जितनी बड़ी आपदा, उसमें छुपा उतना बड़ा अवसर...

कोरोना के चलते अचानक होने वाली बहुत सी मौतों की बात न भी करें, तो भी बीच-बीच में कमउम्र के लोगों की, बिना दुर्घटना की, ऐसी मौतें सामने आती रहती हैं जो हक्का-बक्का कर देती हैं। दारू या सिगरेट न पीने वालों, तंबाकू-गुटखा न चबाने वालों को भी कमउम्र में कैंसर होता है, वे तो चल बसते हैं, बाकी लोगों के सामने लापरवाही के लिए एक मिसाल छोड़ जाते हैं कि सिगरेट न पीने वाले क्या कैंसर से मरते नहीं हैं? यह लापरवाही और बहुत सी मौतों को बढ़ावा देती है, ठीक उसी तरह जिस तरह कि अभी कोरोना की वजह से लोगों में सिगरेट-गुटखा कम होने से मौतें घटी भी हैं। बहुत सी मौतों को लेकर दूसरे लोग कुछ देर की फिक्र भी करते हैं, और फिर श्मशान वैराग्य से उबरकर अपनी लापरवाह जिंदगी जीने लगते हैं।

कोरोना ने जिस तरह अचानक बहुत से लोगों को खत्म कर दिया, सोशल मीडिया पर वैसे जवान लोगों की तस्वीरें देख-देखकर अटपटा लगता है। दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर ही बहुत से बुजुर्ग एक दहशत में जीते दिखते हैं क्योंकि उनकी उम्र के लोग अधिक खतरे में हैं, और मरने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा साठ बरस से अधिक के लोगों का है। किसी के गुजर जाने पर उसकी खबरों को देख-देखकर बहुत से लोग अपनी सेहत के बारे में एक तनाव में रहते हैं, इसमें बस तनाव गैरजरूरी है, लेकिन उससे सबक लेकर सावधान रहना उतना ही जरूरी है।

एक महामारी, कोरोना, की वजह से लोगों में आई अतिरिक्त सावधानी कोई बुरी बात नहीं है। इसी सावधानी के चलते लोगों की जिंदगियां भी बचेंगी, और लोगों का घर भी बिकने से बचेगा। आज जो लोग सरकारी इलाज को नाकाफी पाते हैं और बेहतर लगने वाले महंगे निजी इलाज की तरफ जाते हैं, वे एक लंबे खर्च में फंस जाते हैं। अब उस परिवार की सोचें जिसमें पहले कोरोनाग्रस्त को महंगा निजी इलाज दिलवाया गया, और फिर एक-एक करके दो-चार और लोग परिवार में कोरोनाग्रस्त निकल गए। बाद के सदस्यों को क्या कहकर सरकारी अस्पताल ले जाया जा सकता है? अभी छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि किस तरह उनके एक मरीज बच्चे के परिवार में पांच लोग कोरोना पॉजिटिव हो गए जिनमें दो बच्चे भी हैं, और इन्हें सीटी स्कैन की जरूरत भी है। अब बहुत रईस लोगों को छोडक़र और कौन हो सकते हैं जो इस तरह का खर्च उठा सकें?

ऐसे में एक बड़े कामयाब वकील रहे एक संपन्न बुजुर्ग अचानक दहशत में आकर सोशल मीडिया पर अपनी सेहत को लेकर लोगों से तरह-तरह की राय लेने में लग गए हैं। राय लेने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया इसके लिए सही जगह नहीं है क्योंकि अधकचरी जानकारी वाले लोग भी वहां रायबहादुर बन जाते हैं। दहशत से परे उनकी सावधानी अच्छी चीज है क्योंकि यह सावधानी बाकी जिंदगी बड़े काम आती है। कोरोना ने यह नौबत पैदा की है, और इसके चलते हुए लोगों को न सिर्फ अपनी सेहत के लिए, बल्कि अपनी बाकी तमाम जिम्मेदारियों और अधिकारों के लिए भी सचेत हो जाना चाहिए। जो लेना है उसे लेने की कोशिश करनी चाहिए, जो देना है उसे देने की तैयारी करनी चाहिए। और अपने वारिसों के लिए इस तमाम जानकारी को कानूनी कागजात की शक्ल में छोडऩा भी चाहिए। कोरोना ने जितनी जिंदगियां दुनिया में खत्म की हैं, हो सकता है कि उससे अधिक जिंदगियां उसने बचाई भी हों। लोग जब सावधानी के साथ जीने लगेंगे, साफ-सफाई के लिए फिक्रमंद रहेंगे तब वे मौत को टालने में कामयाब भी होंगे। लोग आज अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए जागरूक हुए हैं, और ऐसा होने से उनकी जिंदगी लंबी हो सकती है, सेहतमंद हो सकती है। इसी तरह गैरजरूरी भटकना कम होने से लोग हादसों में कम मर रहे हैं, और बहुत सी जिंदगियां बच रही हैं। लोग तरह-तरह की जांच करवा रहे हैं जिनसे उन्हें ऐसी बीमारियों की खबर लग रही है जिसका उन्हें अंदाज नहीं रहा होगा, और यह बात भी दुनिया में मौतों को घटाने वाली है।

हर आपदा में एक अवसर छुपा होता है यह बात सदियों पहले से चली आ रही है। कोरोना की आपदा भी ऐसे अवसर लेकर आई है जब लोग सेहत के लिए एक नई जागरूकता पा रहे हैं, काम-धंधों को लेकर, रोजगार को लेकर लोग जिस भरोसे में बेफिक्र जी रहे थे, उससे उबरकर वे अब चौकन्ने होकर जिंदा रहने की लड़ाई के लिए बेहतर तैयार हो रहे हैं। कोरोना के इस दौर में जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई तो नहीं हो सकती, लेकिन लोग बेहतर तैयारी से उससे उबर सकते हैं, हो सकता है कि आने वाले कुछ बरसों में लोग अधिक काबिल हो जाएं, और अगली मुसीबत को झेलने के लिए अधिक तैयार रहें।
 
