मद्रास हाईकोर्ट से सबक लेकर बाकी राज्यों के सिपाहियों को भी बचाएं

  16 अगस्त 2022

मद्रास हाईकोर्ट ने चार दिन पहले राज्य के बड़े पुलिस अफसरों के घरों पर तैनात किए गए पुलिस के निचले दर्जे के कर्मचारियों को गुलामीप्रथा करार देते हुए फटकार लगाई है। अदालत इसके खिलाफ पहले भी कड़ा आदेश कर चुकी है, लेकिन इसका कोई असर सरकार और अफसरों पर नहीं हुआ। सरकारी वकील ने कहा कि अदालत के पिछले आदेश के बाद 19 पुलिस कर्मचारियों को अर्दली ड्यूटी से मुक्त किया गया है, लेकिन जज ने कहा कि इसके बाद भी बड़ी संख्या में छोटे स्तर के पुलिस कर्मचारी बड़े अफसरों के बंगलों पर तैनात हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा करके ये बड़े पुलिस अफसर पुलिस फोर्स में अनुशासन लागू करने का अपना नैतिक अधिकार खो देते हैं। अदालत ने इसे इस देश के संविधान और लोकतंत्र पर तमाचा कहा है, और यह भी कहा कि यह अंग्रेजों के वक्त की गुलामीप्रथा की जारी परंपरा है।

तमिलनाडु में अदालत पहुंचे इस मामले से परे देश के अधिकतर राज्यों में पुलिस के निचले कर्मचारियों का यही हाल है। बड़े पुलिस अफसरों के बंगलों पर अविश्वसनीय संख्या में सिपाही तैनात कर दिए जाते हैं। वे घरेलू कामकाज करते हैं, कुत्तों और बच्चों को साफ करते हैं, उन्हें घुमाते हैं, बंगला बड़ा हो तो डेयरी और सब्जी-भाजी का बगीचा भी देखते हैं। एक प्रदेश की राजधानी में बैठे हुए जानकार लोग बतलाते हैं कि अफसर की अपनी मोटी तनख्वाह से कई गुना अधिक तनख्वाह कर्मचारियों की उन बंगलों पर खर्च होती है जो अपने आपमें अंग्रेजी राज का प्रतीक हैं। सरकार को बंगलों और नौकर-चाकर का यह इंतजाम खत्म करना चाहिए, और इसके लिए एक भत्ता अफसरों को देना चाहिए, या मकान भत्ता तो उन्हें मिलता ही है। यह बात सिर्फ आईपीएस अफसरों के साथ नहीं है, जंगल विभाग के आईएफएस अफसरों के पास रोजी पर मजदूर रखने के अनगिनत काम रहते हैं। ऐसे में अफसरों के बंगलों पर बहुत से रोजी वाले लोग तैनात रहते हैं जिनका सरकारी भुगतान होता है। आईएएस अफस चूंकि इन दोनों से ऊपर माने जाते हैं, इसलिए उनके बंगलों पर हर तरफ से कर्मचारी बुलाए जाते हैं, और भेजे जाते हैं।

यह बात सरकार के फिजूलखर्च से अधिक खतरनाक है। जिन लोगों को पुलिस की ड्यूटी के लिए नौकरी पर रखा जाता है, जिन्हें पुलिस के काम की ट्रेनिंग दी जाती है, उनसे घरेलू काम लेकर उनका मनोबल तोड़ दिया जाता है। कुछ बरस किसी बंगले पर गुलामी करने के बाद ये सिपाही किसी चुनौतीपूर्ण या खतरनाक मोर्चे के लायक रह भी नहीं जाते। रसोई में काम करते हुए, ट्रे थामे हुए, चाय-पानी परोसते हुए, जानवर नहलाते हुए, बच्चों का पखाना धोते हुए किस इंसान का मनोबल मुजरिमों को पकडऩे, आतंकियों से लडऩे, अराजक लोगों को रोकने के लायक रह जाएगा? यह बात पूरी तरह से अमानवीय भी है कि नियम-कायदों के खिलाफ, सरकारी सेवा शर्तों के खिलाफ मातहत लोगों को उनकी ड्यूटी से हटाकर इस तरह गुलाम बनाकर रखा जाए। हम पहले भी इसी जगह इस बात की वकालत कर चुके हैं कि ऐसे गुलाम-कर्मचारियों को अपने ऐसे मालिकों के खिलाफ बगावत करनी चाहिए, उन्हें गुलामी के वीडियो बनाकर शिकायत करनी चाहिए, उन्हें चारों तरफ फैलाना चाहिए। इससे कुछ लोगों की नौकरी पर खतरा आ सकता है, लेकिन वर्दीधारी कर्मचारियों के ऐसे अपमानजनक इस्तेमाल के सिलसिले को खत्म करने के लिए कुछ लोगों को तो ऐसा खतरा उठाना ही होगा। यह एक अकेली वजह हमें पुलिस कर्मचारियों की यूनियन बनाने के लिए काफी लगती है। कुछ प्रदेशों में ऐसी यूनियन है, और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में सरकारों ने बड़ी कोशिश करके पुलिस कर्मचारियों के परिवारों को भी संगठित होने से रोका है। उन्हें रोक तो दिया गया है, लेकिन उनकी कोई मांग पूरी नहीं हुई है।

