐसे संजय गांधी की याद में भी बनाई गई है जिनका इस देश में योगदान महज इमरजेंसी थी। न तो वे किसी ओहदे पर रहे, और न ही अपने परिवार के दो और लोगों की तरह उनकी जिंदगी किसी आतंकी हमले में गई थी। ऐसे में सरकारी खर्च पर दिल्ली में एक बड़ी सी समाधि पूरी तरह नाजायज थी, और वह जनता की छाती पर हमेशा के लिए एक बोझ रहेगी। यह सिलसिला आगे बढ़ाना बहुत गलत होगा। 
लेकिन मोदी सरकार के ही कुछ और फैसलों को देखने की जरूरत है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के पहले से सरदार पटेल की एक प्रतिमा को अमरीका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊंचाई की बनाने की घोषणा की थी, और एक सामाजिक-राजनीतिक अभियान चलाकर देश भर से उस प्रतिमा के लिए गांव-गांव से लोहा मांगा गया था। लोगों को लग रहा था कि जनसहयोग से मिले लोहे से भारतीय इतिहास के इस लौह पुरूष की प्रतिमा बनेगी। लेकिन बाद में पता लगा कि केन्द्र या गुजरात सरकार कुछ हजार करोड़ रूपए खर्च करके यह स्मारक बनवा रहे हैं। खबर तो यह भी है कि भारत की एक बड़ी कंपनी चीन की किसी कंपनी के साथ मिलकर इस प्रतिमा को बना रही है, और जनसहयोग के लोहे का क्या हुआ इसकी कोई खबर नहीं है। स्मारकों की चर्चा करें तो एक दूसरी बात याद आती है। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने दलित समुदाय के देश के सबसे महान नेता बाबा साहब आंबेडकर, अपनी खुद की बसपा के संस्थापक कांशीराम, अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी, और अपनी खुद की जैसी विशाल प्रतिमाएं राजधानी लखनऊ में बनवाई, और उन पर जिस तरह से लाखों करोड़ रूपए दाम की जमीन, और हजार करोड़ के करीब की लागत झोंकी गई, वह भारत में सबसे हिंसक स्मारक बना है। इसके बनाने में जो भ्रष्टाचार हुआ, और उस पर सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उस पर हम अभी नहीं जाते। लेकिन लोगों की नीयत स्मारकों को लेकर जो है, उसका सबसे अश्लील प्रदर्शन मायावती की तरफ से किया गया, जब उन्होंने अपनी खुद की प्रतिमाओं पर इस तरह से जनता की दौलत के हजारों या लाखों करोड़ एक पूरा पार्क बनवाने में खर्च किए। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती है। जिस तरह गुजरात में सरदार पटेल की आसमान छूती प्रतिमा बनवाई जा रही है, ठीक उसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा अपने आदरणीय ऐतिहासिक शिवाजी का एक स्मारक समंदर में बनवा रही है, और उस पर भी हजारों करोड़ खर्च होने जा रहे हैं। 
ऐसे देश में जो कि रियायती खाने की वजह से दो वक्त खा पाता है, जहां पर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जहां पर इलाज और पढ़ाई का बजट केन्द्र सरकार लगातार काटती जा रही है, और मौजूदा सरकार ने शायद 15-20 फीसदी कटौती अभी साल भर में ही की है, उस देश में केन्द्र या राज्य के पैसों से हजारों करोड़ लागत के स्मारक बनाना, उसके लिए सरकारी जमीन देना, सरकारी बंगला देना, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है। मोदी सरकार भी डॉ. अब्दुल कलाम के जन्म स्थान रामेश्वरम में उनका एक बड़ा स्मारक सैकड़ों करोड़ की लागत से बनाने जा रही है। लेकिन दिल्ली में उनके बंगले को स्मारक में न बदलने का फैसला हम सही मानते हैं, और सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर ऐसे किसी भी खर्च की सीमा तय करनी चाहिए कि किस स्मारक पर कौन सी सरकार कितने बरस में अपने बजट का कितना हिस्सा खर्च करे, और कहां पर वे थम जाएं। ऐसा इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र में अपने पसंदीदा लोगों की महानता को आम जनता का पेट काटकर आसमान की तरफ खड़ा करने की नेताओं की नीयत खुद होकर थमने वाली नहीं है। देश भर में इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक आदेश देना पड़ेगा कि सरकार यह सिलसिला जनता के खजाने से खत्म करे, वरना किसी दूसरे राज्य में किसी और को मायावती बनने से कैसे रोका जा सकेगा? कल के दिन एक और आत्ममुग्ध नेता जयललिता अगर सरदार पटेल की प्रतिमा से दुगुनी ऊंचाई की अपनी प्रतिमा, और अपने नेता एम.जी.आर. की प्रतिमा चेन्नई के समंदर में बनवाना शुरू कर देंगी, तो उनको कौन रोक सकेगा? देश भर में यह सिलसिला ही थमना चाहिए। 

मुशर्रफ के दावों के बाद भी अमरीकी मदद जारी रहेगी?