कतरा-कतरा इन बातों को आज यहां लिखने का मकसद यही है कि कोरोना को रोकना न तो कुदरत के हाथ था, और न ही विज्ञान के। साल गुजरते-गुजरते इससे लडऩे के लिए एक वैक्सीन के आसार दिख रहे हैं, और लोग जिंदगी पर आई मुसीबत से निपटने के लिए कुछ बेहतर तैयार दिख रहे हैं। जो चले गए उनका तो कुछ नहीं हो सकता, लेकिन जो रह गए वे अगर श्मशान वैराग्य जैसी क्षणिक सावधानी के शिकार न रहे, और लंबे समय तक के लिए सावधान रहे तो उनका भला जरूर हो सकता है। दुनिया के तरह-तरह के कारोबार ने भी इस दौरान किफायत के कुछ नए सबक लिए हैं, कामगारों ने भी अपने काम को बेहतर बनाना सीखा है, और लोगों ने नए-नए हुनर भी सीख लिए हैं। इन सब बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि कोरोना जैसी इस विकराल आपदा में भी एक अवसर है कि लोग आगे की जिंदगी के लिए हर किस्म से बेहतर तैयार हो सकें। 

(Daily Chhattisgarh)

मैं क्या करूं?

  बहुत पहले युवा पीढ़ी के लिए एक पाक्षिक या मासिक पत्रिका आती थी जिसमें नौजवानों के शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक पहलुओं पर उनके पूछे सवाल रहते थे, और उनके लिए सलाह के रूप में जवाब रहते थे। आमतौर पर पश्चिम में अंग्रेजी भाषा में ऐसे कॉलम कोई महिला लिखती है, और उन्हें एगनी आंट कहा जाता है, उलझन सुलझाने वाली आंटी। उस पत्रिका में इस कॉलम का नाम, मैं क्या करूं, था, और उसे लोग दिलचस्पी के साथ पढ़ते थे फिर चाहे वे सवाल गढ़े हुए क्यों न हों, फर्जी नामों से छपे हुए क्यों न हों। कुछ ऐसे ही कॉलम अलग-अलग जगहों पर मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के लिए हुए भी छपते हैं जिनके बारे में कुछ परामर्शदाताओं का यह मानना है कि उनसे पढऩे वालों का नफा कम, नुकसान अधिक होता है क्योंकि वे कई समस्याओं के शिकार न रहते हुए भी उन्हें पढक़र अपने आपको उनसे जोड़ लेते हैं, और एक नामौजूद उलझन में सचमुच ही उलझ जाते हैं।

लेकिन असल जिंदगी में रोजाना ही कोई न कोई ऐसी नौबत आती है, जब लगता है कि कोई बताने वाले रहें कि ‘मैं क्या करूं’? अब जैसे इन दिनों रिहायशी इलाकों में घूम-घूमकर फल-सब्जी, और दूसरे सामान बेचने वाले लोग एकदम से कई दर्जन गुना हो गए हैं। जिनका कोई दूसरा काम छूट गया, वे हजार-दो हजार रूपए की सब्जियां लेकर घूमते हैं, और कुछ न कुछ धंधा शायद हो जाता है। ऐसे लोग जब तक जोरों से आवाज नहीं लगाते तब तक उनकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता, और ग्राहकी नहीं होती। अब इनसे यह उम्मीद रखना कि वे जोरों की आवाज लगाते हुए भी मास्क लगाए रखेंगे कुछ ज्यादती इसलिए होगी कि उससे तो आवाज दब ही जाएगी। तो ऐसे लोगों को मास्क का ज्ञान देना ठीक होगा या नहीं?

शहरी चौराहों पर बहुत से परिवारों के अलग-अलग कई उम्र के लोग सामान बेचते दिखते हैं। कुछ महिलाएं कुछ महीनों के बच्चों को गोद में टांगे भी रहती हैं। और चौराहों की लालबत्ती पर गाडिय़ों के धुएं का प्रदूषण बहुत अधिक रहता है। अब इन लोगों को ऐसे जहरीले धुएं के बीच अपनी रोजी-रोटी कमाने से रोका जाए, या इनसे कुछ खरीदा जाए, या आगे बढ़ लिया जाए? जब यह नजारा सामने पड़ता है तब मन में सवाल उठता है कि मैं क्या करूं? इन्हीं चौराहों पर कई अपाहिज, कई बूढ़े या बच्चे, जमीन पर घिसटकर चलते कई लोग थमी हुई गाडिय़ों के लोगों से भीख भी मांगते हैं। अब इन्हें भीख देने का मतलब इन जगहों पर उन्हें बढ़ावा देना होगा, या उनकी मदद करना होगा? अक्सर लगता है कि कोई तर्कसंगत या न्यायसंगत सलाह मिल जाए, लेकिन जरूरत के वक्त सलाह मिलती कहां है, यह एक अलग बात है कि बिना जरूरत सलाह देने वाले बेमौसम की बारिश की तरह सलाह बरसाते रहते हैं।

अभी एक सुबह घूमते हुए 8-10 बरस का एक छोटा सा बच्चा छत्तीसगढ़ की इस राजधानी की एक संपन्न बस्ती में बड़ा सा झाड़ू थामे सडक़ साफ कर रहा था। रूककर उससे पूछा गया कि वह किसके लिए काम कर रहा है? आसपास के किसी घरवालों के लिए, म्युनिसिपल के लिए, या किसी और के लिए? उसका कहना था कि मां की तबियत खराब है, इसलिए उसकी जगह वह ड्यूटी करने आ गया है ताकि हाजिरी न कटे। अब यह देखकर यह समझ नहीं पड़ा कि इस बारे में म्युनिसिपल के अफसरों से बात करें, वार्ड के पार्षद से बात करें, या किसी सफाई ठेकेदार से बात करें? या कुछ भी न करें क्योंकि लॉकडाऊन के कारण इस उम्र की बच्चों की स्कूलें बंद चल रही हैं, और बीमार मां की मदद के लिए अगर उसकी जगह यह बच्चा काम कर रहा है, तो उसे रोका तो जा सकता है, लेकिन हो सकता है कि उसकी मां की मजदूरी कट जाए, या उसे काम से हटा दिया जाए। बाल मजदूरी खराब है, लेकिन अगर घर चलाने के लिए वही एक रास्ता बचा है, तो उस रास्ते पर जाने से किसी बच्चे को रोका जाए, या न रोका जाए?

