उत्तराखंड में दरार मकानों में नहीं, धरती के सीने में पैदा की है इंसानों ने...

 14 जनवरी 2023

 

उत्तराखंड में जोशीमठ जो दरारें शुरू हुईं, वे इस राज्य के दूसरे कई कस्बों तक पहुंच रही हैं, और दूसरे कस्बों में भी टूटते हुए घरों को देखकर सरकार बस्तियां खाली करा रही है। ठंड का यह मौसम और पीढिय़ों से बसे हुए लोग इस बीच बेघर हो रहे हैं, न सिर्फ उनके मकान जा रहे हैं, बल्कि उनकी जमीन भी धंस जा रही है, और वह शायद ही उन्हें कभी वापिस मिले क्योंकि हिमालय के किनारे बसे इस प्रदेश में इंसान की बाजारू नीयत ने विकास के नाम पर जो विनाश किया है, उसका असर शायद सदियों तक जारी रहेगा। इसलिए देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में लाखों लोगों की जिंदगी तबाह होने जा रही है, और यह आंकड़ा बढ़ते ही चले जाना है, ठीक उसी तरह, जिस तरह कि कोई दरार बढ़ती चली जाती है। 

लोगों को याद होगा कि पर्यावरण की फिक्र करने वाले लोग लगातार दशकों से यह मुद्दा उठा रहे थे कि हिमालय के पड़ोस के इस राज्य की भूगर्भ की हालत नाजुक है, और उसके साथ बांध और सुरंग बनाने, पहाड़ काटकर सडक़ों को चौड़ा करने का खतरनाक काम नहीं किया जाना चाहिए। लोगों ने इस पहाड़ी राज्य में जंगल और पेड़ बचाने के लिए अपनी जिंदगी दे दी, लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ने दीवारों पर लिखे धरती और कुदरत के संदेशों को पढऩे से इंकार कर दिया, और नेता, अफसर, ठेकेदार, तीनों की पहली पसंद, कांक्रीट और कंस्ट्रक्शन को अंधाधुंध बढ़ाया गया। जिस प्रदेश में आज कस्बे के कस्बे धसक रहे हैं, उस प्रदेश में सरकारों ने सौ के करीब सुरंगें बनाने का बीड़ा उठाया है, बिना यह समझे कि इसके कितने दाम चुकाने होंगे। आज यह दाम चुकाने के लिए सरकार के नोट कम पडऩे वाले हैं क्योंकि खोखले कर दिए गए एक पहाड़ी राज्य को फिर से भरने के लिए न तो दुनिया में सीमेंट काफी है, न ही इसकी टेक्नालॉजी मौजूद है, और न ही यह सरकार के बस में है। अंधाधुंध निर्माण का दाम उत्तराखंड की जनता अपने घर, अपनी जमीन, अपनी जिंदगी देकर चुका रही है। दुनिया में कहीं भी पड़ी हुई दरार बढ़ती ही चली जाती है, और इस वक्त जब हम इस पर लिख रहे हैं, उत्तराखंड में जगह-जगह लोग घर छोडक़र अपने ही वतन में शरणार्थियों की तरह दूसरी जमीन पर तम्बुओं में जा रहे हैं, तब भी रात-रात जागकर कंस्ट्रक्शन कंपनियों की क्रेन और बुलडोजर धरती को हिलाने में, छेदने और पार करने में लगे हुए हैं। एक टीवी समाचार पर यह देखना भयानक था कि बस्तियों में लोग सर्द रातें कहीं तम्बुओं में बैठे हुए हैं, और दूसरी तरफ सरकारी प्रोजेक्टों में ठेकेदारों की दानवाकार मशीनें जमीन हिलाने में लगी हुई हैं।