तमिलनाडु के मद्रास हाईकोर्ट के इस मामले की मिसाल देते हुए, उससे सबक लेते हुए बाकी प्रदेशों में भी सरकारी कर्मचारियों को अर्दलियों की तरह अफसरों और नेताओं के बंगलों पर इस्तेमाल करने के खिलाफ कानूनी पहल करनी चाहिए। यह बात छोटे सरकारी कर्मचारियों के मानवीय अधिकारों के खिलाफ भी है, और पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और गैरकानूनी तो है ही। एक-एक बड़े अफसर और सत्तारूढ़ नेता पर लाखों रूपये महीने की तनख्वाह छोटे कर्मचारियों की भी लगती है, और यह पूरी तरह से अघोषित खर्च है जो कि गरीब जनता के ही सिर पर आता है। सरकारों को बड़े-बड़े सरकारी बंगलों का इंतजाम पूरी तरह से खत्म करना चाहिए। एक-एक परिवार के लिए बड़े-बड़े बंगले, और जनता पर उनका खर्च, पूरी तरह नाजायज है। अफसरों को अपनी तनख्वाह के अलावा जिस मकान भत्ते की पात्रता रहती है, उस भत्ते पर जो मकान उन्हें मिलेगा, उसमें कर्मचारियों की फौज की जरूरत भी नहीं रहेगी।

पुलिस कर्मचारी चूंकि वर्दीधारी हैं, और उनके संघ को छूट नहीं है, इसलिए किसी न किसी को यह बात उठानी होगी। कोई जनसंगठन भी इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग जा सकते हैं, या अदालत में जनहित याचिका लगा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 16 अगस्त 2022


आजादी के अमृत महोत्सव का अमृत किसे, और विष किसे?

  14 अगस्त 2022

आज जब पूरा हिन्दुस्तान तिरंगे झंडे को लहराते हुए घूम रहा है, और कल आजादी की 75वीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा है, उस वक्त राजस्थान के जालौर में इंटरनेट बंद किया गया है। आमतौर पर साम्प्रदायिक घटनाओं को लेकर देश में जगह-जगह ऐसी नौबत आती है, लेकिन जालौर में तो हिन्दुओं के बीच ही ऐसी नौबत आई है। वहां के एक निजी स्कूल में 9 बरस के एक दलित बच्चे ने मास्टर छैलसिंह की अलग रखी हुई मटकी से पानी पी लिया, तो मास्टर ने उसे मार-मारकर जख्मी कर दिया, और तीन हफ्ते बाद इन्हीं जख्मों की वजह से अस्पताल में उसकी मौत हो गई। मास्टर की मार से इस दलित बच्चे के चेहरे और कान बुरी तरह जख्मी हुए थे, और इन जख्मों से वह उबर ही नहीं पाया। अब वहां के तनाव को देखते हुए राज्य सरकार ने वहां इंटरनेट बंद किया है।