स्कूलें बंद रहने से बच्चे टोलियां बनाकर घूम रहे हैं, और कॉलोनियों की नालियों में झांकते दिखते हैं जहां कीचड़ में जरा भी हलचल हो, तो वे नीचे तक पैर-हाथ डालकर मछलियां टटोलने लगते हैं। अब कोरोना जैसी महामारी के बीच गंदगी भरी नालियों में उतरे हुए इन बच्चों को भगाया जाए, रोका जाए, या उनके लिए कुछ और किया जाए? यह सवाल दिल को कोंचता है, और दिमाग को भी, और इन दोनों से जवाब अलग-अलग निकलते हैं।

शहरी फुटपाथों पर और रेलवे प्लेटफॉर्म पर जीने वाले अनगिनत भिखारी और बेघर बच्चे ऐसे रहते हैं जो इन जगहों पर तो खाने को कुछ पा जाते हैं, लेकिन दूसरी जगहों पर शायद उन्हें पेट भर भीख भी नसीब न हो। अब सार्वजनिक जगहों को साफ रखने के लिए भिखारियों और बेघर लोगों को वहां से भगा दिया जाए, या सार्वजनिक जगहों पर जिंदगी जीने का उनका हक एक बुनियादी हक माना जाए? यह सवाल आसान नहीं रहता, और अलग-अलग वक्त पर एक ही सोचने वाले को अलग-अलग जवाब सूझते हैं। अमरीका के कई शहरों में सार्वजनिक उद्यानों जैसी जगहों पर बेघर कब्जा करके वहां रहने लगते हैं। जिन प्रदेशों में लोगों की सोच अधिक पूंजीवादी रहती है, वहां की स्थानीय सरकार और पुलिस उन्हें भगाती हैं, और कुछ प्रदेशों में जहां की राजनीतिक चेतना अधिक उदारवादी रहती है वहां पर किसी भी सार्वजनिक जगह पर जिंदा रहने के हक को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, और उन्हें वहां रहने देने के लिए भी आंदोलन होते हैं।

ऐसे सवाल बहुत सी जगहों पर उठ खड़े होते हैं कि किसी नौबत में क्या किया जाए। किसी उद्यान या सार्वजनिक जगह पर अश्लील गालियां बकते लडक़ों की टोलियों को रोककर, टोककर यह खतरा उठाया जाए कि बाद में आते-जाते वे गाडिय़ों के चक्कों की हवा निकाल जाएं, या फिर उन गालियों को अनदेखा करके चुपचाप आगे बढ़ लिया जाए? यही हाल सार्वजनिक जगहों पर बैठकर सिगरेट या गांजा पीते लोगों को देखकर होता है, या दारू पीते लोगों को देखकर होता है कि उसे अनदेखा किया जाए, या खतरा मोल लेकर उन्हें रोका-टोका जाए?

असल जिंदगी में कोई परामर्शदाता नहीं मिलते जो बताएं कि ऐसी नौबतों में कब क्या करना चाहिए। यह जरूर हो सकता है कि लोग अपने आसपास के दो-चार लोगों से चर्चा करें कि ऐसी नौबत में उन्हें क्या करना चाहिए था, या क्या करना चाहिए। कितना अच्छा होता कि असल जिंदगी में भी उलझन सुलझाने वाली ऐसी कोई आंटी मौजूद होती, और वह बेहतर राह सुझाती रहती। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 दिसंबर 2020


 

वैक्सीन पर कुछ भी तय नहीं, और लोग बेपरवाह...

 कोरोना वैक्सीन अभी प्रयोगशाला से निकलकर कुछ देशों में कुछ लोगों को लगने जा रही है, और दुनिया भर के लोग बेफिक्र हो गए हैं कि  कोरोना का खतरा टल गया है। हिन्दुस्तानी लोग चूंकि कई करोड़ देवी-देवताओं और ईश्वरों पर प्रयोगशालाओं से अधिक भरोसा रखते हैं इसलिए वे कुछ अधिक बेफिक्र हो गए हैं। दूसरी तरफ कोरोना के मोर्चे पर अधिकतर काम राज्य सरकारों को करना पड़ा है लेकिन कोरोना से लेकर लॉकडाऊन तक तकरीबन हर प्रतिबंध केन्द्र सरकार के काबू का रहा है। आज भी कोरोना की वैक्सीन किस तरह आएगी, किनको मुफ्त मिलेगी, किनको भुगतान करना होगा, केन्द्र या राज्य उसमें हिस्सा कैसे बटाएंगे, प्राथमिकता किन्हें दी जाएगी, इसकी कालाबाजारी न हो उसे कैसे रोका जाएगा जैसे दर्जनों सवाल खड़े हुए हैं, और केन्द्र सरकार की राज्यों के साथ कोई अधिक मिलीजुली तैयारी दिख नहीं रही है। फिर यह भी है कि क्या राज्य सीधे ही यह वैक्सीन देश के किसी निर्माता से या किसी विदेशी निर्माता से खरीद सकेंगे, और अपने राज्य में उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकेंगे, या वे केन्द्र के नियमों से बंधे रहेंगे यह भी साफ नहीं है। जिस तरह बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार के हर नागरिक को मुफ्त में कोरोना वैक्सीन लगाने की औपचारिक चुनावी घोषणा की थी, वह घोषणा भी सही थी या झूठी थी, यह भी अब तक साफ नहीं है क्योंकि केन्द्र सरकार अब यह कह रही है कि हर नागरिक को वैक्सीन लगेगी भी नहीं। ऐसे में बिहार का यह वायदा क्या कहा जाए? 

