सामूहिक जनचेतना कुछ नहीं होती, देश अपने लोगों को जिम्मेदार बनाते चलें...
19 सितंबर 2025
नेपाल में अभी हुए आंदोलन में राजधानी काठमांडू के बाहर भी सरकारी दफ्तरों, और सरकारी सम्पत्ति को खूब नुकसान हुआ। एक अमरीकी अखबार की रिपोर्ट बताती है कि संसद, सुप्रीम कोर्ट, और सैकड़ों सरकारी दफ्तरों में लगी आग से इमारतें जल गईं, और दसियों लाख फाईलें खत्म हो गईं। सुप्रीम कोर्ट में 60 हजार से ज्यादा मुकदमों की फाईलें पूरी तरह जल गईं, और कम से कम 20 मंत्रालयों की इमारतें, और तमाम कागज खत्म हो गए। संसद, राष्ट्रपति भवन, और प्रधानमंत्री कार्यालय के सारे कागज जल गए। जन्म-मृत्यु के रिकॉर्ड, कंपनियों के रिकॉर्ड, बैंकों के जमा और निकासी के रिकॉर्ड खत्म हो गए। कुल मिलाकर हालत यह है कि नेपाल ने आनन-फानन एक कामचलाऊ सरकार तो बना ली, लेकिन न मंत्रालय रह गए, न दफ्तर, और पुलिसवाले बिना इमारत, बिना गाड़ी, कहीं भी तम्बू लगाकर काम कर रहे हैं। जब जनआक्रोश बेकाबू होता है, और उसके निशाने पर सरकार ही रहती है, सरकार के कामकाज से उसे नफरत हो जाती है, वह सरकार को पलट देना चाहता है, तब वह इस तरह की आत्मघाती बर्बादी करता है जो कि सरकार के जाने के बाद भी कायम और जारी रहती है। अब जिस सरकार को हटाना था, वह श्रीलंका में भी हटा दी गई, बांग्लादेश और नेपाल में हटा दी गई, अफगानिस्तान और सीरिया में हटा दी गई, लेकिन जहां-जहां सार्वजनिक सम्पत्ति, और सरकारी कागजात को जलाया गया, उसकी कोई भरपाई नई और पसंदीदा सरकार के बन जाने पर भी नहीं हो पाएगी।
जले हुए नेपाल की इस हालत से छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में अभी कुछ अरसा पहले एक आंदोलन के बाद कलेक्टर और एसपी दफ्तरों की इमारतों को लगाई गई आग याद पड़ती है जिसमें बाहर खड़ी हुई गाडिय़ों सहित सब कुछ जला दिया गया था। यह मौका भी बड़ा अजीब था कि भारत के किसी जिले में कलेक्टर-एसपी के दफ्तर इस तरह जला दिए गए थे। आंदोलनरत मणिपुर में ऐसा हुआ कि वहां भी बहुत सारे सरकारी दफ्तर, और बहुत सी सार्वजनिक सम्पत्ति जला दी गई। ऐसी नौबत के बारे में देश को सोचना चाहिए कि मांगें पूरी होने के बाद भी यह नुकसान तो किसी तरह वापिस नहीं जाता। लेकिन जब हम देश के सोचने की बात करते हैं तो हमारे सामने कुल मिलाकर एक उन्मादी भीड़ रहती है, जिसका निशाना सार्वजनिक या सरकारी सम्पत्ति रहती हैं, और बहुत से मामलों में निजी सम्पत्तियां भी रहती हैं। कई आंदोलनों में निजी गाडिय़ों को, दुकानों और बाजारों को भी जला दिया जाता है जिनके बारे में ऐसे कानून बने हैं कि आंदोलनकारियों से ही ऐसे नुकसान की भरपाई की जाएगी। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड जल जाने की भला क्या भरपाई किसी से की जा सकती है?