संपादकीय
28 अक्टूबर 2015
पाकिस्तान के पिछले फौजी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने जितना खुलकर अपनी सरकार और अपनी फौज का आतंक-समर्थन गिनाया है, और जिस तरह अमरीका पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला करने वाले ओसामा-बिन-लादेन को अपना हीरो कहा है, उस पर कुछ कहना और करना अमरीका के लिए बड़ा भारी काम होगा। इस बात को दुनिया में अधिकतर जानकार मानते आए हैं कि पाकिस्तान लगातार अड़ोस-पड़ोस में आतंक को बढ़ावा देते रहा है, और भारत पर हुए कई हमलों को लेकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना केस भी रखा है कि कैसे पाकिस्तान से आए लोगों ने मुंबई अटैक किया, और बाकी हमले किए। लेकिन अमरीका की पाकिस्तान के लिए मोहब्बत कई लोगों को हैरान करती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अमरीका से मिलने वाली फौजी और नगद मदद से चलता है। ऐसे में भारत जैसे देश का यह कहना अमरीका अब अनसुना नहीं कर सकता कि जो मदद अमरीका से पाकिस्तान को मिलती है उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंक में किया जाता है। परवेज मुशर्रफ की कही ये बातें कल से भारत के मीडिया में छाई हुई हैं, और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कुछ कड़े तेवरों के साथ कल एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह कहा है कि पाकिस्तान जो जुबान समझता है उसको उसी जुबान में समझाया जाना चाहिए। 
दुनिया में कोई लोकतांत्रिक देश ऐसी गुंडागर्दी के साथ इस बात का दावा नहीं करता कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी उसका हीरो है, या उसने भारत के कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान के तालिबान तक को ट्रेनिंग दी, मदद दी, हथियार दिए। मुशर्रफ के बारे में लोगों को अच्छी तरह याद है कि कारगिल में फौजी घुसपैठ करने को लेकर भी उन्होंने बरसों बाद जाकर इस बात पर बड़ा फख्र जाहिर किया था कि हिन्दुस्तान की अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार सोती रही, और पाकिस्तानी फौजें कारगिल में दूर तक घुसकर हिन्दुस्तानी इलाकों पर कब्जा कर चुकी थी। इसके बाद का कारगिल युद्ध इतिहास में दर्ज है, और उसकी अधिक चर्चा आज मुशर्रफ या पाकिस्तान को लेकर करना जरूरी नहीं है। 