आज सुबह की खबर है कि केन्द्र सरकार ने राज्यों से कहा है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव की वोटर लिस्ट के आधार पर 50 बरस से अधिक उम्र वालों की शिनाख्त की जाएगी, और प्राथमिकता के आधार पर पहले से रजिस्टर होने वाले लोगों को टीका लगाया जाएगा। केन्द्र सरकार से बागी तेवर रखने वाली बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले को गलत ठहराया है और कहा है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं उनका क्या होगा? पार्टी ने मांग की है कि बिना भेदभाव के सभी नागरिकों को वैक्सीन लगाई जाए। अलग-अलग पार्टियों या अलग-अलग राज्यों की सोच अलग-अलग है। लेकिन केन्द्र सरकार ने बीते कई महीनों में अब तक कोई साफ नक्शा सामने नहीं रखा है कि टीके की लागत कौन उठाएंगे? किस आय वर्ग से ऊपर के लोगों को अपने खर्च पर टीका लगवाना होगा? खर्च में केन्द्र और राज्य का क्या हिस्सा रहेगा? बहुत सारी बातें अभी साफ नहीं हैं जबकि बीते कई महीने इस देश को तैयारी के लिए मिल चुके हैं। 

यह बात सही है कि सिर्फ मतदाता सूची को, या सिर्फ नागरिकता के दस्तावेजों को, या आधार कार्ड को बुनियाद बनाकर टीके पाने वाले लोगों की सीमा तय करना गलत होगा। अब तक केन्द्र सरकार को राज्यों से विचार-विमर्श करके यह तय कर लेना था, या राज्यों को तय करने देना था कि वे टीकाकरण कैसे करेंगे। भारत सरकार हर मामले में सबसे अच्छी योजना बनाने वाली हो यह भी जरूरी नहीं है, और दूसरी तरफ राज्यों के चिकित्सा ढांचे एक सरीखे हों यह भी जरूरी नहीं है। इसलिए राज्यों की प्रतिभाओं का भी इस्तेमाल ऐसे टीकाकरण कार्यक्रम की बारीकियों को तय करने में होना चाहिए। यह बात जाहिर है, और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एक से अधिक बार कही है कि अगले बरस जून-जुलाई तक 20-25 करोड़ वैक्सीन लोगों को लगाने का अनुमान है। अब जैसा कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के साथ हुआ, पहला टीका लगने के एक पखवाड़े बाद वे कोरोना पॉजिटिव हो गए, बाद में डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें दूसरा टीका भी लगना था, जिसकी तारीख नहीं आई थी, इसलिए वे पहले टीके से पूरी तरह सुरक्षित नहीं थे। अब देश में जिन लोगों ने खुद होकर टेस्ट-वैक्सीन लगवाई है, वे बताते हैं कि किस तरह कई तरह की जांच के बाद वैक्सीन लगाई गई, उसके बाद फिर हफ्ते-हफ्ते जांच हुई, और फिर दूसरा डोज लगाया गया। अब सवाल यह है कि टीका लगवाने में फिर गरीब-मजदूरों की कम से कम दो दिनों की मजदूरी जाएगी, और बहुत से लोगों के लिए तो दी गई तारीख पर दूसरे डोज के लिए पहुंचना मुश्किल भी होगा। अब जबकि ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि टीका कुछ ही महीने दूर है, तब ऐसी बारीक योजना का खुलासा हो जाना चाहिए था ताकि राज्य सरकारें, स्थानीय संस्थाएं, और सामाजिक संगठन इस बड़ी चुनौती के लिए तैयार हो सकते। लेकिन अब तक जमीन पर ऐसी कोई चर्चा भी सुनाई नहीं दे रही है। 

और हिन्दुस्तानी लोग हैं कि वे इस लापरवाही के साथ जी रहे हैं कि मानो लैब में वैक्सीन बन गई है तो वे महफूज हो गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि वैक्सीन हर व्यक्ति तक पहुंचने में साल-दो साल भी लग सकते हैं, और इस बीच कोरोना की दूसरी लहर भी आ सकती है क्योंकि लोग लापरवाह हो चुके हैं, सरकारी प्रतिबंध तकरीबन खत्म हो चुके हैं, और बीमारी का खतरा बना हुआ है। हिन्दुस्तान में जिस गैरजिम्मेदारी के साथ शादी-ब्याह, दूसरे जलसे, और मृत्यु कर्म किए जा रहे हैं, वे बताते हैं कि सावधानी से थके हुए इस देश ने अब गैरजिम्मेदारी को ही जीने का ढर्रा बना लिया है। दिक्कत यह है कि देश और प्रदेशों के प्रमुख नेता, सार्वजनिक जीवन के चर्चित और प्रमुख लोग कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं कर रहे हैं। वे खुद कैमरों के मोह में बिना मास्क चलते हैं, चुनावों में धक्का-मुक्की को बढ़ावा देते हैं, और कोरोना के खतरे को बढ़ाते चल रहे हैं। आम जनता से लेकर खास लोगों तक का, फिक्र की कोई बात नहीं है, अब खतरा नहीं रह गया है जैसी बातें खतरे को बढ़ाते चल रही हैं। यह खतरा अस्पताल तक पहुंचने की नौबत या जान जाने की नौबत तक सीमित नहीं है, यह खतरा कोरोना के बने रहने तक चौपट हो रही अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा भी है जो कि टला नहीं है, और न ही टीकाकरण से वह एकदम से टल जाएगा। लोगों को सावधानी जारी रखना जरूरी है, और सावधानी की चर्चा महज अमिताभ बच्चन की टेलीफोन पर घोषणा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 दिसंबर 2020


 

किरणमयी नायक का बयान महिलाओं की साख का बड़ा नुकसान करने वाला

छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग के अध्यक्ष डॉ. किरणमयी नायक का एक चौंकाने वाला बयान आया है जिसमें उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ज्यादातर मामलों में लड़कियां पहले से सहमति से संबंध बनाती हैं, लिव-इन में रहती हैं, और बात बिगडऩे पर रेप का केस दर्ज करा देती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे रिश्ते में पडऩे का नतीजा बुरा होता है। कई लड़कियां तो 18 साल की होते ही शादी कर लेती हैं, और बच्चा होने पर आयोग में शिकायत लेकर आती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी लड़कियों को फिल्मी तरीके से किसी के चक्कर में नहीं पडऩा चाहिए।

