दीवारों पर लिक्खा है, 19 दिसंबर 2024



 

इलाज से कम अहमियत नहीं है वक्त पर बीमारी की शिनाख्त हो जाने की..

19  दिसंबर 2024

 

हिन्दुस्तान में गरीबों के इलाज के लिए केन्द्र सरकार, और राज्य सरकारों के अलग-अलग कई तरह के कार्यक्रम हैं। इलाज का बीमा इनमें सबसे बड़ा कार्यक्रम है, और हर प्रदेश में हजारों रूपए सालाना इस बीमे के एवज में सरकार अस्पतालों को देती है। चूंकि इलाज के लिए निजी अस्पतालों में जाने की छूट रहती है, इसलिए सरकारी अस्पतालों पर लोगों की निर्भरता कुछ मामलों में घटी है। नतीजा यह भी है कि सरकार खुद अपने अस्पतालों के लिए कुछ या अधिक हद तक लापरवाह हो गई हैं। नई बाजार व्यवस्था के तहत बड़े निजी अस्पताल, और स्वास्थ्य बीमा का चलन बढ़ गया है। लेकिन बीमे की रकम तो सरकारों को ही देनी होती है। और यह सब तो केवल खर्च की बात हुई, असल बात सेहत की है जो कि किसी भी दाम से ऊपर है, और एक बार सेहत अधिक बिगडऩे पर पूरी तरह सुधरती भी नहीं है।

अभी छत्तीसगढ़ के एक छोटे जिले बैकुंठपुर के जिला अस्पताल में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (चिरायु) के तहत बच्चों की सेहत परखी गई। राजधानी रायपुर से गए हृदय रोग विशेषज्ञों ने बच्चों की जांच की, और प्रारंभिक जांच के बाद 49 बच्चों में से 23 में हृदय रोग के लक्षण पाए गए। और इनमें से 18 बच्चों को दिल की गंभीर बीमारी निकली। अब इनको राजधानी लाकर यहां बड़े अस्पताल में इनका इलाज करवाया जाएगा। यह तो एक बात हुई, अब एक दूसरी खबर गैरसंक्रामक रोगों की जांच, और उनके इलाज के लिए भी सरकार कर रही है, और 30 साल की उम्र के लोगों की हाई बीपी, डायबिटीज, स्तन कैंसर, और गर्भाशय के कैंसर की जांच करने का सरकारी अभियान चलाया जा रहा है। सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने अपने अमले को कहा है कि अस्पताल में किसी भी बीमारी के इलाज के लिए आने वाले इस उम्र के लोगों की ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की जांच अनिवार्य रूप से की जाए। लोगों को ध्यान होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने एक कैंसर विशेषज्ञ का साक्षात्कार अपने यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, के लिए किया था, और उन्होंने कहा था कि कैंसर विशेषज्ञ तक 80 फीसदी मरीज बहुत देर से आते हैं, और उनके पूरी तरह ठीक होने की संभावना तब तक बहुत घट चुकी रहती है। दूसरी तरफ जल्दी आने वाले मरीजों के पूरी तरह ठीक हो जाने की पूरी-पूरी संभावना रहती है।

हम सरकार के स्तर पर होने वाली जांच को इलाज के खर्च, या बीमे के खर्च से परे और ऊपर मानते हैं। अब देश भर में अधिकतर गरीबों का काफी कुछ इलाज सरकारी योजनाओं में होता है। और ऐसे में अगर समय रहते बीमारी का पता लग जाए, तो उनके ठीक होने, और देश में एक उत्पादक नागरिक की तरह योगदान देने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए एक जिले में ही अगर इतने बच्चे हृदयरोगी मिल रहे हैं, तो पूरे प्रदेश में ऐसे हजारों बच्चों की शिनाख्त हो सकती है जिन्हें दिल के गंभीर इलाज की जरूरत हो। इसी तरह दूसरी बीमारियों का हाल भी देश में खतरनाक स्तर पर पहुंचा हुआ है। डायबिटीज का हाल यह है कि इस देश को दुनिया की डायबिटीज-राजधानी कहा जाता है। अब शहरों से निकलकर यह बीमारी गांव के गरीबों तक पहुंचने लगी है, और बहुत कम उम्र के बच्चे भी डायबिटीज के शिकार मिलने लगे हैं। अगर इसकी शिनाख्त में देर होती है तो यह बहुत जाहिर बात है कि इससे आंखों और किडनी सहित शरीर के दूसरे कई अंगों पर बुरा असर पड़ते रहता है। इसलिए जितनी जल्दी इसकी पहचान हो जाए, इलाज शुरू हो जाए, बीमारी का नुकसान उतनी जल्दी थम सकता है। कुछ इसी तरह का हाल महिलाओं के स्तन कैंसर, और गर्भाशय के कैंसर का है। भारत की आम महिलाएं परिवार की फिक्र में अपने आपको इस हद तक झोंक देती हैं, कि खुद की बीमारी का कोई अहसास होने पर भी उसकी चर्चा नहीं करतीं कि परिवार का ध्यान उनकी तरफ बंटेगा। नतीजा यह होता है कि कैंसर जैसी बीमारी बढक़र जब जानलेवा हो चुकी रहती है, तब जाकर इलाज शुरू होता है, और उस वक्त डॉक्टरों के हाथ में भी करने का बहुत कम रह जाता है।

