बड़े तिलचट्टों के बाद अब छोटे तिलचट्टे, इनसे जूझना सरकारों के लिए और मुश्किल
20 अगस्त 2026
राजस्थान के बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने आदेश निकाल दिया है कि बाहरी लोग स्कूल पहुंचकर कोई वीडियो नहीं बना सकेंगे। सरकारों के अपने तर्क रहते हैं, चूंकि सरकारी स्कूल सरकार की अपनी सम्पत्ति रहती है, इसलिए वहां बाहर के लोगों के आने, या वीडियो बनाने पर रोक लगाने का अधिकार तो उसे है, लेकिन पहली बार ऐसी नौबत क्यों आ रही है? आज राजस्थान में जाने कितने ही जिलों के दर्जनों या सैकड़ों गांवों के स्कूलों के छात्र-छात्राओं के आंदोलन सडक़ों पर उतर आए हैं। बात सिर्फ राजस्थान की नहीं है, उत्तर भारत और हिन्दी प्रदेशों में जगह-जगह यह हाल है। हम भी अपने अखबार में, और अपने यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर लगातार इस बारे में सच सामने रखते रहते हैं, जो कि खासा असुविधा का रहता है। एकाएक जिस तरह देश भर में सरकारी स्कूलों के बच्चों के भीतर अपने बुनियादी हक के लिए एक जागरूकता आ गई है, उन्हें सडक़ों पर निकलना जरूरी लग रहा है, वे कई जगहों पर कलेक्टरों को बुलाने पर आमादा हुए जा रहे हैं, और जंतर-मंतर से सहमा हुआ यह देश, खासकर सहमी हुई सरकारें बच्चों की बातें सुन भी रही हैं। जंतर-मंतर पर जेन-जी कही जाने वाली 1995 के बाद की पैदाइश आंदोलन कर रही थी, लेकिन अभी तो शायद 2010 के बाद की पैदाइश स्कूली पोशाक में ही आंदोलन कर रही है। इस एकदम ताजा, गैरमतदाता पीढ़ी के आंदोलन से सरकारें ऐसी सहमी हैं कि स्कूलों की बदहाली पर वीडियो बनाना कुछ दिनों में राजद्रोह करार दे दिया जाए, तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए।
स्कूल तो सरकारों के हैं, उनकी हालत को लेकर ऐसी बदहवासी की नौबत क्यों आनी चाहिए? कोई अमरीकी राष्ट्रपति, या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तो आ नहीं रहे कि कलकत्ता शहर से सारे फुटपाथजीवियों, और भिखारियों को बाहर कर दिया जाए, या अहमदाबाद की सडक़ किनारे की झुग्गीबस्तियों के सामने दीवार खड़ी कर दी जाए। यह तो गांव-गांव तक बिखरी हुई सरकार की अपनी स्कूलें हैं, उनमें देश के ही बच्चे पढ़ रहे हैं, देश के ही कॉकरोच वहां जाकर कुछ वीडियो बना रहे हैं, जिनमें उस बदहाली को दिखा रहे हैं जो सरकार को पहले से न सिर्फ मालूम होनी चाहिए थी, बल्कि जो होनी भी नहीं चाहिए थी। वे कोई रहस्य की बात तो बता नहीं रहे हैं। वैसे भी देश में कई जगहों से स्कूलों का यह हाल सामने आते ही रहता है कि वहां बैठकर मास्टर शराब पी रहे हैं, नशे में धुत्त फर्श पर पड़े हुए हैं, छत गिर रही है, पानी टपक रहा है, और घुटनों तक पानी में बच्चे आजादी का झंडा फहरा रहे हैं। अब ऐसे वीडियो पर तो सरकार को प्रोत्साहन देना चाहिए कि उसे जमीनी हकीकत की खबर लग रही है, ऐसे में सरकारी हुक्म निकालकर बाहरी लोगों के स्कूल जाने, और वीडियो बनाने पर रोक ऐसे लगाई जा रही है मानो वे इसरो में घुसकर किसी अंतरिक्ष रहस्य को चुरा रहे हैं। हकीकत जब इस हद तक छुपाने लायक हो जाए, तो पारदर्शिता, और जनभागीदारी के खिलाफ इस तरह के आदेश निकालना सरकार की अपनी नाकामयाबी पर पर्दा डालने के अलावा कुछ नहीं है।