किरणमयी नायक महज कांग्रेस सरकार की मनोनीत आयोग अध्यक्ष नहीं हैं, वे लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रही हैं, और पेशे से एक वकील भी हैं। वे कानून को और लोगों के मुकाबले बेहतर समझती हैं, और इसलिए भी उनका यह बयान हक्का-बक्का करता है। बलात्कार की शिकायतों में भारत में यह कानूनी व्यवस्था लंबे समय से है कि बलात्कार की शिकायत कर रही लडक़ी या महिला की नीयत पर जज भी शक नहीं करेंगे। मोटेतौर पर उसकी शिकायत को तब तक सही ही माना जाएगा जब तक वह गलत या झूठी साबित न हो जाए। जब कानून में ही ऐसी व्यवस्था करके रखी है, तो महिला आयोग की अध्यक्ष का बयान उनकी कानूनी जिम्मेदारी के ठीक उल्टे जा रहा है। महिला आयोग का तो जिम्मा ही यही है कि उसके पास आने वाली लड़कियों और महिलाओं की शिकायतों पर वह गौर करे, जो मामले सार्वजनिक रूप से उसकी नजर में भी आते हैं, उन पर गौर करे। अब अगर आयोग की अध्यक्ष ही महिलाओं की शिकायतों पर शक करते हुए उन्हें झूठी शिकायतें न करने की नसीहत दे रही हैं, तो ऐसा लगता है कि महिला आयोग का नजरिया भी समाज में चली आ रही पुरूषवादी सोच से ही उपजा हुआ है। अगर किसी लडक़ी या महिला की शिकायत झूठी है, तो उस पर आयोग भी जांच करने के बाद उसे खारिज कर सकता है, और अदालत भी। लेकिन शिकायतों को लेकर ऐसा आम बयान तो नाजायज है।

हिन्दुस्तान में दिक्कत यह है कि ताकत की जगह पर बैठने के बाद भी महिलाएं दूसरी महिलाओं के हक के आम मुद्दे को नहीं समझ पाती हैं। कई सांसद और भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री भी किसी आंदोलन के दौरान किसी सरकार को उसकी निष्क्रियता, निकम्मेपन, या गैरजिम्मेदारी के लिए चूडिय़ां भेंट करने चली जाती हैं मानो चूडिय़ां कायरता या कमजोरी का प्रतीक हैं। अभी हमें जितना याद पड़ता है उसके मुताबिक इंदिरा गांधी ने प्रदर्शन के इस तरीके की आलोचना की थी, और इंदिरा गांधी को गुजरे भी कई दशक हो चुके हैं। तब से अब तक गंगा का पानी और बहुत प्रदूषित हो चुका है, लेकिन लोगों की सोच नहीं बदली है। अभी कुछ महीने पहले ही खबरों में आए एक बड़े विरोध-प्रदर्शन में बड़ी पार्टियों की प्रमुख महिलाएं किसी सरकार को चूडिय़ां भेंट करते दिख रही थीं।

हिन्दुस्तानी समाज में एक तो वैसे भी महिलाओं के साथ सैकड़ों बरस का भेदभाव चले ही आ रहा है। पहले महिलाओं को सती बनाया जाता था, फिर कन्या भ्रूण हत्या लोकप्रिय थी जो कि आज तक दबे-छुबे चली आ रही है, और दहेज-हत्या, बलात्कार, कामकाज की जगह पर यौन शोषण बहुत ही आम बात है। इन सबके साथ-साथ घर में पुरूषों और लडक़ों के खाना खा लेने के बाद ही महिला और लड़कियों की बारी आती है। एक-दो बरस पहले मुंबई के टाईम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट थी कि वहां के टाटा कैंसर हॉस्पिटल में बच्चों में कैंसर की पहचान होने के बाद उन्हें इलाज के लिए वापिस लाए जाने वाले बच्चों में लड़कियां गिनी-चुनी ही रहती हैं, और तमाम लडक़े इलाज के लिए लाए जाते हैं। अब आंकड़ों और तथ्यों पर आधारित एक जिम्मेदार अस्पताल का यह निष्कर्ष एक बड़ा सुबूत है कि हिन्दुस्तान में लडक़ों को बचाने लायक माना जाता है, और लड़कियों को मरने के लिए छोड़ देने के लायक।

इन्हीं तमाम बातों को देखते हुए हिन्दुस्तान के कानून में महिलाओं की यौन शोषण की शिकायतों को गंभीरता से लेने के लिए पहले विशाखा गाईडलाईंस बनाई गईं, और उसे बाद में एक व्यापक कानून की शक्ल दी गई। बलात्कार या यौन शोषण की शिकायतकर्ता महिला की नीयत पर कोई शक न किया जाए यह भी भारत में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर तय की गई एक कानूनी व्यवस्था है। इसके बाद भी महिला आयोग की अध्यक्ष का ऐसा व्यापक और आम बयान महिलाओं की आम विश्वसनीयता और साख को खत्म करता है। और इस तरह से यह बयान महिला आयोग के मकसद को ही शिकस्त देता है। हम बहस के लिए अगर पल भर को यह मान भी लें कि उनकी कही बात सही है, और लड़कियां सहमति से संबंध बनाती हैं, और बाद में शिकायत करती हैं। ऐसा होने पर भी उनका शिकायत का हक खत्म नहीं होता है। संबंध बनाने का यह मतलब नहीं रहता कि बाद में कोई शिकायत ही न हो सके।

इसी राज्य छत्तीसगढ़ में कई सरकारी अफसरों द्वारा मातहत कर्मचारियों के यौन शोषण के चर्चित मामले बरसों से चले आ रहे हैं, और उन पर पिछली सरकार के बाद यह सरकार भी कार्रवाई करने से कतरा रही है। छोटे ओहदों की जिन महिलाओं के शोषण के मामलों पर कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार के दौरान सार्वजनिक रूप से आलोचना करती थी, आज सरकार बनकर कांग्रेस उन पर चुप है, और महिलाओं का यौन शोषण करने वाले लोगों को बढ़ावा भी दे रही है। महिला आयोग को ऐसे मामलों को उठाना चाहिए, और पार्टी-पॉलीटिक्स से परे महिलाओं के व्यापक हित और व्यापक हक के लिए काम करना चाहिए। किरणमयी नायक का खुद होकर दिया हुआ यह बयान बहुत ही निराशाजनक है, और इससे एक तबके के रूप में महिलाओं की साख को उन्होंने बहुत नुकसान पहुंचाया है। ऊंचे ओहदे, ऊंची जिम्मेदारियां भी लेकर आते हैं, और उनके साथ ऊंचे दर्जे की सावधानी भी बरती जानी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 11 दिसंबर 2020


 