दरअसल इंसान जिस रफ्तार से धरती और कुदरत को दुह लेना चाहते हैं, धरती और कुदरत उस मुताबिक बनी नहीं हैं। हिन्दुस्तान के इन पहाड़ी प्रदेशों में जिस रफ्तार से पेड़ काटे गए, जिस रफ्तार से जल-बिजली के लिए बांध और उसके तालाब बनाए गए, सडक़ों को चौड़ा करने के लिए जिस रफ्तार से पहाडिय़ां काटी गईं, अधिक से अधिक सैलानियों को लाने, ठहराने, और घुमाने के लिए होटलों और गाडिय़ों का समंदर खड़ा कर दिया गया, जगहों को एक-दूसरे से करीब लाने के लिए सुरंगों का जाल बनाना शुरू किया गया, इन सबके खिलाफ पर्यावरण के जानकार लोग, और गैरपर्यावरणवादी तकनीकी विशेषज्ञ भी चेतावनी देते आए थे, लेकिन हर कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट में बंटने वाले कमीशन और रिश्वत के चलते सरकारों को हांकने वाले लोगों ने सारी चेतावनियों को अनसुना कर दिया। इस रफ्तार से हिमालय के किनारे बसे इस इलाके को तबाह किया गया कि मानो ये इलाके अगली सदी न देख लें। 

दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि इंसान जैव विविधता को इस रफ्तार से खत्म करने में लगे हुए हैं कि उसकी भरपाई लाखों बरस भी नहीं हो पाएगी। दो दिन पहले बीबीसी पर एक रिपोर्ट थी कि मेडागास्कर के टापू पर पेड़-पौधों और पशु-पक्षी जैसी तमाम किस्म की जैव विविधता पिछले बहुत थोड़े से समय में इस रफ्तार से खत्म हुई है कि उतनी विविधता दुबारा बनने में तीस लाख बरस लगेंगे, और अगर इसी रफ्तार से यह विविधता कुछ और समय तक बर्बाद हुई तो उसकी भरपाई में दो सौ लाख बरस लगने का वैज्ञानिक अंदाज है। खतरनाक बात यह है कि बहुत थोड़ी आबादी वाले इस टापू पर इंसानों का इतिहास बहुत छोटा है, लेकिन गिनी-चुनी आबादी ने इस रफ्तार से जैव विविधता को खत्म कर दिया है कि यह इंसान के खूनी मिजाज की एक जलती-सुलगती मिसाल दिख रही है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि कुदरत के हिस्सों को तबाह करना, अंधाधुंध शिकार, और जलवायु परिवर्तन के रास्ते इंसानों ने जैव विविधता को कुछ दशकों में ही इतना खत्म कर दिया है कि दसियों लाख साल उसकी भरपाई नहीं होने वाली है। 

कुछ ऐसा ही हाल हिन्दुस्तान में पांच-पांच बरस के लिए आने वाली सरकारों ने पहाड़ी इलाकों का किया है। हर निर्वाचित सरकार को यह हड़बड़ी रहती है कि वह अधिक से अधिक कितने कंस्ट्रक्शन-ठेके दे सके, कितनी कमाई कर सके। कुदरत की गोद में हर इंसान के लिए जरूरत का तो काफी है, लेकिन इंसान बेहिसाब हवस के लिए उसके पास उतना कुछ नहीं है। यह नौबत हिन्दुस्तान जैसे देश के सम्हलकर बैठने की है, और दरारों वाले मकान गिराकर किसी दूसरे इलाके में कुछ दूसरे कच्चे-पक्के मकान बनाना तो हो सकता है, लेकिन हिमालय की तराई, उसके बदन पर आई दरारों को पाटना इंसानों के बस के बाहर का है। ये इलाके न इतने निर्माण के लायक हैं, और न ही इतने सैलानियों के लायक हैं। अगले किसी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अध्ययन तक उत्तराखंड जैसे प्रदेश में सारे बड़े प्रोजेक्ट पर काम पूरी तरह रोक देना चाहिए, ऐसा न करना एक ऐतिहासिक खुदकुशी होगी, जिसमें मौत आज के नेताओं की नहीं होगी, ऐसे प्रदेशों की अगली कई पीढिय़ों की होगी। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

सडक़ों पर मौतें, सरकारी अमले बेचते हैं जिंदगियां

13 जनवरी 2023

 