भारत के सरकारी स्कूलों में कमियों और खामियों की लंबी फेहरिस्त है। और ये दोनों बातें मिलकर गरीबों की नई पीढ़ी को नाकाबिल बनाने का काम कर रही हैं। आज अधिकतर सरकारी स्कूलों में सिर्फ गरीबों के ही बच्चे पढ़ रहे हैं। सत्ता-विपक्ष, किसी भी तरह के और ओहदे, संपन्न और उच्च-मध्यम वर्ग के परिवार, और अब तो मध्यम वर्ग के भी परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं। जिस तबके पर सरकार चलाने, सरकारी व्यवस्था बनाने, और बदइंतजामी को सुधारने का जिम्मा है, उनके कोई बच्चे इन गरीब स्कूलों में नहीं पढ़ते जहां पहुंचने वाले बच्चों को नदी-नाले पार करके आना पड़ता है, टपकती और गिरती हुई छत के नीचे गीली फर्श पर बैठना पड़ता है, पांच-पांच क्लासों के बच्चों को एक कमरे में पढऩा पड़ता है, कई विषयों के शिक्षक न होने पर बच्चों को सडक़ों पर उतरना पड़ता है। यह सब इसलिए है कि देश में किसी ताकतवर तबके के कोई बच्चे गरीब सरकारी स्कूल में शायद ही जाते हैं। कई बरस पहले का इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज का एक फैसला हमें याद पड़ता है जिसमें उन्होंने नेताओं, और अफसरों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूल में भेजने की बात कही थी। हमने कानूनी आधार पर उस वक्त लिखा था कि यह आदेश कमजोर है, और किसी भी तबके पर अनिवार्य रूप से लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन हम इस बात के हिमायती थे कि सरकारी स्कूलों में अगर तमाम नेताओं, और अफसरों के बच्चे पढ़ेंगे, तो शायद उनमें कुछ सुधार आ सकेगा। किसी भी दफ्तर में अगर बड़े अफसरों के शौचालय अगर रहते हैं, और छोटे कर्मचारियों के अलग रहते हैं, तो यह गारंटी हो जाती है कि छोटे कर्मचारियों के शौचालय गंदे रहेंगे। जब वे एक साथ रहते हैं, तो खींचतान कर, मजबूरी में ही सही, शौचालयों को साफ-सुथरा रखा जाता है।
आज जिन लोगों को सत्ता या अदालत पर बैठकर फैसले लेने पड़ते हैं, उन्हें अपने घर के बच्चों से पता ही नहीं चलता कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर क्या है। धीरे-धीरे ये स्कूल गरीब, कम पढ़े हुए, दलित, आदिवासी, और दूर-दूर गांवों में बसे हुए कमजोर तबकों के बच्चों के लिए ही रह गए हैं। इन बच्चों की भी अधिक आवाज नहीं रहती, इनकी माँ-बाप की तो बिल्कुल भी नहीं रहती। लेकिन अब भारतीय लोकतंत्र में कॉकरोच-युग आने से एक नई युगचेतना स्कूली बच्चों तक पहुंची है, और वे भी एकजुट होकर अपनी दिक्कतों के नारे लगाने लगे हैं। हमारा मानना है कि सरकारें अपने खुद के भले के लिए स्कूल सुधारो अभियान में जुट जाएं, वरना टूटी छतों से कॉकरोच टपकने लगेंगे, टूटी फर्श से तिलचट्टे निकलने लगेंगे, और नारे लगने लगेंगे। सरकारी आदेश स्कूलों के भीतर जाकर वीडियो बनाने से ही तो रोक सकते हैं, जब स्कूलों के बाहर सडक़ों पर, और जिला प्रशासन के दफ्तरों में बच्चों के प्रदर्शन होने लगेंगे, आज हो ही रहे हैं, तो सरकारें कितने कैमरे रोक लेंगी?
सरकार को कैमरों के बजाय यह परवाह करना चाहिए कि टैक्स के पैसों से बने हुए स्कूल भवन ऐसे खंडहर क्यों हुए जा रहे हैं, फर्नीचर पहुंचते ही क्यों टूटने लगे हैं, पढ़ाई का स्तर इतना खराब क्यों है, और बिजली, इंटरनेट, कम्प्यूटर बंद क्यों हैं? क्यों सुप्रीम कोर्ट को देश भर के प्रदेशों को झिडक़ना पड़ रहा है कि हर स्कूल में अलग से छात्रा-शौचालय बनाया जाए? क्या सत्ता हांकने वाले तबके के घरों में स्कूल जाने वाली बच्चियां नहीं हैं? क्या उनके किशोरावस्था में पहुंचने पर उनकी माहवारी शुरू नहीं होती? क्या उन्हें स्कूलों में पैड, पानी, शौचालय, और डस्टबीन की जरूरत नहीं पड़ती? क्या स्कूलों में जैसा दोपहर का खाना मिल रहा है, सत्ता की संतानें क्या दो दिन भी वैसा खाना खा सकती हैं? ऐसे बहुत सारे असुविधा के सवाल हैं, और कॉकरोचों का क्या है, वे तो न सरकारी नोटिस पढ़ सकेंगे, न ही कोई गेट उन्हें रोक सकेेंगे, वे तो कहीं से भी सरककर भीतर पहुंच जाएंगे, और नारे लगाने लगेंगे? पश्चिम बंगाल में एक व्यक्ति ने अभी अपने मोहल्ले या गांव की स्कूल की बदहाली को सुधारने की बात कही, तो उसे कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब अगर ऐसी हिंसा का बाकी देश में हिंसक जवाब देना शुरू हो जाएगा, तो उस बदहाली पर सरकारों को जवाब देना मुश्किल पडऩे लगेगा।
