4 इंजनों की कमल एक्सप्रेस, इतनी ताकत भी एक चुनौती

15 फरवरी 2025 

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जहां हमारे अखबार का दफ्तर है, वहां सवा साल से नगाड़े ही नगाड़े सुनाई पड़ रहे हैं। ठीक सामने भाजपा का दफ्तर है, और विधानसभा चुनाव से जो शुरूआत हुई, वह लोकसभा चुनाव से होते हुए अब म्युनिसिपल चुनावों तक जारी है, और कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो भाजपा लगातार हर सत्ता पर काबिज हो रही है। पहले छत्तीसगढ़ विधानसभा में भाजपा को उसकी खुद की उम्मीद से बहुत अधिक सीटें मिलीं, और जो कांग्रेस उम्मीद से थी, उसकी बड़ी शर्मनाक हार हुई। लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास पहले से दो सीटें थीं, वे घटकर एक रह गई, और श्रीमती ज्योत्सना महंत ने डबल इंजन की ताकत से डॉ.चरणदास महंत के साथ मिलकर इस प्रदेश में कांग्रेस की नाक बचा ली, वरना लोकसभा में छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के कोई नामलेवा नहीं रहते। अब पंचायत और म्युनिसिपल  चुनाव की मतगणना चल रही है तो प्रदेश के सभी दस नगर निगमों में महापौर पद पर भाजपा का कब्जा तकरीबन तय दिख रहा है। 49 नगरपालिकाओं में इस पल 36 पर भाजपा, 8 पर कांग्रेस, और 5 पर अन्य उम्मीदवार पालिका अध्यक्ष बनते दिख रहे हैं। इसी तरह 114 नगर पंचायतों में से 84 के मुखिया भाजपा के लोग बन रहे हैं, 20 पर कांग्रेस के, और 10 पर अन्य। वार्डों में भी बहुत बड़ा बहमुत भाजपा के उम्मीदवारों के साथ है। कांग्रेस अपनी हार मान चुकी है।

अब प्रदेश में अधिकतर जगहों पर म्युनिसिपल के मुखिया भाजपा के रहेंगे, और अधिकतर वार्डों में पार्षद भी। दिल्ली में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है, और विधानसभा चुनावों में भाजपा अपनी जीत के बाद लोकसभा में डबल इंजन के नाम पर वोट मांग रही थी। म्युनिसिपल चुनावों में भाजपा ने तीन इंजन के नाम पर वोट मांगे, और वार्डों में जहां भाजपा है वहां तो पीएम से पार्षद तक सारी सत्ता भाजपा के पास रहेगी, और चार इंजन की सरकार ऐसे वार्डों में रहेगी। जिस वार्ड की रेलगाड़ी में चार-चार इंजन लगे हों, वहां चूक के खतरे भी बढ़ जाते हैं। आज नगाड़ों के बीच नसीहत का मौका नहीं है, लेकिन बधाई देने की औपचारिकता तो आम लोग कर ही रहे हैं, हमारे सरीखे फिक्रमंद लोग पटाखों के बीच भी कुछ तेज आवाज में सावधानी बरतने की नसीहत देते रहते हैं। भाजपा को नगरीय शासन के म्युनिसिपल और वार्डों में मिले भारी बहुमत के साथ-साथ उतनी ही भारी सावधानी भी बरतनी चाहिए। पंचायत और म्युनिसिपल चुनावों में आमतौर पर अधिकतर लोग बार-बार नहीं जीतते क्योंकि एक कार्यकाल पूरा होते-होते या तो लोगों की नाराजगी उनके खिलाफ हो जाती है, या उनके भ्रष्टाचार के किस्से प्रचलन में आ जाते हैं, या अगर पार्षद और महापौर-अध्यक्ष जरूरत से अधिक ईमानदार और कड़े रहते हैं, तो उससे भी लोग खफा हो जाते हैं। कुल मिलाकर चुनाव जितना छोटा रहता है, उतना ही खतरनाक रहता है। छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी रायपुर में तरूण चटर्जी विधानसभा का चुनाव बार-बार जीतने के लिए जाने जाते थे, महापौर भी बनते थे, लेकिन जब वार्ड का चुनाव लड़ा, तो अपने घर से ही हार गए थे। इसलिए जब राज्य शासन के नगरीय प्रशासन विभाग से सहूलियत और सुरक्षा हासिल रहेगी, जब महापौर और अध्यक्ष भाजपा के रहेंगे, तब पार्षद भी भाजपा के रहें तो चार इंजनों की यह रेलगाड़ी समझदारी की पटरी से न उतरे इसका ख्याल भी भाजपा को रखना होगा।

इसके साथ-साथ अब भाजपा अगले करीब चार बरस में अगले विधानसभा चुनाव तक एक कड़ी चुनौती को न्यौता दे चुकी है। अब देश, प्रदेश, शहर, और वार्ड इन तमाम जगहों पर भाजपा के लोगों की ही बहुतायत होने से किसी काम के न होने का कोई बहाना भी नहीं चलेगा, और न ही कोई सफाई दी जा सकेगी। ऐसे दिखने लायक और असरदार काम करना पहले दिन से भाजपा के निर्वाचित नेताओं के सामने चुनौती रहेगी। इस नौबत में संभावनाएं भी खूब हैं, और ताकत के एक ही पार्टी में इकट्ठा हो जाने के खतरे भी रहेंगे। भाजपा के नेता प्रदेश की अधिकतर जगहों पर किसी को किसी काम के लिए मना नहीं कर पाएंगे, और भाजपा के अपने लोगों के किसी गलत काम को रोकने की नौबत भी नहीं रहेगी। जब ताकत बहुत अधिक आ जाती है, तो कई किस्म की गलतियां होने का खतरा भी रहता है। हमने राजीव गांधी की सरकार को ऐतिहासिक संसदीय बाहुबल के चलते शाहबानो जैसा भयानक गलत काम करते देखा है। और यूपीए-1 सरकार जो कि बाहरी वामपंथी समर्थन से चल रही थी उसे ठीक काम करते देखा है, और जब यूपीए-2 सरकार को समर्थन की जरूरत नहीं रह गई, तब उसमें होने वाले बड़े-बड़े भ्रष्टाचार भी देखे हैं।