महाराष्ट्र में अभी सुबह-सुबह एक निजी मुसाफिर बस और ट्रक में टक्कर हुई जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई है, और बहुत से जख्मी हो गए हैं। बस की हालत देखें तो लगता है कि मानो अफगानिस्तान या इराक में बम के धमाके से उड़ा दी गई बस हो। ऐसी कोई सुबह नहीं होती जब इस किस्म की पांच-दस थोक मौतों की कोई खबर न आई हो। हर रात के अंधेरे में देश भर में जगह-जगह हादसों में ऐसी मौतें हो रही हैं, और अगर उनका आंकड़ा आधा दर्जन पार कर जाता है, तो ही उनकी खबर प्रदेश की सरहद पार कर पाती है। इक्का-दुक्का मौतों की तो मानो कोई गिनती नहीं है। सरकारी आंकड़ों को देखें तो 2021 में चार लाख बारह हजार सडक़ हादसे हुए हैं जिनमें डेढ़ लाख से अधिक लोग मारे गए हैं, और पौन चार लाख से अधिक लोग जख्मी हुए हैं। जाहिर है कि बाद में इन घायलों में से और बहुत सी मौतें हुई होंगी, या मौत से बदतर जिंदगी चल रही होगी। सडक़ हादसों का यह हाल भयानक है, लेकिन इस पर चर्चा इसलिए जरूरी है कि इसे रोका जा सकता है। 

आए दिन शहरों की खबर आती है कि उनके किनारे हाइवे और रिंगरोड पर किस तरह ट्रांसपोर्ट कारोबारियों की स्थाई पार्किंग चलती है, और जिन दुपहिया-तिपहिया गाडिय़ों को सर्विस रोड से चलना चाहिए, वे हाइवे पर चलने को मजबूर रहती हैं, दुपहिया सवार लोगों की अधिकतर मौतें इसी तरह की सडक़ों पर होती हैं, और हर बार यह बात सामने आती है कि उन्होंने हेलमेट नहीं लगाया हुआ था। केन्द्र सरकार ने हेलमेट लगाने को जरूरी बना दिया है, और न लगाने पर एक जुर्माना भी लगाया है। लेकिन देश के अधिकतर प्रदेशों में राज्य सरकारें अपने लोगों के सिर पर बोझ रखकर उन्हें नाराज करना नहीं चाहतीं, इसलिए वोटर की चापलूसी के मकसद से उसकी आदत खराब होने दी जाती है, और हेलमेट, सीटबेल्ट जैसे नियमों को कुछ महानगरों को छोडक़र अधिकतर जगहों पर लागू नहीं किया जाता। हम अपने अखबार में शुरू से ही इसके लिए अभियान चलाते आए हैं, लेकिन सरकार ने मानो कसम खा रखी है कि वह किसी भी कीमत पर वोटर को नाराज नहीं होने देगी। इसलिए कंधे और कान के बीच मोबाइल दबाए हुए दुपहिया चलाते लोगों को भी कहीं नहीं रोका जाता, और न ही अंधाधुंध रफ्तार से सांप की तरह आड़ी-तिरछी मोटरसाइकिल चलाने वालों को रोका जाता। यह तय है कि अगर राज्य सरकार हेलमेट को लागू कर दे, दुपहिया और मोबाइल के मेल को खत्म कर दे, तो रोजाना आधा दर्जन मौतें तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में टल सकती हैं। 