सरकारों को यह समझना चाहिए कि आज स्कूलों को सुधारने के लिए जो माहौल देश भर में बन रहा है, उसकी प्रतिबंध लगाने वाली आम सरकारी प्रतिक्रिया आत्मघाती होगी। देश भर में करोड़ों गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, और आज नहीं तो कल ये वोटर भी रहेंगे। इन बच्चों को जब तक गैरस्कूली बातों से बहलाना चलते रहा, तब तक तो सब कुछ खप गया। लेकिन अब बच्चों को समझ आ रहा है कि पढ़ाई का कोई दूसरा अंधविश्वासी विकल्प नहीं हो सकता, और वे पढऩे का अपना हक मांग रहे हैं। इस वक्त जिम्मेदारी से मुंह चुराने का कोई विकल्प सरकारों के सामने नहीं है। दूसरों पर प्रतिबंध लगाकर खुद नहीं बचा जा सकता, समय रहते सरकारें समझ लें, तो बेहतर होगा।
हमने अपनी बात लिखकर खत्म की ही थी कि छत्तीसगढ़ की कुछ जगहों से नई खबरें आ रही हैं कि कहां स्कूल की बदहाली को लेकर, तो कहां स्कूल के सामने सडक़ों की बदहाली को लेकर बच्चे आंदोलन पर बैठे हैं। सोशल मीडिया को देखें तो सैकड़ों अलग-अलग जगहों के असल वीडियो जमीनी बदहाली का नजारा दिखा रहे हैं। मुफ्त में मिले हुए इस फीडबैक की अनदेखी किसी भी सरकार को भारी पड़ सकती है, आज नहीं तो कल यह पीढ़ी भी वोटर बनेगी।
दुर्लभ किताबों को चारा बना देने वाली एआई कंपनियां क्या कर रही हैं एक जुर्म?
19 अगस्त 2026
पिछले कुछ महीनों से दुनिया में पुरानी ऐतिहासिक किताबों को चाहने वाले लोगों की छाती पर उस वक्त लात पड़ी जब पता लगा कि एआई कंपनियां अपने कम्प्यूटरों का ज्ञान बढ़ाने के लिए दुर्लभ किताबों को खरीद रही हैं, उन्हें काटकर पन्ने अलग कर रही हैं, फिर उन्हें स्कैन करके अपनी मशीनों की ट्रेनिंग में इस्तेमाल कर रही हैं। यह नौबत अंतरराष्ट्रीय बाजार से दुर्लभ किताबों को रफ्तार से खत्म कर रही है क्योंकि एआई कंपनियां खुद यह जहमत उठाने के बजाय कई एजेंट कंपनियों को तैनात करके इस काम को तेजी से कर रही हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि इंटरनेट पर पहले से मौजूद सारा ज्ञान एआई कंपनियां अपनी मशीनों के दिमाग में पहले ही भर चुकी हैं। अब इंटरनेट पर जो सामग्री आ रही है उसके साथ एक बहुत बड़ा खतरा यह है कि उसमें से बहुत सारी तो अलग-अलग एआई कंपनियों, और मशीनों की ही बनाई हुई है। फिर एक खतरा यह भी है कि आज एआई जितनी जानकारी उगलता है, उसमें से बहुत सारी तो गलत भी निकल जाती है, और कई जानकारियां तो एआई अपनी कल्पना से गढक़र पूरी तरह झूठी दे देता है, जिसे वह पूरी तरह सच्ची दिखने वाली भी बना देता है। आज एआई का हमारी तरह के जो लोग भरपूर इस्तेमाल करते हैं, वे जानते हैं कि एआई के साथ अगर सावधान न रहा जाए, तो वह एक पूरी की पूरी कहानी गढक़र उसमें तारीखें, जगहें, नाम सब भरकर एक भरोसेमंद दस्तावेज की तरह पल भर में पेश कर देता है। इसलिए आज एआई कंपनियां मौजूदा इंटरनेट को अपनी ट्रेनिंग के लिए सावधानी के साथ और एक सीमा तक ही इस्तेमाल कर रही हैं। फिर यह भी है कि आज हासिल ज्ञान से ऊपर अगर जाना है, अगर उससे परे की चीजें अपनी मशीनों को बतानी है, तो इसके लिए इंटरनेट से परे के दुर्लभ ज्ञान तक जाना जरूरी रहेगा, और इसीलिए बड़ी कंपनियां, बड़ी रफ्तार से, बड़ी संख्या में दुर्लभ किताबें अपनी मशीनों में चारे की तरह डाल रही हैं।