अमरीका के लिए फौजी नजरिए से शायद यह बात जरूरी है कि ईरान और चीन  के बीच में बसे पाकिस्तान को इनमें से किसी की भी जेब में जाने से वह रोके, और अपने साथ बनाए रखे। जिस तरह से दुनिया के बड़े कारोबारी अपने कारखानों के इलाकों में, अपनी खदानों के इलाके में वहां के स्थानीय मवाली-रंगदार को हफ्ता देते हैं, उसी तरह अमरीका पाकिस्तान को इस इलाके में अपना अड्डा चलाने के लिए, जमीन के भाड़े की तरह, रंगदारी की तरह हफ्ता देता है। अब जब ये तमाम बातें सामने आ गई हैं कि जनरल मुशर्रफ ने किस तरह तालिबानों और लादेन जैसे लोगों को बढ़ावा दिया, जिन्होंने अमरीका पर हमला किया, न्यूयॉर्क की इमारतों को मिट्टी में मिलाकर अमरीकी गुरूर को धूल में मिला दिया, तो उसके बाद अब अमरीका को सार्वजनिक रूप से अपने नजरिए का खुलासा करना चाहिए। आज दुनिया में जो देश लोकतांत्रिक होने की बात कहते हुए लगातार आतंक को बढ़ावा देता है, उसे अमरीका चढ़ावा देता है। अब भारत के इस दावे में दुनिया को एक अधिक दम दिखेगा कि पाकिस्तान को मिलने वाली अमरीकी मदद आतंक के लिए इस्तेमाल होती है। 
अमरीका ने अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा आतंक-का-शिकार बताते हुए इराक पर हमला किया, लीबिया पर हमला किया, और बाकी देशों पर उसके हमले चल ही रहे हैं। एक तरफ तो अमरीका अपने घर में सीमित देशों पर हमला करके लाखों लोगों को मार चुका है, और वहां पर लोकतंत्र स्थापित करने का नाटक करता है, आतंकियों को मारने के लिए दुनिया के देशों को धमकाकर अपने साथ ले जाता है। दूसरी तरफ जनरल मुशर्रफ के ऐसे खुले दावों के बाद अगर अमरीका पाकिस्तान की आर्थिक मदद जारी रखता है, तो उसका पाखंड खुलकर उजागर होता है। भारत को जनरल मुशर्रफ की कही इन नई बातों को लेकर अमरीका के सामने जमकर विरोध करना चाहिए, क्योंकि भाजपा की ही अटल सरकार पर मुशर्रफ ने फौजी हमला किया था। 

मैगी की वापिसी से एक खतरे की भी वापिसी...

संपादकीय
27  अक्टूबर 2015

लंबे सरकारी प्रतिबंध और अदालती लड़ाई के बाद अब ऐसा लगता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले की भारतीय बाजार की हिट मैगी फिर दुकानों में सजने जा रही है। इसमें नुकसानदेह तत्व मिलने पर एक-एक करके कई राज्यों में और फिर देश भर में इस पर रोक लगाई गई थी, लेकिन अब कई प्रयोगशालाओं के परीक्षण के बाद इसे फिर इजाजत मिल रही है। इससे देश भर के उच्च और उच्च-मध्यम आयवर्ग के ऐसे लोगों को बड़ी खुशी हो रही है जो दो-चार मिनट में पक जाने वाली इस पैकेटबंद-मसालेदार सेंवई के आदी हो चुके थे। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह उठता है कि क्या भारत में लोगों को सेहतमंद खाने के लिए बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार पूरी कर पा रही है?  