आजादी की 75वीं सालगिरह के मौके पर आजादी का अमृत महोत्सव मना रही भारत सरकार के जलसे के बीच यह एक बुरी खबर है जो कि हिन्दुस्तान में उस दलित तबके की हकीकत बताती है जो कि आज देश पर राज कर रही सोच के पांवों तले जी रहा तबका है। आज इस देश में हाईकोर्ट की एक जज उस मनुस्मृति को महिमामंडित कर रही है जिसमें दलितों के खिलाफ तमाम किस्म की हिंसक बातें लिखी गई हैं, जहां महिलाओं को तिरस्कार के लायक पाया गया है। जिस हिन्दू सोच के मुताबिक दलित के कानों में ज्ञान का एक शब्द पड़ जाने पर उसमें पिघला हुआ सीसा भर देने की व्यवस्था है, उस सोच के तहत इस मास्टर ने तो दलित बच्चे को महज पीटा ही था, और यह तो उसके दलित बदन का कुसूर था कि वह मास्टर की मार को बर्दाश्त नहीं कर पाया, और चल बसा।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, और उत्तर भारत के कुछ दूसरे हिस्से दलितों के साथ ऐसे जुल्म करने की परंपरा की गिरफ्त में हैं। हिन्दुस्तान के जिन लोगों को यह लगता है कि अब जाति व्यवस्था खत्म हो चली है, और अब आरक्षण की जरूरत नहीं है, उन लोगों को सीमेंट और डामर की सडक़ों से कुछ नीचे उतरकर देखना चाहिए कि जमीनी हकीकत क्या है। मध्यप्रदेश के कई इलाकों में दलित चप्पल पहनकर सवर्णों की बस्ती से नहीं गुजर सकते, और जो लोग भारत के गांवों के परंपरागत ढांचों के जानकार हैं, उनका कहना है कि आम गांवों में ऊंचे इलाकों में सवर्ण बसते हैं, और वहां से नालियों का पानी जिस तरफ बहता है, वहां ढलान की तरफ दलित बसते हैं, ताकि दलितों की नालियों का पानी कभी भी सवर्ण बस्तियों की तरफ न आ सके। हर बरस दर्जनों ऐसी खबरें आती हैं कि दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढक़र बारात में निकलने के लिए पुलिस की हिफाजत मांगनी पड़ी, और पुलिस की मौजूदगी में भी उन पर हमले हुए। कहीं दलितों को मूंछ रख लेने पर मारा जाता है, तो कहीं संगीत जोर से बजाने पर। देश को आजाद हुए पौन सदी हो गई है, लेकिन दलितों के लिए सवर्ण नफरत में कोई कमी नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की धारदार वक्ता महुआ मोइत्रा ने कुछ दिन पहले ही यह कहा था कि हिन्दुस्तान में जब तक मुस्लिम हैं, तभी तक हिन्दू हिन्दू हैं। जब मुस्लिम खत्म हो जाएंगे तो हिन्दू नहीं रह जाएंगे, उनकी जगह ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अछूत बच जाएंगे। यह बात सौ फीसदी सही है। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि जो दलित जाति व्यवस्था में पैरों से पैदा हुए माने जाते हैं, और अछूत समझे जाते हैं, जिन्हें इंसानी हकों का दावा करते ही मार दिया जाता है, वे दलित भी उन्हीं सवर्ण हिन्दुओं के देवी-देवताओं की पूजा करने के लिए मरे पड़े रहते हैं, जिन देवी-देवताओं ने इन दलितों को कभी नहीं बचाया। हिन्दू धर्म की व्यवस्था में मंदिर प्रवेश, और ईश्वर की उपासना का अधिकार मांगने का मतलब ही ब्राम्हणवादी सवर्ण व्यवस्था को मजबूत करना है। इन दलितों को हिन्दू समाज के ऐसे जातिवादी ढांचे से बाहर निकलकर अपना खुद का ईश्वर ढूंढने या बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन सदियों की गुलाम मानसिकता उन्हें मंदिर प्रवेश का एक ऐसा अधिकारों का सपना दिखाती है जिसे हासिल करना उन्हें बहुत बड़ी बात लगती है। जिस दिन दलित समुदाय एकमुश्त हिन्दू समाज के ढांचे के बाहर निकल आएंगे, बचे हुए गैरदलित हिन्दुओं की अकल ठिकाने आ जाएगी। सवर्ण हिन्दुओं का यह दंभ, और उनकी यह हिंसा, तभी तक कायम हैं, जब तक दलित 21वीं सदी में भी गुलाम मानसिकता के शिकार बने हुए हैं, और मंदिर-प्रवेश को एक अधिकार का दावा मानकर चल रहे हैं।

ऐसी व्यवस्था को धिक्कारकर, लानत भेजकर दलितों को हिन्दू व्यवस्था को ही खारिज करना चाहिए जिसने कि उन्हें शोषण का सामान बनाकर रखा है। यह तो इस देश में दलितों और आदिवासियों के साथ जुल्म और ज्यादती करने पर एक अलग कानून का इंतजाम है, उसके बाद भी सवर्ण तबका धड़ल्ले से हिंसा करते रहता है, क्योंकि उसे भारत की जांच और न्याय व्यवस्था पर अपनी बिरादरी के कब्जे पर अतिआत्मविश्वास है। यह सिलसिला खत्म करना चाहिए, और राजस्थान, मध्यप्रदेश सरीखे राज्यों में कानून के कड़ाई से इस्तेमाल से हालात सुधारने चाहिए। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, और तैनात अफसरों में अगर दलितों की बराबरी का सम्मान नहीं है, तो उन्हें चुनावों से दूर करना चाहिए, और उनकी नौकरी खत्म करनी चाहिए। यह इस देश के लिए आजादी की सालगिरह के इस मौके पर शर्म से डूब मरने की एक बात है कि एक दलित बच्चे को इसलिए मार डाला गया कि उसने गैरदलित का पानी छू लिया था। जहां तक इस सालगिरह को आजादी का अमृत महोत्सव करार देने की भाषा का सवाल है, तो यह भाषा अपने आपमें उसी हिन्दू धर्म से निकली हुई है जिसमें समुद्र मंथन से निकले अमृत पर देवताओं का हक तय किया गया था। यह भाषा आज भी इस देश में उसी धर्म व्यवस्था को मजबूत करती है, और किसी के लिए अमृत और किसी के लिए विष की सोच आगे बढ़ाती है।

(Daily Chhattisgarh)