अब दुनिया में ऐतिहासिक, संग्रहणीय, और दुर्लभ चीजों के महत्व को जानने वाले लोग सदमे में हैं कि सिर्फ एक आधुनिक तकनीक को और अधिक ज्ञान-संपन्न बनाने के लिए क्या इतिहास को इस बेरहमी से मिटाया जा सकता है? क्या इसके खिलाफ दुनिया में कोई कानून नहीं है? क्या विश्व विरासत की फिक्र करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी एआई कंपनियों के इस बाजारू हमले को रोकने की फिक्र नहीं हो रही है? ऐसे कई सवाल हमारे दिमाग में भी उठते हैं। अभी विश्वकप फुटबॉल के बाद नार्वे के एक स्टार खिलाड़ी ने उसे मिले हुए दर्जनों करोड़ रूपयों में से एक बड़ी दुर्लभ किताब खरीदी, और अपने शहर या कस्बे की लाइब्रेरी को तोहफे में दे दी। एक फुटबॉल खिलाड़ी से किताब के प्रति ऐसी संवेदनशीलता कई लोगों को अनोखी लग सकती है, लेकिन एरलिंग हालांड ने 1594 में छपी किताब को करीब सवा करोड़ रूपए में खरीदकर अपने बचपन की सार्वजनिक लाइब्रेरी को उपहार में दिया। इसके साथ-साथ उसने सैकड़ों बच्चों के लिए लाइब्रेरी की फीस भी भरी। अब सवाल यह उठता है कि अगर एआई कंपनियां इस किताब को पहले खरीद लेतीं, तो वे इसके पन्ने फाडक़र, स्कैन करके अपनी मशीनों के दिमाग में तो डाल देतीं, लेकिन यह किताब फिर खत्म हो जाती।
अब हम किसी एआई कंपनी की वकील की तरह भी थोड़ी सी देर के लिए सोचना चाहते हैं, क्योंकि दूसरा नजरिया भी तो समझ में आए। आज दुनिया में जहां कहीं भी दुर्लभ किताबें हैं, वे आम लोगों की पहुंच से मोटेतौर पर बाहर हैं। वे किसी बहुत रईस, गैररईस के निजी संग्रह में हैं, या किसी किताब दुकान में दबी हुई हैं, या किसी लाइब्रेरी की आलमारी में बंद हैं। आम लोगों की पहुंच दुर्लभ किताबों तक बहुत कम रहती है, इतना जरूर है कि यूनेस्को के एक प्रोजेक्ट के तहत ऐसी लाखों-करोड़ों दुर्लभ किताबों की पीडीएफ कॉपी इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध है। अब अगर एआई कंपनियां इन किताबों की जानकारी को अपने कम्प्यूटरों में भरकर, उन्हें मुहैया कराएंगी, उनके आधार पर अपनी जानकारी और विश्लेषण में संपन्नता लाएंगी, तो क्या इससे दुनिया के ज्ञान का कुछ भला भी हो सकेगा? आज एंथ्रोपिक नाम की एआई कंपनी ने लाखों किताबें खरीदकर अपने कम्प्यूटरों पर भर डालीं, और उन्हें खत्म कर दिया। वे किताबें लोगों को आसानी से हासिल नहीं थीं, लेकिन अब इस एआई कंपनी से पूछने पर इन किताबों की जानकारी मिल सकती है। यह सोचना एक शैतान के वकील की तरह का है, लेकिन फिर भी हम विचार-विमर्श के लिए यह सोचना चाहते हैं।
आज दुनिया में बहुत पुरानी किताबें ऐसी भी हैं जो कि दुबारा प्रकाशित नहीं हो रही हैं, क्योंकि उनके ग्राहक अधिक नहीं होंगे। ऐसी किताबें दुबारा दुनिया के सामने आने का और कोई जरिया नहीं है। यूनेस्को के जिस प्रोजेक्ट की हमने बात की है, वह एक जरिया जरूर है, लेकिन उससे परे की भी कई चीजें हो सकती हैं। अभी-अभी भारत में केन्द्र सरकार के कहे हुए देश के हर जिले में पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल करके उनकी कॉपी संभालकर रखी जा रही है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण, और अलग तरह का प्रोजेक्ट है। यह अभी तक बाजार व्यवस्था से परे का है, लेकिन क्या ऐसी जानकारी भी किसी एआई कंपनी को बेची जा सकती है, या सार्वजनिक, और सामाजिक उपयोग के लिए यूनेस्को को दी जा सकती है? फिर सवाल यह भी उठता है कि यूनेस्को ने सार्वजनिक उपयोग के लिए जो जानकारी सामने रखी है, वह तो एआई कंपनियों को वैसे भी हासिल थी। वे तो ऐसी ही किताबें खरीद रही होंगी जो कि यूनेस्को की वेबसाइट पर नहीं होंगी।
अब बाजारू के अलावा एक दूसरा नैतिक सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी दुर्लभ किताब की जानकारी पर एकाधिकार पाने वाली एआई कंपनी अपने कम्प्यूटरों में इस ज्ञान को किस तरफ मोडक़र कैसा इस्तेमाल करे, यह तो वह तय कर सकती है। हो सकता है कि गोरी सोच रखने वाली ऐसी कोई कंपनी काले गुलाम लोगों के इतिहास की किसी दुर्लभ किताब को कॉपी करने के बाद, नष्ट करने के बाद उसे अपने कम्प्यूटरों की याददाश्त में ताला डालकर रख दे। बाजार कुछ भी कर सकता है, व्यापार, और नैतिकता ये दोनों कभी भी एक सिक्के के दो पहलू नहीं हो सकते। ऐसे में किसी दुर्लभ ज्ञान पर बाजारू कंपनी के एकाधिकार, और फिर उसे नष्ट कर देने के खतरे धरती के इतिहास के एक हिस्से को हमेशा के लिए खत्म कर देने से कम खतरनाक, और कम नुकसानदेह नहीं है। इसलिए इस पूरे मुद्दे पर लोगों को बारीकी से सोचना चाहिए कि दुनिया के इतिहास के एक हिस्से को बाजार के एकाधिकार के हवाले करना कितना जायज है, कितना नाजायज है। हम इस खुली बहस को छेडक़र लोगों से सोचने की उम्मीद करते हैं।