लेकिन यह मौका भाजपा के देश के सबसे कामयाब ब्राँड बन जाने का एक और सुबूत है। कमल छाप की पैकिंग में कई कमजोर उम्मीदवार भी जनता के बीच चल जा रहे हैं। पार्टी ने उम्मीदवार छांटने से लेकर आखिरी वोट डलवाने तक के पूरे सिलसिले पर जैसी मजबूत पकड़ बनाई है, वह देखने लायक है। देश में ऐसी मजबूत चुनावी मशीनरी कभी किसी दूसरी पार्टी के पास नहीं रही, और जो राजनीतिक दल भाजपा से सहमत नहीं होते, उन्हें भी उससे दर्जनों चीजें सीखने की जरूरत है। लोकतंत्र में चुनाव जीतकर ही कोई पार्टी अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू कर सकती है, इसलिए अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव जीतने का अपना महत्व रहता है। लगातार चुनाव हारने पर भी चैन से घर बैठने का हुनर लोग कांग्रेस से सीख सकते हैं, और एक चुनाव जीतते ही अगला चुनाव चाहे जितना भी दूर हो, उसकी तैयारी में लग जाने की जीवट सोच लोग भाजपा से सीख सकते हैं। यह बात ठीक है कि म्युनिसिपल और पंचायत चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी को कुछ फायदा हो सकता है क्योंकि लोगों को लगता है कि सत्ता के साथ जाने से ही उनके इलाकों में काम हो पाएगा, लेकिन सवा साल पहले के विधानसभा चुनाव के वक्त तो प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी बड़ी मजबूत थी, और संपन्न भी थी, लेकिन वह बुरी तरह निपट भी गई। इसलिए सत्ता की ताकत हर चुनाव में काम आए यह भी जरूरी नहीं है। एक बेकाबू और बेहद ताकत सत्ता को किस तरह बेदखल कर देती है, यह छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव में देखा हुआ है, और इसलिए अब इस प्रदेश में भाजपा को राज्य सरकार से लेकर म्युनिसिपलों तक सावधानी से काम करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार के सवा साल के कार्यकाल को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि महतारी वंदन सरीखी कई योजनाओं का असर लोकसभा में भी दिखा, और अभी म्युनिसिपल में भी। इसके साथ-साथ पांच बरस के कांग्रेस कार्यकाल के भ्रष्टाचारों से अभी तक जांच एजेंसियों, अदालतों से आने वाली खबरें तकरीबन रोज ही मीडिया में छाई रहती हैं, और उस कार्यकाल की छाया जनता के दिमाग से हटी नहीं है।

आखिर में अब पंचायत के सामने खड़े हुए मतदान को देखें तो लगता है कि म्युनिसिपल चुनावों के नतीजों का उस पर असर पड़ेगा, और वहां भी हो सकता है कि भाजपा के चुने हुए उम्मीदवारों को बहुमत मिल जाए। प्रदेश में हर स्तर पर एक निर्बाध ताकत भाजपा के लिए एक अंदरुनी चुनौती भी रहेगी, लेकिन सफलता से बहस नहीं होती, इसलिए बाकी सरकारों की तरह शहर सरकारों को भी हंड्रेड-डे-हनीमून का हक है।

और चलते-चलते यह चर्चा भी जरूरी है कि प्रदेश का हर चुनाव बुरी तरह हरवाने के बाद अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की बिदाई का वक्त है, और कांग्रेस देश भर में अपने संगठन में बदलाव कर रही है, छत्तीसगढ़ के सबसे ताकतवर कांग्रेस नेता भूपेश बघेल को पंजाब का प्रभारी बनाकर दिल्ली बुलाया गया है, और यह मौका इस राज्य में कांग्रेस को अपना घर सुधारने का भी है। शायद टी.एस.सिंहदेव को इसके लायक समझा जाए। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 15 फरवरी 2025



 

अमरीकी राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल करते कारोबारी से भारतीय पीएम की मुलाकात

14 फरवरी 2025 

 

भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस के बाद अब अमरीका पहुंचे हैं, तो राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ उनकी बहुत महत्वपूर्ण बैठकें हुई हैं। बिफरे हुए सांड के अंदाज में (इस मिसाल के लिए सांड से क्षमायाचना सहित) पूरी दुनिया को चकनाचूर करने में ओवरटाइम कर रहे ट्रम्प भारत के साथ कैसा सुलूक करते हैं इस पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। आज दुनिया का हर महत्वपूर्ण, या अमरीका के लिए नाजुक देश बारीकी से यह देख रहा है कि ट्रम्प उसका क्या भविष्य तय करते हैं, और हिन्दुस्तान भी अमरीका के लिए एक महत्वपूर्ण देश है। मोदी और ट्रम्प की मुलाकात वाले इस दौरे में भारत ने अमरीकी फौजी विमान खरीदने का भी कोई सौदा किया है, और इसकी शर्तें, मोलभाव अभी सामने नहीं आए हैं। फिर भी यह बात साफ है कि ट्रम्प दुनिया के हर देश के साथ आयात-निर्यात का व्यापार संतुलन बराबर करना चाह रहे हैं, और ऐसे में भारत से अमरीका जाने वाले सामानों पर भी कोई टैरिफ लगे या न लगे, इस पर भारतीय कारोबार की नींद हराम हो रखी है, भारतीय शेयर बाजार चौपट पड़ा है। फिर भी इस बात पर गौर करना जरूरी है कि मोदी ट्रम्प से पहले मिलने वाले दो-चार विदेशी शासन प्रमुखों में से एक हैं। इस बारे में बाकी जानकारी अभी खबरों में आती रहेगी, लेकिन आज एक दूसरे मुद्दे पर चर्चा करना जरूरी है।