देश में उत्तेजना और उन्माद के माहौल में भी, सार्वजनिक हिंसा के बीच भी निशाना किसे बनाया जाए, और किसे छोड़ा जाए, यह फर्क कर पाना आसान नहीं रहता है। किसी समझदार ने बहुत पहले यह लिखा था- कि भीड़ में सिर बहुत रहते हैं, दिमाग कोई नहीं रहता। इसलिए भीड़ से किसी तर्कसंगत, और न्यायसंगत फैसले और कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो लोग भी अपने देश या अपने समाज की शान में सामूहिक जनचेतना जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि जापान, या योरप के कुछ बहुत जिम्मेदार, सभ्य और विकसित लोकतंत्रों को छोड़ दें, तो बाकी जगहों पर सामूहिक जनचेतना हर जगह गौरवशाली नहीं रहती। बहुत सी जगहों पर, या कि अधिकतर जगहों पर सामूहिक जनचेतना बड़ी आसानी से नफरत और हिंसा की तरफ मुड़ जाती है, और मुल्क के कानून के खिलाफ हाथों में पत्थर उठा लेती है। सामूहिक जनचेतना का नाम बड़ा होता है, उसका दर्शन छोटा। लोकतंत्र अपनी व्यवस्था को बहुत सभ्य साबित करने के लिए, या अपने नागरिकों को परिपक्व दिखाने या बनाने के लिए सामूहिक जनचेतना जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है, लेकिन वे मृगतृष्णा सरीखे रहते हैं, उनका कोई अस्तित्व नहीं रहता। और फिर दूसरी तरफ देशों को अपनी सरकारी इमारतों और सार्वजनिक सम्पत्ति को बचाने के लिए जितनी बड़ी पुलिस और फौज की जरूरत रहती है, उसका खर्च बहुत संपन्न देश भी नहीं उठा पाते। जिन देशों में लोकतंत्र नहीं रहता है, वहां शाही या फौजी हुकूमत, कमजोर लोकतांत्रिक अधिकारों की वजह से आंदोलनों को कुचल पाते हैं, लेकिन जहां कहीं भी लोकतंत्र की जगह रहती है, वहां हालात बड़ी तेजी से बेकाबू हो जाते हैं, जैसे कि अभी-अभी नेपाल में चार दिन के भीतर ही हो गए थे।
अब उत्तेजित और उन्मादी भीड़ को उसका खुद का भला, उसके देश का भला सिखाने के लिए क्या सचमुच कुछ किया जा सकता है, या कि आज की हमारी यह पूरी चर्चा फिजूल की है। हो सकता है कि हमारी यह बात सिर्फ कागजी हो, और इसकी जमीन पर कोई संभावना न हो। फिर भी लोकतंत्र के हित में हम चाहते हैं कि लोकतांत्रिक देशों की जनता अहिंसक आंदोलन करना सीखे, जैसा कि गांधी ने कर दिखाया था। या फिर भारत में इमरजेंसी के खिलाफ भी जो आंदोलन चले थे, वे मोटेतौर पर सरकारविरोधी होते हुए भी अहिंसक थे, और जनमत इतना मजबूत था कि उसने इमरजेंसी की इंदिरा गांधी को अपना इरादा बदलने पर मजबूर कर दिया था, और एक शांतिपूर्ण मतदान से नेहरू की बेटी को हरा दिया था। भारत के ऐसे कुछ आंदोलन यह साबित करते हैं कि हर बार जनआंदोलन का हिंसक और तबाही लाने वाला होना जरूरी नहीं रहता। आज नेपाल जितने किस्म की दिक्कतों को झेल रहा है, उनमें सरकारी सम्पत्ति, और रिकॉर्ड के जल जाने का नुकसान अपूरणीय है, उसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। देश के नागरिकों में जिम्मेदारी की एक भावना विकसित होना एक पीढ़ी का काम नहीं है, धीरे-धीरे कई पीढिय़ों में जाकर ऐसी जिम्मेदारी आ सकती है, इसलिए दुनिया के बाकी देशों को भी नेपाल से सबक लेना चाहिए कि वे किसी भी मुद्दे पर अपनी जनता को अराजकता न सिखाएं, क्योंकि उन्मादी और हिंसक भीड़ क्या-क्या जलाकर राख कर देती है, इसका कोई ठिकाना तो रहता नहीं है।
अदालतों से थोक में छूटते मुजरिमों के पीछे क्या राज?
18 सितंबर 2025
महाराष्ट्र में अभी ठाणे की एक अदालत में 2015 के दंगों के मामले में सभी 17 आरोपियों को बरी कर दिया। इस दंगे में सार्वजनिक सम्पत्ति की बड़ी बर्बादी की गई थी, और पुलिसवालों को भी हमले में चोटें लगी थीं। एक जिला अदालत ने यह पाया कि हथियारों से लैस भीड़ में रेलवे स्टेशन पर भीड़ के बीच यह दंगा किया था, लेकिन पुलिस आरोपियों की न तो पहचान स्थापित कर सकी, और न ही सुबूत पेश कर सकी। जज ने माना कि जांच में बहुत कमजोरियां रहीं। और इस आधार पर सारे के सारे लोग अदालत से छूट गए। लोगों को याद होगा कि अभी पिछले महीनों में ही हफ्ते भर के फासले से दो फैसले आए, एक में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, और उनके साथ के लोग मालेगांव बम धमाके केस से बरी हो गए, और एक दूसरे मामले में मुम्बई ट्रेन विस्फोट के सारे मुस्लिम आरोपी बरी हो गए क्योंकि जांच एजेंसियां अदालत में उनके खिलाफ अपराध साबित नहीं कर पाई।