रुश्दी पर हमला, दुनिया के लिए कई सवाल खड़े

 13 अगस्त 2022
  

भारत में जन्मे और पश्चिम में बसे विख्यात लेखक सलमान रुश्दी पर कल अमरीका के न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के मंच पर एक नौजवान ने जाकर चाकू से हमला किया, और बुरी तरह जख्मी कर दिया। रुश्दी लंबे समय से मुस्लिम या इस्लामी आतंकियों के निशाने पर थे। उनकी एक किताब ‘सैटेनिक वर्सेज’ पर 1988 में ईरान ने उनकी मौत का फतवा जारी किया था, जो कि ईरान के सत्तारूढ़ धार्मिक मुखिया की तरफ से सार्वजनिक रूप से दिया गया था। इस किताब को मोहम्मद पैगंबर का अपमान करार दिया गया था, और रुश्दी के कत्ल पर दसियों लाख डॉलर का ईनाम भी रखा गया था। एक विश्लेषण यह कहता है कि ईरान और इराक के बीच आठ साल चली लड़ाई खत्म हुई ही थी, और ईरान के हर घर में किसी न किसी शहीद की तस्वीर टंगी थी, देश का बुरा हाल था, सिर्फ कब्रिस्तान पनपे हुए थे, ऐसे में वहां के धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी को रुश्दी की शक्ल में एक दुश्मन खड़ा करके लोगों के दुख-दर्द को भुलवाने का एक जरिया सूझा था, और उन्होंने ईरानियों को इस धार्मिक कट्टरता के उन्माद में झोंक दिया था। इसका एक असर यह भी हुआ था कि बात की बात में दुनिया के दर्जनों देशों में मुस्लिमों के बीच बिना इस किताब को पढ़े हुए उसका लेखक ईशनिंदक साबित हो गया था, और उसके कत्ल की मांग करते हुए चारों तरफ जुलूस निकलने लगे थे। दशकों से रुश्दी कुछ हमदर्द देशों की हिफाजत के घेरे में जी रहे थे, लेकिन धार्मिक उन्माद और नफरत को जानने वाले यह भी जानते थे कि यह दिन एक न एक दिन आना ही था। इस हमले के बाद रुश्दी अस्पताल में वेंटिलेटर पर हैं, धर्मान्ध लोग खुशियां मना रहे हैं, और समझदार लोग इस बात की फिक्र कर रहे हैं कि एक धर्म के हत्यारों की कामयाबी से दूसरे धर्म के कट्टर लोगों को भी हत्यारा बनने का हौसला मिलता है।

यह हमला एक इंसान या एक लेखक पर नहीं है, यह सोच की आजादी पर हमला है। एक लेखक अपने काल्पनिक लेखन में कुछ किरदार गढ़ता है और उन्हें अपनी आस्था का अपमान मानते हुए कुछ कट्टर और धर्मान्ध लोग उसके कत्ल का फतवा जारी कर देते हैं। यह तो रुश्दी पश्चिमी देशों की सरकारी हिफाजत में जी रहे थे, वरना यह हमला कब का हो चुका रहता। लोगों को याद रखना चाहिए कि फ्रांस की एक व्यंग्य पत्रिका में मोहम्मद पैगंबर पर बनाए गए कार्टूनों का विरोध इस कदर हिंसक हुआ था कि पेरिस में हथियारबंद लोगों ने इसके दफ्तर पर हमला करके दर्जन भर लोगों को मार डाला था, और दर्जन भर दूसरे लोग घायल कर दिए गए थे। इन कार्टूनों के खिलाफ योरप के दूसरे देशों में भी जगह-जगह तरह-तरह के हमले हुए थे, और इसने योरप में बसे हुए मुस्लिमों, और वहां पहुंचने वाले मुस्लिम शरणार्थियों की जिंदगी का सबसे बड़ा नुकसान किया था। यह बात समझने की जरूरत है कि किसी धर्म के नाम पर जो हमला होता है, वह बहुत बार तो सबसे बड़ा नुकसान उसी धर्म को मानने वाले लोगों को करता है। आज जो लोग इस्लाम को मानते हुए भी अलग-अलग देशों में वहां के कानून को भी मानते हुए अमन-चैन से जी रहे हैं, उनके खिलाफ भी इसी तरह की दहशत आज चारों तरफ फैलेगी, और दूसरे धर्मों के कुछ कट्टर लोग हो सकता है कि मुस्लिमों पर हिंसक या आर्थिक किसी तरह के हमले भी करें।