गरीब देश की अमीर संसद का हिंसक और अश्लील प्रदर्शन

 भारत के नए संसद भवन का शिलान्यास उस वक्त किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट ने इसके निर्माण पर रोक लगाकर रखी है। खींचतान कर अदालत से सरकार ने इस भूमिपूजन और शिलान्यस की इजाजत ली थी, और आज देश की बदहाली के बीच हजार करोड़ के बजट वाली यह इमारत बनाने पर सरकार आमादा है। मौजूदा संसद भवन एक सदी पुराना भी नहीं है, और इसे छोटा बताया जा रहा है। देश का मीडिया लिख रहा है कि दुनिया के बहुत से देशों में संसद की इमारतें सदियों पुरानी हैं। हालैंड की संसद की इमारत13वीं सदी में बनी है, अमरीका की संसद भवन सन् 1800 में बनी है, और उसे दो सदी से अधिक हो गए हैं। ब्रिटिश संसद की इमारत 1840 और 1870 में बनी है। इटली की संसद की इमारत 16वीं सदी में बनी है। फ्रांस की संसद 1615 से 1645 के बीच बने भवन में लगती है। भारत का संसद भवन 1927 में बनकर तैयार हुआ था, और अब इसे छोटा बताकर एक नया ही भवन बनाया जा रहा है।

अभी जब सुप्रीम कोर्ट ने इस भवन निर्माण पर रोक लगाई हुई है, तो जाहिर है कि शिलान्यास और भूमिपूजन करके निर्माण करने की कोई हड़बड़ी तो थी नहीं। ऐसे में जब किसान इसी दिल्ली के किनारे सडक़ों पर धरना दिए हुए एक पखवाड़े से खुली ठंड में पड़े हैं, वहां कुछ मौतें भी हो गई हैं। आज देश में राजनीतिक बकवासों से परे सिर्फ एक ही मुद्दे पर चर्चा चल रही है, और वह किसानों का मुद्दा है। इस बीच नए संसद भवन को बनाने के लिए समारोहपूर्वक पूजा का मौका कुछ अटपटा है, और ऐसा लगता है कि किसी भी संवेदनशील लोकतंत्र को आज इससे बचना चाहिए था, क्योंकि निर्माण पर तो सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई ही है। अब कहने के लिए यह कहा जा सकता है कि संसद भवन के लिए शिलान्यास का फैसला लोकसभा अध्यक्ष का है जो कि संसद परिसर के मुखिया माने जाते हैं, लेकिन उन्हें अध्यक्ष बनाने वाली भाजपा और उसके प्रधानमंत्री की औपचारिक या अनौपचारिक सहमति के बिना तो ऐसा कोई कार्यक्रम लोकसभा अध्यक्ष ने तय किया नहीं होगा।

भारत का मौजूदा संसद भवन भारी भव्यता वाला है, और यह भी अपने आपमें एक फिजूलखर्ची वाली शाही फितरत की इमारत रही। लेकिन वह वक्त अंग्रेज राज का था जो कि राजसी मिजाज वाला ही था, और जिसने अपने खुद के देश और गुलाम देशों में पश्चिमी वास्तुशिल्पियों से ऐसी ही शाही इमारतें बनवाई थीं। आज अंग्रेजों के वक्त के बनाए गए सडक़ और रेल के पुल तो सौ बरस बाद भी मजबूती के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए संसद भवन की मजबूती को लेकर कोई शक नहीं हो सकता। पिछले कई दशकों में ऐसा भी सुनाई नहीं पड़ा कि संसद भवन का कोई हिस्सा जर्जर होकर गिर गया हो, और वह लोगों के लिए खतरा बन गया हो। इसलिए नए संसद भवन की सोच पहली नजर में हम एक बहुत बड़ी फिजूलखर्ची लगती है। अगर संसद का काम पिछली पौन सदी में बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गया है कि उसके दफ्तर के लिए जगह कम पडऩे लगी हैं, तो दफ्तर की कोई इमारत आसपास की लगी हुई जगह पर बनाकर उससे संसद भवन को जोड़ा जाना चाहिए था, न कि संसद के लिए ही नई इमारत बनाना।

हम लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्रवाई टीवी पर देखते हैं, और सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के संयुक्त सत्रों को भी देखते हैं, इनमें से किसी में भी जगह कम नहीं पड़ती। इससे परे लोगों को बीबीसी टीवी पर ब्रिटिश संसद की कार्रवाई देखनी चाहिए जहां भारतीय लोकसभा की तरह निम्न सदन, हाऊस ऑफ कॉमन्स के दरवाजे पर सांसद खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने का इंतजार करते हैं। वहां संसदीय सीटों की संख्या बढ़ गई लेकिन ब्रिटिश संसद ने अपने सदन में सीटें नहीं बढ़ाईं, इसलिए वहां सारे सदस्य एक साथ नहीं बैठ सकते। कुछ न कुछ सांसद दरवाजे पर खड़े रहते हैं, और सीट खाली होने पर जाकर बैठते हैं। दूसरी तरफ उसी ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था पर बनी हुई भारतीय संसद में तो अभी 6 बरस पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहली बार पांव धरते हुए वहां माथा टिकाया था, और इन 6 बरसों में ही वह संसद भवन नाकाफी लगने लगा!

हजार करोड़ की लागत से यह नया संसद भवन बनाया जा रहा है। लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों की गिनती करें तो प्रति सांसद इस भवन की लागत करीब एक-सवा करोड़ रूपए आएगी। आज जब देश में फटेहाली है, गरीबी और बेरोजगारी है, जब अन्नदाता किसान सडक़ों पर मर रहा है, तब देश की संसद का अपने ऊपर यह निहायत गैरजरूरी और नाजायज है। होना तो यह चाहिए कि सांसद किफायत और सादगी में जीकर अपने विचार-विमर्श, बहस और तर्क-वितर्क बेहतर बनाते, लेकिन वह तो हो नहीं रहा। संसद अप्रासंगिक हो चुकी है, और एक संवैधानिक जरूरत की तरह वहां ध्वनिमत से काम चल रहा है। ऐसी संसद जिसने अपनी बुनियादी भूमिका खो दी है, उस संसद को इतनी फिजूलखर्ची का कौन सा नैतिक हक हो सकता है? और फिर सरकार में खर्च के न्यायोचित रहने का एक सिलसिला होता है। जब कोई भी सरकारी निर्माण अपनी उम्र खो बैठता है, जब वह खतरनाक हो जाता है, तब उसकी जगह नई इमारत बनाई जाती है। आज तो संसद की इमारत का कोई खतरा सुनाई नहीं पड़ा था, और अब जब पूरी दुनिया में कागजों का काम घट रहा है, और वह कम्प्यूटरों पर आ रहा है, तब तो संसद के लिए जगह कम लगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट में नए संसद भवन के खिलाफ यह तर्क भी सामने आया है कि संसद भवन और आसपास की इमारतों का विकल्प तैयार करने के लिए सरकार उस इलाके पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करने जा रही है। अभी भूमिपूजन के मौके पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जारी सूचना में सरकार ने यह कहा है कि नया संसद भवन आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण का एक हिस्सा रहेगा। इसी बयान में बताया गया है कि लोकसभा अपने मौजूदा आकार से तीन गुना बड़ी रहेगी, और राज्यसभा भी पर्याप्त बड़ी रहेगी। यह भी कहा गया है कि सदस्यों के लिए बैठने का और अधिक आरामदेह इंतजाम रहेगा।