केन्द्र और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य जांच के कार्यक्रम इलाज के मुकाबले कहीं भी कम अहमियत नहीं रखते। राज्य सरकारों को चाहिए कि वे अलग-अलग शहरों में अलग-अलग संगठनों को जोडक़र उनके बैनरतले जांच के ऐसे कार्यक्रम करवाए ताकि लोगों की जल्द शिनाख्त हो सके। सरकार का अपना ढांचा ऐसे जांच कार्यक्रम के लिए नाकाफी होता है, और महंगा भी पड़ता है। इसमें सामाजिक भागीदारी बड़े पैमाने पर की जा सकती है। अगर जरूरत हो तो एनसीसी और राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्रों को भी ऐसे शिविरों से जोड़ा जा सकता है ताकि वे कम उम्र से ही बीमारियों की जांच के प्रति जागरूक भी होते चलें। आज एनएसएस के छात्र-छात्राओं को कहीं पर झाडिय़ां और कचरा साफ करते देखा जा सकता है, इनके मुकाबले स्वास्थ्य जांच शिविर अधिक बड़ा योगदान हो सकते हैं।

सरकार के लोगों को भी लोगों की जागरूकता के लिए अलग-अलग मंचों पर जाकर जांच की जरूरत बखान करनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि रोटरी इंटरनेशनल नाम के संगठन ने पूरे हिन्दुस्तान में पोलियो ड्रॉप्स के अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, और देश भर में रोटरी के लाखों सदस्यों ने बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने में संगठित रूप से सरकार का साथ दिया था। देश भर में भी कुछ ऐसे संगठनों को अलग-अलग बीमारियों की जांच के इंतजाम से जोड़ा जा सकता है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकार जब तक ऐसा कुछ न करे, तब तक स्वास्थ्य विभाग या जिला प्रशासन के उत्साही लोग भी सेहत की जांच के कैम्प लगा सकते हैं, और जल्द शिनाख्त ही सबसे बड़ा बचाव हो सकती है। यह बात भी समझने की जरूरत है कि समाज में जागरूकता जैसे-जैसे बढ़ेगी, वैसे-वैसे लोग अपने आसपास के दूसरे लोगों को भी जांच के लिए भेजने की कोशिश करेंगे। इसकी शुरूआत अधिक महत्वपूर्ण है, और एक सीमा के बाद लोग खुद होकर जांच के लिए आने लगेंगे।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 18 दिसंबर 2024



 

सत्ता और दलालों का जनम-जनम का नाता

 18  दिसंबर 2024

 

ब्रिटेन का शाही परिवार एक बार फिर एक विवाद में फंस गया है। वहां के किंग चार्ल्स के छोटे भाई प्रिंस एंड्रयू के एक करीबी चीनी कारोबारी को लेकर अब यह दावा किया जा रहा है कि वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का करीबी था, और वह ब्रिटिश राजमहल में आना-जाना करता था। अब ब्रिटिश सरकार ने इस पर रोक लगाई है, और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए ब्रिटेन आने से रोक दिया गया है। ऐसा कहा जा रहा है कि चीन से अंग्रेजी पढऩे के नाम पर ब्रिटेन आए हुए इस कारोबारी ने चीन के संभावित पूंजीनिवेशकों की ओर से ब्रिटेन के शाही परिवार को प्रभावित करने की कोशिश की होगी। अब अधिक बारीकियों तक जाना जरूरी नहीं है, सिवाय इसके कि अलग-अलग जिस देश में जैसी सत्ता रहती है, उसमें सत्तारूढ़ परिवार के आसपास दुनिया भर के दलाल मंडराते ही हैं, और उनसे बचना कैसे चाहिए?