बच्चों की सुरक्षा के लिए जागरूकता अपने-आप नहीं आती, चर्चा भी जरूरी
18 अगस्त 2026
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के बीच घनी आबादी में छोटा सा एक बच्चा घर के बाहर खेल रहा था। पांव फिसलने से वह बारिश के पानी से लबालब, और तेज बहाव वाली नाली में गिरा, और बहकर नाले में पहुंच गया। मुश्किल से उसे निकाला गया। इस खबर के साथ ही अखबारों ने हाल-फिलहाल में जगह-जगह, कहीं किसी बनती इमारत के गड्ढे में, तो कहीं और डूबकर मरने वाले बच्चों की जानकारी छापी है। कहीं पर बच्चे बिजली के करंट से मर रहे हैं, तो कहीं छत से गिरकर। ऐसे हादसों पर आमतौर पर विचारों के किसी गंभीर कॉलम में नहीं लिखा जाता, लेकिन हमें लगता है कि असल और जमीनी जिंदगी के ये मुद्दे सोचने को मजबूर करते हैं कि क्या जागरूकता से कोई बचाव हो सकता है?
सडक़ों पर कई बार दिखता है कि घनी आबादी के बीच से निकलती गाडिय़ों के सामने दौड़ते हुए बच्चे आ जाते हैं, कई बार वे पतंग लूटने दौड़ते रहते हैं, कभी किसी गेंद को लपकने के लिए, और कभी सडक़ पार के खाने-पीने के किसी ठेले की तरफ। ऐसी बहुत सी वजहें हो सकती हैं जिनसे बच्चों का ध्यान ट्रैफिक की तरफ न रहे, अपनी मंजिल की तरफ रहे। ऐसा सिर्फ बच्चों के साथ ही नहीं होता है, बड़ों के साथ भी होता है। शाम-रात को देखें, तो शराबी सडक़ के दूसरी तरफ की दुकान की तरफ जिस एकाग्रता से बढ़ते रहता है, तो उसका ध्यान किसी भी और चीज की तरफ नहीं रहता। वह मछली की आंख की तरफ बढ़ते हुए तीर की तरह शराब की तरफ बढ़ता है, और ले-लेने के बाद उसी एकाग्रता से, ट्रैफिक से बेखबर लौटता है। कमान से छूटे हुए इस तीर की राह में अगर कोई गाड़ी आती है, तो उस पर इंसान को कुचलने की तोहमत तुरंत लग सकती है। ऐसे में जब अनुभवहीन छोटे बच्चे लापरवाही से बिजली के किसी तार को छू लेते हैं, सडक़ से गुजरती किसी गाड़ी के सामने आ जाते हैं, किसी जहरीले बीज को खा जाते हैं, तो मौत बहुत आसान हो जाती है, या आसानी से हो जाती है।
सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती, लेकिन परिवार और समाज को अपने छोटे बच्चों का ख्याल रखना चाहिए। उन्हें समझ आए, तब तो उन्हें खतरों से बचने की नसीहत देकर सावधान किया जा सकता है, लेकिन जब वे बहुत छोटे रहते हैं, उस वक्त तो उन्हें सिखाया नहीं जा सकता। हमारे एक दोस्त परिवार में बहुत बड़ी उम्र हो जाने पर, बड़ी कोशिशों से संतान का मुंह देखने मिला। पत्नी बाथरूम में प्लास्टिक के एक छोटे से टब में पानी भरकर बच्चे को नहला रही थी, कि इसी बीच घर के दरवाजे की घंटी बजी। उसने टब पकडक़र खड़े हुए बच्चे को छोड़ा, और दरवाजा खोलने गई। एक-दो मिनट के भीतर वह वापिस लौटी, तो तब तक बच्चा टब में उलट चुका था, और पानी में डूबकर खत्म हो गया था। ऐसी घटना लोगों को एक-दूसरे को बतानी चाहिए ताकि दूसरे माँ-बाप अपने बच्चों के साथ सावधानी बरत सकें। आज तो सोशल मीडिया की मेहरबानी से मुफ्त की सार्वजनिक जगह इतनी मिली हुई है कि लोग ऐसे हादसों की चर्चा कर सकते हैं, और दूसरे लोग अपने बच्चों के बारे में सावधान हो सकते हैं।