इससे भारत की पुलिस और दूसरी जांच एजेंसियों की हालत पर भी गंभीर सवाल उठते हैं, और इस बात पर भी कि क्या जांच एजेंसियां सत्तारूढ़ पार्टी के किसी दबाव में, या कि किसी और तरह के असर से जांच को इतना कमजोर कर देती हैं कि अदालत किसी को सजा नहीं दे पाती? जो लोग किसी मामले की जांच को करीब से देखते हैं, या कि पुलिस और न्याय प्रक्रिया को बेहतर तरीके से जानते हैं, उन्हें यह मालूम रहता है कि कमजोर कड़ी कहां-कहां रहती है। किन गवाहों को खरीदा जा सकता है, कौन से जब्त दस्तावेज गायब हो सकते हैं (जैसा कि साध्वी प्रज्ञा के केस में हुआ), अपराध अनुसंधान प्रयोगशाला में कौन-कौन से सुबूत बदलवाए जा सकते हैं, जांच अफसर को किस तरह दबाव या लुभाव से प्रभावित किया जा सकता है, और अदालत में पहुंचने के बाद न्याय प्रक्रिया को कैसे प्रभावित किया जा सकता है। भारत में लोग यह बात भी अच्छी तरह जानते हैं कि शिकायतकर्ता से लेकर गवाह तक को बाहर कैसे धमकाया जा सकता है। देश के बड़े-बड़े बहुचर्चित मामले ऐसे भी हैं जिनमें शिकायतकर्ता या गवाह का कत्ल हो जाता है। आसाराम का मामला हो, या मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाला हो, इनमें गवाह, आरोपी, या शिकायतकर्ता इतनी बड़ी संख्या में मारे गए कि उसके बाद न्याय प्रक्रिया मखौल सरीखी हो गई।
भारत में अभी तो लोग इसी बात पर फिक्रमंद रहते हैं कि निचली अदालतों में करोड़ों मामले बरसों से पड़े हुए हैं, और इनके निपटारे के लिए क्या किया जाए। दूसरी तरफ जिस पर अधिक चर्चा नहीं होती है, वह जांच एजेंसियों की है। देश के बहुत से कानून अभी इसी बरस बदले हैं, और जांच एजेंसियों के पुराने कर्मचारी इनसे अच्छी तरह परिचित भी नहीं है। अब अपराध की जांच के साथ कई तरह की शर्तें जोड़ दी गई हैं, और उन शर्तों को अगर बारीकी से पूरा नहीं किया जाएगा, तो आरोपियों के वकील बड़ी आसानी से पुलिस केस की धज्जी उड़ा देंगे। आज भी बहुत से मामलों में जहां यह जाहिर रहता है कि मुजरिम कौन हैं, वहां भी जांच या अदालती प्रक्रिया की कमजोरी की वजह से वे छूट जाते हैं। यह नौबत देश के लिए शर्मनाक है, लेकिन यह लोकतंत्र अधिक फिक्रमंद नहीं है। आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा धर्म में इस तरह जुड़ा हुआ है कि मानो ईश्वर हर चीज का इंसाफ कर देगा, हर गुनहगार को सजा दे देगा। जबकि ईश्वर का असर जज, सरकारी वकील, पुलिस, और गवाह पर आमतौर पर मुजरिम को बचाने के लिए पड़ता है, शिकायतकर्ता या जुर्म के शिकार को इंसाफ दिलाने के लिए नहीं। धर्म में बुरे को बचाने की अपार क्षमता रहती है, और देश की आबादी का तकरीबन पूरा ही हिस्सा किसी न किसी धर्म के नशे में डूबा हुआ है। उसे यह लगता है कि इस जन्म में जो बुरा उनके साथ हो रहा है, वह उनके पिछले जन्म के कुकर्मों का नतीजा है, और इस जन्म में वे जितना बर्दाश्त करेंगे, त्याग करेंगे, अगले जन्म में उन्हें उतना ही सुख मिलेगा। इसलिए वे इंसाफ की बात सोचते भी नहीं हैं। धर्म नाम का नशा लोगों की तर्कशक्ति, न्यायशक्ति, इन सबको कमजोर कर देता है। इसलिए लोग बेइंसाफी को देखते हुए भी उसके खिलाफ बागी नहीं होते हैं, और यही वजह है कि पुलिस, और दूसरी जांच एजेंसियां लापरवाही से लेकर मनमानी तक कई तरह की गलत बातें करती हैं, और मुजरिम बच निकलते हैं।
भारत में अधिकतर मामलों की जांच राज्य सरकारों की पुलिस के हवाले रहती है, कुछ राज्यों में पुलिस बाकी राज्यों के मुकाबले बेहतर है, लेकिन बहुत से राज्यों में तो पुलिस बहुत बुरी तरह अनपढ़ और अज्ञानी है। फिर नीम चढ़े करेले की तरह, वह अधिकतर जगहों पर साम्प्रदायिक भी हो गई है, और राजनीतिक दबाव के सामने उसने अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों को खो दिया है। ऐसी बहुत सारी बातें मिलकर देश में बड़े-बड़े चर्चित मुकदमों में भी मुजरिमों को बचा जाती हैं क्योंकि भारतीय न्यायपालिका की भावना ही यह है कि चाहे सौ गुनहगार छूट जाए, एक भी बेगुनाह को सजा नहीं होना चाहिए। नतीजा यह होता है कि संदेह के लाभ में, सुबूतों की कमी से मुजरिम छूट जाते हैं, और फिर उनका भरोसा देश की न्याय व्यवस्था पर होने के बजाय अपने जुर्म की ताकत पर अधिक हो जाता है।
आज हमने मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मारने जैसा यह मुद्दा छेड़ा है, जिसके बहुत से पहलू हैं। अलग-अलग बहुत से सरकारी विभाग, राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाएं इस नौबत के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए आज की इस बात का कोई आसान इलाज नहीं निकल सकता। यह लोकतंत्र नाम के मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल की कई ब्रांचों के विशेषज्ञ चिकित्सकों के मिलकर इलाज करने लायक मर्ज और मरीज है। क्या भारतीय लोकतंत्र में आज केन्द्र या राज्य सरकारों में किसी ने ऐसी विहंगम दृष्टि है कि वे ऐसे इलाज की जरूरत भी समझें?