इसमें अनोखा कुछ भी नहीं है। सत्ता के इर्द-गिर्द दलालों और कारोबारियों के मंडराने का बड़ा पुराना इतिहास है। भारत के भी कई प्रधानमंत्रियों के आसपास इस किस्म के लोगों की चर्चा हमेशा से रहती आई है। आज देश के जो सबसे बड़े कारोबारी घराने हैं, उनमें से कुछ प्रधानमंत्री के स्तर पर देश की आयात-निर्यात नीतियों को प्रभावित करने, और फिर उनसे अंधाधुंध मुनाफा कमाने की तोहमत आधी सदी पहले भी झेल चुके हैं। एक वक्त सरकार और कारोबार में कम से कम जनता को दिखाने के लिए कुछ फासला रहता था। अब तो दुनिया के अधिकतर देशों में कारोबार ही सरकार पर हावी दिखते हैं, और शायद यह भी एक वजह है कि एक वक्त जो हिन्दुस्तान फिलीस्तीन का दोस्त और मददगार था, उस हिन्दुस्तान में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए ही अपना रूख पूरी तरह इजराइल की तरफ मोड़ दिया था। शायद इसलिए कि इजराइल से भारत की खरबों डॉलर की खरीदी होती थी, और उस वक्त ही इजराइल के निर्यात का आधे से अधिक आयात अकेले भारत में होता था। आज भी अगले अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने जिस तरह भारत से लेकर ब्राजील तक, और कनाडा के भी सामानों पर अमरीका में एक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही है, तो उससे भी हो सकता है कि इन देशों के कारोबारियों के कुछ एजेंट ट्रम्प परिवार को प्रभावित करने में लग चुके हों। वहां पर दलाली की जगह लॉबिंग शब्द का इस्तेमाल होता है, और उसे अधिक औपचारिक रूप से, थोड़ी सी अधिक इज्जत के साथ किया जाता है। ट्रम्प परिवार के कई लोग दुनिया के कारोबारियों से संबंध रखने के लिए जाने जाते हैं, और अब तो ट्रम्प के पास एलन मस्क सरीखे कारोबारी सहायक भी हैं, और दुनिया के अलग-अलग देशों के लिए, कारोबारियों के लिए अमरीकी सरकार की नीतियों को तय करने में मस्क सरीखे लोगों की भी भूमिका रहेगी।

आज अमरीका और चीन इन दो ध्रुवों के बीच कुछ या अधिक हद तक खेमों में बंटे हुए देशों को दुनिया भर के देशों में सत्ता के दलालों का भी ख्याल रखना पड़ता है। भारत में एक वक्त प्रधानमंत्री निवास में सत्ता के दलाल प्रधानमंत्री परिवार के एक सदस्य को मोटी रकम देकर पीएम से मुलाकात का इंतजाम करते थे, ऐसी चर्चा रहती थी। राज्यों में भी कई जगहों पर ब्रिटिश राजघराने की तरह के राज्यों के राजभवनों से दलाली और भ्रष्टाचार का सिलसिला चलता रहा है। कई जगहों पर सत्तारूढ़ नेता के परिवार खुलकर राजपाट में दखल और अपनी पहुंच बेचते दिखते हैं। ऐसे सिलसिले रोकने के लिए देश में संवैधानिक संस्थाओं का मजबूत होना जरूरी रहता है। जब सत्ता पर निगरानी रखने के लिए बनी संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और स्वायत्त रहती हैं, जिन पर मनोनीत लोग महज सत्ता के पसंदीदा नहीं रहते, वहीं पर शासन या संविधान प्रमुख लोगों के कुकर्मों पर निगरानी रखी जा सकती है। और जहां पर ऐसी निगरानी की कुर्सियां चहेतों को दी जाती हैं, वहां पर जांच एजेंसियों से लेकर संवैधानिक संस्थाओं तक का काम संदेह के घेरे में रहता है। आज अमरीका में ट्रम्प अपने एकदम चहेते लोगों को ऐसी तमाम नाजुक कुर्सियों पर बिठाने पर आमादा हैं, और उसका नतीजा एकदम साफ रहेगा। जब रोकने-टोकने वाले तमाम लोगों की जगह पर सिर्फ अपने चापलूस और दरबारी बिठा दिए जाते हैं, तो फिर मुखिया की गलतियों और गलत कामों की कोई सीमा नहीं रह जाती। जब आसपास के तमाम लोग ट्रम्प के यस मैन (वीमेन भी) रहेंगे, तो फिर कार्यकाल के अंत में वे बहुत से कलंक छोडक़र जाएंगे।