सडक़ों के किनारे किसी सार्वजनिक जगह पर खाने-पीने का सामान लेकर चलते हुए छोटे बच्चों पर कुत्ते या दूसरे जानवर झपट सकते हैं, और उनके हमले से बच्चे जख्मी हो सकते हैं। बहुत से तीर्थस्थानों, और पर्यटन केन्द्रों पर बंदरों की भीड़ रहती है, जो न सिर्फ खाने-पीने के सामान झपटकर ले जाती है, बल्कि मोबाइल फोन, या चश्मे भी छीन लेती है। किसी की टोपी उठाकर ले जाते हुए, या कुछ और छीनने वाले बंदरों को रोकने की कोशिश पर वे नोंच भी सकते हैं, काट भी सकते हैं। कुछ लोग ऐसी जगहों पर बंदरों को अपने हाथ से चने खिलाते हैं, और उसमें भी बंदर कभी-कभी काट सकते हैं। कुत्तों के काटने पर जो एंटीरैबीज इंजेक्शन लगते हैं, वे ही इंजेक्शन चूहा, बिल्ली, बंदर, किसी भी और जानवर के काटने पर लगाने की नौबत आती है। कोई-कोई घटना चिकित्सा विज्ञान में ऐसी भी दर्ज हुई है कि एंटीरैबीज का पूरा कोर्स लगवाने के बाद भी लोग रैबीज से मरे हैं।
यह पूरी बात सुनने में बड़ी साधारण और महत्वहीन लग सकती है, लेकिन अगर सावधानी लोगों के मिजाज में आ जाए, तो बहुत सी मासूम जिंदगियां बच सकती हैं। हमें लगता है कि समाज के भीतर बच्चों को लेकर सावधानी बरतने के कुछ वर्कशॉप होने चाहिए, जिनमें कि परिवार के सभी लोगों को शामिल होना चाहिए। किस तरह चाकू, ब्लेड, या दूसरे धारदार सामान बच्चों से दूर रखे जाने चाहिए, किसी भी तरह की दवा उनकी पहुंच से बाहर रहनी चाहिए, किस तरह बिजली के तार, उपकरण उनसे दूर रहने चाहिए। उन्हें कैसे माचिस, गैस चूल्हे, मोमबत्ती या दीये से दूर रखना चाहिए, इस सावधानी के महत्व को शायद ही कोई समझें, लेकिन यह बच्चों के प्रति बड़ों की जिम्मेदारी का मामला है, और इसे गंभीरता से लेना चाहिए। हमारे एक मित्र परिवार में एक छोटी बच्ची को डॉक्टर ने कोई ऐसी गंभीर दवा दी थी जिसके बारे में कहा गया था कि उसे महज चार बूंद देना है, एक भी बूंद ज्यादा नहीं देना है। दवा का स्वाद शायद बच्ची को अच्छा लगा, बोतल उसकी पहुंच में थी, उसने ढक्कन खोला, और पूरी बोतल एक बार में खाली कर गई! जहां बूंदें चार से पांच नहीं होनी थी, वहां उसने जाने दो सौ या चार सौ कितनी बूंदें एक साथ पी लीं। ऐसा कोई ओवरडोज जानलेवा भी हो सकता है। लेकिन कितने लोग हैं जो कि दवाओं को बच्चों की पहुंच से पर्याप्त दूर रखने की सावधानी रखते हैं? इन दिनों कई जगहों पर बिजली के प्लग प्वाइंट बच्चों की पहुंच के भीतर होते हैं। और वे बुनाई की सलाई जैसी कोई भी धातु की चीज ऐसे प्लग के भीतर डाल सकते हैं, और बहुत बुरी तरह बिजली के झटके के शिकार हो सकते हैं।
ऐसी मिसालें अंतहीन हो सकती हैं, लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि इसी देश में हर दिन कहीं न कहीं बच्चा चोरी की घटना होती है। चुराए गए बच्चों को बेचने का एक बड़ा बाजार है जिसमें बेऔलाद माँ-बाप से लेकर भीख मंगवाने वाले लोगों के गिरोह तक हैं। इसलिए किसी पर्यटन केन्द्र पर, स्टेशन या बस अड्डे पर, बगीचे, मैदान, या किसी मेले में अपने बच्चों का बहुत अधिक ख्याल रखना जरूरी है, क्योंकि हर जगह तो सीसीटीवी कैमरे रहते नहीं हैं जिनमें बच्चे चुराकर ले जा रहे लोग दर्ज हो जाएं, और बच्चों को वापिस हासिल किया जा सके। कई लोगों को यह पूरी बात गैरजरूरी लग सकती है कि इतनी समझ तो हर किसी में रहती है कि अपने बच्चों का ख्याल रखें। लेकिन हमारा मानना है कि स्कूलों में बच्चों के माँ-बाप को बुलाकर अगर ऐसे वर्कशॉप करवाए जाएं, तो इससे हादसों में कमी जरूर आएगी। किसी एक को ठोकर लगती है, तो उससे बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए, नसीहत पाना चाहिए। हर कोई अलग-अलग ठोकर खाए, तो यह तो कोई अच्छी बात नहीं होगी। और कुछ नहीं तो आज के हमारे इस लिखे हुए के लिंक को आप दूसरों तक बढ़ाएं ताकि सावधानी पर चर्चा कुछ आगे बढ़ सके। आपके बच्चे सुरक्षित रहें, इसके लिए हमारी शुभकामनाएं।
खतरों के बीच भी पढऩे पर आमादा बच्चों को धोखा देने ऐसा कलेजा चाहिए!