बलात्कार पर फैसले में लगी चौथाई सदी से उठते सवाल
17 सितंबर 2025
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 साल पुराने एक बलात्कार-प्रकरण में जिला अदालत की दी गई सजा को अभी रद्द कर दिया है, और आरोपी को घटना के समय नाबालिग पाकर उसके मामले को अब किशोर न्याय बोर्ड को भेजा है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा है कि इस मामले में बोर्ड छह महीने के भीतर फैसला दे। 2001 के इस मामले में 2002 में सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी, और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। यह मामला परिवार के भीतर एक नाबालिग लडक़ी, और उसके मौसेरे भाई के बीच का था, और घर में हुए इस बलात्कार पर गांव की पंचायत के बाद पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई थी। स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक यह लडक़ा घटना के वक्त 17 बरस से कम का था।
अब इससे कई सवाल उठते हैं, जिन पर हम यहां चर्चा करना चाहते हैं। पहली बात तो यह कि घर के भीतर करीबी रिश्तेदार नाबालिग भाई-बहनों के बीच इस तरह का खतरा कहीं भी खड़ा हो सकता है, और परिवारों को यह सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों को किस तरफ सही राह पर रख सकें। इसके लिए कई बार यह भी हो सकता है कि घर-परिवार के भीतर भी मां-बाप, या परिवार के दूसरे लोगों को एक सावधानी बरतनी होगी, ताकि ऐसी नौबत ही न आए, ऐसा खतरा ही खड़ा न हो सके। ये तो कमउम्र किशोर-किशोरियां थे, इसलिए यह माना जा सकता है कि बहुत अधिक परिपक्व नहीं थे। लेकिन परिवारों में बालिग रिश्तेदारों के बीच भी जगह-जगह जबर्दस्ती सेक्स के मामले सामने आते हैं, और उससे दर्जनों गुना अधिक मामले शायद कभी सामने आते ही नहीं हैं। इसलिए जैसा कि बड़े बुजुर्ग कहते आए हैं, आग और घी को पास नहीं रखना चाहिए। परिवारों को ऐसी स्थितियों का ध्यान रखना चाहिए जिनमें ऐसे वर्जित, या अवांछित संबंध हो सकते हैं। और बात सिर्फ अदालत से सजा दिलवाने तक की नहीं है, जब कभी परिवार में, करीबी रिश्तों में, या अड़ोस-पड़ोस में ऐसी अवांछित बातें होती हैं, तो उससे पारिवारिक और सामाजिक कड़वाहट भी पैदा होती है, और लंबे समय का नुकसान होता है। परिवार के भीतर ही एक बलात्कार की शिकार रहे, और परिवार के करीबी, या दूर के रिश्तेदार बरसों के लिए जेल में रहें, तो इससे परिवार का ढांचा भी चरमरा जाता है। सबसे अच्छी नौबत तो यही है कि लोग अपने बच्चों को किशोरावस्था में जाने के पहले भी अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में बताकर रखें, और उन्हें अकेले किसी खतरनाक नौबत में न छोड़ें। यह कहते हुए हमको इस बात का पूरा अहसास है कि गरीब मां-बाप के पास एक कमरे के मकान में न तो बच्चों को अलग से बचाकर रखने और सुलाने की गुंजाइश रहती है, और न ही मां-बाप दोनों मजदूरी पर जाते हुए बच्चों की चौकसी कर सकते। ऐसे में अड़ोस-पड़ोस के लोगों को मिलकर एक सामाजिक-सुरक्षा की सोच भी विकसित करनी चाहिए। यह बात भी हमारे लिए कहना आसान है, लेकिन इस पर अमल काफी मुश्किल होगी।
दूसरी बात यह कि जिला स्तर के सत्र न्यायालय ने 2002 में बलात्कार के इस मामले में आरोपी नाबालिग को जो सजा दी थी, उसे हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए उसी लडक़े के स्कूली रिकॉर्ड के मुताबिक उसे नाबालिग माना है। अब सवाल यह उठता है कि स्कूली रिकॉर्ड तो सत्र न्यायालय में भी रखे गए होंगे, और उन्हीं के आधार पर सात बरस की कैद हुई। हाईकोर्ट ने कुछ अधिक बारीकी से ये दस्तावेज परखे होंगे, और अब तक बालिग मानकर सजायाफ्ता इस लडक़े को अब किशोर न्यायालय भेजा है। यह