भारत की आबादी में डायबिटीज के मरीजों का अनुपात लगातार बढ़ते चल रहा है। लोगों में, खासकर संपन्न तबके में वजन बढऩे का खतरा भी गंभीर होते जा रहा है। जो महंगे स्कूल-कॉलेज हैं, उनमें खान-पान की कैंटीन में मिलने वाले कूड़े सरीखे नुकसानदेह सामानों को लेकर पश्चिम के संपन्न देश वैसे ही बहुत फिक्रमंद हैं, और भारत के महंगे स्कूल-कॉलेज इस मामले में पश्चिम से कहीं पीछे नहीं हैं। एक तरफ तो अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारत के मंझले शहरों तक पहुंच चुके हैं, और एक टेलीफोन पर खाने के सामान घर तक पहुंचा देते हैं, और दूसरी तरफ संपन्न तबके का अपने घर पर भी डिब्बाबंद, बोतलबंद खाना-पीना लगातार बढ़ते जा रहा है। एक सोच यह हो सकती है कि संपन्न तबके की सेहत अगर बिगड़ती है, तो वह सरकार पर इलाज का बोझ नहीं डालती। इस तबके के लोग अपने खर्च पर इलाज करा लेते हैं, लेकिन देश की सेहत को इससे बिगड़ती ही है। इसलिए सरकार और समाज इन दोनों को इस जागरूकता के लिए कोशिश करनी चाहिए। 
दूसरी बात यह कि भारत की खुली और उदार बाजार-व्यवस्था के तहत आज खान-पान जितना बिगड़ रहा है, उतने ही महंगे अस्पताल बढ़ते भी चल रहे हैं। ऐसे में बिना किसी साजिश के भी हो यह रहा है कि बाजार एक तरफ तो महंगा कूड़ा खिलाकर लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है, और फिर उसी बाजार की एक दूसरी दूकान लोगों को महंगा इलाज बेच रही है। ये दोनों काम बाजार को माकूल बैठते हैं। इस बिना गढ़ी हुई बाजारू साजिश को खत्म करने की जरूरत है। आज दुनिया भर के आंकड़े ये बता रहे हैं कि कोकाकोला जैसे डिं्रक की एक-एक बोतल में कितने चम्मच शक्कर है, और वह पूरी सेहत के लिए किस हद तक नुकसानदेेह है। और बाजार के हमलावर तेवर हैं कि हर दिन सबसे मशहूर फिल्मी सितारे ऐसे कूड़े को बढ़ावा देते टीवी पर दिखते हैं। देश में जनता के लिए खान-पान की जागरूकता का एक बड़ा अभियान छेडऩे की जरूरत है। सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के जो भी सामाजिक या किसी और तरह के भी संगठन हैं, उनको अपने सदस्यों को बचाने के लिए खानपान के विशेषज्ञों के व्याख्यान करवाने चाहिए, ताकि उनके सदस्य सेहतमंद भी बने रहें, और लंबी जिंदगी भी जी सकें। हर स्कूल और कॉलेज को भी अपने बच्चों को सावधान करने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर जो जितने संपन्न तबके वाले हैं, उनको उतनी ही अधिक कोशिश की जरूरत है। मैगी और कोलाकोला एक ब्रांड न होकर उससे भी अधिक एक जीवनशैली के प्रतीक बन गए हैं, और इनके खतरों को कम नहीं आंकना चाहिए। आज देश में नौजवान पीढ़ी के कई लोग ऐसे हैं जो मां के आने के इंतजार से अधिक मैगी के आने का इंतजार कर रहे हैं, उनको सावधान करना जरूरी है।

बलात्कार घटाने की कोशिश सबको मिलकर करनी चाहिए

संपादकीय
26 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में आए दिन बलात्कार हो रहे हैं, और छोटी बच्चियों से लेकर आदिवासी युवतियों तक, बुजुर्ग महिलाओं तक, और सरकारी छात्रावास में रहने वाली लड़कियों तक से बलात्कार की खबरें रोज छप रही हैं। लेकिन ऐसा जुर्म होता है, पुलिस तक मामला जाता है, खबर छपती है, और सब कुछ दफन हो जाता है। बरसों बाद जाकर किसी-किसी मामले में सजा हो जाती है, लेकिन इतने संपन्न राज्य में जहां सरकार और समाज कई तरह के मामलों में हजारों करोड़ खर्च करते