17 अगस्त 2026
योग गुरू कहे जाने वाले, पतंजलि नाम की विशाल कंपनी के मुखिया रामदेव ने अभी 15 अगस्त को झंडा फहराने के बाद दर्जनों कैमरों के सामने देश में बच्चों और नौजवानों में फैली हुई बेचैनी को लेकर एक बड़ा कड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था- देश में चारों तरफ हंगामा है, घपला है। छोटे-छोटे स्कूल और कॉलेजों में शिक्षक, किताब, बिजली, पानी, और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी है। जहां सब कुछ ठीक है, वहां भी पढ़ाई में नकल हो जाती है, पेपर लीक हो जाता है। सरकारी नौकरियों में साक्षात्कार के दौरान 90 से 99 फीसदी तक घोटाला होता है। अपनी जाति, वर्ग, समुदाय, और विचार के लोगों को नौकरी मिलती है, और बाकियों को धक्का मार दिया जाता है। यह सब अपमानजनक, और लोकतंत्र के खिलाफ है। एक तरफ हम सत्यमेव जयते की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ पहले से तय करके लाखों-करोड़ों रूपए लेकर नौकरियां बांटी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि यदि देश में आंदोलन ही चलते रहे, तो यह देश कैसे चलेगा। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि अभी भी समय है, सुधर जाओ, यह घपले ठीक कर लो, कहीं ऐसा न हो कि बाबा रामदेव को दोबारा आंदोलन करना पड़े। उन्होंने कहा कि देश में गरीब और अमीर के बीच की खाई बहुत गहरी होती जा रही है, जो ठीक नहीं है।
देश में यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हटाने के लिए अन्ना हजारे, केजरीवाल, किरण बेदी जैसे लोगों के साथ रामदेव भी सबसे अगली कतार में थे। उस दौर में वे टीवी स्टूडियो में मौजूद दर्जनों नौजवान दर्शकों के सामने यह घोषणा करते थकते नहीं थे कि मोदी सरकार आएगी, तो पेट्रोल 35 रूपए लीटर हो जाएगा, डॉलर 40 रूपए तक नीचे आ जाएगा, विदेशी बैंकों में जमा हिन्दुस्तानियों का कालाधन वापिस आएगा, और एक-एक गांव को करोड़ों रूपए मिलेंगे। इस तरह के बयान दे-देकर उन्होंने टीवी स्टूडियो के भीतर, और बाहर खूब तालियां बजवाईं थीं। इसलिए अभी 15 अगस्त को जब इन्होंने ऐसा हैरतअंगेज बयान दिया, तो पहली नजर में यह एआई से गढ़ा हुआ फर्जी वीडियो लगा। फिर जांच-परख करने पर यह दिखा कि जिन चैनलों और एजेंसियों के कैमरे वीडियो में दिख रहे थे, उन सबकी वेबसाइटों पर यह वीडियो दिखा, तो हैरानी तो बनी रही, शक जाता रहा।
अब कल 16 अगस्त को, एक दिन बाद ही रामदेव का एक दूसरा बयान कैमरों पर आया है। इसमें उन्होंने कहा है- आंदोलन में बच्चों को नहीं धकेलना चाहिए, बच्चे आंदोलन करेंगे, तो पढ़ेंगे कब? वे शांतिपूर्ण आंदोलन का समर्थन करते हैं, लेकिन अराजक आंदोलन का नहीं। उन्होंने कहा देश का बचपन खतरे में है, इसलिए इस समय देश का सबसे बड़ा मुद्दा यही है। कुछ लोग बचपन का इस्तेमाल आंदोलन में कर रहे हैं। उन्होंने कहा यदि देश का बच्चा प्रायमरी स्कूल में पढ़ रहा है, और आप उसको आंदोलन में धकेल देंगे, तो बच्चा पढ़ेंगे कब? उसको पता ही नहीं कि आंदोलन क्या होता है। लेकिन आपने उसको आंदोलन में धकेल दिया कि जाओ तुम थाने का घेराव करो, सडक़ों पर उतर जाओ, डीएम-एडीएम का घेराव करो। छोटे बच्चों को आंदोलन में नहीं धकेलना चाहिए, ऐसा पूरी दुनिया में कहीं नहीं होता है। उन्होंने कहा देश में अराजक आंदोलन तो नहीं होना चाहिए, लेकिन संवैधानिक, लोकतांत्रिक, और नैतिक मूल्यों पर आधारित आंदोलन होने चाहिए। आंदोलन के नाम पर अराजकता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह किसी एक व्यक्ति के सामथ्र्य की बात नहीं है, कि वो देश की व्यवस्था बदल सके। इसके लिए तीन स्तर पर जागरूकता चाहिए, सामाजिक, राजनीतिक, और प्रशासनिक स्तर की जागरूकता।