चूक किसी नाबालिग की जिंदगी में बहुत बड़ी हो सकती है, हुई है, जिसमें उसमें बालिगों की जेल में रखा गया होगा, और बालिग की तरह नाबालिग से बलात्कार की सात बरस की सजा सुनाई गई। हाईकोर्ट को इस एक मामले में दिए गए अपने फैसले से परे भी यह सोचना चाहिए कि आगे किसी नाबालिग के साथ उम्र की सीमा रेखा पर ऐसी चूक न हो, उसके लिए क्या सावधानियां बरती जाएं, इसकी एक लिस्ट बनानी चाहिए। यह एक अलग बहस का मुद्दा होगा कि बलात्कार और हत्या जैसे कुछ किस्म के मामलों में नाबालिग को बालिग मानकर केस चलाने, या बालिग होने की उम्र को कम करने पर सुप्रीम कोर्ट में एक अलग बहस चल रही है। हम उस बहस को यहां जोडऩा नहीं चाहते, क्योंकि हम यहां परिवार और जिला अदालत की सावधानी पर ही चर्चा केन्द्रित रखना चाहते हैं।
बहुत पुरानी पीढ़ी की बात छोड़ दें, तो अब तो नई पीढ़ी के जन्म, और उसकी पढ़ाई-लिखाई के रिकॉर्ड अधिक आसानी से उपलब्ध रहते हैं। अब अदालतों को नए लोगों की उम्र तय करने में उतनी अधिक दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट, या संसद कुछ किस्म के अपराधों में 18 बरस की बालिग होने की सीमा को घटा दे। वैसा होने पर एक बार फिर उम्र के दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण हो जाएंगे, क्योंकि आज के नाबालिग तबके के कुछ लोग भी उस वक्त अदालती कार्रवाई में बालिग की तरह गिने जाएंगे, और उम्र एक अधिक बड़ा मुद्दा रहेगी। इसलिए स्कूल सरीखी जगहों को, जन्म प्रमाणपत्र जारी करने वाले दफ्तरों को अब एक विवादहीन इंतजाम करना चाहिए, ताकि कोई सचमुच का मुजरिम अपने को नाबालिग बताकर सजा में रियायत न पा ले, और कोई नाबालिग मुजरिम बालिग की तरह सजा न भुगते। कुल मिलाकर यह मामला जन्म प्रमाणपत्र जारी करने वाले अस्पतालों, या जन्म रिकॉर्ड करने वाले पंचायत और म्युनिसिपलों से शुरू होता है, और उसी जगह पर इसे बारीकी से दर्ज करना चाहिए। हाईकोर्ट को भी निचली अदालतों से ऐसे मामलों में चूक न करने की नसीहत देनी चाहिए, क्योंकि कई बार जजों की गलती से, और कई बार काम का बोझ अधिक होने से भी बेइंसाफी हो जाती है। अब इस मामले में यह तकलीफदेह तस्वीर सामने आई है कि बलात्कार के 24 बरस बाद जाकर अब मुजरिम का मामला किशोर न्यायालय भेजा जा रहा है, और वहां से फैसला आने तक इस जुर्म को शायद चौथाई सदी हो चुकी होगी। दुनिया के किन्हीं भी पैमानों पर इतनी देर से मिले इंसाफ को इंसाफ नहीं कहा जा सकता।
एसी, और गाडिय़ों से हो रहे नुकसान में मुकाबला
16 सितंबर 2025
देश की एक पर्यावरण-संस्था आई-फॉरेस्ट की अभी जारी हुई राष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट कहती है कि भारत में एयरकंडीशनरों से निकलने वाली ग्रीन हाऊस गैसें अब देश में वाहनों के प्रदूषण से निकलने वाली गैसों के बराबर हो गया है। और अगर इस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो अगले दस बरस में एसी-प्रदूषण, वाहन-प्रदूषण से दुगुना हो सकता है। इस सर्वे में यह पाया गया है कि 42 फीसदी एयरकंडीशनरों को हर साल गैस री-फिलिंग की जरूरत पड़ती है। इस संस्था का कहना है कि एसी से गैस रिसाव कम करना, कुछ हद तक एक समाधान हो सकता है। एयरकंडीशनरों, और गाडिय़ों, दोनों से ही होने वाले गैस-उत्सर्जन से भारत के पर्यावरण को खतरा हो रहा है, और यह जलवायु परिवर्तन में एक जिम्मेदार पहलू है। विज्ञान की मामूली जानकारी बताती है कि ग्रीन हाऊस गैसों से लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है, ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है, और ओजोन परत के कमजोर होने से, उसमें छेद होने से, सूरज की नुकसानदेह अल्ट्रावॉयलेट किरणें अधिक आती हैं जिससे पर्यावरण असंतुलन बढ़ता है, और प्राणियों में त्वचा कैंसर पैदा होता है।