हैं, इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक चर्चा तक नहीं होती कि बलात्कार क्यों होते हैं, और उनको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। हम यह नहीं कहते कि हर बलात्कार रोकने के लायक होता है, बहुत से मामले ऐसी स्थितियों में होते हैं जहां तक सरकार और समाज की पहुंच नहीं होती। लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनों में कोई एक ऐसी लड़की आत्महत्या करती है जो कि पड़ोस के लड़कों की छेड़छाड़ से परेशान रहती थी। अब जहां लड़कियों की सुरक्षा की यह स्थिति है, वहां पर बलात्कार के बाद बहुत सी लड़कियां और महिलाएं पुलिस तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाती होंगी। 
इस राज्य में बाकी हिन्दुस्तान की तरह एक जरूरत बिल्कुल खड़ी हुई है, समाज और सरकार को मिलकर लड़कियों और महिलाओं के सम्मान के लिए, उनके बेहतर अधिकारों के लिए, और उनकी बेहतर हिफाजत के लिए अभियान छेडऩे की जरूरत है। इसके साथ-साथ समाज के तमाम लोगों को यह बताने की जरूरत भी है कि सेक्स-अपराधियों के साथ कानून कितना कड़ा हो सकता है, और ऐसे मामले में पकड़ाने से लेकर सजा पूरी होने तक हो सकता है कि बलात्कारी का पूरा परिवार ही तबाह हो जाए। आमतौर पर बलात्कारी उस पीढ़ी के रहते हैं कि उनके आगे-पीछे दूसरी पीढिय़ां भी रहती हैं। एक बलात्कार के साथ-साथ बलात्कारी के बच्चों की बाकी जिंदगी भी तबाह हो सकती है, और हो सकता है कि वे जब तक जेल से लौटें, तब तक मां-बाप चल बसें। हमारा मानना है कि लोगों को जुर्म की सजा के खतरों से समय रहते अगर अच्छी तरह आगाह किया जाता है, तो लोग जुर्म से कतरा भी सकते हैं। 
फिर सरकार से परे समाज की भी यह जिम्मेदारी रहती है कि आस-पड़ोस में, सड़क पर या सार्वजनिक जगहों पर, स्कूल या अस्पताल में, हॉस्टल या खेल के मैदान पर अगर वे किसी तरह का देह-शोषण देखते हैं, छेड़छाड़ या बदमाशी देखते हैं, तो उनको भी खुलकर ऐसी बातों का विरोध करना चाहिए। सरकार की पुलिस चाहे कितनी ही बड़ी और ताकतवर क्यों न हो, उसके आकार और उसके खर्च का बोझ जनता पर ही पड़ता है। एक-एक बलात्कार की जांच से लेकर उसकी सजा तक सरकार पर लाखों रूपए का खर्च होता है। अगर जनता जागरूक रहे, तो सरकार का ऐसा खर्च घट भी सकता है, और खर्च से अधिक महत्वपूर्ण बात हम पहले ही लिख चुके हैं कि मुजरिम ऐसे जुर्म से बच सकते हैं। 
सरकार और समाज को मिलकर सार्वजनिक रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, और यह भी गारंटी करनी चाहिए कि समाज में जो कमजोर तबके हैं, उनके साथ दबंगई दिखाने वाले ताकतवर लोग समय रहते सजा पा जाएं। आज जो लोग छेडख़ानी करते हैं, और बच जाते हैं, वैसे ही लोग कल बलात्कार तक पहुंचते हैं। इससे परे बलात्कारियों की एक किस्म ऐसी भी होती है जो परिवार के पहचान के लोग रहते हैं, और ऐसे लोगों से अपने बच्चों को सावधान करना हर परिवार की जिम्मेदारी है। लेकिन भारत में मां-बाप और बच्चों के बीच बातचीत के मुद्दों को लेकर इतनी झिझक कायम रहती है कि बहुत सी बातों को खुलकर किया ही नहीं जाता। सरकार को चाहिए कि मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के ऐसे सार्वजनिक व्याख्यान करवाए जाएं जो कि मां-बाप को सावधान और चौकन्ना करने का काम करें। 
बलात्कार पूरी तरह से बंद नहीं हो सकते, लेकिन उनको घटाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। इसके लिए सबको भिड़कर काम करने की जरूरत है।