हमने ब्रिटिश राजघराने के एक प्रमुख सदस्य तक चीनी घुसपैठिए की शिनाख्त से यह बात शुरू की थी, और उसी पर अगर लौटें तो यह साफ दिखता है कि सरकार या संविधान प्रमुख परिवारों को अपने आपको सत्ता के दलालों से दूर रखना चाहिए। सत्ता तक पहुंच चुके नेताओं के सफल और महान होने के बीच में बहुत बड़ा फर्क रहता है। सत्ता पर काबिज होना एक सफलता रहती है, लेकिन महानता की राह वहां से शुरू भर होती है। हिन्दुस्तान में ही कई ऐसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री रहे, राष्ट्रपति और राज्यपाल रहे, जो कि किसी भी किस्म के विवाद से पूरी तरह दूर रहे, और उनमें से कोई एक पुरानी कार का कर्ज छोडक़र मरा, तो किसी ने विरासत में एक झोपड़ा की अपने कुनबे को दिया। एक राष्ट्रपति ऐसे भी रहे जिनके शपथ ग्रहण में उनके परिवार के कुछ लोग ट्रेन के साधारण दर्जे में सफर करके पहुंचे, और उसके बाद दुबारा कभी नहीं आए। कुछ ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे जिन्होंने किसी भी कारोबारी से अकेले मिलने से मना कर दिया, और वे व्यापारिक प्रतिनिधि मंडलों से ही मिलने को तैयार हुए। अब यह तो अलग-अलग लोगों के अपने मिजाज पर भी निर्भर करता है कि वे नैतिकता को कितना ओढऩा चाहते हैं, या उसे कचरे की टोकरी में डाल देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती।

(Daily Chhattisgarh)

दिल्ली के प्रदूषण से अधिक है देश में अंधविश्वासी अंधेरा

  17  दिसंबर 2024

 

देश में चारों तरफ से अंधविश्वास की खबरें आती हैं कि किस तरह किसी तांत्रिक के कहे लोग किसी बच्चे की बलि दे देते हैं, या टोनही कहते हुए किसी महिला को मार डालते हैं। कुछ जगहों पर जादू-टोने के शक में किसी बुुजुर्ग का भी कत्ल हुआ है। और अब ताजा मामला छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके का है जहां पर 35 बरस के एक गैरआदिवासी आदमी को शादी के 15 बरस बाद बेटा हुआ, और किसी तांत्रिक के चक्कर में मनौती मानने के लिए पांच महीने के बेटे के मुंडन के दिन ही एक जिंदा चूजा निगल लिया, और गले की नली में इसके फंस जाने से वह मर गया। मुंडन के जश्न के लिए घर पर इकट्ठा रिश्तेदारों के बीच उसके अंतिम संस्कार की तैयारियां होती रहीं। जिस बेटे के लिए 15 बरस कोशिश और मनौतियां चलीं, उसके साथ कुल 5 महीने जीना हो पाया। खबरें बताती हैं कि यह आदमी नियमित रूप से किसी तांत्रिक के संपर्क और चक्कर में रहता था। और मनौती भी मानी तो ऐसी भयानक कि जिंदा चूजे को निगल लेने की! 

अंधविश्वास को सिर्फ अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ेपन से जोडक़र देखना भी गलत होगा। बड़े-बड़े लोग तरह-तरह के धार्मिक और आध्यात्मिक पाखंडों में पड़े रहते हैं, बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े अफसर जाने कितने किस्म के तांत्रिक अनुष्ठान करवाते हैं। छत्तीसगढ़ में अभी ऐसी ही तंत्र साधना से जुड़े एक तांत्रिक की फरारी चल रही है जिसने राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान सत्ता के राजतंत्र को भी तंत्र साधना की तरह चलाया था, और जिसकी पेशाब से उन दिनों सत्ता के गलियारों में चिराग जला करते थे। इसलिए अंधविश्वास के शिकार होने की बात महज अनपढ़ या गरीब लोगों पर लागू नहीं होती, सत्ता और संपन्नता के आसमान पर पहुंचे हुए लोग भी परले दर्जे के अंधविश्वासी रहते हैं। हिन्दुस्तान में अंधविश्वासों का कोई अंत ही नहीं होता, जिन लोगों को दस अंधविश्वासों पर भरोसा होने लगता है, उनके सामने लोग और बीस अंधविश्वास पेश कर देते हैं क्योंकि उन्हें एक बेवकूफ ग्राहक मिल जाता है। 

धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान में किस-किस किस्म का पाखंड नहीं चलता! अगर कोई व्यक्ति चंगाई सभा के नाम पर किसी बड़ी सभा के मंच पर यह दावा करे कि उसकी प्रार्थना से अंधे देखने लगेंगे, और लंगड़े चलने लगेंगे, लोगों का लकवा ठीक हो जाएगा, तो इस पर भी भरोसा करने वाले दसियों हजार लोग रहते हैं। कोई व्यक्ति यह तरकीब सिखाए कि बेलपत्री पर शहद या चंदन लगाकर उसे शिवलिंग पर चढ़ा दिया जाए, तो बिल्कुल भी पढ़ाई न करने वाला बच्चा भी शर्तिया पास हो जाएगा, और इस पर न सिर्फ अंधभक्तों की भीड़ भरोसा करती है, बल्कि सत्ता के तमाम लोग भी ऐसे प्रवचनकर्ताओं की महिमा बढ़ाने का काम करते हैं, उन्हें स्थापित करते हैं। हिन्दुस्तान में हर सौ-पचास किलोमीटर पर कोई न कोई पाखंडी अंधविश्वास की दुकान चलाते मिल जाते हैं। 

कहने के लिए देश में अंधविश्वास फैलाने और चमत्कार दिखाने, गंभीर बीमारियां ठीक करने के दावों के खिलाफ बड़ा कड़ा कानून बना हुआ है। लेकिन फर्जी बाबाओं की शोहरत से वोट दुह लेने की नीयत के चलते सत्ता पर बैठे नेता ऐसे जुर्म पर कोई कार्रवाई नहीं होने देते। नतीजा यह होता है कि आसाराम नाम के पाखंडी संत से लेकर गांव-कस्बे के अघोरी-तांत्रिक होने का दावा करने वाले लोग भी अंधविश्वासी भक्तजनों से बलात्कार करते रहते हैं, और उनके कैद काटने के दौरान भी उनके भक्त उनकी पूजा करते रहते हैं। देश में जनता की वैज्ञानिक चेतना को मिट्टी में मिला दिया गया है। भयानक गर्मी की लू को देखते हुए जब शासन-प्रशासन लोगों को घर से न निकलने की सलाह देते हैं, तब लाखों की भीड़ का दावा करने वाले प्रवचनकर्ताओं को प्रवचन की इजाजत दी जाती है, फिर चाहे उसमें पहुंचे लोगों की मौत ही क्यों न हो जाए। लोग विज्ञान की जुटाई गई सहूलियतों का इस्तेमाल करते हुए धर्म और आध्यात्म के नाम पर किए जा रहे तमाम पाखंड को बढ़ावा देते हैं। प्लेन से लेकर कार तक, और लाउडस्पीकर से लेकर टीवी चैनलों तक, सब कुछ मुहैया तो विज्ञान की वजह से हुआ है, लेकिन वैज्ञानिक समझ को नाली में बहाकर लोग बाबाओं के कहे कहीं किसी का सिर काट रहे हैं, तो कहीं पर जिंदा चूजा निगलकर जान दे रहे हैं। 

भारत का संविधान सरकारों और नागरिकों से भी यह उम्मीद करता है कि वे वैज्ञानिक सोच, मानवता, और सवाल व सुधार की भावना का विकास करेंगे। संविधान की धारा 51-ए (एच) इस बात को हर नागरिक का दायित्व मानती है। लेकिन बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग इसके खिलाफ कामकाज करते हैं। देश में एक बहुत बड़ा तबका धर्म की मान्यताओं को विज्ञान से मिली समझ, और संविधान से दिए गए अधिकारों से ऊपर मानता है। इस बारे में विज्ञान के एक प्रोफेसर तेजल कानिटकर ने कुछ बरस पहले एक लेख में लिखा था कि देश के प्रतिष्ठित लोग अपने बयानों और कामों के जरिए संविधान की बातों का उल्लंघन कर रहे हैं, और यह देश के लिए बहुत नुकसानदेह है। अब हालत यह है कि धर्म और अंधविश्वास के बीच की सीमा रेखा खत्म हो चुकी है। धर्म और धर्मान्धता में कोई बड़ा फर्क नहीं रह गया, धर्मन्धता और साम्प्रदायिकता भाई-भाई हो गए हैं, और नफरत को एक धार्मिक काम मान लिया गया है। जब देश के लोगों की न्याय की समझ को इतना कमजोर कर दिया जाता है, विज्ञान के ऊपर अंधविश्वास को स्थापित कर दिया जाता है, तो फिर लोग 15 बरस की मनौती, या मेहनत से पैदा बच्चे के साथ खेलना छोडक़र, उसे प्यार करना छोडक़र, जिंदा चूजा खाकर मनौती पूरी कर रहे हैं, और मर जा रहे हैं। वैज्ञानिक चेतना लोगों में टुकड़े-टुकड़े में नहीं आ पाती, वह या तो आती है, या नहीं आती है। आज हिन्दुस्तान में जिस अंदाज में अंधविश्वास और कट्टरता को बढ़ाया जा रहा है, लोगों के दिमाग में अपने बच्चों को गोद में खिलाने के मुकाबले चूजा निगलकर जान देने में कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 17 दिसंबर 2024