यह बात सिर्फ ईरान की नहीं है, बल्कि उन तमाम देशों की है जहां पर किसी एक धर्म, या कई धर्मों के लोग अपनी आस्था को देश और दुनिया के कानून से ऊपर मानकर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। आज अगर इस्लामिक आतंक को देखा जाए, तो उसके सबसे अधिक शिकार दुनिया के मुस्लिम ही हैं। आज जिस सलमान रुश्दी को लेकर यह बात हो रही है वह मुम्बई में एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार में ही पैदा हुए थे, और मुम्बई की एक ईसाई स्कूल में पढ़े थे। वे कुछ अरसा पाकिस्तान में भी अपने परिवार के साथ रहे थे, और  अब वे इस्लामी आतंकियों के निशाने पर हैं। पिछले दशकों में रुश्दी दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक प्रतीक की तरह भी बन गए थे, और उन्होंने अपने विचारों को नहीं छोड़ा था। अभी से कुछ घंटे पहले हुआ यह हमला दुनिया में हर किस्म की कट्टर ताकतों को मजबूती देगा, और कई दूसरे आतंकी गिरोह और धर्मान्ध लोग इस बात को लेकर हीनभावना के शिकार हो जाएंगे कि वे इस काम को नहीं कर पाए।

हिन्दुस्तान जैसे लोकतंत्र के लिए ऐसी कट्टरता एक बहुत बड़ा खतरा इसलिए है कि यहां बीते दशकों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर अलग-अलग लोगों के खिलाफ जुबान काट देने और सिर काटकर लाने के फतवे दिए गए, ऐसी हिंसा पर ईनाम रखा गया। हिन्दुस्तान के सभी तरह के धार्मिक आतंकियों को रुश्दी पर हमले से एक प्रेरणा मिलेगी, और मुस्लिमों के खिलाफ कट्टरता की जो बात कही जाती है, उसे एक मजबूती मिलेगी। यह सिलसिला किसी एक व्यक्ति या किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, यह संक्रामक रोग की तरह है, और समाज के बीच धार्मिक कट्टरता, और साम्प्रदायिकता को बढ़ाते चलने वाला है। हिन्दुस्तान उन देशों में से था जिसने दुनिया के इस्लामिक और मुस्लिम देशों से भी पहले रुश्दी की इस किताब पर रोक लगा दी थी, और वह आज भी जारी है। भारत की बड़ी मुस्लिम आबादी को देखते हुए राजीव गांधी की सरकार ने यह रोक लगाई थी, और उसने बहुत से लोगों को हैरान भी किया था कि ऐसी तेज रफ्तार प्रतिक्रिया तो किसी इस्लामिक देश की भी नहीं थी। इतिहास बताता है कि भारत पहला देश था जिसने इस उपन्यास को बैन कर दिया था, इसके बाद फिर पाकिस्तान और दूसरे इस्लामी देशों ने रोक लगाई।

यह मौका इस बात को भी समझने का है कि क्या किसी सरकार को इस रफ्तार से रोक लगानी चाहिए, या अपने देश के लोगों को उदारता की बात भी समझानी चाहिए। जब सरकार ही तेजी से धर्मान्धता को मान्यता देती है, तो फिर समाज के भीतर किसी उदारता की अधिक गुंजाइश बचती नहीं है। इस हमले के बाद लोगों में बड़े पैमाने पर चर्चा शुरू हो चुकी है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नए सिरे से दुबारा बात बढऩी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 अगस्त 2022


(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

कोई अच्छी बात भी लोकतंत्र में जबरिया कैसे लादी जा सकती है?

12 अगस्त 2022
  

आजादी की 75वीं सालगिरह पर भारत सरकार ने हर घर तिरंगा नाम का एक अभियान शुरू किया है, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी अपने स्तर पर भी अधिक से अधिक घरों में तिरंगा पहुंचाने की घोषणा के साथ कुछ कोशिश कर रही है। रेलवे के करोड़ों कर्मचारियों को बाजार भाव से काफी अधिक दाम पर अनिवार्य रूप से तिरंगा झंडा खरीदने के लिए कहा जा रहा है, जिसे लेकर विरोध भी हो रहा है, और लोग यह हिसाब भी पोस्ट कर रहे हैं कि ठेकेदार को इससे कितने करोड़ की कमाई होने जा रही है। पिछले कुछ दिनों से हरियाणा की राशन दुकानों के ऐसे वीडियो पोस्ट हो रहे हैं जहां पर राशन दुकानदार ही यह बता रहा है कि उसे ऊपर से हुक्म मिला है कि जो लोग बीस रूपये का झंडा खरीदें, उन्हें ही राशन देना है। अब सीमित आय वाले जो लोग राशन कार्ड लेकर गिने-चुने नोट लेकर राशन दुकान पहुंच रहे हैं, वहां उन्हें पता लग रहा है कि पहले बीस रूपये तो झंडे के देने होंगे। इसके अलावा पोस्ट ऑफिस से भी झंडा बेचा जा रहा है जिसके बारे में सोशल मीडिया पर यह पढऩे मिला कि वह गलत तरह से छपा हुआ झंडा है जिसमें अशोक चक्र एक तरफ खिसका हुआ है, और यह पढक़र जब इस अखबार ने पोस्ट ऑफिस से झंडा खरीदकर मंगवाया तो अशोक चक्र बीच के बजाय एक तरफ बहुत बुरी तरह खिसका हुआ छपा था। झंडे को लेकर ही यह विवाद भी हुआ कि सरकार ने झंडा कानून बदलकर अब सिंथेटिक कपड़ों के तिरंगे झंडे को भी छूट दे दी है, जबकि खादी के कपड़ों से बनने वाले परंपरागत झंडे कपास उगाने वाले किसानों से लेकर बुनकरों तक को रोजगार देते थे, वह पूरा काम अब खत्म सा हो गया।
 