नरेन्द्र मोदी की एक दूसरी तस्वीर आई है ट्रम्प के सबसे बड़े कारोबारी सहयोगी, टेस्ला नाम की दुनिया की सबसे बड़ी बैटरी कार कंपनी, एक अंतरिक्ष कंपनी, ट्विटर (एक्स) सहित और कई कारोबारों वाले एलन मस्क के साथ मुलाकात की। एलन मस्क के दो छोटे-छोटे बच्चों से मिलते हुए मोदी उन्हें तोहफे दे रहे हैं। जाहिर है कि यह मुलाकात इसी तरह होनी थी, और इसके लिए मोदी तैयार होकर गए थे। एलन मस्क की ताकत का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे भारतीय प्रधानमंत्री के साथ मस्क की ऐसी औपचारिक बैठक भी हो रही है, और वे अपने बच्चों को भी अमरीकी राष्ट्रपति भवन में ही मोदी से मिलवा रहे हैं। यह तो मेजबान की मर्जी की बात है कि वे मुलाकात के दौरान किसे साथ में रखें। मस्क के पास अमरीकी राष्ट्रपति का दिया हुआ ऐसा एक भी जिम्मा नहीं है कि भारतीय प्रधानमंत्री के साथ वे अमरीकी सरकार के प्रतिनिधि की हैसियत से कोई बात कर सकें। मस्क को ट्रम्प ने सिर्फ यह काम दिया है कि अमरीकी सरकार में फिजूलखर्ची को किस तरह घटाया जा सकता है। यह निहायत ही घरेलू काम है, और इसका अमरीका के बाहर कोई लेना-देना नहीं है। अब ऐसे में राष्ट्रपति भवन में ही आए हुए भारतीय प्रधानमंत्री से मस्क की यह मुलाकात अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कुछ नए पहलू सामने रखती है। एक तो यह कि दुनिया का सबसे संपन्न आदमी भारतीय प्रधानमंत्री से इस तरह मिल रहा है। हो सकता है कि यह भारत के भी कारोबारी हित में हो, और किसी देश के शासन प्रमुख के लिए कारोबारियों से भी अकेले मिलने में कोई अटपटी बात नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या एक अमरीकी कारोबारी अमरीकी राष्ट्रपति भवन का इस्तेमाल ऐसी बैठक के लिए कर सकता है, या फिर दूसरा सवाल यह है कि अगर वह राष्ट्रपति भवन में अपने कारोबार से परे मिल रहा है तो वह राष्ट्रपति या सरकार का किस हैसियत से प्रतिनिधित्व कर रहा है? दिक्कत मोदी के साथ नहीं थी, दिक्कत एलन मस्क की अमरीकी सरकार में हैसियत के साथ है, मस्क अमरीकी सरकार के साथ खरबों का कारोबार करने वाला, अमरीका के दूसरे कारोबारियों के साथ दुश्मनी रखने वाला, और दुनिया के बहुत से दूसरे देशों में अपने बिखरे हुए कारोबार वाला व्यक्ति है। वह राष्ट्रपति ट्रम्प के सिर पर एक साए की तरह छाया हुआ दिखता है, और बहुत बड़ी अमरीकी पत्रिका, टाईम ने अभी एलन मस्क को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे हुए एक तस्वीर बनाकर तंज कसा था कि वे अघोषित राष्ट्रपति हैं।

हम याद दिलाना चाहेंगे कि अभी ट्रम्प ने राष्ट्रपति भवन के अपने दफ्तर, ओवल ऑफिस में मीडिया से बात की, तो वहीं बगल में एलन मस्क खड़े हुए थे, अपने बेटे को अपने कंधों पर चढ़ाकर रखा था, और मीडिया के सवालों के जवाब वे उसी अंदाज में दे रहे थे। उनके बच्चे राष्ट्रपति के टेबिल के आसपास खेल रहे थे, मस्क की गोद और गर्दन पर चढ़े हुए थे, और बगल में बैठे राष्ट्रपति मस्क को जवाब देते भी सुन रहे थे। यह एक बहुत ही अनोखी, अटपटी, और असाधारण नौबत है जब दुनिया का सबसे रईस आदमी, अमरीकी सरकार के साथ कारोबार करने वाला एक सबसे बड़ा कारोबारी, ट्रम्प के ही टक्कर का सनकी, और वैसी ही भयानक पसंद और नापसंद रखने वाला व्यक्ति अगर अमरीकी राष्ट्रपति के इतिहास में ऐसी अभूतपूर्व ताकत रखता है, तो उसे क्या कहा जाए! खुद डोनल्ड ट्रम्प का परिवार उनके इस कार्यकाल में शपथ ग्रहण के बाद से नहीं दिख रहा है, और उनके इर्द-गिर्द एलन मस्क अपनी सरकारी जिम्मेदारी से परे हर अंतरराष्ट्रीय मामले में टांग अड़ाते हुए रात-दिन दिख रहे हैं।

अमरीकी सरकार की फिजूलखर्ची घटाने की सरकारी जिम्मेदारी से परे एलन मस्क दुनिया के बहुत से देशों के साथ अमरीका के रिश्तों को प्रभावित करने वाले सनकी बयान देते आ रहे हैं। वे ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों की घरेलू राजनीति की जटिलताओं में किसी एक पक्ष के हिमायती होकर किसी दूसरे को हराने के बयान दे रहे हैं, और अमरीका की ऐसी अघोषित विदेश नीति किसी ने देखी नहीं थी, बल्कि दुनिया के किसी भी देश में सरकार पर किसी प्रेतछाया की तरह मंडराने वाला ऐसा इंसान कभी नहीं रहा है। सरकारों के पसंदीदा कारोबारी रहते हैं, इसमें तो कोई लुकीछिपी बात नहीं है, लेकिन सरकार पर अपनी पसंद इस हद तक थोपने का असर रखने वाले ऐसे कारोबारी दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में इसके पहले देखने नहीं मिले हैं। कारोबारी अगर सरकारों पर अपना असर रखते भी हैं तो वह बंद कमरों की बात रहती है, अमरीकी राष्ट्रपति की मीडिया से औपचारिक बातचीत के दौरान उनका कारोबारी दोस्त इस तरह बच्चे को कंधे पर चढ़ाए हुए उन्हीं के दफ्तर में मीडिया के सवालों के जवाब देता रहे, और यह कहता रहे कि हो सकता है कि उसके पहले के कई बयान तथ्यों से परे के रहे हों। अमरीका की विदेश नीति, और अमरीकी सरकार के रूख और उसकी रणनीति दिखाने वाले ऐसे बयान अगर तथ्यों के ठीक खिलाफ दिए गए हैं, तो एलन मस्क किस हैसियत से ऐसा कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, और इससे अमरीका के अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर क्या असर होगा, ऐसे सवाल डोनल्ड ट्रम्प के अलावा दुनिया के हर जानकार के मन में उठ रहे होंगे।

हम सरकार और कारोबार का ऐसा घालमेल दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में देखना नहीं चाहते। यह क्रोनी कैपिटलिज्म से बहुत आगे की बात है, और यह पूरे लोकतंत्र को हाईजैक कर लेने का मामला है। ट्रम्प का यह कार्यकाल चार साल के कुछ पहले खत्म हो जाएगा, और अमरीकी संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक वे इसके बाद कभी अमरीकी सरकार में कुछ नहीं बन सकेंगे, लेकिन उनकी दी हुई ताकत से एलन मस्क आज अमरीका की सरकार, उसके विदेश नीति, उसके कारोबार को जिस तरह से हांक रहे हैं, वह हक्का-बक्का करने वाला है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 14 फरवरी 2025





 

बेघरों के सिर पर छत की मांग के बीच सुप्रीम कोर्ट में चर्चा रेवडिय़ों की भी

 13 फरवरी 2025 

 