इन दोनों बयानों के वीडियो पुख्ता कर लेने के बाद हम यहां इस पर लिखना जरूरी समझते हैं। स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते ही सार्वजनिक रूप से दर्जनों लोगों के बीच दर्जन भर से अधिक कैमरों पर दिया गया बयान, और अगले ही दिन उसी मुद्दे पर दिया गया बयान, एक ही व्यक्ति के नहीं लगते ये दो बयान। पहले दिन सरकार और व्यवस्था की आलोचना की जितनी बातें कही थीं, वे अगले दिन के बयान में गायब हो गईं। और अगले दिन आंदोलन कैसे-कैसे अराजक होते हैं, कैसे-कैसे उन्हें नहीं होना चाहिए, इस पर पूरी बात आ गई। एक दिन पहले जो बाबा यह चेतावनी दे रहा था कि सुधर जाओ, घपले ठीक कर लो, ऐसा न हो कि बाबा रामदेव को दोबारा आंदोलन करना पड़ जाए, वह अगले दिन बच्चों के सडक़ पर आने, या अफसरों से जाकर स्कूल की मांग करने के ही खिलाफ हो गया। जो व्यक्ति अपने को भारत के धर्म, आध्यात्म, योग, आयुर्वेद, और राष्ट्रवाद से जोडक़र पेश करता है, और इन सारी बातों की मदद से अपना बाजारू कारोबार बढ़ाता है, कारोबारी गलत कामों के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर अखबारी पन्नों पर अदालती हुक्म से इश्तहार देकर माफी मांगता है, वह व्यक्ति 24 घंटे के भीतर अपनी जुबान, और अपनी बात इस तरह पलटता है!
ऐसा भी नहीं कि पहले दिन रामदेव के बयान को सुनकर हमें यह लगा हो कि इस बार यह बाबा सचमुच ही एक क्रांति के मूड में दिखता है। इसके ऐसे लटके-झटके पिछले डेढ़ दशक में तो अच्छी तरह दर्ज हैं। रजत शर्मा के शो में इसकी कही बातें अभी भी सोशल मीडिया पर वीडियो की शक्ल में तैरती रहती हैं कि किस तरह यह बेबुनियाद दावे करके नौजवानों से तालियां बजवा रहा था। इस बार हमें अधिक खराब यह लग रहा है कि बच्चों के स्कूल-कॉलेज की बदहाली, इम्तिहान के नाम पर उनके साथ धोखाधड़ी, और नौकरियों में होने वाली धांधलियों के मुद्दे को उठाने के बाद यह बाबा अगले दिन इन मुद्दों से कन्नी काट गया, और अपनी स्कूल की दिक्कतों के लिए आंदोलन करने को मजबूर बच्चों के खिलाफ हो गया! कोई व्यक्ति अपनी कही बातों को लेकर किस परले दर्जे का बेईमान हो सकता है, इसकी यह जीती जागती मिसाल है। गिरती छततले बैठे बच्चे, पानी में डूबते खड़े बच्चे, कीचड़ में डूबकर, नदी-नाले पार कर स्कूल पहुंचते बच्चे, इन बच्चों के साथ भी यह बेईमानी करने से यह आदमी नहीं चूका! लोग कहते हैं कि एक घर तो डायन भी छोड़ती है, छोटे-छोटे से तकलीफजदा बच्चों को लेकर तो किसी को अपने बयानों से ऐसा धोखा नहीं देना चाहिए। पहले दिन उनके लिए आंदोलन करने का दावा, और अगले ही दिन उनके आंदोलन को अराजक करार देना, ऐसा सार्वजनिक रूप से कोई भी इज्जतदार व्यक्ति तो नहीं कर सकते। इस देश के लोगों को ऐसे लोगों की शिनाख्त ठीक से करनी चाहिए।