अब हम इस अध्ययन, और पर्यावरण से जुड़ी बारीक तकनीक को छोडक़र एक बहुत ही मामूली समझ की बात करें तो यह बात जाहिर है कि भारत में एयरकंडीशनर लगाने और सुधारने का काम बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित लोग करते हैं। मोटेतौर पर बेरोजगार नौजवान जो कि मजदूरी के लायक रहते हैं, वे ही एसी उठाने, चढ़ाने, लगाने, सर्विस करने, और मरम्मत करने का काम करते रहते हैं। फिर भारत में बहुत हाईक्वालिटी के पुर्जों के इस्तेमाल का चलन भी कम है। एसी के भीतर लगने वाले पुर्जे, उसमें भरी जाने वाली गैस लोगों को अपनी नजरों से तो दिखती नहीं हैं, इसलिए वे पूरी तरह अप्रशिक्षित कर्मचारियों की कही बातों पर आश्रित रहते हैं। भारत में सर्विस का स्तर आमतौर पर बहुत घटिया है, नकली पुर्जों का चलन खूब है, और कामगारों में बेईमानी आम बात है। फिर गैस से जुड़ी हुई प्रणाली की बारीकी से जांच करने के बजाय लोग भारत की बहुत आम, जुगाड़-तकनीक से काम चला लेते हैं, और ऐसे में गैस लीक होने का खतरा अधिक रहता है। फिर भी हम यह नहीं मानते कि यह कारों से निकलने वाले प्रदूषण के साथ तुलना के लायक नहीं है, क्योंकि कारों का प्रदूषण नापने वाले सेंटर बिना कुछ जांचे फर्जी सर्टिफिकेट देते रहते हैं, और चूंकि भारत में बचाव लागू करने के सभी काम एक जैसी बेईमानी, लापरवाही, और गैरपेशेवर अंदाज से होते हैं, इसलिए किसी एक के आंकड़े ही गलत होते हों, ऐसा नहीं होता।
लेकिन इस खतरे को समझने की जरूरत है कि कारों का एक हिस्सा बैटरी से चलने वाला होते जा रहा है, और गाडिय़ों की बढ़ती संख्या में प्रदूषण उस अनुपात में नहीं बढ़ेगा। दूसरी तरफ एसी के नए-नए ग्राहक पैदा हो रहे हैं, पुराने ग्राहकों के घर-दफ्तर, या दुकान में एसी की गिनती बढ़ती जा रही है, और अब एसी शान-शौकत के बजाय मामूली सहूलियत का सामान बन चुका है, इसलिए उसका इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है, और उसी अनुपात में गैस लीक होना भी। अब विज्ञान और टेक्नॉलॉजी के सामने यह चुनौती है कि पर्यावरण के लिए नुकसानदेह एसी-गैस को कैसे कम नुकसानदेह गैस से बदला जाए, और दूसरी तरफ कारों या दूसरी गाडिय़ों के प्रदूषण को कैसे घटाया जाए। आई-फॉरेस्ट के अध्ययन में इन दो परस्पर असंबद्ध बातों को तुलना के लिए जरूर सामने रखा गया है, लेकिन इन दोनों का आपस में कोई भी रिश्ता नहीं है, और इन दोनों का अलग-अलग समाधान किया जाना जरूरी है।
फिलहाल हम जितनी बातें कर रहे हैं, वे एक नासमझी की अधिक हैं। समझदारी तो यह होगी कि निजी गाडिय़ों के सार्वजनिक परिवहन के विकल्प सोचे जाएं, और उन पर तेजी से अमल किया जाए। फिर धरती के वायुमंडल की गर्मी अंधाधुंध बढऩे दी जाए, और अपने कमरों को ठंडा रखने के लिए एसी का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाए। ये दोनों ही बातें आज अदूरदर्शिता से सोची जा रही हैं। निजी गाडिय़ां अगर बैटरी वाली भी हैं, तो भी वे किसी बैटरी-बस के मुकाबले धरती पर बहुत अधिक बोझ है, बनाने में भी, और बिजली से बैटरी चार्जिंग में भी। जरूरत इस बात की है कि सार्वजनिक परिवहन की गाडिय़ां, चाहे वे बसें हों, चाहे मेट्रो या दूसरे किस्म की ट्रेन हों, उन्हें निजी गाडिय़ों के मजबूत विकल्प की तरह चलन में लाना होगा। दूसरी तरफ शहरों में पेड़ बढ़ाकर, जंगल लगाकर, निर्माण की नई ग्रीन-तकनीक का इस्तेमाल करके इमारतों को गर्म होने से बचाना होगा, वरना कांक्रीट के जंगल को कितने भी एसी कम पड़ते रहेंगे। और लोग अपने एक ककून जैसे छोटे से दायरे को ठंडा करने के लिए बाहर की हवा को कई गुना गर्म करते रहेंगे, जो कि धरती को जलाकर राख कर देगा। हमने इन दोनों जरूरतों से होने वाले प्रदूषण से चर्चा शुरू की है, लेकिन उससे काफी कुछ अधिक करने की जरूरत है।