दिल्ली में शहरी बेघरों के लिए सिर पर छत की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जज, जस्टिस बी.आर.गवई ने सवाल किया कि क्या चुनावों के पहले जिन रेवडिय़ों की घोषणा की जाती है, क्या उनकी बजाय बेघरों को समाज की मूलधारा में लाने की बात नहीं करनी चाहिए ताकि वे भी राष्ट्र की मूलधारा में योगदान कर सकें? जज ने सरकार की तरफ से दाखिल जवाब में इस बात के जिक्र पर भी अफसोस किया कि उसमें बेघरों को दी जाने वाली सुविधाओं का जिक्र है बजाय इसके कि उन्हें किसी काम से लगाया जाए। जज ने पूछा कि क्या हम परजीवियों के एक तबके का निर्माण नहीं कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि इन्हीं चुनावी-रेवडिय़ों की वजह से लोग अब काम करना नहीं चाहते हैं। उन्हें मुफ्त का राशन मिल रहा है जो कि बिना काम किए दिया जा रहा है। उन्होंने अपने निजी अनुभव गिनाते हुए कहा कि उनके किसान परिवार में अब महाराष्ट्र में इन्हीं चुनावी फ्रीबीज की वजह से खेतों में मजदूर नहीं मिल रहे हैं क्योंकि सबको घर बैठे बहुत कुछ मुफ्त मिल रहा है। जनहित याचिका की तरफ से नामी वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि दिल्ली सरकार के चलाए जा रहे शेल्टरों की हालत इतनी खराब है कि उस वजह से भी बेघर लोग वहां जाना नहीं चाहते हैं। इस पर जज ने पूछा कि क्या ऐसे शेल्टर की हालत सडक़ पर सोने से भी ज्यादा खराब है, लोग इन दोनों में से किसे पसंद करेंगे? जस्टिस गवई ने अपना विचार रखा कि लोगों को मुफ्त में चीजें मिलती हैं तो वे अलाल होते जा रहे हैं लेकिन उन्होंने साथ-साथ यह भी माना कि सिर छुपाने का हक लोगों का बुनियादी हक है, और जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे पर तो विचार करना ही है।

चुनावों में किस तरह की लुभावनी घोषणाएं की जाएं, और कैसी न की जाएं इस पर कुछ जनहित याचिकाएं पहले से सुप्रीम कोर्ट में चली आ रही हैं, और पिछले मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ की अगुवाई में एक बेंच इसकी सुनवाई कर रही थी लेकिन यह मामला उनके रिटायर होने तक पूरा नहीं हो पाया था इसलिए इसे अगले मुख्य न्यायाधीश के आने के बाद किसी नई बेंच के सामने पेश करने की बात कहते हुए जस्टिस चन्द्रचूड़ ने इसे रोक दिया था। लेकिन लोकसभा का आम चुनाव निपट जाने की वजह से इसे अधिक प्राथमिकता नहीं मिल पाई, और सुप्रीम कोर्ट में दर्जनों मामले दस-दस, बीस-बीस बरस से चले आ रहे हैं, और कई मामले व्यापक और तात्कालिक महत्व के रहते हैं, इसलिए मुख्य न्यायाधीश की निजी पसंद-नापसंद पर भी यह रहता है कि वे किन मामलों को पहले देखें। फिलहाल चुनावों में फ्रीबीज का मामला अभी तक किसी किनारे पहुंचा नहीं है, और जस्टिस गवई ने एक दूसरी जनहित याचिका के दौरान वकीलों से चर्चा में यह मौखिक विचार सामने रखा था कि चुनावी तोहफों के बजाय लोगों को स्थाई रूप से देश के कामकाज की मूलधारा में लाया जाना बेहतर होगा।

हम इसी पहलू पर चर्चा करना चाहते हैं कि मध्यप्रदेश से शुरू हुई लाड़ली बहना, छत्तीसगढ़ में चाउर वाले बाबा रमन सिंह की भारी कामयाब पीडीएस प्रणाली, तमिलनाडु में शुरू स्कूलों में सुबह का नाश्ता, और एक-एक करके देश के दर्जन भर राज्यों में अब चल निकली उन राज्यों की महतारियों के लिए सीधे नगदी की योजना का कोई अंत नहीं है। केन्द्र सरकार 80 करोड़ लोगों को हर महीने 5-5 किलो अनाज दे रही है, जिन ग्रामीण इलाकों में रोजगार नहीं रहता, वहां पर मनरेगा जैसी रोजगार योजना ने लोगों को भूखों मरने से बचाया है। इसके अलावा गरीब जोड़ों की शादियां, मुफ्त बिजली, मुफ्त पढ़ाई, मुफ्त इलाज जैसी बहुत सी योजनाएं हैं जिनके मुफ्त शब्द पर कई लोगों को आपत्ति भी होती है कि ये जनता के अपने पैसों पर चल रही हैं, और इन्हें मुफ्त कहना एक गलत शब्दावली है। हम भाषा की बारीकी पर गए बिना यह जरूर सोचते हैं कि वोट पाने के लिए चुनावी तोहफों की शक्ल में राजनीतिक दल जितने वायदे करते हैं, उनके बाद सरकार के बजट में अधिक लचीलापन नहीं बचता है। और जब एक-एक योजना एक-एक राज्य में करोड़ों लोगों को फायदा देने वाली रहती है, तो यह बात तो जाहिर रहती ही है कि इसमें लोगों की बारीक शिनाख्त नहीं हो पाती, और इनमें एक पर्याप्त बड़ा हिस्सा अपात्र लोगों का भी रहता है। अब एक तरफ सरकारें लोगों को रोजगार देने, या किसी उत्पादक और मुनाफे वाले कामकाज में लगाने से कतराती हैं, और उन्हें सीधे फायदा पहुंचाकर उनसे वोट पाकर किसी तरह पांच साल की सरकार बना लेना चाहती हैं। अर्थशास्त्र के हिसाब से इसमें दो खराबियां हैं। एक तो यह जब इतने व्यापक तबके को किसी योजना में हितग्राही बनाया जाता है, तो उसमें अपात्र लोगों की शिनाख्त मुमकिन नहीं हो पाती। दूसरी बात यह रहती है कि बजट का इतना बड़ा हिस्सा गैररोजगारोन्मूलक कामों में चले जाता है कि देश को इन रेवडिय़ों के एवज में आर्थिक उत्पादकता कुछ नहीं मिलती। अधिक से अधिक गरीब तबकों का पेट भर जाता है, उन्हें दारू पीने को हजार-दो हजार रूपए महीने मिल जाते हैं, राजनीतिक दलों को इसके एवज में वोट मिल जाते हैं, लेकिन यह कीमत खासी महंगी पड़ती है। सरकार बनाने के कुछ अधिक गंभीर तरीके होने चाहिए, बजाय महज लुभावनी योजनाओं से वोटरों को फांसने के, और फिर बजट का बहुत बड़ा हिस्सा उन वायदों को पूरा करने में खर्च करने के।