अब सवाल यह है कि सांसदों को और कितने आराम की जरूरत है? जब देश में आराम-हराम हो की नौबत है, जब हर हिस्से में तरह-तरह की नकारात्मक बातें हो रही हैं, तो उनकी चर्चा करने के लिए सांसदों को और कितना आराम चाहिए? दिल्ली में जानकार विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर आपत्ति की है कि नया भवन 900 से 1000 लोकसभा सदस्यों का अनुमान लगाकर बनाया जा रहा है जो आज से करीब दोगुने का है। अदालत में यह कहा गया है कि लोकसभा सीटों के पुनर्गठन की अगली बैठक ही 2031 में होनी है, और उसमें आज की 543 सीटों को बढ़ाने पर विचार होगा। उस पुनर्गठन आयोग से परे सीटें बढ़ाने का फैसला और कोई नहीं ले सकते। ऐसे में आज सरकार एक अनुमान लगाकर लोकसभा के आकार को तीन गुना और सीटों को करीब दो गुना करने जा रही है जो कि बेवक्त की बात है।

हमारा बहुत साफ मानना है कि हिन्दुस्तान के सारे राष्ट्रीय आर्थिक आंकड़ों से परे हकीकत यह है कि यह एक बहुत गरीब देश है। इसमें एक फीसदी ऐसे रईस हैं जिनके पास देश की 58 फीसदी दौलत है। उनसे परे भी गरीबों और मध्यमवर्गीयों के बीच बहुत बड़ा फासला है। इसलिए इस देश को किफायत की जरूरत है न कि ऐसी आत्मनिर्भरता की जिसका इस्तेमाल अगले सौ-दो सौ बरस भी शायद न हो सके। जब देश की जनता पूरी जिंदगी रेलगाडिय़ों में फर्श पर बैठकर या पखाने में घुसकर सफर करने को मजबूर है, तब लोकसभा में जरूरत पडऩे पर मौजूदा भवन की ही क्षमता कुछ बढ़ाई जा सकती है। गरीब देश की अमीर संसद का यह प्रदर्शन हिंसक और अश्लील है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 10 दिसंबर 2020


 

एसटी-एससी क्रीमीलेयर, बेइंसाफी का इंतजाम

 सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या देश के आरक्षित तबकों में, खासकर अनुसूचित जाति, और अनुसूचित जनजाति में किसी तरह की क्रीमीलेयर लागू करनी चाहिए ताकि उन समुदायों के बीच आरक्षण के फायदे उन लोगों तक भी पहुंच सकें जो कि समान अवसरों को पाने की तैयारी में बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं। इनमें से पिछड़ी जातियों के लोगों के लिए तो क्रीमीलेयर लागू है ताकि उनमें सबसे संपन्न लोग, उन्हीं के बच्चे ओबीसी आरक्षण के फायदों के अकेले हकदार न रह जाएं, और उन समुदायों के कमजोर तबकों के लोगों को इस आरक्षण का अधिक फायदा मिले। दूसरी तरफ जब एसटी-एससी तबकों के लिए आरक्षण की बात आती है, तो इन्हीं तबकों के हिमायती नेता एक बवाल खड़ा करते हैं कि दलितों और आदिवासियों में सामाजिक परिस्थितियां इतनी अलग हैं कि एक पीढ़ी को आरक्षण का फायदा देकर उसके बाद उसे फायदे से बाहर कर देने से वह सामाजिक बराबरी की नौबत में नहीं पहुंच जाती। एक प्रमुख दलित-आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता का यह मानना है कि आरक्षण का यह फायदा कम से कम तीन पीढ़ी तक जारी रहना चाहिए तब कोई दलित-आदिवासी परिवार सदियों के सामाजिक अन्याय से बाहर आ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाया है उसके 10-20 बरस पहले से मैं दलित-आदिवासी तबकों के भीतर से क्रीमीलेयर को पढ़ाई और नौकरी के आरक्षण से बाहर करने की वकालत करते आया हूं। इसके पीछे सरल और सहज तर्क यह है कि इन दोनों किस्म के आरक्षणों में इन तबकों के एक फीसदी लोगों को भी मिलने जितने मौके नहीं रहते हैं। अगर किसी दलित के लिए एक सीट है, तो शायद कई सौ या कई हजार दलित उम्मीदवार उसके लिए रहते हैं। ऐसे में एक परिवार जिसे एक बार नौकरी का फायदा मिल चुका है, जो एक दर्जे से ऊपर के सार्वजनिक, सरकारी, अदालती, या किसी और किस्म के जनसेवक के ओहदे पर पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों को आरक्षण के फायदे से बाहर करना चाहिए। वे ऐसी हालत में पहुंच चुके रहते हैं कि वे अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई और नौकरी के मुकाबलों के लिए बेहतर तैयार कर सकते हैं। अब अगर हम यहां पर तीन पीढ़ी के तर्क को लागू करें, तो क्रीमीलेयर में पहुंच चुके और ताकतवर हो चुके दलित या आदिवासी की अगली दो पीढिय़ां भी आरक्षण का फायदा पाने की हकदार रहेंगी। हकदार रहने के साथ-साथ वे ताकतवर भी होती जाएंगी ताकि वे अपनी बिरादरी के बाकी लोगों के साथ होने वाले मुकाबले में बेहतर तैयार रहें, अधिक मजबूत रहें। करोड़पति हो चुके एक दलित या आदिवासी के बच्चों को आगे भी ऐसे मौके देना उनके साथ तो इंसाफ हो सकता है, लेकिन यह उन्हीं आरक्षित तबकों के तीन चौथाई, या उससे भी अधिक 90 फीसदी कमजोर लोगों के साथ बेइंसाफी ही रहेगी जो कि समान मौकों के मुकाबले के लिए तैयार ही नहीं हो पाते हैं। इस तरह आज आरक्षित तबकों के भीतर संपन्न, ताकतवर, और बेहतर शिक्षित लोगों का एक ऐसा आभिजात्य वर्ग तैयार हो गया है जो कि एक फौलादी मलाई की शक्ल में मौकों और तबके के लोगों के बीच जमकर बिछ गया है। इस फौलादी मलाई को चीरकर नीचे के कमजोर और विपन्न लोग, पहली पीढ़ी के शिक्षित लोग, किसी भी मुकाबले में बराबरी की तैयारी नहीं कर पाते।