आज ट्रम्प के अमरीकी राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया के संपन्न, और अधिक ऊर्जा-खपत वाले देशों के बीच जलवायु परिवर्तन को धीमा करने की जिम्मेदारी घट गई है। जब इस मोर्चे के सबसे बड़े मुजरिम, अमरीका ने ही अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींच लिया है, तो फिर बाकी देश भला क्यों अपनी जिम्मेदारी आसानी से पूरी करेंगे, क्योंकि जलवायु परिवर्तन धीमा करने के लिए लगने वाले भारी-भरकम खर्च किसी भी देश के बजट में एक लुभावना आंकड़ा नहीं रहते। बाजार तो यही चाहेगा कि निजी गाडिय़ां भी बढ़ती रहें, और हर इंसान अपने कमरों को एयरकंडीशंड बनाते रहें। लेकिन इन दोनों चक्कों पर टिकी हुई गाड़ी धरती की बर्बादी की तरफ ही चल रही है। जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के लिए शहरी आवाजाही, और शहरी कांक्रीटीकरण दोनों के बुरे असर को घटाने के बारे में तुरंत ही सोचना होगा। आज वैसे भी जलवायु परिवर्तन को रोकने का काम बहुत धीमे इसलिए चल रहा है कि इसे धरती को बचाना कहा जा रहा है। धरती का कुछ नहीं बिगड़ रहा है, वह तो आखिरी इंसान के खत्म होने पर भी बची रहेगी। नुकसान तो इंसानों का हो रहा है, जिन्हें बचाने के लिए एसी की जरूरत घटानी होगी, और निजी गाडिय़ां भी।
मिजाज कातिल हो चुका हो तो चाकू पर रोक फिजूल...
15 सितंबर 2025
अलग-अलग मंत्रालयों के लिए संसद की कमेटियां रहती हैं, जिनमें अलग-अलग पार्टियों के सांसदों को रखा जाता है, और वे किसी प्रस्ताव, योजना, या प्रस्तावित कानून पर विचार-विमर्श करते हैं। मंत्रालय सार्वजनिक इश्तहारों से भी लोगों से राय मांगते हैं, और कम से कम दावा तो यही करते हैं कि लोगों ने जो आपत्ति और सुझाव भेजे थे, उन पर सोच-विचार किया गया था। अब संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय समिति ने अपनी एक रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को दी है जो कि संसद के अगले सत्र में पेश की जाएगी। इस कमेटी ने कहा है कि आज एआई से गढक़र जो फेक न्यूज बनाई और फैलाई जाती है, उसके पीछे के लोगों, और संस्थाओं की शिनाख्त करके उन पर मुकदमा चलाने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान किए जाएं। एआई के इस्तेमाल से आज कई तरह की खराब चीजें बनाई जा सकती हैं। हम देश में एआई से गढ़ी हुई तस्वीरों, और वीडियो तो देख ही रहे हैं, अधिक करीब के छत्तीसगढ़ में भी कुछ नए-नए उगे हुए सोशल मीडिया अकाऊंट से कांग्रेस और भाजपा के नेताओं पर ऐसे हमले हो रहे हैं। देश में अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनकी गुजर चुकीं मां जैसे कोई किरदार गढक़र कोई एआई वीडियो बनाया गया है, और उसके खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की गई है।
यह मामला बड़ा दिलचस्प है। एआई तो अभी कोई सालभर से ही ऐसी चीजों में इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों के खिलाफ गंदी और ओछी बातें लिखना तो दशकों से चल रहा है। दो दशक हो गए हैं कि लोग इंटरनेट, और सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक-दूसरे पर हमले के लिए कर रहे हैं, और भारत में हर दिन लाखों लोग विरोधियों को साम्प्रदायिक धमकियां देते हैं, सबसे गंदी गालियों के साथ कत्ल और बलात्कार की धमकियां देते हैं, और जिनसे असहमत हैं, उनके पूरे परिवारों को सोशल मीडिया पर प्रताडि़त करते हैं। ऐसे सारे ही हमलावर लोगों के हाथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस नाम का एक और