लोकतंत्र में सरकारों को अपनी कमाई अपनी मर्जी से खर्च करने की तकरीबन पूरी छूट है। और अब तो देश में योजना आयोग भी नहीं रह गया है जहां राज्यों को कमाई और खर्च के अपने आंकड़ों को पेश करना होता था। अब सब कुछ अधिक मनमर्जी से अधिक दूर तक चलने वाला सिलसिला हो गया है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले को आगे बढऩा चाहिए, चुनाव आयोग में तो एक किस्म से अपने हाथ झाड़ लिए हैं, लेकिन मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों, और सरकारों को जवाब देना चाहिए कि क्या रेवडिय़ों की बोलियों के बीच मेहनत से कमाने-खाने की चर्चा की कोई गुंजाइश रहनी चाहिए, या फिर देश की जनता को निकम्मा बनाने की कुछ और योजनाओं के बारे में कुछ सोचा जाए? अगर देश की एक बहुत बड़ी आबादी सिर्फ सरकारी मदद और रियायतों की वजह से सामाजिक-मानवीय पैमानों पर एक ठीकठाक जिंदगी जी रही है, तो क्या इसे उस समाज की आर्थिक उत्पादकता भी माना जा सकता है? ये सवाल बड़े अलोकप्रिय, गरीब-विरोधी, और पूंजीवादी लग सकते हैं, लेकिन देश की पूरी अर्थव्यवस्था पूंजीवादी होने के साथ-साथ चुनावी रेवडिय़ों पर आधारित अर्थव्यवस्था भी हो गई है। इस नौबत को सुधारने के रास्ते सुप्रीम कोर्ट में इस बहस के दौरान सामने आ सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 13 फरवरी 2025



 

चुनावी दबावमुक्त काम करने के लगातार 3 बरस, सरकार कुछ कर दिखाए

12 फरवरी 2025 

 

देश में वन नेशन-वन इलेक्शन लागू करने की केन्द्र सरकार की पूरी तैयारी है, लेकिन संसद और अलग-अलग विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ करवाने में कई तरह की संवैधानिक दिक्कतें आएंगी, कुछ विधानसभाओं का कार्यकाल कम करना पड़ेगा, कुछ का कार्यकाल पूरा हो जाने पर या तो वही सरकार जारी रखनी होगी, या फिर कुछ महीनों का राष्ट्रपति शासन लगाना होगा, ऐसे कई संवैधानिक फेरबदल जरूरी होंगे। हमने बड़े लंबे समय से चुनावों को एक साथ करवाने की वकालत की है। इसके पीछे चुनावी खर्च में कमी का तर्क नहीं है, बल्कि बड़ा मुद्दा यह है कि अलग-अलग चुनाव होते रहने से देश-प्रदेश की सरकारें हर कुछ बरस में तनाव में रहती हैं कि मतदाताओं को कैसे खुश रखा जाए, कौन से ऐसे जरूरी सरकारी कदम न उठाए जाएं जिनसे लोग नाराज हो सकते हैं। अब छत्तीसगढ़ इसकी एक मिसाल है जहां पर विधानसभा चुनावों के छह महीने बाद लोकसभा के चुनाव होते हैं, और उनके करीब छह महीने बाद पंचायत और म्युनिसिपल के। ये तीनों चुनाव सवा साल से अधिक समय तक चलते रहते हैं, और इनमें आधे समय तो आचार संहिता ही लगी रहती है जिससे काम और कारोबार दोनों ही बहुत बुरी तरह प्रभावित होते हैं। लोगों को यह अंदाज नहीं है कि ढाई महीने तक चली लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के दौरान जब राजनीतिक दलों और राजनेताओं वाले, सरकारी या राजकीय कार्यक्रमों के न होने पर कितने किस्म के कारोबार बहुत बुरी तरह प्रभावित होते हैं। खुद अखबारों में सरकार के और राजनीतिक कार्यक्रमों के इश्तहार छपना बंद हो जाता है, और जो अखबार पार्टियों और उम्मीदवारों से वसूली-उगाही नहीं करते हैं, वे और अधिक मुसीबत में आ जाते हैं। ऐसे में अब जब छत्तीसगढ़ इन तीनों चुनावों को निपटाने के करीब है, और सरकार के सवा साल हो चुके हैं, तब चुनाव मुक्त आगे के कार्यकाल की जमकर तैयारी करनी चाहिए। आखिरी का एक साल फिर चुनावी दबावों का रहता है कि उस वक्त कोई कड़ाई नहीं बरती जा सकती, इसलिए सरकार को ये चुनावमुक्त करीब ढाई बरस जमकर इस्तेमाल करने चाहिए।

जैसे किसी खेल के मैदान पर होता है, सामने के खिलाडिय़ों के बीच से रास्ता निकालकर गेंद आगे बढ़ाई जाती है, उसी तरह राज्य सरकारों को यह चुनावमुक्त गलियारा तेजी से आगे बढऩे के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, और इसके लिए तुरंत भिडऩा चाहिए। मुख्यमंत्री की तमाम घोषणाओं के बावजूद सडक़ सुरक्षा के लिए कुछ नहीं हो पा रहा है, पुलिस के पास चुनावों का एक बहाना भी रहता है कि पुलिस बल उसमें उलझ जाता है इसलिए ट्रैफिक सुधारने की गुंजाइश नहीं रहती। अब चुनावों से आजादी है, और प्रदेश में एक काबिल डीजीपी भी काम संभाल चुके हैं। अरूणदेव गौतम इस कुर्सी पर आने के पहले भी सडक़ सुरक्षा के मामले में राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पेश होते आए हैं, या वहां जवाब दाखिल करने के जिम्मेदार रहे हैं, इसलिए वे इस बात को बेहतर समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट सडक़ सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है। अगर सरकार एक ईमानदार इच्छाशक्ति दिखाए तो इतनी ही पुलिस से वह हर महीने करोड़ों रूपए का जुर्माना वसूल सकती है, और हर बरस सैकड़ों जिंदगियां बचा सकती है। सरकार को बंधी-बंधाई लीक से हटकर यह इंतजाम करना चाहिए कि ट्रैफिक जुर्माने लायक सूचना अगर जनता देती है, तो जुर्माना वसूली के बाद उसका एक हिस्सा उसे भी मिलना चाहिए, और इस जुर्माने की पूरी रकम सीधे-सीधे ट्रैफिक सुधार के लिए दे देनी चाहिए। वोटरों के नाराज हो जाने के खौफ से सत्तारूढ़ नेता कभी सडक़ों पर कड़ाई बरतना नहीं चाहते, लेकिन अब उन्हें यह हिम्मत दिखाना चाहिए कि अगले ढाई-तीन बरस वोटरों को नाराजगी दिखाने का कोई मौका नहीं आने वाला है, और ऐसे में अगर ट्रैफिक को सुधारकर जिंदगियां बचाना दिखाया जा सकेगा, तो अगले विधानसभा चुनाव तक राज्य सरकार की वैसे भी बड़ी वाहवाही होगी।