लेकिन बस और ट्रक जैसी टक्कर हेलमेट से परे का मामला है। हिन्दुस्तान के किसी भी राज्य में जितनी कारोबारी गाडिय़ां रहती हैं, वे आरटीओ और ट्रैफिक पुलिस दोनों की मंजूरी और निगरानी वाली रहती हैं। ये गाडिय़ां ओवरलोड भी चलती हैं, बिना फिटनेस की भी चलती हैं, और अंधाधुंध रफ्तार से तो चलती ही हैं। ड्राइवर कई बार नशे में रहते हैं, और कई बार उनकी नींद अधूरी हुई रहती है। इन सबके साथ-साथ उन्हें माल और मुसाफिर को जल्द से जल्द मंजिल तक पहुंचाने का एक किस्म से ठेका दे दिया जाता है, और यहीं से रफ्तार और हड़बड़ी का जानलेवा मुकाबला शुरू होता है। फिर हिन्दुस्तान में जगह-जगह सडक़ों का हाल खराब है, सावधानी के निशान लगे नहीं रहते, कई गाडिय़ां बिना लाईट के चलती हैं, कई गाडिय़ां सडक़ किनारे बिना लाईट जलाए खड़ी रहती हैं, और यह सब पुलिस और आरटीओ की लापरवाही का नतीजा रहता है। ये दोनों ही विभाग परले दर्जे के भ्रष्टाचार में डूबे हुए रहते हैं, और ये जितनी मोटी कमाई करते हैं, वह लोगों की जिंदगी बेचकर ही हो पाती है। अगर इन दोनों विभागों के लोग ईमानदारी से जांच और जुर्माना करने लगें, तो सडक़ मौतें घटकर एक चौथाई रह जाएंगी। लोगों को जानलेवा लापरवाही, जानलेवा रफ्तार, और गाडिय़ों की जानलेवा कंडम हालत की छूट देकर जो कमाई की जाती है, उसी से सडक़ों पर लाशें बिखरती हैं। 

केन्द्र सरकार सडक़ सुरक्षा के लिए कई तरह के नियम तो बना सकती है, लेकिन उन पर अमल राज्य सरकार के दायरे की बात रहती है। ऐसे में केन्द्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि किस तरह सडक़ों की हिफाजत के काम में, हादसों को रोकने में आम जनता की मदद ली जा सकती है। जनता की भागीदारी से अगर उनके साथ मौजूद पुलिस और आरटीओ के अफसर जांच करेंगे, तो हो सकता है कि उतने संगठित भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रह जाए। वैसे तो हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय चरित्र देखें, तो एक खतरा यह भी लगता है कि जनता की ऐसी भागीदारी के नाम पर जनता को भ्रष्ट बनाने का भी एक सिलसिला शुरू हो सकता है। लेकिन कुछ समय पहले सडक़ परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने यह कहा था कि केन्द्र सरकार ऐसा कानून बनाने जा रही है कि सडक़ों पर नियम तोडऩे वाली गाडिय़ों के फोटो-वीडियो लोग अगर पुलिस को भेजेंगे, तो उनके आधार पर होने वाले जुर्माने में उन्हें भी एक हिस्सा ईनाम की शक्ल में मिलेगा। हमने पहले भी इस सोच की तारीफ की थी, हालांकि कुछ अच्छे पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लिखा था, और लिखा था कि सरकार अपना काम खुद करने के बजाय लोगों पर इसकी जिम्मेदारी डाल रही है। हम ऐसी सोच से सहमत नहीं हैं, और हमारा मानना है कि देश को चलाने का जिम्मा अकेले सरकार पर नहीं हो सकता, और हर नागरिक का यह जिम्मा और अधिकार है कि वे जहां कानून टूटते देखें, वे सरकार को खबर करें। हर जगह तो पुलिस को तैनात करना दुनिया की किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं है, और आम लोगों को भी अपनी नागरिक जवाबदेही निभानी चाहिए। और ऐसा करने में अगर जुर्माने के एक हिस्से पर उनका हक भी तय किया जा रहा है, तो यह सचमुच ही अच्छी बात है। वैसे तो केन्द्र सरकार के किए बिना भी कोई समझदार और जिम्मेदार राज्य सरकार भी यह काम कर सकती है, और हम तो नितिन गडकरी की बात के दस-बीस बरस पहले से यह सुझाव लिखते आए हैं। किसी भी जिम्मेदार राज्य सरकार को सडक़ों के नियम तोडऩे वालों के सुबूत भेजने के लिए जनता का हौसला बढ़ाना चाहिए, और जुर्माना वसूली के बाद उन्हें एक हिस्सा देना चाहिए, इससे हादसे रूकेंगे, और मौतें थमेंगी। 