लेकिन बात अगर महज झंडे तक सीमित रहती, तो भी ठीक था। झंडों के साथ जिस तरह राष्ट्रवाद का उन्माद फैलाया जा रहा है, और एक सकारात्मक राष्ट्रवाद से परे जाकर जिस तरह बिना झंडे वाले लोगों को देशद्रोही और गद्दार करार देने की पहल शुरू हो रही है, वह भयानक है। इस देश में अब देशप्रेमी होना काफी नहीं है, एक खास विचारधारा को देशप्रेम के जो प्रतीक पसंद हैं, उन प्रतीकों को अनिवार्य रूप से मानना, दिखाना, और प्रदर्शित करना भी जरूरी है। उत्तराखंड के भाजपा प्रदेशाध्यक्ष महेश भट्ट ने एक आमसभा में कहा कि जो लोग तिरंगा अभियान के दौरान अपने घरों में राष्ट्रीय ध्वज नहीं लगाते, उनकी देशभक्ति पर सवाल खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा जिनके घर में तिरंगा नहीं लगेगा, हम उन्हें विश्वास की नजर से कभी नहीं देख पाएंगे। उन्होंने कहा मुझे उस घर का फोटो चाहिए जिस घर में तिरंगा न लगा हो।

पिछले बरसों में हिन्दुस्तान ने ऐसे बहुत से प्रतीकों का प्रदर्शन देखा है जिन्हें मोदी की स्तुति के रूप में देखना तो ठीक था, लेकिन जो उस प्रदर्शन में शामिल नहीं थे, उन्हें देश का गद्दार करार देना लोकतंत्र के मुताबिक तो बहुत बड़ी ज्यादती थी। हर किसी के देशप्रेम के तौर-तरीके अलग-अलग होते हैं। हर धर्म और संस्कृति, इलाके और जुबान में देशप्रेम के नारे अलग हो सकते हैं, मातृभूमि की परिभाषा अलग-अलग हो सकती है, देशप्रेम के गाने अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन पिछले बरसों में इस देश ने जिस तरह-हिन्दुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा, या, हिन्दुस्तान में रहना है तो जयश्रीराम कहना होगा जैसे नारे लगाए गए, जो कि किसी के सम्मान में कम थे, धमकी अधिक थे। ऐसे में अलग धर्म और अलग संस्कृति वाले लोगों को तेजी से देशद्रोही करार देकर पाकिस्तान भेजने की बात भी कुछ बरस चली थी, फिर ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने फतवों के आधार पर वीजा देना बंद कर दिया, और सारे ‘देशद्रोही’ लोग इसी देश पर बोझ बने हुए यहीं कायम हैं।

राष्ट्रीयता और देशप्रेम को कुछ खास प्रतीकों से अनिवार्य रूप से जोडक़र उन्हें हर किसी पर लादकर इस तरह का उन्माद खड़ा करना किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। एक तबके को ऐसे उन्माद में मजा आ सकता है, लेकिन इसके तौर-तरीकों से असहमत दूसरे कहीं अधिक बड़े देशप्रेमी लोगों को यह सजा भी लग सकती है कि उस पर कोई बात थोपी जा रही है। लोकतंत्र ऐसे प्रतीकों का नाम नहीं हो सकता जिन्हें सरकारी खर्च पर, राजनीतिक फतवों से, धमकी-चमकी और दबाव से, लोगों का अनाज रोककर उन पर लादा जाए, और उसे आजादी का अमृत महोत्सव कहा जाए। हरियाणा की जिन राशन दुकानों पर बेबस गरीब महिलाओं का आक्रोश निकल रहा है, उनके बीस रूपये में खरीदे झंडों से क्या उनके घर पर आजादी का जश्न मनेगा, या वे लोग जश्न के इस जबरिया तौर-तरीके को कोसेंगे? जिस आजादी के नाम पर यह जलसा मनाया जा रहा है, उसी आजादी को कुचलते हुए यह खुली राजनीतिक धमकी दी जा रही है कि जो लोग झंडा नहीं फहराएंगे उनके घरों की तस्वीरें भेजी जाएं, उन पर यह देश कभी भरोसा नहीं कर सकेगा।