एक दूसरा मुद्दा जो कि ऐसे ही लंबे चुनावमुक्त दौर में हो सकता है, वह शहरों को सुधारने का है। लोगों को अब याद नहीं होगा कि कुछ दशक पहले महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में चन्द्रशेखर नाम के एक आईएएस अफसर म्युनिसिपल कमिश्नर बने, और उन्होंने बिना किसी भेदभाव के एक साथ पूरे शहर के सडक़ किनारे के कब्जे और अवैध निर्माण हटा दिए, और चौड़ी सडक़ों के किनारे फुटपाथ बन गए, बीच में डिवाइडर बन गए, और नागपुर कुछ महीनों के भीतर ही एक बहुत अधिक सहूलियत वाला, और खूबसूरत शहर हो गया। छत्तीसगढ़ में भी हमने कई दशक पहले एक एडीएम और एक सीएसपी को मिलकर शहर के अवैध कब्जे आसानी से हटाते हुए देखा है। आज पूरे प्रदेश में शहरों में अवैध कब्जे और अवैध निर्माण मिलकर सडक़ों को खत्म कर चुके हैं। जहां-जहां सरकार करोड़ों रूपए लगाकर सडक़ चौड़ी भी करती है, वह भी पूरी की पूरी कारोबारी पार्किंग में खत्म हो जाती है, उससे सरकार को कुछ नहीं मिलता। अब सरकार को दिल कड़ा करके शहरों को सुधारना चाहिए क्योंकि अगर वोटरों को उसके इस कार्यकाल में शहरी सहूलियतें और सुंदरता दिखने लगेंगी, तो उसे अगला चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक पाएंगे। शहरों के अलावा कस्बों में, और गांवों में भी अवैध कब्जों से जहां-जहां जनजीवन में दिक्कत आती है, उसे बिना भेदभाव अगर हटाया जाए, तो जनता भी सरकार का साथ देगी। इसी राजधानी रायपुर में जब आर.पी.मंडल पीडब्ल्यूडी सचिव थे, और बिना इस्तेमाल वाली नहर को पाटकर केनाल रोड बनाना था, तो उन्होंने जाकर मुख्य सचिव से अनुरोध करके उनके बंगले का एक हिस्सा तोडक़र सडक़ की चौड़ाई जारी रखी थी। जब कोई भेदभाव नहीं किया जाता, तो जनता भी साथ देने लगती है, और सरकार के भीतर से भी कोई विरोध नहीं होता।

हम अभी सिर्फ उन्हीं व्यापक मुद्दों की चर्चा कर रहे हैं जिनसे जनता बड़े पैमाने पर प्रभावित होने जा रही है, शुरू में कुछ लोग नाराज होंगे, लेकिन फिर सार्वजनिक सहूलियत देखकर उनकी भी नाराजगी जाती रहेगी। सत्तारूढ़ पार्टी को अपने लोगों को भी इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि वे ट्रैफिक, सडक़, और शहरी सुधार में हाथ बंटाएं, न कि अड़ंगा डालें। पंचायत और म्युनिसिपल चुनावों में जो नए जनप्रतिनिधि जीतकर आएंगे, उन्हें भी शुरू से ही समझ आना चाहिए कि उनका काम गैरकानूनी चीजों को बढ़ावा देने का नहीं है, बल्कि स्थानीय सुधार, विकास, और सडक़ सुरक्षा जैसे व्यापक महत्व के काम उनकी जिम्मेदारी है। राज्य सरकार को कड़ाई से सुधार करने के लिए बड़ी तैयारी करनी चाहिए, और मतदाताओं की फिक्र किए बिना काम करने का यह एक बड़ा मौका है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 12 फरवरी 2025



 

तिरुपति प्रसाद-लड्डुओं के लिए चर्बीवाला घी, हिन्दू-जैन सप्लायर बंदी

11 फरवरी 2025 

 

तिरुपति के लड्डुओं के लिए मिलावटी घी सप्लाई करने वाली तीन डेयरी कंपनियों के मालिकों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। कुछ महीने पहले जब गुजरात की एक डेयरी प्रयोगशाला से यह रिपोर्ट आई थी कि तिरुपति के लड्डुओं में गाय और सुअर की चर्बी मिला हुआ घी इस्तेमाल हो रहा है, तब बड़ा हंगामा हुआ था। हर बरस करोड़ों लोग तिरुपति के दर्शन को जाते हैं, और कई करोड़ लड्डू का प्रसाद पाकर, या अधिक प्रसाद खरीदकर लौटते हैं। तिरुपति की मान्यता इतनी अधिक है कि दक्षिण भारत में अनगिनत कारोबारी तिरुपति के भगवान को अपने कारोबार में भागीदार बनाते हैं, और कमाई में उनका हिस्सा दान में भेज देते हैं। यह प्रचलित चर्चा है कि वे अपने इंकम टैक्स रिकॉर्ड में भी यह भागीदारी दिखाते हैं, अब यह पता नहीं कितनी सच बात है। अभी जिन तीन कंपनियों के मालिकों को मिलावटी घी सप्लाई के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है, उनमें एक वैष्णवी डेयरी, एक भोले बाबा डेयरी, और एक ए.आर.डेयरी के नाम आए हैं, और गिरफ्तार होने वाले लोगों में विपिन जैन, पोमिल जैन, अपूर्व चावड़ा, और राजू राजशेखरन हैं। इनकी कंपनी, और इनके खुद के नामों का एक महत्व है कि ये सारे के सारे जैन और हिन्दू नाम हैं जिनके बारे में यह माना जा सकता था कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय और हिन्दू आस्था के सबसे बड़े केन्द्र में प्रसाद के लिए घी सप्लाई करते हुए वे चर्बी सप्लाई करने के पहले मर जाना पसंद करेंगे। लेकिन उन्होंने धड़ल्ले से ऐसा घी सप्लाई किया, यह एक अलग बात है कि अब केन्द्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के बड़े भागीदार चन्द्रबाबू नायडू के राज वाले आन्ध्र में तिरुपति मंदिर के नाम पर अप्रिय चर्चा खत्म करने के लिए अब उस घी को सिर्फ मिलावटी घी कहा जा रहा है, और चर्बी और जानवरों के नाम की चर्चा खत्म हो गई है। आखिर तिरुपति आन्ध्र की पर्यटन अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है, और साथ-साथ हर बरस शायद इस मंदिर में डेढ़ हजार करोड़ का चढ़ावा आता है जिससे क्षेत्रीय विकास भी होता है।