(Daily Chhattisgarh)

 

बात की बात, 12 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 जनवरी 2023


 (Daily Chhattisgarh)

जलेबी बाबा जैसे नाम वाला भी पकड़ाने के पहले कर चुका था सवा सौ बलात्कार

12 जनवरी 2023

 

बाबाओं से भरे हुए हरियाणा में बलात्कार की ताजा सजा पाने वाला बाबा बड़े दिलचस्प नाम वाला है। जलेबी बाबा को फास्ट ट्रैक कोर्ट के स्पेशल जज ने 14 साल की कैद सुनाई है, उस पर अनगिनत महिलाओं से बलात्कार के अलावा उनके वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करने का भी आरोप है। पांच बरस से मुकदमा चल रहा था, और फास्ट ट्रैक कोर्ट में भी इतना समय लग गया। यह बाबा किसी धार्मिक संगठन से निकलकर नहीं आया था, वह हरियाणा में एक जगह जलेबी बनाकर बेचता था, और बाद में उसने घर में मंदिर बनवाया, और इस मंदिर में वह महिलाओं को उनकी परेशानियों का समाधान बताता था, और यह करते-करते वह बिल्लू राम से जलेबी बाबा बन गया था। पुलिस ने अदालत को बताया कि वह शारीरिक और मानसिक तकलीफों वाली महिलाओं के इलाज का दावा करता था, उन्हें खाने-पीने की चीजों में नशा देता था, और उसके बाद उनसे छेडख़ानी को मंदिर के खुफिया कैमरों में रिकॉर्ड कर लेता था। इसके बाद वह ब्लैकमेल करके बलात्कार भी करता था, और रकम भी वसूलता था।

हरियाणा ढेर किस्म के पाखंडी बाबाओं का प्रदेश है, और इनमें से बहुत से बलात्कारी दर्ज हुए हैं, और ऐसा माना जा सकता है कि बाकी के बलात्कार अब तक सामने नहीं आए होंगे, वे बलात्कारी रहे जरूर होंगे। धर्म और आध्यात्म लोगों के शोषण का सबसे आसान जरिया रहता है, भक्तजन और मानने वाले लोग अपने तर्कों को, अपनी वैज्ञानिक समझ को ताक पर धरकर आते हैं, और अपने आपको शारीरिक और मानसिक रूप से गुलाम की तरह पेश कर देते हैं। बाबाओं के चक्कर में पडऩे वाले लोग बलात्कार को भी अपनी खुशकिस्मत मान लेते हैं, और भक्तजनों के पूरे-पूरे परिवार बलात्कारी बाबाओं को समर्पित रहते हैं। हम पहले कई बार इसी जगह पर आसाराम के बारे में लिख चुके हैं जो कि स्वघोषित बापू था, और अपने भक्त परिवार की एक नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में अब तक जेल में है, और देश के सबसे बड़े और महंगे वकील भी उसको जमानत नहीं दिला पाए हैं। लेकिन इससे उसके भक्तों पर बहुत असर नहीं पड़ा है, और आज भी वे आसाराम का प्रचार करते हुए अपने पूरे परिवार और बच्चों सहित सडक़ों पर दिखते हैं, और कभी जुलूस निकालते हैं, कभी कार्यक्रम करते हैं, और उसे छोडऩे की मांग भी करते हैं। इतिहास में हर जगह धर्म का नाम लेकर पाखंड चलाने वाले ऐसे बलात्कारी दर्ज हुए हैं, और हर किस्म के धर्म में ऐसे बलात्कार सामने आए हैं। अभी पिछले पोप के मरने पर चार दिन पहले ही हमने इसी जगह पर लिखा था कि उस पोप ने किस तरह दुनिया भर में पादरियों द्वारा बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों में नरमी दिखाई थी, और उन्हें सजा से बचाया था। ऐसा हाल हिन्दुस्तान में जगह-जगह देखने मिलता है, और जलेबी बाबा नाम के इस बलात्कारी के बारे में कुछ खबरें बताती हैं कि उसने सवा सौ महिलाओं से बलात्कार किया था। 