 

दीवारों पर लिक्खा है, 16 दिसंबर 2024



 

हवा-पानी, और रोटी-छत के बाद सबसे जरूरी मुद्दे जलवायु परिवर्तन पर बात

 16  दिसंबर 2024

 

हिन्द महासागर के एक छोटे टापू मायोट में सदी का सबसे ताकतवर चक्रवाती तूफान टकराया है। कुल सवा तीन लाख आबादी वाले इस टापू पर फ्रांस का कब्जा है, और अभी वहां सैकड़ों लोगों के मारे जाने की आशंका है। फ्रांस सरकार की ओर से कहा गया है कि मौतों की गिनती हजार तक जा सकती है, और हजारों भी हो सकती है। यहां के एक नागरिक ने टेलीफोन पर बताया है कि वहां तबाही का मंजर किसी परमाणु युद्ध के बाद जैसा लग रहा है, और उसके बगल की पूरी बस्ती ही गायब हो गई है। अफ्रीका के करीब का यह टापू कभी ऐसी तबाही से नहीं गुजरा था। लेकिन हम इसी एक घटना को लेकर कुछ लिखना नहीं चाहते, पूरी दुनिया के लिए मौसम की अधिकतम बुरी मार इतनी जल्दी-जल्दी आ रही है, इतनी नई-नई जगहों पर नए किस्म की मार पड़ रही है कि तबाही का कोई अंदाज लगा पाना मुमकिन ही नहीं है।

हम यहां पर प्राकृतिक विपदाओं की बढ़ती भयावहता की लिस्ट गिनाना नहीं चाहते, उसे बड़ी आसानी से तलाशा जा सकता है। लेकिन मौसम के बदलाव के चलते बहुत सी ऐसी जगहों पर सूखा पड़ रहा है जहां बाढ़ आती थी, और जहां पर बाढ़ आती थी, वहां अब सूखा पड़ रहा है। बारिश के महीने बदल जा रहे हैं, और फसलों को पकने का भी वक्त कहीं-कहीं पर नहीं मिल रहा है। तमाम आशंकाओं से अधिक बर्फ गिर रही है, और कई इलाके बर्फबारी में पट जा रहे हैं, कोई देश बाढ़ से तबाह हो जा रहा है, और अफ्रीकी महाद्वीप के बहुत से देशों में पानी की कमी से ऐसा विस्थापन हो रहा है कि पूरा देश ही शरणार्थी की जिंदगी जी रहा है, और उनमें से बड़ी संख्या में लोग मौत के करीब हैं। इन सबके ऊपर फिक्र की बात यह है कि दुनिया के जिन संपन्न देशों की समान और साधन की खपत के चलते धरती पर मौसम का बदलाव हो रहा है, उनके बीच इस बदलाव को धीमा करने, इसके नुकसान की भरपाई करने, और आगे अपनी जीवनशैली को पर्यावरण के मुताबिक ढालने की कोई इच्छा नहीं है। अब एक खतरनाक घटना और हो गई है, अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए डोनल्ड ट्रंप चुन लिया गया है, और वह महज 25 दिन दूर रह गया है काम संभालने के। लोगों को याद होगा कि पिछली बार जब ट्रंप राष्ट्रपति बना था, तो उसने पर्यावरण बचाने और जलवायु परिवर्तन को धीमा करने की तमाम कोशिशों को दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन फ्रॉड कहा था, और जलवायु-समझौते को छोड़ भी दिया था। अब ट्रंप फिर अमरीका को संभालने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए विनाशकारी बहुत से विकसित, संपन्न, और पश्चिमी देशों की अगुवाई करने जा रहा है, और उसके चार बरस के कार्यकाल में धरती की किसी बेहतरी की उम्मीद करना मुश्किल होगा।