किसी किस्म के अच्छे या बुरे कारोबार से किसी धर्म का कोई खास लेना-देना होता हो ऐसा हमें नहीं लगता। पाकिस्तान में ईदी फाउंडेशन के संस्थापक एक मुस्लिम बुजुर्ग दुनिया का सबसे बड़ा एम्बुलेंस नेटवर्क चलाते हैं, और हिन्दुस्तानियों को याद रखना चाहिए कि कई बरस पहले भारत से भटककर पाकिस्तान चली गई एक लडक़ी को भी अपने परिवार में उन्होंने रखा था। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान से बीफ निर्यात करने वाली कंपनियों के मालिकों में तकरीबन तमाम नाम हिन्दुओं के हैं, जिन्होंने अपनी कंपनियों के नाम मुस्लिम किस्म के रख लिए हैं। इसलिए तिरुपति के सालाना करोड़ों श्रद्धालुओं को चर्बी वाले लड्डू देने का जुर्म करने वाले हिन्दू और जैन निकले हैं, तो यह देश में आज के तनाव के माहौल में एक राहत की बात है।

लेकिन कुछ नास्तिकों के मन में इस पूरे सिलसिले से यह सवाल भी उठेगा कि जब ईश्वर के अपने घर में, तिरुपति के भगवान को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में इस तरह की मिलावट हो रही थी, तो ऐसे मुजरिमों पर कोई दैवीय मार क्यों नहीं पड़ी? करोड़ों श्रद्धालुओं की शाकाहारी आस्था को खत्म करने वाले लोग अब तक गिरफ्तार होने के लिए जिंदा क्यों हैं? ईश्वर खुद तो पत्थर की प्रतिमा की शक्ल में वहां पर हैं, और उन्हें चढ़ाया जाने वाला प्रसाद वे खुद तो खाते नहीं होंगे, उन्हें परोस देना मानकर, उसके बाद उसे श्रद्धालुओं में बांटा जाता होगा। ऐसे में ईश्वर का तो कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन शाकाहारी श्रद्धालुओं की जिंदगी भर की कड़ाई अनजाने में खत्म हो गई। यह बात भी कुछ अजीब लगती है कि जिसे अंतर्यामी माना जाता है, जिसे सर्वज्ञ, सर्वत्र, कण-कण में माना जाता है, उसकी नजरों से यह मिलावट कैसे बच गई? जिस जगह की आस्था इतनी है कि लोग वहां सिर मुंडाकर दर्शन के बाद लौटते हैं, प्रसाद का लड्डू पाते हैं, और बाकी परिचितों के लिए भी और प्रसाद खरीदकर लाते हैं, अपनी क्षमता से आगे बढक़र वहां की दान-थैली में रकम और गहने डालते हैं, उन सबकी आस्था के लिए यह एक बड़ी चुनौती हो गई होगी कि वहां के ईश्वर ने प्रसाद में ऐसी भयानक, हिंसक और मांसाहारी मिलावट कैसे हो जाने दी? जिस ईश्वर को सर्वशक्तिमान माना जाता है, उसका चक्र हाथ की उंगली से निकलकर जाकर ऐसे डेयरी मालिकों के गले क्यों नहीं काट पाया? ऐसे ईश्वर के हाथ से बिजली कडक़कर क्यों नहीं निकली, और उसने जाकर इन लोगों को भस्म क्यों नहीं कर दिया? ऐसे कई सवाल लोगों के मन में उठ सकते हैं, यह एक अलग बात है कि आस्था के बाजार में सवालों को फुटपाथ पर भी कारोबार करने को जगह नहीं मिलती, धार्मिक पुलिस तुरंत ही तमाम प्रश्नवाचक चिन्हों को खदेडक़र बाहर कर देती है।

दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि मठों और मंदिरों के जमीन-जायदाद में घपला करने वाले लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता। बल्कि बहुत से धार्मिक केन्द्रों को संभालने वाले धार्मिक मुखिया उन जगहों पर आर्थिक और नैतिक सभी किस्म का घोटाला करते रहते हैं, और यह सब तो उसी छत के नीचे होता है जिस छत के नीचे ईश्वर खुद बसते हैं। लोग बूढ़ी गायों के नाम पर, अनाथ बच्चों के नाम पर घोटाले करते रहते हैं, और उनका बाल भी बांका नहीं होता। इन सबसे मन में यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच ही धर्म कहीं किसी जुर्म के आड़े आता है? अभी लोगों ने देखा होगा कि राष्ट्रपति बनते ही डोनल्ड ट्रम्प अमरीका की परंपरा के मुताबिक एक चर्च गए थे, और वहां पर महिला बिशप ने प्रार्थना सभा में प्रवचन करते हुए ट्रम्प से सीधे-सीधे कहा कि उन्हें ट्रांसजेंडरों, आप्रवासियों पर रहम करनी चाहिए, उन्हें दयालु रहना चाहिए। उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं, और ये बातें अमरीका में धर्म की राजनीति करने वाले, पक्के ईसाई डोनल्ड ट्रम्प के एक कान से घुसीं, और दूसरे कान से निकल गईं। उनके भीतर अगर धर्म कहीं था भी, तो उसे ये बातें छू भी नहीं पाईं।

यह पूरा सिलसिला ईश्वर की सत्ता, उसके जनकल्याणकारी होने, या उसके होने पर ही सवाल खड़े करता है। आपका क्या ख्याल है?

(Daily Chhattisgarh)

महाकुंभ के महाइंतजाम के बीच महाजाम भी...

10 फरवरी 2025 

 

उत्तरप्रदेश में चल रहे महाकुंभ की खबरों को देखें तो हैरानी होती है कि आस्था लोगों से कैसी-कैसी तकलीफें उठवा लेती है। न सिर्फ प्रयागराज के आसपास, बल्कि उत्तरप्रदेश से लगे हुए पड़ोसी प्रदेशों तक हाल यह है कि वहां से ही ट्रैफिक रोक देना पड़ रहा है। एक खबर बताती है कि प्रयागराज से ढाई सौ किलोमीटर पहले ही मध्यप्रदेश में पुलिस ने आगे बढऩा रोक दिया है, और बताया है कि प्रयागराज के चारों तरफ सातों सडक़ों पर कई किलोमीटर का जाम है, और इसमें अगले कई दिन तक कोई कमी नहीं आनी है। एमपी पुलिस ने बताया कि दो सौ-तीन सौ किलोमीटर का जाम लगा है, आगे बढऩा नामुमकिन है। कुछ दूसरी खबरें बताती हैं कि शहर के लोग अपने घरों से निकल नहीं पा रहे हैं, स्कूल-कॉलेज के इम्तिहान ऑनलाईन लेने पर विचार चल रहा है क्योंकि छात्र-छात्राओं का स्कूल-कॉलेज पहुंचना मुमकिन नहीं है। एमपी के रीवां में प्रयागराज हाईवे पर 72 घंटे से जाम है, और जाम में फंसे हुए श्रद्धालुओं का हौसला टूटने पर भी वे वापिस नहीं मुड़ सकते। कुछ लोगों ने बताया कि चार-चार लेन पर इंच-इंच पर गाडिय़ां जाम हैं, और महिलाओं के लिए सडक़ किनारे शौच के लिए जाना भी नहीं हो पा रहा है। स्टेशन पर भयानक भीड़ है, डिब्बों में किसी भी तरह से लोग घुस रहे हैं, और किसी रिजर्वेशन का कोई मतलब नहीं रह गया है। एमपी के सीएम मोहन यादव ने ट्विटर पर लिखा है कि कुंभ जा रहे मध्यप्रदेश व अन्य जगहों के श्रद्धालुओं का रीवां से लेकर जबलपुर, कटनी, सिवनी जिलों तक रास्ता रूक गया है, और वाहनों में ज्यादातर बुजुर्ग महिलाएं, और बच्चे शामिल हैं। उन्होंने सरकारी अमले के साथ-साथ श्रद्धालुओं और जनप्रतिनिधियों से भी सहयोग करने की अपील की है। लोगों का कहना है कि प्रयागराज के आसपास कई तरफ लोग 24 घंटे से लेकर 48 घंटे तक सिर्फ अपनी गाडिय़ों में फंसे हुए हैं।