हिन्दुस्तान की एक दिक्कत यह भी है कि यहां अधिकतर लोगों को किसी भी मानसिक समस्या के लिए न तो मनोचिकित्सक हासिल हैं, और न ही परामर्शदाता। इसलिए मानसिक परेशानी रहने पर गरीब परिवार अपने लोगों को सीधे किसी बाबा, किसी मजार, या किसी गुरू के पास ले जाते हैं, और वहां पर उनका तरह-तरह से शोषण होता है। एक तो परिवार परेशान रहता है, दूसरा ऐसे पाखंडी उन्हें अपने किस्म के इलाज का झांसा देते हैं, और मरीज बच्चे और महिलाएं बलात्कार के शिकार हो जाते हैं। इससे परे हरियाणा में ही बाबा राम-रहीम नाम के एक और बलात्कारी की भयानक कहानी सबके सामने है, जिसे 20 साल की कैद हुई है, और एक पत्रकार की हत्या करवाने के जुर्म में उम्रकैद भी हुई है। राम-रहीम ने अपने आपको एक बहुत बड़ा आध्यात्मिक गुरू बताया, और उसके डेरे में साधुओं को बधिया बनाने के बहुत से मामले किए गए थे। उस पर साध्वियों से बलात्कार के मामले चले, और इसका भांडाफोड़ करने वाले पत्रकार की भी इस बाबा ने हत्या करवा दी। जिस हरियाणा में महिलाओं को सामाजिक रूप से अधिकारों से दूर रखा जाता है, उस हरियाणा में इस किस्म के पाखंडियों को एक उपजाऊ जमीन मिल जाती है। 

हिन्दुस्तान में धर्म के नाम पर धर्मान्धता और कट्टरता को बढ़ावा देकर लोगों की वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का जो सिलसिला पिछले बरसों में चलाया गया है, उससे इस देश की जनता इसी किस्म के पाखंडी और बलात्कारी बाबाओं की गुलाम बनने के खतरे में पड़ गई है। धर्म सिर्फ अनपढ़ों को ही धोखे के लायक नहीं बनाता, पढ़े-लिखे लोगों को भी शोषण के लायक तैयार करता है। लोगों को याद होगा कि देश में सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे केरल में किस तरह एक बिशप पर एक नन से बलात्कार का केस चला था, हालांकि वह बाद में बरी हो गया था। दुनिया के विकसित और पढ़े-लिखे देशों में ही पढ़े-लिखे परिवारों के बच्चे चर्च में पादरियों के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं जहां उनसे बलात्कार होते हैं। धर्म पढ़ाई-लिखाई से मिली समझ को भी खत्म करने की ताकत रखता है, और हरियाणा का सामाजिक पिछड़ापन ऐसे शोषण को और दूरी तक ले जाता है। 

हिन्दुस्तान की एक दिक्कत यह भी है कि कई किस्म के बाबा और पाखंडी बरसों तक बलात्कार करते रहते हैं, लेकिन कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। राम-रहीम और आसाराम जैसे अधिक चर्चित बलात्कारियों के मामले में हमने देखा है कि बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता इनके चरणों में बिछे रहते हैं, और छोटे-मोटे अफसर किसी शिकायत के आने पर भी इन पर कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करते। समाज के जागरूक लोगों और उनके संगठनों को इस नौबत को बदलने की कोशिश करनी चाहिए। धर्म से जुड़े हुए लोगों को भी अगर अपने धर्म की इज्जत बरकरार रखनी है, तो उन्हें भी पाखंड के ऐसे बलात्कारी सिलसिले को खत्म करना पड़ेगा। हम जानते हैं कि हमारा यह कहना आसान है, और लोगों के मन से अंधविश्वास को मिटाना मुश्किल बात है, लेकिन ऐसी कोशिशों के अलावा और कोई चारा भी नहीं है। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 11 जनवरी 2023