हथियार लग गया है। लेकिन इस बात को अच्छी तरह समझने की जरूरत है कि इस साल भर के पहले भी ये हमलावर तो कोई दो दशक से मौजूद ही हैं, और खुलकर साम्प्रदायिक नफरत फैला रहे हैं, किसी महिला जर्नलिस्ट को प्रेस्टीट्यूट लिख रहे हैं, और उसे प्रॉस्टीट्यूट के बराबर रख रहे हैं। तो आज संसदीय समिति ने एआई को लेकर जो फिक्र जाहिर की है, वह दरअसल पिछले दशकों में खड़ी हुई इस हमलावर-‘बलात्कारी-हत्यारी’ फौज को लेकर होनी चाहिए थी। अब तक लोग बिना एआई के जो जुर्म कर रहे थे, उस जुर्म में अब एआई की मदद और जुड़ गई है, तो उसकी वजह से पहली बार उसे जुर्म मानना भोलेपन की नासमझी अधिक दिखती है। अगर इस देश में ऐसे ट्रोल करने वाले ‘बलात्कारी-हत्यारे’ पहले से काबू में किए गए रहते, वे जेल भेजे गए रहते, तो लोग ऐसी सार्वजनिक धमकियां देने को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानकर नहीं चलते रहते। अब जब लोग जहरीली-नफरती हिंसा फैलाने के आदी हो चुके हैं, और उस पर आज भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, तो फिर महज एक तकनीक को कोसना हास्यास्पद लगता है। एआई के आगमन के पहले तक जो लोग जुबानी बलात्कार-कत्ल करने में सार्वजनिक रूप से फख्र हासिल करते थे, उन्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि देश और प्रदेशों की सरकारें उनके खिलाफ कुछ नहीं करेंगी। ऐसे में सिर्फ एआई को लेकर, या सिर्फ फेक न्यूज को लेकर फिक्र जाहिर करना पत्तों के इलाज के लिए दवा छिडक़ने जैसा है, क्योंकि उस पेड़ की जड़ों को तो पानी से सींचा ही जा रहा है।
न सिर्फ लोकतंत्र, बल्कि किसी भी तंत्र के तहत चलने वाला देश या समाज इस तरह टुकड़े-टुकड़े में सोचकर कतरे-कतरे में कार्रवाई नहीं कर सकता। लोगों की सोच को अलोकतांत्रिक, अमानवीय, और हिंसक करते चले जाना, और फिर उनसे यह उम्मीद करना कि वे एआई जैसे औजार का इस्तेमाल न करें, यह बचकानी बात है। कातिल की हत्यारी-सोच को रोकने की जरूरत है, उसके विकसित हो जाने के बाद उसे यह सिखाना कि वह लाल हत्थे के चाकू से कत्ल न करे, यह किस काम का रहेगा? लोकतंत्र एक जटिल व्यवस्था है, इसमें लोगों की सोच को कानून का सम्मान करने का बनाया जाना चाहिए, उन्हें यह नहीं सिखाया जा सकता कि कानून के एक से सोलह तक के पेज अनदेखा करके उन्हें तोडऩा जायज है, और सोलह से बत्तीस पेज के कानूनों का सम्मान करना जरूरी है।
सोशल मीडिया हिन्दुस्तान के लोगों में से कई करोड़ लोगों की नफरत और हिंसा की सोच का पुख्ता सुबूत है। इस पर अगर जड़ों से कार्रवाई नहीं होगी, तो जहर का यह पेड़ चारों तरफ फैलते चले जाएगा, फैल चुका है, और फैल रहा है। इसलिए इस मंत्रालय, या किसी और मंत्रालय की संसदीय समिति को यह सोचना चाहिए कि जब नफरती हिंसा की बीमारी लोकसभा के भीतर तक पहुंच चुकी है, और सत्तारूढ़ पार्टी का सांसद, एक विपक्षी, और अल्पसंख्यक सांसद को सदन के भीतर ही गंदी से गंदी गालियां दे सकता है, धमका सकता है, तो फिर एआई जैसी एक तकनीक को तोहमत देने की बात पूरी तरह बोगस है। भारतीय समाज में सोच-समझकर फैलाए गए नफरत के संक्रमण को काबू करना, एआई से गढ़े गए फेक पर रोक लगाने से नहीं हो पाएगा। जब नफरत कोरोना की तरह फैली हुई है, तो कोरोना मरीज को नेल पॉलिश लगाने से भला महामारी पर क्या रोक लग सकेगी? एआई पर चर्चा से अपने आपको फिक्रमंद साबित करने का पाखंड संसदीय समिति को किनारे रखना चाहिए, और लोकसभा के भीतर से लेकर सडक़, और सोशल मीडिया तक नफरत का जो बोलबाला है, हिंसा को जिस तरह मान्यता दे दी गई है, उसके बारे में फिक्र करना चाहिए, वरना एआई के फिक्र के बिना भी सांसदों को तनख्वाह, और सहूलियतें तो उतनी ही मिल ही रही है।