जलवायु परिवर्तन से बहुत से लोग अपने आपको सुरक्षित मानकर चलते हैं क्योंकि उन्हें उनकी संपन्नता की वजह से इस बात का भरोसा है कि धरती पर किसी सहूलियत के आखिरी दौर में भी वे सरकारी खर्च से, या अपनी गोरी या बुरी कमाई से उसे अपने लिए तो जुटा ही लेंगे। इसलिए उन्हें इस बात की फिक्र नहीं है कि धरती के ध्रुवों पर बर्फ किस रफ्तार से पिघल रही है, समंदर का पानी कितना ऊंचा जा रहा है, कितने शहर या देश अगले कुछ दशकों में डूबने वाले हैं, कहां पर सूखे की वजह से फसल खत्म होने वाली है, कहां पर बाढ़ की वजह से शहर खत्म हो रहे हैं, और कहां-कहां तूफान तबाही ला रहे हैं। अपनी खुद की सहूलियत की अगले कुछ दशकों की गारंटी लोगों को जिम्मेदार बनने ही नहीं दे रही है, और ऐसे लोग अपने देश के साथ-साथ दुनिया को बचाने के भी जिम्मेदार हैं। ऐसे में दुनिया के कमजोर देश, और उनके कमजोर लोग उम्मीद भी क्या कर सकते हैं? संपन्न का पैदा किया गया प्रदूषण विपन्न पर कहर बनकर टूटे पड़ रहा है, और विपन्न के हाथ उसे झेलने के अलावा और कुछ भी नहीं है।

दुनिया के लोगों को अपनी खपत की हवस को काबू में रखने के लिए कहना आसान इसलिए भी नहीं है कि बाजार इस हवस को कोंच-कोंचकर आगे बढ़ाते चलने में लगे रहता है। और चूंकि दुनिया की बहुत सी सरकारें अब कारोबार के हाथों काबू में हैं, सरकार के लोग कारोबार के पैसों से सत्ता में आते हैं, कारोबार के अघोषित भागीदार रहते हैं, और देश की कमाई के आंकड़ों को अधिक दिखाने में कारोबार काम भी आते हैं, इसलिए सरकारों की नीतियां कारोबार को बढ़ाने की रहती हैं, और इसका मतलब खपत बढ़ाना भी रहता है। कहीं डीजल-पेट्रोल की खपत बढ़ाना, कहीं बिजली, तो कहीं खनिजों से बनने वाले सामान की खपत बढ़ावा। और यह सब कुछ धरती पर कार्बन बढ़ाए बिना, प्रदूषण बढ़ाए बिना मुमकिन नहीं होता, एक जगह की खपत दूसरी जगह के लिए कहर में तब्दील हो जाती है। जिन गरीब देशों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कोई काम नहीं हैं, वहां भी मौसम की ऐसी बुरी मार पड़ रही है कि क्या पूछें।

दिक्कत यह है कि धरती एक है, उसकी जलवायु मिलीजुली और साझा सामान है, लेकिन जलवायु को बर्बाद करने का हक धरती पर नक्शों की सरहदों में बंटा हुआ है। और सबसे ताकतवर के हाथों सबसे अधिक तबाही हो रही है। ताकतवर देशों में सरकारों को बनाने और बिगाडऩे का काम कारोबार करते हैं, और पर्यावरण उनकी लागत में कहीं जगह नहीं पाता। यह सिलसिला इतना खतरनाक होते चल रहा है कि भारत में सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार की आपसी सहमति से जो नदी जोड़ परियोजना चल रही है, उसके बारे में भी एक आशंका खड़ी होती है कि आज जिन इलाकों से अधिक बाढ़ के पानी को देश के जिन सूखे इलाकों की नदियों में ले जाने के लिए देश का सबसे बड़ी लागत का प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है, उसका क्या इस्तेमाल रह जाएगा, अगर आज के बाढ़ वाले इलाके कल सूखे हो जाएंगे, और आज के सूखे इलाकों में कल बाढ़ आने लगेगी? मौसम का बदलाव किसी भी भविष्यवाणी से परे हो रहा है, और मौसम विज्ञानी भी तबाही के कुछ दिन पहले ही खतरे की सूचना दे पाते हैं, कई मामलों में महज कुछ घंटे पहले। ऐसे में कुदरत का कोड़ा तो पडऩा ही पडऩा है, संपन्न देश अपनी बीमा व्यवस्था की वजह से, और सरकार की आर्थिक ताकत की वजह से इसके बाद भी जिंदा रह लेंगे, लेकिन गरीब देशों की तो मौत है। दिक्कत यह है कि कहीं चार, और कहीं पांच बरस के लिए चुनी जाने वाली सरकारों के सामने जब अगली आधी-एक सदी की परवाह करने की चुनौती रहती है, तो वह बहुत आकर्षक चुनावी समीकरण नहीं रहती। आम जनता की जागरूकता कोशिश करके कमजोर और नीची रखी जाती है ताकि वह जिंदगी के असल मुद्दों को समझ न ले। और यह भी एक वजह है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण, और मौसम की मार जैसी बातों से अधिकतर दुनिया के तकरीबन तमाम आम लोग नावाकिफ और बेफिक्र रहते हैं। ऐसे में न सिर्फ तूफान से तबाही वाले इलाकों में बिजली चौपट हो जाने से अंधेरा है, बल्कि धरती का भविष्य ही अंधकारमय है। कम से कम नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाना जरूरी है, क्योंकि उसके सामने पहाड़ सी बाकी जिंदगी बाकी है, आज के नेताओं, और कारोबारियों की अधेड़ और बूढ़ी हो चली पीढ़ी को तो आधी सदी बाद के खतरे दिखने की कोई गुंजाइश है नहीं।