ट्रंप अपने देश में आतंकी, और ब्राजील में बन गए उसी किस्म की एक प्रेरणा

11 जनवरी 2023

 

ब्राजील में नए निर्वाचित राष्ट्रपति लूला के चुनाव को गैरकानूनी करार देते हुए पिछले राष्ट्रपति बोलसोनारो के समर्थकों ने जिस तरह ब्राजील की संसद, सुप्रीम कोर्ट, और राष्ट्रपति भवन पर हमला बोला, उसने सबको हक्का-बक्का कर दिया। दो बरस पहले जनवरी के महीने का ही पहला हफ्ता था जब अमरीका में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे पर उनके समर्थकों ने जो बाइडन के चुनाव को नाजायज करार दिया था, और इसी तरह संसद पर हमला बोला था। अब मानो ब्राजील में उसी अमरीकी हमले से रास्ता समझकर ब्राजील में ठीक वैसा ही हुआ, कुछ बड़े पैमाने पर हुआ, और कुछ दूसरी संवैधानिक संस्थाओं पर भी हुआ। जिस तरह अमरीका में ट्रंप ने बाइडन के चुनाव को मतगणना पूरी हो जाने के बाद भी लगातार खारिज किया, कुछ वैसा ही ब्राजील में भी हारे हुए राष्ट्रपति ने किया। चूंकि ये दोनों मामले महज दो बरस के फासले पर बिल्कुल एक सरीखे दिखते हुए सामने आए हैं, इसलिए यह मानने की हर वजह है कि ट्रंप की बगावत से ही ब्राजील में हारे हुए राष्ट्रपति बोलसोनारो को रास्ता सूझा। इससे यह भी साबित होता है कि दुनिया में एक देश में की गई वारदातें दूसरे देशों को भी उस तरह का रास्ता दिखा सकती हैं। ब्राजील में बोलसोनारो की हार के आसार बने हुए थे, और इस बार की यह हिंसक बगावत सोशल मीडिया पर हमले के तार जोडक़र की गई साबित हो रही है। 

दुनिया में लोग और देश मोहब्बत की बातें चाहे एक-दूसरे से न सीख पाएं, नफरत और हिंसा की बातें तेजी से एक-दूसरे से सीख लेते हैं। हिन्दुस्तान में आज धर्म को लेकर जिस तरह की कट्टरता पनप रही है, धर्मान्धता बढ़ रही है, किसी भी तरह की हिंसा के लिए धर्म को एक न्यायसंगत वजह मान लिया गया है, उसकी जड़ें पड़ोस के पाकिस्तान से लेकर उसके बगल के अफगानिस्तान तक की धार्मिक कट्टरता से जुड़ी हुई हैं। एक देश का आतंक दूसरे देश के आतंक को बढ़ावा देता है। हिन्दुस्तान में बहुत से लोगों को इस बात से तकलीफ पहुंचती है जब इस देश के धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठनों की तुलना कुछ लोग अफगान-तालिबानों से करते हैं। हो सकता है कि यह तुलना कुछ नाजायज हो, लेकिन कट्टरता और धर्मान्धता के मामलों में फर्क महज हिंसा के पैमानों का है, बाकी राह तो एक ही है। जिस तरह ट्रंप की दिखाई राह पर बोलसोनारो चले, ठीक उसी तरह दूसरे देशों में इस्लामी कट्टरपंथ और आतंक की दिखाई गई राह पर हिन्दुस्तान में आज की धार्मिक हिंसा चल रही है। हो सकता है कि वह कई मील पीछे हो, लेकिन यह समझ लेना जरूरी है कि यह उसी राह पर मील के अलग-अलग पत्थरों तक पहुंचा हुआ सफर है। 