इस महाकुंभ में हुई एक भगदड़ में करीब 30 लोगों के मरने की खबरें थीं, लेकिन यूपी की योगी सरकार ने कुछ रहस्यमय कारणों से मौतों की खबर ही जारी नहीं होने दी थी। जिस तरह दसियों हजार करोड़ रूपए लगाकर इस महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है, वह कई सवाल खड़े करता है। जिस यूपी में पैसों की कमी से हजारों स्कूलें बंद हो चुकी हैं, वहां पर एक धार्मिक आयोजन के लिए, तीर्थयात्रियों की संख्या का रिकॉर्ड कायम करने के लिए योगी ने पैसा बहा दिया है। अब क्या सचमुच इतने खर्च की जरूरत थी, या आस्था के बीच ऐसे किसी भी लोकतांत्रिक सवाल को उठाना आज जुर्म कहा जाएगा, यह सोचना कुछ मुश्किल है। यह बात बहुत साफ है कि महाकुंभ में करोड़ों आस्थावान खुद होकर पहुंचे रहते, लेकिन इस बार योगी सरकार ने जिस तरह सैकड़ों या हजारों करोड़ खर्च करके इसका प्रचार किया, उसकी वजह से आने वाले लोग भी बढ़े, और जो लोग इसके पहले अयोध्या के राम मंदिर नहीं जा पाए होंगे, उनके लिए यह दो तीरथ एक साथ करने का मौका भी था। लेकिन जितने लोगों के आने का अंदाज था, उनके हिसाब से भी तैयारी करना मुमकिन नहीं था, और सुरक्षित तो बिल्कुल भी नहीं था। एक दिन, एक वक्त, एक जगह पर करोड़ों लोगों का इकट्ठा होना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, और न्यौता भेज-भेजकर इस चुनौती को और बड़ा किया गया था। वैसे तो आस्था का समझ से अधिक रिश्ता रहता नहीं है, फिर भी यह सवाल उठता है कि क्या किसी जिम्मेदार सरकार को इतनी भीड़ के खतरों को इस हद तक और बढ़ाना था?

सभी धर्मों में कुछ खास दिनों पर किसी तीर्थस्थान पर भीड़ जुटती ही है। नागपुर में हर बरस दीक्षा भूमि में 10 लाख से भी अधिक लोग एक जगह आते हैं। हज यात्रा में भी मक्का में एक वक्त 18-20 लाख लोग इकट्ठा होते हैं, और उनके बीच भगदड़ में कई बार बहुत लोग मारे गए हैं। कुछ बरस पहले एक ही दिन में 24 सौ लोग मरे थे। लेकिन कुंभ की भीड़ तो मानवीय क्षमता से मुमकिन इंतजाम के मुकाबले भी बहुत अधिक बड़ी रहती है। और जब ऐसी भीड़ निजी कारों में भी आने दी जा रही है, तो जाहिर है कि वह सडक़ और पार्किंग सबको अधिक घेरेगी। यह बात हमारी समझ से परे है कि सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने का यह दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा मौका था, और कुंभ के चारों तरफ सौ-दो सौ किलोमीटर से सिर्फ बसों में आवाजाही अगर की गई होती, तो पैसा, पर्यावरण, ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, समय सब कुछ बचा होता। एक बस के लायक मुसाफिर 15-20 कारों में पहुंच रहे हैं, और सरकार यहां पर एक कल्पनाशीलता दिखा सकती थी।

अच्छा हो कि कुंभ का यह आखिरी हफ्ता बिना किसी हादसे के निपट जाए, लेकिन सरकार के भीतर इस बात पर विचार जरूर होना चाहिए कि ऐसी अपार भीड़ के क्या-क्या खतरे हो सकते थे, और किसी भी जिम्मेदार सरकार को ऐसी बेहिसाब भीड़ से बचना चाहिए जिसमें कोई भी अप्रिय नौबत आने पर पुलिस कुछ न कर सके। आस्था के साथ न बहस हो सकती, न तर्क-वितर्क हो सकता, इसलिए हम यह नहीं कहेंगे कि लोगों को कुंभ के गिने-चुने दिनों में गंदे हो चुके पानी में डुबकी लगाने के बजाय बाद में इत्मिनान से परिवार सहित वहां जाना चाहिए था, ताकि वे चैन से कुछ वक्त गुजार सकते, लेकिन आस्था के साथ यह सब बात नहीं हो सकती। सरकार को लोगों को उनकी आस्था तक सीमित रखना था, उसे महंगे प्रचार से लोगों की भीड़ को और नहीं बढ़ाना था। इतने बड़े पैमाने पर कोई सुरक्षा इंतजाम हो नहीं सकता था, आज भी यह माना जाना चाहिए कि बहुत बड़े हादसे के बिना अगर यह निपटा है, निपट रहा है, तो वह लोगों की मेहनत के साथ-साथ एक संयोग की बात भी है। पूरी दुनिया में इससे बड़ा कोई धार्मिक जमावड़ा होता नहीं है, और यह भी कहा जा रहा है कि 144 बरस बाद आया हुआ महाकुंभ था। ऐसे में महाकुंभ के इस आयोजन से अलग-अलग प्रदेशों की सरकारों को बहुत कुछ सीखने मिला होगा, हमने कुंभ शुरू होने के पहले ही यह सलाह दी थी कि सरकारों को, और आईआईएम जैसे मैनेजमेंट संस्थानों को अपने लोगों को यहां सीखने के लिए भेजना चाहिए था। हो सकता है कि उन्होंने इस मौके का फायदा भी उठाया हो। फिलहाल चाहे जायज खर्च से, चाहे नाजायज फिजूलखर्ची से, इतने बड़े इंतजाम को करने के लिए योगी सरकार और उनके अमले को तारीफ तो मिलनी ही चाहिए, और इसमें जितना और सुधार हो सकता था, उसका सबक भी लेना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)