(Daily Chhattisgarh)

बेरोजगार जीते जी बराबर, और गुजर जाने पर भी...

 15  दिसंबर 2024

 

छत्तीसगढ़ में हफ्ते भर पहले अग्निवीर भर्ती की दौड़ में हिस्सा ले रहे एक बेरोजगार नौजवान की मौत हो गई थी। उस पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की ओर से दस लाख रूपए मुआवजे की घोषणा हुई थी। यह तेजी से शायद इसलिए भी हो पाया था कि राज्य के वित्तमंत्री ओ.पी.चौधरी के विधानसभा क्षेत्र रायगढ़ में यह घटना हुई थी। इसके बाद पिछले पांच-छह दिनों में दो अलग-अलग जगहों पर वनरक्षक भर्ती की शारीरिक परीक्षा के लिए दौड़ते हुए बेरोजगारों में से दो की मौत हुई। मुख्यमंत्री ने इनके लिए भी दस-दस लाख रूपए की राहत घोषित की है। टैक्स देने वाले लोगों को यह रकम बड़ी लग सकती है, लेकिन इस बात को समझने की जरूरत है कि अगर एक बेरोजगार शर्तों को पूरा करते हुए एक नौकरी पाने के लिए मुकाबले में शामिल हुआ था, और इसी दौरान उसकी मौत हुई थी, तो उसके परिवार का ऐसे किसी मुआवजे या राहत का हक तो बनता है। और यह बात भी ठीक है कि चाहे देश में चर्चित अग्निवीर के लिए भर्ती हो, या प्रदेश के वनरक्षक के लिए, या प्रदेश में पुलिस भर्ती के लिए हो, अगर मुकाबले के दौरान बेरोजगार के साथ ऐसा हादसा होता है तो सरकार को उसके परिवार को मदद करनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि राज्य को ऐसा एक पैमाना तय कर देना चाहिए कि भर्ती के दौरान ऐसा तकलीफदेह हादसा सामने आने पर बिना किसी अतिरिक्त मंजूरी के सरकार परिवार के साथ खड़ी रहे।

बहुत से नौजवान ऐसे मुकाबलों के लायक शारीरिक रूप से चुस्त नहीं रहते हैं, इतने दौडऩे की आदत नहीं रहती है, और कभी-कभी ऐसी मौतें सुनाई पड़ती हैं। सरकार या सेना, जो भी भर्ती कर रहे हों, उन्हें बहुत लंबी दौड़ करवाने के पहले कुछ छोटी दौड़ करवाकर लोगों की क्षमता बढ़वाने की कोशिश भी करनी चाहिए, ताकि ऐसे हादसे कम हो सकें। जिस तरह कई प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सरकारें कोचिंग और प्रशिक्षण का इंतजाम करती हैं, ऐसे कड़े शारीरिक मुकाबले के लिए भी सरकार को अलग-अलग शहरों में खिलाडिय़ों, या खेल शिक्षकों की अगुवाई में ऐसी तैयारी करवानी चाहिए। कुछ बड़े शहरों में कुछ कोचिंग सेंटर ऐसे शारीरिक इम्तिहानों के लिए नौजवानों को तैयार करवाते दिखते भी हैं, लेकिन जो लोग उनकी फीस न उठा सकें, उनके लिए भी सरकार या खेल संगठनों को क्षमता विकास की कोशिश करनी चाहिए।   

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 दिसंबर 2024