विविधता से भरा हुआ यह देश अपनी राजनीतिक और सामाजिक विविधताओं की वजह से ही आजाद दिखता है, और माना जाता है। अगर सारी आबादी की पोशाक, खानपान, राजनीतिक विचारधारा, और सांस्कृतिक तौर-तरीके सभी को एक सरीखा किया जाए, और तभी उन्हें देशप्रेमी माना जाए, तो यह तो आजादी के ठीक खिलाफ होगा। लोगों को आज तिरंगा झंडा अच्छा लग सकता है, लेकिन घरों पर इसे फहराना उन्हीं लोगों को अच्छा लगेगा जिनके मन में ऐसा करने की बात है। नसबंदी बहुत अच्छी बात थी, और हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को घटाने में कारगर भी हो सकती थी, लेकिन जब इमरजेंसी में संजय गांधी नाम के एक तानाशाह ने पूरे देश पर नसबंदी को जबरिया थोप दिया था, तो अगले चुनाव के वक्त लोगों ने इसे याद रखा था। कोई अच्छी चीज भी लोकतंत्र में दूसरों पर जबरिया कैसे थोपी जा सकती है? और आज जिस तरह सार्वजनिक धमकी देते हुए ऐसे लोगों को अविश्वसनीय करार दिया जा रहा है, जो घरों पर झंडा नहीं फहराएंगे, ऐसे नेता यह तो बताएं कि देश का कौन सा संविधान उन्हें किसी को अविश्वसनीय करार देने का हक देता है?

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11अगस्त 2022


 (Daily Chhattisgarh)

ऐसे घटिया शक्तिमान की खटिया खड़ी क्यों न हो?

   11 अगस्त 2022
 

मुम्बई फिल्म उद्योग के एक बहुत ही औसत दर्जे के अभिनेता मुकेश खन्ना का नाम बच्चों के लिए बनाए गए शक्तिमान नाम के एक किरदार से जुड़ा हुआ था, और एक वक्त था जब छत्तीसगढ़ में स्कूलों का जाल बिछाने वाले, और साथ-साथ अखबार चलाने वाले एक जालसाज ने मुकेश खन्ना को ब्रांड एम्बेसडर बनाकर दसियों हजार मध्यमवर्गीय मां-बाप को लूटा था। ऐसे मुकेश खन्ना ने अभी एक गंदा बयान दिया है जिसमें उन्होंने कहा है- कोई भी लडक़ी अगर किसी लडक़े को कहे कि मैं तुम्हारे साथ सेक्स करना चाहती हूं तो वो लडक़ी लडक़ी नहीं है, वो धंधा कर रही है। इस तरह की निर्लज बातें कोई सभ्य समाज की लडक़ी नहीं करेगी, और अगर वो करती है तो वो सभ्य समाज की नहीं है, उसका धंधा है ये, उसकी भागीदार मत बनिये। मुकेश खन्ना के इस बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है, और लोग सोशल मीडिया पर ही उन्हें जमकर धिक्कार भी रहे हैं। इसके अलावा दिल्ली के महिला आयोग ने दिल्ली पुलिस को एक नोटिस भेजकर इस बारे में जानकारी मांगी है, एफआईआर की कॉपी भेजने कहा है, और इस पर की गई कार्रवाई के बारे में बताने कहा है। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाती मालीवाल ने इस चिट्ठी को ट्वीट करते हुए कहा है कि महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक बयानों पर एफआईआर दर्ज करवाने हेतु दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है।

दरअसल महिलाओं को बर्दाश्त कर पाना आसान बात नहीं होती है। सोशल मीडिया पर कई लोग इस बात को लिखते हैं कि लोगों को कामयाब महिलाएं दूर से तो अच्छी लगती हैं, लेकिन जब उनसे रूबरू सामना होता है, तो मर्द उन्हें पसंद नहीं कर पाते। ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि कामयाबी किसी भी महिला में एक आत्मविश्वास पैदा करती है, और महिला का आत्मविश्वास आदमी में हीनभावना पैदा करता ही है। अपने आपको बच्चों के बीच एक आदर्श किरदार की तरह पेश करने वाले इस अभिनेता की बकवास में आदमियों की कोई जगह नहीं है कि अगर कोई आदमी किसी औरत से ऐसी बात कहे तो वह आदमी भी क्या पेशा करने वाला होगा? इक्कीसवीं सदी के दो दशक निकल चुके हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी आदमी, और खासे पढ़े-लिखे और सार्वजनिक जीवन के कामयाब लोग, सार्वजनिक रूप से भी अठारहवीं सदी की ऐसी दकियानूसी बात करते हैं।

और मुकेश खन्ना तो फिर भी एक छोटा सा आदमी है, इस देश के कई मुख्यमंत्री और कई केन्द्रीय मंत्री एक से बढक़र एक घटिया और अश्लील बातें महिलाओं के बारे में कहते आए हैं। इनमें यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल सरीखे लोग भी शामिल हैं, और इनको सहूलियत यह भी रहती है कि इनके ऐसे महिलाविरोधी बयानों के बाद भी न तो ये चुनाव हारते, और न ही इनकी पार्टी चुनाव हारती। मतलब यह है कि जनता के एक छोटे और मुखर तबके को ऐसे बयान खटकते हैं, लेकिन ऐसे बयान वोट नहीं बिगाड़ पाते जबकि वोटरों में आधी महिलाएं हैं। जब तक वोटरों की जागरूकता नहीं बढ़ेगी, और महिलाओं के बीच एक तबके के रूप में स्वाभिमान नहीं जागेगा, तब तक महिलाओं के खिलाफ खाप पंचायतों से लेकर देश की संसद और विधानसभाओं तक बकवास चलती रहेगी, और उनके साथ बेइंसाफी जारी रहेगी।