पहले अमरीका, और उसके बाद ब्राजील, दुनिया के दो बड़े और महत्वपूर्ण देशों में हुए पारदर्शी चुनावों के बाद जिस तरह जाती हुई सत्ता ने गुजरने से इंकार कर दिया, और अपनी हार के आंकड़ों को नकार दिया, उससे दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के सामने एक मिसाल बन सकती है, और उससे जगह-जगह लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। जो लोग अमरीका की खबरों को ध्यान से देखते हैं, उन्हें यह मालूम है कि अमरीकी संसद पर ट्रंप समर्थकों द्वारा 6 जनवरी को किए गए हमले की संसदीय सुनवाई पूरी हो चुकी है, और इस कमेटी ने ट्रंप और उनके समर्थकों के खिलाफ चार गंभीर पहलुओं पर आपराधिक मामले चलाने की सिफारिश अमरीका के न्याय विभाग से की है। वहां संसदीय समिति की सिफारिश कोई बंदिश नहीं है, इसलिए अमरीका के सबसे बड़े सरकारी वकील अपने स्तर पर यह तय करेंगे कि किन-किन सिफारिशों के आधार पर आपराधिक मुकदमे चलाने हैं, और क्या पिछले राष्ट्रपति ट्रंप पर भी इन दंगों और हमलों को भडक़ाने और उकसाने का मुकदमा चलाना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो अमरीकी इतिहास में यह पहला मौका रहेगा जब किसी राष्ट्रपति पर ऐसा मुकदमा चलेगा। अमरीका के इस मामले को बाकी लोकतंत्रों को भी बारीकी से देखना चाहिए कि कोई संसदीय समिति किस तरह काम कर सकती है, और किस तरह पिछले राष्ट्रपति को भी कटघरे मेें खड़ा कर सकती है। 

हिन्दुस्तान इस मामले में एक बेहतर मिसाल बनकर दुनिया के तमाम लोकतंत्रों के सामने है कि एक बार चुनावी नतीजे आ जाने के बाद कोई सरकार हटने से इंकार नहीं कर पाती। यह एक अलग बात है कि हटने के पहले वह चुनावों में हर गलत काम कर जाती है, थोक में दलबदल करवाती है, चुने हुए सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त करती है, लेकिन वोटरों के फैसले के खिलाफ हथियारबंद बगावत, संसद पर हमला किस्म की बातें हिन्दुस्तान में कभी देखने में नहीं आतीं। या तो इसके पीछे एक वजह यह है कि यहां वोटरों को प्रभावित करने, और सांसदों-विधायकों को खरीदने की इतनी संभावनाएं हमेशा ही बनी रहती हैं कि नतीजों के बाद बगावत की जरूरत नहीं रहती। लेकिन एक पार्टी की सरकार दूसरी पार्टी की सरकार को सत्ता के हस्तांतरण में किसी हिंसा को बढ़ावा देते कभी नहीं दिखी है। अमरीका और ब्राजील को हिन्दुस्तानी संसदीय व्यवस्था से यह एक पहलू जरूर सीख लेना चाहिए, यह एक अलग बात है कि चुनावी नतीजों को भ्रष्टाचार से खरीद लेने में हिन्दुस्तान को जो महारथ हासिल है, उसे सीखने में दूसरे लोकतंत्रों को खासा वक्त लग सकता है।

अमरीका में ट्रंप एक गंभीर मुकदमे का एक गंभीर खतरा झेल रहे हैं, जिसमें उन्हें सजा तक होने का खतरा है। लेकिन अपने देश में वे सजा भुगतें या न भुगतें, उन्होंने पास के एक दूसरे देश में बगावत की प्रेरणा तो दे ही दी है। हमारा यह मानना है कि ट्रंप ने अमरीका में एक आतंकवादी का काम किया, और दूसरे देशों के लिए वे एक आतंकवादी मिसाल बन भी चुके हैं। दुनिया के गंभीर, सभ्य, और परिपक्व लोकतंत्रों को ऐसी घटिया मिसाल बनने से बचना चाहिए जिससे कि वे खुद तो चाहे उबर जाएं, लेकिन वे दूसरों को डुबाने का इंतजाम कर देते हैं।

(Daily Chhattisgarh)