जो लोग यह सोचते हैं कि तीन पीढ़ी तक आरक्षण का फायदा मिले बिना किसी परिवार का सामाजिक पिछड़ेपन से, सामाजिक शोषण से उबर पाना मुमकिन नहीं है, वे लोग महज क्रीमीलेयर के लिए फिक्रमंद शहरी, शिक्षित, संपन्न, और ताकतवर लोगों के हिमायती लोग हैं। आरक्षण की पूरी सोच जिस सामाजिक और आर्थिक शोषण से तबकों को उबारने के लिए है, उन तबकों के भीतर ही लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी पिछड़ते चले जाएं, यह सामाजिक न्याय नहीं होगा, यह आर्थिक न्याय नहीं होगा, यह किसी भी किस्म का न्याय होगा।

दिक्कत वहां खड़ी होती है जहां आरक्षित तबकों के बाहर के लोग (जिनमें यह लेखक भी शामिल है) इस बात को उठाते हैं, उस वक्त गैरगंभीर बहस में तो कुछ लोग इसे ऐसा भावनात्मक नारा भी बनाने की कोशिश करते हैं कि मानो आरक्षण को खत्म करने की कोई बात हो रही है। इसलिए इस बहस के बीच भी इस बात का खुलासा जरूरी है कि यह तमाम तर्क आरक्षण को किसी भी तरह से घटाने की बात नहीं कर रहा है, यह महज आरक्षित तबकों के भीतर एक अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत बंटवारे की बात कर रहा है।

आज दिक्कत यह है कि जब कभी संसद में दलित-आदिवासी तबकों में से क्रीमीलेयर को आरक्षण के फायदों से बाहर करने की बात होगी, संसद में कानून बनाने वाले सांसदों के अपने बच्चे ऐसे किसी प्रतिबंध से फायदे से बाहर हो जाएंगे। जिन अफसरों को सरकार में बैठकर प्रस्ताव तैयार करने होते हैं, उनके बच्चे भी क्रीमीलेयर में गिनाकर फायदे से बाहर हो जाएंगे। इसलिए दलित-आदिवासी तबकों की क्रीमीलेयर के वर्गहित में यह नहीं है कि उस क्रीमीलेयर पर किसी तरह की रोक लगे, उसे आरक्षण के फायदों से किसी तरह बाहर किया जाए। यह सीधे-सीधे हितों के टकराव का एक मामला है जिसमें क्रीमीलेयर यह तर्क देने लगती है कि आरक्षण का फायदा कम से कम तीन पीढ़ी जारी रहना चाहिए।

जिस सामाजिक-आर्थिक अन्याय के खिलाफ आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी, उसी अन्याय को अब आरक्षित तबकों के भीतर बढ़ावा दिया जा रहा है, और समाज के नेता बने हुए लोग, समाज के ताकतवर लोग यह काम कर रहे हैं। अन्याय के शिकार आरक्षित तबकों के तीन चौथाई लोग तो कभी भी ऐसी फौलादी क्रीमीलेयर में छेद करके अवसरों के आसमान तक नहीं पहुंच पाएंगे, वे महज सतह के नीचे रह जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट में भी आज जो बहस चल रही है, वह इन आरक्षित तबकों के भीतर के कमजोर वर्गों के बारे में बात कर रही है। लेकिन हम जातियों के आधार पर आरक्षित तबकों के भीतर बंटवारा करने के बजाय आर्थिक और ताकतवर ओहदों के आधार पर अवसरों के बंटवारे की वकालत बेहतर समझते हैं। जाति के आधार पर आरक्षण तो हो चुका है, अब ओबीसी की तरह जाति के भीतर अधिक पिछड़ी जाति जैसी बात दलित और आदिवासी तबकों पर अगर लागू की जाती है, तो वह एक बहुत जटिल चुनौती रहेगी। शायद आरक्षित तबकों के भीतर यह तरीका अकेला मुमकिन और कारगर तरीका रहेगा कि संपन्नता और सरकारी-सार्वजनिक ओहदों को क्रीमीलेयर का पैमाना बनाया जाए, आरक्षण पाई हुई एक पीढ़ी अगर ऐसे ओहदों तक पहुंच गई है, ऐसी संपन्नता तक पहुंच गई है कि वह अपने बच्चों को बेहतर तैयार करने की हालत में हैं, तो उसे नौकरी और पढ़ाई के आरक्षण से बाहर करना चाहिए। तभी एक सामाजिक न्याय की बात हो सकेगी। और अगर, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है, आरक्षित जातियों के भीतर अधिक पिछड़ी और अधिक कमजोर जातियों के आधार पर इन तबकों के आरक्षण-ढांचे में फेरबदल किया जाता है, तो उस फेरबदल के साथ भी क्रीमीलेयर की शर्त जोड़ी जानी चाहिए। हम गिने-चुने परिवारों को बार-बार आरक्षण का फायदा देकर आरक्षित जातियों के भीतर एक अनारक्षित जैसी ताकत के हिमायती नहीं हैं। 

(Daily Chhattisgarh)