लोगों को खाप पंचायतों की इन बातों को नहीं भूलना चाहिए जो कि लड़कियों के जींस पहनने पर पाबंदी लगाती हैं, उनके मोबाइल फोन रखने पर पाबंदी लगाती हैं। अभी-अभी हिन्दुस्तान के लिए राष्ट्रमंडल खेलों में सोना जीतकर आने वाली निखत जरीन को बॉक्सिंग के कपड़े पहनने के लिए मुस्लिम समाज के भीतर से लगातार चेतावनी दी जाती थी। कुछ ऐसा ही सानिया मिर्जा को भी झेलना पड़ता था। और जब इनकी कामयाबी आसमान पर पहुंची तब जाकर इनके खिलाफ ओछे हमले बंद हुए, वरना इन्हें भी अपने कपड़ों के लिए मर्दों के वैसे ही हमले झेलने पड़ते थे जैसे हमले घर से बाहर निकलने वाली लड़कियों को योगियों और मनोहरलालों के झेलने पड़ते हैं।

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा इन मामलों में जागरूक हैं, और देश की राजधानी में बैठे हुए वे बहुत से मामलों में जागरूकता दिखाती हैं। अगर और योजना आयोग, बाल आयोग, या महिला आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी करते, तो बकवास पर कुछ लगाम लग सकती थी। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश के बड़बोले समाजवादी नेता आजम खान ने जब बलात्कार की शिकार बारह बरस की एक बच्ची की शिकायत को राजनीतिक साजिश कहा था, तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार पड़ी थी, और इस बड़बोले नेता को अदालत में माफी मांगनी पड़ी थी। हिन्दुस्तान में आज जरूरत ऐसी ही कार्रवाई की है जिससे हिंसक और अश्लील बकवास करने वाले लोगों को अदालत तक घसीटा जा सके, और वहां उनकी जुबान पर लगाम लगाई जा सके।

दूसरा एक और तरीका लोकतांत्रिक जागरूकता वाले सभ्य समाज में हो सकता है, लेकिन उसकी गुंजाइश हिन्दुस्तान में कम ही दिखती है। यहां पर अगर ऐसी गंदगी की बात करने वाले लोगों से जुड़े हुए सभी सामानों का बहिष्कार किया जा सकता, तो भी बहुत से लोगों के होश ठिकाने आ जाते। लेकिन एक तरफ तो पश्चिम के जागरूक देशों में तीसरी दुनिया के देशों में बहुत कम मजदूरी देकर, अमानवीय स्थितियों में बनवाए गए सामानों का बहिष्कार किया जाता है, और वैसे बहिष्कार के असर से सामान बनाने वाले इन देशों में मजदूरों की हालत कुछ सुधरती है। भारत जैसे देश में बाल मजदूरों से बनवाए गए कालीनों का दुनिया के दूसरे देश बहिष्कार करते हैं, लेकिन हिन्दुस्तानी घरों में बाल मजदूरों को बंधुआ बनाकर रखा जाता है, और दफ्तरों और बाजारों में बाल मजदूर चाय पहुंचाते हैं, जिनसे किसी को परहेज नहीं होता। दरअसल इस देश और इसके प्रदेशों में संवैधानिक जिम्मेदारियों के आयोगों में राजनीतिक मनोनयन होने से वहां बैठे लोग अपने राजनीतिक आकाओं को असुविधा का कोई काम नहीं करना चाहते, और इस तरह सुधार की संवैधानिक-संभावना खत्म हो जाती है।

आज जरूरत तो यह भी लगती है कि मानवाधिकार आयोग, बाल आयोग, महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जनजाति आयोग, अल्पसंख्यक आयोग की कुर्सियों पर राजनीतिक मनोनयन खत्म होना चाहिए, और किसी भी राज्य में इन ओहदों पर राज्य के बाहर की एक राष्ट्रीय फेहरिस्त से लोगों को मनोनीत करने का एक संवैधानिक ढांचा खड़ा करना चाहिए। जब तक राजनीति से संवैधानिक पदों को अलग नहीं किया जाएगा, तब तक समाज के कमजोर तबकों के खिलाफ हिंसक बकवास जारी रहेगी। अभी दिल्ली के करीब यूपी में भाजपा के बताए जा रहे एक नेता ने जिस गंदी जुबान में एक महिला को धमकाया, उस पर भारी जनदबाव के चलते पुलिस कार्रवाई तो हुई है, लेकिन उत्तरप्रदेश में कोई महिला आयोग भी है, ऐसा पता नहीं लगा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)